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भक्त या संत को सताने का फल


 

‘अदभुत रामायण’ में एक प्रसंग आता है, जिसे महर्षि वाल्मीकि जी ने समस्त पापों को हरने वाला और शुभ बताया है।

मानस पर्वत की कोटर में एक उल्लू रहता था, जो देवताओं, विद्याधरों, गंधर्वों और अप्सराओं का गायनाचार्य था। वह किस प्रकार गायनाचार्य के पद पर प्रतिष्ठित हुआ इस बारे  में देवर्षि नारद जी द्वारा पूछे जाने पर उसने वृत्तांत बताते हुए कहाः “हे नारद जी ! भुवनेश नामक एक धर्मात्मा राजा था। वह अनेकों अश्वमेध यज्ञ, वाजपेय यज्ञ कर चुका था। उसने करोड़ों गाय, स्वर्ण, वस्त्र, रथ, घोड़े आदि दान किये थे। वह अपनी प्रजा का अच्छी तरह से पालन करता रहा किंतु उसने भगवान के लिए गानयोग (गायन द्वारा गुणगान) पर प्रतिबंध लगा दिया था। वह कहता था कि “गानयोग से सिर्फ मेरा यशगान करो, जो मेरे सिवाय किसी और का गुणगान करेगा, वह मारा जायेगा।”

उसके राज्य में हरिमित्र नामक एक भक्त रहते थे। वे नदी-किनारे जाकर भगवान  का पूजन और वीणा बजाते हुए प्रीतिपूर्वक गुणगान करते थे।

राजा भुवनेश को इस बात का पता चला तो उसने अपने सैनिक भेजे। उन्होंने हरिमित्र की भजन-पूजन सामग्री नष्ट कर दी और उन्हें बंदी बनाकर राजा के सामने ले आये। सत्ता के मद में चूर हुए एवं चापलूसों की चाटुकारिता से अत्यंत घमंडी बने भुवनेश ने हरिमित्र का सबके सामने खूब अपमान किया, उनका धन छीनकर उन्हें राज्य से निकाल दिया।

समय बलवान है। कुछ समय बाद राजा मर गया। अपने कर्मों के फलस्वरूप वह उल्लू बना। सर्वत्र गति करने वाला होकर वह थोड़ा-सा भी भोजन प्राप्त नहीं कर सका। भूख से अत्यंत आर्त, खिन्न और दुःखित होता हुआ यमराज से कहने लगाः “हे देव ! मैं भूख से अत्यंत पीड़ित हूँ। मैंने ऐसा कौन सा पाप किया है और अब मुझे क्या करना चाहिए ?”

यमराज प्रकट होकर बोलेः “तुमने अनेक पाप किये हैं। तुमने हरिमित्र को भक्ति करने से रोका था, उनका धन छीना था। भगवान के गुणगान पर रोक लगाकर प्रजा से स्वयं का यशगान करवाया था। इसी कारण तुम्हारे स्वर्गादि लोक नष्ट हो गये। अब तुझे अपने पहले त्यागे हुए शरीर को नोच-नोचकर नित्य खाना होगा। इस प्रकार तुम्हें एक मन्वंतपर्यंत महानरक में निवास करना है। फिर कुत्ता होना पड़ेगा। उसके बाद दीर्घकाल बीतने पर तुम्हें मनुष्य देह की प्राप्ति होगी।”

हे नारद जी ! जो पूर्वकाल में राजा था, मैं वही हूँ, अब उल्लू की योनि को प्राप्त हुआ हूँ।

हे मुने ! उन भक्तराज को सताने का जो कर्म मैंने किया था, यह उसी का फल मुझे मिला है। तभी से मैं इस पर्वत की कोटर में रह रहा हूँ। मुझे भूख लगने पर खाने हेतु मेरी ही मृत शरीर मेरे सामने उपस्थित हो गया। मैं भूख से व्याकुल होकर जब खाने को तैयार हो गया, तभी दैवयोग से सूर्य के समान प्रकाशमान विमान पर आरूढ़, विष्णुदूतों के साथ हरिमित्र यहाँ आये। उन्होंने मुझे मृतदेह के पास देखा तो दयापूर्वक पूछाः “हे उलूक ! यह शरीर तो राजा भुवनेश का दिखाई दे रहा है ! तुम इसका भक्षण करने को क्यों उद्यत हो ?”

मैंने उन्हें प्रणाम किया और अपना समस्त वृत्तांत कहकर विनयपूर्वक कहाः “पूर्वकाल में आपके प्रति जो अपराध मुझसे बन गया था, यह उसी का फल है। इसके बाद मुझे कुत्ते की योनि मिलेगी। उसके पश्चात मनुष्य-जन्म मिलेगा।”

दयालु हरिमित्र करूणा से भरकर बोलेः “हे उलूक ! तुमसे जो अपराध हुआ था, मैं उसे क्षमा करता हूँ। यह शव अब अंतर्धान हो और तुम श्वान (कुत्ता) भी न बनो। मेरे प्रसाद से तुम्हें गानयोग की उपलब्धि होगी और भगवान की स्तुति गाने के लिए तुम्हारी जिह्वा स्पष्टता को प्राप्त होगी। तुम देवताओं, विद्याधरों, गंधर्वों और अप्सराओं के गायनाचार्य होकर विविध भाँति के भक्ष्य-भोज्यों से सम्पन्न हो जाओगे। इसके बाद कुछ ही दिनों में तुम्हारा सब प्रकार से कल्याण होगा।”

हे द्विज ! हरिमित्र के ऐसा कहते ही वह नारकीय दृश्य लुप्त हो गया। महापुरुषों की ऐसी ही करूणामयी प्रवृत्ति होती है। वे अपराध करने वालों के भी दुःखों को नष्ट कर देते हैं। इस प्रकार हरिमित्र अमृतमय वचन कहकर हरिधाम को गये। हे नारद जी ! इस प्रकार मुझे गायनाचार्य का पद प्राप्त हुआ।”

जरा सोचिये, जब भगवान को प्रीतिपूर्वक भजने वाले एक भक्त को सताने से ऐसी दुर्गति हुई तो भगवान के परम प्रिय ब्रह्मज्ञानी संतों को सताने से कितना भयंकर दोष लगेगा और कैसी दुर्गति होगी ! सताते समय पता न भी चले तो भी उस कर्म का फल तो भुगतना ही पड़ता है, अनेक नीच योनियों में जाना ही पड़ता है। नीच योनियों की सृष्टि ही ऐसे महापापों के फल भोगने के लिए हुई है, कोई शास्त्र पुराणों  पढ़कर देख ले। संत अपमान के महापाप के फल से कोई नहीं बचा सकता पर सच्चे दिल से उन्हीं से क्षमा-याचना कर ली जाय तो वे क्षमा भी कर देते हैं। संतों के अपमान से मनुष्य तबाही की खाई में गिरता है तो संतों की कृपा से ऊपर भी उठता है। उनकी सेवा तथा आज्ञापालन के द्वारा ऊँचे-में-ऊँचा मनुष्य-जन्म का सुफल परमानंद की प्राप्ति भी कर सकता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2016, पृष्ठ संख्या 14,15 अंक 278

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जब देवी ने ली दीक्षा


श्री नाभा जी महाराज कृत ‘भक्तमाल’ में कथा आती है कि श्री हरिव्यास जी संतों के साथ विचरण करते हुए चटथावल नामक ग्राम पहुँचे। वहाँ एक सुंदर वाटिका देख के वहीं अपना नित्य-नियम करके भोजन प्रसाद ग्रहण करने का विचार कर रहे थे। तभी वाटिका में देवी के मंदिर पर किसी ने बकरा मार के देवी को चढ़ाया। संतों के मन में अति पीड़ा व ग्लानि हुई। सभी ने निश्चय किया कि ‘इस स्थान पर प्रसाद तो क्या, पानी की एक बूँद भी नहीं पियेंगे।’ सब संतों के साथ श्री हरिव्यास जी भूखे ही रह गये।

दुष्ट भले संतों की निंदा करके, उन्हें सताकर अपना सर्वनाश करते हैं लेकिन पुण्यात्मा, समाज के सज्जन-समझदार लोग तो उनकी सेवा करके अपने कल्याण कर लेते हैं। यहाँ तक कि भगवान एवं देवी-देवता भी संतों और भक्तों की सेवा करने के लिए सदैव लालायित रहते हैं।

जैसे कुछ मूढ़ लोगों ने देवी के समक्ष ब्रह्मज्ञानी महापुरुष जड़भरत की बलि देने का प्रयास किया तो देवी ने प्रकट होकर बलि देने वालों का संहार किया व जड़भरत जी का अभिवादन किया, वैसे ही यहाँ देवी एक नवीन देह धारण करके संतों के पास आ के बोलीः “महात्मन् ! आप लोग भूखे क्यों हो ? भोजन-प्रसाद पाइये।”

श्री हरिव्यास जीः “यह हिंसा देख मन में अति ग्लानि हो रही है। अब प्रसाद कौन पाये !”

मानव-तनधारी देवी ने विनय कियाः “वह देवी मैं ही हूँ। अब मुझ पर कृपा कर मुझे अपनी शिष्या बनायें व प्रसाद ग्रहण करें।”

देवी की विनय व प्रार्थना से द्रवीभूत होकर श्री हरिव्यास जी ने उन्हें अपनी शिष्या बनाना स्वीकार किया। देवी भगवन्मंत्र सुन नगर की ओर दौड़ीं। उस नगर का जो मुखिया था, उसे खाटसमेत भूमि पर पटक के उसकी छाती पर चढ़कर कहने लगीं- “मैं तो श्री हरिव्यास जी की शिष्या, दासी हूँ। तुम लोग भी अगर उनके शिष्य, दास न होओगे तो अभी सबको मार डालूँगी।”

देवी की आज्ञा सुन के वे सबके सब श्री हरिव्यास जी के शिष्य बन गये। मंत्र, जप-माला, तिलक, मुद्रा ग्रहण कर मानो सबको नया जीवन प्राप्त हुआ। श्री हरिव्यास जी के कृपा-प्रसाद से गाँव के सभी लोग हलकी आदतें और बुरे कर्म छोड़कर दुःख, पाप, संताप मिटाने वाले प्रभुरस का पान करने के रास्ते चल पड़े।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2016, पृष्ठ संख्या 13, अंक 278

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सदगुरु से ही ब्रह्म को ब्रह्मत्व प्राप्त होता है


संत एकनाथ जी महाराज सदगुरु स्तुति करते हुए लिखते हैं- ‘हे सदगुरु परब्रह्म ! तुम्हारी जय हो ! ब्रह्म को ‘ब्रह्म’ यह नाम तुम्हारे कारण ही प्राप्त हुआ है। हे देवश्रेष्ठ गुरुराया ! सारे देवता तुम्हारे चरणों में प्रणाम करते हैं।

हे सदगुरु सुखनिधान ! तुम्हारी जय हो। सुख को सुखपना भी तुम्हारे कारण ही मिला है। तुमसे ही आनंद को निजानंद प्राप्त होता है और बोध को निजबोध का लाभ प्राप्त होता है। तुम्हारे ही कारण ब्रह्म ब्रह्मत्व प्राप्त होता है। तुम्हारे जैसे समर्थ एक तुम ही हो। ऐसे श्रीगुरु तुम अनंत हो। तुम कृपालु होकर अपने भक्तों को निजात्मस्वरूप का ज्ञान प्रदान करते हो। अपने निजस्वरूप का बोध कराकर देव-भक्त का भाव नहीं रहने देते हो।

जिस प्रकार गंगा समुद्र में मिलने पर भी उस पर चमकती रहती है, उसी प्रकार भक्त तुम्हारे साथ मिल जाने पर भी तुम्हारे ही कारण तुम्हारा भजन करते हैं। अद्वैत भाव से तुम्हारी भक्ति करने से तुम्हें परम संतोष होता है और प्रसन्न होने पर तुम शिष्यों के हाथों में आत्मसम्पत्ति अर्पण करते हो। शिष्य को निजात्मस्वरूप-दान से गुरुत्व देकर उसे महान बनाते हो, यह तुम्हारा अतिशय विलक्षण चमत्कार है !

जो वेद-शास्त्रों की समझ में नहीं आता, जिसके लिए वेद रात-दिन वार्ता कर रहे हैं, वह आत्मज्ञान तुम सत्शिष्य को एक क्षण में करा देते हो। करोड़ों वेद एवं वेदान्त का पठन करने पर भी तुम्हारे आत्मोपदेश की शैली किसी को भी नहीं आ सकती। अदृष्ट वस्तु ध्यान में आना सम्भव नहीं है। तुम्हारी कृपा-युक्ति का लाभ होने पर ही दुर्गम सरल होता है।

‘श्रीमद्भागवत’ अगम्य है, उस पर एकादश स्कंध का अर्थ अत्यंत गहन है लेकिन तुम सदगुरु समर्थ और कृपालु हो, इसलिए तुमने मुझसे उसका अर्थ प्राकृत भाषा में करवाया। जिस प्रकार माँ दही को मथकर उसका मक्खन निकाल के बालक को देती है, उसी प्रकार मेरे गुरुदेव जनार्दन स्वामी ने यहाँ किया है। वेद-शास्त्रों का मंथन कर व्यास जी ने ‘श्रीमद्भागवत’ निकाला, उस भागवत का  मथितार्थ (मथ के निकाला गया) यह ग्यारहवाँ स्कंध है, ऐसा निश्चित समझना चाहिए। उस एकादश स्कंध का माधुर्य स्वयं मेरी समझ में नहीं आया इसलिए मेरे सदगुरु जनार्दन स्वामी जी ने उसका मंथन कर उसका सार तत्त्व मुझे निकाल कर दिया। उसे सहज ही मुख में डाला तो एकादश की माधुरी मेरी समझ में आयी। उसी माधुर्य की चाह से यह टीका तैयार हो रही है। इसलिए एकादश स्कंध पर की यह टीका अकेले एक एकनाथ से नहीं बल्कि एक से एक मिलकर बाहर आ रही है। एक पीछे और एक आगे – यही एकादश अर्थात् ग्यारह का स्वरूप है।

सदगुरु जनार्दन स्वामी ने अपना एकपन एक में (अद्वैत) में दृढ़ किया। वही एकादश स्कंध के अर्थ में आया है। एका (एकनाथ) में एकत्व घुल-मिल गया। भोजन में जिस प्रकार मिष्टान्न का ग्रास होता है, उसी प्रकार भागवत में यह एकादश स्कंध है।

गुण-दोषों का दर्शन साधक के लिए घातक

भगवान श्री कृष्ण का उपदेश सुनकर उद्धवजी ज्ञानसम्पन्न हो गये। इससे अत्यधिक ज्ञातृत्व हो जाने के कारण ज्ञान-अभिमान होने की सम्भावना हुई। ‘सारा संसार मूर्ख है और एक मैं ज्ञाता हूँ’ – ऐसा जो अहंकार बढ़ता रहता है, वही गुण-दोषों की सर्वदा एवं सर्वत्र चर्चा कराता है। जहाँ गुण-दोषों का दर्शन होता है, वहाँ सत्य, ज्ञान का लोप हो जाता है।

साधकों के लिए इतना ज्ञान-अभिमान बाधक है। ईश्वर भी यदि गुण-दोष देखने लगें तो उनको भी बाधा आयेगी। इस प्रकार गुण दोषों का दर्शन साधक के लिए पूरी तरह घातक है। इसलिए प्रश्न किये बिना ही श्रीकृष्ण उद्धव को उसका उपाय बताते हैं। जिस प्रकार बालक को उसका हित समझ में नहीं आता, अतः उसकी माँ ही निष्ठापूर्वक उसका ख्याल रखती है, उसी प्रकार उद्धव के सच्चे हित की चिंता श्रीकृष्ण को थी। उद्धव का जन्म यादववंश में हुआ था और यादव तो ब्रह्मशाप से मरने वाले थे। उनमें से उद्धव को बचाने के लिए श्रीकृष्ण उसे सम्पूर्ण ब्रह्मज्ञान बता रहे हैं। जहाँ देहातीत ब्रह्मज्ञान रहता है, वहाँ श्राप का बंधन बाधक नहीं होता। यह जानकर ही श्रीकृष्ण ब्रह्मज्ञान का उपदेश देने लगे।

श्रीकृष्ण कहते हैं- ‘हे उद्धव ! संसार में मुख्यरूप से 3 गुण हैं। उन गुणों के कारण लोग भी 3 प्रकार के हो गये हैं। उनके शांत, दारुण और मिश्र – ऐसे स्वाभाविक कर्म हैं। उन कर्मों की निंदा या स्तुति हमें कभी नहीं करनी चाहिए क्योंकि एक के भलेपन का वर्णन करने से उन्हीं शब्दों से दूसरों को बुरा बोलने जैसा हो जाता है।

संसार परिपूर्ण ब्रह्मत्व स्वरूप है इसलिए निंदा या स्तुति किसी भी प्राणी की कभी नहीं करनी चाहिए। सभी प्राणियों में आत्माराम है इसलिए प्राण जाने पर भी निंदा या स्तुति नहीं करें। उद्धव ! निंदा स्तुति की बात सदा के लिए त्याग दो, तभी तुम्हें परमार्थ साध्य होगा और निजबोध से निज स्वार्थ प्राप्त होगा। उद्धव ! समस्त प्राणियों में भगवद्भाव रखना, यही ब्रह्मस्वरूप होने का मार्ग है। इसमें कभी भी धोखा नहीं है। जहाँ से अपाय (खतरे) की सम्भावना हो, यदि वहीं भगवद्भावना दृढ़ता से बढ़ायी जाये तो जो अपाय है, वही उपाय हो जायेगा। इस स्थिति को दूर छोड़ जो ‘मैं ज्ञाता हूँ’ ऐसा अहंकार करेगा और निंदा स्तुति का आश्रय लेगा वह अनर्थ में पड़ेगा।’

(श्रीमद् एकनाथी भागवत से)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2016, पृष्ठ संख्या 16,17 अंक 278

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