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काम और प्रेम में अन्तर


पूज्य बापू जी

प्रेम हर प्राणी के स्वतः सिद्ध स्वभाव में है लेकिन वह प्रेम जिस चीज में लगता है, वही रूप हो जाता है। प्रेम पैसों की तरफ जाता है तो लोभ बन जाता है, प्रेम परिवार के इर्द-गिर्द मंडराता है तो मोह बन जाता है, प्रेम शरीर या पद की तरफ जाता है तो अहंकार बन जाता है, प्रेम बहुजनहिताय की तरफ जाता है तो कर्मयोग बन जाता है, प्रेम प्रभु की तरफ जाता है तो भक्तियोग बन जाता है और प्रेम पूर्णता की तरफ जाता है तो पूर्ण प्रेम पूर्ण ही बना देता है।

सभी का ईश्वर के साथ स्वतः सिद्ध अपनत्व है, स्वतः सिद्ध प्रेम है, स्वतः सिद्ध अविनाशी नाता है। शरीर का और आपका नाता विनाशी है। पति-पत्नी का प्रेम काम की प्रधानता से है, सेठ और नौकर का प्रेम रूपये और कार्य की प्रधानता से है। दुनियावी प्रेम जो है, इन्द्रियों, मन और भोग की प्रधानता से है लेकिन जीवात्मा का परमात्मा से प्रेम स्वतः सिद्ध है।

सोचा मैं न कहीं जाऊँगा, यहीं बैठकर अब खाऊँगा।

जिसको गरज होगी आयेगा, सृष्टिकर्ता खुद लायेगा।।***

*** आत्मसाक्षात्कार के बाद एक बार पूज्य बापू जी परमात्म-मस्ती में विचरण करते हुए घने जंगल में मीलों अंदर जा के ध्यान में बैठ गये। अगले दिन सुबह भूख लगी तो पूज्य श्री ने हठ कर ली। तभी वहाँ दो किसान दूध व फल लेकर हाजिर हो गये !

यह प्रेम की परिभाषा है, अहं की भाषा होती तो भूखे मर जाते। यह स्वतः सिद्ध प्रेम की भाषा है। कानूनी प्रेम की भाषा, पति-पत्नी के प्रेम की भाषा होती तो भूखे मरते।

ज्यूँ ही मन विचार वे लाये, त्यूँ ही दो किसान वहाँ आये।

और किसान क्या बोलते हैं ? “रात को सपने में मार्ग देखा।” मेरे को तो सुबह विचार आया लेकिन मेरा प्रेमास्पद (परमात्मा) पहले ही सोचता है कि ‘इसे सुबह विचार आयेगा’ तो रात को स्वप्न में दिखा देता है किसानों को रास्ता !

बच्चे को माँ दुत्कार देती है, फिर भी बच्चा खिंच-खिंचकर माँ की तरफ आता है और कभी माँ का बच्चा मुक्के मार के रूठ के चला जाता है तो माँ- “बेटा ! खा ले, खा ले।….” कह के मनाने की कोशिश करती है।

बेटाः “नहीं खाना, मैं तुम्हारे घर में नहीं आऊँगा।” पैर पटकता-पटकता विद्यालय जाता है। कक्षा में बैठा है। दोपहर की छुट्टी होने के पहले माँ पहुँच जाती है।

माँ- “मास्टर साहब !….”

मास्टर साहबः “अरे माई ! रुको, रुको।….”

“अरे मेरा बेटा बिना खाये निकला है।”

माँ बुलाती हैः “बेटा !”

बेटा बोलता हैः “नहीं खाना है !”

“बेटा ! तू नहीं खायेगा तो मैं कैसे खाऊँगी ?”

माँ का प्रेम बेटे को खिलाये बिना नहीं रहता है और बेटा भी माँ को देखते-देखते फिर गले लग जाता है। प्रेम स्वतः सिद्ध है। स्वतः सिद्ध प्रेम को अगर पहचान लें तो नीरसता चली जायेगी और निर्दुःखता स्वाभाविक आ जायेगी।

जीव प्रेमस्वरूप परमात्मा का अभिन्न अंग है, जैसे तरंग समुद्र अथवा पानी का अभिन्न अंग है। कोई भी तरंग समुद्र अथवा पानी का अभिन्न अंग है। कोई भी तरंग आपको सड़क पर दौड़ती हुई मिले तो मुझे बताना। मैं आपका चेला बन जाऊँगा। जब भी तरंग दौड़ेगी तो पानी पर ही दौड़ेगी, सड़क पर नहीं दौड़ेगी। ऐसे ही जो फुरना होता है, जो विचार आते हैं, संकल्प-विकल्प होते हैं वे चैतन्यस्वरूप, प्रेमस्वरूप आत्मचैतन्य से ही उठते हैं। लेकिन वह प्रेम जब देखना, सूँघना, सुनना, चखना, स्पर्श करना – इन पाँच विकारों में भटकता है अथवा मान बढ़ाई, शारीरिक आराम या तामसी आराम में भटकता है तो यह प्रेम तबाही की तरफ ले जाता है।

भगवान राम के गुरुदेव वसिष्ठजी महाराज कहते हैं- “हे राम जी ! तीन पदार्थ बड़े अनर्थ हैं और परम सार के कारण हैं – एक तो लक्ष्मी (सम्पदा), दूसरा आरोग्य और तीसरा यौवन अवस्था।”

अगर इनका सदुपयोग प्रेमास्पद (ईश्वर) के लिये किया जाये तो परमात्मप्राप्ति शीघ्र होती है। अगर इनके द्वारा संसार के सुखों का उपभोग किया जाये तो जीव दुःखों की खाई में जा गिरता है, जन्म से जन्मांतर के चक्र में पहुँच जाता है। राजा नृग बड़ा प्रसिद्ध था लेकिन मरने के बाद गिरगिट हो गया क्योंकि प्रेम शरीर में था, भोगों में था। राजा अज मरने के बाद साँप हो गया।

प्रेम न खेतों ऊपजे प्रेम न हाट बिकाय।

राजा चहो प्रजा चहो शीश दिये ले जाय।। अहं दिये ले जाये।

प्रेम और वासना में क्या फर्क है ? वासना को कितना भी दो, तृप्ति नहीं होगी और प्रेम लेकर तृप्त नहीं होता है, देकर तृप्त होता है।

प्रेम जब संसार में लगता है अर्थात सरकने वाले गलियारों में जाता है तो वह विकार बनता है, काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार बनता है, हमें यश का गुलाम बनाता है, आराम का पिट्ठू बनाता है। ऐसा करके जीव को नीच गतियों में ले जाता है। ऐसे प्रेम को काम कहेंगे। काम जीव को भीतर से बाहर ले आता है और प्रेम बाहर से भीतर ले जाता है आत्मिक शांति में। कामनाएँ अशांति की तरफ ले जाती है और प्रेम परमात्म-शांति की तरफ ले जाता है। कामनाएँ  परिणाम में दुःख देती हैं और प्रेम परिणाम में आनंदस्वरूप ईश्वर के साथ एकाकार करता है। कामनाएँ विकारी हैं और प्रेम निर्विकारी है। कामनाएँ नाशवान हैं, ‘अभी यह खाऊँ, वह खाऊँ….यह देखूँ, वह देखूँ… यहाँ जाऊँ, वहाँ जाऊँ…’ उसके बाद दूसरी कामनाएँ पैदा हो जाती है और प्रेम अविनाशी की तरफ ले जाता है। कामना जड़ता की तरफ ले जाकर जीव को फँसाती है और प्रेम उसे चैतन्यस्वरूप की तरफ ले आता है। कामनाएँ वासना विकारों को बढ़ाती रहती हैं और भगवद्भक्ति व प्रेम इच्छाओं या कामनाओं को शांत करके भगवत्सुख, भगवत्शांति, भगवन्माधुर्य देते रहते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2016, पृष्ठ संख्या 16,17 अंक 277

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शास्त्रों का बोझा पटको, जीवंत महापुरुष की शरण लो


 

केसरी कुमार नाम के एक प्राध्यापक, जो स्वामी शरणानंद जी के भक्त थे, उन्होंने अपने जीवन की एक घटित घटना का जिक्र करते हुए लिखा कि मैं स्वामी श्री शरणानंद जी महाराज के पास बैठा हुआ था कि गीता प्रेस के संस्थापक श्री जयदयाल गोयंदकाजी एकाएक आ गये। थोड़ी देर बैठने के पश्चात बोलेः “महाराज ! मैं वेद और उपनिषद चाट गया। शास्त्र-पुराण सब पढ़ लिये। अनेक ग्रंथ कंठाग्र हैं। वर्षों से कल्याण पत्रिका में असंख्य जिज्ञासुओं के प्रश्नों के उत्तर देता रहा हूँ। किंतु महाराज ! मुझे कुछ हाथ नहीं लगा। मैं कोरा का कोरा हूँ।”
और वे अत्यन्त द्रवित हो गये। उन्हें अश्रुपात होने लगा।
मैंने एकांत में स्वामी जी से पूछाः “महाराज ! जब इन महानुभाव की यह दशा है, तब हम जैसों की आपके मार्ग में क्या गति होगी ?”
स्वामी जी एक क्षण चुप रहकर बोलेः “गोयंदकाजी के आँसुओं के रूप में धुआँ निकल रहा है भाई ! जो इस बात का लक्षण है कि लकड़ी में आग लग चुकी है। अध्ययन ईंधन है न, जले तो और न जले तो बंधन !”
मुझे चुप देखकर वे फिर ठहाका मारते हुए बोलेः “निराश न हो। तुम्हारे लिए भी एक नुस्खा है। भारी बोझ लेकर चलने वाले को देर होती ही है। गोयंदकाजी ने अपने माथे पर वेद-पुराणों का भारी गठ्ठर लाद रखा था, सो उन्हें पहुँचने में देर हो रही है। तुम्हारे माथे पर हलका बोझ है, जल्दी पहुँच जाओगे। बोझा पटक दो तो और जल्दी होगी। कार्तिकेय जी पृथ्वी परिक्रमा करते ही रहे और गणेश जी माता-पिता के चारों और घूमकर अव्वल हो गये।” (संदर्भः प्राकृत भारती अकादमी जयपुर द्वारा प्रकाशित ‘तरुतले’ भाग-1)
प्राध्यापक केसरी कुमार के जीवन में घटी यह घटना एक बड़े रहस्य की ओर इंगित करती है।
स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं- “हम भाषण सुनते हैं और पुस्तकें पढ़ते हैं, परमात्मा और जीवात्मा, धर्म और मुक्ति के बारे में विवाद और तर्क करते हैं। यह आध्यात्मिकता नहीं है क्योंकि आध्यात्मिकता पुस्तकों में, सिद्धान्तों में अथवा दर्शनों में निवास नहीं करती। यह विद्वता और तर्क में नहीं वरन् वास्तविक अंतःविकास में होती है। मैंने सब धर्मग्रंथ पढ़े हैं, वे अदभुत हैं पर जीवंत शक्ति तुमको पुस्तकों में नहीं मिल सकती। वह शक्ति, जो एक क्षण में जीवन को परिवर्तित कर दे, केवल उन जीवंत प्रकाशवान महान आत्माओं से ही प्राप्त हो सकती है जो समय-समय पर हमारे बीच में प्रकट होते रहते हैं।”
पूज्य बापू जी जैसे आत्मानुभव से प्रकाशवान जीवंत महापुरुष के मार्गदर्शन में उनके द्वारा बताये गये शास्त्रों का अध्ययन करना ठीक है लेकिन मनमानी पुस्तकों को पढ़ने वाले लोग प्रायः उलझ जाते हैं।
आद्य शंकराचार्य जी ने ‘विवेक चूड़ामणि’ में कहा हैः शब्दजालं महारण्यं चित्तभ्रमणकारणम्। सदगुरु के बिना यह चित्त को भटकाने का हेतु बन जाता है। अतः मनमुखी साधक सावधान ! व्यर्थ के वाणी-व्यय व मनमानी पुस्तकों में उलझने से बचो, औरों को बचाओ।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2016, पृष्ठ संख्या 9, अंक 277
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विचार की बलिहारी


‘नारद पुराण’ में आता है कि रैवत मन्वंतर में वेदमालि नामक एक प्रसिद्ध ब्राह्मण रहता था। विद्वान व शास्त्रज्ञ होने पर भी उसने अनेक उपायों से यत्नपूर्वक धन एकत्र किया। अपने व्रत, तप, पाठ आदि को भी दक्षिणा लेकर दूसरों के लिए संकल्प करके दे देता तथा शास्त्रनिषिद्ध व्यक्तियों से भी दान लेने में संकोच नहीं करता था।
‘मेरे पास कितना धन है’ यह जानने के लिए एक दिन उसने अपने धन को गिनना प्रारम्भ किया। उसका धन संख्या में बहुत ही अधिक था। धन की गणना करके वह हर्ष से फूल उठा। उस धनराशि को देखकर भगवान की कृपा से उसके चित्त में विचार का उदय हुआ, ‘मैंने नीच पुरुषों से दान ले के, न बेचने योग्य वस्तुओं का विक्रय करके तथा तपस्या आदि को बेच के यह प्रचुर धन एकत्र किया है। किंतु मेरी अत्यंत दुःसह तृष्णा अब भी शांत नहीं हुई। अहो ! मैं तो समझता हूँ, यह तृष्णा बहुत बड़ा कष्ट है। समस्त क्लेशों का कारण भी यही है। इसके कारण मनुष्य यदि समस्त कामनाओं को प्राप्त कर ले तो भी पुनः दूसरी वस्तुओं की अभिलाषा करने लगता है। बुढ़ापे में मनुष्य के केश पक जाते हैं, दाँत गल जाते हैं, आँख और कान भी जीर्ण हो जाते हैं किंतु यह तृष्णा शांत नहीं होती। मेरी सारी इन्द्रियाँ शिथिल हो रही हैं, बुढ़ापे ने मेरे बल को भी नष्ट कर दिया। किंतु तृष्णा तरुणी हो के और भी प्रबल हो उठी है। जिसके मन में कष्टदायिनी तृष्णा है, वह विद्वान होने पर भी मूर्ख हो जाता है, अत्यंत शांत होने पर भी महाक्रोधी हो जाता है और बुद्धिमान होने पर भी अत्यंत मूढ़बुद्धि हो जाता है।’
पश्चाताप करके वेदमालि ने अपने उद्धार के लिए हृदयपूर्वक भगवान से प्रार्थना की। उसने निश्चय किया कि ‘शेष जीवन संतों की सेवा, भगवद्-ध्यान, भगवद्-ज्ञान व भगवद्-सुमिरन में लगाऊँगा।’ अपने धन को उसने सरोवर, प्याउएँ, गौशालाएँ बनवाने, अन्नदान करने आदि में लगा दिया और किसी आत्मतृप्त संत-महात्मा की खोज एवं तपस्या के लिए नर-नारायण ऋषि के आश्रम बदरीवन की ओर चल पड़ा। वहाँ उसे मुनिश्रेष्ठ जानंति मिले।
वेदमालि ने हाथ जोड़कर विनय से कहाः “भगवन् ! आपके दर्शन से मैं कृतकृत्य हो गया। अब ज्ञान देकर मेरा उद्धार कीजिये।”
मुनिश्रेष्ठ जानंति बोलेः “महामते ! दूसरे की निंदा, चुगली तथा ईर्ष्या, दोषदृष्टि भूलकर भी न करो। सदा परोपकार में लगे रहो। मूर्खों से मिलना-जुलना छोड़ दो। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य छोड़कर लोक (जगत) को अपने आत्मा के समान देखो, इससे तुम्हें शांति मिलेगी। पाखंडपूर्ण आचार, अहंकार और क्रूरता का सर्वथा त्याग करो। सब प्राणियों पर दया तथा साधु पुरुषों की सेवा करते रहो। वेदांत का स्वाध्याय करते रहो। ऐसा करने पर तुम्हें परम उत्तम ज्ञान प्राप्त होगा। ज्ञान से समस्त पापों का निश्चय ही निवारण एवं मोक्ष हो जाता है।”
मुनि के उपदेशानुसार बुद्धिमान वेदमालि ज्ञान के साधन में लगे रहे। ‘मैं ही उपाधिरहित, स्वयं प्रकाश, निर्मल ब्रह्म हूँ’ – ऐसा निश्चय करने पर उन्हें परम शांति प्राप्त हो गयी। इस प्रकार गुरुकृपा से वे आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो गये।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2016, पृष्ठ संख्या 13, अंक 277
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