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अपना इरादा पक्का बना लो बस – पूज्य बापू जी


आप सदैव शुभ संकल्प करो, मंगलकारी संकल्प करो, विधेयात्मक संकल्प करो, सुखद संकल्प करो। तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु। हमारा संकल्प शिवसंकल्प हो अर्थात् मंगलकारी संकल्प हो।

परिस्थितियाँ कैसी भी हों, प्रतिकूल हों चाहे अनुकूल हों, उनमें डूबो मत, उनका उपयोग करो।

यह तो प्रसिद्ध कहावत है कि

“रोते-रोते क्या है जीना,

नाचो दुःख में तान के सीना।…

रात अंधियारी हो, घिरी घटाएँ काली हों।

रास्ता सुनसान हो, आँधी और तूफान हों।

मंजिल तेरी दूर हो, पाँव तेरे मजबूर हों।

तो क्या करोगे ? डर जाओगे ?”

“ना…”

“रूक जाओगे?”

“ना….”

“तो क्या करोगे?”

“बम बम ॐॐ, हर हर ॐॐ, हर हर ॐॐ….”

शिव संकल्प कौन सा करें ?

‘वकील बनना है, डॉक्टर बनना है, मंत्री बनना है, प्रधानमंत्री बनना है, फलाना बनना है….’ – ये बहुत छोटे संकल्प हैं। ‘सारी सृष्टि का जो आधार है, उस आत्मा-परमात्मा को मुझे जानना है।’ बस, तो प्रधानमंत्री का पद भी तुम्हारे उस परमेश्वरप्राप्ति के संकल्प के आगे नन्हा हो जायेगा। एक बार आप ठीक से सोच लो कि ‘बस, मुझे यह करना है। कुछ भी हो मुझे अपने ईश्वरत्व को जानना है, आत्मा-परमात्मा को जानना है एवं अपने प्यारे के आनंद, ज्ञान, माधुर्य, सान्निध्य का अनुभव करना है।’ प्रधानमंत्री होने में अपनी तरफ से ही बल लगेगा, लोगों का सहयोग लेना पड़ेगा लेकिन परमात्मा की प्राप्ति में लोगों के सहयोग की जरूरत नहीं पड़ेगी। अपने बल पर भी इतनी कोई मेहनत नहीं है। केवल इतना इरादा बन जाये उसे पाने का बस ! फिर जितनी सच्चाई मार्गदर्शन और सहयोग देता जायेगा। ऐसा ही तो हुआ। हम कोई अपने बल पर ईश्वर तक पहुँचे हैं क्या ? नहीं। ‘ईश्वर को ही पाना है’ – इस पक्के इरादे से ईश्वर को खींचकर आना पड़ा।

शिव संकल्प शक्ति विकसित करने का उपाय

परमात्मप्राप्ति की तड़प अभी तुरंत नहीं भी बढ़ा सको तो कम से कम परमात्मा के नाम का जप चालू करो। सुबह नींद में से उठे फिर ‘हरि ॐ …ॐ….ॐ….आनंद….ॐ….ॐ….ॐ…. आरोग्य…..’ – ऐसा कुछ समय जप किया फिर दातुन-स्नान आदि करके दीया जलाकर 10 मिनट ऐसा जप करो। शुभ संकल्प करो। थोड़ा ‘जीवन रसायन’ पुस्तक पढ़ो, थोड़ा ‘ईश्वर की ओर’ पढ़ो और उसी का चिंतन करो। फिर 5 मिनट मन से जप करो, फिर 4-5 मिनट  वाणी से करो अथवा 2 मिनट वाणी से, 3 मिनट मन से – ऐसा आधा घंटा रोज करो। फिर त्रिबंध करके 10 प्राणायाम करो, देखो कैसा लाभ होता है ! पूरा स्वभाव और आदतें बदल जायेंगी। लेकिन 3 दिन किया फिर 5 दिन छुट्टी कर दी तो फिर भाई कैसे चलेगा ! साधना में सातत्य चाहिए। ईश्वरप्राप्ति के रास्ते चलते हैं तो ईश्वर से दूर ले जाने वाले साधना-विरोधी कर्म छोड़ दें। हम लोग थोड़ी साधना करते हैं फिर थोड़ा विपरीत करते हैं फिर जरा साधना करते है… ऐसे गड़बड़ घोटाला हो जाता है, सातत्य चाहिए। सतत लगा रहे तो 6 महीने में तो जापक का जप सिद्ध हो जाय, ईश्वरप्राप्ति हो जाये। 12 महीने में कोई एम.डी. नहीं होता है, एम.ए. या एम.बी.बी.एस. नहीं होता है लेकिन एम.बी.बी.एस. वाले मत्था टेककर अपना भाग्य बना लें ऐसा साक्षात्कार कर सकता है। बोले, ‘मैं कान का विशेषज्ञ हूँ, मैं दाँत का विशेषज्ञ हूँ…’ फिर भी इसमें भी कहीं कुछ बाकी रह जाता है लेकिन उस परमेश्वर-तत्व को जानो तो एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय। अतः सब करो लेकिन एक के लिए पूरा संकल्प करो कि ‘ईश्वर को पाना है, बस ! ॐॐॐ….’

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2014, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 262

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स्वादिष्ट और बलदायक केला


केला एक ऐसा विलक्षण फल है जो शारीरिक व बौद्धिक विकास के साथ उत्साहवर्धक भी है। पूजन-अर्चन आदि कार्यों में भी केले का महत्वपूर्ण स्थान है। केले में शर्करा, कैल्शियम, पोटैशियम, सोडियम, फॉस्फोरस, प्रोटीन्स, विटामिन ए, बी, सी, डी एवं लौह, ताँबा, आयोडीन आदि तत्वों के साथ ऊर्जा का भरपूर खजाना है।

लाभः पका केला स्वादिष्ट, भूख बढ़ाने वाला, शीतल, पुष्टिकारक, मांस एवं वीर्यवर्धक, भूख-प्यास को मिटाने वाला तथा नेत्ररोग एवं प्रमेह में हितकर है।

केला हड्डियों और दाँतों को मजबूती प्रदान करता है। छोटे बच्चों के शारीरिक व बौद्धिक विकास के लिए केला अत्यन्त गुणकारी है।

एक पका केला रोजाना खिलाने से बच्चों का सूखा रोग मिटता है।

यह शरीर व धातु की दुर्बलता दूर करता है, शरीर को स्फूर्तिवान तथा त्वचा को कांतिमय बनाता है और रोगप्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाता है।

केला अन्न को पचाने में सहायक है। भोजन के साथ 1-2 पके केले प्रतिदिन खाने से भूख बढ़ती है।

खून की कमी को दूर करने के लिए तथा वजन बढ़ाने के लिए केला विशेष लाभकारी है।

आसान घरेलु प्रयोग

स्वप्नदोषः 2 अच्छे पके केलों का गूदा खूब घोंटकर उसमें 10-10 ग्राम शुद्ध शहद व आँवले का रस मिला के सुबह शाम कुछ दिनों तक नियमित लेने से लाभ होता है।

प्रदर रोगः महिलाओं को सफेद पानी पड़ने की बीमारी- सुबह शाम एक-एक खूब पका केला 10 ग्राम गाय के घी के साथ खाने से करीब एक सप्ताह में ही लाभ होता है।

शीघ्रपतनः एक केले के साथ 10 ग्राम शुद्ध शहद लगातार कम-से-कम 15 दिन तक सेवन करें। शीघ्रपतन के रोगियों के लिए यह रामबाण प्रयोग माना जाता है।

आमाशय व्रण (अल्सर) पके केले खाने और भोजन में दूध व भात लेने से अल्सर में लाभ होता है।

उपरोक्त सभी प्रयोगों में अच्छे से पके चित्तीदार केले धीरे-धीरे, खूब चबाते हुए खाने चाहिए। इसमें केले आसानी से पच जाते हैं, अन्यथा पचने में भारी भी पड़ सकते हैं। अधिक केले खाने से अजीर्ण हो सकता है। केले के साथ इलायची खाने से वह शीघ्र पच जाता है। अदरक भी केला पचाने में सहायता करता है।

सावधानियाँ– केला भोजन के समय या बाद में खाना उचित है। मंदाग्नि, गुर्दों से संबंधित बीमारियों, कफजन्य व्याधियों से पीड़ित व मोटे व्यक्तियों को इसका सेवन नहीं करना चाहिए। केले का छिलका हटाने के बाद तुरंत खा लेना चाहिए। केले, अन्य फल व सब्जियों को फ्रिज में उनके पौष्टिक तत्व नष्ट होते हैं।

तिथि अनुसार आहार विहार

चतुर्दशी को उड़द खाना महापापकारी है। (ब्रह्मवैवर्तपुराण, ब्रह्म खण्डः 27.35)

अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रांति, चतुर्दशी, अष्टमी, रविवार, श्राद्ध और व्रत के दिन रक्तवर्ण का साग और काँसे के पात्र में भोजन निषिद्ध है।

(ब्रह्मवैवर्त पुराणः ब्रह्म खण्ड) 27.37-38

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2014, पृष्ठ संख्या 30, अंक 261

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सगर्भावस्था में निषिद्ध आहार


गर्भ रहने पर गर्भिणी किसी भी प्रकार के आसव-अरिष्ट (कुमारी आसव, दशमूलारिष्ट आदि), उष्ण-तीक्ष्ण औषधियों, दर्द-निवारक (पेन किल्लर) व नींद की गोलियों, मरे हुए जानवरों के रक्त से बनी रक्तवर्धक दवाइयों एवं टॉनिक्स तथा हानिकारक अंग्रेजी दवाइयों आदि का सेवन न करें।

इडली, डोसा, ढोकला जैसे खमीरयुक्त, पित्तवर्धक तथा चीज़, पनीर जैसे पचने में भारी पदार्थ न खायें। ब्रेड, बिस्कुट, केक, नूडल्स (चाऊमीन), भेलपुरी, दहीबड़ा जैसे मैदे की वस्तुएँ न खाकर शुद्ध घी व आटे से बने तथा स्वास्थ्यप्रद पदार्थों का सेवन करें।

कोल्डड्रिंक्स व डिब्बाबंद रसों की जगह ताजा नींबू या आँवले का शरबत ले। देशी गाय के दूध, गुलकंद का प्रयोग लाभकारी है।

मांस, मछली, अंडे आदि का सेवन कदापि न करें।

आयुर्वेदानुसार सगर्भावस्था में किसी भी प्रकार का आहार अधिक मात्रा में न लें। षड् रसयुकत् आहार लेना चाहिए परंतु केवल किसी एकाध प्रिय रस का अति सेवन दुष्परिणाम ला सकता है।

इस संदर्भ में चरकाचार्य जी ने बताया हैः

मधुरः सतत् सेवन करने से बच्चे को मधुमेह (डायबिटीज), गूँगापन, स्थूलता हो सकती है।

अम्लः इमली, टमाटर, खट्टा दही, डोसा, खमीरवाले पदार्थ अति प्रमाण में खाने से बच्चे को जन्म से ही नाक से खून बहना, त्वचा व आँखों के रोग हो सकते हैं।

लवण (नमक)– ज्यादा नमक लेने से रक्त में खराबी आती है, त्वचा के रोग होते हैं। बच्चे के बाल असमय में सफेद हो जाते हैं, गिरते हैं, गंजापन आता है, त्वचा पर असमय झुर्रियाँ पड़ती हैं तथा नेत्रज्योति कम होती है।

तीखाः बच्चा कमजोर प्रकृति का, क्षीण शुक्रधातुवाला व भविष्य में संतानोत्पत्ति में असमर्थ हो सकता है।

कड़वाः बच्चा शुष्क, कम वजन का व कमजोर हो सकता है।

कषायः अति खाने पर श्यावता (नीलरोग) आती है, उर्ध्ववायु की तकलीफ रहती है।

सारांश यही है कि स्वादलोलुप न होकर आवश्यक संतुलित आहार लें।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2014, पृष्ठ संख्या 25, अंक 261

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