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संस्कार ही सही और गलत राह पर ले जाते हैं – पूज्य बापू जी


जीवन में सावधानी नहीं है तो जिससे सुख मिलेगा उसके प्रति राग हो जायेगा और जिससे दुःख मिलेगा उसके प्रति द्वेष हो जायेगा। इससे इससे अनजाने में ही चित्त में संस्कार जमा होते जायेंगे एवं वे ही संस्कार जन्म मरण का कारण बन जायेंगे।

ʹयहाँ सुख होगाʹ ऐसी जब अंतःकरण में संस्कार की धारा चलती है तो ज्ञान तुमको उस कार्य में प्रवृत्त करता है। ʹयहाँ दुःख होगाʹ ऐसी धारा होती है तो वहाँ से तुम निवृत्त होते हो। ज्ञान ही प्रवर्त्तक है, ज्ञान ही निर्वतक है। वस्तु, व्यक्ति, परिस्थितियाँ ये सुख और दुःख के ऊपरी साधन हैं लेकिन सुख-दुःख के ऊपरी-ऊपरी साधन हैं लेकिन सुख-दुःख का मूल कहाँ हैं इसका अगर ज्ञान हो जाये तो तुम शुद्ध ज्ञान में पहुँच जाओगे। प्रवृत्ति व निवृत्ति का ज्ञान मूल में तो आता है चैतन्य से लेकिन तुम्हारे संस्कारों की भूलों से वह ज्ञान ले ले के इधर-उधर भटक के तुम पूरा कर देते हो। अगर ज्ञानस्वरूप ईश्वर के मूल में जाने की कुछ बुद्धि सूझ जाय, भूख जग जाय तो सारे सुखों का मूल अपना आत्मदेव है – परमेश्वर। जब अपने ही घर में खुदाई है, काबा का सिजदा कौन करे ! काशी में कौन जाय !

दो व्यक्ति लड़ रहे हैं। क्यों लड़ रहे हैं ? एक को है कि ʹयह मेरा कुछ ले जायेगा।ʹ दूसरे को है कि ʹछीन लो।ʹ तो भय लड़ रहा है, लोग लड़ रहा है लेकिन ज्ञान दोनों में है। ज्ञानस्वरूप चेतन तो है लेकिन भय के संस्कार और लोभ के संस्कार लड़ा रहे हैं। ऐसे ही राग के संस्कार और द्वेष के संस्कार भी लड़ा रहे हैं।

राक्षसों को रावण के प्रति राग है और हनुमानजी के प्रति द्वेष है तो वे राम जी के विरूद्ध लड़ाई करेंगे और हनुमानजी व बंदरों को राम जी के प्रति प्रेम है और राक्षसों के प्रति नाराजगी है तो वे राक्षसों से लड़ेंगे लेकिन लड़ने की सत्ता, ज्ञान तो वही का वही है। गीजर में तार गयो तो पानी गरम होगा और फ्रिज में गया तो ठंडा लेकिन विद्युत वही का वही। सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म। वह सत्स्वरूप, ज्ञानस्वरूप और अन्त न होने वाला है, मरने के बाद भी ज्ञानस्वरूप आत्मदेश का अंत नहीं होता।

किसी के कर्म सात्त्विक होते हैं तो उसके संस्कार वैसे होंगे। जैसे – तुम्हारे कर्म सात्त्विक है तो सत्संग में आऩे का संस्कार, ज्ञान तुम्हें यहाँ ले आया। अगर शराबी-कबाबी होता तो बोलताः ʹरविवार का दिन है, चलो भाई ! शराबखाने में जायेंगेʹ, पिक्चरबाज होता तो थियेटर में ले जाता। तो ज्ञान के आधार से संस्कार तुम्हें यहाँ-वहाँ ले जा रहे हैं।

तो कोई चीज बुरी और भली कैसे ? कि संस्कारों के अनुसार। मेरे सामने कोई तुलसी डाली हुई कुछ सात्त्विक चीज-वस्तु-प्रसाद ले आता है तो मैं कहता हूँ- ʹचलो भाई ! थोड़ा रखो, थोड़ा ले जाओʹ लेकिन यदि कोई मांस, मदिरा, अंडा आदि ले आयेगा तो मैं कहूँगा- ʹए… बेवकूफ है क्या ? यह क्या ले आया !ʹ लेकिन वही चीज शराबी-कबाबी के पास ले जाओ तो बोलेगाः ʹयार ! उस्ताद !! आज तो सुभान-अल्लाह है।ʹ और मेरा प्रसाद ले जाओगे तो बोलेगाः ʹअरे छोड़ ! बाबा लोगों की क्या बात करता है, यह आमलेट पड़ा है, मैं मौज मार रहा हूँ।ʹ

तो उसके तामस, नीच संस्कार हैं तो उसका ज्ञान नीचा हो जाता है। यदि मध्यम संस्कार हैं तो उसका ज्ञान मध्यम हो जाता है और उत्तम संस्कार हैं तो उसका ज्ञान उत्तम हो जाता है। यदि भगवदीय संस्कार हैं तो उसका ज्ञान भगवन्मय हो जाता है और ब्रह्मज्ञान के संस्कार हैं तो उसका ज्ञान अपने मूल स्वभाव को जानकर उसे मुक्तात्मा, महान आत्मा बना देता है, साक्षात्कार करा देता है।

जो कुछ परिवर्तन और प्राप्ति है वह मनुष्य-जीवन में ही है। जो किसी विघ्न-बाधा के आने पर सोचता हैः ʹयहाँ से चला जाऊँ, भाग जाऊँ….ʹ, वह आदमी अपने जीवन में कुछ नहीं कर सकता। वह कायर है, कायर ! हतभागी है। मन्दाः सुमन्दमतयाः। वे ही हलके संस्कार अगर आगे आते हैं तो हल्का प्रकाश होता है। जैसे बरसात तो वही-की-वही लेकिन कीचड़ में पड़ती है तो दलदल हो जाती है, सड़क पर पड़ती है तो डीजल और गोबर के दाग धोती है, खेत में पड़ती है तो धान हो जाता है और स्वाती नक्षत्र के दिनों में सीप में पड़ती है तो मोती हो जाती है। पानी तो वही का वही लेकिन सम्पर्क कैसा होता है ? जैसा सम्पर्क वैसा लाभ होता है। ऐसे ही ज्ञान तो वही-का-वही लेकिन संस्कार कैसे हैं ? संस्कार अगर दिव्य होते जायें तो ज्ञान की दिव्यता का फायदा मिलेगा। संस्कार दिव्य कैसे होते हैं ?

दुनियादारी में तो दिव्य संस्कार आते ही नहीं हैं। राग, द्वेष, काम, क्रोध, लोभवाले ही संस्कार आते हैं। तो बोलेः ʹध्यान भजन करें।ʹ

ध्यान-भजन दुनियादारी से तो अच्छा है, इससे बुद्धि तो अच्छी होती है लेकिन इससे भी ऊँची बात है सत्संग।

तन सुखाय पिंजर कियो, धरे रैन दिन ध्यान।

ध्यान अच्छा तो है, दिन-रात कोई ध्यान कर ले लेकिन-

तुलसी मिटे न वासना, बिना विचारे ज्ञान।

वासना इधर-उधर भटकती है। एकाग्र होने के बाद भी संकल्प करके आदमी दिव्य लोकों में और दिव्य भोगों में उलझ सकता है, इसीलिए उसको सत्संग चाहिए और सत्संग से ज्ञान के दिव्य संस्कार जागृत होते हैं। इसलिए बोलते हैं-

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लब सतसंग।।

अर्थात् स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाये तो भी वे सब मिलकर दूसरे पलड़े पर रखे हुए उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो क्षणमात्र के सत्संग से मिलता है। (श्रीरामचरित. सुं.कां.-4)

सो जानब सतसंग प्रभाऊ।

लोकहुँ बेद न आन उपाऊ।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2013, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 245

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मंत्रजप से शुद्ध होते हैं जन्मकुण्डली के बारह स्थान – पूज्य बापू जी


शास्त्रों में जन्मकुण्डली के बारह स्थान बताये गये हैं। एक करोड़ जप पूरा होने पर उनमें से प्रथम स्थान-तनु स्थान शुद्ध होने लगता है। रजो-तमोगुण शांत होकर रोगबीजों व जन्म-मरण के बीजों का नाश होता है तथा शुभ स्वप्न आने लगते हैं। संतों, देवताओं व भगवान के दर्शन होने लगते हैं। कभी कम्पन होने लगेगा, कभी हास्य आने लगेगा, कभी नृत्य उभरेगा, कभी आप सोच नहीं सकते ऐसे-ऐसे रहस्य प्रकट होंगे। निगुरों के आगे इन रहस्यों को प्रकट नहीं करना चाहिए। रात को सोते समय कंठ में गुरु जी के साथ तादात्म्य करके सो गये तो गुरु शिष्य का संबंध जुड़ जाता है। श्रद्धा तीव्र है तो संबंध जल्दी जुड़ता है अन्यथा दो तीन महीने में जुड़ जाता है। स्वप्न में गुरु अथवा संत के दर्शन होने लगें तो समझो एक करोड़ जप का फल फलित हो गया।

अगर दो करोड़ जप हुआ तो कुंडली का दूसरा स्थान-कुटुम्ब स्थान शुद्ध व प्रभावशाली हो जाता है। धन की प्राप्ति होगी, कुटुम्ब का वियोग नहीं होगा। समता ,शांति व माधुर्य स्वाभाविक हो जायेगा। कुटुम्ब स्थान शुद्ध होने पर नौकरी व धनप्राप्ति के लिए भटकने की जरूरत नहीं पड़ेगी। जैसे व्यक्ति की छाया उसके पीछे चलती है, ऐसे ही धन और यश उसका दास होकर उसके पीछे चलेंगे।

तीन करोड़ जप  की संख्या पूरी होने पर जन्मकुण्डली का तीसरा स्थान या सहज स्थान शुद्ध हो जाता है, जाग जाता है। असाध्य कार्य आपके लिए साध्य हो जाता है। लोग आपको प्रेम करने लगेंगे, स्नेह करने लगेंगे। आपकी उपस्थितिमात्र से लोगों की प्रेमावृत्ति छलकने लगेगी।

अगर चार करोड़ जप हो जाता है तो चौथा स्थान – सुख स्थान, मित्र स्थान शुद्ध हो जाता है। शरीर और मन के आघात नहीं के बराबर हो जायेंगे। मानसिक उपद्रव की घटनाएँ होंगी लेकिन आपका मन उन सबसे निर्लेप रहेगा। डरने की बात नहीं है कि चार करोड़ जप कब पूरा होगा। साधारण जगह पर जप की अपेक्षा तुलसी की क्यारी के नजदीक एक जब दस जप के बराब होता है। देवालय अथवा आश्रम में प्राणायाम करके किया गया एक जप सौ गुना ज्यादा फल देता है। ब्रह्मवेत्ता गुरु के आगे किया एक जप हजारों गुना फल देता है। संयम, श्रद्धा, एकाग्रता व तत्परता जितने अंशों में मजबूत होंगे, जप उतना ज्यादा प्रभावी होगा। सोमवती अमावस्या और ऐसी मंगलमय तिथियों के दिनों में जप का फल 10 हजार गुना हो जाता है। सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण में लाख गुना हो जाता है। दुष्कर्मों का त्याग करके किये गये जप का फल अनंत गुना हो जाता है।

पाँच करोड़ जप पूरा होने पर पाँचवाँ स्थान-पुत्र स्थान शुद्ध हो जायेगा। अपुत्रवान को पुत्र हो जायेगा। अपुत्रवान को आप पुत्र देने की युक्ति सिद्ध कर लेंगे।

छः करोड़ जप पूरा होने पर छठा स्थान-रिपु स्थान शुद्ध हो जायेगा। कोई आपसे शत्रुता नहीं रख सकेगा। किसी  ने शत्रुता की तो प्रकृति उसको दंडित करेगी। शत्रु वे रोग से आपको निपटना नहीं पड़ेगा, जप की शक्ति उससे निपटेगी।

सात करोड़ जप पूरा होने पर आपकी जन्मकुण्डली का सातवाँ स्थान-स्त्री स्थान शुद्ध हो जाता है। आपकी शादी नहीं हो रही है तो शादी हो जायेगी। दूसरे की शादी नहीं हो रही है तो उसके लिए आपकी दुआ भी काम करने लगेगी। दाम्पत्य सुख अनुकूल होगा। आपके सभी रिश्तेदार, पत्नी, बच्चे, ससुराल पक्ष के लोग आपसे  प्रसन्न रहने लगेंगे। आपको किसी को रिझाना नहीं पड़ेगा, सभी आपको रिझाने का मौका खोजते फिरेंगे। भगवद्-जप से आप इतने पावन होने लगेंगे ! फिर निर्णय क्यों नहीं करते कि ʹमैं दो करोड़ की संख्या पूरी करूँगा।ʹ तीन, चार, पाँच करोड़…. जितने का भी हो ठान लो बस।

अगर आठ करोड़ जप हो गया तो आठवाँ स्थान – मृत्यु स्थान शुद्ध हो जायेगा। फिर आपकी चाहे गाड़ियों, मोटरों अथवा जहाज या हेलिकाप्टर से भयंकर दुर्घटना ही क्यों न हो लेकिन आपकी अकाल मृत्यु नहीं हो सकती है। मृत्यु के दिन ही मृत्यु होगी, उसके पहले नहीं हो सकती। चाहे आप गौरांग की नाई उछलते हुए दरियाई तूफान की लहरों में प्रेम से कूद जायें तो भी आपका बाल बाँका नहीं होगा।

आनंदमयी माँ बीच नर्मदा में नाव से कूद पड़ीं, तैरना नहीं जानती थी फिर भी हयात रहीं। लाल जी महाराज नर्मदा की बाढ़ में आ गये, वे तैरना नहीं जानते थे फिर भी उनकी जप-सत्ता ने मानो उनको पकड़ के किनारे कर दिया। मैंने ऐसे कई जप के धनियों को देखा भी है, शास्त्रों में पढ़ा-सुना भी है।

अगर नौ करोड़ जप  हो जाये तो मंत्र के देवता जप करते ही आपके सामने प्रकट हो जायेंगे, वार्तालाप करेंगे। समर्थ रामदास के आगे सीताराम प्रकट हो जाते थे, तुकारामजी के आगे रूकोबा विट्ठल (राधा कृष्ण) प्रकट हो जाते थे, लाल जी महाराज के सामने उनके इष्टदेव मंत्र जपते ही प्रकट हो जाते थे।

अगर दस करोड़ जप की संख्या पूरी कर ली तो जन्मकुंडली का दसवाँ स्थान-कर्म स्थान, पितृ स्थान शुद्ध हो जायेगा। दुष्कर्मों का नाश होगा और आपके सभी कर्म सत्कर्म हो जायेंगे। श्रीकृष्ण का युद्ध भी सत्कर्म हो जाता है, हनुमानजी का लंका जलाना भी सत्कर्म हो जाता है।

राम लखन जानकी, जय बोलो हनुमान की।

लंका जलायी तो कितने जल गये होंगे ! लेकिन हनुमान जी को दोष नहीं लगा।

अगर ग्यारह करोड़ जप हो गया तो ग्यारहवाँ स्थान-लाभ स्थान शुद्ध होता है। धन, घर, भूमि के तो लाभ सहज में होते जायेंगे। सत्त्वात्संजायते ज्ञानम्…. परमात्म-ज्ञान का प्रकाश हो जायेगा।

अगर बारह करोड़ जप हो जाता है तो क्या कहना ! आपका बारहवाँ स्थान – व्यय स्थान शुद्ध हो जाता है। वह इतना शुद्ध हो जाता है कि अनावश्यक व्यय बंद हो जायेंगा। रज-तम पूर्णत शांत हो जायेंगे। सत्त्वगुण की जो सिद्धि है दर्शन-अदर्शन, वह प्राप्त हो जायेगी। मेरे सामने ऐसा हुआ था। मेरे सामने जा रहे थे संत। जैसे ही मैं देखने को दौड़ा तो उसी समय वे अदृश्य हो गये।

जिन्हें हरिभक्ति प्यारी हो,

माता-पिता सहजे छुटे संतान अरू नारी।

माता-पिता और पति-पत्नी की मोह-ममता छूट जाती है और उनमें भी भगवद् भाव आने लगता है। जिसको भगवद् भक्ति का रंग लगता है, उसका नजरिया बदल जाता है। विकारी नजरिये की जगह भगवद् नजरिया आ जाता है। ममता की जगह पर भगवान आ जाते हैं। मोह, स्वार्थ और विकार की जगह पर स्नेह और सच्चिदानंद छलकने लगता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2013, पृष्ठ संख्या 12,13 अंक 245

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पापी का जूता, पापी के ही सर, संयम सात्त्विक धैर्य का देखो असर – पूज्य बापू जी


धृति अर्थात् धैर्य के तीन प्रकार हैं-तामसी धृति, राजसी धृति और सात्त्विक धृति। जो पापी, अपराधी, चोर, डकैत होते हैं वे भी धैर्य रख के अपने कर्म को अंजाम देने में सफल हो जाते हैं, यह ʹतामसी धृतिʹ है।

जो राजसी व्यक्ति हैं वे भी ठंडी-गर्मी सह के, धन-सत्ता बढ़ा के, अहंकार पोसकर गद्दी, कुर्सी के लिए धैर्य रखते हैं, यह ʹराजसी धैर्यʹ है।

तीसरे होते हैं सात्त्विक धैर्यवान। वे परमात्मा में विश्रांति पाने के लिए चल पड़ते हैं। साधन-भजन, परोपकार करते हैं, मान-अपमान आता है तो धैर्य रखते हैं। सफलता-विफलता में विह्वल होकर अपने आत्मा-परमात्मा को पाने का उद्देश्य नहीं छोड़ते और कठिनाइयों से भी डरते नहीं हैं, अपने उद्देश्य में डट जाते हैं।

बाल या यौवन काल में जिनके जीवन में सत्संग आ जाता है, उनके जीवन में भगवान की धृतिशक्ति सात्त्विक रूप में चमकती। जिसके जीवन में यह सात्त्विक धृति आती है, उसकी प्रज्ञा ठीक काम करने लगती है। वह छोटे से छोटा, लाचार से लाचार अकेला व्यक्ति तो क्या कन्या भी महानता का इतिहास रच डालती है।

सात्त्विक धृति के धनी व्यक्ति के ऊपर कैसी भी आफतें आ जायें, वह अपनी वर्तमान अवस्था में ही ऊपर उठता है। ʹमेरा भाग्य ऐसा है अथवा बाद में ऐसा होगाʹ , नहीं… अभी से ही। उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम का धृतिपूर्वक सदुपयोग करके छोटे से छोटे व्यक्ति भी महान हो गये, जैसे – शबरी भीलन।

जिस मनुष्य के जीवन में सात्त्विक धृति है, यदि वह ठान ले ते इतिहास का देदीप्यमान मार्गदर्शक बन सकता है, फिर वह चाहे कोई बेचारी अबला कन्या क्यों न हो, बड़े-बड़े तीसमारखाँओं को दिन में तारे दिखा सकती है।

आज सोनगढ़ इलाके का ʹवावʹ गाँव कन्या सोनबा की धृति की गवाही दे रहा है। सोनबा के पिता का नाम था मोकल सिंह। भावनगर जिले में सोनगढ़ के नजदीक एक छोटा सा गाँव था। सेंदरड़ा। एक दिन वह साहसी कन्या कहीं जा रही थी। उसे घुड़सवारी का शौक था। उसने देखा कि सामने से यवन सैनिकों का टोला आ रहा है और सूबेदार मेरे पर बुरी नजर डालता हुआ नजदीक आ रहा है। उस युवती ने आँखें अँगारे उगलें ऐसे ढंग से उसके सामने देखा लेकिन वह भी तो सूबेदार था, जूनागढ़ का सर्वेसर्वा !

सूबेदार ने कहाः “अरे सुन्दरी ! तेरे जैसी सुंदरी तो मेरी बेगम बनने के काबिल है। आ, तू मेरे महल में रहने के काबिल है।”

ऐसी गंदी-गंदी बातें सुनायीं कि सोनबा का खून खौलने लगा। उसने कहाः “हे दुर्बुद्धि दुष्ट ! सँभल के बात कर। तेरे दिन पूरे होने को हैं इसलिए तू मेरे ऊपर बुरी नजर डाल रहा है। तेरी आँखें निकाल के कौवों को दे दूँगी। तेरे साथ सेना है लेकिन मेरे साथ गुरु के वचन हैं। उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम – ये छः सदगुण जिसके पास होते हैं, उस पर कदम-कदम पर परमात्मा कृपा बरसाता है। अगर तू अपनी जान बचाना चाहता है तो यह बकवास बंद कर, तू अपने रास्ते जा और मैं अपने रास्ते जा रही हूँ।”

“अरे बिहिश्त की परी ! तेरे जैसी सुंदरी और वीरांगना को हम अपनी खास पटरानी बनायेंगे। तुम अब हमारे हाथ से नहीं जा सकती चिड़िया ! सैनिको ! घेर लो इस सुन्दरी को।”

सोनबा ने देखा कि ये सैनिक मुझे घेरेंगे और यह दुष्ट मनचाहा आचरण करके मुझे जूनागढ़ ले जाना चाहेगा… हम्ઽઽઽ…. ૐ….. ૐ…. ૐ…. घोड़ी को ऐड़ी मारी। घोड़ी घूमती गयी और तलवार एक दो सैनिकों गिरा दिया। दूसरे सैनिक पकड़ने की कोशिश तो कर रहे थे लेकिन डर के मारे नजदीक नहीं आर रहे थे। घोड़ी उछाल मारते हुए सैनिकों के बीच में से भाग गयी लेकिन सोनबा जानती थी कि सूबेदार मेरा पीछा करेगा। उसने जाकर अपने पिता को बताया।

मोकल सिंह ने सारी बात समझकर अपने प्रजाजनों से कहाः “क्षत्रिय की कन्या पर अत्याचार, पूरी क्षत्रिय जाति का अपमान है। वह सूबेदार सेना लेकर आयेगा और हमारी छोटी सी रियासत को कुचलने की कोशिश करेगा लेकिन प्राण कुर्बान करके भी कन्या की धर्मरक्षा करना हमारा कर्तव्य है।”

“हाँ, हमारा कर्तव्य है।” सभी ने एक स्वर में कहा और लड़ने का निर्णय किया।

गाँव वालों ने रास्ते पर काँटों की बाड़ कर दी परंतु छोटी-सी रियासत को कुचलना सूबेदार के लिए क्या बड़ी बात थी ! रणभेरी बजा दी। हाथी ने सब इधर-उधर कर दिया। उसकी सेना ने पूरे गाँव को घेर लिया। खन… खन…. खन…. तलवारें चलने लगीं। सूबेदार के सैनिक कटने लगे।

आखिर सूबेदार ने कहाः “ये मनोबल से मजबूत हैं। गोलियाँ चलाओ। इनके पास बंदूकों की व्यवस्था नहीं है। तलवार और बंदूक की लड़ाई में तो बंदूक ही जीतेगी।” धड़-धड़-धड़ सेंदरड़ा गाँव के मुट्ठीभर सैनिक बलि चढ़ते देख सोनबा ने पिता जी से कहाः “पिता जी ! आप संधि का झंडा फहराइये।”

“संधि ! वह दुष्ट आकर तुझे ले जायेगा।”

“पिता श्री ! मैं आपकी कन्या हूँ। आप जरा भी संदेह नहीं रखिये। अपने कुल की प्रतिष्ठा को हानि पहुँचे ऐसा मैं कभी नहीं करूँगी। इस समय उनके पास बंदूकें हैं और हमारी सेना के पास बंदूकें नहीं हैं। इस समय बल से शत्रुओं के साथ हम नहीं जीत पायेंगे, बुद्धि से जीतना पड़ेगा।”

शास्त्र कहते हैं – उद्यम, साहस, धैर्य तो हो लेकिन बुद्धि का उपयोग भी हो। ये तीन सदगुण हैं और बुद्धि नहीं है तो मारे जायेंगे। सोनबा ने पिता के कान में कुछ बात कह दी।

पिता ने झंडा दिखाया कि हम आपसे लड़ना नहीं चाहते। सूबेदार ने देखा कि जब ये डर गये हैं और संधि करना चाहते हैं तो कोई हर्ज नहीं है। वह  बोलाः “मुझे तो बस वह सुंदरी चाहिए।”

सोनबा के पिता ने कहाः “तुमने इस छोटी सी बात के लिए नरसंहार करवाया ! तुम बोलते तो हम तुम्हारे जैसे सूबेदार के साथ अपनी बेटी का रिश्ता खुशी-खुशी कर देते। अब हमारी कन्या का विवाह तो हम तुमसे ही करेंगे लेकिन हमारे रीति-रिवाज के हिसाब से। अभी सिंहस्थ का साल है। इस सिहंस्थ में अगर विवाह करेंगे तो कन्या विधवा होकर लौटेगी। सिंहस्थ के बाद धूमधाम से विवाह करेंगे।”

सूबेदारः “अच्छी बात है।”

वह मूर्ख खुश हो गया।

मोकल सिंह ने कहाः “देखो सूबेदार जी ! हमारी रीति रिवाज के अनुसार कन्या को सुमुहूर्त चढ़ाना चाहिए।”

सुमुहूर्त मतलब क्या ?”

क्या है सुमुहूर्त का राज ? सोनबा ने पिता के कान में कौन सी बात कही ? क्या सूबेदार सोनबा से विवाह कर सका ? जानने के लिए इंतजार कीजिये अगले अंक का।)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2013, पृष्ठ संख्या 27,28, अंक 244

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मोकल सिंह ने कहाः “वर पक्ष की ओर से कन्या को हीरे मोती के गहने तथा कीमती कपड़े आदि भेजने का रिवाज है। इसको हमारे यहाँ सुमूहूर्त कहते है।”

सूबेदारः “हमको क्या कमी है ! जूनागढ़ जाकर सब भेज देंगे। अभी तो ये नकद दस हजार सोने की मोहरें रख लो।” और फिर सूबेदार चल पड़ा जूनागढ़।

जिस जगह सूबेदार के साथ भिडंत हुई थी वहाँ सोनबा अपने कुटुम्बी लोगों को लेकर गयी और बोलीः “हमें यहाँ बावड़ी खुदवानी है। मनुष्यों और गाय-भैंसों के लिए पानी की किल्लत है।” बावड़ी का काम शुरु हुआ।

कुछ दिन बीते। एक राजपूत चिट्ठी लेकर सूबेदार के पास पहुँचा। चिट्ठी में लिखा था कि ʹकुंवरी साहेबा तीर्थयात्रा को जा रही हैं। तीर्थयात्रा में सखियाँ, सहेलियाँ भी जायेंगी, 20 हजार सोना-मोहरें दे दो।ʹ

“अरे, 20 क्या 25 हजार ले जाओ। ऐसी वीरांगना मिलेगी मुझे !”

25 हजार सोना-मोहरें दे दीं मूर्ख ने।

सोनबा ने पहले की 10 हजार और अब की 25 हजार सोने की मोहरें सूबेदार की मौत के लिए बावड़ी खुदवाने में लगा दी, जिसमें नीचे तलघर बनवाया। उसकी बनावट ऐसी थी कि ऊपर से पानी की बावड़ी दिखे लेकिन नीचे पूरा गाँव आ जाय ताकि सेंदरड़ा गाँव के लोग गुप्त रूप से रह सकें और कभी शत्रु आये तो उसे पता भी नहीं चले की कहाँ से कौन निकलकर आया। सोनबा ने बड़ी चतुराई से ऐसी बावड़ी खुदवायी क्योंकि उसके पास गुरुमंत्र था, ध्यान था। सुबह उठती तो ललाट पर भ्रूमध्य में ध्यान करती तो उसको अंतरात्मा की ऐसी प्रेरणा मिलती रही कि बड़े-बड़े साजिशकर्ता भी ठोकर खा गये।

जब वर्ष पूरा होने को आया तब सूबेदार ने कहलवाया कि अब शादी के लिए तैयारी कोर। मोकल सिंह ने कुछ टेढ़ी-मेढ़ी बात सुना दी कि ʹसोनबा से शादी करना माना कब्र में जाना है।ʹ

“हं….. मेरे लिए छोटे से गाँव का मुखिया ऐसा बोल जाये !….” सूबेदार ने सेना तैयार की और सेंदरड़ा गाँव के नजदीक आकर पड़ाव डाला। “एक बार संधि कर चुके हो, क्या फिर से मौत के घाट उतरना चाहते हो ? हा…. हा…. हा….”

धैर्य तो है इसके पास लेकिन तामसी धैर्य है। रात को शराब पी, मांस खाया और सोचने लगा कि ʹसुबह इन पर अपन सफल हो जायेंगे…ʹ राजसी धृति है। ʹऔर चाहिए, और चाहिए….ʹ – लगे रहते हैं लोभी लोग। ये दोनों धृतियाँ व्यक्ति को डुबाती हैं।

श्रीकृष्ण कहते हैं सात्त्विक धृति चाहिए। ईश्वर के रास्ते दृढ़ता से चलो। चाहे कितने विघ्न आयें लेकिन अपने कर्तव्य को, अपने धर्म को, जप-अनुष्ठान को मत छोड़ो, अपने गुरु के ज्ञान को न छोड़ो। यह सात्त्विक धृति है।

सोनबा में सात्त्विक धृति थी और उस सूबेदार में तामसी और राजसी धृति थी कि ʹअभी  तो धैर्य रखें, सुबह होते ही इनका कचूमर बना देंगे और सुंदरी को बलपूर्वक ले चलेंगे।ʹ

सूबेदार ने हुक्म दियाः “चारों तरफ ऐसा कड़ा पहरा लगाओ की आदमी तो क्या एक चिड़िया भी बाहर न निकल सके।”

मध्यरात्रि को जवानों का एक टोला आया चमचमाती तलवारों के साथ और सूबेदार के कई सैनिकों की मुंडियाँ धड़ से अलग करके गायब हो गया। यवन सैनिकों ने खोजा तो कोई मिले नहीं !

ʹचारों तरफ मेरी सेना… इतना कड़ा पहरा…. देखते ही गोली मारो का आदेश… फिर भी इतने सारे जवान कहाँ से आये और गये कहाँ !!”

उनको पता ही नहीं कि जहाँ ठहरा है वही तलघर से आये और तलघर में चले गये। नशेबाजों को क्या पता चले !

सुबह हुई। सूबेदार ने चढ़ाई कर दी। सेंदरड़ा गाँव को घेर लिया। हाथी की टक्कर से दरवाजा टूटा। घुसे अंदर, तो क्या देखते हैं कि लोग हैं ही नहीं !

“सेंदरड़ा के लोग कहाँ गये ? दरवाजे बंद करके छुप गये क्या ? दरवाजे तोड़ो !”

घर-घर के दरवाजे तोड़े तो सारे घर खाली ! पूरा सेंदरड़ा खाली !! सूबेदारः “लगता है डर के मारे भाग गये। मुखिया के घर में जाओ। उस सुंदरी को तो ले चलेंगे।”

न सुंदरी मिली न सुंदरा मिला…. धक्के खाते-खाते निराश होकर अपने पड़ाव पर आये। छावनी में आकर देखा तो दुश्मन अचानक हल्ला करके भाग गया है। कई सैनिक मारे गये हैं, कई घायल  अवस्था में पड़े हैं। सोचने लगे, ʹक्या कारण है ? बंदूकें हमारे पास, उनके पास कोई बंदूक नहीं फिर भी हम मौत के घाट उतार दिये जा रहे हैं। हम उपाय खोजेंगे धीरज से।ʹ

उपाय तो खोज रहे हैं लेकिन तामसी बुद्धि से। प्याली पी, सोये…. नींद तो क्या आनी थी, मौत आनी थी। सोनबा और सैनिक तलघर से निकले और धाड़-धाड़ हमला कर दिया। वे तो शराबी थे। वे बंदूकें सँभालें उसके पहले सोनबा ने उनको सँभला दिया…. किसी को भाला तो किसी की तलवार की नोंक। एक अकेली सोनबा और मुट्ठीभर सैनिक !

सोनबा सूबेदार के तम्बू में घुस आयी और गरज पड़ीः “तुझे सोनबा चाहिए थी न ? मैं  गयी हूँ मूर्ख !” और भाला सीधा उसकी छाती में घुसेड़ दिया। किसकी ? जो सोनबा को अपनी बेगम बनाना चाहता था। बाकी के सैनिक जान बचाकर भाग गये।

भावनगर जिले के सोनगड़ के पास सेंदरड़ा गाँव के नजदीक सोनबा ने जो बावड़ी खुदवायी थी, वहाँ बसा गाँव आज भी उस संयमी, सदाचारिणी, वीर कन्या की यशोगाथा की खबर दे रहा है। उस कन्या के सत्संग, साहस, धैर्य, गुरुभक्ति और संयमी जीवन की खबर दे रहा है। वह आजीवन ब्रह्मचारिणी रही। जैसे मीरा ने परमेश्वर को वर बनाया, ऐसे ही उस कन्या ने परब्रह्म परमात्मा को ही वर बनाया।

एक कन्या में कितनी शक्ति छुपी है ! इतना बड़ा सूबेदार, इतने सारे सैनिक, इतनी सारी बंदूकें… ये बेचारे छोटी-मोटी लाठियों तलवारों से उनका मुकाबला क्या करें ! सोनबा ने युक्ति खोजी और गुरुकृपा से उसे सूझ गयी। दुष्ट को कैसे धैर्यपूर्वक यमपुरी में पहुँचाया जाता है और अपने आत्मा को परमात्मा में कैसे पहुँचाया जाता है, इसकी सीख सोनबा ने सदगुरु से पा ली थी। सोनबा अपने को शरीर नहीं मानती थी। शरीर पंचभौतिक है, इसको स्वस्थ रखो, संयमी रखो लेकिन भीतर से जानो कि ʹशरीर की बीमारी मेरी बीमारी नहीं है। मन का दुःख मेरा दुःख नहीं है, चित्त की चिंता मेरी चिंता नहीं है। संसार सपना है, उसको चलाने वाला चैतन्य परमात्मा अपना है। ૐ…..ૐ…..ૐ…..

इस कथा से भगवान की यह बात स्पष्ट समझ में आ सकती है की तामसी और राजसी धैर्यवाला तुच्छ चीजों के लिए धैर्य धारण करता है। ऐसे तो बगुला भी मछली के शिकार के लिए धैर्यवान दिखता है अथवा तो कोई प्रेमी, प्रेमिका को फँसाने के लिए धैर्यपूर्वक लगा रहता है, प्रेमिका प्रेमी को उल्लू बनाने के लिए लगी रहती है लेकिन ये सारे धैर्य तुच्छ हैं। जो अपने आत्मा-परमात्मा के स्वभाव को पाने के लिए धैर्यवान होकर लग जाता है, उसका धैर्य सात्त्विक है। वह सात्त्विक धैर्यवान व्यक्ति अपने जीवनदाता के सुख, शांति, माधुर्य और सामर्थ्य को पा लेता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद मई 2013, पृष्ठ संख्या 23,24 अंक 245

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