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हनुमान जी की सेवानिष्ठा


हनुमान जयंतीः 

(पूज्य बापू जी की अमृतवाणी)

सेवा क्या है ? जिससे किसी का आध्यात्मिक, शारीरिक, मानसिक हित हो वह सेवा है। सेवक को जो फल मिलता है वह बड़े-बड़े तपस्वियों, जती-जोगियों को भी नहीं मिलता। सेवक को जो मिलता है उसका कोई बयान नहीं कर सकता लेकिन सेवक ईमानदारी से सेवा करे, दिखावटी सेवा न करे। सेवक को किसी पद की जरूरत नहीं है, सच्चे सेवक के आगे-पीछे सारे पद घूमते हैं।

कोई कहे कि ʹमैं बड़ा पद लेकर सेवा करना चाहता हूँʹ तो यह बिल्कुल झूठी बात है। सेवा में जो अधिकार चाहता है वह वासनावान होकर जगत का मोही हो जाता है लेकिन जो सेवा में अपना अहं मिटाकर दूसरे की भलाई तथा तन से, मन से, विचारों से दूसरे का मंगल चाहता है और मान मिले चाहे अपमान मिले उसकी परवाह नहीं करता, ऐसे हनुमान जी जैसे सेवक की जन्मतिथि सर्वत्र मानी जाती है। चैत्री पूर्णिमा हनुमान जयंती के रूप में मनायी जाती है।

हनुमान जी को, तो जो चाहे सेवा बोल दो, ʹभरत के पास जाओʹ तो भरत के पास पहुँच जाते, ʹसंजीवनी लाओʹ तो संजीवनी ले आते, समुद्र पार कर जाते। भारी इतने कि जिस पर्वत पर खड़े होकर हनुमान जी ने छलाँग मारी वह पाताल में चला गया। छोटे भी ऐसे बन गये कि राक्षसी के मुँह में जाकर आ गये। विराट भी ऐसे बन गये कि विशालकाय ! ब्रह्मचर्य का प्रभाव लँगोट के पक्के हनुमानजी के जीवन में चम-चम चमक रहा है।

लंका में हनुमान जी को पकड़ के लंकेश के दरबार में ले गये। हनुमान जी भयभीत नहीं हुए, उग्र भी नहीं हुए, निश्चिंत खड़े रहे। हनुमानजी की निश्चिंतता देखकर रावण बौखला गया। बौखलाते हुए हँस पड़ा, बोलाः “सभा में ऐसे आकर खड़ा है, मानो तुम्हारे लिए सम्मान-सभा है। तुमको पकड़ के लाये हैं, अपमानित कर रहे हैं और तुमको जरा भी लज्जा नहीं ! सिर नहीं झुका रहे हो, ऐसे खड़े हो मानो ये सारे सभाजन तुम्हारे सम्मान की गाथा गायेंगे।”

हनुमानजी ने रावण को ऐसा सुनाया कि रावण सोच भी नहीं सकता था कि हनुमान जी की बुद्धि ऐसी हो सकती है। हनुमानजी तो प्रीतिपूर्वक सुमिरन करते थे, निष्काम भाव से सेवा करते थे। बुद्धियोग के धनी थे हनुमानजी। हनुमानजी ने सुना दियाः

ʹमोहि न कुछ बाँधे कइ लाजा।

मुझे अपने बाँधे जाने की कुछ भी लज्जा नहीं  है। तुम बोलते हो कि निर्लज्ज होकर खड़ा हूँ, यह लाज-वाज का जाल मुझे बाँध नहीं सकता।

कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा।।

मैं तो प्रभु का कार्य करना चाहता हूँ। चाहे बँधकर तुम्हारे पास आऊँ, चाहे आग लगाते हुए तुम्हारे यहाँ से जाऊँ, मुझे तो भगवान का कार्य करना है। मुझे लाज किस बात की ? मैं तो टुकुर-टुकुर देख रहा हूँ। तुमने मेरे स्वागत की सभा की हो या अपमान की सभा – यह तुम जानो, मैं तो निश्चिंत हूँ। मैं प्रभु के कार्य में सफल हो रहा हूँ।” सेवक अपने स्वामी का, गुरु का, संस्कृति का काम करे तो उसमें लज्जा किस बात की ! सफलता का अहंकार क्यों करे, मान-अपमान का महत्त्व क्या है ?

यह सुन क्रोध में आ के रावण ने हनुमानजी की पूँछ में कपड़ा बाँधकर आग लगाने को कहा। हनुमानजी ने  पूँछ लम्बी कर दी, अब इन्द्रजीत कहता हैः “इस पूँछ को हम ढँक नहीं सकते इतनी लम्बी पूँछ कर दी इस हनुमान ने। कहीं यह पूँछ लम्बी होकर लंका में चारों तरफ फैलेगी तो लंका भी तो जल सकती है !” घबरा गया इन्द्रजीत। हनुमान जी ने पूँछ छोटी कर दी तो ढँक गयी। दैत्य बोलते हैं- “हमने पूँछ ढँक दी, हमने सेवा की।”

जो दैत्यवृत्ति के होते हैं वे सेवा के नाम से अहंकार का चोला पहनते हैं लेकिन हनुमान-वृत्तिवाले सेवा के नाम पर सरलता का अमृत बरसाते हैं।

तो हनुमानजी ने पूँछ को सिकोड़ भी दिया लेकिन उनके पिता हैं वायुदेव, उनसे प्रार्थना कीः “पिता श्री ! आपका और अग्नि का तो सजातीय संबंध है, पवन चलेगा तो अग्नि पकड़ेगी। हे वायुदेव और अग्निदेव ! थोड़ी देर अग्नि न लगे, धुआँ हो – ऐसी कृपा करना।”

राक्षस फूँकते-फूँकते अग्नि लगाने की मेहनत कर रहे थे। रावण ने कहाः “देखो ! अग्नि क्यों नहीं लग रही ? हनुमान तुम बताओ।”

हनुमानजी ने कैसी कर्मयोग से सम्पन्न बुद्धि का परिचय दिया ! बोलेः “ब्राह्मण को जब बुलाते हैं, आमंत्रित करते हैं तभी ब्राह्मण भोजन करते हैं। अग्निदेव तो ब्राह्मणों के भी ब्राह्मणों हैं। यजमान जब तक शुद्ध होकर अग्नि देवता को नहीं बुलाता, तब तक अग्नि कैसे लगेगी ? तुम तुम्हारे दूतों के द्वारा लगवा रहे हो। तुम खुद अग्निदेव को बुलाओ। वे तो एक-एक मुख से फूँकते हैं, तुम्हारे तो दस मुख हैं।” देखो, अब हनुमानजी को ! सेवक स्वामी का यश बढ़ाता है।

हनुमान जी ने कहाः “एक-एक फूँक मारकर उसमें थूक भी रहे हो तो अशुद्ध आमंत्रण से अग्निदेव आते नहीं। तुम तो ब्राह्मण हो, पुलस्त्य कुल में पैदा हुए हो, पंडित हो।” मूर्ख को उल्लू बनाना है तो उसकी सराहना करनी चाहिए और साधक को महान बनाना हो तो उसको प्रेमपूर्वक या तो डाँट के, टोक के, उलाहने से समझाना चाहिए।

रावण को लगा कि ʹहनुमानजी की युक्ति को ठीक है। चलो, अब हम स्वयं अग्नि लगायेंगे।ʹ रावण ने अंजलि में जल लिया, हाथ पैर धोये। अब रावण ने पूरा घी छँटवा दिया, ʹ अग्नये स्वाहा।ʹ करके अग्नि देवता का आवाहन किया और बोलाः “दस-दस मुख से मैं फूँकूँगा तो अग्नि बिल्कुल प्रज्जवलित हो जायेगी ! राक्षस फूँक रहे हैं तो अग्नि प्रज्जवलित नहीं हो रही है। धुआँ नाक में, आँखों में जाने से राक्षस परेशान से हो गये हैं, उन्हें जलन हो रही है।”

रावण के मन में पाप था, बेईमानी थी कि ʹदस मुखों से ऐसी फूँक मारूँगा कि पूँछ के साथ हनुमानजी भी जल जायें। इसको जलाने से मेरा यश होगा कि राम जी का खास मंत्री, जिसने छलाँग मारी तो पर्वत ऐसा दबा कि पाताल में चला गया, ऐसे बहादुर हनुमान को जिंदा जला दिया !”

अब मन में बेईमानी है और अग्नि देवता का सेवक बन रहा है। फूँक तो मारी लेकिन हनुमानजी तो क्या जलें, उस आग में उसकी दाढ़ी और मूँछें जल गयीं, नकटा हो गया। जो सेवा का बहाना करके सेवा करता है उसकी ऐसी ही हालत होती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2012, पृष्ठ संख्या 25,26 अंक 231

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एक में अनेक, अनेक में एक


एक-ही-एक

(पूज्य बापू जी के मुखारविंद से निःसृत ज्ञानगंगा)

अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य

जन्तोर्निहितो गुहायाम।

ʹइस जीवात्मा की हृदयरूपी गुफा में रहने वाला परमात्मा सूक्ष्म से अति सूक्ष्म और महान से भी महान है।ʹ (कठोपनिषद, द्वितिय वल्लीः 20)

उसके विषय में कहा गया हैः

न जायते म्रियते वा कदाचि-

न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

अजो नित्यः शाश्वतोयं पुराणो

न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।

ʹयह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है फिर न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता है।ʹ (गीताः 2.20)

शरीर के मरने पर भी जो शुद्ध ʹमैंʹ है वह मरता नहीं है। देखा जाय तो शरीर भी वास्तव में नहीं मरता है। मृत्यु के बाद शरीर को जला दो तो उसका जो जलीय भाग है वह वाष्प हो जायेगा और बादल बनकर नहीं बरसेगा। जो पृथ्वी का भाग वह राख होकर मिट्टी में मिल जायेगा, उससे कोई पौधा उगेगा। जो तेज का अंश है, अग्नि का भाग है, वह महाअग्नि में मिल जायेगा। उसमें जो आकाश-तत्त्व है वह महाकाश में मिल जायेगा।

नाश तो कुछ होता नहीं है, रूपांतरित होता है। हमारी आँखों से कोई ओझल होता है तो हम समझते हैं वह मर गया। वास्तव में कोई मरता नहीं है। जब कोई मरेगा नहीं तो जन्मेगा कैसे ? उन पंचमहाभूतों का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा इकट्ठा होकर शरीर दिखता है, तब कहते हैं, ʹजन्म हुआʹ। वह जियेगा 60-70 साल, फिर वे पाँच भूत अलग-अलग व्यापक पाँच महाभूतों में मिल जाते हैं, उसे कहते हैं ʹमर गयाʹ। वास्तव में तो

न कोई जन्मे, न कोई मरे।

न कोई भाई, न कोई बाप।

आप ही लाड़ी, आप ही लाड़ा,

जहाँ देखो वहाँ आप-ही-आप।।

कहीं तो वह लाड़ी के रूप में दिख रहा है, कहीं लाड़ा दिख रहा है किंतु है तो वही चैतन्य आत्मा। अनेक रूपों में वही एक है। संसार के सारे क्रिया कलापों का आधार भी वही है। जैसे सिनेमा में आप देखते हैं कि एक ही प्रकाश है पर प्लास्टिक (फिल्म) की पट्टियों पर पड़ता है तो अनेक रूप-रंग और क्रियाएँ देखने को मिलती हैं। कहीं मोटरगाड़ी भागी जा रही है तो कहीं रेलगाड़ी दौड़ रही है। कहीं नायिका को गुंडों ने पकड़ा है, कहीं बस्ती में आग लगायी जा रही है तो कहीं उत्सव मनाया जा रहा है। इस प्रकार देखोगे कि आग भी उसी में, बस्ती भी उसी में, नायिका भी वहीं और गुंडे भी वहीं, उसी पर्दे पर। सब प्रकाश का ही चमत्कार है।

एक ही प्रकाश अऩेक रूपों में दिखता है। ऐसे ही अनेक रूपों में छिपा हुआ एक-का-एक जो तत्त्व है वही सबका आधार है। वह एक ही तत्त्व अनेक रूपों में भासता है। यह ज्ञान समझ में आ जाय तो फिर काम, क्रोध, लोभ, मोह, मेरा-तेरा सब छूट जायेगा। ये गुलाब, गेंदा, चमेली, सेब-संतरे सब अलग-अलग दिखते हैं लेकिन तत्त्वदृष्टि से देखो तो सब एक है। ऐसे ही जिसको तत्त्व की बात समझ में आ जाय वह चांडाल, कुत्ता, गाय, ब्राह्मण और हाथी में छुपे हुए एक तत्त्व को जानकर सबको समभाव से देखता है।

जिसने भी उस तत्त्व को जान लिया है, तत्त्व का ज्ञान पा लिया है, उसे तो सर्वत्र वही, आकाश से भी सूक्ष्म चिदानंदघन परमेश्वर नजर आता है। वह अपने-आपको भी वहीरूप जान लेता है। उसके रोम-रोम से ʹसर्वोहम्ʹ के आंदोलन स्वाभाविक रूप से फैलते रहते हैं।

तुम कितने भी भयानक हो, कितने भी डरावने हो, तुम्हें देखकर छोटे-बड़े डर जायें लेकिन तुम अपने-आपको देखकर कभी नहीं डरोगे। मान लो तुम्हारा रूप इतना सुहावना है कि तुम्हें देखकर कई लोग तुम्हारे पीछे दीवाने हो जायें, पर तुम अपने को देखकर दीवाने होओगे क्या ? नहीं। दूसरे को देखकर काम होगा, दूसरे को देखकर क्रोध होगा, दूसरे को देखकर मोह होगा। अपने को देखकर काम, क्रोध, मोह थोड़े ही होगा ! अगर आप सबमें, अपना-आपा देख लोगे तो फिर आप ही आप बचोगे, तब काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, ईर्ष्या, चिंता सब शान्त हो जायेगा। यह ज्ञान समझ में आ जाय तो जपी का जप सफल हो जाय, तपी का तप सफल हो जाय। ऐसा अदभुत ज्ञान है यह आत्मज्ञान।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2012, पृष्ठ संख्या 16,17 अंक 231

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होली मनायें तो ऐसी


(होलिका दहनः 7 मार्च 2012, धुलेंडीः 8 मार्च 2012)

(पूज्य बापू जी की ज्ञानमयी वाणी से)

होली अगर हो खेलनी, तो संत सम्मत खेलिये।

संतान शुभ ऋषि मुनिन की, मत संत आज्ञा पेलिये।।

तुम संतों और ऋषि-मुनियों की संतान हो। यदि तुम होली खेलना चाहते हो तो भाँग पीकर बाजार में नाचने की जरूरत नहीं है, दारू पीकर अथवा दुर्व्यसन करके अपने आपको अधोगति में डालने की जरूरत नहीं है, होली खेलनी हो तो संत के संग में खेलो। सच्ची होली तो यह है कि ब्रह्मविद्या की अग्नि प्रकट हो जाय, भक्तिरस की अग्नि भभक उठे और उसमें तुम्हारी चिंता, दारिद्रय, मोह, ममता स्वाहा हो जाय। तुम कंचन जैसे हो जाओ, कुंदन जैसे शुद्ध हो जाओ। इसी का नाम होली है। लोग लकड़ियाँ एकत्रित करके अग्नि प्रज्वलित करते हैं, होली जलाते हैं पर यह कोई आखिरी होली नहीं है। होली तब समझो कि संसार जलती आग दिखे। संसार जलती आग है तो सही पर दिखता नहीं है, यह हमारी बुद्धि की मंदता है। जरा-जरा बात में दिन भर में न जाने कितने हर्ष के और कितने शोक के आघात-प्रत्याघात लगते हैं। मेरे-तेरे के कितने बिच्छु काटते हैं….. तो संसार जलती आग है ऐसा दिखे और सब विषय-विकार फीके लगें तो समझो सच्ची होली है, नहीं तो बचकानी होली है, संसार में भटकने वालों की होली है। साधकों की होली निराली होती है।

संसार का दुःख कैसे मिटे, आत्मज्ञान कैसे हो ? आध्यात्मिक शांति, परमात्मशांति कैसे मिले ? – इस बात का ध्यान रहे तो समझो तुम्हारी होली सार्थक है, नहीं तो होली में तुम खुद होली हो गये।

माजून खाई भंग की, बौछार कीन्हीं रंग की।

बाजार में जूता उछाला, या किसी से जंग की।।

भाँग पी, जूते उछाले या किसी से जंग की – यह कोई होली है !

गाना सुना या नाच देखा, ध्वनि सुनी मौचंग की।

सुध बुध भुलाई आपनी, बलिहारी ऐसे रंग की।।

देहाध्यास भूलने का जो तरीका था, होली जिस उद्देश्य से मनायी जाती थी वह अर्थ आजकल दब गया। देहाध्यास भूलने के लिए नेता और जनता की एकता, संत और साधक की एकता, सेठ और नौकर की एकता का, प्राकृतिक नैसर्गिक जीवन जीने का एक दिन था, एक मौका था होली का दिन। ʹमैंʹ और ʹमेरेʹ के व्यवहार से जो बोझा महसूस होता है, वह बोझा उतारने का यह एक सुन्दर कार्यक्रम था लेकिन इस होली में भी आजकल बोझा उतारता नहीं है बल्कि और बढ़ रहा है। सामान्य दिनों में जो काम होता है त्यौहारों में और अधिक काम बढ़ा लेते हैं। सामान्य दिनों में जो मिलना, करना, विकारों में उलझना होता है, त्यौहारों के दिनों में लोग इनमें और अधिक उलझते हैं। होली के दिन सिनेमाघर पर भीड़ ज्यादा होगी। इन दिनों जितने मानसिक अपराध होंगे, उतने अन्य दिनों में नहीं होंगे क्योंकि हम व्यवस्था का दुरुपयोग कर रहे हैं। त्यौहारों की जो व्यवस्था थी जीवन को सरलता की, नैसर्गिकता की तरफ ले जाने की, अहंकार को विसर्जित करने की, त्यौहारों के द्वारा जो कुछ अहंकार को पुष्ट करने का मौका ढूंढ रहा है।

अहंकार का सर्जन, विकारों का सर्जन करने का मौका जितना अधिक लेंगे, उतना जीवनशक्ति का ह्रास होगा। इसलिए फकीरी होली तुम्हें कहती है कि ज्ञान की आग जलाओ। लकड़ियों की आग तो बहुत लोग जलाते हैं और स्वर्ग में, नरक में भटकते रहते हैं, जन्मते-मरते रहते हैं।

यदि हम हमारे जीवन की शक्ति का आदर न करेंगे, हम हमारे जीवन के स्वामी न बनेंगे तो हमारा स्वामी शैतान बन जायेगा। इसलिए होली तुम्हें कहती है कि उस शैतान से बचने के लिए अपने अहंकार को धूल में मिलाओ, धुलैंडी मनाओ, होली जलाओ। अपने अहंकार की सुध-बुध भुला दो, भुला दो देहाध्यास को। गाना गाओ तो गाना बन जाओ और नृत्य करो तो नृत्य, कीर्तन करो तो कीर्तन, सत्संग सुनो तो सत्संग हो जाओ। अपने अहंकार की बलि दे दो। जो भारीपन है वह छोड़ दो। होली हलका होना सिखाती है। कोई साहब हो, सूबेदार हो, भले इन्सपेक्टर हो, चाहे मंत्री हो, लेकिन होली के दिन तो फगुआ लेने वाले बच्चे भी उनका साहबपना, मंत्रीपना भुला देते हैं कि ʹसाहब ! होली का फगुआ दो नहीं तो रँग देंगे।ʹ ऐसी है होली !

अज्ञान को नहीं हटाया, प्रेमाभक्ति का रस नहीं पाया, अपने आपको नहीं पाया तो होली मनाकर क्या पाया ? मोह-ममता के ऊपर धूल नहीं डाली तो धुलेंडी क्या खेली ?

छाती मिलाते शत्रु से, सन्मित्र से मुख मोड़ते।

हितकारी ईश्वर छोड़कर, नाता जगत से जोड़ते।।

धन से, पद से, प्रतिष्ठा से छाती मिलाते हो जो कि तुम्हारे नहीं हैं और जो तुम्हारा है उधर से तो तुम मुख मोड़कर बैठे हो। ईश्वर को छोड़कर जगत से नाता जोड़कर बैठे हो, फिर होली क्या मनाते हो ? होली मनाओ तो बस ऐसी कि जो तुम्हारा है वह प्रकट हो जाये। ऐसा प्रकाश भीतर से प्रकट होने दो कि जो तुम्हारा है उसमें जग जाओ। ऐसे से मिलो जिससे फिर बिछुड़ना न पड़े।

भोले बाबा ने कहा हैः

होली हुई तब जानिये, पिचकारि सदगुरु की लगे।

ऐसी होली खेलिए कि ज्ञान की पिचकारी से अहंकार भाग जाय। ज्ञान की पिचकारियाँ तो चलती रहती हैं। कई बार ऐसी पिचकारियाँ आती हैं और किसी के हृदय में लगकर चली जाती हैं, किसी के हृदय में थोड़ी टिकती हैं, किसी के हृदय से तो आर-पार निकल जाती हैं। अब बचकानी होली छोड़ दो। बहुत दिन खेले, बहुत जन्म खेले तुम ऐसी होली। ऐसे खेलते-खेलते कई होलियाँ आ गयीं, कई दिवालियाँ आ गयीं लेकिन हम वैसे-के-वैसे रहे।

हमारी स्थिति ऐसी न हो कि त्यौहार मनाने के बाद भी हमारा अहंकार बचा रहे। उत्सव मनाने के बाद भी हम परमात्मा के निकट न पहुँचे तो वह उत्सव वास्तव में उत्सव नहीं, वह त्यौहार त्यौहार नहीं, वह तो मौत का दिन है। जीवन का दिन तो वह है कि तुम ईश्वर के रास्ते पर एक कदम आगे बढ़ जाओ। बाह्य उत्सव तुम्हें ईश्वरीय उत्सव में ले जाय, ईश्वरीय ज्ञान, ईश्वरीय माधुर्य, ईश्वरीय दृष्टि, ईश्वरीय प्रेम में परितृप्त कर दे। ईश्वर के रास्ते एक छलाँग तुम्हारी और बढ़ जाय तो समझ लो त्यौहार तुम्हारे लिये सार्थक है। यदि एक छलाँग शैतान की तरफ आगे बढ़ जाती है तो वह त्यौहार तुम्हारे लिए अभिशाप है, वरदान नहीं। जो भी त्यौहार हैं वे सब महापुरुषों ने तुम्हारे लिए वरदानरूप बनाये हैं। उन त्यौहारों का तुम्हें अधिक-से-अधिक लाभ मिले और तुम विराट आत्मा के साथ एक हो जाओ, तुम असली पिता के द्वार तक पहुँच जाओ – त्यौहारों का लक्ष्यार्थ यही है।

सब रंग कच्चे जांय, यक रंग पक्के में रंगे।

नहिं रंग चढ़े फिर द्वैत का, अद्वैत में रंग जाय मन।

विक्षेप मल सब जाय धुल, निश्चिन्त मन अम्लान हो।।

पक्का रंग आत्मा का ज्ञान होता है, बाकी के रंग सब कच्चे होते हैं। संसार के रंग तुम्हारे शरीर तक, मन तक, बुद्धि तक आते हैं। जिसने भीतर की होली खेल ली, जिसके भीतर भीतर का प्रकाश हो गया, भीतर का प्रेम आ गया, जिसने आध्यात्मिक होली खेल ली, उसको जो रंग चढ़ता है वह अबाधित होता है। संसारी होली का रंग हम लोगों को नहीं चढ़ता, हमारे कपड़ों को चढ़ता है, हमारे शरीर को भी तो रंग नहीं चढ़ता ! और यह रंग कपड़ों पर भी टिकता नहीं, टिका तो समय पाकर कपड़े फट जाते हैं लेकिन तुम्हारे ऊपर यदि फकीरी होली का रंग चढ़ जाय….. फकीरी होली का अर्थ है कि जहाँ पहुँचने के बाद फिर गिरना नहीं होता, जो पाने के बाद खोना नहीं होता। यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम। (गीताः 15.6)

काश ! ऐसा कोई सौभाग्यशाली दिन आ जाय कि तुम्हारे ऊपर संतों की होली का रंग लग जाय तो फिर तैंतीस करोड़ देवता धोबी का काम शुरु करें और तुम्हारा रंग उतारने की कोशिश करें तो भी नहीं उतरेगा, बल्कि तुम्हारा रंग उन पर चढ़ जायेगा।

होली के बाद धुलेंडी आती है। धुलेंडी का पैगाम है कि अपनी इच्छाओं को, वासनाओं को, कमियों को धूल में मिला दो। अहंकार को धूल में मिला दो। निर्दोष बालक जैसे नाचता है, खेलता है, निर्विकार आँख से देखता है, निर्विकार होकर व्यवहार करता है, ऐसे ही तुम निर्विकार होकर जियो। तुम्हारे अंदर जो विकार उठें उन विकारों को, शैतान को भगाने के लिए तुम ईश्वरी सामर्थ्य जुटा लो। ईश्वरीय सामर्थ्य ईश्वर-नाम, ईश्वर-ध्यान और ईश्वरप्रीति से जुटता है। इसलिए होली मनायें तो किसी पावन जगह पर मनायें, संत के संग मनायें ताकि जन्म-मरण की भटकान समाप्त हो जाय। आत्मज्ञान, आत्मविश्राम, आत्मतृप्ति…

आप इरादा पक्का करो, बाकी भगवान पग-पग पर सहायता करते ही हैं, बिल्कुल पक्की बात है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2012, पृष्ठ संख्या 12,13,14 अंक 230

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