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बुद्धि से परे है ईश्वर की सुन्दर व्यवस्था


(आत्ममाधुर्य से ओतप्रोत बापू जी की अमृतवाणी)

एक तपस्वी ने 12 साल भजन किया । देखा कुछ हुआ नहीं, भगवान तो नहीं आये कोई ऋद्धि-सिद्धि भी नहीं आयी, लोक में इतनी पूजा-प्रतिष्ठा भी नहीं । ले तेरी कंठी, धर तेरी माला ! बाबा-बाबाओं का संग, एकांतवास, यह-वह सब छोड़ो । बोलते हैं कि एकांत में भजन करते हैं तो बड़ा फायदा होता है, बड़ी शक्तियों का संचार होता है ।  नेपोलियन जैसा व्यक्ति भी बोलता है कि मैं पछताता हूँ, मैंने एकांत का फायदा गँवाया इसीलिए मेरी दुर्गति हो रही है । बड़े-बड़े जो हुए हैं संसार में मशहूर, उन्होंने एकांत का महत्त्व जाना है लेकिन हमें तो कोई फायदा नहीं हुआ… वे तपस्वी चल दिये ईश्वर को कोसते हुए ।

रास्ते में 15-16 के एक लड़के ने पूछाः “आप कहाँ जा रहे हैं ?”

तपस्वी बोलेः “अपने घर को जा रहे हैं ।”

“अच्छा, हम भी चलते हैं ।”

“बेटे ! तेरे को कहाँ जाना है ?”

बोलाः “उसी गाँव की ओर जाना है ।”

“कहाँ रहते हो ?”

बोलाः “आपके मोहल्ले से दो मील दूर ही छोटा गाँव है उधर ।” चलते गये, चलते गये । रात हुई । किसी ने दिया स्थान, सोचा, अतिथि हैं, तपस्या करके लौटे हैं । दोनों का सत्कार किया । सोने के बर्तनों में भोजन कराया । बड़ा धनी भक्त था लेकिन बड़ा भावुक था ।

सोने के बर्तनों में भोजन किया । सुबह दोनों रवाना हुए । लड़के ने सोने की एक कटोरी छुपा ली । यात्रा तो हुई । दिन भर चले, रात को दूसरे गाँव पहुँचे तो किसी ने आतिथ्य नहीं दिया । भटक-भटक के किसी किसान के खलिहान में रात बितायी । लड़के ने वह सोने की कटोरी वहीं रख दी । तपस्वी देखता रहा ।

सुबह हुई, चले । चलते-चलते नदी लाँघनी थी । एक बड़ा प्रभावशाली लड़का नदी में नहा रहा था । इस लड़के ने उस नहाने वाले लड़के का एकाएक गला पकड़ के पानी में दबोच दिया । अब पानी में दबोचा हुआ व्यक्ति 2-3 मिनट से ज्यादा कैसे जिये ! वह तो मर गया, दम घुट गया उसका । तब उस तपस्वी से सहन नहीं हुआ । उसने लड़के को कहा कि “आखिर तू यह क्या करता है ? मेरे साथ तू क्यों आया ? तपस्वी एकदम बौखला गया तो लड़के को टिकटिकी लगा के देखा । लड़के का रूप धीरे-धीरे गायब हो गया और वहाँ चतुर्भुजी भगवान प्रकट हो गये । “प्रभु तुम !….”

भगवान बोलेः “भगवान जो करते हैं उसमें सब जगह अपनी खोपड़ी नहीं चलायी जाती । यह कैसा, वह कैसा…. मैंने भजन किया, मुझे भगवान मिलें…. मुझे यह मिले, वह मिले….. तो यह मन मौजूद रहेगा । कई सृष्टियाँ पैदा कर-करके विलय कर रहा हूँ और सभी के हृदय में बैठे ख्याल रखता हूँ । कोई बुरा काम करता है तो धड़कनें बड़ा देता हूँ, अच्छा काम करता है तो प्रोत्साहित करता हूँ, सत्प्रेरणा देता हूँ और किसी को अहंकार आ जाता है तो प्रतिद्वन्द्वी दे देता हूँ और विषाद आ जाता है तो मददगार दे देता हूँ । मेरी इतनी सुन्दर व्यवस्था है फिर भी तुम्हारे जैसे 12-12 साल झख मारने के बाद भी बोलते हैं, ‘ऐसा क्यों नहीं हुआ… कोई आया नहीं…. कुछ हुआ नहीं….’ तुम्हें तुम्हारे कल्याण का क्या पता !

शिशु को कल्याण का क्या पता ! सब जगह अपनी खोपड़ी या अपनी मान्यता से, अपने नाप से सृष्टिकर्ता को या सृष्टि को नापना परेशानी का मूल है बेटे ! अभी तक तो हम तुम्हारे साथ बेटे की नाईं चल ही रहे थे, अब तुम बेटे हो गये ।”

तपस्वी बोलेः “प्रभु ! हम बेटों के भी बेटे हैं लेकिन यह बात समझ में नहीं आती नाथ ! आपको भोजन मिला मेरे निमित्त अथवा मेरे को भोजन मिला आपके निमित्त …. सोने की थाली में, और आपने वहाँ से कटोरी चुरा ली । आपको क्या कमी थी ?”

भगवान बोलेः “वह भगत था, भावनाप्रधान था । इतना भावनाप्रधान नहीं होना चाहिए कि अनजान अतिथि को सोने के बर्तनों में खिलाये । तो मैंने कटोरी चुरा ली, ताकि अब दूसरी बार नये लोगों से इस ढंग से व्यवहार नहीं करे । एक कटोरी में ही उसकी जान छूटी, नहीं तो दूसरे न जाने उसका कितना घाटा करते । तो थोड़ा घाटा करके मैंने उस भक्त की रक्षा कर ली ।”

“तो फिर गाँव भर में भटके और कहीं रहने को नहीं मिला । खेत-खलिहान में रात बितायी औऱ वहाँ कटोरी छोड़कर चले दिये ?”

भगवान बोलेः “खेत-खलिहान वाला चुप कैसे बैठेगा ! मेहमान आये थे, किसी ने उन्हें नहीं रखा, हमारे यहाँ खेत खलिहान में पड़े रहे और सोने की कटोरी छोड़ गये । तो गाँव वाले जो निगुरे हैं, सेवा से वंचित हैं, सत्कर्म का महत्त्व नहीं जानते उन उल्लुओं को थोड़ा प्रकाश मिलेगा कि भाई ! अतिथि आये तो न जाने कोई सोने की कटोरी, कोई पुण्य की कटोरी छोड़ जायेगा तो लालच में सही, उनके द्वारा मानवता का थोड़ा व्यवहार होगा ।”

“नाथ ! ये दोनों बातें तो समझ में आ गयीं लेकिन नदी पार करते समय एक बड़ा राजवी लड़का दिख रहा था । उसने आपको कुछ नहीं कहा और आपने जाते ही उसका गला पकड़ के, आपका बल तो असीम है, उसको मार के रवाना कर दिया बहाव में ।”

भगवान बोलेः “वह मंत्री का लड़का था और मंत्री की नीयत बुरी हो गयी थी कि राजकुमार की हत्या करवा के फिर राजा को सांत्वना देंगे और मेरे बेटे की तरफ राजा का विचार करेंगे । अगर राजा इधर-उधर करेगा तो राजा को भी किनारे लगा देंगे और मेरा पुत्र राज्य करेगा मेरे इशारे से, मैं बुढ़ापा आराम से बिताऊँगा । राजा के लिए भी नीचे से सारा जाल बिछा के रखा है उसने । इन अभागों को पता नहीं कि बुढ़ापा कुकर्म करके आराम से नहीं बीतता है ।”

औरंगजेब जैसा भी बुढ़ापे में छटपटाया और मौत के समय उसे शूल चुभ रहे थे, प्राण नहीं निकल रहे थे, तड़प रहा था । गाँधी जी बोलते थे कि ‘निमित्त हलका लेकर आप फल उत्तम चाहते हैं, काँटे बोकर आप फूल चाहते हैं, मुश्किल है । बबूल बोकर आप आम चाहते हैं तो मूर्खता है ।’ ऐसा करके – वैसा करके फिर आराम से जियेंगे, आराम से बुढ़ापा और सेवा-निवृत्ति का जीवन बितायेंगे…. यह बिल्कुल बेवकूफी के सिवाय और कुछ नहीं है ।

करम प्रधान बिस्व करि राखा । जो जस करइ सो तस फलु चाखा ।।

(श्री रामचरित. अयो. कां. 298.2)

भगवान बोलेः “गला इसलिए दबाया कि उस छोरे में मंत्री की ममता थी और ममता-ममता में वह मंत्री सोचने लगा, मेरे बेटे को ही राजसत्ता मिले तो मैं आराम से रहूँगा ।’ यह उसका अधर्म था, भूल थी और फिर राजा को कैद करके हराम का राज्य उस छोरे को मिलता । वह छोरा अनर्थ करता और प्रजा त्राहिमाम् पुकारती । तो बड़ा अनर्थ टालने के लिए मैंने छोटा अनर्थ कर लिया और मैंने अपने हाथों से उसको भेज दिया तो उसकी दुर्गति तो नहीं होगी, दूसरे जन्म में कहीं बेटा हो जायेगा !”

तपस्वी बोलेः “सब जगह हम लोग अपनी खोपड़ी लगाते हैं इसलिए सिर चकराता है । प्रभु ! सब जगह आपकी सुंदर व्यवस्था है । ईश्वर कब, कहाँ कैसी व्यवस्था करते हैं, यह मानवीय दिमाग से बहुत दूर की बात है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 8,9 अंक 228

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भारतीय संस्कृति के आधारभूत तथ्य


धर्म के दस लक्षणः धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध ।

दस दिशाएँ- पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैर्ऋत्य, वायव्य, ईशान, अधः, ऊर्ध्व ।

दस इन्द्रियाँ- पाँच कर्मेन्द्रियाँ (हाथ, पैर, जिह्वा, गुदा, जननेन्द्रिय), पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, नाक, कान, जिह्वा, त्वचा) ।

दस महाविद्याः काली, तारा, छिन्न मस्ता, धूमावती, बगलामुखी, कमला, त्रिपुरभैरवी, भुवनेश्वरी, त्रिपुरसुंदरी और मातंगी ।

दश दिक्पालः दसों दिशाओं की रक्षा करने वाले दस देवता – पूर्व दिशा के इन्द्र, अग्नि कोण के अग्नि, दक्षिण दिशा के यम, नैर्ऋत्य कोण के नैर्ऋत्य, पश्चिम दिशा के वरुण, वायव्य कोण के मरुत, उत्तर दिशा के कुबेर, ईशान कोण के ईश, ऊर्ध्व दिशा के ब्रह्मा और अधः दिशा के रक्षक अनंत हैं ।

दशांग धूपः दस सुगन्धियों के मेल से बनने वाला एक धूप जो पूजा में जलाया जाता है । ये दस द्रव्य हैं – शिलारस, गुग्गुल, चंदन, जटामांसी, लोबान, राल, खस, नख, भीमसैनी कपूर और कस्तूरी ।

दश मूलः सरिवन, पिठवन, छोटी कटाई, बड़ी कटाई, गोखरू, बेल, पाठा, गम्भारी, गनियारी (शमी के समान एक काँटेदार वृक्ष) और सोनपाठा इन दस वृक्षों की जड़ें ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 21 अंक 228

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अपने भक्त के कारणे राम तजउ निज रूप


(पूज्य बापू जी की मधुमय अमृतवाणी)

मैं तो उन लोगों को धनभागी मानता हूँ जो भगवान के भक्त की सेवा करते हैं, संत का सत्संग सुनते हैं । महाराष्ट्र में परली बैजनाथ है । वहाँ एक भक्त रहते थे, जिनका नाम था जगन्मित्र । गाँव वालों ने उन्हें थोड़ी जमीन दी थी । उसी में वे अपना छोटा सा मकान बना कर रहते और भगवान का भजन करते थे ।

एक बदमाश दरोगा (थानेदार) संत-स्वभाव जगन्मित्र के परिवार को सताता था । दरोगा ने देखा कि ‘यह मेरे रास्ते का काँटा है । मेरी बेटी की शादी होने वाली है । बाराती आयेंगे और यह छोटे से झौंपड़े वाला…. मैं इसका झौंपड़ा नीलाम करा दूँगा । मैं इसको बरबाद कर दूँगा ।’

गाँव वालों ने कहाः “दरोगा साहब ! हम आपको हाथ जोड़ते हैं । यह भगवान का भक्त है । आप इसे न सतायें तो अच्छा है ।”

दरोगा बोलाः “अरे, भगवान का भक्त है तो हम भी देवी के भक्त हैं ! हम नास्तिक नहीं हैं । अगर यह सच्चा भक्त है तो देवी के शेर को बुलाकर दिखाये । शेर इसको काटे नहीं, मारे नहीं तो मैं मानूँगा । नहीं तो मैं इसका यह झौंपड़ा हटवा दूँगा, नीलाम करा दूँगा ।”

जगन्मित्र को लोगों ने बतायाः “यह पुलिस के बल से, सरकारी नौकरी के बल से आपको तबाह करना चाहता है । इसके पास आधिभौतिक बल है ।”

जगन्मित्र ने कहाः “इसका आधिभौतिक बल इसके पास रहे । मेरे पास आधिदैविक बल है, अध्यात्म बल है, भगवान की कृपा है । यह मुझे कुचल डाले, कारागार में भेजे, मेरा झौंपड़ा नीलाम करा दे इसके पहले मैं जाता हूँ और मेरे ठाकुर जी को बुला लाता हूँ ।”

जगन्मित्र जंगल में गये और कातर भाव से पुकारने लगेः ‘भक्त की लाज रखने के लिए तू नरसिंह अवतार भी ले सकता है । निराकार साकार भी हो सकता है । प्रभु ! प्रभु !! प्रभु !!!

दहाड़ता हुआ एक शेर प्रकट हुआ । कहाँ से प्रकट हुआ कोई सोच नहीं सकता । शेर जगन्मित्र के पास आया । जगन्मित्र ने कहाः “प्रभु ! शेर के रूप में पधारे हो ।” अपना दुपट्टा शेर के गले में बाँध दिया और कहाः “प्रभु ! चलो मेरे साथ ।” जैसे पाली हुई बकरी को कोई खींचकर ले आये, ऐसे ही जगन्मित्र शेर को खींच के ला रहे हैं ।

उस समय गाँव के चारों ओर दीवार (पक्का परकोटा) होती थी और एक मुख्य द्वार होता था । संध्या का समय था । शेर को  देखकर द्वारपाल घबराया और दरवाजा बंद कर दिया । वैसे तो दरवाजा रात्रि को 9 बजे बंद होता था लेकिन आज संध्या को साढ़े सात ही दरवाजा बंद कर दिया ।

जगन्मित्र ने कहाः “प्रभु जी ! दरवाजा तो बंद कर दिया है । उस दरोगा से कैसे मिलोगे आप ?” प्रभु जी ने दहाड़ मारी, दरवाजा गिर पड़ा । जगन्मित्र और शेर नगर में प्रविष्ट हुए ।

लोगों ने आश्चर्य से कहाः “अरे ! शेर और जगन्मित्र के हाथ में पाली हुई बकरी जैसा ! अरे शेर, शेर…. शेर आया, शेर आया !” लोग घरों में छुप गये और छतों से देखने लगे कि भक्त जगन्मित्र शेर को ले जा रहे हैं । वे दरोगा के घर के पास पहुँचे । दरोगा ने देखा कि ‘यह तो शेर को ऐसे ला रहा है ! अब मैं क्या मुँह दिखाऊँ ?’ अंदर कमरे में छुप गया । उसके बाल-बच्चे भी छुप गये । दरवाजा बंद कर लिया ।

जगन्मित्र बोलेः “प्रभु जी ! इसने तो आपका दर्शन ही नहीं किया ।”

शेर रूपी प्रभु जी ने पंजा मारा तो दरवाजा टूट गया । अब तो जगन्मित्र शेर को अंदर ले गये । बोलेः “दरोगा साहब ! तुम बोलते थे कि शेर दिखा दे । यह देख लो ।”

दरोगा फूट-फूट कर रोने लगा और चरणों पर गिर पड़ा । बोलाः “महाराज ! मैंने आधिदैविक शक्ति और आध्यात्मिक शक्ति का अपमान किया है । मुझे पता नहीं था कि आप जैसे भक्त को सताने से भगवान नाराज होते हैं । महाराज ! मुझे माफ कर दो ।”

जगन्मित्र ने शेर के गले का प्रेम बंधन खोला और शेर अदृश्य हो गया ।

संत सताये तीनों जायें, तेज बल और वंश ।

ऐसे ऐसे कई गये, रावण कौरव और कंस ।।

संत को सताने से तबाही होती है तो उनका दर्शन, सत्संग, सेवा आबादी भी तो देते हैं, बेड़ा पार भी तो करते हैं । मैंने मेरे संतों को रिझाया तो मेरा बेड़ा पार हुआ । जिन्होंने भी संतों का दर्शन किया, संतों को रिझाया उन्हें आधिदैविक शांति मिली, आध्यात्मिक शांति मिली, आत्मशांति मिली । आधिभौतिक जगत भी उनके लिए सुखदायी हुआ । जो आध्यात्मिकता का तिरस्कार करके आधिभौतिक जगत में  प्रगति करना चाहते हैं, आधिभौतिक जगत उनको दबोच लेता है, दुःखी करता है । हृदयाघात करा के, कुचल-कुचल के मार देता है लेकिन जो आधिदैविक शक्ति, आध्यात्मिक शक्ति का आश्रय लेते हैं, उनके आधिभौतिक जगत सुखरूप हो जाता है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 6,7 अंक 228

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