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उनकी सहजावस्था को वे ही जानते हैं


(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

एक बार एक पंडित जी श्री रमण महर्षि के पास गया और बातचीत के दौरान उसने उनसे कोई प्रश्न किया । महर्षि ने उत्तर दिया । उसने दूसरा प्रश्न किया, महर्षि ने उसका भी उत्तर दिया । लोगों के सामने अपने को विशेष दिखाने के लिए उसने फिर से प्रश्न किया तो महर्षि पंडित जी पर बिगड़े, बोलेः “क्या समझता है पंडित का बच्चा ?” उठाया डंडा, पंडित डर के भागा । पंडित आगे और रमण महर्षि डंडा लेकर पीछे । देखने वाले दंग रह गये । महर्षि बहुत दूर तक उसको भगाकर आये और दूसरे ही क्षण उतने ही शांत, उतने ही आनंदित थे । कितना सहज जीवन है संतों का ! प्रसिद्ध लेखक पॉल ब्रंटन बुद्धिमान था, उसने लिखा कि ‘महर्षि कितने सहज हैं ! कितनी ऊँची अवस्था है ! कैसा स्वाभाविक जीवन है !’

‘लोग क्या कहेंगे, वे क्या कहेंगे ?’ नहीं ! नानक बोले सहज स्वभाव । उन महापुरुषों के दिल में द्वेष नहीं होता है, न नफरत होती है, न राग होता है । उनके जीवन में तो सहजता होती है ।

एक बार सहारनपुर में किसी संचालक ने लापरवाही की और लोगों में थोड़ी अव्यवस्था हो गयी तो मैंने संचालकों को बुलाकर डाँटा, उठ-बैठ करवायी तो मीडियावालों को ऐसी ऊँची सूझबूझ कि दूसरे दिन अखबारों में आयाः ‘बापू जी ने तो अपने संचालकों की भी क्लास ले ली । बापू जी की तटस्थता और व्यवहार कुशलता से ‘पिनड्रॉप साइलेंस’ रहता है, अव्यवस्था होने से बच जाती है । बापू जी एक सत्संग करने वाले संत भी हैं और साथ-साथ में दूरद्रष्टा भी हैं ।’

यदि लेखकों की मति किसी दुर्भावना से ग्रस्त होती तो वे यह भी लिख सकते थे कि ‘रमण महर्षि को आपा नहीं खोना चाहिए था, फलाने संत को ऐसा नहीं करना चाहिए था….’ वास्तव में जिनका आपा होता है वे ही सँभालें, उनका ही आपा खोये और रहे । आत्मारामी महापुरुषों का आपा होता ही नहीं, सहज स्वभाव…. नानक बोले सहज स्वभाव ।

‘गीता’ में कहा गया हैः

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।

‘हे कुंतीपुत्र ! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए ।’ (गीताः 18.48)

ज्ञानी में सदोष कर्म केवल दिखते हैं लेकिन सहज में आ गये तो ज्ञानी वे कर भी देता है । जैसे – लंका में हनुमान जी को तंग किया गया और उनकी पूँछ पर कपड़ा लपेटा जा रहा था तो हनुमान जी बोलेः “ठीक है, चलो लपेटो !” तेल डालने लगे तो बोलेः ‘डालो ‘। और फिर सारी लंका में आग लगा दी । अब सात्तविक दृष्टि से सोचने वाले इसे हनुमान जी का कौशल्य-विनोद समझते हैं लेकिन रावण के भगत और राम के विरोधी होंगे, वे हनुमान जी के लिए अनाप-शनाप बोलेंगे ।

तो यह जगत कैसा है ? जैसा आपके मन का भाव है वैसा है । सुर भाव है, सज्जनता है तो आप सद्गुण का और असुर भाव है तो आप दोषारोपण का नज़रिया ले लेंगे । कैमरे से जिस ऐंगल से फोटो लो वैसा ही दृश्य दिखता है ।

सभी महापुरुषों का एक जैसा स्वभाव नहीं होता । जैसे दुर्वासा मुनि ज्ञानी थे, साक्षात्कारी थे और जरा-जरा सी बात में ऐसा डाँट देते कि सुनने वाले के कान में धुआँ निकल जाय । लोगों को लगे कि ‘लो, महात्मा होकर ऐसा करते हैं ?’ अरे ! ज्ञानी के लिए यह करो, यह न करो ऐसा कोई बंधन नहीं है ।

एक बार दुर्वासा मुनि जंगल मं बैठे थे । सामने दूर रास्ते से एक पथिक जा रहा था, उसे जोर से चिल्लाकर बुलायाः “इधर आ !”

आधा मील दूर से चलकर आया, बोलाः “जी महाराज ?”

“अरे ! क्या जी महाराज ! कहाँ गया था ?”

“तपस्या करने गया था । देवी माँ की उपासना की और देवी प्रकट हुई । मैं निःसंतान था, वैद्यों ने बोला था तुम्हें संतान नहीं होगी । देवी माँ ने कृपा करके  मुझे संतानप्राप्ति का वर दिया है ।”

“जाओ ! वरदान रद्द है, नहीं होगा ।”

ये दुर्वासा महर्षि हैं । अब लोगों को लगेगा कि ये कैसे महात्मा हैं ? लेकिन जो बुद्धिमान होंगे वे समझ जायेंगे कि इसके पीछे भी भगवान का संकल्प है । दुर्वासा ऋषि ने द्वेष से नहीं बुलाया था, ब्राह्मण के प्रति संत की कृपा कहो या परमेश्वरी की प्रेरणा कहो । संत ने सोचा होगा कि इस इलाके में आया, संत की दृष्टि पड़ी, इतना भजन किया फिर संतान की वासना बनी रही तो फँसेगा और संतान हुई तो आसक्ति होगी, शायद दुःख देने वाली हो या संसार में फँसाने वाली हो । इसलिए महापुरुष ने प्रारब्ध काट दिया ।

मेटत कठिन कुअंक भाल के ।

तपस्या करके वांछित फल पाना, इच्छा पूरी करना, इसकी अपेक्षा इच्छा निवृत्त करना श्रेष्ठ साधन है । इच्छा पूरी हो गयी तो फिर वैसे के वैसे । तपस्या से भी सत्संग का महत्त्व ज्यादा है । यह दिखाने के लिए ईश्वर ने जीवन्मुक्त महापुरुष दुर्वासा जी से ऐसा  व्यवहार करवाया होगा ।

तो बकने वाले बकते रहें कि ‘दुर्वासा जी को, रमण महर्षि को ऐसा नहीं करना चाहिए था’ लेकिन उनका तो सहज स्वभाव था ।

जो करे सब सहज में, सो साहेब का लाल ।

वृन्दावन की बात है । एक महात्मा सत्संग कर रहे थे । मनचले स्वभाव की एक औरत आयी और बोलीः “अरे ! बैठा-बैठा मुफ्त का खावे है और फिर भाषण करे है ।”

महात्मा के लिए कुछ-का-कुछ बोलने लगी । किसी साधु ने कहा किः “महाराज ! वह आपके लिए गंदा बोल रही है ।”

“मेरे लिए कहाँ बोल रही है ? मेरा नाम थोड़े ही लेती है ! वह तो ऐसे ही बोलती है ।”

उस बाई ने सुन लिया तो महाराज का नाम लेकर बोलने लगी । लोग बोलेः “बाबा ! अब तो आपका नाम लेकर बोल रही है ।”

“इस नाम के तो कई लोग हैं दुनिया में । यह अकेले मेरा ही नाम है ऐसा मैं क्यों मानूँ । किसी को भी सुनाती होगी ।”

तो बाई और चिढ़ गयी, बोले “तेरे को कह रही हूँ तेरे को ! मुंडा-मुंडा टालिया !”

लोग बोलेः “बाबा ! अब तो आप ही के सामने इशारा है ।”

बाबा बोलेः “मेरे को नहीं कह रही है, यह तो इस शरीर को कह रही है । यह मेरा पाँचवा खोखा है । इसके अंदर चार खोखे और हैं । यह तो अन्नमय शरीर को देख रही है और उसी को कह रही है, मैं अन्नमय शरीर तो हूँ नहीं । अन्नमय शरीर तो मरने के बाद यहीं पड़ा रहेगा । फिर भी मैं तो रहूँगा । मेरे तक तो यह पहुँच नहीं सकती । अभी तो इसकी पहुँच अन्नमय शरीर तक है । जो कुछ भी कह रही है, गुस्सा कर रही है, गालियाँ दे रही है, मेरे इस अन्नमय शरीर को, पाँचवें शरीर को दे रही है । मैं तो इन सभी से न्यारा हूँ तो मेरे को कहाँ दे रही है !”

“अरे इतनी गालियाँ बोल रही हूँ और ‘मेरे को नहीं दे रही, मेरे को नहीं दे रही है ।’ क्या यह कथा कर रहे हो ?”

बाई सुनाये जा रही थी और महाराज हँसे  रहे थे । कोई बोलेः ‘ये क्या महाराज हैं  ? कोई इज्जत है इनकी ? दो पैसे की बाई ऐसा सुनाये तो फिर कौन साधु-संत बनेगा ?” अब देखने वाले का नज़रिया कैसा है ? महाराज में द्वेषबुद्धि होगी तो कोई बोलेगाः ‘ऐसा कोई महाराज होता है !’ और समझदार होगा तो बोलेगाः ‘हमारे महाराज कितने बढ़िया हैं !’ अब महाराज बढ़िया हैं कि घटिया यह तो भगवान जानते हैं लेकिन आपका मन द्वैत के तराजू में डोलता रहता है । आप किसी के डुलाने से या अपने राग-द्वेष के कारण डोलते रहो अथवा इन दोनों के बीच का ज्ञान का नेत्र खोलकर डुलानों को नियंत्रित करके अपने आत्मदेव को जानो, आपके हाथ की बात है ।

महात्मा विलक्षण होते हैं । जैसे रमण महर्षि कभी-कभी बिगड़ते हैं, दुर्वासा जी जरा-जरा सी बात में बिगड़ जाते हैं और तीसरे हैं कि कभी बिगड़ते ही नहीं हैं और तीनों ही प्रकार के महापुरुष जीवन्मुक्त हैं । ज्ञानी संतों के लिए कोई तराजू बाँधकर बैठे कि ‘इन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए, वैसा नहीं करना चाहिए’ तो वह द्वेष से प्रेरित होकर करता है या पैसे के लालच से प्रेरित होकर करता है । उसके पीछे क्या है वह जानना चाहिए ।

जिनको परमात्मा का सुख मिल गया वे व्यवहार में डंडा लेकर दिख पड़ते हों, तब भी ‘क्रुद्धोऽपि न क्रुद्धते, खिन्नोऽपि न खिद्यते’ खिन्न जैसे दिखते हैं फिर खिन्न  नहीं होते । ‘रूष्टोऽपि न रूष्टते...’ रूष्ट होते दिखते हैं फिर भी रूष्ट नहीं होते । तस्य तुलना केन जायते ? उनकी तुलना आप किससे करोगे ?

उनकी इस आदर्शमय दशा को उनके सदृश अन्य ज्ञानी महापुरुष ही जानते हैं । रमण महर्षि जैसे महापुरुष को आप अपनी बाहर की मति-गति से, द्वेष से तौलोगे तो आपका आसुरी भाव है । समझदारी से तौलोगे तो आपका दैवी भाव है, सुर भाव है । लेकिन वे महापुरुष तो भावातीत, गुणातीत, देहातीत, देशातीत, कालातीत, पाँचों शरीरों से अतीत परमात्मा में विश्रांति पा रहे हैं । आपके तौलने से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता । आपकी मति भ्रष्ट है तो द्वेष से तौलो । बाकी वे आपके तराजू में तुलें ऐसे नहीं होते ।

अष्टावक्र जी महाराज कहते हैं-

न प्रीयते वन्द्यमानो निन्द्यमानो न कुप्यति ।

नैवोद्विजति मरणे जीवने नाभिनन्दति ।।

‘मुक्त पुरुष न स्तुति किये जाने पर प्रसन्न होता है, न निंदित होने पर क्रुद्ध होता ह । न मृत्यु में उद्विग्न होता है, न जीवन में हर्षित होता है ।’ (अष्टावक्र गीताः 18.99)

जीवन्मुक्त ज्ञान इतर पुरुषों द्वारा स्तुति को प्राप्त हुआ भी हर्ष को प्राप्त नहीं होता है और इतर पुरुषों द्वारा निंदा किये जाने पर भी क्रोध को नहीं  प्राप्त  होता है और मृत्यु के आने पर भी वह भय को नहीं प्राप्त होता है क्योंकि उसकी दृष्टि में आत्मा नित्य है, जन्म-मरण कोई वस्तु नहीं है । उसको न अधिक जीने की इच्छा है, न मरने का भय है, वह सदा एकरस है ।

रमण महर्षि डंडा लेकर पंडित के पीछे पड़ें, दो-पाँच खरी-खोटी सुनाकर उसे दूर छोड़कर आवें उनकी मौज है अथवा कोई मनचली माई उन दूसरे महापुरुष को मुंडा कहे, टालिया कहती रहे और वे चुप बैठें, सुनें उनकी मौज की बात है । उनकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती है । वे ज्ञानी अतुलनीय होते हैं । तो अपना लक्ष्य ज्ञानी के अनुभव को अपना अनुभव बनाने का रखना चाहिए ।

स्रोतःऋषि प्रसाद, जनवरी 2009, पृष्ठ संख्या 2,3,4 अंक 193

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सप्तचक्रों के ध्यान के लाभ


शरीर में आध्यात्मिक शक्तियों के सात केन्द्र हैं जिन्हें ‘चक्र’ कहा जाता है । ये चक्र चर्मचक्षुओं से नहीं दिखते क्योंकि ये हमारे सूक्ष्म शरीर में होते हैं । फिर भी स्थूल शरीर के ज्ञानतंतुओं-स्नायुकेन्द्रों के साथ समानता स्थापित करके इनका निर्देश किया जाता है । इन चक्रों का ध्यान करने से निम्नलिखित लाभ होते हैं ।

1. मूलाधार चक्रः इस चक्र का ध्यान धरने वाला साधक अत्यन्त तेजस्वी बन जाता है । उसकी जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है और वह निरोगता प्राप्त करता है । पटुता, सर्वज्ञता और सरलता उसका स्वभाव बन जाता है ।

2. स्वाधिष्ठान चक्रः इस चक्र का ध्यान करने वाला साधक सारे रोगों से मुक्त होकर संसार में सुख से विचरण करता है । वह मृत्यु पर विजय पाता है । उसके शरीर में वायु संचारित होकर सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है ।

3. मणिपुर चक्रः इसके ध्यान से साधक के समस्त दुःखों की निवृत्ति होती है और उसके सारे मनोरथ सिद्ध होते हैं । यह काल पर विजय पा लेता है अर्थात् काल को भी चकमा दे सकता है । जैसे – योगी चाँगदेव जी ने काल की वंचना कर चौदह सौ वर्ष तक आयुष्य भोगा था ।

4. अनाहत चक्रः इसके ध्यान से अपूर्व ज्ञान व त्रिकालदर्शिता प्राप्त होती है । स्वेच्छा से आकाशगमन करने की सिद्धि मिलती है । देवताओं व योगियों के दर्शन होते हैं ।

5. विशुद्धाख्य चक्रः इसके ध्यान से चारों वेद रहस्यसहित समुद्र के रत्नवत् प्रकाश देते हैं । इस चक्र में अगर मन लय हो जाय तो मन-प्राण अन्तर में रमण करने लगते हैं । शरीर वज्र से भी कठोर हो जाता है ।

6. आज्ञा चक्रः आज्ञा चक्र में ध्यान करते समय जिह्वा ऊर्ध्वमुखी (तालू की ओर) रखनी चाहिए । इससे सर्व पातकों का नाश होता है । उपरोक्त सभी पाँचों चक्रों के ध्यान का समस्त फल इस चक्र का ध्यान करने से प्राप्त हो जाते हैं । वासना के बंधन से मुक्ति मिलती है ।

7. सहस्रार चक्रः इस सहस्रार पद्म में स्थित ब्रह्मरंध्र का ध्यान धरने से परम गति अर्थात् ‘मोक्ष’ की प्राप्ति होती है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2008, पृष्ठ संख्या मुख्य पृष्ठ का भीतरी पन्ना अंक 181

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जिसके बिना जीवन अधूरा….- पूज्य बापू जी


चित्त की विश्रांति से सामर्थ्य प्रकट होता है और सामर्थ्य का सदुपयोग करने से निर्भयता आती है । चित्त की विश्रांति प्रभुरस को प्रकट करने वाली कुंजी है । चित्त की विश्रांति प्रसाद की जननी है । विश्रांति साधन ब्रह्मज्ञान कराने में समर्थ है । जैसे – काम करते-करते थक जाते हैं फिर आराम करते हैं तो काम करने की शक्ति संचित होती है । बोलते-बोलते थक जाते हैं फिर नहीं बोलते तो बोलने की शक्ति संचित होती है । दिन भर परिश्रम करते हैं, अपनी ऊर्जा खर्च होती है और रात को कुछ नहीं करते – सो जाते हैं तो दूसरे दिन काम करने की ऊर्जा संचित होती है । यह सबके अनुभव की बात है ।

अभी अपराधियों से पूछताछ करने वालों ने एक नया तरीका खोज लिया है । पहले तो अपराधी को मार-पीटकर सच्ची बात उगलवाते थे । अब अपराधी को रात को सोने नहीं देते तो वह इतना विह्वल हो जाता है कि कोई भी गोपनीय बात छुपा नहीं सकता । सच्ची बात बोलकर वह जान छुड़ा लेता है तो मानना पड़ेगा कि अपराधी व्यक्ति को भी आराम चाहिए ।

आराम तीन प्रकार का होता हैः स्थूल आराम, सूक्ष्म आराम और वास्तविक आराम ।

स्थूल आरामः काम करके थके हैं और नींद आयी, यह स्थूल आराम है ।

सूक्ष्म आरामः कर्म ऐसे सुन्दर, सुहावने मंगलकारी करें कि हृदय में संतोष मिले । आपको भूख लगी है, भोजन की थाली तैयार है परंतु आपने देखा कि कोई व्यक्ति है जो अपने से भी ज्यादा भूखा या दुखियारा है । यदि खुद को थोड़ा भूखा रखकर भी आपने उसको खिला दिया तो उसको तो भूख की पीड़ा से आराम मिलेगा परंतु आपको सूक्ष्म आराम मिलेगा । ऐसे ही माता-पिता व मित्रों के काम आ गये, संस्कृति व धर्म के काम आ गये तो उसमें स्थूल आराम तो नहीं होता, कठोर परिश्रम होता है । जैसे गुरु गोविन्दसिंह जी के बेटे दीवाल में चुने जा रहे थे, उनका स्थूल आराम तो तबाह हो रहा था, मौत आ रही थी लेकिन आत्मसंतोष हो रहा था कि अपने धर्म के लिए दीवाल में चुन जा रहे हैं । बहू कैसी भी हो, सास उसे बेटी समझकर बड़ा दिल रख के उससे व्यवहार करती है, ‘बहू मेरे साथ बुरा व्यवहार करती है किंतु मैं तो बुरा व्यवहार नहीं करूँगी । उसकी गति वह जाने ।’ – ऐसा सोचती है अथवा बहू सास की सब बातें सहन कर लेती है और अपनी तरफ से सास के साथ मंगलमय व्यवहार करती है तो उनको एक प्रकार का आत्मसंतोष का आराम मिलता है ।

लालबहादुर शास्त्री, मोरारजी भाई देसाई जैसे कोई नेता जिन्होंने अपने क्षेत्र में कार्य किया हो, उन्हें चुनाव में हारने पर भी इस प्रकार का आत्मसंतोष होता है कि चलो भाई ! हम तीन बार जीते, चौथी बार हार गये अथवा कभी मंत्री नहीं बने तो भी कोई बात नहीं, हमने अपने इलाके के लोगों की सेवा की है ।’ लेकिन इससे जीवात्मा का परम कल्याण नहीं होता । वह तो होता है वास्तविक आराम पाने से ही ।

वास्तविक आरामः चतुर्मास में देवशयनी एकादशी से देवउठी एकादशी तक भगवान नारायण क्षीरसागर में लेटे-लेटे वास्तविक आराम पाते हैं और उनके संकल्प के प्रभाव से सृष्टि चलती है । आप रात्रि को निद्रा में आराम पाते हैं और सुबह प्रभात काल में जो निर्णय करते हैं वे अच्छे होते हैं तथा झंझटों से बचाने वाले होते हैं । रात्रि की निद्रा को अगर आप योगनिद्रा बनाने में सक्षम हो जायें तो स्थूल आराम के साथ सूक्ष्म आराम और सूक्ष्म आराम के साथ वास्तविक आराम तक आप पहुँच सकते हैं । वास्तविक आराम पाने के लिए ही मनुष्य जन्म मिला है । नींद तो भैंसा भी कर लेता है, पक्षी भी अपने घोंसले में आराम कर लेते हैं । हर जीव को निद्रा चाहिए और वह कर लेता है । स्थूल आराम करना कोई बड़ी बात नहीं है । सूक्ष्म आराम करना कुछ-कुछ अच्छाई है किंतु जिसने वास्तविक आराम पा लिया उसने अपना और अपनी सात पीढ़ियों का वास्तविक कल्याण कर लिया ।

दुनिया के तमाम श्रेष्ठ ग्रंथों में विश्व-साहित् में सबका मंगल चाहने वाले सर्वोपरि ग्रंथ हैं चार वेद । वेद कहते हैं-

ॐ द्यौः शांतिरन्तरिक्षं शांतिः पृथिवी शांतिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः । वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ।।

‘स्वर्गलोक, अन्तरिक्षलोक तथा पृथ्वीलोक हमें शान्ति प्रदान करें । जल शांतिप्रदायक हो, औषधियाँ तथा वनस्पतियाँ शांति प्रदान करने वाली हों । सभी देवगण शांति प्रदान करें । सर्वव्यापी परमात्मा सम्पूर्ण जगत में शांति स्थापित करें । शांति भी हमें परम शांति प्रदान करे ।’ (यजुर्वेदः 36.17)

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ।।

‘सभी सुखी हों, सभी नीरोगी रहें, सभी सबका मंगल देखें और किसी को भी किसी दुःख की प्राप्ति न हो ।’

पशुओं को, पक्षियों को, पेड़-पौधों को भी सुख-शांति मिले । सबको सुख-शांति व वास्तविक आराम मिले ।

वास्तविक आराम के बिना जो कुछ मिलेगा वह एक दिन छीना जायेगा । आज तक जो आपने जाना है, पाया है और आज के बाद जो जानोगे, पाओगे वह सब मृत्यु के एक झटके में छूट जायेगा लेकिन जो वास्तविक तत्त्व है उसको एक बार जान लो या पा लो तो मौत का बाप और तैंतीस करोड़ देवता व भगवान नारायण मिलकर भी उसे छीन नहीं सकते । भगवान नारायण सहित सब देवता मिलें और देवताओं तथा भगवान नारायण का आधारस्वरूप आत्मा (वास्तविक आराम) नहीं मिला तो जीवन अधूरा है । उर्वशी अप्सरा को ठुकराने की ताकत रखने वाले अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण मिले, फिर भी उसका रुदन चालू था । 16000 राजकन्याओं के साथ एक ही दिन में विवाह सम्पन्न करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपने उतने ही रूप बना लिये और उतने ही रूप गर्गाचार्यों के भी बना दिये थे । ऐसे समर्थ श्रीकृष्ण जिसके सारथी हैं, ऐसे अर्जुन को भी जब तक वास्तविक तत्त्व का ज्ञान नहीं मिला तब तक उसके सर्व दुःखों की निवृत्ति नहीं हुई और जब वास्तविक तत्त्व का ज्ञान हुआ, वास्तविक आराम मिला तो वही अर्जुन कहता हैः

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा…..

‘मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है ।’ (गीताः 18.73) अर्थात् अपने शुद्ध, बुद्ध, नित्य, मुक्त आत्मस्वभाव की स्मृति ।

आपकी पत्नी राज़ी हो गयी, पति राज़ी हो गया, बॉस राज़ी हो गया, लोगों ने तालियाँ बजाकर आपका ‘वोट बैंक’ पक्का कर दिया तो भी आप पूरे निश्चिंत नहीं हो सकते । कुछ भी मिल जाय फिर भी सारे दुःखों की निवृत्ति और पूर्ण सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती । मदालसा रानी ने अपने चारों बेटों को वास्तविक आराम दिला के ब्रह्मज्ञानी बना दिया । ‘गुरुवाणी’ में आता हैः

पूरा प्रभु आराधिआ पूरा जा का नाउ ।

नानक पूरा पाइआ पूरे के गुन गाउ ।।

जिस मनुष्य ने अटल नाम वाले पूर्ण प्रभु का स्मरण करके आत्मारामी सद्गुरुओं की कृपाप्रसादी को पचाया है, उसे पूर्ण प्रभु मिल गया है । पूर्ण पुरुषों से पूर्ण स्वरूप का ज्ञान पाकर, अपनी पूर्णता की अनुभूति कराने वाले साधन को समझकर सजाग हो जाना चाहिए, अपनी पूर्णता का अनुभव करना चाहिए ।

पूर्ण परमात्मा की आराधना करके उसमें शांत होना सीखो, सम होना सीखो तो आपका परम मंगल हो जायेगा, परम कल्याण हो जायेगा ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2008 पृष्ठ संख्या 2-4

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