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आसुरी, राक्षसी और मोहिनी भाव


संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा हैः

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।

राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः।।

‘वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञानवाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को ही धारण किये रहते हैं।’ गीताः 9.12

आसुरी भाव, दैत्य भाव और मोहिनी भाव – ऐसे तीन प्रकार के भाव वाले लोग भगवान से विमुख होकर सारे किये-कराये पर पानी फिरा देते हैं। उनकी जो कुछ भी अच्छी प्रवृत्ति होती है वह भी अंत में नष्ट हो जाती है क्योंकि अच्छी प्रवृत्ति का फल भी वे नश्वर प्रकृति की चीजें चाहते हैं।

मानों यज्ञ भी कर लेते हैं, दान भी कर लेते हैं, पुण्य कर्म भी कर लेते हैं लेकिन दान पुण्यादि सत्कर्म का फल वे स्वर्ग चाहते हैं और स्वर्ग का भोग भोगकर उनके पुण्य नष्ट हो जाते हैं। अच्छे कर्म करके वाहवाही चाहते हैं तो अच्छे कर्म हुए, वाहवाही मिली…. बस, वाहवाही । भोगकर समय खराब हो जाता है। हाथ में  मिला क्या ?

बुरे कर्म करने वाले तो अपना सत्यानाश करते ही हैं लेकिन अच्छे कर्म करने वाले ज्ञानविहीन लोग भी आसुरी प्रकृति का आश्रय लेते हैं। मोघाशा….. भगवान से विमुख होना यह ‘मोघ’ है। स्वर्ग को पाया, ऋद्धि-सिद्धि को पाया, प्रसिद्धि को पाया लेकिन आखिर क्या ?

मैं हनुमान जी से स्नेह करता हूँ, उनको प्रणाम करता हूँ। उनके पास इतनी योग्यताएँ होने के बावजूद वे उन योग्यताओं में रूके नहीं। आत्मा-परमात्मा को पाने के लिए श्रीराम जी की सेवा में लग गये। अर्जुन ने श्री कृष्ण की आज्ञा में रहकर परमात्मतत्व को पा लिया।

ईश्वर के सिवाये कहीं भी मन लगाया तो अंत में रोना ही पड़ेगा। मोघाशा मोघकर्माणो.… भगवान से विमुख आशा एवं भगवान से विमुख कर्म जो चाहते हैं ऐसे लोग अपना जीवन, समय और ज्ञान व्यर्थ कर देते हैं।

लोग दुनियाभर के ज्ञान से अपनी बुद्धि को सम्पन्न कर दें, धन के भण्डार कर लें, स्वदेश में धन्य हो लें, विदेश में सम्मानित हो लें लेकिन गुरुतत्व अर्थात् आत्मा-परमात्मा में प्रीति नहीं हुई तो आखिर क्या ? जो भगवान से विमुख हैं वे यज्ञ कर लें, दान कर लें, तप कर लें, लेकिन उसका फल यदि सत्यस्वरूप ईश्वर को नहीं चाहते तो असत् भोग चाहेंगे और असत् भोग समय लेकर नष्ट हो जाते हैं। तो आखिर मिला क्या ? मिली समय की बरबादी, वासनाओं की गुलामी, दीनता-हीनता। स्वार्थ से, कामना की पूर्ति से प्रेरित होकर जो कर्म करते हैं, ‘भले किसी की हानि हो तो हो लेकिन मेरा यह काम होना ही चाहिए….’ ऐसा सोचकर उस काम के पीछे अपना ज्ञान, अपनी क्रियाशक्ति और अपनी भावना लगा देते हैं, ऐसे स्वभाव वाले लोगों को ही आसुरी प्रकृति के लोग कहा गया है।

आसुरी प्रकृति के लोग अर्थात् ऐसे लोग नहीं जो अनपढ़ होते हैं, अश्रद्धालु होते हैं या मूर्ख होते हैं। नहीं….. उनमें योग्यताएँ तो बहुत सारी होती हैं लेकिन ईश्वर प्राप्ति के सिवाय की चीजों में ही उनकी योग्यताएँ लगती हैं। मिथ्या सुख की प्राप्ति में, मिथ्या देह के आराम में ही उनकी सारी योग्यताएँ लगी रहती हैं। आसुरी भाव का आश्रय लेने वाला व्यक्ति अपनी कामनापूर्ति के लिए सब कुछ करने को तैयार हो जायेगा लेकिन ईश्वर प्राप्ति की कामना नहीं करेगा।

दूसरे होते हैं राक्षसी भाव वाले व्यक्ति। अपने स्वार्थ की पूर्ति में यदि कोई विघ्न डालेगा तो उस पर कोपायमान हो जायेंगे। ‘अपना स्वार्थ सिद्ध हो फिर दूसरे चाहे भूखे रहें चाहे मरें, चाहे कुछ भी हो लेकिन मेरी लौकिक कामना सफल हो…’ ऐसी वृत्तिवाले लोग राक्षसी भाव का आश्रय लेते हैं।

तीसरे होते हैं मोहिनी भाव का आश्रय लेने वाले। मोहिनी भाव उसे कहते हैं कि उड़ते हुए पक्षी को गोली मार दी, बैठे हुए किसी निर्दोष आदमी को ठोकर मार दी। कोई सोया है और उसके कान में सलाई भोंक दी। किसी से कोई लाभ की इच्छा नहीं, फिर भी ऐसे ही किसी को सताते रहना इसको बोलते हैं मोहिनी भाव।

आसुरी, राक्षसी और मोहिनी भाव का आश्रय लेने वाले लोग सम्मोह, लोभ और मूर्खता के कारण अपना मनुष्य जीवन व्यर्थ गँवा देते हैं। जैसे बन्दरको नारियल मिले तो व्यर्थ है, अंधे आदमी को हीरा मिले तो व्यर्थ है और अपवित्र,निंदक, क्रूर एवं धोखेबाज को गुरूदीक्षा मिले तो व्यर्थ है। जो सुधरना तो नहीं चाहता वरन् गुरु के नाम को भुनाना चाहता है उसकी गुरुदीक्षा व्यर्थ है।

आगे के श्लोक में भगवान कहते हैं-

महात्मनास्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः।

भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्।।

‘परन्तु हे पृथानंदन ! दैवी प्रकृति के आश्रित महात्मा लोग मुझको सम्पूर्ण प्राणियों का सनातन कारण और अविनाशी अक्षरस्वरूप जानकर अनन्यमन से युक्त होकर निरंतर भजते हैं। (गीता- 9.13)

आसुरी प्रकृति में तमस, राक्षसी प्रकृति में रजस उन्मुख तमस है और मोहिनी प्रकृति में घोर तमस है लेकिन महात्मा लोग इस रजस-तमस-घोर तमस आदि से ऊपर दैवी प्रकृति के होते हैं। देव कहा जाता है परमात्मा को। उस परमात्मदेव के स्वाभाविक सदगुण उनमें रहते हैं। जैसे पानी का स्वभाव तरल है, अग्नि का स्वभाव उष्ण है, बर्फ का स्वभाव शीतल है ऐसे ही भगवान के जो स्वाभावि गुण हैं – निर्भयता, सात्विकता, ज्ञान में स्थिति, आचार्य की उपासना, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य आदि…. ये दैवी प्रकृति के गुण हैं। महात्मा इस दैवी प्रकृति का आश्रय लेते हैं।

26 गुण हैं दैवी प्रकृति के। इन 26 गुणों में जितनी-जितनी गहरी स्थिति होगी, उतना-उतना मनुष्य महात्मा के जैसे स्वभाव से सम्पन्न होता जायेगा। किंतु जितना-जितना वह इन तीन गुणों में…. आसुरी, राक्षसी और मोहिनी प्रकृति में होगा उतना-उतना वह क्रूर स्वभाव का होगा।

हालाँकि महात्मा की नजर तो क्रूर स्वभाव वाले की गहराई में जो चैतन्य है और शुभ स्वभाव वाले की गहराई में जो चैतन्य है, वहीं होती है। साधारण व्यक्ति तो किसी के गुण-दोष पर नजर रखता है लेकिन महापुरुष लोग गुणदोष को मिथ्या मानकर, गुण दोष जिससे प्रकाशित होते हैं, जहाँ से सत्ता-स्फूर्ति पाते हैं उस निर्गुण नारायण को अपने अंतःकरण एवं औरों के अंतःकरण में देखते हैं। ऐसे महात्मा लोग सार बातें समझने में कुशल होते हैं।

जो दैवी प्रकृति का आश्रय नहीं लेते अर्थात् सात्विक आहार नहीं लेते, सात्विक व्यवहार नहीं करते, सात्विक स्थानों पर नहीं जाते, सात्विक वातावरण में जीना पसंद नहीं करते बल्कि जो आया सो खा लिया, जो आया सो पी लिया, वे अच्छे कर्म भी करेंगे लेकिन उनकी बुद्धि ईश्वर के अनुभव तक नहीं पहुँचेगी।

कोई यदि राजा को रिझाना चाहे लेकिन इसके लिए किसी छोटे अमलदार को रिझाने लगे तो जरूरी नहीं कि सभी अमलदार रीझ जायें और राजा भी रीझ जाये। लेकिन वह एक राजा को अगर राजी कर दे तो सभी अमलदार रीझ जायेंगे। यदि वह राजा से एक हो गया तो सारे अमलदार-अधिकारी-मंत्री उसकी प्रसन्नता चाहेंगे। इसी प्रकार दैवी प्रकृति का आश्रय लेने वाले महात्मा लोग राजाओं के राजा उस परब्रह्म परमात्मा को आत्मसात् कर लेते हैं। फिर ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ, देवी देवता, यक्ष, गंधर्व, किन्नर आदि एवं भूत-प्रेत, आसुरी प्रकृति वाले, तामसी प्रकृतिवाले, मोहिनी प्रकृतिवाले सभी के सभी लोग ऐसे महात्मा पुरुष को चाहते हैं एवं उनकी बात मानते हैं।

भगवान को तो कोई मानता है कोई नहीं मानता है लेकिन भगवान के दैवी स्वभाव को आत्मसात् किये हुए महात्मा को बहुत लोग मानते हैं। जैसे हिरण्यकशिपु भगवान का विरोधी था लेकिन नारद जी आये तो उसने उठकर नारदजी का सत्कार किया। कंस भगवान का विरोधी था लेकिन नारदजी की आज्ञा में चला। कुछ लोग भगवान को मानते हैं तो कुछ लोग अल्लाह को लेकिन जो दैवी प्रकृति का आश्रय लेकर बह्मज्ञान को पा लेते है उनको अल्लाह को मानने वाले भी मानते हैं, भगवान को मानने वाले भी मानते हैं और नास्तिक लोग भी उन महात्मा के सम्पर्क में आकर उनके प्रति आदरभाव रखते हैं। ये दैवी गुण इतना महान बना देते हैं !

ईश्वर का आश्रय लेना हो तो ईश्वर के दैवी गुणों का आश्रय लो। दैवी गुणों का आश्रय लेने से चित्त के दुर्गुण क्षीण होते जाते हैं एवं भगवान के दिव्य गुण प्रगट होते जाते हैं जिससे दिव्य सुख उभरने लगता है। ज्यों-ज्यों दिव्य गुण एवं दिव्य सुख उभरेगा, त्यों-त्यों संसार की चोटें आपके चित्त पर कम असर करेंगी।

ऐसा नहीं कि परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया तो आपकी कोई निंदा नहीं करेगा, आपका कोई विरोध नहीं करेगा, आपके सब  दिन सुखद हो जायेंगे। नहीं….. परमात्म-साक्षात्कार हो जाय फिर भी दुःख तो आयेंगे ही। भगवान राम जैसे राम को चौदह वर्ष का बनवास मिला, युधिष्ठिर को बारह साल का वनवास एवं एक वर्ष का अज्ञातवास मिला। बुद्ध हों या महावीर,कबीर हों या नानकदेव, रमण महर्षि हों या रामकृष्ण, रामतीर्थ हों या पूज्य लीलाशाहजी बापू…. विघ्न बाधाएँ तो सभी देहधारियों के जीवन में आती ही हैं लेकिन विघ्न बाधाओं का प्रभाव जहाँ पहुँच नहीं सकता, उस आत्मसुख में वे महापुरुष इतने सराबोर होते हैं कि जीते जी इन विघ्न-बाधाओं में होते हुए भी वे मुक्तात्मा होते हैं।

जैसे जंगल में आग लग जाने पर सयाने पशु सरोवर में खड़े हो जाते हैं तो जंगल की आग उन्हें नहीं जला सकती। ऐसे ही जो महापुरुष आत्मसरोवर में आने की कला जान लेते हैं, वे संसार की तपन के समय अपने आत्मसुख के विचार कर तपन के प्रभाव से परे हो जाते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2002, पृष्ठ संख्या 2-5, अंक 109

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धन्य कौन ?


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

एक बार ऋषि-मुनियों में आपस में चर्चा चली कि कौन-सा युग श्रेष्ठ है जिसमें थोड़ा-सा पुण्य अधिक फलदायक होता है और कौन सुविधापूर्वक उसका अनुष्ठान कर सकता है ?

किसी ने कहा सतयुग ही श्रेष्ठ युग है, किसी ने कहा द्वापर तो किसी ने कुछ… ऐसे ही किसी ने ब्राह्मण को श्रेष्ठ बताया तो किसी ने तपस्वियों को तो किसी ने ऋषियों को….. तब किसी ने कहाः

“हम लोग अपने को श्रेष्ठ तो कहते हैं परन्तु वास्तव में श्रेष्ठ कौन है इस बात का पता लगाने के लिए हमें अपने से भी श्रेष्ठ के पास जाना चाहिए।”

फिर आपस में विचार-विमर्श करके सब ऋषि मुनि वेदव्यास जी आश्रम में गये। वहाँ पता चला कि वेदव्यास जी नदी में स्नान करने गये हैं, अतः वे सब नदी तट पर पहुँचे।

वेदव्यास जी के पास यह सामर्थ्य है कि वे आने वाले के प्रयोजन को सहज ही जान लेते हैं। ऋषि-मुनियों के आने के प्रयोजन को भी वे सहज में ही भाँप गये। जल में डुबकी लगाकर ज्यों ही वेदव्यास जी बाहर निकले त्यों ही बोल पड़े- शूद्रः साधुः। शूद्र साधु है।

फिर उन्होंने दूसरी डुबकी लगायी और बाहर निकल कर कहाः कलिः साधुः। कलियुग प्रशंसनीय है।

जब तीसरी डुबकी लगाकर बाहर निकले तब बोलेः योषितः साधुः धन्यास्तास्ताभ्यो धन्यतरोऽस्ति कः ? ‘स्त्रियाँ ही साधु हैं, वे ही धन्य हैं, उनसे अधिक धन्य और कौन है ?’

यह सुनकर ऋषि मुनि संदेह में पड़ गये क्योंकि व्यास जी द्वारा पढ़े गये मंत्र नदी-स्नान-काल में पढ़े जाने वाले मंत्र नहीं थे। नदी से बाहर निकलने पर ऋषि-मुनियों ने उनका अभिवादन करते हुए कहाः

“हम आये तो आपके पास कुछ पूछने के लिए ही हैं लेकिन हम पहले यह जानना चाहते हैं कि ‘कलियुग ही धन्य है, शूद्र ही साधु है, स्त्रियाँ ही श्रेष्ठ हैं, वे ही धन्य हैं, उनसे अधिक धन्य और कौन है ?’ आपने ऐसा क्यों कहा ? हमें आपके श्रीमुख से यह बड़ी जिज्ञासा हो रही है। कृपया हमारी जिज्ञासा का समाधान करें।”

वेदव्यास जी ने कहाः

“सतयुग में 10 वर्ष तपस्या करने से जो फल मिलता है वह त्रेता में 9 वर्ष तपस्या करने से, द्वापर में 1 महीना तपस्या करने से और कलियुग में मात्र एक ही दिन तपस्या करने से मिलता है। जो फल सतयुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ और द्वापर में देवार्चन करने से प्राप्त होता है, वही कलियुग में भगवान श्री कृष्ण का नाम-कीर्तन करने से मिल जाता है। कलियुग में थोड़े परिश्रम से ही लोगों को महान धर्म की प्राप्ति हो जाती है। इसलिए कलियुग को श्रेष्ठ कहा है।”

गोस्वामी तुलसी दास जी ने भी कहा हैः

कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास।

गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास।।

वेदव्यास जी ने आगे कहाः “शूद्र श्रेष्ठ है क्योंकि द्विज को पहले ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करते हुए वेदाध्ययन करना पड़ता है और उसके पश्चात गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने पर स्वधर्माचरण से उपार्जित धन के द्वारा विधिपूर्वक यज्ञ-दानादि करने पड़ते हैं। इसमें भी व्यर्थ वार्तालाप, व्यर्थ भोजनादि उनके पतन के कारण होते हैं, इसलिए उन्हें सदा संयमी रहना आवश्यक होता है। सभी कार्यों में विधि का ध्यान रखना पड़ता है। विधि विपरीत करने से दोष लगता है। किन्तु शूद्र द्विज सेवा से ही सद्गति प्राप्त कर लेता है इसलिए वह धन्य है।

इसी प्रकार स्त्रियाँ भी धन्य हैं क्योंकि पुरुष जब धर्मानुकूल उपायों द्वारा तथा अन्य कष्टसाध्य व्रत-उपवास आदि करते है, तब पुण्यलोक को पाते हैं किन्तु स्त्रियाँ तो तन-मन-वचन से पति की सेवा करने से ही उनकी हितकारिणी होकर पति के समान शुभ लोकों को अनायास ही प्राप्त कर लेती हैं। इसीलिए मैंने उन्हें धन्य कहा।”

फिर वेदव्यास जी ने ऋषि-मुनियों से उनके आने का कारण पूछा तब उन्होंने कहाः “हम लोग यह पूछने आये थे कि किस युग में थोड़ा-सा पुण्य भी महान फल दे देता है और कौन उसका सुखपूर्वक अनुष्ठान कर सकता है ? इनका उचित उत्तर आपने दे ही दिया है, इसलिए अब हमें कुछ नहीं पूछना है।”

व्यासजी के वचनों में अपनी शंकाओं का समाधान प्राप्त करके ऋषिगण व्यासजी का पूजन करके अपने-अपने स्थान को लौट गये।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2002, पृष्ठ संख्या 13,14 अंक 114

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सर्वकला भरपूर, प्रभु !


(ईश्वर सदा है सर्वत्र है और सबमें है। उसी के कारण हमारा अस्तित्व है। इसी बात पर प्रकाश डालते हुए पूज्यश्री कह रहे हैं-)

कंकर, पत्थर और पहाड़ में ईश्वर के अस्तित्व की एक कला है – अस्तिपना। कंकर, पत्थर और पहाड़ों का चूरा करके बालू बना दो। बालू का भी चूरा कर दो फिर भी उसका अस्तित्व मौजूद रहता है। उसे भी हवा में फूँक मारकर उड़ा दो तो वह तुम्हारी आँखों से ओझल हो जाता है, लेकिन उसका कहीं-न-कहीं अस्तित्व तो रहता ही है।

परमेश्वर की दो कलाएँ प्रतीत होती हैं- अस्तिपना और भोजन ग्रहण करने की क्षमता। बीज है, पौधा है, पेड़ है…. बीज को बो दो तो पौधा है, पौधे को बड़ा करो तो पेड़ है, पेड़ को काट दो तो लकड़ी है, लकड़ी का फर्नीचर आदि बना दो तो कुर्सी आदि है, उसको जला दो तो कोयला है, कोयले को जला दो तो राख है, राख को कहीं डाल दो तो खाद है। उसका है पना नष्ट नहीं होता। पेड़ पौधों में अस्तिपना तो होता ही है, भोजन ग्रहण करने की कला भी होती है।

क्षुद्र जीव-जंतुओं में परमेश्वर की तीन कलाएँ विकसित होती हैं- है पना, भोजन ग्रहण करने की क्षमता और स्थानांतरण करने की शक्ति।

पशु-पक्षियों में इन क्षुद्र जंतुओं से अधिक भगवान की चार कलाएँ विकसित देखी जाती हैं। उपरोक्त तीन के अलावा चौथी है- अपने माता-पिता एवं घर-घरौंदे की पहचानने की क्षमता। हजार गौओं के बीच भी बछड़ा अपनी माँ को पहचान लेता है, लेकिन बछड़ा नया संबंध नहीं जोड़ सकता है। उपनिषदों का ज्ञान, शास्त्रों का पठन, गुरुमंत्र का रहस्य जानना इत्यादि पशुयोनि में समझना बड़ा असम्भव सा लगता है। हाँ, किसी की पाँचवीं कला विकसित हो जाये तो हो सकता है।

मनुष्यों में उपरोक्त चारों के अलावा पाँचवीं कला भी विकसित है कि वह नया संबंध जोड़ सकता है और उन संबंधों को जीवनभर अच्छी तरह से याद भी रख सकता है। बछड़ा माँ को पहचान लेता है लेकिन जवानी में माँ और अन्य रिश्तेदारों को रिश्तेदारों के रूप में नहीं  पहचानता है। कामविकार उत्पन्न होता है तो बछड़े को मानवीय मर्यादा जैसा ज्ञान नहीं रहता है लेकिन मनुष्य को संबंधों को पहचानने एवं नया संबंध स्थापित करने की पाँचवीं कला भी प्राप्त है।

मनुष्य अपनी असली संबंध परमात्मा के साथ है, इसे भी जान सकता है और भावना से भगवत्संबंध भी जोड़ सकता है। वह कई नये संबंध भी जोड़ सकता है, कई कल्पित संबंध तोड़ भी सकता है और परमात्मा के साथ अपने वास्तविक संबंध को पहचान सकता है। आत्मा का वास्तविक संबंध परमात्मा से है, इसको पहचानने की कला मनुष्य में है, मन से शाश्वत सच्चिदानंद से जुड़ने की कला मनुष्य में है।

यदि मनुष्य के जीवन में व्रत नियम है, एकादशी का व्रत करता है, जप-ध्यानादि करता है, संत महापुरुषों का सत्संग करता है तो धीरे-धीरे छठी, सातवीं आठवीं, नवमी कला विकसित करके दसों इन्द्रियों के आकर्षणों से पार परमात्म-अनुभव प्राप्त करके, दस कला का धनी हो जाता है, ब्रह्मवेत्ता-साक्षात्कारी पुरुष हो जाता है उसकी समता सर्वभूतहितरेता आदि पाँच कलाएँ और विकसित हो जाती हैं।

फिर भी यदि कोई और अधिक सामर्थ्य पाना चाहे तो योग-अभ्यास करके बाकी की छः कलाएँ भी प्राप्त कर सकता है। वेदों का पूर्ण ज्ञान, पूर्ण ऐश्वर्य, पूर्ण यश, मृतक को जीवनदान देने का सामर्थ्य आदि छः भागवीय कलाएँ भी वह विकसित कर सकता है।

ब्रह्मज्ञानियों के जीवन में 10 कलाएँ विकसित होती हैं। श्रीरामजी के जीवन में 12 कलाएँ विकसित थीं और श्रीकृष्ण के जीवन में 16 कलाएँ विकसित थीं।

आप श्रीकृष्ण की नाईं 16 कलाएँ विकसित न करो तो कोई हरकत नहीं, श्रीराम की नाईं 12 कलाएँ विकसित न करो तो भी चल जायेगा लेकिन राजा जनक और परीक्षित की नाईं, मदालसा और गार्गी की नाईं कम-से-कम 10 कलाएँ तो विकसित कर लो। जिसकी 10 कलाएँ विकसित हो जाती हैं, वह मुक्तात्मा हो जाता है, महात्मा हो जाता है।

अपने जीवन में सर्वकला भरपूर प्रभु को जान लेने से मानव को चिंताएँ, दुःख, मुसीबत, शोक, भय, विषय-विकार आदि परेशान नहीं कर सकते, लेकिन उसे इस बात का पता ही नहीं कि उसका जन्म उस सर्वकला भरपूर प्रभु को जानने के लिए हुआ है।

हमें मनुष्य रूप में जन्म इसीलिए मिला है कि हम इस विनाशी शरीर में रहते हुए भी अविनाशी आत्मा को जानकर जीते-जी मुक्ति का अनुभव कर सकें। इस नश्वर शरीर में रहकर भी जीवन्मुक्त होकर विचरण करते हुए उस शाश्वत के गीत गायें।

लेकिन मनुष्य का बड़े-में-बड़ा दुर्भाग्य है कि संसार के भोग-विलास में फँसकर, जगत के बाह्य आकर्षणों में फँसकर, विषय-विकार में उलझकर, मोह-माया और अहंकार में फँसकर भवसागर में गोते खा रहा है। उस सर्वकला भरपूर प्रभु को न जानने के कारण यह जीव बेचारा निराश होकर मर जाता है। नानक जी ने कहा हैः

सर्वकला भरपूर प्रभु बिरथा जाननहार।

जाके सुमिरन उगरिये नानक तिस बलिहार।।

व्यर्थ में संसार की बातें करने-सुनने से राग और द्वेष बढ़ते हैं तथा  अहंकारवश जीव अपनी योग्यताएँ कुंठित कर लेता है। मिथ्या जगत के व्यवहार में तथा पद-प्रतिष्ठा के अभिमान में अपने स्व को न जानकर यह जीव बाजी हार जाता है।

संसार के मिथ्या व्यवहार के अभिमान में पड़कर ही रावण, कंस, हिटलर, सिकंदर आदि अभिमानी और अहंकारियों ने जीवन की बाजी हारी, लेकिन भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण, बुद्ध, नानक, कबीर, शबरी, मीरा आदि ने अपने आत्मस्वरूप में जगकर जन्म-मरण के चक्र पर विजय पायी थी। वे लोग अपने-आपमें तो तृप्त रहे ही, साथ ही अपने सम्पर्क में आने वालों को भी तृप्त किया।

हमने आज तक ऐसा कहीं भी देखा या सुना नहीं है कि फलानी जगह पर रावण,कंस, हिटलर, सिकंदर के मंदिर हैं या उनके चित्र को लोग पूजते हैं। लेकिन भगवान श्रीराम के, श्रीकृष्ण के मंदिर सर्वत्र हैं, उनके तस्वीर की पूजा करने वाले तथा उनके भजन गाने वाले करोड़ों लोग आपको मिल जायेंगे।

बुद्ध, कबीर,नानक आदि को पूजने वाले तथा उनके गीत गाने वाले भी आपको कई मिल जायेंगे। थे तो वे भी हमारे जैसे मनुष्य शरीर में,लेकिन उन्होंने मानव-जीवन के लक्ष्य को जाना तथा उस दिशा में चल पड़े तो उस प्रभु को जानकर जीवन्मुक्त हो गये। नानक जी ने ठीक ही कहाः

सर्वकला भरपूर प्रभु बिरथा जाननहार।

जाके सुमिरन उगरिये नानक तिस बलिहार।।

जिस परमात्मा के सुमिरनमात्र से इस जीव का उद्धार हो जाता है, अंतःकरण पवित्र तथा निर्मल हो जाता है, भय और चिंताएँ दूर हो जाती हैं, रोगप्रतिकारक शक्ति का विकास हो जाता है तथा काम, क्रोध और लोभ नष्ट हो जाते हैं, ऐसे सर्वकला भरपूर परमात्मा पर मैं कुर्बान जाऊँ !

पृथ्वी पर सारे जीव-जंतु आदि की चेतनाशक्ति कहाँ से आती है ? फल-फूल में विटामिन पैदा करने की शक्ति कहाँ से आती है? जल में द्रवता तथा रस उत्पन्न करने की शक्ति कहाँ से आती है ? बच्चों के नाज़-नखरे, उनकी गंदगी, दुर्गन्ध को सहते हुए भी माता में उनके प्रति स्नेह एवं दुलार से सेवा करने की शक्ति कहाँ से आती है ? राजाओं में राज्य करने की समझ कहाँ से आती है ? और संतों में वक्तृत्व की तथा श्रोताओं में श्रोतृत्व की शक्ति कहाँ से आती है ? उसी सर्वकला भरपूर प्रभु से !

वह सर्वकला भरपूर प्रभु हमें भी कभी संसार से वैराग्य दिलाकर अपने ईश्वरीय मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। कभी सत्संग का प्रेम-प्रसाद चखाकर कभी ध्यान-भजन-कीर्तन का रस चखाकर अपने परमात्मरस में डुबाना चाहता है।

वह कितना दयालु है, कितना उदार है कितना धैर्यवान है ! जो हमें येन केन प्रकारेण अपने आत्मस्वरूप का प्रभाव देकर अपने ही स्वरूप में जगाना चाहता है, हमें अपने स्वरूप का दान करना चाहता है।

जब वह अपने स्वरूप का दान करने के लिए तैयार बैठा है तो हम देरी क्यों करें? पहुँच जायें ऐसे किन्हीं संत-महापुरुषों के चरणों में, जिन्होंने उस सर्वकला भरपूर प्रभु के स्वरूप को जाना है… उनके बताये मार्ग के अनुसार चलकर हम भी उस प्रभु को जानने में समर्थ हो सकते हैं जो सर्वकला भरपूर हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 3-5, अंक 108

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