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मिठाई की दुकान अर्थात् यमदूत का घर – स्वामी विवेकानन्द


आयुर्वेद-शास्त्र में आता है कि केवल दूध ही पचने में भारी है तो फिर दूध को जलाकर जो मावा बनाया जाता है वह पचने में कितना भारी होगा ! आचार्य सुश्रुत ने कहा हैः भैंस का दूध पचने में अति भारी, अतिशय अभिष्यंदी होने से रसवाही स्रोतों को कफ से अवरूद्ध करने वाला एवं जठराग्नि का नाश करने वाला है। यदि भैंस का दूध इतना नुकसान कर सकता है तो उसका मावा जठराग्नि का कितना भयंकर नाश करता होगा ? मावे के लिए शास्त्र में किलाटक शब्द का उपयोग किया गया है, जो भारी होने के कारण भूख मिटा देता हैः

किरति विक्षिपत क्षुधं गुरुत्वात् कृ विक्षेपे किरे लश्रति किलाटः इति हेमः ततः स्वार्थेकन्।

नई बयायी हुई गाय-भैंस के शुरुआत के दूध को पीयूष भी कहते हैं। यही कच्चा दूध बिगड़कर गाढ़ा हो जाता है, जिसे क्षीरशाक कहते हैं। दूध को दही अथवा छाछ से फाड़कर स्वच्छ वस्त्र में बाँधकर उसका पानी निकाल लिया जाता है उसे तक्रपिंड (छेना) कहते हैं।

भावप्रकाश निघंटु में लिखा गया है कि  ये सब चीजें पचने में अत्यंत भारी एवं कफकारक होने से अत्यंत तीव्र जठराग्निवालों को ही पुष्टि देती है, अन्य के लिए तो रोगकारक ही साबित होती हैं।

श्रीखंड और पनीर भी पचने में अति भारी, कब्जियत करने वाला एवं अभिष्यंदी है। यह चरबी, कफ, पित्त एवं सूजन उत्पन्न करने वाला है और यदि नहीं पचता है तो चक्कर, ज्वर, रक्तपित्त (रक्त का बहना), रक्तवात, त्वचारोग, पांडु (रक्त न बनना) तथा रक्त का कैंसर आदि रोगों का जन्म देता है।

उसमें भी मावा, पीयूष, छेना (तक्रपिंड), क्षीरशाक, दही वगैरह की मिठाई बनाने में शक्कर का उपयोग किया जाता है, तब तो वे और भी ज्यादा कफ करने वाले और पचने में भारी हो जाते हैं एवं अभिष्यंदी स्रोतो को अत्यधिक अवरुद्ध करने वाले बन जाते हैं। पाचन में अत्यंत भारी ऐसी मिठाईयाँ खाने से कब्जियात एवं मंदाग्नि होती है जो सब रोगों का मूल है। इसका योग्य उपचार न किया जाय तो ज्वर आता है एवं ज्वर को दबाया जाय अथवा गल्त चिकित्सा हो जाय तो रक्तपित्त, रक्तवात, त्वचा के रोग, पांडु, रक्त का कैंसर, गाँठ, चक्कर आना, उच्च रक्तचाप, किडनी के रोग, लकवा,  कोलेस्ट्रॉल बढ़ने से हृदयरोग डायबिटीज आदि रोग होते हैं। मंदाग्नि होने से सातवीं धातु वीर्य कैसे बन सकता है ? अतः, अंत में नपुंसकता आ जाती है।

आज का विज्ञान भी कहता है कि बौद्धिक कार्य करने वाले व्यक्ति के लिए दिन के दौरान भोजन में केवल 40 से 50 ग्राम वसा (चर्बी) पर्याप्त है और कठिन श्रम करने वालों के लिए 90 ग्राम। इतनी वसा तो सामान्य भोजन में लिये जाने वाले घी, तेल, मक्खन, गेहूँ,चावल, दूध आदि में से ही मिल जाती है। इसके अलावा मिठाई खाने से कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है। धमनियों की जकड़न बढ़ती है, नाड़ियाँ मोटी होती जाती हैं। दूसरी और रक्त में चर्बी की मात्रा बढ़ती है और वह इन नाड़ियों में जाती है। जब तक नाड़ियों में कोमलता होती है तब तक वह फैलकर इस चरबी को जाने के लिए रास्ता देती है। परन्तु जब वह कड़क हो जाती है, उसकी फैलने की सीमा पूरी हो जाती है तब वह चर्बी वहीं रूक जाती है और हृदयरोग को जन्म देती है।

मिठाई में अनेक प्रकार की दूसरी ऐसी चीजें भी मिलायी जाती हैं, जो घृणा उत्पन्न करें। शक्कर अथवा बूरे में कास्टिक सोडा अथवा चॉक का चूरा भी मिलाया जाता है जिसके सेवन से आँतों में छाले पड़ जाते हैं। प्रत्येक मिठाई में प्रायः कृत्रिम (एनेलिन) रंग मिलाये जाते हैं जिसके कारण कैंसर जैसे रोग उत्पन्न होते हैं।

जलेबी में कृत्रिम पीला रंग (मेटालीन यलो) मिलाया जाता है, जो हानिकारक है। लोग उसमें टॉफी, खराब मैदा अथवा घटिया किस्म का गुड़ भी मिलाते हैं। उसे आयस्टोन एवं पेराफी से ढाँका जाता है, वह भी हानिकारक है। उसी प्रकार मिठाईयों को मोहक दिखाने वाले चाँदी के वर्क एल्यूमीनियम फॉइल में से बने होते हैं एवं उसमें जो केसर डाली जाती है, वह तो केसर के बदले भुट्टे के रेशे, मुर्गी का खून भी हो सकता है।

आधुनिक विदेशी मिठाईयों में पीपरमेंट, गोले, चॉकलेट, बिस्किट लालीपॉप, केक, टॉफी, जेम्स, जेलीज, ब्रेड वगैरह में घटिया किस्म का मैदा, सफेद खड़ी, प्लॉस्टर ऑफ पेरिस, बाजरी अथवा अन्य अनाजका बिगड़ा हुआ आटा मिलाया जाता है। अच्छे केक में भी अंडे का पाउडर मिलाकर बनावटी मक्खन, घटिया किस्म के शक्कर एवं जहरीले सुगंधित पदार्थ मिलाये जाते हैं। नानखटाई में इमली के बीज के आटे का उपयोग होता है। कॉन्फेक्शनरी में फ्रेंच चॉक, ग्लुकोज का बिगड़ा हुआ सीरप एवं सामान्य रंग अथवा एसेन्स मिलाये जाते हैं। बिस्किट बनाने के उपयोग में आने वाले आकर्षक जहरी रंग हानिकारक होते हैं।

इस प्रकार, ऐसी मिठाईयाँ वस्तुतः मिठाई न होते हुए बल, बुद्धि, स्वास्थ्यनाशक, रोगकारक एवं तमस ब़ढ़ाने वाली साबित होती हैं।

मिठाईयों का शौक कुप्रवृत्तियों का कारण एवं परिणाम है। डॉ. ब्लोच लिखते हैं कि मिठाई का शौक जल्दी कुप्रवृत्तयों की ओर प्रेरित करता है। जो बालक मिठाई के ज्यादा शौकीन होते हैं उनके पतन की ज्यादा सम्भावना रहती है और वे दूसरे बालकों की अपेक्षा हस्तमैथुन जैसे कुकर्मों की ओर जल्दी खिंच जाते हैं।

स्वामी विवेकानन्द ने भी कहा हैः

मिठाई (कंदोई) की दुकान साक्षात् यमदूत का घर है।

जैसे, खमीर लाकर बनाये गये इडली-डोसे वगैरह खाने में तो सुंदर लगते हैं परन्तु स्वास्थ्य के लिए खूब हानिकारक होते हैं, इसी प्रकार मावे एवं दूध को फाड़कर बने पनीर से बनायी गयी मिठाईयाँ लगती तो हैं मिठाईयाँ पर होती है जहर के समान। मिठाई खाने से लीवर और आँतों की भयंकर असाध्य बीमारियाँ होती हैं। अतः ऐसी मिठाईयों से आप भी बचें और ओरों को भी बचायें।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 29-31, अंक 107

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गुफा में सांप


सिंध (वर्तमान पाकिस्तान) के तलहार शहर की बात हैः

मैं (स्वामी केवलराम) और संत कृष्णदास दोनों साथ में रहते थे और गुरुद्वार पर अध्ययन करते थे। एक बार हम दोनों टंडेमहमदखान से सदगुरु स्वामी श्री केशवानंद जी की आज्ञा लेकर श्रीलीलाशाह जी के दर्शन के लिए तलहार गये।

हम सब गुरुभाई एक ही सदगुरु के श्रीचरणों में पढ़ते थे परंतु साधना की अवस्था में तो हम सब केवल विद्यार्थी ही थे। जबकि श्रीलीलाशाह जी वेदान्त का अभ्यास पूर्ण कर चुके थे। श्री लीलाशाह जी योगाभ्यास सीखते-सीखते दूसरे विद्यार्थियों एवं भक्तों को योगासन एवं योगक्रियाएँ सिखाते थे।

स्वामी श्री लीलाशाहजी तलहार शहर से दूर एक बगीचे में बनी कुटिया में रहते थे। तलहार पहुँचते-पहुँचते हमें रात हो गयी। हम उनके निवास स्थान पर पहुँचे तो द्वार खुला हुआ था। मानों, उन्हें पहले से ही हमारे आने का पता लग गया था !

हम कुटिया में गये तो भीतर कोई भी न था। तभी ‘हरि ૐ… हरि ૐ…. प्रभु ! विराजो।’ की ध्वनि सुनायी दी। लालटेन जल रही थी। हम दोनों बैठ गये। थोड़ी ही देर में श्री लीलाशाहजी महाराज गुफा से बाहर आये और हमसे बड़े प्रेम से मिले। फिर पूछाः

“आप लोग यहाँ आऩे के लिए सुबह की ट्रेन से निकले होंगे, अतः भूखे होंगे?”

इतना कहकर थोड़ी ही देर में भोजन की दो थालियाँ लाकर हमारे सामने रखते हुए बोलेः “पहले भोजन कर लो, फिर शांति से बात करेंगे।”

हमें भी जमकर भूख लगी थी लेकिन आश्चर्य तो इस बात का हुआ कि बिना पूर्व सूचना के इतनी देर रात में इस जंगल में यह भोजन कहाँ से आया? हम तो विस्मय में पड़ गये।

स्वामी जी कहाः “प्यारे ! जल्दी भोजन करके थालियाँ बाहर टंकी पर रख देना, मैं ले जाऊँगा।”

“मैं ले जाऊँगा” यह सुनकर हमें और आश्चर्य हुआ। मैं कृष्णदास के सामने देखूँ और

कृष्णदास मेरे सामने। हमें आश्चर्यचकित देखकर श्रीलीलाशाहजी हँसते हँसते बोलेः

“आप लोगों को क्या हो गया है? भोजन क्यों नहीं कर रहे हो?”

हमने कहाः “स्वामी जी ! आप साक्षात श्रीकृष्ण जैसी लीला कर रहे हैं। आप भी हमारे साथ भोजन कीजिये।”

किंतु स्वामी जी ने भोजन लेने से मना कर दिया क्योंकि वे उन दिनों केवल फलाहार ही करते थे, भोजन नहीं लेते थे एवं योग साधना में रत रहते थे।

हमने भोजन किया एवं थाली साफ करके बाहर रख आये। उसके पश्चात स्वामी जी ने सब समाचार पूछे। थोड़ी देर सत्संग की बातें हुई। फिर स्वामी जी ने कहाः “अब आपको आराम करना होगा?”

मैंने कहाः ”हाँ, जैसी आपकी आज्ञा लेकिन आराम करने से पूर्व मैं आपकी गुफा के दर्शन

करना चाहता हूँ।”

स्वामी जी ने अनुमति देते हुए कहाः ” हाँ, भले जाओ लेकिन सँभलकर उतरना, सीढ़ियाँ थोड़ी ऊँची हैं। डरना मत।”

मैने कहाः ”स्वामी जी ! इसमें डरने की क्या बात है ?”

ऐसा कहकर मैं गुफा की ओर आगे बढ़ा। अंदर दीपक जल रहा था। मुश्किल से मैं दो ही सीढ़ी उतरा होऊँगा, इतने में अंदर का परिदृश्य देखकर मैं डर के पीछे हट गया…. एक भयंकर विषधर फन निकालकर बैठा था ! मैं जल्दी से ऊपर आकर स्वामीजी के पास बैठ गया।

स्वामी जी ने पूछाः ”जल्दी वापस क्यों आ गये? गुफा में अंदर गये  कि नहीं ?”

हाथ जोड़ते हुए मैंने कहाः ”स्वामी जी ! आपकी लीला अपरम्पार है। आप असीम शक्ति के भंडार हैं। साँप अंदर बैठा हो तो मैं कैसे अंदर जा सकता हूँ ?”

स्वामी जी ने हँसकर कहाः ”भाई ! अंदर साँप नहीं है, आपको भ्रांति हो गई है। चलो मैं आपके साथ आता हूँ।”

फिर हम तीनों गये। संत कृष्णदास से स्वामी जी ने कहाः ” अंदर जाकर देखोतो साँप दिखता है क्या ?”

संत कृष्णदास ने सीढ़ियों से उतरकर अंदर देखा और कहाः ”स्वामीजी ! साँप तो नहीं है।”

यह कहकर वे बाहर निकल आये। फिर स्वामी जी ने मुझसे कहाः ”अब आप जाकर देखो।”

मैं नीचे उतरा, ध्यान से देखा तो साँप फन निकालकर बैठा है ! मैं फिर से पीछे हट गया। फिर स्वामी जी हँसते-हँसते मुझे अपने साथ  ले गये, उस वक्त साँप न दिखा !

पूज्य श्री लीलाशाह जी महाराज अनंत-अनंत यौगिक शक्तियों के धनी थे। अगर कोई अधिकारी होता और उसमें हित समाया होता तो कभी-कभार वे अपने उस अथाह योग-सामर्थ्य के एकाध अंश की झलक दिखा देते थे। यह भी उनकी मौज थी। अन्यथा संतों को किसी भी लीला में न तो आसक्ति होती है न ही लोकैषणा की भावना !

स्वामी केवलराम, अजमेर

(पूज्य श्री लीलाशाह जी बापू के गुरुभाई)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 25-26, अंक 107

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एक का ही आश्रय लें…………


(कल-कल, छल-छल करती पतित पावन गंगा, यमुना एवं सरस्वती का त्रिवेणी संगम स्थल अर्थात् तीर्थराज प्रयाग में पूज्य श्री ने तीन महीने के मौन के बाद बहायी गीता-ज्ञान गंगा….)

क्यों सिद्ध बनना चाहता, तुझी से सब सिद्ध हैं।

हैं खेल सारी सिद्धियाँ, तू सिद्ध का भी सिद्ध है।।

अपनी आत्मा को देखो, अपने परमेश्वर से नाता जोड़कर चेष्टा करो। अपने दिलबर को पीठ देकर शरीर का अहं सजाओगे तो कहीं के नहीं रहोगे। रावण और कंस इसी में तबाह हो गये। हिटलर और सिकंदर में भी बहुत-सी योग्यताएँ थीं लेकिन… शरीर का नाम भी कब तक रहेगा

परमेश्वर के नाते आप सबसे मिलें… परमेश्वर के नाते पति की, पत्नी की, साधक की, संत की, सबकी सेवा करें, बस। तभी आपको विश्रांति मिलेगी और विश्रांति आपकी मांग है। परमात्मा में विश्रांति पाने से आपका जीवन स्वाभाविक ही स्वस्थ, सुखी और सन्मानित हो जायेगा, उसके लिए आपको कोई नाटक नहीं करना पड़ेगा, उसके लिए आपको कोई नाटक नहीं करना पड़ेगा उसके लिए आपको कोई षड्यंत्र नहीं करना पड़ेगा। मैं हाथ जोड़कर आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप जो करें, ईश्वर के नाते करें।

‘मुझे यह सुख देगा… यह काम में आयेगा….’ ऐसा सोचकर परमेश्वर के साथ क्यों गद्दारी करता है ? जो मौत के बाद भई तेरा साथ नहीं छोड़ेगा, उसको छोड़कर तू मरने वाले का आश्रय लेता है ? मिटने वाले का आश्रय लेता है ? अमिट का आश्रय छोड़कर मिटने वाले का कब तक आश्रय लेगा ? शाश्वत को छोड़कर नश्वर की शरण कब तक जायेगा ?

‘यह मेरे काम आयेगा…. वह मेरे काम आयेगा….’ ना, ना ! ये शरीर के काम आयेंगे तो अहंकार बढ़ेगा और काम नहीं आयेंगे तो दुःख, विषाद व अशांति होगी। तेरे काम तो केवल तेरा पिया आयेगा। तू नींद में रोज उसी में जाता है, कभी ध्यान में बैठे-बैठे भी उसमें जा…. तेरा तो कल्याण होगा, तेरी मीठी निगाहें जिस पर पड़ेंगीं वह भी उन्नत होने लगेगा, महान आत्मा होने लगेगा।

‘श्रीमद् भगवदगीता’ में आता हैः

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।

बहवो ज्ञानतपसा पूता मद् भावमागताः।।

‘राग, भय और क्रोध से सर्वथा रहित, मेरे में ही तल्लीन, मेरे ही आश्रित तथा ज्ञानरूप तप से पवित्र हुए बहुत से भक्त मेरे भाव को, मेरे स्वरूप को, मेरे अनुभव को प्राप्त हो चुके हैं।’ (गीताः 4.10)

वीतराग…. राग को हटाता जा…. भयक्रोधा…. डर क्यों लगता है ? शरीर को ‘मैं’ मानता है, वस्तुओं को सच्चा मानता है इसलिए तू डरता है, विकारों को पोषता है इसलिए तू डरता है, कपट रखता है इसलिए तू डरता है। तू सच्चाई की शरण ले। भय हटा दे।

क्रोध क्यों होता है ? वासना की पूर्ति में कोई छोटा विघ्न डालता है तो उस पर क्रोध होता है, बड़े से भय लगता है, बराबरी वाले से द्वेष होता है। तू वासना को महत्व को न दे, तू परमात्मा की प्रीति को महत्व दे मेरे प्यारे ! तो तू सचमुच में प्रभु का प्यारा हो जायेगा।

तू परमात्मा की प्रीति को महत्व न दे, तू परमात्मा की प्रीति को महत्व दे मेरे प्यारे ! तो तू सचमुच में प्रभु का प्यारा हो जायेगा।

तू परमात्मा की प्रीति को महत्व देना भूल गया है इसलिए क्रोध में पचता है, भय से काँपता है, राग में फँसता है मेरे भैया ! तू  फँसने के लिए, तपने के लिए नहीं आया। तू संसार के स्वामी का अनुभव करके मुक्त होने के लिए संसार में आया है।

जरा जरा बात में क्यों डरता है ? जरा-जरा बात में क्यों चिंतित होता है ? दो रोटी ही तो खानी हैं। किसी करोड़पति की स्त्री फुटपाथ पर दो रोटी माँगे तो इज्जत किसकी जायेगी ? करोड़पति की जायेगी। ऐसे ही करोड़पतियों के बाप के भी बाप परमेश्वर ने तुझे पैदा किया है, वह अगर तुझे भूखा और नंगा रखता है तो उसकी इज्जत का सवाल है, इसमें तेरा क्या बिगड़ता है ?

उसकी शान  वह सँभलता है। फिर क्यों कपट करें ? क्यों चिंता करें ? क्यों डरें ? क्यों रोयें ? राग, भय और क्रोध को आज से ही अलविदा कर दे। जैसे त्रिवेणी में बालू और तिनके बह जाते हैं ऐसे ही सत्संग की त्रिवेणी में आज वे तीनों चीजें बहा दें, बस ! ‘भय, क्रोध और राग तू जा…. प्रीति, नम्रता और प्रभु-आस्था तू मेरे दिल में आ…’

‘मुझे बड़ी चिंता है, मैं क्या करूँ….?’ अरे ! जन्म लेना तेरे हाथ में नहीं है। बालों को सफेद होने से रोकना तेरे हाथ में नहीं है। मौत को थाम लेना तेरे हाथ में नहीं है। अन्न पचाना तेरे हाथ में नहीं है। भूख लगाना तेरे हाथ में नहीं है। रक्त का संचार करना तेरे हाथ में नहीं है। वह परमात्मा ये सब कर रहा है तो बाकी का भी उसके चरणों में सौंपकर तू विश्रांति पा। फिर देख, हँसने का भी मजा…. खाने का भी मज़ा… पीने का भी मज़ा…. जीने का भी मज़ा… मरने का भी मज़ा… तू चिंता मत कर, चिंतन कर, भैया !

मन्मया….. अर्थात् उसी ब्रह्म परमात्मा के चिंतन के एकाकार होना। मामुपाश्रिताः…. मेरे आश्रित हो जा ! जैसे, बच्चा माँ-बाप, दादा-दादी के आश्रित होता है तो मध्यरात्रि में भी उन्हें दोड़-धूप करा देता है क्योंकि बच्चा उनके आश्रित है। ऐसे ही तुम भी परमात्मा के आश्रित हो जाओ। फिर देखो, वह कितना सँभालता है….

‘मुझे तो बहुत मिला है। मैं आपको क्या बताऊँ ? मैं एक आसाराम नहीं, हजार आसाराम हों और एक-एक आसाराम की हजार-हजार जिह्वाएँ हो फिर भी उसने जो दिया है, उसका बयान नहीं कर सकता हूँ ! आपको सच बोलता हूँ। आप उसका आश्रय लें, आपसे मैं हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ।

जो सभी का आश्रय है, आपका भी सचमुच में वही आश्रय है लेकिन आप कपट का आश्रय लेकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं…. आप काम का आश्रय लेकर अपने को नोचते हैं… आप द्वेष का आश्रय लेकर अपने को सताते हैं… आप लोभ का आश्रय लेकर अपने को डुबोते हैं। आप उसी का आश्रय लीजिये, जो ब्रह्माण्डों का आश्रयदाता है, आपका भी वही आश्रयदाता है। जो मेरी जीभ का आश्रयदाता है, आपके कानों का भी वही आश्रयदाता है। इतने निकट के आश्रयदाता को छोड़कर कब तक भटकते रहोगे ? कब तक गिड़गिड़ाते रहोगे ? कब तक पचते रहोगे ?… क्या आपकी बुद्धि निर्णय कर सकती है उसके आश्रय के बिना ? क्या आपका मन सोच सकता है उसके आश्रय के बिना ? क्या आपका शरीर चल सकता है उसके आश्रय के बिना ? क्या धरती टिक सकती है उसके आश्रय के बिना ?

इतने समर्थ प्रभु का आश्रय छोड़कर कहाँ तक भटकोगे ? कब तक भटकोगे ? भैया !

कबीरा माँगे माँगणा प्रभु दीजे मोहे दोय।

संत समागम हरि कथा मो उर निशदिन होय।।

संत समागम, हरि-कथा हरि स्वरूप के आश्रय में स्थित करते हैं। उस आश्रय में गोता मारना ही सत्संग का उद्देश्य है।

हम आश्रय तो भगवान का लेते हैं और प्रीति संसार से करते हैं। नहीं, आश्रय भी भगवान का और प्रीति भी भगवान की। आपका तो  काम बने जायेगा, आपकी मीठी निगाहें जिस पर पड़ेंगी उसका भी मंगल होने लगेगा। यह बिल्कुल सच्ची बात है। उसका आश्रय लेकर तो देखो ! हम परमात्मा का थोड़ा बहुत आश्रय लेते भी हैं लेकिन प्रीति संसार की होने से उस आश्रय का पूरा लाभ, पूरा सुख नहीं ले पाते। उसका पूरा लाभ व पूरा सुख पाने के लिए आश्रय भी उसी का और प्रीति भी उसी की हो।

आश्रय तो श्रद्धालु भी लेते हैं लेकिन उसको बाहर खोजते हैं, दूर खोजते हैं। कहते तो हैं- ‘हम भगवान की शरण में हैं।’ लेकिन आप अपने को तो जानो कि शरण में जाने वाला कौन है ? और जिस भगवान की शरण में जाते हो उसकी शरण को भी जान लो। कैसे जानें ? ज्ञानरूपी तप से।

भगवान कहते हैं-

…..बहवो ज्ञानतपसा पूता मद् भावमागताः।।

……. बहुत से भक्त ज्ञानरूप तप से पवित्र हुए मेरे भाव को प्राप्त हो चुके हैं।’ अर्थात् जैसे भगवान मुक्तात्मा, ब्रह्म परमात्मा हैं ऐसे ही अपने को मुक्तात्मा, ब्रह्म परमात्मा समझकर कई भक्त भगवान को प्राप्त हो चुके हैं। आप भी भगवान को जानकर मुक्तात्मा हो जाओ। अपना लक्ष्य ऊँचा बना लो और उसका बार-बार सुमिरन करो। दोहराओः

लक्ष्य न ओझल होने पाये, कदम मिलाकर चल।

सफलता तेरे चरण चूमेगी, आज नहीं तो कल।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 3,4 अंक 107

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