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भक्त मोहन


(अमदावाद में मार्च 2001 में आयोजित विद्यार्थी शिविर में देश के नन्हें-नन्हें भावी कर्णधारों को प्रेरक प्रसंग के माध्यम से भक्तिकी महिमा समझाते हुए पूज्य श्री ने कहाः)

मोहन की माँ ने उसे पढ़ने के लिए गुरुकुल में भेजा। मोहन के पिता का बचपन में ही स्वर्गवास हो गया था। गरीब ब्राह्मणी ने अपने इकलौते बेटे को गाँव से  5 मील दूर गुरुकुल में प्रवेश करवाया। गुरुकुल जाते समय बीच में जंगल का रास्ता पड़ता था।

एक दिन घर लौटने में मोहन को देर हो गयी। भयानक जानवरों की आवाजें आने लगीं। कहीं चीता, कहीं शेर तो कहीं सियार…. मोहन थर-थर काँपने लगा। मोहन जैसे-तैसे करके जंगल से बाहर निकला। उसकी माँ राह देख रही थी। माँ ने कहाः

”बेटा ! क्यों डरता है?”

मोहनः ”माँ ! अँधेरा हो गया था। हिंसक प्राणियों की भयानक आवाजें आ रही थीं। माँ ! इसलिए बड़ा डर लगता था। भगवान का नाम लेता-लेता मैं किसी तरह भाग आया।”

माँ- ”तू अपने भाई को बुला लेता।”

मोहनः ”माँ ! मेरा कोई भाई भी है क्या ?”

माँ- ”हाँ, हाँ,बेटा ! तेरा बड़ा भाई है।”

मोहनः ”कहाँ है?”

माँ- ”जहाँ से बुलाओ, आ जाता है।”

मोहनः ”भाई का नाम क्या है ? माँ !”

माँ- ”बेटा! तेरे भाई का नाम है गोपाल। कोई उसको गोपाल बुलाता है,कोई गोविन्द,कोई कृष्ण बोलता है,कोई केशव। वही तेरा बड़ा भाई है, बेटा ! जब भी डर लगे तब तू ‘गोपाल भैया…. गोपाल भैया’ करके उसको पुकारना तो वह आ जायेगा।”

दूसरे दिन गुरुकुल से लौटते वक्त जंगल में मोहन को डर लगा। उसने पुकाराः

”गोपाल भैया ! गोपाल भैया ! आ जाओ न, मुझे बड़ा डर लग रहा है… गोपाल भैया।”

इतने में मोहन को बड़ा ही मधुर स्वर सुनायी दियाः ”भैया ! तू डर मत। मैं यह आया।”

गोपाल भैया का हाथ पकड़कर मोहन निडर होकर चलने लगा। जंगल की सीमा तक मोहन को लौटाकर गोपाल लौटने लगा।

मोहनः ”गोपाल भैया ! घर चलो।”

गोपालः ”नहीं भैया ! मुझे और भी काम हैं।”

घर जाकर मोहन ने माँ को सारी बात बतायीः ”माँ ! माँ ! आज भी देर हो गयी। जंगल में डर लगने लगा तो मैंने गोपाल भैया को पुकारा। वे मुझे गाँव की सीमा तक छोड़ गये।”

माँ समझ गयी  कि जो दयामय द्रौपदी और निर्दोष गजेन्द्र की पुकार  पर दौड़ पड़े थे, मेरे भोले, निर्दोष और दृढ़ श्रद्धावाले बालक की पुकार पर भी वे ही आये थे।

अब मोहन वन में पहुँचते ही गोपाल भैया को पुकारता और वे झट आ जाते।

एक दिन गुरुकुल में गुरुजी के यहाँ सारे बच्चे और कुछ शिक्षक उपस्थित हुए। गुरुजी के यहाँ दूसरे दिन श्राद्ध था। कौन बच्चा इस निमित्त क्या लायेगा, इस पर बातचीत हो रही थी। किसी ने कहाः ”मैं दूध लाऊँगा।”

किसी ने कहाः ”मैं शक्कर लाऊँगा.”

किसी ने कहाः ”चावल लाऊँगा।”

किसी ने कहाः ”चारोली और इलायची लाऊँगा।”

मोहन गरीब था फिर भी उसने कहाः ”गुरु जी ! गुरु जी ! मैं दूध लाऊँगा। अपनी माँ से जाकर कहूँगा तो मेरी माँ दूध का खूब बड़ा लोटा भर देगी, मैं ले आऊँगा।

गुरु जी को पता था कि ”यह गरीब है क्या लायेगा ?”

मोहन ने घर जाकर गुरु के यहाँ श्राद्ध की बात कही और कहाः ”माँ ! मुझे भी एक लोटा दूध ले जाना है।”

गरीब माँ कहाँ से दूध लाती ? माँ ने कहाः ”बेटा जब गुरुकुल जायेगा न तो गोपाल भैया को पुकारना। तू गोपाल भैया से दूध माँग लेना, वे ले आयेंगे।”

दूसरे दिन मोहन ने जंगल में जाते ही गोपाल भैया को पुकारा और कहाः आज मेरे गुरु जी के पिता का श्राद्ध है। मुझे एक लोटा दूध लेकर जाना है। माँ ने कहा है कि गोपाल भैया से माँग लेना।

गोपाल ने मोहन के हाथ में देते हुए कहाः अपने गुरु जी को दे देना।

मोहन लोटा लेकर गुरुकुल पहुँचा। कोई ढेर सारे चावल लाया, तो कोई शक्कर और यह तो केवल एक लोटा दूध लाया !

मोहनः गुरु जी, गुरु जी ! गोपाल भैया ने दूध भेजा है।

गुरु जी व्यस्त थे, सामने तक न देखा। उन्हें पता न था कि गरीब मोहन क्या लाया होगा।

मोहन ने फिर से कहाः गुरु जी, गुरु जी ! मैं दूध लाया हूँ,गोपाल भैया ने दिया है।

गुरु जीः बैठ, अभी।

थोड़ी देर बाद मोहन फिर बोलाः गुरु जी, गुरु जी मैं दूध लाया हूँ, गोपाल भैया ने दिया।

गुरु जी ने कहाः सेवक ! ले जा। जरा-सा दूध लाया है और सिर खपा दिया। जा, इसका लोटा खाली कर दे।

सेवक लोटा ले गया। खाली बर्तन में दूध डाला बर्तन भर गया। दूसरे बर्तन में डाला, दूसरा बर्तन भी भर गया। जितने बर्तनों में दूध डालता बर्तन भर जाते,पर लोटा खाली न होता होता  सेवक चौंका। उसने गुरु जी को जाकर बताया।

गुरु जीः कहाँ से लाया है यह अक्षय पात्र?

मोहनः एक मेरा गोपाल भैया है, उनसे माँगकर लाया हूँ।

गुरुजीः तेरी आवाज सुनकर गोपाल भैया कैसे आ गये?

मोहनः मेरी माँ ने बताया था कि कोई यदि प्रेम से और विश्वास से उसको पुकारे, ध्यान करे तो वह प्रकट हो जाता है। एक दिन घर जाने में देर हो गयी थी। जंगल में शेर चीतों की आवाज सुनकर मैं घबरा गया और उसको पुकारा तो वह आ गया। आज मैंने गोपाल भैया से कहा कि दूध चाहिए। तो वह दूध ले आया।

गुरु जी ने मोहन को प्रणाम किया और कहाः मोहन, मुझे भी ले चल, अपने गोपाल भैया के दर्शन करा।

मोहनः चलिये, गुरु जी। जब मैं घर जाऊँगा तब जंगल के रास्ते में गोपाल भैया को बुलाऊँगा। आप भी देख लेना।

श्राद्ध विधि पूरी होने के बाद गुरु जी मोहन के साथ चले। रास्ते में जंगल आया। मोहन ने आवाज लगायीः गोपाल भैया, गोपाल भैया, आ जाओ न।

मोहन को आवाज सुनायी दीः आज तुम अकेले तो हो नहीं, डर तो लगता नहीं, फिर मुझे क्यों बुलाते हो ?

मोहनः गोपाल भैया, डर तो नहीं लगता लेकिन मेरे गुरु जी तुम्हारे दर्शन करना चाहते हैं।

गुरु जीः मेरे कर्म ऐसे हैं कि मुझे देखकर भगवान नहीं आते। तू दूर जाकर पुकार।

मोहन ने दूर जाकर पुकारा। गोपाल भैया दिखे। मोहन ने कहाः मेरे गुरु जी को भी दर्शन दो न।

गोपालः वे मेरा तेज सहन नहीं कर सकेंगे। तेरी माँ तो बचपन से भक्त थी, तू भी बचपन से भक्ति करता है। तुम्हारे गुरु जी ने इतनी भक्ति नहीं की है। गुरु जी से कहो कि जो प्रकाश पुंज  दिखेगा, वही गोपाल भैया है। जाओ, गुरु जी को मेरे प्रकाश का दर्शन हो जायेगा। उसी से उनका कल्याण हो जायेगा।

मोहन ने आकर कहाः देखो, गुरु जी गोपाल भैया खड़े हैं।

गुरु जीः मेरे को गोपाल भैया नहीं दिखते, केवल प्रकाश दिखता है।

मोहनः हाँ, वही है, वही है गोपाल भैया।

गुरु जी गदगद हो गये। उनका रोम रोम आनंदित हो उठा, अष्टसात्विक भाव प्रकट हो गये। गुरुजीः गोपाल,गोपाल करके पुकार उठे। अब तो गुरुजी मोहन को अपना गुरु मानने लगे क्योंकि उसी ने भगवद् दर्शन का रास्ता बताया।

तुम भी मोहन की नाँईं भगवन्नाम जपते जाओ। गोपाल भैया तुम पर भी प्रसन्न हो जायेंगे… स्वप्न में भी दर्शन दे देंगे। बच्चों पर तो वे जल्दी खुश होते हैं। तुम भी भगवान के साथ सेवक स्वामी, सखा भैया के भाव से कोई भी सम्बंध जोड़कर प्रेम से उन्हें पुकारोगे तो तुम्हारे हृदय में भी आनंद प्रकट हो जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 27-29, अंक 107

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अन्तःकरण के मुख्य दोष


(जाबल्य ऋषि की तपस्थली, साबरमती के तट पर बने मोटेरा आश्रम में पूज्य श्री ने अंतःकरण के मुख्य दोषों पर प्रकाश डालते हुए अपने प्यारे साधकों को कहाः)

भक्तियोग, ज्ञानयोग और कर्मयोग का आखिरी फल तो एक ही हैः उस परमतत्व को जानना, जो सत्यस्वरूप है, ज्ञानस्वरूप है और अनंत है। श्रुति कहती हैः

सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म।

लेकिन बाबा ! भक्ति के, ज्ञान के और कर्म के आरम्भ में क्या कोई फर्क है ?

हाँ थोड़ा होता है। भक्ति सगुण, साकार ब्रह्म के लिए प्रेम उभारने हेतु अंतःकरण की भावमय, रसमय दशा है। निष्काम कर्म सेवामय वृत्ति बनाकर अंतःकरण को सुख देने वाला है और जहाँ से भक्ति का भाव या रस आता है अथवा जहाँ से सेवा के फलस्वरूप शांति या सुख आता है, उस मूल के विचार को बोलते हैं-तत्वज्ञान।

अंतःकरण के तीन दोष हैं- मल, विक्षेप और आवरण।

मल क्या है ? उचित-अनुचित का विचार किये बिना मन में जैसा आये वैसा करके सुख लेना।

या पर्यंत जीवेत् सुखेन जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत्।

‘जब तक जीयें, सुख से जीयें, ऋण करके भी घी पियें….।’ मल माने, न करने जैसा करके भी मजा लेना, न खाने जैसा खाकर भी मजा लेना, न बोलने जैसा बोलकर भी मजा लेना…. अर्थात् केवल मजे के लिए लपक पड़ना। जैसे, मछली स्वाद के मजे के लिए लपक पड़ती है और फँस जाती है, पतंगा रूप के मजे के लिए दीये पर लपक पड़ता है और जल मरता है, भ्रमर सुगंध के मजे के लिए लपक पड़ता है और कमल में कैद हो जाता है, हिरण शब्द के मजे के लिए लपक पड़ता है और मारा जाता है, हाथी स्पर्श के मजे के लिए लपक पड़ता है और जीवनभर महावत की गुलामी करता है। ऐसे ही हम लोगों का मन लपक पड़ता हैः ‘पान मसाला खाऊँ, बीड़ी पीऊँ, शराब पीऊँ, दुराचार करूँ, चोरी करूँ…. कुछ भी करके मजा लूँ।’ यह अन्तःकरण की मलीनता का प्रभाव है। पाप-वासना, अशुद्ध आसक्ति, भोग-वासनाएँ, ये मल दोष हैं।

निष्काम कर्म करके अंतःकरण का मलदोष निकाला जा सकता है। बाहर के सुख की वासना मिटाने के लिए निष्काम कर्म सहायक होते हैं। औरों को सुख देने के कार्य करने से अपने सुख की वासना निवृत्त होती है और मलदोष निवृत्त होने लगता है।

भक्तियोग से भी मलदोष निवृत्त होता है। निगुरे और अभक्त लोग जितना शास्त्र-मर्यादा का उल्लंघन करते हैं और उनका मन जहाँ-तहाँ लपक पड़ता है, उतना भक्तों और सगुरों के द्वारा नहीं होता। भक्तों और सगुरों के जीवन में पचासों गलतियाँ दिखेंगी लेकिन वे भक्त या शिष्य नहीं बनते तो पाँच सौ गलतियाँ करते और गलती को गलती नहीं मानते। भक्त या शिष्य गलती को गलती तो मानते हैं।

भक्त कभी यह न सोचेः ‘अरे रे रे…. मुझमें इतनी गलतियाँ हैं, मुझमें इतने दोष हैं…. भगवान ! मैं तेरे दर्शन के योग्य नहीं हूँ।’ नहीं, नहीं, भक्त ऐसा न सोचे और न ही भक्ति छोड़कर संसारियों के खिंचाव में आकर्षित हो जाय। वरन् वह प्रार्थना करेः ‘अपने दोष छोड़ने में मैं असमर्थ हूँ प्रभु ! लेकिन मैं तेरा हूँ… अब तू ही कृपा कर।‘ भक्त जब भगवान का बनता है तो दोष भक्त के नहीं रहते, भगवान अपने समझकर उनको हटाने का सामर्थ्य दे देते हैं।

दूसरी बात, यदि भक्त अपने में दोष मानता है तो दोष को बल मिलता है। भक्त अंतःकरण में दोष देखे, अपने में नहीं। ‘दोष अंतःकरण में होते हैं, मल अंतःकरण में होता है, विक्षेप अंतःकरण में होता है, आवरण अंतःकरण में होता है। मुझमें तो परमात्मा है और मैं परमात्मा में हूँ।’ इस प्रकार का चिंतन करने से भी अंतःकरण के दोष जल्दी निवृत्त होते हैं।

किसी के अंतःकरण में कोई गुण है लेकिन भक्ति नहीं है, भगवान का आश्रय नहीं है तो वह गुण ज्यादा समय नहीं टिक सकता। रावण, कंस, दुर्योधन, हिटलर, सिकंदर आदि एकदम गये-बीते नहीं थे। उनमें भी गुण थे। रावण और कंस के पास इतना सामर्थ्य था कि देवता तक उनसे काँपते थे। दुर्योधन ऐसा प्राणनिरोध करता था कि जल में समाधिस्थ हो जाता था। हिटलर, सिकंदर भी एकाग्रता में आगे थे। लेकिन…..

गुण होते हैं उस दैव के, आत्मचैतन्य के, इसीलिए गीता में 26 गुणों को दैवी सम्पदा कहा गया है। अभय, सत्य, संशुद्धि…. आदि 26 गुणों का वर्णन गीता के 16वें अध्याय के प्रथम तीन श्लोकों में आता है, जिन्हें बोलते हैं दैवी गुण। दैवी गुण माने, जो गुण उस देव के हैं, लेकिन उस देव का आश्रय नहीं है तो अहं अपने गुण मान लेता है तथा उसमें उलझ जाता है और वे गुण दुर्गुण हो जाते हैं।

अगर भक्त में अवगुण हैं तो वह अपने को अवगुणी न माने और गुण हैं तो गुणवान न माने। लेकिन अपने को भगवान का माने और भगवान को अपना माने तो भगवान का देवत्व अपने में बढ़ते-बढ़ते दैवी गुण बढ़ जायेंगे और वे दैवी गुण अवगुणों को समाप्त कर डालेंगे। इससे अंतःकरण का मलदोष निवृत्त होगा।

दूसरा होता है अंतःकरण का विक्षेप। जैसे दर्पण गंदा है तो समझो मल है और दर्पण हिलडुल रहा है तो है विक्षेप। हिलते डुलते दर्पण में चेहरा ठीक से नहीं दिखेगा। यदि दर्पण स्थिर होगा तभी चेहरा ठीक से दिखेगा। ऐसे ही अंतःकरण पवित्र तो है लेकिन जप-ध्यान करने बैठते हैं तो बस, जैसे फिल्म की पट्टी  चलती वैसे विचार-पर-विचार आने लगते हैं, यह है विक्षेप।

मलदोष निवृत्त होता है सेवा, सत्कर्म, दान पुण्य आदि स और विक्षेप दूर होता है भक्ति उपासना, जप-ध्यान आदि से। इसके बाद एक ही दोष रहता है, ईश्वरप्राप्ति में एक ही सोपान बाकी रहता है आवरण अर्थात् अज्ञान। वस्तुतः ‘मैं क्या हूँ’ इसका पता नहीं है और देह को ‘मैं’ मानकर ‘मैं फलाना हूँ, मैं फलानी हूँ….’ मान बैठे। मैं वास्तव में क्या हूँ’ इसका अज्ञान ही आवरण है।

आवरण दो प्रकार का होता हैः

असत्वादपादक आवरण और अभानापादक आवरण।

असत्वादपादक आवरण आम आदमी को होता है। उसे ईश्वर के अस्तित्व का पता नहीं होता। वह सोचता हैः ‘भगवान होते तो दिखते….’

अभानापादक आवरण भक्तों को, साधकों को होता है। उनको ईश्वर के अस्तित्व का भान नहीं होता है। वे मानते तो हैं कि भगवान हैं, उनकी प्रेरणा भी मानते हैं, उन्हें ईश्वर के अस्तित्व के विषय में तो समझ तो आता है लेकिन अनुभव नहीं होता है।

असत्वापादक आवरण गुरु के ज्ञान से हट जाता है। भक्त ने, साधक ने, जिसने सत्संग सुना है, वह मानता है कि भगवान हैं और मेरी आत्मा होकर बैठे हैं।

‘भ’ माने भरण-पोषण की सत्ता, ‘ग’ माने गमनागमन की सत्ता, ‘वा’ माने वाणी का उदगम स्थान, ‘न’ माने यह सब नहीं होने के बाद भी जो रहता है, वह भगवान मेरा आत्मा है। यह सार सत्संग के द्वारा वह समझ तो लेता है लेकिन अभी केवल समझा है अनुभव नहीं हुआ। इसे बोलते हैं अभानापादक आवरण।

जब तक यह आवरण दूर नहीं हुआ, जब तक ईश्वर का अनुभव नहीं हुआ तब तक यात्रा अधूरी है। ईश्वर का साक्षात्कार नहीं हुआ तब तक जीवन अधूरा है।

अभानापादक आवरण दूर करने के लिए आत्मा-परमात्मा के विषय में ‘श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण’, ‘ब्रह्मसूत्र‘ व उपनिषदों का श्रवण करें, सुने हुए का मनन करें, निदिध्यासन करें (अर्थात् गोता मारें)।

मुझे थोड़ा आनंद आता था, थोड़ी अनुभूतियाँ भी हुई थीं लेकिन मन में होता था कि ‘पूज्य श्री लीलाशाह बापू को साक्षात्कार हुआ उतना तो मुझे नहीं हुआ। बापू को इतना लोग मानते हैं, मुझे तो कोई चिड़िया भी नहीं मानती।’ यह अभानापादक आवरण खटक रहा था। मेरा यह आवरण मिटाने के लिए मेरे गुरु जी को भी कसम खानी पड़ी, लीला करनी पड़ी थी।

पूज्य गुरुदेव उपदेश देते तब तो लगता थाः “स्थूल शरीर मैं नहीं, आनंदमय कोष भी मैं नहीं, मैं तो साक्षी हूँ, आनंदस्वरूप हूँ, ब्रह्म हूँ।” ये सब बुद्धिपूर्वक मान लिया था, ध्यान में थोड़ा आनंद भी आता था लेकिन अभानापादक आवरण खटक रहा था। पूर्णता की कमी खटक रही थी।

सुबह में गुरु जी किसी को वेदांत का शास्त्र पढ़ने के लिए देते थे। गुरुजी अपने नियम करते और शास्त्र भी सुनते। बीच में पर्दा रहता था। कभी कभी गुरुजी पर्दा हटा लेते थे। कमरे में हम 4-5 साधक ही रहते।

एक दिन गुरु जी को आ गयी मौज…. गुरु जी सीधा प्रहार नहीं करते थे, सांकेतिक भाषा में कहते थे। गुरु जी ने कहाः “कुछ लोग बेचारे….” ऐसा कहकर गुरु जी ने मेरी ओर देखा। मैं समझ गया कि इशारा मेरी ओर है। उस दिन हम तीन ही थे।

गुरु देव ने कहाः “कुछ बेचारे यह सोचते रहते हैं कि हूँ तो मैं ब्रह्म, शरीर मैं नहीं हूँ लेकिन मेरे गुरु जी को कितने लोग जानते हैं, उतने मुझे नहीं जानते। गुरु जी के अनुभव में और मेरे अनुभव में कुछ कमी है। वे कमी है की बात मानकर कमी बना लेते हैं। मुझमें दोष हैं, मुझमें दोष हैं ऐसा करके दोष बना लेते हैं। मैं ऐसे लोगों को क्या कहूँ ?”

गुरुदेव के पास ही गीता-ग्रंथ रखा था, उसे उठाते हुए उन्होंने कहाः “लीलाशाह सिर पर गीता रखता है और कसम खाता है कि जो लीलाशाह है वह तू है, जो तू है वही लीलाशाह है। अब तो मान ले, भाई !”

कृपालु गुरुदेव ने इस तरह मेरे अभानापादक आवरण को भी मार भगाया।

यह अभानापादक आवरण हटाने का एक तरीका है शास्त्रीय तरीका। भक्ति करते-करते फिर भीतर से भगवान की आवाज आयेगीः “तू किसको खोजता है ? मैं तेरे साथ हूँ, तू मेरा स्वरूप है।” सोSहं की ध्वनियाँ होने लगेंगी।

सनातन धर्म के जो पाँच प्रमुख देव हैं उन पाँचों में से किसी एक की भी भक्ति आप करें तो उनकी भक्ति में यह ताकत है कि वे आपका लौकिक मनोरथ तो पूरा करते हैं, लेकिन यदि आप किसी लौकिक कामना के बिना ही देवों की भक्ति करते हैं तो देव आपको अलौकिक आत्मसुख देने वाले संत के पास पहुँचा देते हैं।

फिर चाहे कोई शैव उपासक हो और शिव की उपासना करते हो, चाहे वैष्णव हो और भगवान विष्णु के अवतारों की उपासना करता हो, शाक्त उपासक हो और लक्ष्मी माता, सरस्वती देवी, नवदुर्गा या गायत्री आदि की उपासना करता हो चाहे गाणपत्य हो और गणपति जी की उपासना करता हो, चाहे सूर्य उपासक हो। इन पंच देवों की उपासना में बड़ा बल है। इनकी उपासना आपकों संतों से, सदगुरुओं से, सच्चे महापुरुषों से मिला देता है।

असत्वापादक आवरण सत्संग से मिटता है और अभानापादक आवरण साधना एवं गुरुकृपा से मिटता है। दोनों आवरण हट जाने से आत्मा बेपरदा हो जाता है, ईश्वर का साक्षात्कार हो जाता है। आम आदमी को, निगुरे को दोनों आवरण होते हैं। भक्त को, साधक को एक ही आवरण होता है और ज्ञानवान को दोनों ही आवरण नहीं रहते। अपने आत्मा-परमात्मा के अऩुभव में ज्ञानी निरावरण होते हैं। 33   करोड़ देवता और ब्रह्मा, विष्णु, महेश मिलकर भी ज्ञानी के अनुभव की अन्यथा नहीं कर सकते ! ज्ञानी की ऐसी ज्ञाननिष्ठा होती है ! भावना बदल जाती है, मान्यता भी बदल जाती है लेकिन ज्ञान नहीं बदलता, तत्व ज्ञान नहीं बदलता।

जैसे, यह रूमाल है। इसका आपको ज्ञान हो गया कि इस रंग का है, इतना बड़ा है। अब अगर इसको छिपा दिया जाय और आपको अन्य बातों में लगा दिया जाय तो इसका अदर्शन हो सकता है लेकिन इसका अज्ञान नहीं हो सकता है। आपसे इसका ज्ञान कोई छीन नहीं सकता है। आपके इसका ज्ञान कोई छीन नहीं सकता है। रूमाल का तो अदर्शन होगा, विस्मृति भी होगी परन्तु परमात्मा का एक बार दर्शन हो जाने पर, एक बार उसका ज्ञान हो जाने पर, एक बार उसके निरावरण हो जाने पर फिर उसका अदर्शन और उसकी विस्मृति ज्यादा समय नहीं टिकती। ऐसा दिव्य है उस परमात्मा का अनुभव !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 4-7, अंक 107

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विवेक जागृत रखो


(गीतामर्मज्ञ पूज्य श्री गीताज्ञान की पावन गंगा बहाते हुए अपने प्यारे श्रोताओं को कितना सहज में ज्ञानामृत देते हैं उसका एक साक्ष्य आपके समक्ष प्रस्तुत है।)
श्रीमद् भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोsनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।
‘हे कुन्तीपुत्र ! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत ! उनको तू सहन कर।’ (गीताः 2.14)
तू भूख-प्यास, मान-अपमान, सुख-दुःख को सहन कर, नहीं सहेगा तो देह में मन लगा रहेगा और सह लेगा तो मन की देह से कुछ पृथकता हो सकेगी। मन परमात्मा में लगाना है तो देह की सुविधा-असुविधा की चिंता छोड़। जन्म-मरण के दुःखों से दूर होना है तो देह में से ममता हटा।
वे लोग सचमुच अभागे हैं जो सारा दिन शरीर को सजाते रहते हैं, आईने में देखते रहते हैं सुन्दरता विकसित करने के लिए सैलूनों में, ब्यूटी पार्लरों में जाया करते हैं। ऐसे देहाध्यासी लोगों को एक क्षण में हँसना, दूसरे क्षण में दुःख हो जाता है। एक क्षण में हँसना, दूसरे क्षण में रोना पड़ता है। ऐसा करते-करते वे पूरा समय गँवा देते हैं। बाद में तिर्यक-पशु-पक्षियों की योनि पाते हैं और भटकते रहते हैं, वे सुख-दुःख सहते हैं फिर भी उनके दुःखों का अंत नहीं आता है।
हे राम जी ! इस जीव ने कौन से दुःख नहीं सहे हैं। संसार में जो भी दुःख हैं वे सब मनुष्य ने सहन किये हैं। कभी तो वह बैल होकर बोझा उठाता है, कभी हाथी होकर जंगलों में भटकता है, कभी हिरण बनाता है तो किसी का शिकार हो जाता है, कभी शिकारी होकर भागता है तो कभी शिकार होकर भागता है।
यह जीव जन्म-से-जन्मांतर तक भागता आया है। चौरासी लाख योनियों से भागता-भागता इस मनुष्य देह में आया है। अब यदि मनुष्य देह में नहीं चेतेगा तो फिर न जाने कितने-कितने जन्मों में भागना पड़ेगा। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं- ‘हे अर्जुन ! तू तितिक्षा सह। सत्पुरुषों का संग कर।’
सत्पुरुषों के पास जाने में कोई कष्ट आता है तो तू सहन कर ले, तपस्या हो जायेगी। परमात्मा का ध्यान करने में संसार का कोई पदार्थ, कोई चीज चली जाय तो चिंता मत कर। एक दिन शरीर भी मिट्टी में मिल जायेगा। सच पूछो तो जो परमात्मा का ध्यान करते हैं, संसार की चीजें तो उनके पीछे-पीछे घूमती रहती हैं और जो परमात्मा को छोड़कर संसार के पीछे घूमते हैं उऩके पास संसार का सुख टिकता ही नहीं। मान लो, संसार की कोई चीज छूट जाय, संसार का कोई मित्र नाराज भी हो जाय, संसार का कोई पदार्थ चला भी जाय तो भगवदभक्ति के रास्ते में उसकी परवाह नहीं करनी चाहिए।
शीत उष्ण, सुख-दुःख आते हैं और जाते हैं। ये आगमापायी और अनित्य हैं। जिस देह को शीत-उष्ण लगता है, जिस देह को भूख-प्यास लगती है, वह देह भी शाश्वत नहीं है तो उस देह पर आने वाले सुख-दुःख सदा कैसे रहेंगे ? इसलिए बुद्धिमान को चाहिए कि अपना अधिक-से-अधिक समय मौन, एकांत, ध्यान में, संतों के सान्निध्य में अथवा निःस्वार्थ होकर समाज व संतों के बीच सेतु बनने के दैवीकार्य में गुजारें। लोगों से कम-से-कम परिचय करें, कम-से-कम बोलें ,कम-से-कम सोयें, शरीर को टिकाने के लिए ही खायें और बार-बार विचार करें किः “मैं कौन हूँ ? मैं कहाँ से आया हूँ ? आखिर मैं कहाँ जाऊँगा ? संसार की सब सुविधाएँ मिल जायें, आखिर क्या ?”
एक बात यदि आप याद रखोगे तो कल्याण हो जायेगा। प्रतिदिन अपने से पूछो…. कुछ भी काम करो, काम करने के पहले और काम करने के बाद अपने-आपसे पूछो किः आखिर यह सब कब तक ? बस, इतना ही याद रखोगे तो बहुत बढ़िया होगा। दिन में बार-बार पूछो किः ‘आखिर क्या ?’ आखिर यह सब कब तक ? आखिर इन सबका क्या ?’ बार-बार ऐसा सोचोगे तो विवेक जगेगा। विवेक जगने से वैराग्य आता है। जिसकी बुद्धि में वैराग्यरूपी फूल खिला है, उसके जीवन में षट्सम्पत्तिरूपी भँवरे आने लगते हैं।
जब तक विवेक नहीं है तब तक मन चंचल है। जरा-सा विवेक जागृत रखो तो मन शांत जायेगा। विवेक प्रगाढ़ होगा तो वैराग्य टिकेगा तो यश भी टिकेगा, वैराग्य टिकेगा तो मान भी टिकेगा, वैराग्य टिकेगा तो अर्थ भी टिकेगा और वैराग्य गया तो सब गया ! वैराग्य का बाप है विवेक। जगत की नश्वरता का विवेक करो।
क्या करिये क्या जोड़िये, थोड़े जीवन काज।
छोड़ी-छोड़ी सब जात हैं देह, गेह, धन, राज।।
कोई रोता बिलखता मरता है तो कोई एकाएक मरता है, कोई बीमार होकर मरता है तो कोई तंदुरुस्त ही मर जाता है, लेकिन सच्चा मरना तो उसी का है जो परमात्मा के ध्यान में मर जाय। धन्य तो उसी का जीना है जो परमात्मा में डूबकर परमात्ममय हो जाता। जिसका मन परमात्मा के ध्यान में डूबा है, जिसका मन परमात्मा की मस्ती में मरा है उसको काल का क्या मारेगा ? जो परमात्मा में मर रहा है उसको दुनिया क्या मारेगी ? वह तो परमात्मा में मरकर परमात्ममय हो गया है।
मूर्ख आदमी संसार में खपकर संसारी हो जाते हैं, जड़वादी जड़ चीजों के पीछे जड़ बन जाते हैं, भोगवादी भोगों में खपकर भोगी बन जाते हैं, लेकिन कोई-कोई गुरुमुख, कोई-कोई हरि का प्यारा है जो विवेक को सजाग रखकर अपने मन को परमात्मा में लगाता है, सत्पुरुषों की संगति में लगाता है, प्रणव के जाप में लगाता है।
बहिरंग जप करते-करते फिर मानसिक जप होता है तो मन के कल्मष दूर होते हैं, तन के पाप नाश होते हैं। शरीर के दोष और मन की चंचलता कम होती है। जप से तन और मन के दोष दूर हो जाते हैं तो फिर ध्यान लगना स्वाभाविक शुरु हो जाता है और आदमी अपने मूलस्वरूप में प्रगट होने लगता है।
आपका मूलस्वरूप है आत्मा। आपका मूलस्वरूप है चैतन्य सच्चिदानंद परमात्मा। आपका मूलस्वरूप है अजन्मा, आपका मूलस्वरूप है अविनाशी, आपका मूलस्वरूप है त्रिकालाबाधित। आप धीरे-धीरे अपने मूलस्वरूप की एक बार थोड़ी-सी भी झाँकी आ जाय फिर नागकन्याओं का सुख भी तुम्हें प्रभावित नहीं कर सकेगा, अप्सराओं का सुख भी तुम्हें प्रभावित नहीं कर सकेगा, देवों, यक्षों और किन्नरों का सुख भी तुम्हें आकर्षित नहीं कर सकेगा तो संसार के तुच्छ सुख तुम्हें क्या बाँध सकेंगे ?
इसीलिए विवेक को सदैव जागृत रखें। मन को समझायें- ‘आखिर कब तक ? पुत्र की चिंता भी क्यों और कब तक करेगा ? अगले जन्म में तेरे कितने पुत्र-पुत्री परिवार हो गये, कितनी पत्नियाँ हो गयीं, तू किस-किसकी चिंता करेगा ?’
जिसने अनुराग का दान दिया उससे कण माँग लजाता नहीं….
जिसने तेरी आँखों के देखने की सत्ता दी, जिसने तेरे पैरों को पसारने का सामर्थ्य दिया, जिसने तेरे होठों को हिलने की सत्ता दी, जिसने तेरे मन के संकल्पों को स्फुरने की सत्ता दी, जिसने तेरी बुद्धि को निर्णय करने की सत्ता दी, जिसने तुझे इतना-इतना दान दिया उसको भूलकर तू कहाँ भटकता है ?
इन्द्रियों के सुख क्षणिक हैं। कोई आँख के सुख में फँसा है ,कोई जीभ के सुख में फँसा है, कोई नाक के सुख में फँसा है, कोई कान के सुख में फँसा है और कोई त्वचा के सुख में फँसा है। जिस सुखस्वरूप परमात्मा की सत्ता से ये इन्द्रियसुख भासते हैं, उस सुखस्वरूप परमात्म-चेतना का अनुभव करो। तुम तुच्छ इन्द्रिय सुख के पीछे अपना जीवन बरबाद न करो।
जिसने अनुराग का दान दिया उससे कण माँग लजाता नहीं।
अपना भूल समाधि लगा, यह पिउ का वियोग सुहाता नहीं।
नभ देख पयोधर शाम ढले, क्यों मिट उसमें मिल जाता नहीं।
अब सीख ले मौन का मंत्र नया, ये पीउ का वियोग सुहाता नहीं।
चुगता है चकोर अंगार, फरियाद किसी को सुनाता नहीं।
अरे ! चकोर पक्षी उस पिया के प्रेम में अंगार चुग जाता है फिर भी किसी से शिकायत नहीं करता और ‘हे मन ! तू सुख-दुःख की शिकायत करता है ? प्रतिकूलता में कायरों जैसा भागता है ? जरा-सा अपमान हो जाता है तो तू कमजोर हो जाता है ? प्रभु को छोड़ देता है ? जरा सा मान मिलता है तो प्रभु को छोड़ देता है ?
आदमी की सबसे बड़ी दुर्बलता यह है, आदमी का आखिरी-में-आखिरी दुर्भाग्य यह है कि वह पहला ही कुठाराघात अपने साधन-भजन और विवेक पर करता है। संसार का कोई काम आ गया तो भजन छोड़ दिया, संध्या वंदन छोड़ दिया। आदमी पहली कैंची चलाता है – सत्संग पर, ध्यान भजन पर।
शास्त्र कहते हैं- शतंविहाय भोक्तव्यम्…. सौ काम छोड़कर भोजन कर लेना चाहिए।
……..सहस्त्रम् स्नानम् आचरेत्।
हजार काम छोड़कर स्नान कर लें। स्नान से सत्त्वगुण बढ़ता है। सत्त्वगुण से विवेक पुष्ट होता है। सत्त्वगुण बढ़ने से मनोबल बढ़ता है, संकल्प सत्य होने लगता है, सत्त्वगुण अत्यधिक होने से ऋद्धि-सिद्धि हाजिर हो जाती है।
सूर्योदय के पहले स्नान करने से बुद्धि पवित्र होती है, ध्यान-भजन में भी बरकत आती है और संसार के व्यवहार में, कमायी में भी बरकत आती है। पहले के जमाने में लोग चार बजे उठकर स्नानादि करके संध्या-वंदन करते थे। तब परिवार में एक व्यक्ति कमाता था फिर भी सुखी जीवन गुजारते थे और अभी पति और पत्नी दोनों कमाते हैं फिर भी बरकत नहीं होती और जरा-जरा बात में खिन्न हो जाते हैं।
लक्ष्यम् विहाय दातव्यम्…..
लाख काम छोड़कर भी दान करने का मौका आ जाय तो दान कर दें। धन का दान करें, धन न हो तो किसी को आश्वासन दें, प्यासे को पानी का प्याला ही दान करें लेकिन कुछ-न-कुछ दान करें क्योंकि शरीर नाशवान है। मौत कब आ जाय निश्चित नहीं है। इसलिए शरीर से कुछ देना सीखें, ताकि एक बार प्रभु के लिए शरीर भी देना पड़े तो दे सकें। शरीर देकर भी यदि परमात्मा मिलता है तो सौदा सस्ता है। नहीं तो शरीर को तो श्मशान में लकड़ियाँ जला देंगी। दान भी प्रभु को पाने की प्रक्रिया का एक अंग है।
…….कोटि त्यक्त्वा हरिभजेत्। करोड़ काम छोड़कर हरि का स्मरण करो, हरि का ध्यान करो।
आज आदमी का सोचने का तरीका इतना गलत हो गया है कि घर में कोई मेहमान आ जाय, संसार में कुछ काम आ जाय या ऑफिस के साहब को रिझाना पड़े तो ध्यान-भजन को छोड़ देता है। अरे ! आत्म-साहब को छोड़कर बाहर के साहबों को रिझाने जायेगा तो साहब राजी नहीं होंगे, तेरा शोषण होगा और तू आत्म-साहब के रास्ते चलेगा तो साहबों के भी साहब (आत्म-साहब) उस साहब का चित्त बदल देंगे। जो काम हजारों-लाखों खर्च करके नहीं होता वह तेरे ध्यान-भजन के प्रभाव से अपने-आप भी हो सकता है।
कबीरा यह जग आयके, बहुत से कीने मीत।
जिन दिल बाँधा एक से, वे सोये निश्चिंत।।
कोई मित्र से मिलने के लिए सत्संग छोड़ देते हैं, कोई धन कमाने के लिए सत्संग छोड़ देते हैं, कोई नोटिस को ठीक करने के लिए सत्संग छोड़ देते हैं। जब संसार में प्रतिकूलता आ जाती है या अधिक अऩुकूलता आ जाती है तो व्यक्ति पहला खून करता है, साधन-भजन का। पहली गोली मारता है ध्यान-भजन के समय को। जो ध्यान-भजन का समय काट देता है उसको काल भी उठा लेता है।
जो ध्यान भजन नहीं करता उसको भीतर का रस नहीं आता। जिसको भीतर का रस नहीं आता, वह बाहर के रसों में अपना कीमती समय गँवा देता है और बाहर से सजा-धजा तो दिखता है लेकिन भीतर से खोखला हो जाता है। आखिर भगवान की कृपा, संतों की कृपा से कुछ काम तो होता है लेकिन अपने कर्म इतने तीव्र होते हैं कि कुछ तो भोगना ही पड़ता है। इसलिए शास्त्रकार कहते हैं-
शतं विहाय भोक्तव्यं सहस्त्रं स्नानं आचरेत्।
लक्ष्यं विहाय दातव्यं कोटि त्यक्त्वा हरिभजेत्।।
‘सौ काम छोड़कर भोजन करो। हजार काम छोड़कर स्नान करो। लाख काम छोड़कर दान करो और करोड़ काम छोड़कर हरि का स्मरण करो, हरि का स्मरण करो, हरि का ध्यान करो।’ हरि के ध्यान से तुम स्वयं हरिमय हा जाओगे।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्टूबर 2001, पृष्ठ संख्या 7-9, अंक 106
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