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वैराग्य अग्नि प्रज्वलित करें….


(जैसे गाय दिन भर के चारे का कुछ साररूप अमृत अपने बछड़े को दूधरूप में पिलाती है ऐसे ही प्राचीन ग्रंथों-पुराणों और उपनिषदों का साररूप अमृत-रस  संचित करके, पूज्य बापू जी अपने भक्तों को पिला रहे हैं। यह ज्ञानामृत ‘चित्त का इलाज’ कैसेट से संकलित है।)

पुराण में यह प्रसंग आता है, श्री कृष्ण उद्धव को यह प्रसंग सुनाते हैं-

भगवान श्रीहरि के अंशावतार नर-नारायण नामक ऋषि पवित्र स्थान बदरिकाश्रम में तपस्या कर रहे थे। उनके तप को भंग करने के लिए देवराज इन्द्र ने अप्सराएँ भेजीं, लेकिन नर-नारायण ने चित्त से पार का निर्विकल्प सुख पाया था, वे क्रिया के सुख में कैसे गिर सकते थे ?

नर-नारायण ने उन अप्सराओं की ओर आँख उठाकर देखा तक नहीं ! कामदेव और रति के साथ आयी हुई वे अप्सराएँ अपने प्रयत्न में असफल रहीं। नर-नारायण अपने सहजस्वरूप से नीचे नहीं आये। निर्विकल्प से सविकल्प में, सविकल्प से भाव में और भाव से क्रिया में नहीं आये।

होता ऐसा है कि तत्त्व से, निर्विकल्प से सविकल्प में आया जाता है, सविकल्प से भाव में और भाव से क्रिया होती है। क्रिया में उलझ गये तो क्रिया को थामो, भाव में आओ। भाव को बदलो, समाधि में आओ। समाधि को बदलकर तत्त्व में चले आओ तो आप भी नर-नारायण स्वरूप हो जाओगे।

देवराज इन्द्र की भेजी हुई अप्सराओं से नर-नारायण विचलित न हुए, वरन् नारायण में अपने उरु से एक अत्यंत रूपवती अप्सरा ‘उर्वशी’ को उत्पन्न किया। जिसके आगे इन्द्र की अप्सराएँ भी फीकी पड़ गयीं। नारायण ने वह उर्वशी इन्द्र को भेंट दे दी।

स्वर्ग से आयी अप्सरा ने कहाः “देवेन्द्र ने हमें आपकी तपस्या में विघ्न डालने के लिए भेजा था।

महाभाग ! आप देवाधिदेव ऩारायण हैं। हम चाहती हैं कि आपकी सेवा करें। आप हमें स्वीकार करने की कृपा करें।”

नारायणः “अभी नहीं। हमने इस जन्म में तय कर रखा है कि विवाह नहीं करेंगे। देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए अट्ठाईसवीं चतुर्युगी के द्वापर में मैं भूमण्डल पर प्रकट होऊँगा। उस समय तुम सभी अलग-अलग जन्म लेकर मेरी पत्नी बनोगी।”

वे ही नर और नारायण द्वापर में श्रीकृष्ण और बलराम के रूप में प्रगट हुए थे एवं वे ही अप्सराएँ श्रीकृष्ण की रानियाँ बनी थीं, ऐसी कथा है।

नारायण द्वारा प्रगट की गयी उर्वशी नृत्यकला में अद्वितीय थी। शोभा एवं रूप-लावण्य में भी सबसे बढ़-चढ़कर थी।

जब योग्यता बढ़ जाती है और अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं रहता तो परिच्छिन्नता रहती है, अहंकार आ जाता है और जब अहंकार आ जाता है तब सारी योग्यताओं पर पानी फिर जाता है।

कोई कितना भी पुण्यात्मा हो, कितना भी धर्मात्मा हो, कितना भी बलवान हो, कितना भी विद्वान हो, कितना भी धनवान हो, कितना भी सत्तावान हो लेकिन जब अहंकार आ जाता है तब सारे गुण अवगुण में परिवर्तित हो जाते हैं।

उर्वशी नृत्य कर रही थी। नृत्य करते-करते उसे लगाः ‘मैं कितना सुन्दर नृत्य कर रही हूँ !’ उसमें मैं की परिच्छिन्नता आ गयी….

क्रिया सहज में होती है तो समाधि जैसा सुख होता है लेकिन क्रिया का मूल्यांकन करके जीव कर्ता बन जाता है तो सहज क्रिया के नीचे की स्थिति में आ जाता है। आप जब ऑफिस में, दुकान में, देश में, परदेश में, जहाँ भी काम करते हो और आनंद आता है तो समझो, आप अपने कर्ताभाव को भूले हुए हो। क्रिया तो हो रही है लेकिन अनजाने में आप भावना के जगत में पहुँचे हो, तब काम करने में आपको मजा आता है। आप जब आनंदित होते हो तो आपके द्वारा सुहावने निर्णय आते हैं। अतः जिस समय जो काम करें, फल की आकांक्षा के लिए नहीं। यदि व्यवहार करते समय हमारी नजर फल पर होती है तो व्यवहार का रस नहीं मिलता, लेकिन यदि हमारी नजर परमात्मा पर होती है तो व्यवहार का फल भी सुन्दर होता है और अंतःकरण भी शुद्ध होता है।

उर्वशी को गर्व हुआ कि मैं कितना सुन्दर नृत्य कर रही हूँ तो वह नृत्य की कला भूल गयी। तब ब्रह्मदेव ने शाप दियाः ‘जा, मृत्युलोक को प्राप्त हो।’

उर्वशी को अपनी गल्ती का पता चल गया कि मुझमें मद आ गया था। उर्वशी ने क्षमायाचना की। ब्रह्माजी का क्रोध शांत हुआ और बोलेः

“जब तू ऐल (पुरुरवा) राजा को नग्न अवस्था में देखेगी तब शाप से मुक्त होगी और तुझे पुनः स्वर्ग में प्रवेश मिलेगा।”

इन्द्र ने देखा कि बेचारी उर्वशी मृत्युलोक में जा रही है। वह जल्दी से शापनिवृत्त हो जाय इसलिए दो अश्विनी कुमारों को मेढ़े के रूप में साथ में दे दिया।

ऐल राजा महाप्रतापी था। बड़े-बड़े मुकुटधारी राजा उसके आगे नतमस्तक होते थे। वह गरीबों का सहायक और प्रजा का पालक था, साधु संतों का आदर करने वाला था, मित्रों का परम सुहृद था और शत्रुओं के लिए काल के समान था। विद्या एवं धन से सम्पन्न होते हुए भी निरभिमानी और दानी था।

ऐसे रूप, गुण, वैभव, सदाचार एवं शक्तिसम्पन्न राजा ऐल को उर्वशी ने अपने चंगुल में फँसा लिया। राजा पुरुरवा उसके मोह में पड़ गया। मोह में पड़ा तो इन्द्रियों के सुख में पड़ गया और इन्द्रियों का सुख बार-बार भोगने से आदमी आत्मसुख से, समाधि के सुख से, भाव के सुख से नीचे आ जाता है।

समाधि का सुख बार-बार लेने से इन्द्रियों के सुख से मनुष्य ऊपर उठ जाता है। जबकि बार-बार विकारों का सुख भोगने से मनुष्य समाधि के सुख से, आत्मसुख से नीचे आ जाता है।

इतना प्रतापी और यशस्वी राजा भी धीरे-धीरे उर्वशी के वश में हो गया। उर्वशी जैसा कहती वैसा ही राजा करता। जैसे, बंदर मदारी के इशारे पर नाचता है ऐसे ही वह राजा उसके इशारे पर नाचता। इस तरह वर्षों बीत गये।

एक रात्रि को इन्द्र की प्रेरणा से गंधर्व मेढ़ों को चुराकर ले गये। जब वे मेढ़ों को ले चले तो मेढ़े चिल्लाने लगे। उर्वशी उन मेढ़ों को पुत्र के समान मानती थी। उनके चिल्लाने की आवाज सुनकर वह क्रोधित हो उठी और बोलीः

“राजन् ! मेढ़ों को सुरक्षित रखने की तुमने प्रतिज्ञा की थी, किन्तु ! आज तुम्हारे विश्वास में आकर मैं बरबाद हो गयी। मेरे पुत्र के सामन आँखें मूँदे पड़े हो। तुम्हें धिक्कार है ! तुम कैसे राजा हो ? कैसे वीर हो ? चोरों से मेढ़ों को नहीं छुड़वा सकते ?”

जब स्त्री अपमान कर देती है तो पुरुष को ज्यादा जोश आ जाता है।

राजा हथियार लेकर  मेढ़ों के पीछे भागा तो कपड़ों तक का ख्याल न रहा। कहाँ तो प्रतापी, यशस्वी राजा ऐल और कहाँ स्त्री का आज्ञा से मेढ़ों के बचाने के लिए भागा जा रहा है… कटिवस्त्र भी छूट गया, एकदम दिगम्बर हो गया। इतने में बिजली चमकी और बिजली के प्रकाश में उर्वशी ने राजा को नग्नावस्था में देख लिया। राजा का बचा हुआ तप-तेज उर्वशी के हिस्से चला गया और वह शाप से मुक्त हो गयी, उसका को तो काम बन गया।

मेढ़ों को लेकर अपने भवन में लौटने पर राजा को उर्वशी स्वर्ग में जाने के लिए तत्पर दिखाई दी। उर्वशी को देखकर राजा बोलाः “अरी सुन्दरी ! कमललोचनी ! ठहरो। मुझे सुखी करो। मैंने तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया है। तुम्हारे बिना मैं कैसे जीऊँगा ? तुम्हारे लिए तो मैंने अपना राज्य तक छोड़ दिया।”

इस प्रकार राजा ऐल विलाप करने लगे।

उर्वशीः “महाराज ! तुम बड़े मूर्ख हो। तुम्हारी बुद्धि कुण्ठित हो गयी है। इस दुनिया में किसी का कोई सहारा नहीं होता। सच्चा सहारा तो परमात्मा ही है।”

स्त्री फटकारे, लानत दे फिर भी अन्दर वैराग्य नहीं होता, विवेक नहीं होता क्योंकि क्रिया के सुख से हम लोगों का इतना तादात्म्य हो जाता है कि अपमान भी उस वक्त मजाक लगता है।

उर्वशी ने राजा को समझाने का यत्न किया कि तुमने कई बार मेरे शरीर का आलिंगन किया, वर्षों तक किया। इससे तुम्हें क्या मिला ? जरा सोचो। देह नश्वर है और देह का सुख भी नश्वर है। क्रिया के नश्वर सुख में तुम अपने शाश्वत प्रभु को क्यों भूलते हो ?”

फिर भी राजा ऐल का मोह न गया। ऐल गिड़गिड़ाने लगा। आखिर उर्वशी का हृदय पिघला। उसने गन्धर्वों से अग्निपात्र लेकर दिया और कहाः “इस अग्निपात्र में हवन करोगे तो तुम स्वर्ग को प्राप्त होगे और हम फिर वहाँ भोग भोगेंगे।”

अग्निपात्र लेकर राजा अपने महल में चला गया। अग्निपात्र में उसने हवन किया। उसके प्रताप से वह स्वर्ग गया और उसने चिरकाल तक उर्वशी के साथ भोग भोगे।

उर्वशी के साथ भोगते-भोगते ऐल जब क्षीणकाय हुआ, पुण्य क्षीण हुए तब उसे वैराग्य आया कि अरे ! मुझे धिक्कार है। मैं कहाँ तो प्रतापी राजा, कहाँ तेजस्वी राजा और कहाँ मैंने अपना जीवन विषय-विकारों में बरबाद कर दिया ! इसमें उर्वशी का कसूर नहीं है, कसूर मेरा ही है। मैं अपने महा प्रताप को भूलकर शापित उर्वशी के चक्कर में पड़ा ! अरे काम ! तुझे धिक्कार है ! अरे ! क्रिया के सुख ! तुझे धिक्कार है ! मुझ जैसे प्रतापी राजा को तूने हरण कर लिया ! बड़े-बड़े ऋषियों को, तपस्वियों को भी तूने ही गिराया है ! अरे, काम ! तुझे धिक्कार है। जो तेरा ग्रास हो जाता है उसके पश्चाताप का कोई पार नहीं रहता है।

जीव जब परमात्मा की शरण में जाता है तो उसका हृदय शुद्ध होने लगता है। जब वह भोग-भोगता है तो उसका हृदय अशुद्ध होता है। भोगों की तुच्छता का ख्याल करके परमात्मा की स्मृति करता है तो चित्त शुद्ध होता है।

पानी को जब अग्नि का संयोग मिलता है तो वाष्पीभूत होने लगता है। एक पानी की बूँद को जब अग्नि का संयोग मिलता है तो उसमें 1300 गुनी ताकत आ जाती है। ऐसे ही चित्त को जब विवेक वैराग्य की अग्नि मिलती है तब चित्त बड़ा शक्तिशाली हो जाता है, सूक्ष्म हो जाता है और ऐसा चित्त परमात्म-यात्रा में सफल होने लगता है।

अतः भोगों की नश्वरता एवं क्षणभंगुरता का ख्याल करके विवेक जगायें, वैराग्य रूपी अग्नि से चित्त को सूक्ष्म करके परमात्म-पथ पर अग्रसर होते जायें। यही जीवन का साफल्य है।

जानिअ तबहिं जीव जग जागा, जब सब विषय बिलास बिरागा।

(श्रीरामचरितमानस)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2001, पृष्ठ संख्या 16-18, अंक 106

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साधना के सोपान


(पूज्य श्री के तीन महीने के एकांत-मौन के बाद दक्षिण दिल्ली के पुष्पविहार में हुए सत्संग से उदधृत कुछ अमृत-पुष्प….)

चार जगर पर व्यावहारिक बात नहीं करनी चाहिए, केवल भगवत्स्मरण ही करना चाहिए। ये चार स्थान हैं- श्मशान, मंदिर, गुरु-निवास एवं रोगी के पास।

श्मशान में कभी गये तो ‘तुम्हार क्या हाल है ? आजकल धंधा कैसा चल रहा है ? सरकार का ऐसा है…..’ ना, ना। श्मशान में इधर उधर की बातें न करें वरन् अपने मन को समझायें- ‘आज इसका शरीर आया, देर सवेर शरीर यह शरीर भी ऐसे ही आयेगा…. इसको ‘मैं-मैं’ मत मान, जहाँ से मैं-मैं की शक्ति आती है वही मेरा है…. प्रभु ! तू ही तू… तू ही तू…. मैं तेरा, तू मेरा। अरे मन ! इधर-उधर की बातें मत कर… देख, यह शव जल रहा है, कभी यह शरीर भी जल जायेगा।’ इस प्रकार मन को सीख दें।

महिलाओं को श्मशान में नहीं जाना चाहिए और पुऱुशों को अगर श्मशान में जाने को न मिले तो आश्रम द्वारा प्रकाशित ‘ईश्वर की ओर’ पुस्तक बार-बार पढ़ें। उससे भी मन विवेक-वैराग्य से संपन्न होने लगेगा।

रोगी से मिलने जाओ तब भी संसार की बाते नहीं करनी चाहिए। रोगी से मिलते समय उसको ढाढ़स बँधाओ। उसको कहोः ‘रोग तुम्हारे शरीर को है….. शरीर तो कभी रोगी, कभी स्वस्थ होता है लेकिन तुम तो भगवान के सपूत, अमर आत्मा हो। एक दिन यह शऱीर नहीं रहेगा, फिर भी आप रहेंगे, आप तो ऐसे हैं….’ इस प्रकार रोगी में भगवदभाव की बातें भरें तो आपका रोगी से मिलना भी भगवान की भक्ति हो जायेगा। रोगी के अन्दर बैठा हुआ परमात्मा आप पर संतुष्ट होगा और आपके दिल में बैठा हुआ वह रब भी आप पर संतुष्ट होगा।

अगर आप मंदिर-गुरुद्वारे में जाते हो तो वहाँ पर भी सांसारिक चर्चा न करो, इधर-उधर की बातें छोड़ दो। वहाँ तो ऐसे रहो कि एक दूसरे को पहचानते ही नहीं और पहचानते भी हो तो रब के नाते। अन्यथा भगवान और गुरु का नाता तो ठंडा हो जाता है और पहचान बढ़ जाती है’ आप मेरे घर आइये… आप यह करिये…. आप वह करिये….., जरा ध्यान रखना उसका लड़का ठीक है, अपने ही हैं….’ मंदिर-गुरुद्वारे में जाकर भगवदभाव जगाना होता है, संसार को भूलना होता है। अगर वहाँ जाकर भी संसार की बातें करोगे तो मुक्ति कहाँ पाओगे ? दुःखों से विनिर्मुक्त कहाँ होगे ? इसलिए मुक्ति के रास्ते को गंदा मत करो, वरन् गंदे रास्तों को भी भगवदभक्ति से सँवार लो।

अगर गुरु के निवास पर जाते हो, गुरु के निकट जाते हो, तब भी सांसारिक बातों को महत्त्व न दो। गुरु को निर्दोष निगाहों से,  प्रेमभरी निगाहों से, भगवदभाव की निगाहों से देखो और उन्हें संसार की छोटी-छोटी समस्या सुनाकर उनका दिव्य खजाना पाने से वंचित न रहो। उनके पास से तो वह चीज मिलती है जो करोड़ों जन्मों में करोड़ों माता-पिता से भी नहीं मिली। ऐसे माता-पिता-गुरु मिले हैं तो फिर संसार के छोटे-मोटे खिलौनों की बात नहीं करनी चाहिए।

इस प्रकार चार जगहों पर सांसारिक चर्चा से बचकर भगवत्चर्चा, भगवत्सुमिरन करें, मंदिर-गुरुद्वारे एवं संतद्वार पर जप-ध्यान करें तो आपके लिए मुक्ति का पथ प्रशस्त हो जायेगा…

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2001, पृष्ठ संख्या 15, अंक 106

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करूणासागर की करूणा….


पूज्य बापू जी का साक्षात्कार दिवसः 18 अक्टूबर 2001

(जीवन में सदगुरु की कितनी आवश्यकता है इस विषय पर चेटीचंड 2001 के ध्यान योग शिविर में शिविरार्थियों को समझाते हुए पूज्य बापू जी कह रहे हैं-)

प्रसादे सर्वदुःखानां….. परमात्मशांति के प्रसाद से सारे दुःखों का अंत होता है और बुद्धि परमात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित होती है।

जीव बेचारा इन्द्रियों एवं मन से जुड़कर संसार में सुखी होने को भटकता है लेकिन सुख की जगह पर दुःख और जिम्मेदारियाँ, क्लेश और बीमारियाँ मिलती हैं। धर्मयुक्त जीवन होता है तो धर्म संयम सिखाता है, वासनाओं को नियंत्रित करता है लेकिन वासनावाला अनुकूल में राग और प्रतिकूल में द्वेष करने लगता है। मनुष्य बेचारा राग-द्वेष में फंस जाता है।

अऩुकूल परिस्थितियों से उत्पन्न राग और प्रतिकूल परिस्थितियों से उत्पन्न द्वेष मानव की शांति का, माधुर्य का, समझ का अपहरण कर लेता है इसलिए ईश्वरोपासना की आवश्यकता पड़ती है। ईश्वर की उपासना किये बिना राग-द्वेष मिटता नहीं है। ईश्वर की उपासना से राग-द्वेष शिथिल होता है, धर्म का अनुष्ठान करने से वासना नियंत्रित होती है। इससे सज्जनता एवं सदगुण आने लगते हैं। यदि सदगुण आते हैं तो अहंरूपी असुर घुस जाता हैः ‘मैं सदगुणी हूँ… मैं सयंमी हूँ… मैं धर्मात्मा हूँ…. मैं भक्त हूँ… मैं मक्का गया, मैं काशी गया….’ और यह अहं आकर सब चुरा लेता है।

इस अहं को हटाने के लिए अहं की खोज करें- ‘मैं-मैं कौन करता है ?’ मन तू ज्योतिस्वरूप अपना मूल पिछान। तू तो साक्षीस्वरूप परमात्मा का अविभाज्य अंग है लेकिन जो इसको नहीं जानने देती है वह – अविद्या महारानी।

अविद्या के कारण जीव मन के गुणों को अपना गुण मानता है, चित्त के गुण-दोषों को अपना गुण दोष मानता है और अहं सजाता है। फिर मन के अनुकूल होता है तो सुख होता है, मन के प्रतिकूल होता है तो दुःख होता है। इसी से भिड़ते-भिड़ते जीव बेचारा अपना जीवन खत्म कर देता है।

शास्त्र कहते हैं- तस्मात् गुरु अभिमुखात् गच्छेत्। गुरु के अभिमुख जाओ। अन्यथा ये माया और अहं तुम्हें कहीं-न-कहीं भटका देंगे। गुरु भी कैसे हों ? श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ…. जिन्हें शास्त्रों का ज्ञान हो, अविद्या को भगाने का एवं राग-द्वेष को मिटाने का जिन्हें अनुभव हो, जो ब्रह्मनिष्ठ परमात्मा में प्रतिष्ठित हों, ऐसे गुरु की खोज करें।

तुलसीदास जी कहते हैं-

तन सुकाय पिंजर कियो धरे रैन दिन ध्यान।

तुलसी मिटे न वासना बिना विचारे ज्ञान।।

शरीर को सुखाकर पिंजर जैसा बना लें, दिनरात  ध्यान जैसा ऊँचा साधन करें, फिर भी ज्ञान का विचार किये बिना अविद्या-वासना मिटती नहीं है।

जब ज्ञान का विचार मिलता है, तब अविद्या बोलती हैः ये बाद में कर लेंगे अभी तो जरा पिता को सँभाल लूँ, जरा पत्नी को सँभाल लूँ, जरा परिवार को सँभाल लूँ…. फिर आराम से भजन करूँगा।’ ऐसा करते-करते जीव उलझ जाता है।

अपने कर्तव्य का जब तक सूक्ष्म अभिमान है, तब तक परमात्मा की पूर्णता का अनुभव नहीं होगा। साधन तो करें लेकिन हमारे साधन के बल से विश्वनियंता पकड़ में आ जाये – ये संभव नहीं है। साधन करते-करते यह महसूस हो, कि मेरा करा-कराया अल्प है, ईश्वर की कृपा ही सर्वस्व है। इससे ईश्वर की महती कृपा जीव को मिलती है।

फिर चाहे ईश्वर को निराकार मानो, चाहे साकार मानो, चाहे बंसीधर मानो, चाहे धनुषधारी मानो, चाहे सबसदाशिव मानो, चाहे पाण्डुरंग मानो, चाहे गजानन के रूप में मानो, चाहे प्राणिमात्र के आधारस्वरूप निर्गुण निराकार आत्मरूप में मानो लेकिन ईश्वर की शरणागति स्वीकार करने से ईश्वरकृपा अवश्य मिलती है।

शरीर से जो कुछ करो ईश्वर की प्रसन्नता के लिए मन, से जो कुछ करो ईश्वर की प्रसन्नता के लिए, बुद्धि से जो कुछ सोचो उसी के विषय में। ‘अहं, अहं’ नहीं, आत्मारामी बनो।

संसार का सहज कार्य भी मार्गदर्शक के बिना नहीं होता। कबीरजी कहते हैं-

सहजो कारज संसार को गुरु बिन होत नाहीं।

हरि तो गुरु बिन क्या मिले समझ ले मनमाहीं।।

फिर यह तो अनजाना देश है और अनमिला पिया है। यहाँ मन, बुद्धि, अहं अपना कोई-न-कोई षड्यंत्र करके साधक को उलझा देते हैं।

ऐसा नहीं है कि लोगों में श्रद्धा नहीं है। श्रद्धा तो है। साधन नहीं करते ऐसी बाते भी नहीं है। गुरु नहीं है ऐसी बात है क्या ? नहीं, गुरु भी हैं। लेकिन गुरु की सूक्ष्मता का फायदा, साधना की सूक्ष्मता का फायदा, श्रद्धा की सूक्ष्मता का फायदा कोई-कोई विरले ही ले पाते हैं, आखिरी तक निभा पाते हैं। स्थूल मतिवाले तो अपनी तराजू से तोलेंगेः पहले ऐसा था, ‘अब ऐसा है…. इतना लाभ हुआ, इतना नहीं हुआ…।’

इसलिए बहुत-बहुत साहस और समझ की आवश्यकता है। नानकजी ने कहा हैः

घर विच आनंद रहया भरपूर, मनमुख स्वाद न पाया।

अपने मन से निर्णय कर लिया कि मैं यहाँ जाकर भजन करूँगा… मैं ऐसा अनुष्ठान करूँगा… मैं उधर जाकर रहूँगा… ये आपके जीवन में आता है – ऐसी बात नहीं है। मेरे जीवन में भी आया था और मैंने गुरुओं को चिट्ठी लिखी थीः “डीसा में आश्रम की कुटिया के चारों तरफ झोंपड़े हैं और बच्चों की गाली-गलौज सुनाई पड़ती है। दिनभर शोरगुल रहता है। नर्मदा किनारे एकांत गुफा है वहाँ जाकर साधना करूँ ?”

गुरु जी ने उत्तर दियाः “नहीं, वहीं रहो।”

‘चलो, जैसी गुरु-आज्ञा।’ फिर परेशानियाँ बढ़ीं। रातभर कुत्ते भौंके, दिनभर लड़के गालियाँ बकें। दीवारों पर भी कोयले से गंदी-गंदी गालियाँ लिखा करें। मन में होता थाः यहाँ कैसे साधना हो ? कैसे ईश्वरप्राप्ति हो ? फिर से गुरु जी को चिट्ठी लिखीः ‘रात भर कुत्ते भौंकते हैं, यहाँ जो कुटिया है, वह भी किसी राजनेता ने षड्यंत्र करके जमीन हड़पने के लिए बनायी थी। जब उसके विरोधियों ने आवाज उठायी तो उसने लिखवा दियाः ‘श्री लीलाशाह बापू आश्रम।’ ऐसा करके आपके नाम का उपयोग किया है और हमको भी ऐसी-ऐसी प्रतिकूलता है।’

बापू ने उत्तर दियाः ‘कुत्ते भौंकते हैं तो ‘ॐ….ॐ….’ बोलते हैं ऐसी भावना करो और राजनेता जो करेगा, वह भरेगा तुम वहीं रहो।’

ऐसा करके मैं सात साल वहीं रहा, गुरु-आज्ञा मानकर। तब पता चला कि गुरु जी का आज्ञा की अगर थोड़ी सी भी अवहेलना करता तो ऐसा ही होता जैसे ईश्वरप्राप्ति के लिए कई लोग निकलते हैं, साधु भी बन जाते हैं लेकिन फिर बेचारे खड़ियापलटन वाले रह जाते हैं अथवा किसी छोटे-मोटे मठ-मंदिर के पुजारी हो जाते हैं या महंत मंडलेश्वर बनकर रह जाते हैं। ईश्वरतत्त्व की अनुभूति कोई विरला ही कर पाता है। क्यों ? क्योंकि अविद्या का, माया का बड़ा सूक्ष्म खेल है।

आद्यशंकराचार्य जी कहते हैं-

नास्ति अविद्या मनसोतिरिक्ताः मन एव अविद्या भवबंध हेतु।

तस्मिन् विलिने सकलं विलीनं तस्मिन जिगीर्णे सकलं जिगिर्णम्।।

अपना मन ही धर्मात्मा बनकर प्रेरणा देता हैः ‘मेरा निर्णय सही है।’ भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

मन एव मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षयोः।

मन ही मनुष्य के बंधन एवं मुक्ति का कारण है। यदि मन में जैसा आया वैसा करने लगे तो मन ही बंधन में भटकायेगा। धार्मिक होकर भी कहीं-न-कहीं बाँध देगा, त्यागी होकर भई कहीं-न-कहीं बाँध देगा, योगी होकर भी कहीं-न-कहीं बाँध देगा।

ज्ञानी की गुरु की आज्ञा-आदेश के पालन और उनके सहयोग के बिना संसार-सागर से पार होना संभव ही नहीं है। ज्ञानी गुरुदेव कह दो अथवा ज्ञानस्वरूप ईश्वर की विशेष कृपा कह दो, एक ही बात है।

गुरु बिनु भवनिधि तरहिं न कोई।

जो विरंचि संकर सम होई।।

ब्रह्माजी और शिवजी जैसे समर्थ हों फिर भी ‘मैं समर्थ हूँ’ – यह जीवभाव बना रहेगा। ‘अपना ‘मैं’ विराट ब्रह्म के साथ एकाकार  है, अभिन्न है’ ऐसा बोध जिन सत्पुरुषों को हुआ, उनकी दृष्टि से जब तक अपनी आंतरिक सूक्ष्म दृष्टि नहीं मिलती तब तक संसार का दुःख पूरान नहीं मिटता है। अगर संसार की चीज वस्तुएँ पाकर ही दुःख मिटता हो तो सभी देशों के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री निर्दुःख होने चाहिए, धनी लोग निर्दुःख होने चाहिए। निर्दुःख तो वही हैं, जिन्होंने निर्दुःख परमात्मातत्त्व को अपने आत्मरूप में जाना है, परमेश्वरतत्त्व का जिनको आधार है।

अपने साधन का आधार नहीं, अपनी चतुराई का आधार नहीं, अपनी अकल होशियारी का आधार नहीं, परमात्मस्वरूप का आधार परमात्मस्वरूप में जगे हुए महापुरुषों का ही मार्गदर्शन आखिरी दम तक चाहिए।

अगर मैं गुरु जी की आज्ञा की अवहेलना करके सोचताः पत्नी बेचारी रोती होगी…. माँ वृद्धा है आँसू बहाती होगी…. भैया बेचारा मेरे सहयोग से ही कारोबार करता था… बैंक में, इधर-उधर मेरा हस्ताक्षर ही चलता था, अब पैसे कैसे निकालेगा ? दुकान पर उगाही कैसे आयेगी ? जरा जाऊँ-जरा जाऊँ….. मैं जरा जरा में ही जा मिटता ! लेकिन झटका मारके निकल गया तो निकल गया। वमन किया हुआ फिर क्या चाटना !

डीसा से अमदावाद 150 कि.मी. ही दूर था लेकिन 7 साल तक घरवालों को पता नहीं चलने दिया कि हम डीसा में रहते हैं क्योंकि घर से सम्पर्क रहेगा तो किसी-न-किसी काम में उलझायेंगे…. इसलिए जरा दृढ़ होना पड़ता है। शास्त्र कदम-कदम पर सावधान करते हैं-

गुरुकृपा ही केवलम् शिष्यस्य परम मंगलम्।

अगर डीसा छोड़कर चले जाते अथवा गुरु जी ने कहाः ‘वहीं रहो’ तब हम सोचतेः ‘नहीं, हमें नर्मदा किनारे रहना है। आपने खूब प्यार दिया, आपने खूब मार्गदर्शन दिया, हम आपके आभारी हैं लेकिन अब हम चले जा रहे हैं…. तो हमारी क्या दशा होती ?

गुरू जी के हृदय को सुना-अनसुना करके धोखे से चले जाते अथवा जबरन आज्ञा लेकर जले जाते तो हमारी क्या हालत होती ? हम कल्पना नहीं कर सकते। शक्कर की एक दुकान थी तो दो-पाँच करते और क्या करते ? अथवा तो मठाधीश होकर और लोग जीते हैं वैसे ही जीते। बुढ़ापा आता तो हम सोचतेः ‘हम बूढ़े हो गये….’ बीमारी आती तो हम सोचतेः ‘हम बीमार हो गये…’ शरीर की मौत आने वाली होती तो लगताः ‘हम मर जायेंगे….’ मौत आती तो मर भी जाते… लेकिन अब मौत का बाप भी हमारे आगे खड़ा नहीं रह सकता।

‘मौत होगी तो तन की होगी, मैं काल का भी काल हूँ। मौत की भी मौत हो जाय अगर मेरी तरफ आँख उठाकर देखे तो….’ यह अनुभव तो गुरुकृपा के बिना सँभव ही नहीं था ! बहुत-बहुत ऊँची यात्रा है। इसमें आप टिक जाओ तो आपके दर्शनमात्र से लोगों का मंगल हो सकता है। आपका कुल तर जायेगा।

लेकिन आजकल के शिष्य तो…. ईश्वरप्राप्ति की पूर्ण यात्रा करने की तो उनकी मति-गति नहीं है। जब पूछते हैं- “मैं फलानी जगह जाऊँ” उस समय अगर ‘ना’ बोलें तब भी जायेंगे, इसलिए बोलना पड़ता हैः ‘चलो बाबा ! जाओ। जैसा तुमको ठीक लगे।’

गुरु को कहना पड़ता हैः ‘जैसा तुमको ठीक लगे वैसा करो।’ तो इसका मतलब है कि शिष्य मनमुख है। शिष्य समर्पित तो है, गुरु के द्वार पर तो रहता है लेकिन मन का दास है। जहाँ गुरु की नजर है और गुरु उसकी जितनी उन्नति, जितनी ऊँचाई चाहते हैं वहाँ के लिए तो गुरु को बोलना पड़ेगाः ‘ये नहीं, ये….’ लेकिन शिष्य फिर दूसरा कुछ करेगा या तो भाग जायेगा।

अब भाग जाय उसकी अपेक्षा अथवा नाता तोड़ दे उसकी अपेक्षा ‘चलो, लगा रहे’ कभी न कभी चल पड़ेगा।’ सौ-सौ बातें शिष्य की माननी पड़ती हैं। सौ-सौ नखरे और बेवकूफियाँ स्वीकार करनी पड़ती हैं उसकी, ताकि कभी-न-कभी, इस जन्म में नहीं तो किसी और जन्म में पूर्णता को पा लेगा।

गुरु को क्या लेना है ? अगर गुरु को कुछ लेना है और इसलिए गुरु बने हैं तो वे सचमुच में गुरु भी नहीं हैं। सदगुरु को तो देना-ही-देना है। सारा संसार मिलकर भी सदगुरु की सहायता नहीं कर सकता है और अकेले सदगुरु पूरे संसार की सहायता कर सकते हैं। सदगुरु ऐसे होते हैं लेकिन संसार उनको सदगुरु के रूप में समझे, माने, मार्गदर्शन ले, तब।

जिसकी ईश्वर प्राप्ति की तड़प जितनी ज्यादा है उतनी ही ईमानदारी से वह गुरु की आज्ञा मानेगा। अपने हृदय में ईश्वरप्राप्ति की प्यास, ईश्वरप्राप्ति की तड़प बढ़ायें। ईश्वरप्राप्ति की प्यास और तड़प बढ़ने से अंतःकरण की सारी वासनाएँ, कल्मष और दोष तप-तप कर प्रभावशून्य हो जाते हैं। जैसे, गेहूँ को भून दें तो वे गेहूँ के दाने बोने के काम में नहीं आयेंगे। चने आदि को भून दिया फिर उनका विस्तार नहीं होगा। ऐसे ही ईश्वरप्राप्ति की तड़प बढ़ा कर वासनाएँ भून डालो। फिर वे वासनाएँ संसार के विस्तार में नहीं ले जायेंगी।

प्रकृति के अनेक उपहार हैं-अन्न, जल, तेज, वायु, आकाश, धरती, फल आदि। इनका उपयोग करके सब आनंद से जी सकते हैं, मुक्तात्मा हो सकते हैं लेकिन राम में, द्वेष में, अधिक खाने में, विकार भोगने में खप रहे है बेचारे ! जो ईश्वरप्राप्ति के लिए ही यत्न करते हैं, उधर की मति-गति करते हैं उनका वह ज्ञान नित्य नवीन रस देता है, नित्य नवीन प्रकाश देता है… वे जीवन्मुक्त पुरुष हो जाते हैं, वे परम सुख में विराजते हैं, वे परम आनंद में, परम ज्ञान में, परम तत्त्व में एकाकार रहते हैं। यह बहुत ऊँची स्थिति है ! मानवता के विकास की पराकाष्ठा है यह।

अपना ऊँचा लक्ष्य बनाओ। सप्ताह में कई बार दोहराओः

लक्ष्य न ओझल होने पाये, कदम मिलाकर चल। (शास्त्र-गुरु के अनुभव से)

सफलता तेरे कदम चूमेगी, आज नहीं तो कल।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्टूबर 2001, पृष्ठ संख्या 11-14, अंक 106

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