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तुलसी मीठे वचन ते….


मधुर व्यवहार से सबके प्रिय बनिये

संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

मीठी और हितभरी वाणी दूसरों को आनन्द, शांति और प्रेम का दान करती है और स्वयं आनन्द, शांति और प्रेम को खींचकर बुलाती है। मीठी और हितभरी वाणी से सदगुणों का पोषण होता है, मन को पवित्र शक्ति प्राप्त होती है और बुद्धि निर्मल बनती है। ऐसी वाणी में भगवान का आशीर्वाद उतरता है और उससे अपना, दूसरों का सबका कल्याण होता है। उससे सत्य की रक्षा होती है और उसी में सत्य की शोभा है।

मुख से ऐसा शब्द कभी मत निकालो जो किसी का दिल दुखाये और अहित करे। कड़वी और अहितकारी वाणी सत्य को बचा नहीं सकती और उसमें रहने वाले आंशिक सत्य का स्वरूप भी बड़ा कुत्सित और भयानक हो जाता है जो किसी को प्यारा और स्वीकार्य नहीं लग सकता। जिसकी जबान गन्दी होती है और उसका मन भी गन्दा होता है।

कुटुम्ब-परिवार में भी वाणी का प्रयोग करते समय यह अवश्य ख्याल में रखा जाय कि मैं जिससे बात करता हूँ वह कोई मशीन नहीं है, ‘रोबोट’ नहीं है, लोहे का पुतला नहीं है, मनुष्य है। उसके पास भी दिल है। हर दिल को स्नेह, सहानुभूति, प्रेम और आदर की आवश्यकता होती है। अतः अपने से बड़ों के साथ विनययुक्त व्यवहार, बराबरवालों से प्रेम और छोटों के प्रति दया तथा सहानुभूति सम्पन्न तुम्हारा  व्यवहार जादुई असर करता है।

किसी का दुकान-मकान, धन दौलत छीन लेना इतना बड़ा जुल्म नहीं है जितना कि किसी के दिल को तोड़ना क्योंकि दिल में दिलबर खुद रहता है। बातचीत के तौर पर आपसी स्नेह को याद रखकर सुझाव दिये जायें तो कुटुम्ब में वैमनस्य खड़ा नहीं होगा।

कहने के ढंग में मामूली फर्क कर देने से कार्यदक्षता पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। अगर किसी से काम करवाना हो तो उससे यह कहें कि अगर आपके अनुकूल हो तो यह काम करने की कृपा करें।

बातचीत के सिलसिले में महत्ता दूसरों देनी चाहिए, न कि अपने आपको। ढंग से कही हुई बात प्रभाव रखती है और अविवेकपूर्वक कही हुई वही बात विपरीत परिणाम लाती है।

दूसरों से  मिलजुलकर काम वही कर सकता है जो अपने अहंकार को दूसरों पर नहीं लादता।

ऐसा अध्यक्ष अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से कोई गलती हो जाये तो वह उस गलती को स्वयं अपने ऊपर ले लेता है और कोई अच्छा काम होता है तो उसका श्रेय दूसरों को देता है।

अपने साथियों की व्यक्तिगत या घरेलू समस्याओं के प्रति सहानूभूति रखकर, यथाशक्ति उनकी सहायता करना दक्ष नेतृत्व का चिह्न है। कोई अगर अच्छा काम कर लाये तो उसकी प्रशंसा करना और जहाँ उसकी कमियाँ हों वहाँ उसका मार्गदर्शन करना भी दक्ष नेतृत्व की पहचान है।

अपने साथ काम करने वालों के साथ मैत्री और अपनत्व का सम्बन्ध कार्य में दक्षता लाता है। जहाँ परायेपन की भावना होगी वहाँ नेतृत्व में एकसूत्रता नहीं होगी और काम करने व वाले तथा काम लेने वाले के बीच समन्वय न होने के कारण कार्य में ह्रास होगा।

यह विचार छोड़ दो कि बिना डाँट-डपट के, बिना डराने-धमकाने के और बिना छल-कपट के तुम्हारे मित्र साथी, स्त्री-बच्चे या नौकर-चाकर बिगड़ जायेंगे। सच्ची बात तो यह है कि डर, डाँट और छल-कपट से तो तुम उनको पराया बना देते हो और सदा के लिए उऩ्हें अपने से दूर कर देते हो।

प्रेम, सहानुभूति, सम्मान, मधुर वचन, सक्रिय, हित, त्याग-भावना आदि से हर किसी को सदा के लिए अपना बना सकते हो। तुम्हारा ऐसा  व्यवहार होगा तो लोग तुम्हारे लिये बड़े-से-बड़े त्याग के लिए तैयार हो जायेंगे। तुम्हारी लोकप्रियता मौखिक नहीं रहेगी। लोगों के हृदय में बड़ा मधुर और प्रिय स्थान तुम्हारे लिए सुरक्षित हो जायेगा। तुम भी सुखी हो जाओगे और तुम्हारे सम्पर्क में आने वाले को भी सुख-शांति मिलेगी।

गोस्वामी तुलसी दास जी का वचन हमेशा याद रखने जैसा है-

तुलसी मीठे वचन से, सुख उपजहूँ चहूँ ओर।

वशीकरण यह मंत्र है, तज दे वचन कठोर।।

यदि सुन्दर रीति से, सांत्वनापूर्ण, मधुर एवं स्नेह संयुक्त वचन सदैव बोले जायें तो इसके जैसा वशीकरण का साधन संसार में और कोई नहीं है। परन्तु यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि अपने द्वारा किसी का शोषण न हो। मधुर वाणी उसी की सार्थक है जो प्राणिमात्र का हितचिंतक है। किसी की नासमझी का गैर-फायदा उठाकर गरीब, अनपढ़, अबोध लोगों का शोषण करने वाले शुरुआत में तो सफल होते दिखते हैं किन्तु उनका अन्त अत्यन्त खराब होता है। सच्चाई, स्नेह और मधुर व्यवहार करने वाला कुछ गँवा रहा है ऐसा किसी को बाहर से शुरुआत में लग सकता है किन्तु उसका अऩ्त अनन्त ब्रह्माण्डनायक ईश्वर की प्राप्ति में परिणत होता है। खुदीराम मधुरता और सच्चाई पर अडिग थे। लोग उनको भोला-भाला और मूर्ख मानते थे। प्रेम और सच्चाई से जीने वाले, हुगली जिले के देरे गाँव के ये खुदीराम आगे चलकर रामकृष्ण परमहंस जैसा पुत्ररत्न प्राप्त कर सके। सच्चाई और मधुर व्यवहार का फल शुरु में भले न दिखे किन्तु वह अवश्यमेव उन्नतिकारक होता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2001, पृष्ठ संख्या 22,23 अंक 103

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सतयुग की पूजा पद्धति


संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

पूर्वकाल में मंदिर-मस्जिद आदि कुछ नहीं था। लोग ब्रह्मवेत्ता सदगुरुओं को ईश्वररूप जानकर, उनका उपदेश सुनते, उनकी आज्ञा के अनुसार चलते एवं परमात्मज्ञान पा लेते थे।

बाद में रजो-तमोगुण बढ़ गया। महापुरुषों ने देखा कि ऐरे गैरे भी ‘ब्रह्मज्ञानी’ बनने का ढोंग करने लगे और इसके कारण लोग सच्चे ब्रह्मज्ञानियों पर भी शंका करने लगे इसलिए उन्होंने मूर्तियाँ लाकर रख दीं। सिर पटकते-पटकते 12 साल तप करो, पूजा-पाठ करते यात्रायें करो तब कुछ शुद्धि होगी, किसी सच्चे आत्मज्ञानी महापुरुष को खोजने की पुण्याई होगी। फिर आत्मज्ञान मिलेगा तो लाभ होगा। जब तक ब्रह्मवेत्ता सदगुरु नहीं मिलते तब तक भगवान की सेवा-पूजा करो, तीर्थों में जाओ, कहीं नाक रगड़ो, कहीं झख मारो। जब हृदय शुद्ध होगा, भगवान को पाने की तड़प होगी, सदगुरु की जरूरत पड़ेगी तब कोई गुरु मिलेंगे तो कदर होगी। मुफ्त में गुरु मिल जायेंगे तो क्या कदर करेंगे ?

सतयुग में मूर्तिपूजा नहीं थी, त्रेता में भी नहीं थी। द्वापर-त्रेता के संगम से मूर्तिपूजा चली। एक त्रिकालज्ञ ब्रह्मवेत्ता महापुरुष कहते हैं कि- पौराणिक युग से आज तक जो भी मूर्ति के भगवान हैं वे सब ब्रह्मज्ञानियों के बेटे हैं। ये जो भी देवी-देवता हैं या भगवान हैं, सारे के सारे ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों के मानसिक पुत्र हैं। ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों ने समाज को उन्नत करने के लिए मन से भगवत्तत्व की भावना की और तदनुसार शिल्पियों ने मूर्तियों की रचना की।

कर्षति आकर्षति इति कृष्णः। जो सभी को आकर्षित करता है उसका नाम है श्री कृष्ण। रोम रोम में रम रहा है इसलिए उसका नाम रखा श्री राम। वह कल्याण करता है इसलिए उसका नाम रखा शिव। वह आद्यशक्ति है इसलिए उसको जगदम्बमा कहके भी पूजते हैं।

महापुरुषों की ऊँची सूझ-बूझ और लोक मांगल्य की भावना के अनुसार मूर्तियों की रचना हुई एवं उऩ्होंने ध्यानावस्था में अपने परमात्मस्वरूप में एकाकार होकर जो बोला, वह शास्त्र बन गया। जितने भी शास्त्र हैं सब ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों की समाधिभाषा हैं। ज्ञानवान अपने आत्मानुभव में आकर जो वचन बोलते हैं, वे शास्त्र बन जाते हैं।

गुजरात में अखा भगत नाम के एक आत्मज्ञानी महापुरुष हो गये। लोगों को जगाने के लिए उन्होंने कहा हैः

सजीवाए निर्जीवा ने घडयो, पछी मने कहे मने कंई दे।

अखो तमनने ई पूछे, तमारी एक फूटी के बे ?

‘सजीव (मानव) ने निर्जीव मूर्ति का निर्माण किया, फिर उससे ही प्रार्थना करता है कि मुझे कुछ दे। अखा तुमसे पूछा है कि तुम्हारी एक आँख फूटी है कि दोनों ?’

आप सजीव हैं और मूर्ति निर्जीव है। मंदिर मस्जिद और चर्चों ने इंसान को नहीं बनाया, इन्सान ने उन्हें बनाया है।

गुजरात के ऊँझा नामक स्थान में उमिया माता का मंदिर है। उस मंदिर का उदघाटन था तो वहाँ मेरा जाना हुआ। सारा पटेल समाज वहाँ उपस्थित था।  लोग वहाँ के एक वृद्ध ‘चेयरमैन’ को मेरे पास लाये एवं बोलेः “स्वामी जी ! ये साठ वर्ष से काँवर में पानी लाकर माता जी को पानी चढ़ाते हैं।”

लोगों ने उन्हें हार पहनाया, मेरे आशीर्वचन दिलाये फिर मुझे विचार आया कि साठ वर्ष से कंधे पर काँवर रखकर पानी लाते हैं और माता जी को चढ़ाते हैं, अगर साठ वर्ष तो क्या साठ माह भी किसी ब्रह्मवेत्ता महापुरुष के श्रीचरणों में शांत बैठे होते तो बेड़ा पार हो गया होता।

जो माता जी को पानी नहीं चढ़ाते हैं, नास्तिक हैं, उनकी अपेक्षा तो इन काका को धन्यवाद है लेकिन हमें ऐसे काका नहीं होना है। हमें तो तेजी से चलना है। वर्तमान में जिस प्रकार यात्रा के तीव्र साधन हुए, संदेश पहुँचाने के तार, टेलिफोन आदि के तीव्र साधन हुए, रसोई बनाने के तीव्र साधन हुए वैसे ही प्रभुप्राप्ति के लिए भी तीव्र गति से यात्रा करके मंजिल तक पहुँच जायें।

मुख में पत्थर रखकर राजसी मनुष्य तप करते हैं। आखिरी समय तपस्याकाल में धृतराष्ट्र केव पवनाहार करते थे, गांधारी केवल जलाहार करती थीं और कुंताजी महा में केवल एक ही बार भोजन करती थीं। आप भी ऐसे ही तप करो ऐसा कहने का हेतु नहीं है क्योंकि उस समय का शरीर एवं उस  समय की निष्ठा आज के शरीर एवं आज की निष्ठा से बिल्कुल भिन्न थी। फिर भी कभी-कभी तो उपवास अवश्य करना चाहिए।

कभी स्वाभाविक श्वासोच्छवास को गिनते जायें तो कभी हरि के ध्यान में तल्लीन हो जायें। कभी जप करते-करते शांत होते जायें। कभी जप करते-करते मनन-निदिध्यासन करते जायें तो कभी सेवा द्वारा अंतःकरण को पावन करते जायें।

किन्हीं ब्रह्मवेत्ता महापुरुष को खोज लें और उनकी बतायी हुई युक्तियों का अनुसरण करें तो शीघ्र ही बेड़ा पार हो जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2001, पृष्ठ संख्या 9,10 अंक 103

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निष्काम कर्म की महिमा


संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।

स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।।

‘जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी था योगी है केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है।’ (गीताः 6.1)

केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है वरन् कर्मफल की इच्छा का त्याग करके जो करने योग्य कर्म करता है, सुख लेने की बुद्धि से नहीं, सुख देने की  बुद्धि से कर्म करता है, वही वास्तव में संन्यासी और योगी है।

जो बाहर से भीतर आये, उसे बोलते हैं आहार। जो भीतर से बाहर जाये उसे बोलते हैं आनन्दद। जो भीतर से बाहर आये उसे बोलते हैं सुख। जो भीतर से बाहर आये उसे बोलते हैं ज्ञान।

जब सुख देने की बुद्धि से कर्तव्य कर्म करोगे, शास्त्रोक्त कर्म करोगे तो अपने अंतःकरण में शुद्ध सुख उत्पन्न होगा। आसक्ति रहित कर्म करोगे तो भीतर से आनन्द प्रगट होगा, भीतर से ही ज्ञान प्रगट होगा। आसक्तिरहित कर्म ही संन्यास और योग का फल दे देंगे।

मनुस्मृति में कहा गया हैः

यत्कर्मं कुर्वयोsस्य स्यात्परितोषोsन्तरात्मनः।

तत् प्रत्येनन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्।।

‘जो कर्म करने से अपने मन में तृप्ति और संतोष का अनुभव हो, वह कर्म प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए। जिस कर्म को करने के बाद अन्तरात्मा धिक्कारे, ग्लानि हो, घृणा हो-वह कर्म प्रयत्नपूर्वक छोड़ना चाहिए।’ (मनुः 4-161)

जिन कर्मों से आत्मसुख की प्राप्ति हो, आत्मसंतोष हो, अंतरात्मा की तृप्ति हो, अऩ्तरात्मा का सुख उभरता हो, वे कर्म प्रयत्नपूर्वक करने चाहिए। जो कर्म शास्त्रोक्त हों, संत-अनुमोदित हों और अपने अन्तरात्मा में सुख का माधुर्य का, धन्यवाद का अहसास कराते हों, ये कर्म प्रयत्नपूर्वक करने चाहिए। जो कर्म शास्त्र, संत एवं अन्तरात्मा द्वारा इन्कार किये गये हों उन कर्मों को प्रयत्नपूर्वक त्यागना चाहिए।

कर्म तो करो लेकिन कर्म की आसक्ति का, कर्म के फल का त्याग करोगे तो बुद्धि स्वच्छ और सात्त्विक होगी। स्वच्छ बुद्धि में परमात्म-विषयक जिज्ञासा होगी, फिर तो संन्यासी और योगी को जो आत्मा-परमात्मा का अनुभव होता है वही तुमको होगा और तुम मुक्तात्मा हो जाओगे।

परमेश्वर तत्त्व का ज्ञान पाना हो तो आसक्ति-रहित कर्म करके अपने को खोजें। कर्म करने से पूर्व, कर्म करते वक्त और कर्म पूरे हो जायें उस वक्त जो सबको देखनेवाला सत्-चित्-आनन्द स्वरूप परमात्मा है वही मेरा आत्मा है’ ऐसा चिन्तन करने से बहुत लाभ होता है।

जब हम साधना करने बैठते हैं तब लगता है कि सारा जगत सपना है और चैतन्य आत्मा अपना है लेकिन कर्म करते समय हमारा मन और इन्द्रियाँ आसक्ति करके हमें पुनः संसार में भटका देते हैं। इसीलिए मनु महाराज ने कहा हैः “जिन कर्मों को करने से अपने मन में तृप्ति और संतोष का अनुभव हो, वे कर्म प्रयत्नपूर्वक करने चाहिए।”

संन्यासी को आदेश है कि अग्नि को नहीं छुए, बनी-बनायी भिक्षा ग्रहण करे। अग्नि को नहीं छुआ, बनी-बनायी भिक्षा ग्रहण की और संन्यासी के कपड़े पहने लिए लेकिन यदि मन में इच्छा वासना है तो संन्यास सिद्ध नहीं होता। इससे तो कर्म करे लेकिन इच्छा वासनाएँ छोड़ दे तो अन्तरात्मा का सुख प्रगट होता है। इसीलिए आसक्तिरहित कर्म करने वाले को संन्यासी कहा है।

एक वृद्ध व्यक्ति अंधेरी रात में चौराहे पर लालटेन लेकर खड़ा था। उसका भाव था कि लोगों को अँधेरे में कष्ट न हो।

किसी ने पूछाः “बाबा ! लोगों को रोशनी मिलने से तुम्हें क्या लाभ हो रहा है ?”

वृद्धः “लोगों को तो मैं बाहर से रोशनी दे रहा हूँ लेकिन मुझे यह फायदा है कि मेरा अन्तरात्मा संतुष्ट हो रहा है।”

जो गति योगी को, संन्यासी को मिलती है वही निष्काम करने वाले को मिलती है।

एक बार ज्ञानेश्वर महाराज सुबह  सुबह नदी तट पर घूमने निकले तो देखा कि एक लड़का नदी में गोते खा रहा है और पास में ही एक संन्यासी आँखें बंद करके बैठा है। ज्ञानेश्वर महाराज तुरन्त नदी में कूदे, उस डूबते हुए लड़के को बाहर निकाला फिर संन्यासी को पुकारा ?

“ओ संन्यासी महाराज !”

संन्यासी ने आँखें खोलीं तो ज्ञानेश्वरजी बोलेः “क्या आपका ध्यान लगता है ?”

संन्यासीः “ध्यान तो नहीं लगता है, मन इधर-उधर भागता है।”

“यह लड़का डूब रहा था, क्या आपको दिखाई नहीं दिया ?”

“देखा तो था लेकिन मैं ध्यान कर रहा था।”

ज्ञानेश्वरः “फिर आप ध्यान में कैसे सफल हो सकते हो ? ईश्वर ने आपको किसी की सेवा करने का मौका दिया था। वह आपका कर्तव्य भी था। यदि आप उस कर्तव्य का पालन करते तो ध्यान में भी मन लगता।

ईश्वर की सृष्टि, ईश्वर का बगीचा बिगड़ रहा है और आप बगीचे का आनंद लेना चाहते हो ? बगीचे का आनंद लेना है तो बगीचे को सँवारना भी पड़ता है।”

परहित के कार्य, शास्त्र-संत अनुमोदित कार्य, आसक्तिरहित कार्य मानव की योग्यताओं को विकसित करके उसे परमात्म ज्ञान, परमात्म ध्यान के योग्य बनाते हैं।

जिनके नाम से रघुकुल चला एवं आगे चलकर जिनके कुल में भगवान श्रीराम प्रगट हुए, वे राजा रघु किशोर थे, तब की बात हैः एक दिन वे अपने पिता के साथ वन में स्थित गुरुवर वसिष्ठ के आश्रम में गये। उस समय ब्रह्मर्षि वसिष्ठजी महाराज अपने ब्रह्मचारियों को समझा रहे थेः “जिसने तन से अगर तप नहीं किया तो उसे भोग भी नहीं मिल सकता, मोक्ष की तो बात ही क्या है ? भोग के लिए भी तप चाहिए और मोक्ष के लिए भी तप चाहिए। इसलिए इस तन से तप करना चाहिए।

किशोर रघु के मन में प्रश्न उठा किः ‘संन्यासी और योगी भोग सुख का त्याग करके तप करते हैं सुख के लिए तप नहीं करते। गुरुवर कहते हैं कि भोग के लिए भी तप करना चाहिए ?’ किशोर रघु ने विनयपूर्वक प्रश्न कियाः “गुरुदेव ! सुख भोग के लिए भी तप करना चाहिए, यह मुझे समझ में नहीं आ रही है। बताने की कृपा करें।

गुरुदेवः “शरीर तभी भोग को भोग सकेगा, जब स्वस्थ होगा और स्वस्थ तभी रहेगा जब परिश्रम करेगा। तैयार सुविधाएँ मिलें और पका हुआ भोजन मिले तो वह कितने दिन भोग सकेगा ?”

एक होता है यत्नतः तप करना जो तपस्वी के लिए है, संन्यासी के लिए है, योगी के लिए है दूसरा है सहज तप। जो ईश्वर के रास्ते जाते हैं उन्हें यत्नतः तप नहीं करना है वरन् ईश्वर के रास्ते आने वाली कठिनाइयों को हँसते-हँसते सह लें, जो भी कष्ट और मुसीबतें आयें उऩ्हें हँसते-हँसते गुजरने दें और अपने मन को ईश्वर के जप ध्यान में लगाये रखें, आसक्तिरहित कर्म में लगाये रखें, उनका वही तप हो जाता है।

तपस्वी प्रयत्नपूर्वक तप करता है तो तप में कर्त्तापन रहता है लेकिन जो स्वाभाविक सुख-दुःख आते हैं उनमें सम बुद्धि रखता है, उसे कर्त्तापन का बोझ नहीं लगता। कभी बीमार हो जाओ तो ऐसा नहीं होना चाहिए किः ‘हाय  मैं बीमार हूँ, दुःखी हूँ, ठीक हो जाऊँ।’ ऐसा करने से शायद तुम ठीक तो हो जाओ, दुःख तो मिटेगा लेकिन वह तप नहीं होगा। इसकी जगह बिमारी में भी चिन्तन करें कि- ‘मैं बीमार नहीं हूँ, यह शरीर का तप हो रहा है… मेरे कर्म कट रहे हैं…’ इस भावना से बिमारी के कष्ट को सहते हुए उसे निवृत्त करने का यत्न करें। इससे कर्म भी कटेंगे, तपस्या भी होगी और आरोग्यता भी प्राप्त हो जायेगी। आपका मन जैसा दृढ़ संकल्प करता है, उसी प्रकार की आपको मदद मिलती है।

जब आसक्ति होगी तो स्वार्थयुक्त कर्म करने में रूचि होगी लेकिन कर्म निःस्वार्थ हों, परहित के हों, शास्त्र-संत अनुमोदित हों-इस प्रकार की समझ होगी तो श्रीकृष्ण कहते हैं- ‘आसक्तिरहित कर्म करने वाला संन्यासी है, योगी है।’

एक आदमी ने सोचा किः ‘500 रूपये दान करने हैं।’ वह किसी महाराज के पास गया और बोलाः “महाराज ! ये 500 रूपये ले लीजिये।”

महाराजः “हम त्यागी हैं रूपयों को स्पर्श नहीं करते।”

व्यक्तिः “आप नहीं छूते लेकिन मुझे तो दान करना है।”

महाराजः “किसी और को दे दो।”

वह आदमी गया सिनेमा थियेटर की ओर 100 टिकटें सिनेमा की लेकर बाँट दीं। क्या यह दान हुआ ? यह तो लोगों की और भी खाना खराबी हुई। लोगों के तन-मन की हानि का कार्य हुआ।

दूसरे का दुःख निवृत्त हो, दूसरे का अज्ञान निवृत्त हो इस प्रकार का दान करना योग्य है। जिसका पेट पहले से ही भरा है, उसको रोटी का दान करना व्यर्थ है। अगर दान करना है तो भूखे को रोटी का दान करना चाहिए। प्यासे को पानी पिलाना चाहिए। राह भूले हुए को पानी की आवश्यकता नहीं है, उसे रास्ता दिखाना ही आपका कर्तव्य है।

भूखे को भोजन कराना एवं प्यासे को  पानी पिलाना सत्कर्म है लेकिन अशांत के लिए भोजन-पानी की आवश्यकता नहीं, अशांत के लिए तो शांति के वचन चाहिए। ऐसे ही अभक्त को भक्ति मिले, अज्ञानी को ज्ञान मिले, निगुरा सगुरा हो जाये और सगुरा साक्षात्कार की तरफ चले, ऐसा प्रयास योग्य कर्म है।

ये योग्यकर्म भी आसक्तिरहित होकर करें। ऐसों के लिए श्रीकृष्ण कहते हैं- “जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है।”

अतः आप अपने जीवन में जहाँ भी हों, व्यवहार में संन्यास और योग को प्रविष्ट करें। भीतर पावन रस का झरना खोलें। सदैव याद रखें-संसार में आसक्ति करने और पच मरने के लिए आपका जन्म नहीं हुआ है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2001, पृष्ठ संख्या 10-13, अंक 103

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