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निःस्पृहता का प्रभाव


संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।

निःस्पृह सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा।।

‘अत्यंत वश में किया हुआ चित्त जिस काल में परमात्मा में ही भलीभाँति स्थित हो जाता है, उस काल में संपूर्ण भोगों से स्पृहारहित पुरुष योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है।’ (गीताः 6.18)

जिस काल में तुम्हारे चित्त में कोई कामना नहीं रहती, कोई इच्छा नहीं रहती, कोई आकर्षण-विकर्षण नहीं रहता, उस काल में तुम्हारा चित्त अलौकिक योगामृत का पान करता है। वह योगामृत ऐसा है कि जिसके आगे पृथ्वी के भोग तो क्या, स्वर्ग का अमृत भी तुच्छ हो जाता है।

कर्मनिष्ठ व्यक्ति खूब पुण्यकर्म करता है और मरने के बाद स्वर्ग के अमृत को पाता है, तपस्वी तप करता है बदले में ऐश्वर्य पाता है, लेकिन जो भगवान का प्यारा है उसका चित्त भगवान में लीन हो जाता है और वह भगवदस्वरूप हो जाता है।

चित्त एक अजीब नट है। वह जिस समय जिसका अनुकरण करता है, तब वही हो जाता है। यदि चित्त नश्वर का अनुकरण करता है तो नाश को प्राप्त होता है और यदि  शाश्वत की ओर, परमात्मा की ओर जाता है तो परमात्मा में लीन हो जाता है।

जैसे, भगवान शंकर ने भस्मासुर को वरदान दे दिया किः ‘तू जिसके सिर पर हाथ रखेगा वह वहीं भस्म हो जायेगा।’ भस्मासुर वरदान पाकर शिवजी को ही भस्म करने के लिए दौड़ा। भस्मासुर के चित्त में भगवान शिव को ही भस्म करके पार्वती को अपना बनाने की वासना थी। अतः मलिन वासना के कारण वह शिवजी के पीछे भागा जा रहा था। आगे शिव, पीछे भस्मासुर।

शिवजी ने मन ही मन भगवान विष्णु के स्वरूप का स्मरण किया। भगवान विष्णु मार्ग में एक अत्यन्त सुन्दरी का रूप लेकर खड़े हो गये। मोहिनी रूपधारी भगवान विष्णु को देखकर भस्मासुर मोहित हो गया एवं उनसे विवाह की याचना करने लगा।

भस्मासुर को अपने जाल में फँसा देखकर मोहिनी ने कहाः “मैं आपसे विवाह करने को तैयार हूँ परन्तु मेरी एक शर्त है। जो व्यक्ति मुझसे विवाह करना चाहता हो उसे मेरे साथ नृत्य करना होगा, मेरी नृत्यकला के अनुसार उसे भी नृत्य करना पड़ेगा।”

भस्मासुर ने स्वीकृति दे दी और मोहिनी के साथ भस्मासुर ने नृत्य करना आरम्भ कर दिया। नृत्य करते-करते मोहिनी रूपधारी भगवान विष्णु ने अपने मस्तक पर हाथ रखा। भस्मासुर ने भी जैसे ही अपना हाथ अपने मस्तक पर रखा, क्षणभर में ही वह वहीं भस्म हो गया।

ऐसे ही तुम्हारे चित्त को धर्म में, कर्म में, यज्ञ में, दान में, पुण्य में, इधर-उधर घुमाकर जब परमात्मा में लीन किया जाता है, तुम्हारी वासनाएँ भस्म हो जाती हैं, तुम्हारी ममता नष्ट हो जाती है, तुम्हारा अहँकार नष्ट हो जाता है। फिर तुम योगयुक्त हो ही जाते हो।

इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हैः

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।

निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्याच्यते तदा।।

स्पृहा और कामना तब तक रहती है जब ‘तुम’ रहते हो अर्थात् अहं रहता है। जब ‘तुम’ नष्ट हो गये तो स्पृहा कौन करेगा ? कामना कौन करेगा ? काम-क्रोध लोभ क्यों सताते हैं ? क्योंकि ‘तुम’ बने हो। जब तक ‘तुम’ बने रहोगे तब तक काम-क्रोध-लोभ-मोह भी रहेंगे। जब तक तुम रहोगे तब तक दुःख, अशांति और चिंता भी रहेगी। वास्तव में काम-क्रोध-लोभ-मोह या दुःख-अशांति-चिंता-भय आदि न शरीर में है और न आत्मा में, वे तो हैं तुम्हारे में, यानी अहं में। जब ‘मैं’ यानी परिच्छिन्न ‘अहं’ ही नष्ट हो गया तो ये सब कैसे रह सकते हैं ?

सच पूछो तो तुम्हारा होना ही ईश्वर से दूर होना है। तुम मिट गये तो ईश्वर ही रह जाता है।

इसीलिए कहा गया हैः

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहिं।

प्रेम गली अति साँकरी, ता में दो न समाहिं।।

‘जब ‘मैं’ था अर्थात् ‘अहं’ था तब हरि नहीं थे। जब मैं न रहा हो केवल हरि ही रह गये। यह ईश्वरप्रेम की गली इतनी सँकरी है कि उसमें दोनों अर्थात् ईश्वर और अहं एक साथ नहीं समा सकते।’

जिसने ईश्वर तत्त्व को जान लिया, जिसका चित्त परमात्मा में लीन हो गया, जो योगयुक्त हो गया वह फिर समस्त बन्धनों से, समस्त कामनाओं से, समस्त पकड़ों से निःस्पृह हो जाता है। उससे तुम पकड़वाला, संग्रहवाला काम नहीं करवा सकते हो।

अज्ञानी को खुश करना आसान है लेकिन उसकी सेवा करना कठिन है और ज्ञानी की सेवा करना सरल है किन्तु उन्हें प्रसन्न करना कठिन है क्योंकि ज्ञानी तम-मन-धन सब छोड़कर अगम पंथ में  प्रवेश कर चुके होते हैं। कबीर जी ने कहा हैः

अगमपंथ मन थिर करे, बुद्धि करे प्रवेश।

तन मन धन सब छोड़ि के, तब पहुँचे वा देश।।

तन, मन, धन सब प्रकृति में हैं। प्रकृति के तन मन की मान्यताएँ छोड़कर जब योगी अगम देश में पहुँच जाते हैं तब वे मुक्त हो जाते हैं। ऐसे मुक्त पुरुष को कौन बाँध सकता है ? ऐसे महापुरुष को तुम किसी मान्यता में, किसी परिस्थिति में, किसी समाज में, किसी पंथ में नहीं बाँध सकते। जिनके संकल्पमात्र से प्रकृति में उथल-पुथल मच जाती है उऩ्हें प्रकृति के साधनों द्वारा बाँध पाना कदापि सँभव नहीं है।

ऐसे महापुरुष जब बोलते हैं तब उन्हें जितने लोग सुनते हैं, जिन पर उनकी नजर पड़ती है, उतने लोगों के पाप नष्ट होने लगते हैं, उतने लोगों की दृष्टि पवित्र होने लगती है, कान पवित्र होने लगते हैं। लेकिन वे ज्ञानी यदि मौन में होते हैं, एकांत में रहते हैं तो उनकी वृत्ति ब्रह्माकार होती है और ब्रह्मलोक तक के जिज्ञासु जीवों को मदद मिलती है। जैसे, हिमालय में बर्फ गिरती है तो यहाँ (अमदाबाद) में ठंडक आ जाती है, ऐसे ही जिसके चित्त में चैतन्य का प्रसाद आ गया वे यदि अपनी महिमा में मौन रहते हैं तो ब्रह्मलोक तक अपनी आत्मिक ठंडक पहुँचा सकते हैं।

मुझे ऐसे कई संतों की मित्रता मिली है जो कभी कहीं प्रवचन करने नहीं गये, किसी के घर नहीं गये। उनके चित्त को बहिर्मुख होने की रूचि बहुत कम होती है। लेकिन बाहर का समाज इनती नीचे की स्थिति में है कि वह मौन की भाषा नहीं समझ सकता, उनके पवित्र आंदोलनों को नहीं झेल पाता इसलिए वे महापुरुष बाहर आना कभी – कभी ही स्वीकारते हैं। यह जरूरी नहीं है कि मैं माइक पर प्रवचन करूँ तभी तुम्हें लाभ हो। तुम ज्यों-ज्यों ऊपर उठोगे त्यों-त्यों तुम्हें अऩुभव होगा कि गुरुमंदिर की खिड़की बंद हो, माइक भी न हो और यह शरीर भी यहाँ न हो फिर भी तुम्हें बढ़िया प्रेरणा मिल रही है। ऐसा हो सकता है।

स्थूल शरीर से जितना काम होता है, उससे ज्यादा काम सूक्ष्म शरीर से होता है और जितना सूक्ष्म शरीर से होता है उससे अनन्त गुना उस परमात्मप्रसाद से होता है।

नानक जी ने कहा हैः

एको सुमरिये नानका जो जल थल ह्यो समाय।

क्यूँ जपिये सो नानका जो उपजे फिर मर जाय।।

यह शरीर तो उपजने और मरने वाला है। स्वामी विवेकानन्द भी बार-बार कहा करते थे किः ‘जो तुम्हें दिख रहा है वह मैं नहीं हूँ। मैं वह हूँ जो कभी नष्ट नहीं होता।’ इस अविनाशी तत्त्व का
अनुभव करके व्यक्ति समस्त स्पृहाओं से रहित हो जाता है।

जिनके चित्त से स्पृहा चली जाती है उनके चित्त में नित्य नवीन आत्मरस उभरता है। जो धर्म व सात्त्विकता से प्रसन्नचित्त होता है, उसकी बुद्धि तीक्ष्ण हो जाती है। चिंतित, शोकातुर मनुष्य जो निर्णय लेगा वह अनुचित हो सकता है लेकिन सात्त्विक प्रसन्न मनुष्य जो निर्णय लेगा वह उचित होगा। इसीलिए पहले के जमाने में बड़े-बड़े राजा-महाराजा संत-महापुरुषों से सलाह लेते थे, मार्गदर्शन लेते थे फिर काम करते थे।

जीवन मात्र आनंद चाहता है। श्रुति भी कहती हैः आनंदो ब्रह्म ब्रह्मेति परमात्मा। आनंद ब्रह्म है और जो ब्रह्म को पा चुका है उसका स्वभाव आनंदित होता है, उसकी दृष्टि से, उसकी वाणी से आनंद बरसता है, उसके श्रीचरणों में बैठने से आनंद मिलता है।

इसीलिए कहा गया हैः नूरानी नजर सौं दिलबर दरवेशन मुखे निहाल करे छडयो…. अपनी नूरानी निगाहों से दरवेश ने मुझे निहाल कर दिया…

जाने अनजाने भी तुम बर्फ को स्पर्श करो तो ठंडा लगेगा, जाने अनजाने भी मिश्री शक्कर खाओ तो मीठी लगेगी। ऐसे ही सत्संग में, संतों के द्वार पर तुम कैसे भी जाओ, इच्छा से या अनिच्छा से, स्वार्थ से जाओ या जासूसी करने, लेकिन परमात्मा के प्यारों के बीच बैठोगे तो तुम्हारा मन निर्मल होने लगेगा, तुम्हारा चित्त प्रसन्न होने लगेगा, तुम्हारा हृदय आनंद से सराबोर होने लगेगा।

जेको जनम मरण ते डरे, साधजना की शरणी पड़े।

जेको अपना दुःख मिटावे, साधजना की सेवा पावे।।

जो जन्म मरण से डरता है उसे साधु पुरुषों की शरण में जाना चाहिए। जो अपना दुःख मिटाना चाहता है उसे साधु पुरुषों की सेवा करनी चाहिए। साधु पुरुषों की सेवा क्या है ? सेवा यही है कि वे जो कहते हैं वह करो और साधु पुरुष यही कहते हैं कि तुम ईश्वर चिन्तन करो, राग-द्वेष से ऊपर उठो, अपने आत्मस्वरूप में डूबो।

एक व्यक्ति ने मुझसे पूछाः “स्वामी जी ! अमकु जगह पर मिल खरीदना है। आपकी आज्ञा हो तो खरीद लूँ।”

मैंने कहाः “नहीं।”

वह व्यक्ति दो चार महीने के बाद आया और बोलाः “स्वामी जी ! जिस मिल के लिए आपने मना किया था वह मिल यदि हम लेते तो बेहाल हो जाते। उसमें तो बड़ी झंझटें हैं और वहाँ अब पुलिस का पहरा है।”

मैंने कहाः “उधर से (भीतर से) ‘ना’ का जवाब आया तो मैंने ‘ना’ कह दिया था।”

फिर वह बोलाः “स्वामी जी ! अमुक जगह पर प्लाट है। खरीद लूँ ?” मैंने उसी वक्त ‘हाँ’ कह दिया।

थोड़े दिन के बाद उसने आकर बतायाः “स्वामी जी ! जितने में लिया था उससे आठ गुनी कीमत में गया।”

मैंने कहाः “उसने हाँ कहलवा दिया तो ‘हाँ’ में भी अच्छा हुआ और ‘ना’ कहलवा दिया तो ‘ना’ में भी अच्छा हुआ।”

जिनको चित्त का प्रसाद मिल गया है उनको भीतर से जो प्रेरणा फुरती है, वह सही हो जाती है। मैं कोई टोने-टोटके नहीं जानता हूँ अथवा ध्यान करके नहीं देखता हूँ कि ऐसा होने वाला है कि नहीं। जिसका चित्त निर्मल होता है उसको भीतर से ठीक प्रेरणा मिलती है।

जो व्यक्ति जितनी गहराई में जाता है उसमें उतनी ज्यादा नम्रता, सरलता, निःस्पृहता होती है और चित्त पर  निःस्पृहता का बड़ा प्रभाव पड़ता है। निःस्पृहता का, सच्चाई का, प्रेम का अपना प्रभाव है। भले, थोड़ी देर के लिए अहंकारी स्वीकार नहीं करेगा, बल्कि विरोध करेगा लेकिन बाद में तो उसको भी स्वीकार करना पड़ता है।

अहंकार को जब छूट मिलती है तब अन्याय कर लेता है लेकिन अहंकार के ऊपर यदि महा अहंकार की लगाम है तो अहंकार भी कुछ-कुछ स्वीकार करता है।

अहंकार की अपनी सीमा होती है, व्यवहार की अपनी सीमा होती है। अहंकार, व्यवहार-यह सब चित्त में है, मन में है, अंतःकरण में है और मन की अपनी सीमा होती है, अंतःकरण की अपनी सीमा होती है।

कोई वकील है तो डॉक्टर नहीं है, कोई डॉक्टर है तो वकील नहीं है। कोई-कोई वकील और डॉक्टर दोनों हैं तो इंजीनियर नहीं है लेकिन उस एक चैतन्य की सत्ता से ही सब हो रहा है। व्यापारी का विषय इंजीनियर का नहीं है, इंजीनियर का विषय मजदूर का नहीं है। इंजीनियर मजदूरी नहीं कर सकता है लेकिन वह चैतन्य दोनों कर सकता है।  उसी एक चैतन्य आत्मस्वरूप में जो डूबता है, वह सब जान लेता है। इसीलिए संतों के द्वारा जो भी होता है वह सब यज्ञ ही यज्ञ है, सब मंगल ही मंगल है। संत वाणी कहती हैः

ब्रह्मज्ञानी ते कछु बुरा न भया।

स्रोतः ऋषि प्रसाद,  जून 2001, पृष्ठ संख्या 5-8, अंक 102

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आठ प्रकार के पुष्प


एक बार राजा अम्बरीष ने देवर्षि नारद से पूछाः “भगवान की पूजा के लिए भगवान को कौन से पुष्प पसंद हैं ?”

नारदजीः “राजन् ! भगवान को आठ प्रकार के पुष्प पसंद हैं। उन आठ प्रकार के पुष्पों से जो भगवान की पूजा करता है, भगवान उसके हृदय में प्रकट हो जाते हैं। उसकी बुद्धि भगवद्ज्ञान में गोता लगाकर ऋतंभरा प्रज्ञा हो जाती है। उसके 21 कुल तर जाते हैं।”

अम्बरीषः “महात्मन् ! देर न करें। कृपा करके जल्दी बताइये कि वे कौन से पुष्प हैं जिनसे भगवान प्रसन्न होते हैं। मैं वे पुष्प बगीचे से मँगवाऊँ और अगर बगीचे में नहीं होंगे तो उनके पौधे मँगवाकर उन्हें अपने बगीचे में लगवाऊँ। भगवान जिन पुष्पों से प्रसन्न होते हैं, मैं वे पुष्प जरूर लगवाऊँगा एवं प्रतिदिन उऩ्हीं पुष्पों से भगवान की पूजा करूँगा।”

नारदजी मंद-मंद मुस्कराये एवं बोलेः “अम्बरीष ! वे पुष्प किसी माली के बगीचे में नहीं होते।  वे पुष्प तो तुम्हारे दिलरूपी बगीचे में ही हो सकते हैं।”

अम्बरीष! “महाराज ! अगर मेरे दिल में वे पुष्प हो सकते हैं तो मैं वहाँ जरूर बोऊँगा और वे ही पुष्प भगवान को चढ़ाऊँगा। देवर्षि ! जल्दी कहिये कि जिन पुष्पों से श्रीहरि संतुष्ट होते हैं और पूजा करने वाले को भगवन्मय बना देते हैं वे कौन से पुष्प हैं ? देवर्षि ! अब मेरी जिज्ञासा बहुत बढ़ गयी है। कृपा करके अब बता दीजिये।”

राजा अम्बरीष यह कह टकटकी लगाये देवर्षि की ओर देखने लगे। मानों, उनके कानों में भी आँखों की जिज्ञासा जाग गयी और आँखों में भी कानों का जिज्ञासा जाग गयी !

तब नारद जी ने कहाः “पुण्यात्मा अम्बरीष ! भगवान इन आठ पुष्पों से पूजा करने पर प्रगट हो जाते हैं तथा भक्त को अपने से मिला देते हैं। जैसे तरंग को पानी अपने में मिला दे, घटाकाश को महाकाश अपने में मिला दे वैसे ही जीव को ब्रह्म अपने में मिला देता है। फिर वह बाहर से भले राजा ही दिखे लेकिन भीतर से परमात्मा के साथ एक हो जाता है। ऐसे वे आठ पुष्प हैं।”

राजा अम्बरीष का धैर्य टूटा। वे बोलेः “देवर्षि ! देर न कीजिये, अब बता दीजिये।”

नारदजीः “वे आठ पुष्प इस प्रकार हैं-

इन्द्रियनिग्रहः इधर उधर फालतू जगह पर देखने, सूँघने, सोचने, भटकने की आदत को रोकना। इसको कहते हैं इन्द्रियनिग्रहरूपी पुष्प।

अहिंसाः मन  वचन कर्म से किसी को दुःख न देना।

निर्दोष प्राणियों पर दयाः मूक एवं निर्दोष प्राणियों को न सताना। दोषी को अगर दण्ड भी देना हो तो उसके हित की भावना से देना।

क्षमारूपी पुष्प।

मनोनिग्रहः मन को एक जगह पर लगाने का अभ्यास करना, एकाग्र करना।

ध्यानः भगवान का ध्यान करना।

सत्य का पालन करना।

श्रद्धाः भगवान और भगवान को पाये हुए महापुरुषों में दृढ़ श्रद्धा रखना।

इन आठ पुष्पों से भगवान तुरंत प्रसन्न होते हैं एवं वे साधक को सिद्ध बना देते हैं।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2001, पृष्ठ संख्या 18,19 अंक 102

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उचित और सुख को एक कर दें


संत श्री आशारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

ज्यों-ज्यों भगवद् ज्ञान और भगवद् सुख मिलता है त्यों-त्यों संसार से वैराग्य होता है और ज्यों-ज्यों संसार से वैराग्य होता है त्यों-त्यों भगवदरज्ञान और भगवदसुख में स्थिति होती है।

एक होता है उचित, दूसरा होता है सुख। उचित और सुख को एक कर दो तो जीवन परम सुख परमात्मा से सराबोर हो जायेगा और आप जीवन्मुक्त हो जायेंगे।

उचित और सुख को जब अलग कर देते हैं तो जीवन विक्षिप्त हो जाता है, दुःखी हो जाता है, अनुचित हो जाता है। जैसे संयम करना, ब्रह्मचर्य पालना उचित है लेकिन देखा किसी युवती को, उसके हाव-भाव को अथवा युवती ने देखा युवक को, उसके हाव-भाव को किः ‘बड़ा अच्छा लड़का है, सुदृढ़ है, मेरी तरफ देखता भी है….’ तो यह उचित नहीं है। अनुचित करने में सुख की लालच हो जाती है। जब सुख की लालच को महत्त्व देते हैं तो अनुचित करने लगते हैं और अनुचित का फल भी अनुचित होता है।

सत्य बोलना उचित है, धोखा करना अऩुचित है लेकिन देखते हैं किः ‘झूठ बोलने से लाभ हो रहा है…. धोखा करने से इतना मिल रहा है….’ तो उचित को छोड़ देते हैं और अनुचित करने लगते हैं। फिर अनुचित का परिणाम भी देर-सवेर अनुचित ही आयेगा।

नौकरी करते थे एक सज्जन। रिश्वत का पैसा उचित नहीं है-ऐसा सोचकर नहीं लिया। दूसरे ऑफिसरों की नजरों में वे मूर्ख साबित हो रहे थे। लेकिन उनका विचार उचित था तो निर्भीकता थी और मितव्ययी बनकर जीते थे।

फिर अनुचित करने वालों के सम्पर्क में आये और थोड़ा सा ले लिया…. अनुचित हो गया। अनुचित ढंग से आया वह दस साल रहा फिर ऐसे गया जैसे रूई के गोदाम में आग लगी हो। सब धन चला गया। कोर्ट खा गया, कुछ इधर उधर हो गया। अनुचित करने का फल उन्हें भोगना पड़ा।

अतः सुख और उचित-इन दोनों को अलग न किया जाये। जो उचित है वही सुखस्वरूप है, भले अभी वह दुःखरूप दिखता हो। जो उचित है वही सत्य है। सत्य ही उचित है, असत्य उचित नहीं है। जो सत्य है वह शाश्वत है। जो सत्य है वह चेतन है। जो सत्य है वह आनन्दस्वरूप है।

आप होशियार बनो। अपना ज्ञान बढ़ाओ। अपना ज्ञान….. नश्वर का ज्ञान नहीं। ‘मैं कौन हूँ ? जीव किसको बोलते हैं ? ईश्वर किसको बोलते हैं ? माया किसको बोलते हैं ?’ इसी प्रकार अपना ज्ञान बढ़ाओ, दूसरों का ज्ञान  बढ़ाओ।

सत्+चित्+आनंद = सच्चिदानंद परमेश्वर की शरण जायें। शरीर की शरण न जायें। अनुचित की शरण न जायें। उचित की शरण जायें।

जब उचित और सुख एक होता है तो आपके कदम ठीक जगह पर पड़ते हैं, ठीक निर्णय होते हैं, ठीक प्रयत्न होते हैं, ठीक परिणाम आते हैं। यदि दैवयोग से, प्रारब्ध से, वातावरण से, राजनीति से कहीं आपका शोषण अथवा अन्याय होता है फिर भी आप उचित ढंग से सह लेते हैं तो भीतर से आप बलवान रहेंगे।

अनुचित ढंग से राजनीति से, इधर से, उधर से कहीं पोषण भी होता हो, थोड़ा सुख भी मिलता हो लेकिन अंदर से आप खोखले हो जायेंगे। बिल्कुल पक्की बात है।

उचित और सुख का पार्थक्य कर देंगे तो उचित छोड़ देंगे और अनुचित करके सुखी होने की बेवकूफी करेंगे। अनुचित ढंग से खाकर मजा लिया फिर बीमार हुए। अनुचित ढंग से व्यवहार किया, उस समय मजा आया लेकिन बाद में भुगतना पड़ता है।

कहावत है न, दूध का दूध और पानी का पानी।

आज उचित का महत्त्व नहीं रहा…. धर्म का, शास्त्र का, नियम का, सदाचार का, दूसरे की भलाई का महत्त्व नहीं रहा। अपने को मजा आ जाये, अपनी भलाई हो जाये…… फिर अनुचित ढंग से हो जाये तो हो जाये।

ऐसा करने लगे हैं तो सभी दुःखी हैं। दुःख बढ़ गया है। सेठ भी दुःखी है तो नौकर भी दुःखी है। माई भी दुःखी है, भाई भी दुःखी है। पठित भी दुःखी है, अनपढ़ भई दुःखी है। अधिकारी भी दुःखी है, कर्मचारी भी दुःखी है।

अनुचित करके सुखी होने की गलती मिटाने को कटिबद्ध हो जायें। इसमें सहायता मिलती है भगवन्नाम से, शास्त्र-पठन से, अपने जीवन में कुछ व्रत-नियम के पालन से। अपने जीवन में कोई न कोई बढ़िया व्रत-नियम ले लें। व्रत –नियम को ध्यान के समय भी दुहरायें। इससे उस व्रत-नियम का पालन करने में मदद मिलती है।

जो उचित नहीं है वह भविष्य में सुखकारक नहीं है, भले अभी लगे। अतः उचित करेंगे। संयम उचित है, विकार अनुचित है। मौन उचित है, अति बोलना अनुचित है। नियम से खाना-पीना उचित है, अनियमित रूप से खाना-पीना अनुचित है। गृहस्थी है तो संयम से संसार-व्यवहार करना उचित है लेकिन अमावस्या, पूनम, एकादशी, जन्मदिवस अथवा महीने में एक से अधिक बार पति-पत्नी का व्यवहार अनुचित है। आज से अनुचित बंद। ऐसे ही प्रदोष काल में भोजन और मैथुन अनुचित है तो बंद।

जप करना, ध्यान करना, दान करना, पुण्य करना, सत्संग करना, स्वाध्याय करना, सेवा करना, नम्र बनना, आप अमानी रहना दूसरों को मान देना, अभय रहना, सत्त्वसंशुद्धि रखना, अहिंसक रहना, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य का पालन करना यह उचित है। उचित का वरण…. इससे सुख की, सफलता की प्राप्ति होगी और मुक्ति की यात्रा अवश्य पूर्ण होगी।

रहते हैं मंदिर में, मस्जिद में, चर्च में, लेकिन अनुचित करेंगे तो चर्च क्या करें ? मस्जिद क्या करे ? मंदिर क्या करे ? रहते हैं मंदिर-मस्जिद में और उचित करते हैं तो मंदिर-मस्जिद का विशेष लाभ मिलेगा। जरा-जरा बात में झूठ बोलेंगे, आलसी बन जायेंगे, चोरी करेंगे तो फिर अनुचित करने पर उचित जगह का लाभ विशेष नहीं मिलता। इसलिए अनुचित न करें। अगर हो गया है तो व्यक्त करके दुबारा न करने का दृढ़ संकल्प कर लें। जो अनुचित करके भी सुखी होना चाहते हैं वे ज्यादा बीमार होते हैं, ज्यादा दुःखी होते हैं। इसलिए उचित और सुख को अलग न करें। जो उचित है, वही सुखकर है। अतः सदैव उचित का ही वरण करें और अनुचित का त्याग करें।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2001, पृष्ठ संख्या 4-6, अंक 101

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