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स्वप्न को स्वप्न जान लो


संत श्री आसाराम बापू जी के सत्संग-प्रवचन से

मानव का यह सहज स्वभाव है कि वह सदैव जाग्रत अवस्था का ही ख्याल करता है, जाग्रत को ही सुधारना चाहता है, जाग्रत में ही सुखी होना चाहता है। स्वप्न एवं सुषुप्ति का वह जरा भी ख्याल नहीं करता जबकि केवल जाग्रत अवस्था ही उसकी नहीं है, स्वप्न एवं सुषुप्ति अवस्था भी उसी की है।

जैसे, आप जाग्रत अवस्था में सोचते हो कि ʹयह मकान किसका है ? दुकान किसकी है ? उसने क्या किया ? उसने क्या कहा ?ʹ आदि आदि, वैसे ही स्वप्न के बारे में भी सोचना शुरु कर दो कि ʹयह स्वप्न कैसे आता है ?ʹ हाँ… इसके लिए थोड़े अभ्यास की जरूरत है। यदि केवल तीन महीने तक आप दिन में सौ-सौ बार सोचो किः ʹजो कुछ किया, सब स्वप्न है… जो कुछ बोला, सब स्वप्न है….ʹ तो जब आप स्वप्न देखोगे तब भी लगेगा की ʹयह स्वप्न है…ʹ और आप स्वप्न से जाग जाओगे। स्वप्न को स्वप्न जान लिया तो यह जाग्रत भी वास्तव में तो है स्वप्न ही, फिर इसे भी स्वप्न मानना आसान हो जायेगा।

अभ्यास की बड़ी बलिहारी है !

आप जैसा-जैसा अभ्यास करते हो, वैसा-वैसा ही सब भासता है। आत्मदेव का चमत्कार है ही ऐसा कि जैसा-जैसा आप सोचते हो, वैसा-वैसा आपको भासता है। मित्र में मित्र की भावना दृढ़ होती है तभी वह मित्र दिखता है, हालाँकि वह किसी का शत्रु भी हो सकता है। वास्तव में, न वह शत्रु है, न मित्र किन्तु आप में उसके प्रति मित्र की भावना है तो आपके लिए वह मित्र है और किसी में उसके प्रति शत्रु की भावना है तो उसके लिए वह शत्रु है। है तो वह एक ही, किन्तु दृष्टिभेद के कारण आप सबको अलग-अलग भासता है।

पाँच भूतों की नजर से देखा जाये तो यह मानव शरीर इन्हीं तत्त्वों से बना एक पुतलामात्र है, किन्तु ज्ञानदृष्टि से देखा जाये तो वह अठखेलियाँ करता हुआ ब्रह्म ही है। कौन शत्रु और कौन मित्र ? कौन अपना और कौन पराया ? सब उसी आत्मदेव का खिलवाड़मात्र है। यह ऊँचे-में-ऊँची अवस्था है।

इस अवस्था को पाने के दो तरीके हैं- एक तो यह कि जो कुछ देखो तो सोचोः ʹसब परमात्मा ही है….. सब एक ही है… सब एक ही है….ʹ इसको दोहराते जाओ। दूसरा तरीका है किः ʹसब मैं ही हूँ…. सब मैं ही हूँ….ʹ इसे दोहराते जाओ। दोनों ही तरीकों का अभ्यास करने से चित शांत होता जायेगा। अथवा तो ʹसब स्वप्न है…. सब स्वप्न है….ʹ ऐसा भी सतत् चिंतन कर सकते हो।

चाहे जो भी तरीका अपनाओ वह होना चाहिए भीतर से, केवल वाचिक नहीं। ऐसा नहीं कि रोज माला लेकर घुमाने बैठ गेय कि ʹसब स्वप्न है… सब स्वप्न है…ʹ दिन में दस बार या सौ बार ऐसा जप कर दिया। नहीं नहीं, इससे काम नहीं चलेगा। चाहेत एक बार भी कहो, किन्तु उसमें आपके प्राण होने चाहिए, अपकी पूरी सहमति होनी चाहिए। केवल एक बार ही सही, परन्तु पूरी श्रद्धा से कहोगे तो बहुत लाभ होगा। यदि सतत यही चिंतन करोगे तो भी ठीक है। वास्तविकता का भी ज्ञान हो जायेगा।

यदि आप मुक्त होना चाहते हो, जगत के जंजाल से छूटना चाहते हो, बुद्ध पुरुष की अवस्था का अनुभव करना चाहते हो, जन्म-मरण के चक्कर से छूटना चाहते हो, माता के गर्भ में उल्टे लटकने से बचना चाहते हो तो आपको इसका खूब गहरा अभ्यास करना चाहिए किः ʹसब सपना है.. सब सपना है….ʹ

विवेक से देखो तो बचपन सपना हो गया, युवावस्था सपना हो गई, कल की बात भी सपना हो गई और आज की प्रवृत्ति भी थोड़ी देर के बाद सपना हो जायेगी। सब बदलता जा रहा है, सपना होता जा रहा है किन्तु इन सबको देखने वाला द्रष्टा, साक्षी, चैतन्य एक-का-एक है. वह इन बदलाहटों में भी नहीं बदलता। वही वास्तविक सत्य है। यदि इसको ठीक से पक्का कर लो तो फिर आपको क्रोध के समय इतना क्रोध नहीं होगा, उद्वेग के समय इतना उद्वेग नहीं होगा, लोभ के समय इतना लोभ नहीं होगा, मोह के समय इतना मोह नहीं होगा, अशांति के समय इतनी अशांति नहीं होगी। यदि आप ठीक से उस तत्त्व में टिक गये तो बाहर से युद्ध करते हुए भी भीतर से शांत रहोगे,  ऐसा वह परम ज्ञान है आत्म-परमात्मदेव का।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2001, पृष्ठ संख्या 3, अंक 97

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सेहत और सावधानियाँ


आयुर्वेद के तीन उपस्तम्भ हैं- आहार निद्रा और ब्रह्मचर्य।

जीवन में सुख-शांति व समृद्धि प्राप्त करने के लिए स्वस्थ शरीर की नितान्त आवश्यकता है क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन और विवेकवती कुशाग्र बुद्धि प्राप्त हो सकती है। मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए उचित निद्रा, श्रम, व्यायाम और संतुलित आहार अति आवश्यक है। पाँचों इन्द्रियों के विषयों के सेवन की गलतियों के कारण ही मनुष्य रोगी होता है। इसमें भोजन की गलतियों का सबसे अधिक महत्त्व है।

गलत विधि से गलत मात्रा में अर्थात आवश्यकता से अधिक या बहुत कम भोजन करने से, या अहितकर भोजन के सेवन से मन्दाग्नि और मन्दाग्नि से कब्ज रहने लगता है। तब आँतों में रुका हुआ मल सड़कर आम व दूषित रस बनाने लगता है। यह दूषित रस ही सारे शरीर में फैलकर विविध प्रकार के रोग उत्पन्न करता है। उपनिषदों में भी कहा गया हैः आहारशुद्धो सत्त्वशुद्धिः। शुद्ध आहार से मन शुद्ध रहता है। साधारणतः सभी व्यक्तियों के लिए आहार के कुछ नियमों को जानना अत्यन्त आवश्यक है। जैसेः

प्रातःकाल 10 से 12 और सायंकाल 6 से 8 बजे का समय भोजन के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। एक बार आहार ग्रहण करने के बाद दूसरी बार आहार ग्रहण करने के बीच कम से कम तीन घण्टों का अन्तर अवश्य होना चाहिए क्योंकि इन तीन घण्टों की अवधि में आहार की पाचन-क्रिया संपन्न होती है। यदि दूसरा आहार इसी बीच ग्रहण करें तो पूर्वकृत आहार का कच्चा रस इसके साथ मिलकर दोष उत्पन्न कर देगा।

रात्रि में आहार के पाचन में समय अधिक लगता है इसीलिये रात्रि को प्रथम प्रहर में ही भोजन कर लेना चाहिए। शीत ऋतु में रात बड़ी होने के कारण सुबह जल्दी भोजन कर लेना चाहिए और गर्मियों में दिन बड़े होने के कारण सायंकाल का भोजन जल्दी कर लेना उचित है।

अपनी प्रकृति के अनुसार यथावश्यक मात्रा में भोजन करना चाहिए। आहार की मात्रा व्यक्ति की पाचकाग्नि और शारीरिक बल के अनुसार निर्धारित होती है। स्वभाव से हल्के पदार्थ जैसे कि चावल, मूँग, दूध, अधिक मात्रा में ग्रहण करना सम्भव है परन्तु उड़द, चना तथा पिट्ठी के पदार्थ स्वभावतः भारी होते हैं, जिन्हें कम मात्रा में लेना ही उपयुक्त रहता है।

आहार ग्रहण करते समय सर्वप्रथम मधुर, बीचे में खट्टे और नमकीन तथा अन्त में तीखे, कड़वे व कसैले पदार्थों का सेवन करना उचित है।

भोजन के पहले अदरक और सेंधा नमक का सेवन  सदा हितकारी होता है। वह जठराग्नि को प्रदीप्त करता है और भोजन के प्रति रूचि पैदा करता है तथा जीभ एवं कण्ठ की शुद्धि करता है।

भोजन गर्म और स्निग्ध होना चाहिए। गरम भोजन स्वादिष्ट लगता है, पाचकाग्नि को तेज करता है और भोजन शीघ्र पच जाता है। यह वायु को निकाल देता है और कफ को सुखा देता है। स्निग्ध भोजन शरीर को मजबूत बनाता है, उसका बल बढ़ाता है और वर्ण में भी निखार लाता है।

बहुत जल्दी जल्दी अथवा बहुत देर तक, बोलते हुए अथवा हँसते हुए भोजन नहीं करना चाहिए।

भोजन के बीच-बीच में प्यास लगने पर थोड़ा-थोड़ा पानी पीना चाहिए परन्तु बाद में पीना हानिकारक है। भोजन के बाद तक्र (छाछ) का सेवन हितकर है और अनेक रोगों से बचाने वाला है।

अच्छी तरह भूख एवं प्यास लगना, शरीर में उत्साह उत्पन्न होना एवं हल्कापन महसूस होना, शुद्ध डकार आना और दस्त साफ आना-ये आहार के ठीक प्रकार से पाचन होने के लक्षण हैं।

धन्वन्तरि आरोग्य केन्द्र, साबरमती, अमदावाद।

दालचीनी

भारत में दालचीनी के वृक्ष हिमालय तथा पश्चिमी तट पर पाये जाते हैं। इस वृक्ष की छाल ʹदालचीनीʹ के नाम से प्रसिद्ध है।

यह रस में तीखी, कड़वी तथा मधुर होती है। उष्ण-तीक्ष्ण होने के कारण दीपन, पाचन और विशेष रूप से कफ का नाश करने वाली है। यह अपने मधुर रस से पित्त का शमन और उष्ण वीर्य़ होने से वात का शमन करती है। अतः त्रिदोषशामक है।

औषध-प्रयोग

मुँह के रोगः यह मुख की शुद्धि तथा उसके दुर्गन्ध का नाश करने वाली है। अजीर्ण अथवा ज्वर के कारण गला सूख गया हो तो इसका एक टुकड़ा मुँह में रखने से प्यास बुझती है तथा उत्तम स्वाद उत्पन्न होता है। इससे मसूढ़ भी मजबूत होते हैं।

दंतशूल व दंतकृमिः इसके तेल में भिगोया हुआ रुई का फाहा दाँत के मूल में रखने से दंतशूल तथा दंतकृमियों का नाश होता है। 5 भाग शहद में इसका एक भाग चूर्ण मिलाकर दाँत पर लगाने से भी दंतशूल में राहत मिलती है।

पेट के रोगः 1 चम्मच शहद के साथ इसका 1.5 ग्राम (एक चने जितनी मात्रा) चूर्ण लेने से पेट का अल्सर नष्ट हो जाता है।

दालचीनी, इलायची और तेजपत्र का समभाग मिश्रण करें। इसका 1 ग्राम चूर्ण 1 चम्मच शहद के साथ लेने से पेट के अनेक विकार जैसे मंदाग्नि, अजीर्ण, उदरशूल आदि में राहत मिलती है।

सर्दी, खाँसी, जुकामः इसका 1 ग्राम चूर्ण एवं 1 ग्राम सितोपलादि चूर्ण 1 चम्मच शहद के साथ लेने से सर्दी, खाँसी में तुरन्त राहत मिलती है।

क्षयरोग (टी.बी.)- इसका 1 ग्राम चूर्ण 1 चम्मच शहद में सेवन करने से कफ आसानी से  छँटने लगता है एवं खाँसी से राहत मिलती है। दालचीनी का यह सबसे महत्त्वपूर्ण उपयोग है।

रक्तविकार एवं हृदयरोगः दालचीनी रक्त की शुद्धि करने वाली है। इसका 1 ग्राम चूर्ण 1 ग्राम शहद में मिलाकर सेवन करने से अथवा दूध में मिलाकर पीने से रक्त में उपस्थित कोलेस्ट्रोल की अतिरिक्त मात्रा घटने लगती है। अथवा इसका आधा से एक ग्राम चूर्ण 200 मि.ली. पानी में धीमी आँच पर उबालें। 100 मि.ली. पानी शेष रहने पर उसे छानकर पी लें। इससे भी कोलेस्ट्रोल की अतिरिक्त मात्रा घटती है।

गरम प्रकृति वाले लोग पानी में दूध मिश्रित कर इसका उपयोग कर सकते हैं। इस प्रयोग से रक्त की शुद्धि होती है एवं हृदय को बल प्राप्त होता है।

सामान्य वेदनाः इसका एक चम्मच (छोटा) चूर्ण 20 ग्राम शहद एवं 40 ग्राम पानी में मिलाकर स्थानिक मालिश करने से कुछ ही मिनटों में वात के कारण होने वाले दर्द से छुटकारा मिलता है।

इसका एक ग्राम चूर्ण और दो चम्मच शहद 1 कप गुनगुने पानी में मिलाकर नित्य सुबह-शाम पीने से संधिशूल में राहत मिलती है।

वेदनायुक्त सूजन तथा सिरदर्द में इसका चूर्ण गरम पानी में मिलाकर लेप करें।

बिच्छू के दंशवाली जगह पर इसका तेल लगाने से दर्द कम होता है।

वृद्धावस्थाः बुढ़ापे में रक्तवाहिनियाँ कड़क और रूक्ष होने लगता है। एक चने जितना दालचीनी का चूर्ण शहद में मिलाकर नियमित सेवन करने से इन लक्षणों से राहत मिलती हैं। इस प्रयोग से त्वचा पर झुर्रियाँ नहीं पड़तीं, शरीर में स्फूर्ति बढ़ती है और श्रम से जल्दी थकान नहीं आती।

मोटापाः इसके 1.5 ग्राम चूर्ण का काढ़ा बना लें। उसमें 1 चम्मच शहद मिलाकर सुबह खाली पेट तथा सोने से पहले पियें। इससे मेद कम होता है।

त्वचा विकारः दालचीनी का चूर्ण और शहद समभाग कर दाद, खाज तथा खुजलीवाले स्थान पर लेप करने से कुछ ही दिनों में त्वचा के ये विकार मिट जाते हैं।

सोने से पूर्व इसका 1 चम्मच चूर्ण 3 चम्मच शहद में मिलाकर मुँह की खीलों पर अच्छी तरह से मसलें। सुबह चने का आटा अथवा उबटन लगाकर गरम पानी से चेहरा साफ कर लें। इससे खील-मुँहासे मिटते हैं।

बालों का झड़नाः दालचीनी का चूर्ण, शहद और गरम औलिव्ह तेल 1-1 चम्मच लेकर मिश्रित करें और उसे बालों की जड़ों में धीरे-धीरे मालिश करें। पाँचट मिनट के बाद सिर को पानी से धो लें। इस प्रयोग से बालों का झड़ना कम हो जाता है।

सावधानीः दालचीनी उष्ण-तीक्ष्ण तथा रक्त का उत्क्लेश करने वाली है अर्थात रक्त में पित्त की मात्रा बढ़ाने वाली। इसके अधिक सेवन से शरीर में गर्मी उत्पन्न होती है। अतः गरमी के दिनों में इसका लगातार सेवन न करें। इसके अत्यधिक उपयोग से नपुंसकता आती है।

सेवफल

सेवफल भोजन पचाता है, खुद भी जल्दी पचता है। वात-वित्त से होने वाले रोगों का भी शमन करता है। दाँत और मसूढ़ों में मजबूती लाता है। अग्नि पर सेंककर खाने से पेट के सभी रोगों का शमन करता है। भोजन बंद करके दिन में सेब ही खाना शुरु कर दें तो पेट व दाँत की बीमारियों एवं कमजोरी में लाभ होता है।

साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज उपचार केन्द्र, जहाँगीरपुरा, वरियाव रोड, सूरत।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2001, पृष्ठ संख्या 28-30, अंक 97

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साधना में सत्संग की आवश्यकता


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

जप, तप, व्रत, उपवास, ध्यान, भजन, योग आदि साधन अगर सत्संग के बिना किये जायें तो उनमें रस नहीं आता। वे तो साधनमात्र हैं। सत्संग के बिना वे व्यक्तित्व के सिंगार बन जाते हैं।

जब तक ब्रह्मवेत्ता महापुरुष का जीवंत सान्निध्य इन साधनों को सुहावना नहीं बनाता, तब तक ये साधन श्रममात्र रह जाते हैं। ये साधन सब अच्छे हैं फिर भी सत्संग के बिना रसमय नहीं बनते। सत्संग इनमें रस लाता है।

रसौ वै सः।

अनुभवनिष्ठ ब्रह्मवेत्ता महापुरुष की वाणी की शरण लिये बिना रसस्वरूप परमात्मा का बोध नहीं हो सकता। अकेले साधनभजन करने से थोड़ी बहुत सात्त्विकता आ जाती है, सच्चाई आ जाती है, थोड़ी-बहुत शक्ति आ सकती है किन्तु साथ ही साथ सात्त्विकता और सच्चाई एवं शक्ति का अहं भी उतना ही आ जाता है। साधना का अहं खड़ा हो जाता है। अहं के अनुरूप घटना घटती है तो सुख होता है और उसके प्रतिकूल घटना घटती है तो दुःख होता है। सुखी और दुःखी होने वाले हम मौजूद रहे।

सत्संग से कया होता है ? हमारा माना हुआ जो परिच्छिन्न व्यक्तित्त्व है, जीव का अहं है उसकी पोल खुल जाती है। जैसे, प्याज की पर्तें उतारते जाओ तो भीतर से कुछ ठोस प्याज जैसा निकलेगा नहीं क्योंकि उसमें केवल पर्तें ही पर्तें हैं। ऐसे ही जब तक सत्संग नहीं मिलता तब तक ʹमैंʹ का ठोस पन दिखता है। सत्संग मिलते ही ʹमैंʹ की पर्तें हटती हैं और अपने परमात्मस्वरूप के सुख-शांति-माधुर्य में जीव प्रवेश पाने लगता है। जीव मुक्ति का अनुभव कर लेता है।

एक साधु ने ʹकलिदोषनिवारकʹ ग्रंथ में पढ़ा कि साढ़े तीन करोड़ नाम जपने से सद्योमुक्ति होती है। उसने अनुष्ठान शुरु किया। साढ़े तीन करोड़ राम नाम का जप कर लिया। कुछ हुआ नहीं। दूसरी बार अनुष्ठान किया। फिर भी सद्योमुक्ति जैसा कुछ हुआ नहीं। जिन सत्पुरुष के द्वारा वह ग्रंथ लिखा गया था उनको जाकर कहाः

“महाराज ! मैं साढ़े तीन करोड़ जप दो बार किये। कुछ हुआ नहीं।”

“तीसरी बार कर।” संत ने कहा।

तीसरी बार करने पर भी सद्योमुक्ति का कोई अनुभव नहीं हुआ। उसकी श्रद्धा टूट गई। फिर किसी ब्रह्मवेत्ता के पास गया और अपना हाल बताते हुए कहाः

“स्वामी जी ! सुना था कि साढ़े तीन करोड़ मंत्रजप करने से सद्योमुक्ति होती है। मैंने एक बार नहीं, तीन बार किया। मुझे कोई अनुभव नहीं हुआ।”

“सद्योमुक्ति का मतलब क्या है ?” संतश्री ने पूछा।

“शीघ्रमुक्ति। सद्यो मोक्षप्रदायकः। तुरन्त मुक्ति हो जाती है।”

“वत्स ! तू मनमाना होकर साधन करता था इसलिए अटूट दृष्टि नहीं रही। तू अभी मुक्त है, इसी समय मुक्त है। तुझे बाँध सके ऐसी कोई भी परिस्थिति तीनों लोकों में भी नहीं है। तूने जप तो किया लेकिन सत्संग का रंग नहीं लगा। अब सत्संग में बैठकर देख। दीये में तेल तो भर दिया, बाती भी रख दी लेकिन जले हुए दीये के नजदीक नहीं गया। अब सत्संग में बैठ। शांति से ध्यानपूर्वक सुन। श्रद्धा के साथ विचार कर। तेरी सद्योमुक्ति है ही। ʹमेरी सद्योमुक्ति अब होगी….ʹ ऐसा मत मान। अभी, इसी समय, यहीं तेरी सद्योमुक्ति है। हम लोग बड़े-में-बड़ी गलती यह करते हैं कि साधनों के बल से भगवान को पाना चाहते हैं या मुक्त होना चाहते हैं। साधन करने वाले का व्यक्तित्व बना रहेगा। केवल भगवान की कृपा से भगवान को पाना चाहते हैं तो आलस्य आ जायेगा। अतः अपने पुरुषार्थ और भगवान की कृपा का समन्वय कर। ʹभगवान ऐसे हैं…. वैसे हैं… वे जैसे हैं उसी रूप में अपने आप प्रकट होंʹ ऐसी मान्यता मत रख।”

आपकी धारणा के मुताबिक भगवान प्रकट होहं ऐसा चाहोगे तो आपकी धारणा कभी कैसी होगी, कभी कैसी होगी। मुसलमान खुदा को चाहेगा तो अपनी धारणा का, अहीर भगवान को चाहेगा तो अपनी धारणा का, देवी का भक्त अपनी धारणा का चाहेगा, पटेल अपनी धारणा का भगवान चाहेगा, सिंधी अपनी धारणा का झुलेलाल चाहेगा।

आपकी धारणा के भगवान तो आपकी अन्तःकरण की वृत्ति के अनुरूप होकर दिखेंगे। आपकी वृत्ति माता के आकार की होगी तो भगवान माता के स्वरूप में दिखेंगे। आपकी वृत्ति श्री रामचन्द्र के आकार की होगी तो भगवान श्रीरामचन्द्र जी के रूप में दिखेंगे। आपकी वृत्ति झुलेलाल के रूप में दिखेंगे। ऐसे भगवान दिखेंगे और फिर अन्तर्धान हो जायेंगे।

उन महापुरुष ने साधू को कहाः “तू सत्संग में आ, तब तुझे भगवदरस की प्राप्ति होगी, अन्यथा नहीं होगी।”

यही घटना बल्ख के सम्राट इब्राहीम के साथ घटी। वह राजपाट छोड़कर भारत में आया औऱ फकीर बन गया। लकड़ियाँ बेचकर दो पैसे कमा लेता। एक पैसे से गुजारा करता, एक पैसा बच जाता। जब ज्यादा पैसे इकट्ठे हो जाते तब साधुओं को भोजन करा देता। कहाँ तो बल्ख का सम्राट और कहाँ लकड़हारा होकर परिश्रम करने वाला फकीर !

इब्राहीम के मन में आयाः “मैं दान का नहीं खाता। इतना बड़ा राज्य छोड़ा, फकीर बनने के बावजूद भी किसी के दान का नहीं खाता हूँ, अपना कमाकर खाता हूँ। ऊपर से दान भी करता हूँ। फिर भी मालिक नहीं मिल रहा है… क्या बात है ?ʹ यह प्रार्थना करने लगताः

“हे मेरे मालिक ! हे मेरे प्रभु ! हे भगवान ! हे खुदा ! हे ईश्वर ! मुझे कब मिलोगे ? मैं नहीं जानता कि आप कैसे हो। आप जैसे भी हो, मुझे सन्मार्ग दिखाओ।”

ऐसी प्रार्थना करते-करते वह ध्यानस्थ होने लगा। अंतर में प्रेरणा मिली किः ” जा हृषिकेश के आगे। वहाँ अमुक संत हैं, उनके पास जा।” बल्खनरेश वहाँ पहुँचा और बोला “बाबा जी ! मैं बल्ख का सम्राट था। राजपाट छोड़कर फकीर बना हूँ। अभी मेरा अहं नहीं छूटता। मैंने सुना है कि अहं मिटते ही मालिक मिलता है। ʹपहले मैं राजा था….ʹ ऐसा अहं था। फिर फकीर का अहं घुसा। अहं निकालने के लिए परिश्रम करके खाता हूँ, संग्रह न करके त्याग करता हूँ, बचा हुआ वित्त भंडारे में खर्च कर देता हूँ। पसीना बहाकर अपना अन्न खाता हूँ फिर भी मालिक क्यों नहीं मिलता ?”

बाबाजी ने कहाः “यह अपना खाने वालाʹ और ʹपराया खाने वालाʹ ही अड़चन है। मेरा और तेरा, अपना और पराया जो बनाता है वह अहं ही मालिक के दीदार में अड़चन है।”

सम्राट ने कहाः “महाराज ! मेरा वह अहं आप निकाल दीजिये। इतनी कृपा कीजिये।”

बाबाजी ने कहाः “हाँ, तू ठीक समझा है। अहं है तेरे पास ?”

“हाँ, अहं है। वही दुष्ट परेशान कर रहा है।”

“तो देख, कल सुबह चार बजे आ जाना। मैं तेरा अहं ले लूँगा।”

“जी, महाराज !”

वे बाबाजी अनुभवसंपन्न ब्रह्मवेत्ता महापुरुष थे। उन्होंने सिद्धि के ऊँचे शिखर सर किये थे।

इब्राहीम जाने लगा। बाबा जी ने पीछे से कहाः “देख, कल पूरा अहं लाना। कहीं आधा छोड़कर नहीं आना।”

इब्राहीम चकित रह गया ! सोचाः ʹअहं छोड़कर कहाँ आऊँगा ? वह तो पूरे का पूरा साथ में रहता है।”

दूसरे दिन सुबह चार बजे इब्राहीम पहुँच गया बाबा जी की गुफा पर। बाबाजी डण्डा लेकर आये। बड़ी बड़ी आँखे दिखाते हुए बोलेः “अहं लाया है ?”

“हाँ महाराज ! अहं है।”

“कहीं छोड़कर तो नहीं आया ?”

“ना, महाराज !”

“कहाँ है ?”

“हृदय में रहता है।”

“बैठ। निकाल उसको। मुझे दिखा। उसको ठीक कर देता हूँ। जब तक अहं को निकालकर मेरे सामने नहीं रखेगा तब तक उठने नहीं दूँगा। सिर पर डंडा दूँगा। तू सम्राट था तो उधर था। इधर अभी तेरा कोई नहीं। यहाँ बाबाओं का राज्य की सीमा में आ गया है। अहं दिये बिना गया तो….. देना है न अहं ?… तो खोज, कहाँ है अहं ?”

“कैसे खोजूँ अहं को ? वह कहाँ होता है?”

“अहं कहाँ होता है…. ऐसा करके भी खोज। जहाँ होता है वहाँ से निकाल। आज तुझे नहीं छोड़ूँगा।”

ज्यों केले के पात में, पात पात में पात।

त्यों संतन की बात में, बात बात में बात।।

कभी साधक का ताड़न करने से काम बन जाता है तो कभी पुचकार से काम हो जाता है…. कभी किसी साधन से तो कभी किसी साधन से। यह तो महापुरुष जानते हैं कि कौन से साधक की उन्नति किस प्रकार करनी चाहिए।

युक्ति से मुक्ति होती है, मजदूरी से मुक्ति नहीं होती।

इब्राहीम अहं को खोजते-खोजते अन्तर्मुख होता गया। प्रभात का समय। शुद्ध वातावरण। बाबाजी की कृपा बरसती रही। मन की भाग-दौड़ क्षीण होती गई। एकटक निहारते-निहारते आँखें बन्द हुईं। चेहरे पर अनुपम शांति छाने लगी। ललाट पर तेज उभरने लगा। डण्डे वाले बाबा जी तो गुफा के भीतर चले गये थे। डण्डा मारना तो था नहीं। जो कुछ भीतर से करना था वह कर दिया। इब्राहीम की सुरता की गति अन्तर्मुख बना दी।

इब्राहीम को अहं खोजते-खोजते साढ़े चार बजे…. पाँच बजे…. छः बज गये। बैठा है ध्यानस्थ। बाहर का कोई पता नहीं। श्वासोच्छवास की गति मंद होती चली जा रही है।

सूर्योदय हुआ। सूर्य का प्रकाश पहाड़ियों पर फैल रहा है। अपनी आत्मा का प्रकाश इब्राहीम के चेहरे पर दिव्य तेज ले आया है। बाबाजी देखकर प्रसन्न हो रहे हैं कि साधक ठीक जा रहा है।

घण्टों के बाद बाबाजी इब्राहीम के पास गये।

“उठो उठो अब।”

इब्राहीम ने आँखें खोलीं और चरणों में गिर पड़ा।

“अहं दे दो।”

“गुरु महाराज!”

इब्राहीम के हृदय में भाव उमड़ रहा है लेकिन वाणी उठती नहीं। भाव-विभोर होकर गुरु महाराज को निहार रहा है। विचार स्फुरता नहीं। आखिर बाबाजी ने उसकी बहिर्गति कराई। फिर बोलेः

“लाओ, कहाँ है अहं ?”

“महाराज ! अहं जैसी कोई चीज है ही नहीं। बस, वही वह है। वाणी वहाँ जाती नहीं। यह तो अध्यारोप करके बोल रहा हूँ।”

बाबाजी ने इब्राहीम को गले लगा लिया।

“इब्राहीम ! तू गैर नहीं। तू इब्राहीम नहीं। तू मैं है…. मैं तू हूँ।”

जब तक अहं को नहीं खोजा था तब तक अहं परेशान कर रहा था। अहं को खोजा तो उसका वास्तव में अस्तित्व ही नहीं रहता। आँख कोई चीज देखती है और हम उससे जुड़ जाते हैं- “मैंने देखा।”

मनः वृत्ति शरीर की तरफ बहती है तो अहं बना देती है और अपने मूल की तरफ जाती है तो मन रहता ही नहीं। जैसे, तरंग उछलती है तो अलग बनी रहती है और पानी को खोजती है तो शांत होकर दरियामय हो जाती है, उसका अलग अस्तित्व मिट जाता है। ऐसे ही ʹमैं… मैं… मैं…. मैं… परेशान करता है। वह ʹमैंʹ अगर अपने मूल को खोजता है तो उसका परिच्छिन्न अहं मिलता ही नहीं।

तीन प्रकार का अहं होता हैः स्थूल अहं, सूक्ष्म अहं एवं वास्तविक अहं। स्थूल अहं सदगुरु की शरण से विलीन होता है। सूक्ष्म अहं वेदान्त के प्रतिपादित साधन की तरकीब से बाधित होता है। वास्तविक अहं ब्रह्म है, परम सुखस्वरूप है। उसी में अनन्त अनन्त ब्रह्माण्ड फुरफुराकर लीन हो रहे हैं।

हमारा जो वास्तविक ʹमैंʹ है उसमें अनन्त-अनन्त सृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं, स्थित रहती हैं और लीन हो जाती हैं। फिर भी हमारा बाल तक बाँका नहीं होता। हमारा वास्तविक अहं वह है ! अपनी वास्तविकता का बोध नहीं है तो वहाँ की एक तरंग, एक धारा, एक वृत्ति को ʹमैंʹ मानकर उसी में उलझ रहे हैं। उलझते-उलझते सदियाँ बीत गयीं लेकिन विश्रांति नहीं मिली।

बिना सत्संग के साधन-भजन भीतर के व्यक्तित्व को सजाये रखता है। अहं बोलता हैः ʹपहले मैं संसारी था, अब मैं साधक हूँ। पहले मैं भोगी था, अब मैं त्यागी हूँ। पहले बहुत बोलने वाला था, अब मौनी हूँ। पहले स्त्री-पुत्र-परिवार के चक्कर में था, अब अकेला शांत हूँ। कमरा बन्द कर देता हूँ। बस, मौज है। न किसी से लेना न किसी को देना।ʹ

खतरा पैदा करोगे। जो कमरे में अकेला नहीं बैठते, एकान्त में नहीं रहते उनकी अपेक्षा आप ठीक हो लेकिन जब कमरा न होगा, एकान्त न होगा तब परेशानी चालू हो जायेगी। ….और मौत आपको कमरे से भी तो पकड़कर ले जायेगी।

जीते-जी मौत के सिर पर पैर रखने की कला आ जाना, इसी का नाम आत्मसाक्षात्कार है। आत्मसाक्षात्कार होने से राग-द्वेष और अभिनिवेश का आत्यंतिक अभाव हो जाता है। किसी भी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति से लगाव नहीं, घृणा नहीं, द्वेष नहीं। अभिनिवेश यानी मृत्यु का भय, जीने की आस्था। आत्म-साक्षात्कार हो जाता है तो जीने की आकांक्षा हट जाती है। जीने की आकांक्षा हटी तो मरने का भय कहाँ ? जिसको अपने आपका बोध  हो जाता है वह जान लेता है किः ʹमेरी मौत तो कभी होती नहीं। एक शरीर तो क्या, हजारों शरीर लीन हो जायें, पैदा हो जायें, ब्रह्माण्डों में उथल-पुथल हो जाये फिर भी मुझ चिदाकाशस्वरूप को कोई आँच नहीं आतीʹ ऐसा अपने असली ʹमैंʹ का साक्षात्कार हो जाता है।

देह छतां जेनी दशा, वर्ते देहातीत।

ते ज्ञानीना चरणमां, हो वन्दन अगणीत।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2001, पृष्ठ संख्या 16-19, अंक 97

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