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सब दोषों का मूलः प्रज्ञापराध


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

प्रज्ञापराधो मूलं सर्वदोषाणाम्…

सभी दोषों का मूल है प्रज्ञा का अपराध। इस संसार में जितने भी दुःख हैं वे सब बेवकूफी के कारण ही उत्पन्न होते हैं। जहाँ बेवकूफी है वहाँ दुःख है। जहाँ समझ है वहाँ सुख है।

जहाँ सुमति तहँ संपति नाना।

जहाँ कुमति तहँ दु-ख निधाना।।

जितने भी दुःख हैं वे सब बुद्धि की मंदता से आते हैं। बुद्धि की मंदता के कारण ही राग-द्वेष होता है। बुद्धि की मंदता के कारण ही लोग सम्पूर्ण जीवन ʹमेरे-तेरेʹ में गँवाकर अंत में निराश होकर मर जाते हैं।

एक बहुत बड़े विद्वान पण्डित थे। उनके नाम से सब पण्डित घबराते थे। कोई भी उनके साथ शास्त्रार्थ करने को तैयार नहीं होता था।

एक दिन जब सूर्य ढल गया और संध्या का समय हुआ तो वे पण्डित महाशय दही खाने लगे। उसी समय उनकी पहचान वाले एक दूसरे पण्डित मित्र वहाँ पहुँच गये। संध्या के समय उन्हें दही खाते देखकर पण्डित मित्र ने कहाः

“यह क्या कर रहे हो ?”

विद्वान पण्डितः ʹʹदही खा रहा हूँ।”

“संध्या के समय दही खा रहे हो ! क्या तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी है ?”

“मेरी बुद्धि इतनी तीक्ष्ण है कि लोग मुझसे बात करने में भी घबराते हैं। मेरे साथ शास्त्रार्थ करने के लिए कोई नहीं आता। अतः मैं अपनी बुद्धि की तीव्रता को कम करने के लिए दही खा रहा हूँ।”

उनकी बात सुनकर मित्र हँसने लगा और बोलाः “बुद्धि को कम करने के लिए दही खा रहे हो ? तुम्हें दही खाने की आवश्यकता नहीं है, तुम तो ऐसे ही मूर्ख हो। संध्या के समय संध्या करनी चाहिए, प्राणायाम-जप-ध्यानादि करना चाहिए यह तुम्हें मालूम है, फिर भी अपनी बुद्धि का दिवाला निकाल रहे हो। तुमसे बड़ा मूर्ख और कौन होगा ?”

यह है प्रज्ञा का अपराध। बुद्धि की कमी के कारण ही व्यक्ति सब करा कराया चौपट कर देता है। मानव के पास बुद्धि तो है किन्तु वह उसका सही उपयोग नहीं करता इसी कारण आये दिन झगड़े-फसाद होते रहते हैं। जरा-जरा सी बात में हम इतने भड़क जाते हैं कि मार पीट क नौबत आ जाती है।

जहाँ राग होता है वहाँ दूसरे की कोई गलती नहीं दिखती और जहाँ द्वेष होता है वहाँ दूसरे का सदगुण नहीं दिखाई देता। दूसरों को समझकर कार्य नहीं करते तो उनकी अच्छाई भी हमें बुराई ही दिखती है। ये राग-द्वेष भी होते हैं प्रज्ञा की कमी से….. प्रज्ञा के दोष के कारण ही हमें दूसरों की कंकड़ समान कमियाँ भी पहाड़ जैसी लगती हैं और अपनी पहाड़ जैसी कमियाँ भी कंकड़ जैसी लगती है। अपनी कमी का पता चलने पर भी उन्हें निकालने के लिए उतने सजाग या उतने दृढ़ प्रयत्नशील नहीं रहते और अपने इस मिथ्या शरीर की प्रशंसा एवं वाहवाही सुनकर खुश होते हैं और खोये रहते हैं।

अरे ! वाहवाही से तो कुत्ता भी खुश हो जाता है, पुचकारने पर पूँछ हिलाता है और डण्डा दिखाने पर पूँछ दबा लेता है। फिर आप खुश या नाराज हो गये तो क्या बड़ी बात है ?

प्रज्ञा के अपराध के कारण ही हम कुछ न जानते हुए भी अपने-आपको सर्वश्रेष्ठ समझने लगते हैं।

यह मूर्खता नहीं तो और क्या है ?

मनुष्य की प्रज्ञा का यह दोष दूर होता है बुद्धि का आदर करने से। बुद्धि का जितना आदर करोगे उतनी वह विकसित होगी। ….और बुद्धि की पराकाष्ठा है  ब्रह्मज्ञान। बुद्धि के विकास के लिए आत्मज्ञान से बढ़कर कोई उपाय नहीं है।

यदि सब दुःखों से सदा के लिए छूटना है तो आत्मज्ञान पा लो।

कभी न छूटे पिण्ड दुःखों से, जिसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं।

जब तक ब्रह्म का ज्ञान नहीं होगा, तब तक दुःखों से पिण्ड नहीं छूट सकता। फिर चाहे आप स्वयं प्रधानमंत्री ही क्यों न बन जायें। सुविधाएँ मिल जायेंगी लेकिन सब दुःखों का अंत न हो सकेगा। समस्त दुःखों का अंत तो तभी होगा जब ब्रह्म का ज्ञान पाओगे, अपने आत्मस्वरूप को पहचानोगे।

रामकृष्ण परमहंस का एक शिष्य था जो कुछ बनना चाहता था। श्रीरामकृष्ण उसको बोलते थेः

“तू चाहे डॉक्टर बन, चाहे इन्जीनियर बन, चाहे वकील बन लेकिन पहले अपने आपको जान ले। मूल को जान ले फिर चाहे किसी भी शाखा को पकड़ना। एक बार अपने आत्मदेव को पा ले फिर जो पाना चाहो पा लेना।”

ईश्वर को पाने के लिए संसार को छोड़ना पड़े तो छोड़ देना लेकिन संसार को पाने के लिए ईश्वर का त्याग कदापि न करना।

आज कल के माता-पिता भी बच्चों से डॉक्टर, इंजीनियर, वकील आदि बनने की आशा तो रखते हैं लेकिन कोई भी माता-पिता यह नहीं कहते कि ʹबेटा ! तू एक बार ब्रह्मवेत्ता होकर दिखा दे।ʹ जो माता पिता ऐसा बोलें वे माता-पिता नहीं वरन् उनके रूप में साक्षात् सदगुरु ही हैं।

ऐसी महिमा है आत्मज्ञान की ! जिसने अपने आत्मस्वरूप को पाया है समझो, उसने सब कुछ पा लिया और जिसने अपने आत्मस्वरूप को नहीं पाया उसने कुछ नहीं पाया। आत्मज्ञान-प्राप्त महापुरुष की प्रज्ञा परमात्मा में प्रतिष्ठित हो जाती है…. तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता। …..और जिसकी प्रज्ञा परमात्मा में प्रतिष्ठित हो चुकी है उसके सब दोष अपने-आप निवृत्त हो जाते हैं।

दुनिया में जो कुछ दुःख हैं वे प्रज्ञा के दोष से हैं। बुद्धि की जितनी मन्दता, दुःख उतने ज्यादा। बुद्धि जितनी हीन, दुःख उतने ज्यादा। बुद्धि जितनी शुद्ध, दुःख उतने कम। बुद्धि अगर पूर्ण शुद्ध हो गई तो बड़ा अनुपम लाभ होगा।

बुद्धिगत ज्ञान का आदर करने से व्यर्थ का आकर्षण, व्यर्थ की चेष्टा, व्यर्थ के भोग और व्यर्थ का संग्रह, व्यर्थ का शोषण और व्यर्थ का पुचकार सारा का सारा खत्म होता चला जायेगा। विकल्प कम होने से आपका मन निःसंकल्प होगा। मन निःसंकल्प होने लगेगा तो सामर्थ्य बढ़ने लगेगा। मन को ज्यादा काम नहीं तो बुद्धि को ज्यादा परेशानी नहीं। बुद्धि जहाँ से स्फुरित होती है उस वास्तविक ज्ञान में बुद्धि ठहरने की अधिकारिणी हो जायेगी।

भगवान श्रीकृष्ण गीता में ʹसांख्ययोगʹ नामक दूसरे अध्याय में कहते हैं-

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।

नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।57।।

ʹजो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है उसकी बुद्धि स्थिर है।ʹ (57)

यदा संहरते चायं कूर्मोङ्गानीव सर्वशः।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।58।।

ʹ…..और कछुआ सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है।ʹ (ऐसा समझऩा चाहिए।)(58)

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।

वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।61।।

ʹइसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहितचित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे, क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है।ʹ (61)

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।68।।

ʹइसलिए हे महाबाहो ! जिस परुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों से सब प्रकार निग्रह की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है।ʹ(68)

इन्द्रियगत ज्ञान अति तुच्छ है। जो लोग इन्द्रियगत ज्ञान को सर्वस्व मानते हैं उन लोगों के जीवन में बस, भोग…. भोग…. भोग…। पाश्चात्य जगत के लोग परलोक को नहीं मानते, श्राद्ध आदि को नहीं मानते। वे लोग इन्द्रियगत ज्ञान को ही सर्वस्व मानते हैं। इस शरीर को खूब खिलाओ-पिलाओ और भोग भोगो। इन्द्रियगत ज्ञान का आदर है इसलिए इन्द्रियों को खूब भोग चाहिए। इन्द्रियाँ चंचल हैं इसलिए भोग भी बदलते रहते हैं।

पाश्चात्य जगत की क्या परिस्थिति है ? बड़ी दयनीय स्थिति है उन लोगों की। वे लोग समय-समय पर फैशन बदलते हैं, कपड़े बदलते हैं, फर्नीचर बदलते हैं, घर बदलते हैं, कार बदलते हैं और यहाँ तक कि पत्नी भी बदलते हैं।

कहीं-कहीं तो ऐसी जगहें हैं जहाँ लोग अपनी-अपनी पत्नी ले जाते हैं। सब लोग नाचते हैं, झूमते हैं, दारू पीते हैं और पत्नियाँ बदल कर उपभोग करते हैं। फिर भी बेचारों को सुख नहीं है… दिनों दिन अशान्ति के, बरबादी के रास्ते चले जा रहे हैं।

पत्नी बदलो, परिवार बदलो, घर बदलो, गाड़ी बदलो, कपड़े बदलो, यह बदलो, वह बदलो फिर भी शांति नहीं। जब अमेरिका में 25 करोड़ की जनसंख्या थी तब वहाँ 20-25 हजार लोग हर साल आत्महत्या करते थे और अब 27 करोड़ 3 लाख से अधिक की आबादी हो गई है तो फिर क्या हाल होगा ? हालाँकि वहाँ की आर्थिक स्थिति बड़ी अच्छी है, खाने-पीने की प्रचुर चीजें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, उनमें कोई मिलावट नहीं है, लोग खूब काम करते हैं… अपनी डयूटी बजाते हैं लेकिन मशीन की तरह काम किये जा रहे हैं। भोग में अपने को गिराये जा रहे हैं।

भारत का अभी भी सौभाग्य है कि हजारों की संख्या में आप लोग आत्मशांति की जगह पर बैठ सकते हो।

भारत के युवक जब विदेशों में जाते हैं तब वहाँ उनका ब्रेनवाश अर्थात् बलात मतपरिवर्तन या मतारोपण किया जाता है कि जिस भूमि में वे पैदा हुए, जो ऋषियों की भूमि है, भगवान ने भी कई अवतार जिस भूमि पर लिये हैं, कई संत-महात्मा, ब्रह्मवेत्ता सत्पुरुष जिस भूमि पर अवतरित होते रहते हैं ऐसी अपनी मातृभूमि भारत के लिए उनमें घृणा और नफरत पैदा हो जाती है।

स्वामी रामतीर्थ के कथनानुसार और रशिया के कई विद्वानों के लेखों के अनुसार ईसा मसीह सत्रह साल भारत में रहे थे। उन्होंने कश्मीर के योगियों से योग सीखा। बाद में वहाँ जाकर चमके थे। ऐसी दिव्य भारत भूमि के लिए ही वे युवक बोलने लगते हैं- ʹIndia is nothing. India is very poor. भारत कुछ नहीं है। भारत बहुत गरीब है।ʹ

मैं अमेरिका गया था तो वहाँ के लोगों ने पूछाः “आप आध्यात्मिकता की बात करते हैं… तो भारत में आध्यात्मिकता है फिर भी भारत इतना गरीब क्यों है ?”

मैंने कहाः “हमारा भारत गरीब क्यों है यह आपको बता दूँगा लेकिन पहले आप यह बताओ कि आपके पास सब कुछ भौतिक सुविधाएँ होने के बावजूद दिल की दरिद्रता क्यों नहीं मिटती ? पति कमाता है, पत्नी कमाती है, बच्चे कमाते हैं फिर भी जैसे बूढ़े पशुओं को गोशाला में भेज देते हैं, ऐसे ही आप अपने माँ-बाप को नर्सिंग होम (सरकारी अनाथाश्रम) में क्यों भेज देते हो ? दिल के इतने दरिद्र क्यों हो ?

अब मैं यह बताता हूँ कि भारत दरिद्र क्यों हुआ। वह जमाना था कि भारत के लोग सोने के बर्तनों में भोजन करते थे। युधिष्ठिर महाराज ने यज्ञ किया था तब प्रतिदिन एक लाख लोगों को भोजन कराते थे। दस हजार साधू-ब्राह्मणों को सुवर्णपात्रों में भोजन परोसा जाता था। उन्हें हाथ जोड़कर विनती करते थे किः ʹभोजनोपरान्त कृप्या सुवर्णपात्र को स्वीकार करके अपने घर ले जाइये।ʹ कुछ लोग ये बर्तन ले जाते और कुछ लोग ऐसे भी थे जो कहतेः ʹहम ये सोने के ठीकरे सँभालेंगे कि अपने आत्मधन का ख्याल करेंगे ?ʹ सोने के बर्तन वहीं छोड़कर वे चले जाते थे। ऐसा हमारा भारत था !

हमारे भारत के एक साधू स्वामी रामतीर्थ अमेरिका पहुँचे तो वहाँ का राष्ट्रपति मि. रूजवेल्ट उनका दर्शन करके बोलता हैः “आज मेरा जीवन धन्य हुआ। अब तक तो ईसा मसीह के बारे में केवल सुना था। आज जिन्दा ईसा मुझे इन साधू में दिखाई दे रहा है।ʹ

भारत में ऐसे मोती पकते हैं। भारत आध्यात्मिक औऱ भौतिक दोनों संपत्तियों से समृद्ध था। फेरी-वाले पुकार लगाते थे) ʹदेना चाहो तो सोने-चाँदी के टूटे-फूटे बर्तन….ʹ

जमाना बदला। विदेशी लुटेरों ने देश पर आक्रमण किया। भारतीयों में संकीर्णता और दुर्बलता घुस गई। ʹसबमें भगवान हैं…ʹ की भावना से सब विदेशियों को आत्मसात कर लिया लेकिन लुटेरों ने भारत का सब माल हड़प कर लिया। फिर अफगानिस्तान आये, हूण आये, शक आये, ग्रीक (यूनानी) आये, फिरंगी (अंग्रेज) आये। सदियो तक भारत पराधीन बना रहा। शोषकों ने भारत की आर्थिक स्थिति सब गड़बड़ कर दी। शोषक लोग बढ़ गये, कंस और रावणों का प्रभाव बढ़ गया। समाज का खून चूसने वाले दुष्टों का बोलबाला होने लगा। लोगों में सावधानी नहीं रही। उन्होंने अपनी बलवान संकल्प-शक्ति खो दी। वे अपनी हिम्मत और प्राणशक्ति को भूलते गये। आध्यात्मिकता का, वेदान्त का, उपनिषदों का अमृतोपदेश गिरि-गुफाओं तक ही सीमित होने लगा। लोग हिम्मत, साहस, प्रसन्नता और सतर्कता भूलते गये। भय, लाचारी, खुशामदखोरी, पलायनवाद….ʹ अपना क्या ? करेगा सो भरेगा….ʹ इस प्रकार की धारणा से समाज पिछड़ गया। इसका फायदा शोषकों ने लिया।

…..ओर इस समय भारत में अमेरिका की अपेक्षा भूमि कम है, अमेरिका की अपेक्षा तीसरा हिस्सा भी नही है और जनसंख्या तीन गुनी से भी अधिक है। इस प्रकार देखा जाये तो अमेरिका में भारत की अपेक्षा करीब साढ़े नौ गुनी अधिक भौतिक सुविधाएँ हैं। फिर भी हमें रंज नहीं है।

आपके यहाँ भले ही इतनी सुविधाएँ हों लेकिन भारत आध्यात्मिक सपूतों के प्रसाद से प्रेम और सहनशक्ति, सहानुभूति और स्नेह, सदभाव और सामाजिक जीवन में आपसे अभी भी कहीं ऊँचा है। भले ही सिनेमा और टी.वी के माध्यम से पाश्चात्य जगत की गन्दगी भारत में आ रही है फिर भी आध्यात्मिक सुवास, हृदय की शांति कोई लेना चाहे तो, मिलेगी तो भारत से ही मिलेगी, आपके यहाँ मिलनी मुश्किल है।”

हे भारतवासियों ! आत्मशांति, आत्मनिर्भरता, आत्मसंयम और सदाचार बढ़ाकर अपना आत्म-साक्षात्कार…. अपना जन्मसिद्ध अधिकार पा लो। कब तक विलासियों का अनुकरण करते-करते अपने को अशांति और उद्वेग में खपाते रहोगे ?

उठो… जागो… कमर कसो। सनातन धर्म के सर्वोपरि सिद्धान्तों को अमल में लाओ और यहीं, इसी जन्म में आत्मा-परमात्मा का अनुभव, अपनी अमरता का अनुभव कर लो।

हे परमेश्वर के अति निकटवर्ती मानव ! बहकावे में आकर विलासिता में फिसलने से अपने को बचा।

मानव ! तुझे नहीं याद क्या ? तू ब्रह्म का ही अंश है।

कुल गोत्र तेरा ब्रह्म है, तू ब्रह्म का ही वंश है।।

हे स्थितप्रज्ञ ! हे ऋषियों की संतान ! अपनी प्रज्ञा को ऊँची उठाओ… ब्रह्म में स्थिर करो। यही तुम्हारा वास्तव में मुख्य कर्तव्य है। फिर पूरा संसार तुम्हें खिलौन लगेगा।

ૐ….ૐ….ૐ…जागो….जागो…

ऐसे पुरुषों को खोज लो जो तुम्हारी प्रज्ञा को परमात्मा में प्रतिष्ठित कराने की क्षमता रखते हों।

उत्तिष्ठित….जाग्रत…. प्राप्य वरान्निबोधत।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2000, पृष्ठ संख्या 9-13, अंक 89

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वाणी ऐसी बोलिये….


 

संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

परद्रव्येष्वभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम्।

वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम्।।

पारूषष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चापि सर्वशः।

असंबद्ध प्रलापश्च वाङमयं साच्चतुर्विधम्।।

अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः।

परदारोपसेवा च शारीरं त्रिविधं स्मृतम्।।

(मनुस्मृतिः 12.5,6,7)

मनुस्मृति में मनु महाराज कहते हैं कि मानव को सदैव दस दोषों से बचना चाहिए। दस दोषों में तीन मन के, तीन तन के एवं चार वाणी के दोषों का उल्लेख किया गया है।

मन के तीन दोषः पराये धन का चिन्तन, दूसरे की हानि करने का चिंतन, मन की मान्यता को महत्ता देना।

तन के तीन दोषः लोभकृतः धन हड़पना, क्रोधकृतः हिंसा करना, कामकृतः परस्त्रीगमन।

वाणी के चार दोषः कटु भाषण, असंबद्ध प्रलाप, झूठ बोलना, पैशुन्य यानी चुगली करना।

साँप का दंश तो एक बार मारता है किन्तु वाणी का दंश तो मरने के बाद भी एक-दूसरे का वैर ले लेता है। पिछले जन्म का शत्रु इस जन्म में किसी भी रूप में वैर ले ही लेता है। इसलिए बोलने में हमेशा सावधानी बरतनी चाहिए। चार बातों का आदर करने से दुश्मन भी मित्र हो जाते हैं-

घर में कलह के समय क्रोध करने वाले पर क्रोध न करें, वरन् चुप्पी साध लें।

किसी का अपमान न करें। यदि किसी की निंदा हुई हो तो उसकी गैरहाजिरी में उसकी प्रशंसा कर दें।

जो कुटुम्बी आपसे नहीं बोलता हो, उससे प्रयत्नपूर्वक बोलें।

बोलने से पहले हृदय को मधुरता से भर दें।

ये चार बातें जिसके जीवन में हैं उसके शत्रु भी मित्र बन जाते हैं और जो जरा-जरा बात में क्रोध करता है, जरा-जरा बात में रूठ जाता है, वाद-विवाद करता है एवं तिरस्कार करता है उसके मित्र भी शत्रु बन जाते हैं।

इसलिए इस बात का खूब ख्याल रखना चाहिए कि कब बोलना, कितना बोलना, कैसे बोलना और कहाँ बोलना।

बोलने की जगह पर बोलो, चुप रहने की जगह पर चुप रहो, कम बोलने की जगह पर कम बोलो, सुनने की जगह पर सुनो और सुनाने की जगह पर सुनाओ।

जो सुनने की जगह पर सुनता है उसकी अक्ल का दीदार होता है। जो मौन की जगह पर बोलता है उसकी बेवकूफी का प्रदर्शन होता है और जो बोलने की जगह पर चुप हो जाता है वह मार खाता है। ऐसे मूर्ख लोग फिर ʹराम-रामʹ कहें चाहे ब्रह्मज्ञान सुनें, उन्हें कोई विशेष फायदा नहीं होता।

बहुत बोलने से, संसार की बातें बोलने से मौन रहना अच्छा है। यदि बोलना ही हो तो सत्य बोलें, एवं धर्मानुकूल बोलें। बोलते-बोलते सामने वाले में परमात्मप्रीति जगाना, सामने वाले को ब्रह्मविद्या में जगाने के लिए बोलना यह तो सर्वश्रेष्ठ है।

शुकदेवजी महाराज मुनि थे, एकांत में मौन रहते थे लेकिन वे जब बोले तब तमाम श्रोताओं सहित परीक्षित श्रीमद् भागवत रस में सराबोर हो गये, भगवद्-ज्ञान में जाग गये। अष्टावक्रजी महाराज बोले तो ʹअष्टावक्र संहिताʹ बन गयी। श्रीकृष्ण जी बोले तो ʹश्रीमद् भगवद् गीता बन गयी। बोले तो ऐसा बोलें कि जिससे बोला जाता है, उसकी खबर मिल जाये।

दत्तात्रेय जी महाराज अपने भक्तों से कहते हैं कि जिसकी वाणी में कोई सारगर्भित बात नहीं है अथवा किसी को आश्वासन देने की बात नहीं है, प्रेम नहीं है, आदर नहीं है, मधुरता नहीं है बल्कि कर्कश वाणी है वह तो मानों, बोझा उठाकर घूमता है।

एक थे हसन मियाँ। उन्होंने देखा कि उनका पड़ोसी शहद बेचक बड़ा पैसे वाला हो गया है। अतः उन्होंने अपनी बीवी को कहाः “मैं भी अब शहद बेचने का धंधा करूँगा।”

बीबी ने कहाः “शहद का धंधा बाद में करना। पहले शहद जैसा बोलना, मधुर बोलना तो सीख लें ! नहीं तो गड़बड़ हो जायेगी।”

हसन मियाँ बोलेः “अरे ! तू मुझे क्या समझाती है ?”

इस प्रकार बीवी को डाँट-फटकार कर निकल पड़ा शहद बेचने। पड़ोसी शहद बेचने जाये उसके पहले ही उठकर शहद बेचने चला जाता। वह ʹशहद लो शहद….ʹ की आवाज तो लगाता लेकिन कर्कश वाणी के कारण कोई उससे शहद लेने को तैयार न होता। यदि कोई उससे शहद लेने के लिए मटका उतरवाता भी तो चखकर मुँह मोड़ लेता। जब घूम-घामकर वह घर लौटा तो उसकी बीबी ने पूछाः

“क्यों मियाँ ! शहद कितना बिका ?”

हसन मियाँ- “ग्राहक नालायक हैं, बेवकूफ हैं। पहले मटका उतरवाकर शहद चख लेते हैं फिर नहीं लेते।”

बीबी समझदार थीष उसने कहाः “गुस्ताखी माफ हो, बड़े मियाँ ! जो खुशमिजाज हैं, प्रसन्नता एवं मधुरता से बोलते हैं उनकी मिर्च भी बिक जाती है लेकिन बदमिजाज एवं कटु वाणी वालों से लोग शहद भी नहीं लेते हैं।”

कबीर जी ने ठीक ही कहा हैः

वाणी ऐसी बोलिये, जो मनवाँ शीतल होये।

औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होये।।

किसी को और कुछ न दे सकें तो कम-से-कम दो मधुर शब्द से, आत्मभाव से सामने वाले का सत्कार कर दें। इससे उसको भी प्रसन्नता होगी एवं आपका अंतःकरण भी शुद्ध होगा।

यह समझ लें कि मीठी और हितभरी वाणी दूसरों को आनंद, शांति एवं प्रेम का दान करती है और स्वयं आनंद, शांति एवं प्रेम को खींच लाती है। मधुर एवं हितकर वाणी से सदगुणों का पोषण होता है, मन को पवित्र शक्ति प्राप्त होती है एवं बुद्धि निर्मल बनती है। ऐसी वाणी में भगवान का आशीर्वाद उतरता है और इससे अपना, दूसरों का, सबका कल्याण होता है। इससे सत्य की रक्षा होती है और इसी में सत्य की शोभा है।

मुख से ऐसा कटु शब्द कभी मत निकालें जो किसी का दिल दुखावे और अहित करे। कभी असत्य मत बोलें, किसी की चुगली न करें और असंबद्ध प्रलाप न करें। असंबद्ध प्रलाप अर्थात् समय परिस्थिति के विपरीत बातें न करें। जैसे, किसी की मृत्यु का अवसर हो और वहाँ करने लगे किसी की शादी की बात। ऐसा नहीं होना चाहिए। सही बात भी असामयिक होने से प्रिय नहीं लगती।

नीकी पै फीकी लगे, बिन अवसर की बात।

जैसे बीरन में युद्ध में, रस सिंगार न सुहात।।

बातें करते समय दूसरों को मान देना और आप अमानी रहना यह सफलता की कुंजी है। जो बात-बात में दूसरों को उद्विग्न करता है, वह पापियों के लोक में जाता है।

मुँह से बात बाहर निकालने से पहले ही उसके परिणाम की कल्पना कर लें ताकि बाद में पछताना न पड़े।

बोली एक अमोल है, जो कोई बोले जानि।

हिये तराजू तौलि के, फिर मुख बाहर आनि।।

हुक्म चलाते हो ऐसा बोलना, आवश्यकतानुसार बोलना, चिल्लाते हुए बोलना, अश्लील शब्द बोलना और कटु बोलना ये चार संभाषण के दोष हैं।

हितकर बोलना, आवश्यकतानुसार बोलना, मधुर बोलना, प्रिय बोलना एवं सत्य बोलना ये वाणी के गुण हैं।

जैसे रूखा भोजन मनुष्य को तृप्ति प्रदान नहीं कर सकता, वैसे ही मधुर वचनों के बिना दिया हुआ दान भी प्रसन्नता नहीं उपजाता।

लोगों से मिलते वक्त जो स्वयं बात आरम्भ करता है और सबके साथ प्रसन्नता से बोलता है, उस पर सब प्रसन्न रहते हैं।

आवश्यकता पड़ने पर किसी को दण्ड देते समय भी सांत्वनापूर्ण वचन ही बोलना चाहिए। इस प्रकार आप अपना प्रयोजन तो सिद्ध कर ही लेते हैं और कोई मनुष्य उद्विग्न भी नहीं होता।

यदि सुन्दर रीति से, सांत्वनापूर्ण, मधुर एवं स्नेहयुक्त वचन सदैव बोले जायें तो इसके जैसा वशीकरण का साधन संसार में कोई नहीं है। परन्तु यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि अपने द्वारा किसी का शोषण न हो। मधुर वाणी उसी की सार्थक होती है जो प्राणिमात्र का हितचिंतक होता है। गरीब, अनपढ़, अबोध लोगों की नासमझी का गैरफायदा उठाकर उनका शोषण करने वाले शुरुआत में तो सफल दिखते हैं किन्तु ऐसे लोगों का अंत अत्यन्त खराब होता है। सच्चाई, स्नेह और मधुर व्यवहार करने वाला कुछ गँवा रहा है, ऐसा किसी को बाहर से शुरुआत में लग सकता है किन्तु उसका अंत अनंत ब्रह्माण्डनायक ईश्वर की प्राप्ति में परिणत होता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2000, पृष्ठ संख्या 4-6, अंक 89

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ज्ञान की सात भूमिकाएँ


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

दो प्रकार के संस्कारी मनुष्य होते हैं- धार्मिक और जिज्ञासु।

यह बात उन मनुष्यों की नहीं है जो केवल खाने पीने और संतति को जन्म देने में ही अपना जीवन पूरा कर देते हैं। ऐसे लोगों को तो मनुष्य रूप में पशु ही कहा गया है। मनुष्यरूपेण मृगाश्चरंति। यह संसारी मानवों की बात है।

जिन्हें धार्मिक संस्कार मिलते हैं, वे आगे चलकर जिज्ञासु हो सकते हैं। धार्मिक व्यक्ति पहले तो धर्म के कार्य करता है। स्वर्गादि पाने के लिए वह तप, दान, यज्ञ आदि करता है। आगे चलकर उसे महसूस होता है कि स्वर्ग भी तो आसक्ति पैदा करेगा और न जाने कितने जन्मों में भटकायेगा। ऐसा विचार करके धार्मिक व्यक्ति जिज्ञासु बन जाता है। जिज्ञासु को ऐसे विचार आते हैं- ʹमैं ऐसी वस्तु पा लूँ कि दुबारा दुःखद गर्भवास में न पडूँ।ʹ भोग-प्रलोभनों में फँसने वालों से बड़ी ऊँची समझ का धनी होता है जिज्ञासु। वह ज्ञान की प्रथम भूमिका ʹशुभेच्छाʹ में प्रवेश पा लेता है।

शुभेच्छाः भोगेच्छाओं, वासनाओं को मिटाने की, जन्म-मरण से छूटने की जो आकांक्षा है, वह ʹशुभेच्छाʹ है। इस भूमिकावाला जिज्ञासु अहंकार पोसने के लिए कर्म नहीं करता। वह व्यवहार में कुशल एवं मितभाषी होता है। प्रशंसा उसे आतिशबाजी के अनार जैसी लगती है। वह मित्रों आदि के बीच भले रहे, पर भीतर से उदासीन रहता है। उसे सब फीका फीका लगने लगता है। वह सत्शास्त्रों एवं संतों की संगति की इच्छा करता है।

कबीर, नानक, श्रीरामकृष्ण परमहंस, वर्धमान महावीर… शुरुआत में सबकी प्रथम भूमिका आती है। वर्धमान की माँ जब गुजर गयीं तो वर्धमान बोलः “मैं जाता हूँ घर से।”

पिता ने कहाः “अभी तो मैं शोक से भी नहीं उबरा हूँ और तुझे जाना है ?”

पिता की यह बात सुनकर वर्धमान रूक गये। कुछ समय के पश्चात पिता भी चल बसे। वर्धमान ने पुनः कहाः “मैं जाता हूँ।”

बड़े भाई ने कहाः “पहले माँ चली गयीं, अभी पिता चल दिये। जब तक मैं जीवित हूँ, तब तक तुम जाने की बात मत करना।”

भाई की यह बात सुनकर वर्धमान ने फिर छोड़कर जाने का नाम तो नहीं लिया, किन्तु वे ऐसे ढंग से जीवन जीवने लगे कि नहीं के बराबर। अंततः उनके भाई ने कह दिया किः “घर में रहो अथवा जाओ। तुम्हें घर से कोई मतलब नहीं। तुम जा सकते हो।” इस प्रकार उनके भाई ने उऩ्हें जाने की सम्मति दे दी।

पहली भूमिका प्राप्त होने पर आदमी लाख काम छोड़कर भी ईश्वर की ओर चलेगा। यदि पहली भूमिका नहीं प्राप्त हुई तो ईश्वर को छोड़कर लाख काम करेगा। पहली भूमिकावाले की आगे की यात्रा यदि न हो और वह मर जाये तो स्वर्ग का सुख तो उसे सहज में ही मिल जाता है। प्रलोभन देने वालों के चक्कर में वह नहीं फँसता। इतना ही नहीं, स्वर्गिक सुख में भी उसकी रुचि नहीं होती । अतः किसी श्रेष्ठ कुल में उसका जन्म होता है।

शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोभिजायते।

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।।

ʹ…..योगभ्रष्ट पुरुष शुद्ध आचरण वाले श्रीमान् पुरुषों के घर में जन्म लेता है अथवा ज्ञानवान योगियों के कुल में जन्म लेता है….ʹ (गीताः 6.41,42)

साधु-संतों के प्रति उसके हृदय में आदरभाव तो रहेगा लेकिन कोई ढोंगी साधु उसको ठग नहीं सकेगा।

मैं नौ साल का था। साधु संतों में मेरी रुचि थी। एक दिन एक बाबा घूमता-घामता आया और उसने कई चमत्कार दिखाये। डंडे को पकड़कर दबाया तो पानी की धार निकल पड़ी। मेरे कुटुंबियों ने तो ʹजय गंगे माताʹ कहकर चरणामृत भी लिया, किन्तु मुझे हुआ कि सूखे डंडे से पानी कैसे ? यदि वह डंडे में से गंगा प्रगट कर सकता है तो इसको कपड़े-आटे की चिन्ता कैसी ? मैं छोटा था, इसलिए मेरी कोई गिनती ही नहीं थी, जिससे खूब बारीकी से जाँच करने में मैं सफल हो गया। मैंने ठीक से देखा  तो पता चला कि उसने जल से भीगी हुई रूई को डंडे की पोल में छुपाकर रखा था। उसे दबाने पर वह गंगा होकर बहता था।

उसने ऐसा करके कइयों को उल्लू बनाया होगा किन्तु मेरे ऊपर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा जबकि मैं उस समय मात्र 9 वर्ष का ही था। बड़ा होने पर मुझे भाई ने, साले-सालियों ने, कुटुंबियों ने, कइयों ने रोका किन्तु मैं सदगुरु के पास पहुँचे बिना नहीं रहा। यह आसुमल की प्रशंसा नहीं कर रहा हूँ। अपितु ज्ञान की भूमिका का प्रभाव बता रहा हूँ। प्रथम भूमिका वाले को अध्यात्म-पथ पर आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता।

शुभेच्छावाले जिज्ञासु को किसके आगे बैठना, कैसे बोलना, कैसे चलना आदि सत्प्रेरणा अपने आप मिलती है। उसे अन्तःप्रेरणा होती है। उसका आचरण सुहावना होता है, दूसरों के लिए अनुकरणीय होता है। उसे भोगवासना से अरुचि पैदा होने लगती है, एकांत अच्छा लगने लगता है, जप-ध्यान में आनंद आता है। ʹभगवान क्या है ? आत्मा क्या है ? जगत में हमारा वास्तविक कर्त्तव्य क्या है ?ʹ इत्यादि की जिज्ञासाएँ उसमें उत्पन्न होती हैं।

सुविचारणाः जब शुभेच्छा बढ़ती है तो दूसरी भूमिका ʹसुविचारणाʹ फलने लगती है। सत्शास्त्रों एवं महापुरुषों का संग करके, वैराग्य एवं अभ्यास से सदाचार में प्रवृत्त होना-इसका नाम सुविचारणा है। सुविचारणा वाला साधक देवी-देवता, मूर्तिपूजा आदि में नहीं उलझता। इस भूमिका में कर्मकाण्ड, पूजा आदि घटते जायेंगे एवं आत्मज्ञान की बातों की ओर कुदरती आकर्षण होने लगेगा। तिलक न करते हुए भी वह साधु होगा, साधु के कपड़े न होते हुए भी उसका मन साधुताई की तरफ खिंचेगा। धर्म के रहस्य को जानने में उसकी रुचि होगी।

पहले साधनाकाल में जब मैं स्वामिनारायणवालों के पास गया तो उन्होंने कहाः “तुम स्वामिनारायण वाले बनोगे, तभी भगवान मिलेंगे।ʹ जब उन्होंने यह कहा तो मैंने पूछाः “स्वामिनारायण संप्रदाय कब बना ?” उन्होंने कहाः “200 वर्ष हुए।”

मैंने पूछाः “200 वर्ष पहले इस जगत में भगवान नहीं थे क्या ?”

इसका उत्तर वे न दे सके। मुझे उनकी बातें गले नहीं उतरीं, अतः मैं वहाँ से चल दिया।

मत-पंथ और संप्रदाय की बातों में पहली-दूसरी भूमिका वाला साधक नहीं फँसता है।

जिसको धार्मिक कहलाना है, वह किसी-न-किसी पंथ-संप्रदाय का हो जायेगा। हमारी सिंधी जाति के इष्ट भगवान झूलेलाल हैं तो मैं भी झूलेलाल के पंथ में रहता, लेकिन मेरी भूमिका बन गयी तो मैं फिर उसमें न रह पाया। जो मत-पंथ-संप्रदाय में रूके हैं और अपने को उन्हीं का मानते हैं तो समझ लो कि वे यात्रा करना नहीं चाहते हैं, जबकि पहली-दूसरी भूमिका वाले साधक उसमें नहीं रुकते।

जैसे प्यासे आदमी की प्यास शर्बत या पानी की बातें करने से नहीं बुझती एवं भूखे आदमी की भूख लड्डू की बातें करने से नहीं मिटती। यहा तो उसे पानी पिलाओ, भोजन कराओ या वह स्वयं ही अन्न-जल खोज ले तभी उसकी तृषा-क्षुधा शांत हो सकती है। ऐसे ही जिसको सत्य की प्यास है, प्रभु प्राप्ति की भूख है वह मत-पंथ की बातों में नहीं आयेगा, बल्कि आगे चल पड़ेगा।

दूसरी भूमिकावाले को विचार आते रहते हैं किः ʹमेरे ऐसे दिन कब आयेंगे, जब मुझे परमात्म-शांति प्राप्त होगी ? मेरी ऐसी स्थिति कब होगी कि मैं सुख-दुःख में सम रहूँगा ?ʹ सुविचारणा में साधक को शास्त्राध्ययन की रुचि होगी।

घाटवाले बाबा के पिता तहसीलदार थे। वे काशी में रहते थे। घाटवाले बाबा 17-18 साल के हुए तो उनमें शास्त्राध्ययन की रुचि जागी। वे चल पड़े गंगा किनारे। ʹकोई संत मिलें….ʹश्री योग वाशिष्ठ महारामायणʹ जैसा ग्रंथ सुनूँ…. वेदान्त सुनूँ….ʹ इस इच्छा से उन्होंने हिमालय तक की यात्रा की किन्तु कोई संत मिले नहीं। अंत में एक गृहस्थी हरिद्वार में मिला, जो हाथ में घड़ी बाँधता, खों-खों करता एवं ʹहर की पौड़ीʹ पर पड़ा रहता था। वह हर रोज 2-3 व्यक्तियों को ʹश्रीयोगवाशिष्ठ महारामायणʹ सुनाता। घाटवाले बाबा ने भी वहाँ बैठे-बैठे ʹश्रीयोगवाशिष्ठ महारामायणʹ सुना। वे क्रमशः दूसरी से तीसरी भूमिका में आ गये, तीसरी से चौथी भूमिका में आ गये और उन्हें ज्ञान हो गया।

जिसकी दूसरी भूमिका ʹसुविचराणाʹ दृढ़ होगी, उसे एकांतवास और मौन अच्छा लगेगा, आत्मज्ञानी संतों के प्रति उसके मन में आकर्षण पैदा हो जायेगा। उसे मौन, जब, एकांत में रस आयेगा। भीड़-भड़ाके, शादी-ब्याह आदि में उसकी रुचि नहीं होगी। नदी-तालाब, गुफा-कंदरा उसे रुचेगी। आत्मज्ञान की बातें सुनने की उसे रुचि होगी। सदगुण विकसित होने लगेंगे। जैसे, कामी व्यक्ति स्त्री पर लट्टू हो जाता है, अभागों को पापकर्म रसीले लगते हैं, सेठ को व्यापार-धंधे का चिंतन चलता रहता है, वैसे ही दूसरी भूमिकावाले साधक में त्याग, वैराग्य, प्रसन्नता, सहानुभूति, परोपकार, दया, दान, सेवा, सरलता आदि सदगुण अपने आप आने लगते हैं। जैसे सुवासित फूल खिलता है तो महक आने लगती है वैसे ही उपरोक्त सारे सदगुण ऐसे साधक में स्वयं आने लगते हैं।

जब वह एकांत में संतों एवं शास्त्रों के वचन विचारता है तो उसमें ईश्वर को पाने की तड़प बढ़ती है। कभी-कभी उसे ध्यान में ईश्वर की झलक मिलने लगती है। ʹमैं यह देह नहीं हूँ। जो खाया-पिया है, उसी का रुपान्तरण यह देह है… यह देह मैं नहीं हूँ तो मैं कौन हूँ ? भगवान क्या है ? वे कैसे मिलें ? मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि किसको कहते हैं ?ʹ – ऐसे विचारों से अपने-आप उनका जवाब आयेगा, नहीं तो जवाब पाने की तड़प होगी। कोई उससे नीची भूमिकावाला उसको जवाब देगा तो उसके जवाब से उसे संतोष नहीं होगा। मान-अपमान की चोटें दिनोंदिन उसे कम प्रभावित करेंगे। संसार के प्रति आकर्षण घटने लगेगा। कभी-कभी काम, क्रोध, मोह आदि विकार आ जायेंगे तो उसको पश्चाताप होगा। वह एकांत में अपने को मारेगा भी सही, रोयेगा भी कि ʹअरे ! मुझसे ऐसा हो गया ?ʹ वह भीतर से इतना स्वच्छ होता जायेगा।

तनुमानसाः दूसरी भूमिका परिपक्व होने पर तीसरी भूमिका ʹतनुमानसाʹ प्रगट होने लगती है। ʹशुभेच्छाʹ एवं ʹसुविचारणाʹ करके बुद्धि सूक्ष्म होती है और इन्द्रियों के अर्थ में अनासक्ति होती है तो ʹतनुमानसाʹ नामक भूमिका बनती है।

तीसरी भूमिका के साधक में वेदान्त के विचार जमने लगेंगेः ʹदेह से आत्मा पृथक है…. मन-बुद्धि का वह द्रष्टा है।ʹ बुद्धि के निर्णय बदलते हुए दिखेंगे, मन के संकल्प-विकल्प बदलते हुए दिखेंगे, संसार की बदलाहट महसूस होने लगेगी और संसार का मान-अपमान उसके लिए फीका हो जायेगा। ईश्वर के सिवाय सारी दुनिया उसे एक तुच्छ खिलौनामात्र लगेगी।

वह जब एकांत में मौन होकर बैठेगा और विचार करने लगेगा तो निदिध्यासन होने लगेगा। उसके चित्त में अनोखी शांति, अनोखा आनंद प्रगट होने लगेगा और कभी-कभी वह जो कहेगा, होने लगेगा। जो होने वाला है, उसका उसे पता चलने लगेगा। लेकिन यदि वह ईमानदारी से साधना कर रहा है तो उसे ज्यादा महत्त्व नहीं देगा, नहीं तो ʹतुष्टिʹ नाम की अवस्था आ जायेगी। फिर ऐसा लगेगा किः ʹजो जानता था, सो जान लिया। जो पाना था, सो पा लिया। मैं साक्षी हूँ…. मैं ब्रह्म हूँ… मैं चैतन्य आत्मा हूँ….. गुरु जी का ज्ञान मेरा ज्ञान हो गया.. गुरु जी का अनुभव मेरा अनुभव हो गया….ʹ कभी ऐसा अनुभव भी होगा लेकिन जिस वक्त अभ्यास करता रहेगा उस वक्त ऐसा अनुभव रहेगा फिर लुढ़क गया तो कुछ नहीं रहेगा।

अगर वह चलता रहा, नियम करता रहा, जपानुष्ठान आदि करता रहा तो मंत्र जप करते उसके अर्थ में तल्लीन होता जायेगा। फिर लंबे मंत्र उससे नहीं होंगे। उसे छोटे मंत्र चाहिए। जब वेदान्त-चिंतन करेगा तब ब्रह्माकार वृत्ति बनेगी, आनंद-शांति मिलने लगेगी लेकिन जब चिंतन छूटेगा तो फिर व्यवहार में आ जायेगा।

इस अवस्था में उसका एक पैर संसार में और दूसरा पैर ʹबार्डरʹ पर …. परम पद की सीमा के करीब होगा। वह जब तक साधन-भजन करेगा, तब तक उसका मन ऊँची अवस्था में रहेगा लेकिन ज्यों ही साधन भजन छोड़ देगा त्यों ही उसका मन नीचे आ जायेगा। इस भूमिका में संसार को सँभालने के विचार भी आयेंगे और आत्मज्ञान पाने के विचार भी आयेंगे।

तीसरी भूमिका में आया हुआ व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार के नितांत करीब होता है। इस भूमिका में यात्रा करते-करते यदि साधक का देहावसान हो जाता है तो जो लाखों रूपये खर्च करके अश्वमेध यज्ञ करते हैं, उनसे भी ऊँची गति उसकी होती है। तपस्वियों-मुनियों को जहाँ स्थान मिलता है ऐसे ब्रह्मलोक तक की उसकी यात्रा हो जाती है। उसके पुण्य अन्यों की नाईं क्षीण नहीं होते हैं। (क्रमशः)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2000, पृष्ठ संख्या 2-5, अंक 86

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गतांक का शेष

जैसे, किसी ने हवाई जहाज का टिकट लिया है और बीच में जहाज बिगड़ जाता है तो उसे होटल में ठहरना पड़ता है। उस हवाई जहाज की कंपनी होटल में उसके रहने-खाने का पूरा खर्च उठाती है, मुसाफिर को खर्च नहीं करना पड़ता। ऐसे ही तीसरी भूमिका में पहुँचे हुए साधक को ब्रह्मज्ञान पाने का टिकट उपलब्ध हो जाता है। लेकिन यदि बीच में ही उसका शरीर शांत हो जाये तो अन्य पुण्यात्माओं की नाईं पुण्यलोक में उसकी गति होती है। उसके पुण्य नष्ट नहीं होते हैं। अगर उसको रूचि रहती है तो वह ब्रह्मलोक में ब्रह्माजी के साथ निवास करता है और जब महाप्रलय होता है तब ब्रह्माजी के उपदेश से ब्राह्मी स्थिति प्राप्त करके ब्रह्मरूप हो जाता है।

सत्त्वापत्तिः तीसरी भूमिका जब परिपक्व होती है तब चौथी भूमिका सत्त्वापत्ति आती है। उपरोक्त तीनों भूमिकाओं का अभ्यास करते हुए, इन्द्रियों के विषय और जगत से वैराग्य करते हुए श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन के द्वारा सत्य आत्मा में स्थित होने का नाम सत्त्वापत्ति है। इस चौथी भूमिका में आत्मसाक्षात्कार हो जाता है। चौथी भूमिका वाले का चित्त कैसा होता है ? जैसे आम की डाल। आम की डाल पकड़कर नीचे झुकाई, उसमें से फल, पत्ते आदि तोड़े और डाल को छोड़ दिया तो डाल अपने मूल स्थान पर ऊपर पहुँच जाती है, ऐसे ही चौथी भूमिकावाला साधक व्यवहार में अपने मन को ले आयेगा, कथा सुनने सुनाने में, बातों में ले आयेगा लेकिन एक क्षण में ही उसका चित्त पुनः अपने स्वरूप में चला जायेगा।

उठत बैठत वही उटाने, कहत कबीर हम उसी ठिकाने….

उस चौथी भूमिका में पहुँचकर सिद्ध हुआ साधक पुनः नीचे नहीं आता, पतित नहीं होता। उसमें जगत का मिथ्यात्व दृढ़ हो जाता है।

जैसे मनुष्य की स्मृति में उसका अपना नाम पक्का बैठ जाता है कि ʹगोविन्द हूँ… मैं गोपाल हूँ…ʹ तो फिर उसको कहे कि ʹतुम गोविन्द नहीं हो… तुम गोपाल नहीं हो….ʹ तब  भी उसे संशय नहीं होता। ऐसे ही चौथी भूमिकावाले महापुरुष को ʹमैं ब्रह्म हूँʹ…. यह ब्राह्मी अनुभूति पक्की हो जाती है। फिर ब्रह्माजी भी कहें कि ʹतुम जीव हो…. तुम ब्रह्म नहीं हो….ʹ तब भी उसे संशय नहीं रहता। फिर राम, राम नहीं बचते… कृष्ण, कृष्ण नहीं बचते बल्कि अपना-आपा आत्मस्वरूप हो जाते हैं।

श्रीरामचरितमानस में आता हैः

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।।

(अयोध्याकाण्डः 126,3)

चौथी भूमिका वाला साधक देह में दिखता है लेकिन उसकी चेतना समस्त ब्रह्माण्डों में फैली होती हुई होती है। जैसे आप सेवफल से अलग हैं, वैसे ही वह देह में होते हुए भी देह से पृथक होता है।

महावीर कहते हैं- “जो दीन-दुःखियों की सेवा-परिचर्या करता है, वह मेरे ज्ञान को समझ सकता है। सेवा से अंतःकरण शुद्ध होता है तब पता चलता है कि हम शरीर नहीं हैं, शरीर से हम पृथक हैं।”

तुलसीदास जी कहते हैं-

पर हित सरिस धर्म नहिं भाई।

वेदव्यास जी ने कहा हैः

परोपकाराय पुण्याय….

नरसिंह मेहता जी ने कहा हैः

वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीड पराई जाणे रे…..

सब संतों का एक ही निचोड़ है। ऊँचाई पर जो पहुँचे हैं, उन सबमें एकवाक्यता है। हम कहते हैं कि ʹहम जैनी हैं…. हम वैष्णव हैं…ʹ यह तो शुरुआत है। जब ऊँचे उठेंगे तब ये भेदभाव गायब हो जायेंगे। चौथी भूमिका वाले को ʹमहापुरुषʹ कहते हैं… ब्रह्मवेत्ता कहते हैं। उनका पुनर्जन्म नहीं होता।

तीसरी भूमिका वाले साधक ब्रह्मलोक तक जाते हैं, उनका पुनर्जन्म हो सकता है किन्तु चौथी भूमिका वालों का जब शरीर शांत होता है तब उनका स्थूल शरीर स्थूल भूतों में, सूक्ष्म शरीर सूक्ष्म सूक्ष्म भूतों में और चेतना महाकाशस्वरूप ब्रह्माण्ड में फैल जाती है। वे हमें भी अपनी इच्छा से, इच्छित लोकों में भेज सकते हैं। ज्ञानी प्रकृति से पार हो जाते हैं।

वे जीवन्मुक्त महापुरुष सुख में सुखी, दुःख में दुःखी नहीं होते हैं। वे अपने  प्राकृत आचार को करें या न करें, उन्हें कोई बंधन नहीं होता। ज्ञानवान् कैसे होते हैं ? इसके बारे में शास्त्रों में  बहुत कुछ कहा गया है, फिर भी लिखने वालों ने अंत में यही लिखा है कि ज्ञानी का अनुभव ज्ञानी जाने। एक ज्ञानी का जीवनचरित्र, स्वभाव एवं व्यवहार जरूरी नहीं कि दूसरे ज्ञानी से मिलता जुलता हो लेकिन एक ज्ञानी का अनुभव दूसरे ज्ञानी के अनुभव से मेल खाता है।

शुकः त्यागी कृष्ण भोगी जनकराघवनरेन्द्राः।

वशिष्ठः कर्मनिष्ठश्च सर्वेषां ज्ञानीनां समान मुक्ताः।।

क्रमशः

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2000, पृष्ठ संख्या 3,4 अंक 87

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गतांक का शेष

चतुर्थ भूमिका में पहुँचे हुए ब्रह्मवेत्ता की आत्मविश्रांति बनी रही तो वे साढ़े चार भूमिका को उपलब्ध होत हैं। ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुष फिर अपने आत्म-खजाने को बाँटने के लिए जगत में निकल पड़ते हैं। ऐसे सदगुरु को ब्रह्म का भी ज्ञान होता है और जगत का भी। जैसे कोई दुभाषिया हो और हिन्दी गुजराती दोनों भाषाएँ जानता हो। वह जब हिन्दी में बोलता है तब गुजराती भाषा का ज्ञान उसका छिपा हुआ होता है और जब गुजराती भाषा में बोलता है तो हिन्दी भाषा का उसका ज्ञान छिपा हुआ होता है। ऐसे ही जब ज्ञानी व्यवहार करते हैं तो परमार्थ का अनुभव उनके साथ होता है। जैसे बोलते-बोलते कुछ शब्द गुजराती के आ ही जाते हैं, वैसे ही जगत के व्यवहार करते हुए भी ज्ञानी की असली भूमिका कभी-कभार अभिव्यक्त हो ही जाती है। साधारण संसारी की नाईं रहते हुए भी उनकी परमार्थ की अनुभतियाँ छलक पड़ती है, उनका संतत्त्व छुपाये भी नहीं छुपता।

असंसक्तिः चौथी भूमिका को प्राप्त हुए महापुरुष को यदि निवृत्ति में अधिक प्रीति होती है और वे एकान्त में ध्यानमग्न रहते हैं तो उनकी फिर पाँचवीं भूमि ʹअसंसक्तिʹ आती है। उनके चित्त में नित्य परमानंद और नित्य अपरोक्ष ब्रह्मात्मभाव का अनुभव होता रहता है। चार भूमिकाओं के फलस्वरूप जो शुद्ध विभूति है, उसका नाम ʹअसंसक्तिʹ है। जैसे सोते हुए इन्सान के लिए मच्छरों की भनभनाहट सुनी-अनसुनी होती है, ऐसे ही ʹअसंसक्तिʹ में पहुँचे हुए महापुरुष के लिए जगत की ʹतू-तू…. मैं-मैं….ʹ, लाभ-हानि सब सुना-अनसुना हो जाता है।

पदार्थाभावनीः दृश्य का विस्मरण और बाहर के नाना प्रकार के पदार्थों के तुच्छ भासने का नाम ʹपदार्थाभावनीʹ है। यह छठी भूमिका है। इस भूमिका में पदार्थ मात्र की ओर जब कोई अन्य व्यक्ति इंगित करता है तब भी प्रयत्न करने पर उसकी प्रतीति होती है। आत्मविश्रांति की वजह से बाह्य एवं आंतरिक पदार्थों की अभावना हो जाती है। कोई मुँह में अन्न का ग्रास रखता है, तब कहीं वे खाते हैं-ऐसी यह छठवीं भूमिका है।

फिर वे महापुरुष ज्यों-ज्यों ज्ञान में गहरे उतरते जायेंगे, त्यों-त्यों लोगों की, जगत की पहचान भूलते जायेंगे। तत्त्वज्ञान की इतनी गहराई होती है कि वहाँ नामरूप की सत्यता ही मिट जाती है।

घाटवाले बाबा का कहना हैः “भगवान श्रीकृष्ण की चौथी भूमिका थी इसलिए उनको बाह्य जगत का ज्ञान भी था और ब्रह्मज्ञान भी था। श्रीरामजी की चौथी भूमिका थी। जड़भरत की पाँचवीं भूमिका थी। जब कभी जहाँ कहीं चल दिये तो चल दिये। पता भी नहीं चलता था कि कहाँ जा रहे हैं। ऋषभदेव छठवीं भूमिका में थे। उन्हें अपने शरीर का भी भान नहीं रहता था। इसीलिए वे एक बार ऐसे वन में सशरीर प्रवेश कर गये जिसमें आग लगी थी और उनका शरीर वहीं शांत हो गया, स्वयं ब्रह्म में लीन हो गये।”

यह है छठवीं भूमिका।

तुर्याः सभी भूमिकाएँ जहाँ एकता को प्राप्त हों, उसका नाम ʹतुर्याʹ है। प्रथम तीन भूमिकाएँ जगत की जाग्रत अवस्था में हैं। चौथी, पाँचवीं, छठवीं एवं सातवीं जीवन्मुक्त की अवस्थाएँ हैं। इन सातों भूमिकाओं से परे विदहेमुक्ति है। उसे ʹतुरीयातीतʹ पद कहते हैं।

पहली भूमिका यूँ मान लो कि दूर से दरिया की ठंडी हवा आती प्रतीत हो रही है।

दूसरी भूमिकाः आप दरिया के किनारे पहुँचे हैं।

तीसरी भूमिकाः आपके पैरों को दरिया का पानी छू रहा है।

चौथी भूमिकाः आप कमर तक दरिया में पहुँच गये हैं। अब गर्म हवा आप पर प्रभाव नहीं डालेगी। शरीर का भी पानी छू रहा है और आस-पास भी ठंडी लहरें उठ रही हैं। लेकिन आप दरिया में भी हैं और बाहर भी हैं।

पाँचवीं भूमिकाः छाती तक, गले तक आप दरिया में आ गये।

छठवीं भूमिकाः जल आपकी आँखों को छू रहा है, बाहर का जगत दिखता नहीं। पलकों तक पानी आ गया। कोशिश करने पर बाहर का जगत दिखता है।

सातवीं भूमिकाः आप दरिया में पूरी तरह से डूब गये। ऐसी अवस्था तो कभी-कभी हजारों-लाखों वर्षों में किसी महापुरुष की होती है।

कई  वर्षों के बाद चौथी भूमिकावाले ब्रह्मज्ञानी महापुरुष पैदा होते हैं। करोड़ों में कोई विरला ऐसी चौथी भूमिका तक पहुँचा हुआ मिलता है। कोई उन्हें ʹमहावीरʹ कह देते हैं तो कोई ʹभगवानʹ कहते हैं, कोई उन्हें ʹअवतारीʹ कहते हैं तो कोई ʹब्रह्मʹ कहते हैं और कोई ʹतारणहारʹ कहते हैं। कभी उनका कबीर नाम पड़ा तो कभी रमण महर्षि…. कभी रामतीर्थ नाम पड़ा तो कभी शंकराचार्य…. कभी भगवान कृष्ण नाम पड़ा तो कभी भगवान बुद्ध…. लेकिन ज्ञान में सबकी एकता होती है। चौथी भूमिका में आत्म-साक्षात्कार हो जाता है। फिर ऐसे महापुरुष उसके विशेष आनंद में पाँचवीं – छठवीं भूमिका में रहें या लोक-सम्पर्क में अपना समय लगायें, उनकी मौज है। जो चार-साढ़े चार भूमिका में रहते हैं, उनके द्वारा लोककल्याण के काम बहुत ज्यादा होते हैं। इसीलिए वे लोग प्रसिद्ध होते हैं और पाँचवीं-छठवीं भूमिका में चले जाते हैं, वे प्रसिद्ध नहीं होते लेकिन मुक्ति सबकी एक जैसी होती है।

इन परमात्म-प्राप्ति की सप्त-भूमिकाओं को जो श्रद्धा-भक्ति से पढ़ता व सुनता है, उसके पापों का क्षय होता है और वह अक्षय पुण्य को पाता है।

समाप्त।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2000, पृष्ठ संख्या 3,4 अंक 88

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