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महर्षि कर्दम एवं देवहूति का दिव्य चरित्र


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

धर्मस्य ह्यावर्ग्यस्य नार्थोर्थायोपकल्पते।

नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय ही स्मृतः।।

कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता।

जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः।। (श्रीमद् भागवतः 1.2.9,10)

ʹधर्म का फल है मोक्ष। उसकी सार्थकता अर्थ प्राप्ति में नहीं है। अर्थ केवल धर्म के लिए है। भोग-विलास उसका फल नहीं माना गया है। भोग का फल इन्द्रियों को तृप्त करना नहीं है। उसका प्रयोजन है केवल  जीवन-निर्वाह। जीवन का फल भी तत्त्वजिज्ञासा है। बहुत कर्म करके स्वर्गादि प्राप्त करना उसका फल नहीं है।ʹ

धर्म का फल संसार के बंधनों से मुक्ति तथा भगवान की प्राप्ति करना है। उससे यदि कुछ सांसारिक संपत्ति उपार्जित कर ली तो यह उसकी कोई सफलता नहीं है। उसकी वास्तविक सफलता तो यह है कि वास्तविक तत्त्व को, भगवत्तत्त्व को जानने की शुद्ध इच्छा हो।

धन भोगवासना में डूब मरने के लिए नहीं अपितु धर्म के लिए है। धर्म धनप्राप्ति के लिए नहीं है, वरन् भगवत्प्राप्ति के लिए है। धर्म संयम का मार्ग दिखलाकर अपने स्वरूप में, आत्मस्वरूप में ले आता है। आज का आदमी बोलता है किः “हम तो गृहस्थी हैं…. हम तो संसारी हैं…..ʹ

अरे ! मनु महाराज… सात समुद्रवाली पृथ्वी के एकछत्र सम्राट स्वयम्भू मनु, जिनकी राजधानी बर्हिष्मती पुरी समस्त संपदाओं से युक्त थी, वे भी धर्म का कितना रहस्य जानते थे ! मनु महाराज ने भारद्वाज जी को जो उपदेश दिया है, वही ʹमनुस्मृतिʹ के नाम से विख्यात है। जिन्होंने भारद्वाज ऋषि को धर्म का उपदेश दिया था, वे ही मनु महाराज अपनी कन्या को लेकर वहाँ गये जहाँ कर्दम ऋषि तपस्या कर रहे थे।

कर्दम ऋषि भी कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। वे ब्रह्माजी के मानसपुत्र थे। कर्दम ऋषि ने ब्रह्मा जी से पूछाः “पिता जी ! क्या आज्ञा है ?” पिता की खुशी का वही दिन है जब पुत्र कहे कि ʹपिता जी ! क्या आज्ञा है ? मैं आपकी कौन-सी इच्छा पूरी करूँ ?ʹ समझो उस दिन पिता का पिता होना सार्थक हो गया। स्वस्थ शरीर, मधुरभाषिणी पत्नी और आज्ञाकारी पुत्र-यह गृहस्थ जीवन का सुख माना गया है। ऐशो आराम में गरकाव होना और डिस्को करना, शराब पीना एवं पत्नी बदलना-इस पिशाची जीवन को गृहस्थाश्रम का सुख नहीं माना गया।

कर्दम ऋषि द्वारा पूछे जाने पर ब्रह्माजी ने कहाः “बेटा ! सृष्टि का विस्तार करो।”

कर्दम ऋषिः “पिता जी ! सृष्टि का विस्तार करने के लिए कुछ योग्यता, कुछ सामर्थ्य हो तभी सृष्टि की परम्परा अच्छे से चल सकेगी। आपकी आज्ञा का पालन करने के लिए मैं जाता हूँ तप करने।”

कर्दम ऋषि तप करने निकल पड़े।

तप भी तीन प्रकार का होता हैः शारीरिक तप, वाचिक तप और मानसिक तप।

जो अन्नमय शरीर में रहते हैं उनके लिए तीर्थयात्रा करना, शरीर को कष्ट देना-यह तप है। जो प्राणमय शरीर में रहते हैं उऩके लिए प्राणायाम आसन आदि करना तप है। जो मनोमय शरीर में रहते हैं उनके लिए भक्तिभाव, आराधना आदि मानसिक तप है। विज्ञानमय एवं आनंदमय शरीर में जिनकी चेतना रहती है, ऐसे लोगों के लिए ध्यान और तत्त्व विचार करना तप है।

लेकिन सब तपों से बढ़कर एकाग्रता को परम तप माना गया है।

तपः सु सर्वेषु एकाग्रता परं तपः।

कर्दम ऋषि उसी एकाग्रता में लग गये। उनकी एकाग्रता ने इतना जोर पकड़ा कि भगवान आदिनारायण उनके आगे प्रगट हो गये। उन्होंने कर्दम ऋषि को दर्शन दिये और वरदान देते हुए कहाः “तुम्हें सृष्टि विस्तार की सेवा करनी है। अतः तुम्हारा विवाह होगा महाराज स्वयम्भू मनु की पुत्री देवहूति के साथ। महाराज मनु स्वयं अपनी कन्या लेकर तुम्हारे पास आयेंगे। उस कन्या देवहूति से तुम्हारी नौ कन्याएँ होंगी। उन कन्याओं से लोकरीति के अनुसार मरीचि आदि ऋषिगणों के द्वारा पुत्र उत्पन्न होंगे।

कृत्वा दयां च जीवेषु दत्त्वा चाभयमात्मवान्।

तुम संयमी बनोगे, जीवों पर दया करोगे, सबको अभयदान करोगे और मुझको सबमें और सबको मुझमें देखोगे। मैं तुम्हारा बेटा बनूँगा और सांख्य दर्शन का उपदेश करूँगा।”

यह वरदान देकर भगवान अंतर्धान हो गये। यहाँ उचित समय पर महाराज मनु अपनी पत्नी के साथ अपनी सुशील सुकन्या देवहूति को ले आये। कर्दम ऋषि ने महाराज मनु का आतिथ्य सत्कार किया एवं सबको आसन दिया। मनु शतरूपा तो आसन पर बैठ गये किन्तु देवहूति सयानी हो चुकी थी। उसने सोचाः ʹये मेरे होनहार पति हैं। अगर उनके बिछाये हुए आसन पर मैं बैठ जाऊँ तो यह पत्नीधर्म के विरूद्ध होगा और अगर अस्वीकार कर दूँ तो उनकी अवज्ञा होगी।ʹ

अतः उस चतुर सुकन्या देवहूति ने न आसन की अवज्ञा की और न ही उस पर बैठी, वरन् अपना दायाँ घुटना और दायाँ हाथ आसन पर रखा, जिससे ऋषिवर का आसन स्वीकार भी हो गया और ऋषि की मर्यादा का पालन भी हो गया।

फिर कुशलक्षेम पूछते हुए कर्दम ऋषि मनु महाराज से बोलेः “आपका यह पौरा संतों की रक्षा एवं दुष्टों के नाश के लिए है क्योंकि आप में भगवान की पालनशक्ति है। सब देवताओं की शक्ति राजा में रहती है। यदि आप विचरण न करें व दुष्टों को दण्ड न दें तो उनको भय न रहेगा और पृथ्वी पर दुष्टता बढ़ जायेगी। राजा को तो ऐसा उग्रदण्डी होना चाहिए कि किसी को उच्छ्रंखल होने की हिम्मत न हो। यदि दण्डनीति शिथिल हो गयी तो वेदधर्म का नाश हो जायेगा।

राजन ! राज्य में प्रजा को पानी तो साफ सुथरा मिलता है न ? प्रजा को अन्न, फल-फूल, दूध आदि तो ठीक से मिलता है न ? प्रजा के गरीब वर्ग का अधिक शोषण तो नहीं होता ? धनाढय लोग गरीबों का ख्याल तो करते हैं न ? गरीब लोग धनाढय को देखकर जलते तो नहीं हैं न ? प्रजा के छोटे-से-छोटे एवं बड़े-से-बड़े वर्ग, सबको आप अपनी संतान की नाईं ही देखते हैं न ? महाराज ! जिस राजा के राज्य में प्रजा सुखी होती है वह राजा प्रजा का प्रेमपात्र होता है। जिस राजा के राज्य में प्रजा दुःखी होती है वह राजा नरक का अधिकारी है – ऐसा शास्त्र कहते हैं। हे राजन् ! आपके राज्य में प्रजा सुखी तो है न ?”

तब मनु महाराज बोलेः “हे ऋषिवर ! आप धन्य हैं। आपने तो आवभगत करते-करते, कुशल समाचार पूछते-पूछते राजा का कर्त्तव्य क्या है और प्रजा सुखी कैसे रहे इन सभी बातों की जानकारी दे डाली। महाराज ! आपको मेरे प्रणाम हैं।”

कर्दम ऋषिः “अच्छा राजन् ! अब यह बताइये कि इस समय यहाँ आपका आगमन किस प्रयोजन से हुआ है ?”

मनु महाराजः “हे ऋषिवर ! हमने सुना है कि आप विवाह के इच्छुक हैं। भगवान आदिनारायण ने भी हमें ऐसी ही प्रेरणा दी है और यह कन्या देवहूति आपके योग्य है। यह जितनी सुन्दर है उतना ही इसका चरित्र भी उज्जवल और पवित्र है।”

कर्दम ऋषिः “राजन् ! आपकी कन्या के विषय में मैंने नारदजी से सुन रखा है कि एक बार यह आपके महल की छत पर गेंद खेल रही थी, तब इसके सौन्दर्य को देखकर विश्वावसु नामक गन्धर्व मूर्च्छित होकर गिर पड़ा था। यह इतनी सुन्दर है और अभी इसके व्यवहार को देखकर भी मैंने जान लिया है कि यह शील, सदाचार और ज्ञान में भी सुन्दर है। अतः मैं आपकी इस साध्वी कन्या से विवाह तो कर सकता हूँ लेकिन एक शर्त के साथ।

वह शर्त है कि मैं सदैव गृहस्थी के दलदल में ही फँसा नहीं रहना चाहता। अतः जब तक इसको सन्तान नहीं हो जायेगी, तभी तक मैं गृहस्थ-धर्मानुसार इसके साथ रहूँगा। बाद में मैं संन्यास धारण कर लूँगा और अपने को उन परब्रह्म परमात्मा में स्थित करूँगा जिनसे इस विचित्र जगत की उत्पत्ति हुई है, जिनके आश्रय से यह स्थित है और जिनमें यह लीन हो जाता है।”

मनु महाराज सहमत हुए। उन्होंने शास्त्रोक्त विधि से देवहूति का कन्यादान पेड़ के नीचे बैठे हुए महर्षि कर्दम को कर दिया। फिर वे अपनी राजधानी की ओर चल पड़े।

कितना आदर है ज्ञान का ! कितना आदर है तप का   ! कितना आदर है संयम और सदाचार का !

तुम भी अपने जीवन में वह ओज लाओ, तेज लाओ, तन्दुरुस्ती लाओ और बल लाओ ताकि तुम्हारा जीवन भी महके…. तुम्हारा जीवन भी आत्मा-परमात्मा के सुख का अनुभव करे।

देवहूति तन-मन से कर्दमजी की सेवा में लग गयी। यद्यपि वह राजपुत्री थी, अत्यन्त प्यार में पली थी एवं कर्दम ऋषि के पास न तो रहने के लिए घर था, न सोने के लिए चारपाई थी, न बिछाने के लिए वस्त्र था और न खाने के लिए बर्तन…. फिर भी देवहूति पर उन अभावों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

पत्थर या धातु की मूर्ति में भगवदबुद्धि करके पूजा और आदर करने से सामर्थ्य आता है, चित्त शुद्ध होता है। पति में तो साक्षात परमेश्वर विराजमान ही हैं। सुख-सुविधा के अभाव में भी पत्नी देवहूति ने पेड़ के नीचे रहने वाले, ज्ञान और ध्यान-भजन में लगे हुए कर्दम जैसे पवित्रात्मा पति में परमात्माबुद्धि करके ऐसी सेवा की कि कर्दम ऋषि की वर्षों की तपस्या निर्विघ्न पूरी हुई।

एक दिन कर्दम ऋषि देवहूति से बोलेः “हे मनुनन्दिनी ! तुमने मेरा बड़ा आदर किया है। मैं तुम्हारी उत्तम सेवा और परम भक्ति से बहुत सन्तुष्ट हूँ। सभी देहधारियों को अपना शरीर बहुत प्रिय एवं आदर की वस्तु होता है, किन्तु तुमने मेरी सेवा के आगे उसके क्षीण होने की भी कोई परवाह नहीं की। बताओ, तुम्हारी क्या इच्छा है ?”

तब देवहूति ने अपने दाहिने पैर के अंगूठे से धरती कुरेदते हुए सलज्ज होकर कहाः “हे नाथ ! मेरे माता-पिता मेरा हाथ आपके हाथ में दे गये थे। हम गृहस्थ जीवन का अनुभव करें, इसलिए हमारा विवाह हुआ था।”

कितनी सुशीलता है भारतीय नारी में ! तन की परवाह किये बिना वर्षों लगी रही पतिसेवा में, फिर भी कोई शिकायत नहीं है जीवन में। पतिसेवा भी कैसी कि पति के कुछ कहे बिना ही पति के हित की भावना से सेवा की और उनको पता तक न चला ! जो पति के हित की भावना से सेवा करती है वह पतिपरायणता पत्नी, गिरी-गुफा में योगी को जो आनंद मिलता है उस आनंद को घर बैठे ही पा सकती है। किन्तु….

सब ते सेवाधर्म कठोरा।

वेदान्त का तत्त्वज्ञान सुनना या सुनाना इतना कठिन नहीं है जितना तप ध्यान करना कठिन है। जप ध्यान करना  भी इतना कठिन नहीं है जितना अपनी इच्छा को पति की इच्छा में मिलाकर सेवा कर लेना। यह बहुत ऊँची बात है। ऐसी ऊँची बात में भारत की नारियों का नाम अभी तक इतिहास में है।

क्रमशः

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 1999, पृष्ठ संख्या 6-9, अंक 80

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(गतांक का शेष)

मैंने सुना है कि परदेश में किसी जगह से एक संत गुजर रहे थे। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक अंग्रेज महिला कब्र पर पंखा झल रही है। उन संत ने गाड़ी रुकवायी। गये उस महिला के पास और बोलेः

“तू किसको पंखा झल रही है ?”

उस महिला ने कहाः “ये मेरे पति थे।”

संतः “धन्य हो देवी ! धन्य हो ! हमने तो सुना था कि भारत में ही ऐसी देवियाँ हैं जो पति को शांति मिले इसलिए पंखा झलती हैं, सेवा करती हैं लेकिन तुम तो पति की कब्र पर भी पंखा झल रही हो ?”

तब उस महिला ने कहाः “आप ऐसा क्यों बोल रहे हैं यह मेरी समझ में नहीं आया।”

संतः “तू अपने पति की कब्र पर इसीलिए पंखा झल रही है न, कि पति को शांति मिले ?”

महिलाः “नहीं, नहीं। इसलिए नहीं। वह जब बीमार पड़ा तब मुझसे बोला था कि ʹतू दूसरा पति मत करना।ʹ मैंने उससे कहा कि ʹमैं तो करूँगी।ʹ तब वह बोला कि ʹअच्छा…. तो फिर जल्दी मत करना।ʹ मैंने कहा कि ʹतुम मरे नहीं कि मैंने किया नहीं।ʹ आखिर उसने गिड़गिड़ाते हुए मुझसे वचन लिया कि ʹजब तक मेरी कब्र गीली हो तब तक तू मेरी बने रहना, दूसरा मत करना।ʹ इसलिए मैं पंखा झल रही हूँ ताकि यह कब्र जल्दी सूखे तो दूसरा करूँ।”

इसका नाम है भोगप्रधान संस्कृति। पश्चिम की संस्कृति है भोगप्रधान संस्कृति जबकि भारतीय संस्कृति है योगप्रधान संस्कृति।

अपनी देवहूति की इच्छा को पूर्ण करने के लिए महर्षि कर्दम ने अपने योगबल से एक ऐसा विमान रचा, जो इच्छानुसार सर्वत्र जा सकता था। यह विमान सब प्रकार के इच्छित भोग-सुख प्रदान करने वाला, अत्यन्त सुन्दर, सब प्रकार के रत्नों से युक्त, सब संपत्तियों की उत्तरोत्तर वृद्धि से संपन्न, मणिमय खंभों से सुशोभित, सभी ऋतुओं में सुखदायक था। विमान में रहने के लिए शयनखंड अलग, साधन भजन का खंड अलग, जलाशय, क्रीडास्थली, आँगन, बैठकगृह आदि सुविधानुसार अलग-अलग बने हुए थे। योगबल से ऐसे सुन्दर पक्षी बनाये कि ब्रह्माजी की सृष्टि से पक्षी उनके पास किल्लोल करने आ जाते थे। वह विमान जल में भी चल सकता था, थल में भी चल सकता था, आकाश में भी उड़ सकता था और गुरुत्वाकर्षण ने नियमों से पार लोक-लोकान्तर की भी सैर करा सकता था। वह विमान संकल्प से चल सकता था। उसमें किसी चालक की जरूरत न थी। ऐसा वह दिव्य और भव्य विमान था। आज के वैज्ञानिक ऐसे दिव्य विमान की तो कल्पना तक नहीं कर सकते हैं।

दुनिया के सारे वैज्ञानिक मिलकर अपने आविष्कृत साधनों से एक आदमी को उतना सुखी नहीं कर सकते जितना शुद्ध सात्त्विक सुख किसी महापुरुष की एक निगाह मात्र से हजारों आदमियों को मिल सकता है। वैज्ञानिक आविष्कारों से सुविधा मिल सकती है, सुखाभास मिल सकता है लेकिन सच्चा आत्मसुख नहीं। सुख तो तुम्हारी आत्मा का है। ʹयह मिला, वह मिला तो मैं सुखी हो गया….ʹ यह तुम्हारा माना हुआ सुख है। वास्तविक सुख तो आत्मा परमात्मा के प्रसाद से मिलता है तब पता चलता है कि वास्तविक सुख क्या है ?

जो सुख नित्य प्रकाश विभु, नामरूप जंजाल।

मति न लखे जो मति लखे, सो मैं शुद्ध अपार।।

जो नित्य सुख है वह आत्मा का है। नाम और रूप तो माया का जंजाल है। जिसको मति नहीं देखती लेकिन जो मति को देखता है उस चैतन्य के सुख में कर्दम ऋषि टिक गये और उस सुखस्वरूप चैतन्य में टिककर योग-सामर्थ्य का उपयोग करके उऩ्होंने दिव्य विमान बनाया जो किसी यंत्र से नहीं अपितु मन की इच्छा से चलता था।

दुनिया में उस समय किसी के पास ऐसा विमान नहीं था जो कर्दम ऋषि के विमान की बराबरी कर सके। कर्दम जी का वैभव शंका या आश्चर्य का विषय नहीं है। जिन लोगों ने भगवान के चरणों का आश्रय ले लिया है, उनके लिए संसार का कोई भी पदार्थ दुर्लभ नहीं है।

फिर कर्दम ऋषि ने देखा कि  पृथ्वी के साम्राज्य के एकछत्र सम्राट की सुकन्या यह देवहूति अपने फटे चिथड़े एवं मैले कुचैले वल्कल को देखकर सिकुड़ रही है तो वे बोले “देवी ! संकोच न करो। जाओ, सरोवर में स्नान करो। वस्त्र अलंकार तुम्हें अपने आप प्राप्त हो जायेंगे।”

देवहूति सरोवर में स्नान करने गयी और ज्यों ही बाहर निकली, त्यों ही उसने देखा कि उसका कृशकाय शरीर हृष्ट-पुष्ट हो चुका है एवं वह वस्य़त्र-अलंकारों से सुसज्ज हो गयी है तथा हजारों दासियाँ उसकी सेवा में खड़ी हैं। कर्दम ऋषि भी स्नान आदि से निवृत्त होकर वस्त्र-अलंकारों से सुशोभित हो रहे थे। उस विमान में उन्होंने वर्षों तक सांसारिक जीवन व्यतीत किया और नौ कन्याओं को जन्म दिया।

एक दिन कर्दम ऋषि ने देवहूति से कहाः “देवी ! अब समय हो गया है। सुबह-दोपहर शाम-रात करते-करते कालचक्र हमारी आयु क्षीण कर रहा है। अतः अब मुझे इस गृहस्थी के जंजाल से निवृत्त होकर अपने परब्रह्म परमात्मा में स्थिति करने के लिए एकान्त में जाना है। अब मैं गृहस्थाश्रम का त्याग करके संन्यास लूँगा।”

देवहूतिः “मुझे आप जैसे योगी को प्राप्त करने का सौभाग्य मिला फिर भी मैंने आपसे संसार के इन तुच्छ विषयों की माँग की ! मुझसे गलती तो हुई है किन्तु आप मेरी एक प्रार्थना स्वीकार करें- इन कन्याओं के विवाह हो जाने दें एवं भगवान ने आपको जो वरदान दिया है कि ʹमैं आपके घर अवतरित होऊँगाʹ उसे फल जाने दें। तब तक आप रुकने की कृपा करें ऐसी मेरी नम्र प्रार्थना है।”

कर्दम जी बोलेः “हे सत्य धर्म का पालन करने वाली सती ! तुम अपने विषय में इस प्रकार खेद न करो। तुम्हारी गोद में अविनाशी भगवान विष्णु शीघ्र ही पधारेंगे जो तुम्हें ब्रह्मज्ञान का उपदेश करके तुम्हारे हृदय की अहंकारमयी ग्रंथी का छेदन करेंगे।”

क्रमशः

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 1999, पृष्ठ संख्या 6,7 अंक 81

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गतांक का शेष

कुछ समय बीत जाने पर देवहूति के गर्भ से भगवान कपिल प्रगट हुए। इसी समय कर्दम जी के उस आश्रम में मरीचि आदि मुनियों सहित श्री ब्रह्माजी आये एवं कर्दम जी से बोलेः “वत्स ! प्रिय कर्दम ! तुमने मेरा सम्मान करते हुए मेरी आज्ञा का पालन किया है। उससे तुम्हारे द्वारा निष्कपट भाव से की गई मेरी पूजा संपन्न हुई है। बेटा ! तुम्हारी ये सुन्दर कन्याएँ अपने वंशों द्वारा इस सृष्टि को अनेक प्रकार से बढ़ायेंगी। अब तुम इस मरीचि आदि मुनिवरों को इनके स्वभाव और रूचि के अनुसार अपनी कन्याएँ समर्पित करो और संसार में अपना यश फैलाओ।”

इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी ब्रह्मलोक चले गये। ब्रह्माजी के चले जाने पर कर्दम ऋषि ने उनकी आज्ञा के अनुसार मरीचि आदि प्रजापतियों के साथ अपनी कन्याओं का विधिपूर्व विवाह कर दिया। उन्होंने अपनी ʹकलाʹ नाम की कन्या का विवाह मरीचि के साथ किया। ʹअनुसूयाʹ का कन्यादान अत्रि ऋषि को किया, जिनके यहाँ भगवान दत्तात्रेय अवतरित हुए। ʹश्रद्धाʹ नाम की तीसरी कन्या अंगिरा ऋषि को एवं चौथी कन्या ʹहविर्भूʹ पुलस्त्य ऋषि को समर्पित की। पाँचवीं कन्या ʹगतिʹ को पुलह ऋषि के साथ, छठी कन्या ʹक्रियाʹ को क्रतु ऋषि के साथ और सातवीं कन्या ʹख्यातिʹ को भृगु ऋषि के साथ ब्याह दिया। आठवीं कन्या ʹअरुन्धतीʹ महर्षि वशिष्ठजी को समर्पित किया और नौवीं कन्या ʹशांतिʹ का कन्यादान अथर्वा ऋषि को किया।

फिर कर्दम जी ने उन विवाहित ऋषियों का उनकी पत्नियों सहित खूब सत्कार किया। प्रसंग सम्पन्न हो जाने पर वे सब कर्दम जी की आज्ञा लेकर अति आनंदपूर्वक अपने-अपने आश्रमों को चले गये।

कर्दम जी ने देखा कि उनके यहाँ साक्षात् देवाधिदेव श्रीहरि ने ही अवतार लिया है। वे एकान्त में उनके पास गये और उन्हें प्रणाम करके कहने लगेः “हे प्रभो ! आप वास्तव में अपने भक्तों का मान बढ़ाने वाले हैं। समय-समय पर अपना प्रकाश, अपना ज्ञानामृत मानव जाति को देने के लिए अवतरित होने वाले हे नारायण ! आपको मेरा नमस्कार है ! आपने अपने वचनों को सत्य करने और सांख्ययोग का उपदेश करने के लिए ही मेरे यहाँ अवतार लिया है। प्रभो ! आपकी कृपा से मैं तीनों ऋणों से मुक्त हो गया हूँ और मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हो चुके हैं। अब मैं संन्यास मार्ग को ग्रहण कर आपके व्यापक ब्रह्मस्वरूप का चिन्तन करते हुए शोकरहित होकर विचरना चाहता हूँ। अब आप मुझे आज्ञा दीजिए ताकि मैं आपके वास्तविक शुद्ध स्वरूप में विश्रान्ति पा सकूँ।”

कितना विवेक है ! कितना वैराग्य है ! ऐसा विमान बनाने का सामर्थ्य कि जिसकी कल्पना तक आज के बिचारे वैज्ञानिक नहीं कर सकते ! इतनी ऊँचाई पर पहुँचे हुए थे, फिर भी ऐसे सुख को उन्होंने छोड़ दिया। घर में कपिल भगवान का अवतार हुआ है…. वह भगवान का साकार विग्रह है और वह विग्रह जिससे दिखता है उस निराकार नारायण में  प्रतिष्ठित होने के लिए कर्दम ऋषि भगवान को प्रणाम करके एकान्त में चले गये।

देवहूति का मन उदास था, फिर भी थोड़ी तसल्ली थी कि कपिल भगवान साथ में हैं। इसी तरह थोड़ा समय बीता और एक दिन देवहूति ने कपिल भगवान से कहाः

“प्रभो ! मैंने अपने जीवन का बहुत सारा समय संसार के चक्र को चलाने का निमित्त बनने में, संसार के प्रपंच में गँवा दिया। अब मुझे आप उपदेश दीजिये ताकि मैं मुक्ति का प्रसाद पा लूँ।”

भगवान कपिल ने माता देवहूति को भक्तिमार्ग का उपदेश देते हुए कहाः “जो प्राणिमात्र में मुझ अंतर्यामी का अनादर कर देता है, मुझको नहीं देखता है और बड़ी-बड़ी पूजा की सामग्रियों से मंदिर में या घर में मेरी पूजा करता है उसकी पूजा मैं स्वीकार नहीं करता। जिन मनुष्य के रूप में मैं बैठा हुआ हूँ उनको तो दुःख देता है और फिर मेरे आगे सामग्रियों का भोग लगाता है ऐसे व्यक्ति से मैं संतुष्ट नहीं होता। किन्तु जो प्राणिमात्र के अंदर छुपे हुए मुझ नारायण को, मुझ ब्रह्म को पूजता है, माँ ! वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।

आसक्ति कभी न खत्म होने वाला पाश है, माँ ! लेकिन वह आसक्ति अगर संत-महापुरुष के प्रति हो जाये तो मुक्तिदायिनी है।”

क्रमशः

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 1999, पृष्ठ संख्या 8,9 अंक 82

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गतांक का शेष

प्रसंगमजरं पाशमात्मनः कवयो विदुः।

स एव साधुषु कृतो मोक्षद्वारमपावृतम्।।

ʹविवेकीजन संग या आसक्ति को ही आत्मा का अछेद्य बंधन मानते हैं। किन्तु वही संग या आसक्ति जब संत महापुरुषों के प्रति हो जाती है तो वह मोक्ष का खुला द्वार बन जाती है।ʹ (श्रीमद् भागवतः 3.25.20)

इस प्रकार भगवान कपिल ने माता देवहूति को भक्ति आदि का रहस्य सुनाया। फिर सांख्य मत का उपदेश देते हुए कहाः “पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, मन, बुद्धि और पाँच महाभूत इन सबमें परिवर्तन होता है। ये प्रकृति के हैं लेकिन जिसकी सत्ता से परिवर्तन होता है और जो परिवर्तन से रहित है वही अपना आत्मस्वरूप है। मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, देह, देह के संबंध आदि को प्रकृति की चीजें समझकर इनसे संबंध-विच्छेद करके जो अपने आत्मस्वरूप में आ जाता है, वह मुक्त हो जाता है।”

योगमार्ग का उपदेश देते हुए भगवान कपिल माता देवहूति से कहते हैं कि यम-नियमादि करके इस जीव को अपने मन-इन्द्रियों पर संयम करना चाहिए।

इस प्रकार भगवान कपिल ने विस्तारसहित सांख्य, योग एवं भक्तिमार्ग का वर्णन माता देवहूति के समक्ष किया और वह पुण्यशीला देवी उपदेश सुनकर, अपने चित्त को परब्रह्म परमात्मा में स्थित करने में रत हो गयीं। भगवान कपिल ने अपनी माता को आत्मज्ञान का उपदेश देने के बाद उनसे अनुमति लेकर वहाँ से प्रस्थान किया। पिता के आश्रम से ईशान कोण की ओर यात्रा करते-करते, उपदेश देते-देते कलकत्ता पहुँचे। आज भी हम गंगासागर का मेला देखते हैं। वहाँ स्वयं समुद्र ने उऩका पूजन करके उन्हें स्थान दिया। तीनों लोकों को शांति प्रदान करने के लिए योगमार्ग का अवलंबन कर समाधि में स्थित हो गये। सिद्ध, गंधर्व, मुनि और अप्सरागण  उनकी स्तुति करते हैं तथा सांख्याचार्यगर्ण भी उनका सब प्रकार से स्तवन करते रहते हैं।

तुम्हारा समय धन से बड़ा है। तुम्हारा जीवन रत्नों और गहनों से बड़ा ऊँचा है। तुम्हारा जीवन अष्टसिद्धियों से भी ऊँचा है। तुम्हारा जीवन अष्टसिद्धियों-नवनिधियों से भी ऊँचा है। तुम अपने ऐसे कीमती जीवन को संसार की तू-तू…. मैं-मैंʹ मत खपा देना बल्कि अपने जीवन को जीवनदाता के अनुभव में लगाकर अमर हो जाना। यही भागवत का उपदेश है।

कितना तीव्र विवेक है कर्दम ऋषि का ! योगबल से मनोवांछित गति करने वाला ʹकामाख्याʹ नामक दिव्य विमान बनाया है। जैसे, आप सपने में मन से पूरी दुनिया बना लेते हैं ऐसे ही योगबल से योगी लोग इस  प्रकार की दूसरी सृष्टि भी बना सकते हैं। ऐसे योगबल को भी उन्होंने तुच्छ समझा एवं जिससे योगसिद्ध होता है उस योग के तत्त्व में टिकने के लिए अपने गृहस्थ जीवन का त्याग कर दिया।

भगवान कपिल तो गंगासागर की ओर पधारे और माँ देवहूति ने इन्द्रियों को मन में एवं मन को बुद्धि में लीन किया। बुद्धि को परब्रह्म परमात्मा में विश्रांति दिलायी। जब परब्रह्म परमात्मा में बुद्धि ने विश्रांति पायी तो फिर बुद्धि बुद्धि न बची, ऋतंभरा प्रज्ञा हो गयी।

जैसे, लोहे की पुतली को पारस का स्पर्श करवा दो तो वह सोने की हो जाती है। फिर उसे जंग लगने का भय नहीं रहता।

माँ देवहूति जब ऋतंभरा प्रज्ञा के परम सुख में स्थित हुई तो उनकी आँखों से हर्ष के दो आँसू टपक पड़े। जिस सरोवर में वे आँसू गिरे, उस सरोवर का नाम है बिन्दु सरोवर। उन्हें आत्मशांति की यह सिद्धि जहाँ मिली उस जगह का नाम है सिद्धपुर। गुजरात में सिद्धपुर और सिद्धपुर में बिन्दु सरोवर आज भी माता देवहूति के पावन चरित्र की गाथा गा रहे हैं। (संपूर्ण)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवमबर 1999, पृष्ठ संख्या 7,8 अंक 83

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सदैव प्रसन्न रहने का परिणाम


मन में दो  बातें एक साथ नहीं रह सकतीं। जिस समय मन दुःखी होगा उस समय मन सुखी नहीं होगा। जिस मन सुखी होगा उस समय दुःखी नहीं होगा। इस तथ्य का लाभ उठाना चाहिए।

कितना भी बड़ा भारी दुःख आ जाये, आप अपने मन में सुख भरने की कला सीख लो। अगर सुख भरने की कला सीख गये तो दुःख का प्रभाव आपको दबोच नहीं सकेगा।

एक बार अकबर बड़ा दुःखी हो गया था एवं यमुना जी में आत्महत्या करने जा रहा था। बीरबल को इस बात का पता चला तो उसने अकबर से कहाः “जहाँपनाह ! खूब हँसो।” अकबर दुःखी तो था ही, अतः वह चिढ़ गया और बोलाः “चारों तरफ से मुझे मुसीबतों ने आ घेरा है और तुम कहते हो खूब हँसो ?”

यह कहकर गुस्से-गुस्से में अकबर ने अपनी अँगूठी निकालकर जोर से यमुनाजी में फेंक दी और कहाः “बीरबल ! तुम मुझे खूब हँसाते हो ? अब देखो तुम कैसे रोते हो। आज से आठ दिन के अंदर यह अँगूठी जहाँपनाह की अँगुली में होनी चाहिए, नहीं तो तुम्हारा सिर काट दिया जायेगा।

बीरबल हँस पड़े। यह देखकर अकबर को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह बोलाः “आठ दिन के बाद तुम्हारी मृत्यु होने वाली है और तुम हँस रहे हो ?”

बीरबलः “हाँ। दुःख के समय ज्यादा प्रसन्न होना चाहिए ताकि दुःख गहरा न उतरे। आप भी जहाँपनाह ! थोड़ा धैर्य रखें, सब ठीक हो जायेगा।”

अकबरः “लेकिन अँगूठी लाकर पहनानी ही पड़ेगी। अन्यथा सजा में कोई छूटछाट नहीं होगी।”

बीरबलः “निश्चिंत रहिये, जहाँपनाह !”

बीरबल गया राजधानी में। उसको हुआ किः ʹक्या पता कब मर जायें….. अब कुछ नेक काम कर लें।ʹ

जब आदमी को अपनी मृत्यु सामने दिखती है तो उसका सज्जन बनना शुरु हो जाता है। इसीलिए कहा हैः

दो बातन को भूल मत जो चाहत कल्याण।

नारायण इक मौत को दूजो श्रीभगवान।।

मृत्यु कभी भी, कहीं भी, कैसे भी आ सकती है और आयेगी जरूर… इस बात को एवं भगवान को कभी मत भूल। इसी में है मानव ! तेरा कल्याण है।

बीरबल तो निश्चिंत होकर सोते थे। एक… दो… तीन दिन बीत गये। चौथे दिन एक घटना घटी। अकबर ने घोषणा करवा दीः “यदि किसी की सब्जी आदि न बिके तो शाम को राज्य के गोदाम में छोड़ जाये और उसको वाजिब दाम मिल जायेगा।

दैवयोग से उसी दिन बाजार में एक बड़ा भारी मच्छ आया। सारा दिन बीतने पर भी वह मच्छ बिका नहीं था। अतः शाम को वह राज्य के गोदाम में लाया गया। यह खबर अकबर तक पहुँची। लोग बोलने लगे किः ʹइतना बड़ा मच्छ आज तक हमने देखा नहीं है।ʹ

अकबर ने मच्छ मँगवाया एवं कहाः “मेरे ही सामने इसको चीरो।”

मछुआरे ने मच्छ को चीरा तो अंदर से अकबर की अँगूठी निकली। अकबर दंग रह गया ! वह बोल उठाः “तीन दिन पहले फेंकी हुई मेरी अँगूठी…. और मच्छ के द्वारा मेरे राजदरबार में पहुँची ! बीरबल यह कैसा जादू ?”

बीरबलः “जहाँपनाह ! जो खुश रहता है उसको कुदरत और भगवान मदद करते हैं।”

सदैव सम और प्रसन्न रहना ईश्वर की सर्वोपरि भक्ति है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 1999, पृष्ठ संख्या 40,41 अंक 79

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सत्शिष्य के लक्षण


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

सत्शिष्य के लक्षण बताते हुए कहा है किः

अमानमत्सरो दक्षो निर्ममो दृढ़सौहृदः।

असत्वरोर्थजिज्ञासुः अनसूयुः अमोघवाक्।।

ʹसत्शिष्य मान और मत्सर से रहित, अपने कार्य में दक्ष, ममतारहित, गुरु में दृढ़ प्रीति करने वाला, निश्चल चित्त वाला, परमार्थ का जिज्ञासु और ईर्ष्यारहित एवं सत्यवादी होता है।ʹ

इस प्रकार के नवगुणों से जो सुसज्जित होता है ऐसा सत्शिष्य सदगुरु के थोड़े से उपदेश मात्र से आत्म-साक्षात्कार करके जीवन्मुक्त पद में आरूढ़ हो जाता है।

ऐसे पद को पाये हुए ब्रह्मवेत्ता महापुरुष का सान्निध्य साधक के लिए नितांत आवश्यक। साधक को ब्रह्मवेत्ता महापुरुष का सान्निध्य मिल भी जाये, लेकिन उसमें यदि इन नवगुणों का अभाव है तो उसे ऐहिक लाभ जरूर होता है, किन्तु आत्म-साक्षात्कार के लाभ से वह वंचित रह जाता है।

अमानित्व, ईर्ष्या का अभाव तथा मत्सर का अभाव-इन सदगुणों के समावेश से साधक तमाम दोषों से बच जाता है एवं साधक का तन और मन आत्म-विश्रांति पाने के काबिल हो जाता है।

सत्शिष्यों का यह स्वभाव होता हैः वे आप अमानी रहते हैं और दूसरों को मान देते हैं। जैसे भगवान राम स्वयं अमानी रहकर दूसरों को मान देते थे।

साधक को क्या करना चाहिए ? वह अपनी बराबरी के लोगों को देखकर न ईर्ष्या करे, न अपने से छोटों को देखकर अहंकार करे और न ही अपने से बड़ों के सामने कुंठित हो, वरन् सबको गुरु का कृपापात्र समझकर, सबसे आदरपूर्ण व्यवहार करे, प्रेमपूर्ण व्यवहार करे। ऐसा करने से साधक धीरे-धीरे मान, मत्सर एवं ईर्ष्यारहित होने लगता है। खुद को मान मिले ऐसी इच्छा रखने पर मान नहीं मिलता है तो सुखाभास होता है एवं नश्वर मान की इच्छा और बढ़ती है। इस प्रकार मान की इच्छा मनुष्य को गुलाम बनाती है जबकि मान की इच्छा से रहित होने से मनुष्य स्वतंत्र बनता है। इसलिए साधक को हमेशा मानरहित बनने की कोशिश करनी चाहिए। जैसे मछली जाल में फँसती है तो छटपटाती है, ऐसे ही जब साधक प्रशंसकों के बीच में आये तब उसका मन छटपटाना चाहिए। जैसे, लुटेरों के बीच आ जाने पर सज्जन आदमी जल्दी से वहाँ से खिसकने की कोशिश करता है ऐसे ही साधक की प्रशंसकों, प्रलोभनों एवं विषयों से बचने की कोशिश करनी चाहिए।

जो तमोगुणी व्यक्ति होता है वह चाहता है कि ʹमुझे सब मान दें और मेरे पैरों तले सारी दुनिया रहे।ʹ जो रजोगुणी व्यक्ति होता है वह कहता है कि ʹहम दूसरों को मान देंगे तो वे भी हमें मान देंगे।ʹ ये दोनों प्रकार के लोग प्रत्यक्ष या परोक्षरूप से कोशिश करते हैं अपना मान बढ़ाने की ही। मान पाने के लिए वे संबंधों के तंतु जोड़ते ही रहते हैं और इससे इतना बहिर्मुख हो जाते हैं कि जिससे संबंध जोड़ना चाहिए उस अंतर्यामी परमेश्वर के लिए उनको फुरसत ही नहीं मिलती और आखिर में अपमानित होकर जगत से चले जाते हैं। ऐसा न हो इसलिए साधक को हमेशा याद रखना चाहिए कि चाहे कितना भी मान मिल जाये लेकिन मिलता तो है इस नश्वर शरीर को ही और शरीर को अंत में जलाना ही है तो फिर उसके लिए क्यों परेशान होना ?

संतों ने ठीक ही कहा हैः

मान पुड़ी है जहर की, खाये सो मर जाये।

चाह उसी की राखता, वह भी अति दुःख पाये।।

एक बार बुद्ध के चरणों में एक अपरिचित युवक आ गिरा और दंडवत प्रणाम करने लगा।

बुद्धः “अरे, अरे, यह क्या कर रहे हो ? तुम क्या चाहते हो ? मैं तो तुम्हें जानता तक नहीं।”

युवकः “भन्ते ! खड़े रहकर तो बहुत देख चुका। आज तक अपने पैरों पर खड़ा होता रहा इसलिए अहंकार भी साथ में खड़ा ही रहा और सिवाय दुःख के कुछ नहीं मिला। अतः आज मैं आपके श्रीचरणों में लेटकर विश्रांति पाना चाहता हूँ।”

अपने भिक्षुकों की ओर देखकर बुद्ध बोलेः “तुम सब रोज मुझे गुरु मानकर प्रणाम करते हो लेकिन कोई अपना अहं न मिटा पाया और यह अनजान युवक आज पहली बार में ही एक संत-फकीर के नाते मेरे सामने झुकते-झुकते अपने अहं को मिटाते हुए, बाहर की आकृति का अवलंबन करते हुए अंदर निराकार की शांति में डूब रहा है।”

इस घटना का यही आशय समझना है कि सच्चे संतों की शरण में जाकर साधक को अपना अहंकार विसर्जित कर देना चाहिए। ऐसा नहीं कि रास्ते जाते जहाँ-तहाँ आप लम्बे लेट जाएँ।

अमानमत्सरो दक्षो…..

साधक को चाहिए कि वह अपने कार्य में दक्ष हो। अपना कार्य क्या है ? अपना कार्य है कि प्रकृति के गुण-दोष से बचकर आत्मा में जगना और इस कार्य में दक्ष रहना  अर्थात् डटे रहना, लगे रहना। उस निमित्त जो भी सेवाकार्य करना पड़े उसमें दक्ष रहो। लापरवाही, उपेक्षा या बेवकूफी से कार्य से विफल नहीं होना चाहिए, दक्ष रहना चाहिए। जैसे, ग्राहक कितना भी दाम म करवाने को कहे, फिर भी लोभी व्यापारी दलील करते हुए अधिक-से-अधिक मुनाफा कमाने की कोशिश करता है, ऐसे ही ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग में अपने चित्त को चलित करने के लिए कितनी ही प्रतिकूल परिस्थितियाँ आ जायें, फिर भी साधक को अपने परम लक्ष्य में डटे रहना चाहिए। सुख आये या दुःख, मान हो या अपमान, सबको देखते जाओ…. मन के विचारों को, प्राणों की गति को देखने की कला में दक्ष हो जाओ।

नौकरी कर रहे हो तो उसमें पूरे उत्साह से लग जाओ, विद्यार्थी हो तो उमंग के साथ पढ़ो, लेकिन व्यावहारिक दक्षता के साथ-साथ आध्यात्मिक दक्षता भी जीवन में होनी चाहिए। साधक को सदैव आत्मज्ञान की ओर आगे बढ़ना चाहिए। कार्यों को इतना नहीं बढ़ाना चाहिए कि आत्मचिंतन का समय ही न मिले। संबंधों को इतना नहीं बढ़ाना चाहिए कि, जिससे संबंध जोड़े जाते हैं उसी का पता न चले।

एकनाथ जी महाराज ने कहा है कि रात्रि के पहले प्रहर और आखिरी प्रहर में आत्म चिंतन करना चाहिए। कार्य के प्रारम्भ में और अंत में आत्मविचार करना चाहिए। दक्ष वह है जो जीवन में इच्छा उठे और पूरी हो जाये तब अपने आप से ही प्रश्न करे किः “आखिर इच्छापूर्ति से क्या मिलता है ?” ऐसा करने से इच्छानिवृत्ति के उच्च सिंहासन पर आसीन होने वाले दक्ष महापुरुष की नाई निर्वासनिक नारायण में प्रतिष्ठित हो जायेगा।

अगला सदगुण है ममतारहित होना। देह में अहंता और देह के संबंधियों में ममता होती है। जो मनुष्य अपने संबंधों के पीछे जितनी ममता रखता है, उतना ही उसके परिवार वाले उसको दुःख के दिन दिखा देते हैं। अतः साधक को देह एवं देह के संबंधों से ममतारहित बनना चाहिए।

आगे बात आती है-गुरु में दृढ़ प्रीति करने की। मनुष्य क्या करता है ? वास्तविक प्रेमरस को समझे बिना संसार के नश्वर पदार्थों में प्रेम का रस चखने जाता हूँ और अंत में हताशा, निराशा एवं पश्चाताप की खाई में गिर पड़ता है। इतने से भी छुटकारा नहीं मिलता। चौरासी लाख जन्मों की यातनाएँ सहने के लिए उसे बाध्य होना पड़ता है। शुद्ध प्रेम तो उसे कहते हैं जो भगवान और गुरु से किया जाता है। उनमें दृढ़ प्रीति करने वाला साधक आध्यात्मिकता के शिखर पर शीघ्र ही पहुँच जाता है। जितना अधिक प्रेम, उतना अधिक समर्पण और जितना अधिक समर्पण, उतना ही अधिक लाभ।

कबीर जी ने कहा हैः

प्रेम न खेतों उपजे, प्रेम न हाट बिकाय।

राजा चहो प्रजा चहो, शीश दिये ले जाय।।

शरीर की आसक्ति और अहंता जितनी मिट जाती है, उतना ही स्वभाव प्रेमपूर्ण बनता जाता है। इसीलिए छोटा-सा बच्चा, जो निर्दोष होता है, हमें बहुत प्यारा लगता है क्योंकि उसमें देहासक्ति नहीं होती। अतः शरीर की अहंता एवं आसक्ति छोड़कर गुरु में, प्रभु में दृढ़ प्रीति करने से अंतःकरण शुद्ध होता है। ʹविचारसागरʹ ग्रन्थ में भी आता है कि “गुरु में दृढ़ प्रीति करने से मन का मैल तो दूर होता ही है, साथ ही उनका उपदेश भी शीघ्र असर करने लगता है, जिससे मनुष्य की अविद्या और अज्ञान भी शीघ्र नष्ट हो जाता है।”

इस प्रकार गुरु में जितनी-जितनी निष्ठा बढ़ती जाती है, जितना-जितना सत्संग पचता जाता है उतना-उतना ही चित्त निर्मल व निश्चिंत होता जाता है।

इस प्रकार परमार्थ पाने की जिज्ञासा बढ़ती जाती है, जीवन में पवित्रता, सात्त्विकता, सच्चाई आदि गुण प्रगट होते जाते हैं और साधक ईर्ष्यारहित हो जाता है।

जिस साधक का जीवन  सत्य से युक्त, मान, मत्सर, ममता एवं ईर्ष्या से रहित होता है, जो गुरु में दृढ़ प्रीति वाला, कार्य में दक्ष एवं निश्चलचित्त होता है, परमार्थ का जिज्ञासु होता है – ऐसा नव गुणों से सुसज्ज साधक शीघ्र ही गुरुकृपा का अधिकारी होकर जीवन्मुक्ति के विलक्षण आनंद का अनुभव कर लेता है अर्थात् परमात्म-साक्षात्कार कर लेता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 1999, पृष्ठ संख्या 6-9, अंक 79

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