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मन को कैसे जीतें ?


परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू

जितने बड़े व्यक्ति को हराया जाता है, उतना ही जीत का महत्त्व बढ़ जाता है। मन एक शक्तिशाली शत्रु है। उसे जीतने के लिए बुद्धिपूर्वक यत्न करना पड़ता है। मन जितना शक्तिशाली है, उस पर विजय पाना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। मन को हराने की कला जिस मानव में आ जाती है, वह मानव महान हो जाता है।

ʹश्रीमद् भगवद् गीताʹ में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछता हैः

चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्।

तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।।

ʹहे श्रीकृष्ण ! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाववाला, बड़ा दृढ़ और बलवान है। इसलिए उसको वश में करना मैं वायु को रोकने की भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ।ʹ (गीताः 6.34)

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।

ʹहे महाबाहो ! निःसन्देह मन चंचलच और कठिनता से वश में होने वाला है। परंतु हे कुंतीपुत्र अर्जुन ! यह अभ्यास अर्थात् एकीभाव में निथ्य स्थिति के लिए बारंबार यत्न करने से और वैराग्य से वश में होता है।ʹ (गीताः6.35)

जो लोग वैराग्य का ही सहारा लेते हैं, वे मानसिक उन्माद के शिकार हो जाते हैं। मान लो, संसार में किसी निकटवर्ती के माता-पिता या कुटुम्बी की मृत्यु हो गयी। गये श्मशान में तो आ गया वैराग्य… किसी घटना को देखकर हो गया वैराग्य… चले गये गंगा किनारे…. वस्त्र, बिस्तर आदि कुछ भी पास में न रखा…. भिक्षा माँगकर खा ली…. फिर अभ्यास नहीं किया। …तो ऐसे लोगों का वैराग्य एकदेशीय हो जाता है।

अभ्यास के बिना वैराग्य परिपक्व नहीं होता है। अभ्यासरहित जो वैराग्य है वह ʹमैं त्यागी हूँ…ʹ ऐसा भाव उत्पन्न कर दूसरों को तुच्छ दिखाने वाला एवं अहंकार सजाने वाला हो सकता है। ऐसा वैराग्य अंदर का आनंद न देने के कारण बोझरूप हो सकता है। इसीलिए भगवान कहते हैं-

अभ्यासेनच तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।

अभ्यास की बलिहारी हैं क्योंकि मनुष्य जिस विषय का अभ्यास करता है, उसमें वह पारंगत हो जाता है। जैसे साइकिल, मोटर आदि चलाने का अभ्यास है, पैसे ʹसेटʹ करने का अभ्यास है वैसे ही आत्म-अनात्म का विचार करके, मन की चंचल दशा को नियंत्रित करने का अभ्यास हो जाये तो मनुष्य सर्वोपरि सिद्धिरूप आत्मज्ञान को पा लेता है।

साधक अलग-अलग मार्ग के होते हैं। कोई ज्ञानमार्गी है, कोई भक्तिमार्गी होता है, कोई कर्ममार्गी होता है, तो कोई योगमार्गी होता है। सेवा में अगर निष्कामता हो अर्थात् वाहवाही की आकांक्षा न हो एवं सच्चे दिल से, परिश्रम से अपनी योग्यता ईश्वर के कार्य में लगा दे तो यह हो गया निष्काम कर्मयोग।

निष्काम कर्मयोग में कहीं सकामता न आ जाये-इसके लिए सावधान रहे और कार्य करते-करते भी बार-बार अभ्यास करे किः ʹशरीर मेरा नहीं, पाँच भूतों का है। वस्तुएँ मेरी नहीं, ये मेरे से पहले भी थीं और मैं मरूँगा तब भी यही रहेंगी… जिसका सर्वस्व है उसको रिझाने के लिए मैं काम करता हूँ…ʹ ऐसा करने से सेवा करते-करते भी साधक का मन निर्वासनिक सुख का एहसास कर सकता है।

भक्तिमार्गी साधक भक्ति करते-करते ऐसा अभ्यास करे किः “अनंत ब्रह्माण्डनायक भगवान मेरे अपने हैं। मैं भगवान का हूँ तो आवश्यकता मेरी कैसी ? मेरी आवश्यकता भी भगवान की आवश्यकता है, मेरा शरीर भगवान का शरीर है, मेरा घर भगवान का घर है, मेरा बेटा भगवान का बेटा है, मेरी बेटी भगवान की बेटी है, मेरी इज्जत भगवान की इज्जत है तो मुझे चिन्ता किस बात की ?ʹ ऐसा अभ्यास करके भक्त निश्चिंत हो सकता है।

योगी प्रतिदिन नियत समय पर धारणा-ध्यान समाधि का अभ्यास करे तो उसका विवेक जगता है। विवेक जगता है तब संसार के भोगों के प्रति वैराग्य आता है। विवेक-वैराग्य के उदय होने से आत्मा-परमात्मा की अनुभूति करने की योग्यता विकसित हो जाती है।

ऐसे ही ज्ञानमार्ग का साधक अभ्यास करे किः ʹजो कुछ दिख रहा है वह भगवान की आह्लादिनी शक्ति की, प्रकृति की लीला है। जो कुछ दिखता है वह सब माया है। अस्ति, भाति, प्रिय.. इसमें चैतन्य की सत्ता है और सब नाम-रूप माया है। संसार के व्यवहार एवं मन-बुद्धि के जगत में उलझना मेरा कर्त्तव्य नहीं है। मन के फुरने और जगत के व्यवहार भिन्न-भिन्न होते हैं लेकिन उनकी गहराई में उनका दृष्टा, साक्षी, अभिन्न आत्मा मैं हूँ।ʹ

कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग, कुण्डलिनी योग… चाहे कोई भी योग क्यों न हो, अभ्यास की आवश्यकता तो सबमें है। यदि आत्माभिमुख होने का अभ्यास है तो फिर बाह्य वातावरण चाहे कैसा भी विलासी लगता हो, पर मनुष्य भीतर से परमात्मा में गोता मार सकता है। यदि अभ्यास की तीव्रता नहीं हो तो फिर मनुष्य सब छोड़कर गंगा-यमुना किनारे चला जाये फिर भी परमात्म-तत्त्व में विश्रान्ति पाना उसके लिए कठिन हो जाता है।

चैतन्य महाप्रभु का एक प्यारा शिष्य था-पुण्डरीक। उस पुण्डरीक को देखकर दूसरे शिष्यों के मन में हुआः ʹगुरु महाराज इसको देखकर विशेष छलकते हैं, प्रसन्न होते हैं। चलो, आज इसके घर चलें।ʹ

पुण्डरीक के घर गदाधर और मुकुन्द नाम के दो गुरुभाई गये। उस समय पुण्डरीक अपने घर पर एक सुन्दर, सुसज्जित शैया पर आराम कर रहा था। कमरा भी इस तरह सजा हुआ था कि मानो, किसी अति विलासी करोड़ाधिपति व्यक्ति का हो। कमरा देखकर गदाधर को हुआः ʹयह चैतन्य महाप्रभु का शिष्य़ कैसे ? यह तो अति विलासी आदमी लग रहा है !ʹ मुकुन्द को हुआः ʹपुण्डरीक सो रहा है.. बाहर से तो वह विलासी वातावरण में दिख रहा है किन्तु चैतन्य महाप्रभु विलासी आदमी से  प्यार नहीं करने। भीतर से जरूर भगवान में इसकी प्रीति होगी।ʹ ऐसा मन में सोचते हुए मुकुन्द ने ʹहरि बोल…. हरि बोल….ʹ की मधुर ध्वनि चालू की।

पुण्डरीक की नींद खुल गयी और वह कूदकर पलंग से उतरा। उसकी आँखें बंद हो गयीं और वह भावविभोर होकर हरि नाम कीर्तन में तल्लीन हो गया। यह उसके अभ्यास का ही तो परिणाम था !

विक्रम संवत 1100 के इर्द-गिर्द की घटना हैः आचार्य श्रीधर स्वामी बड़े प्रसिद्ध संत हो गये हैं, जिन्होंने श्रीमद् भगवद् गीता पर टीका भी लिखी है।

उनका जन्म दिवस किस कुल में हुआ था, उसका पता नहीं है। बाल्यकाल में उनका मस्तिष्क पूर्ण विकसित नहीं हुआ था। अपनी किशोरावस्था में वे एक तुच्छ पात्र में तेल लिये हुए कहीं जा रहे थे। उसी समय उस राज्य के राजा और वजीर भगवान की कृपा के विषय में परस्पर चर्चा करते हुए सरिता के किनारे टहल रहे थे।

मंत्री का कहना था कि अगर भगवान रहमत कर दे, भगवद्-भक्ति का अभ्यास हो जाये तो बुद्धु से बुद्धु आदमी भी चतुन बन सकता है, निर्धन से निर्धन आदमी बड़े धन को पा सकता है, बाहर से निर्धन सा दिखाई देता व्यक्ति भी बड़े धनवानों को दान कर सकता है, निरक्षर होते हुए भी साक्षरों को पढ़ा सकता है, अपरिचित होते हुए भी बड़े-बड़े परिचितों को मार्गदर्शन कर सकता है।

जीवन में ईश्वर-चिंतन का अभ्यास अगर आ जाय तो आदमी का भाग्य बदल जाय। फिर कैसी परिस्थिति में वह पैदा हुआ है इसका महत्त्व नहीं है वरन् अभी उसको कैसा वातावरण मिला है उसका महत्त्व है। उसके पास कितना धन-वैभव है उसका महत्त्व नहीं है वरन् अभी उसका संग कैसा है उसका महत्त्व है।

राजा ने कहाः “यह कैसे हो सकता है अयोग्य योग्य हो जाये ? अगर भगवान का भजन करने से अयोग्य भी योग्य हो सकता है तो यह लड़का जो अयोग्य पात्र में तेल लिये जा रहा है बड़ा मूर्ख लग रहा है, क्या यह योग्य हो सकता है ?”

वजीरः “अगर इसको भगवान के भजन का रंग लगा दिया जाय, भजन के अभ्यास में प्रीति करा दी जाये तो यह भी योग्य हो सकता है।”

दैवयोग कहो, भगवान की लीला कहो अथवा श्रीधर का प्रारब्ध कहो… उस बच्चे को राज्य की तरफ से भगवान की भक्ति का रंग लगा दिया गया।

अभ्यास करते-करते उस बालक का चित्त भगवान की भक्ति से रंग गया। समय बीतता गया, योग्यता विकसित होती गयी और वही बालक आगे चलकर श्रीधर स्वामी के रूप में पहचाना जाने लगा।

समय आने पर उनका विवाह हो गया। शादी के पश्चात वे गृहस्थी की गाड़ी चलाने लगे। वे गीता, भागवत, पुराण आदि का नित्य पाठ व स्वाध्याय करते थे। समय पाकर उनकी पत्नी गर्भवती हुई किन्तु शिशु को जन्म देते ही वह परलोक सिधार गयी। श्रीधर स्वामी को हुआ किः ʹचलो, अच्छा हुआ। भगवान ने पत्नी को अपने चरणों में बुलाकर मुझे भजन करने का मौका दे दिया।ʹ

अब वे अपनी दैनिक प्रवृत्ति करते हुए शिशु का पालन करने लगे। किन्तु धीरे-धीरे अभ्यास का इतन बल बढ़ा कि शिशु को पालना-पोसना भी अब उन्हें भारी लगने लगा। वे विचारने लगेः ʹएक शिशु के कारण मैं अपना ध्यान भजन, एकांत, समाधि छोड़ दूँ ?ʹ अभ्यास की तीव्रता से वैराग्य ने जोर पकड़ा और उन्होंने सोचाः ʹशिशु को छोड़कर चला जाऊँ।ʹ अब बालक को छोड़कर वे संन्यास लेने के लिए काशी की ओर प्रस्थान करने को उद्यत हुए। फिर उऩके मन में आयाः ʹइस नन्हें से शिशु को घर में अकेला छोड़कर जा रहा हूँ… इसकी माँ चल बसी है तो क्या हुआ?ʹ किन्तु अभ्यास ने कहाः ʹमाँ चल बसी है तो क्या हुआ ? कई जन्मों में इसकी कितनी ही माताएँ हुई होंगी ? कितने ही पिता बने होंगे ? सच्चे पिता तो सबकी रखवाली करते हैं फिर क्यों तू ʹअपना बेटाʹ करके फँसता है ?ʹ

इतने में वहाँ एक घटना घटी। छत पर से लुढ़कता हुआ एक अण्डा गिरा और वह फूट गया। उसमें से पक्षी के बच्चे ने चोंच बाहर निकाली। वह भूख के कारण गर्दन हिलाने लगा। इतने में अण्डे से जो रस निकला उस चिकनाहट में एक मक्खी आकर फँसी जिसे उस नवजात बच्चे ने अपनी चोंच में ले लिया।

श्रीधर स्वामी को हुआः ʹएक पक्षी के बच्चे के जीवन को बचाने के लिए परमात्मा की इतनी व्यवस्था है तो क्या मनुष्य के शिशु की रखवाली वह नहीं करेगा ?ʹ वे शिशु को छोड़कर चल दिये। फिर तो उस शिशु का ऐसा सुंदर लालन-पालन हुआ कि पहले तो केवल एक पिता ही उसे स्नेह करता था किन्तु अब पूरा गाँव उससे स्नेह करने लगा।

श्रीधर स्वामी ने काशी में जाकर वेदान्त का श्रवण-मनन-निदिध्यासन किया। भक्ति में भी वे उतने ही आगे थे। उनके ग्रंथ पढ़ें तो पता चलता है कि वेदान्त के दिव्य ज्ञान के साथ-साथ भक्ति की दिव्य भावना भी उनके शास्त्रों से छलकती है।

श्रीधर स्वामी किस कुल के थे, इसका पता नहीं है। बाल्यकाल में वे मंदबुद्धि थे किन्तु जब भगवान के रास्ते पर चलने का अभ्यास किया तो महान टीकाकार श्रीधर स्वामी के रूप में प्रसिद्ध हो गये। अभ्यास की बलिहारी है !

ʹश्रीयोगवाशिष्ठ महारामायणʹ आता है कि अनंत जन्मों की वासनाएँ इस जीव के अंतःकरण में एकत्रित हैं। ये एक-दो दिन में तो नहीं छूटेंगी। इसलिए इस अंतःकरण से वासनाओं को निवृत्त करने के लिए अभ्यास की जरूरत है।

एक बार कार्त्तिक क्षेत्र में संतों की परिषद हुई थी। उनमें आपस में विचार-विमर्श हो रहा था किः ʹभगवान विष्णु की नाभि से ब्रह्माजी प्रगट हुए हैं और नारदजी ब्रह्माजी के मानस पुत्र हैं। नारदजी ने ध्रुव को मंत्र दिया तो ध्रुव का काम छः महीने में बन गया और हम लोग वर्षों से जटाएँ बढ़ाये हुए मंत्रजाप कर रहे हैं फिर भी हमारा काम नहीं हो रहा।ʹ

एक ने कहाः ʹʹभाई ! यह तो जान पहचान का जमाना है। भगवान विष्णु ने देखा कि ध्रुव को नारद ने मंत्र दिया है तो वे जल्दी प्रसन्न हो गये।”

दूसरे ने कहाः “नहीं नहीं, ऐसी बात नहीं है। तुम भगवान में दोष देखते हो, इसका मतलब यह है कि तुम्हारी बुद्धि में दोष है।”

तीसरे ने कहाः “तो फिर क्या कारण है कि ध्रुव को छः महीने में भगवान मिल गये और हमको बरसों बीत गये हैं फिर भी नहीं मिल रहे ?”

इतने में एक मल्लाह बहुत ही सुन्दर नाव लेकर आया और बोलाः “महापुरुषों ! मैं यह नाव लेकर आया हूँ। अगर आप कृपा करें तो इसका उदघाटन हो जाये।”

किसी की निंदा करने से, किसी पर दोषारोपण करने से चित्त उद्विग्न हो जाता है क्योंकि निंदा करने से मन नीचे के केन्द्रों में चला जाता है। आप सागर की ऊपरी सतह पर तो घण्टों भर तैर सकते हैं लेकिन सागर की गहराई में ज्यादा देर नहीं रह सकते। ऐसे ही ऊपर के केन्द्रों में समाधि में, भाव में, प्रभु प्रेम में आप घण्टों भर रह सकते हैं, दिन भर रह सकते हैं महीना भर रह सकते हैं लेकिन काम में, क्रोध में आप घण्टा भर भी नहीं रह सकते।

संत लोग बैठ गये उस नाव में। मल्लाह नाव को खेते-खेते ऐसे स्थल पर ले गया जहाँ कुछ द्वीप थे और उन द्वीपों पर थोड़ी अस्थियाँ पड़ी हुई थीं। किसी संत ने पूछाः “इन द्वीपों पर थोड़ी-थोड़ी अस्थियाँ पड़ी हुई हैं ! क्या बात है ?”

मल्लाहः “महाराज ! यहाँ एक तपस्वी ने तप करते-करते अपने तन को सुखा डाला था कि उसके प्राण पखेरू उड़ गये थे और अस्थियाँ रह गयी थीं। फिर वह बार-बार जन्म लेकर इन्हीं द्वीपों पर मृत्युपर्यन्त तप करता रहा। इस तरह उसने अपने 99 जन्मों तक कठोर तप किया। उसी तपस्वी के 99 जन्मों के अस्थिपिंजरों का यह ढेर है।”

संतः “वह तपस्वी कौन था ?”

मल्लाहः “वह तपस्वी था उत्तानपाद राजा का पुत्र ध्रुव। 99 जन्मों का उसका अभ्यास था अतः 100 वें जन्म में छः महीने के अभ्यास से ही उसे परमात्म दर्शन हो गये।”

इस प्रकार उन संतों के संदेह का निवारण हो गया। मल्लाह के रूप में आये हुए भगवान ने कहाः “हमारे यहाँ जान पहचान से नहीं वरन् साधक के अभ्यास की दृढ़ता के काम होता है। आपका अभ्यास बिखरा हुआ है, इसलिए मैं नहीं आता। लेकिन जब मेरा चिन्तन करते-करते आप लोगों ने मेरी समता के विषय में संदेह किया, तब आप लोगों का चित्त कहीं भ्रमित न हो जाये इसलिए मैं मल्लाह के रूप में प्रत्यक्ष होकर आप लोगों को सही बात बताने आया हूँ।”

यह कहकर भगवान अदृश्य हो गये।

आपको यदि किसी के जीवन में उन्नति दिखती है तो समझ लेना कि उसके जीवन में अभ्यास की तीव्रता है। जिसका जिस विषय में अभ्यास होता है, उसी विषय में वह पारंगत होता है। छोटे-छोटे विषयों का अभ्यास करने से उन छोटे-छोटे विषयों पर ही अधिकार हो पाता है लेकिन मन का साक्षी होने का अभ्यास अगर हो जाए तो मन को जीतने की शक्ति आ जाती है और जिसने मन को जीत लिया फिर उसे कुछ भी जीतना शेष नहीं रह जाता। अतः जब का अभ्यास, ज्ञान का अभ्यास, आत्मशांति पाने का अभ्यास, श्वासोच्छवास को गिनने का अभ्यास…. मन को निर्दोष बनाने के ये सुन्दर उपाय हैं। जो अभ्यास के महत्त्व को जानते हैं वे महानता को छू लेते हैं। आप भी लग जाओ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 1999, पृष्ठ संख्या 2-6, अंक 78

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बिना दवा स्मरणशक्ति का विकास


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

परब्रह्म परमात्मा में सोलह कलाएँ होती हैं। सृष्टि में प्रत्येक वस्तु तथा जीव उन सोलह कलाओं में से कुछ कलाओं के साथ जीवित अथवा स्थित रहते हैं। अलग-अलग वस्तुओं तथा जीवों में ईश्वर की अलग-अलग कलाएँ विकसित होती हैं। उन कलाओं में एक विशेष कला है – स्मृतिकला।

स्मृतिकला तीन प्रकार की होती हैः तात्कालिक स्मृति, अल्पकालिक स्मृति तथा दीर्घकालिक स्मृति।

कई जीवों में अल्पकालिक अथवा तात्कालिक स्मृतिकला ही विकसित होती है परन्तु मनुष्य में स्मृतिकला के तीनों प्रकार विकसित होते हैं। अतः मनुष्य को प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा जाता है।

मनोवैज्ञानिक विश्लेषणानुसार, ʹकुछ याद रखनाʹ एक प्रकार की जटिल मानसिक प्रक्रिया है। स्मरणशक्ति अर्थात् सुनी, देखी एवं अनुभव की हुई बातों का वर्गीकरण करके मस्तिष्क में उन्हें संगृहीत करना तथा भविष्य में जब भी उनकी आवश्यकता पड़े उन्हें फिर से जान लेना।

स्मृति के लिए दिमाग का जो हिस्सा कार्य करता है उसमें एसीटाइलकोलीन, डोयामीन तथा प्रोटीन्स के माध्यम से एक रासायनिक क्रिया होती है। एक प्रयोग के द्वारा यह भी सिद्ध हुआ है कि मानव-मस्तिष्क की कोशिकाएँ आपस में जितनी सघनता से गुंथित होती हैं उतनी ही उसकी स्मृति का विकास होता है।

मानसिक विशेषज्ञों के अनुसार, प्रायः सभी प्रकार के मानसिक रोग स्मृति से जुड़े होते हैं, जैसे कि चिन्ता, मानसिक रोग स्मृति से जुड़े होते हैं, जैसे कि चिन्ता, मानसिक अशांति आदि। ऐसे ढंग के व्यक्तियों में कोई भी कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व इतनी घबराहट बढ़ जाती है कि वे समय पर जरूरत की चीजों को अच्छी तरह से याद नहीं रख सकते।

विद्यार्थियों में यह समस्या अधिक पायी जाती है। परीक्षाकाल निकट आने पर अथवा परीक्षा-पत्र को देखकर घबरा जाने से अऩेक विद्यार्थी याद किये हुए पाठ भी भूल जाते हैं। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि स्मरणशक्ति पर मानसिक रोगों का सीधा प्रभाव पड़ता है।

हमारे प्राचीन ऋषियों ने स्मरणशक्ति को बढ़ाने के लिए प्राणायाम, ध्यान, धारणा आदि अनेक यौगिक प्रयोगों का आविष्कार किया है। उऩ्होंने तो ध्यान के द्वारा एक ही स्थान पर बैठे-बैठे अनेक ग्रहों एवं लोकों की खोज कर डाली।

महर्षि वाल्मीकि ने ध्यान के द्वारा अपनी बौद्धिक शक्तियों का इतना विकास किया कि श्रीरामावतार से पूर्व ही उन्होंने श्रीराम की जीवनी को ʹरामायणʹ के रूप में लिपिबद्ध कर दिया।

इसी प्रकार महर्षि वेदव्यासजी श्रीमद् भागवत महापुराण में आज से हजारों वर्ष पूर्व ही कलियुगी मनुष्यों के लक्षण बता दिये थे।

हमें मानना पड़ेगा कि हमारा ऋषिविज्ञान इतना विकसित था कि उसके सामने आजे के विज्ञान की कोई गणना ही नहीं की जा सकती।

महर्षि वाल्मीकि तथा वेदव्यासजी द्वारा रचित ये दो ग्रंथ-रामायण तथा महाभारत, उनकी चमत्कारिक तथा विकसित स्मरणशक्ति के उदाहरण स्वरूप हैं।

स्मरणशक्ति को बढ़ाने वाला भ्रामरी प्राणायाम हमारे ऋषियों की एक विलक्षण खोज है। भ्रामरी प्राणायाम द्वारा मस्तिष्क की कोशिकाओं में स्पंदन होता है जिसके फलस्वरूप एसीटाइलकोलीन, डोयामीन तथा प्रोटीन के बीच होने वाली रासायनिक क्रिया को उत्तेजना मिलती है तथा स्मरणशक्ति का चमत्कारिक विकास होता है।

कैसे करें भ्रामरी प्राणायाम ?

यह प्राणायाम करने के लिए सर्वप्रथम पाचनशक्ति मजबूत करने की आवश्यकता होती है। पाचनतंत्र में ग्रहण किये गये खाद्य पदार्थों को पचाने तथा उन्हें निष्कासित करने की पूर्ण क्षमता होनी चाहिए।

जिसका पाचनतंत्र कमजोर हो, उसे सर्वप्रथम ʹप्रातः पानी प्रयोगʹ तथा पाद-पश्चिमोत्तानासन के द्वारा अपने पाचनतंत्र को सुदृढ़ बनाना चाहिए। यह प्राणायाम करने वाले के लिए उपयुक्त पोषक तथा सात्त्विक आहार लेना भी अति आवश्यक है क्योंकि शुद्ध तथा पोषक तत्त्व न मिलने के कारण मस्तिष्क की कार्यक्षमता मन्द पड़ जाती है। अतः प्राणायाम करने वाले व्यक्ति के दैनिक भोजन में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, विटामिन तथा खनिज तत्त्वों की उपयुक्त मात्रा उसकी शारीरिक क्षमता के अनुसार होनी चाहिए।

इस प्रकार शुद्ध, सात्त्विक तथा पौष्टिक आहार लेते हुए प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकालीन तीनों संध्याओं के समय खाली पेट भ्रामरी प्राणायाम करने से स्मरणशक्ति का चमत्कारिक विकास होता है।

विधिः प्रातः काल शोच-स्नानादि से निवृत्त होकर कम्बल अथवा ऊन के बने हुए किसी स्वच्छ आसन पर पद्मासन, सिद्धासन अथवा सुखासन में बैठ जायें और आँखें बन्द कर लें।

ध्यान रहे कि कमर व गर्दन एक सीध में रहें। अब दोनों हाथों की तर्जनी (अँगूठे के पासवाली) उँगलियों से अपने दोनों कानों के छिद्रों को बन्द कर लें। इसके बाद खूब गहरा श्वास लेकर कुछ समय तक रोके रखें तथा मुख बन्द करके श्वास छोड़ते हुए भौंरे की तरह ʹૐ…..ʹ का लम्बा गुंजन करें।

इस प्रक्रिया में यह ध्यान अवश्य रखें कि श्वास लेने तथा छोड़ने की क्रिया नथुनों के द्वारा ही होनी चाहिए। मुख के द्वारा श्वास लेना अथवा छोड़ना निषिद्ध है।

श्वास छोड़ते समय होंठ बन्द रखें तथा ऊपर व नीचे के दाँतों के बीच में कुछ फासला रखें। श्वास अन्दर भरने तथा रोकने की क्रिया में ज्यादा जबरदस्ती न करें। यथासम्भव श्वास अंदर खींचे तथा रोकें। अभ्यास के द्वारा धीरे-धीरे आपकी श्वास लेने तथा रोकने की शक्ति स्वतः ही बढ़ती जायेगी।

प्रत्येक श्वास छोड़ते समय ʹૐʹ का गुंजन करें। इस गुंजन द्वारा मस्तिष्क की कोशिकाओं में हो रहे स्पन्दन (कम्पन) पर अपने मन को एकाग्र रखें।

प्रारम्भ में इस प्राणायाम का अभ्यास दस-दस मिनट सुबह-दोपहर अथवा शाम जिस संध्या में समय मिलता हो, नियमित रूप से करें। एक माह बाद प्रतिदिन एक-एक मिनट बढ़ाते हुए तीस मिनट तक यह प्राणायाम कर सकते हैं। किन्तु शारीरिक रूप से कमजोर तथा अस्वस्थ लोगों को प्राणायाम की संख्या का निर्धारण अपनी क्षमता के अनुसार करना चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 1999, पृष्ठ संख्या 9-11, अंक 78

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निंदा से कोढ़ नाश ! – पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू


मृत्यु के भय से तो मृत्यु तो बढ़िया है और बदनामी के भय से बदनामी अच्छी है। ʹबदʹ होना बुरा नहीं है।

इक्ष्वाकु कुल के राजा को कोढ़ की बीमारी हो गयी। दिन का चैन और रात की नींद हराम हो गयी। सारे हकीम और वैद्य अपना-अपना इलाज आजमाकर थक चुके थे। आखिर वह राजा गुरु वशिष्ठजी के श्रीचरणों में पहुँचा और बोलाः

“गुरुदेव ! आज आपके निकट मैं स्वार्थ की बात लेकर आया हूँ। प्रभु ! शांति के लिए नहीं, वरन् शरीर का रोग मिटाने के लिए आया हूँ। इस कोढ़ के इलाज में कोई भी औषधि काम नहीं कर रही है। इसने मुझे धन-वैभव एवं सारी सुविधाओं के बीच रहते हुए भी अत्यंत दुःखी कर दिया है। गुरुदेव इसका क्या कारण है ?”

वशिष्ठजी महाराज ने तनिक अपने स्वस्वरूप में गोता लगाया और समझ गये कि इसके पूर्वकाल का दुष्कृत्य अभी फल देने के लिए तत्पर हुआ है।

कभी पूर्वकाल का सुकृत फल देने को तत्पर होता है। पूर्वकाल का सात्त्विक सुकृत जब फल देने को तत्पर होता है तब संतों के यहाँ जाने की रूचि होती है। राजस सुकृत फल देता है तो भोग-वैभव मिलता है और तामस सुकृत फल देता है तो ऐशो आराम की ओर, शराब कबाब की ओर ले जाता है।

जरूरी नहीं कि पाप का फल ही दुःख होता है। कभी-कभी पुण्य का फल भी दुःख होता है। पुण्य का फल दुःख ? हाँ…. कुछ ऐसे पुण्य किये हैं कि जिसका फल दुःख हो रहा है। दुःख क्यों हो रहा है ? क्योंकि आपकी समय शक्ति संसार के इन खिलौनों में बरबाद न हो जाये। अतः प्रकृति इन खिलौनों की, सांसारिक विषयरूपी खिलौनों की प्राप्ति में विक्षेप डालकर आपकों संत और परमात्मा की शरण पहुँचाना चाहती है, इसीलिए दुःख देती है।

कुछ लोग विवेक से संसार-वैभव का आकर्षण छोड़कर संतों की शरण में पहुँच जाते हैं तो कुछ लोगों को सुकृत के बल से उस सुख-वैभव में विक्षेप डालकर उसकी नश्वरता का बोध करवाकर संतों की शरण में पहुँचा देती है प्रकृति।

वशिष्ठजी महाराज बोलेः “हे राजन ! तुम्हारा पूर्वकृत दुष्कृत्य ही अभी कोढ़ के रूप में प्रगट हुआ है।”

राजाः “गुरुदेव ! मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ।” तब वशिष्ठजी ने कहाः ठीक है मैं तुम्हें दिखा देता हूँ।” वशिष्ठजी ने राजा की आँखों पर संकल्प करके हाथ रख दिया, फिर पूछाः “राजन ! क्या दिख रहा है ?”

राजाः “गुरुजी ! दो पहाड़ दिख रहे हैं। उनमें से एक पहाड़ तो सुवर्णकाय है और दूसरा काला कलूट एवं गंदगी के ढेर जैसा दिख रहा है।”

वशिष्ठजीः “राजन ! ठीक दिख रहा है। पहला जो चमक रहा है, वह तुम्हारे शुभ सुकृत हैं और दूसरा जो दिख रहा है गंदगी के ढेर जैसा, यह तुम्हारा पाप है। राज्य और यश तुम्हारे सुकृत का फल है लेकिन अनिद्रा और कोढ़ की बीमारी ये तुम्हारे पूर्वजन्मों के दुष्कृत्यों के फल हैं।”

राजाः “गुरुदेव ! इसका उपाय क्या है ?” वशिष्ठजीः “इस गंदगी के ढेर को तुम खा सकते हो क्या ?”

राजाः “गुरुदेव ! यह तो संभव नहीं है।” वशिष्ठजीः “तो जब तक यह ढेर रहेगा, तब तक तुम्हारा यह दुःख भी बना रहेगा।”

राजाः “इस ढेर को खत्म करने का कोई दूसरा उपाय बताइये, गुरुदेव !”

वशिष्ठजीः “तुम ऐसा किया करो कि अपनी भाभी के महल के प्रांगण में अपना खाट बिछवाओ और रोज शाम को ऐसे ढंग से वहाँ जाकर रहो ताकि  लोगों के मन में ऐसा हो कि ʹभाभी के साथ राजा का नाजायज संबंध है।ʹ लोगों को तुम दोनों का रिश्ता गलत प्रतीत हो। तुम गलत नहीं हो और गलती करोगे भी नही किन्तु लोगों को ʹतुम गलत होʹ ऐसी प्रतीति कराओ।”

राजाः “गुरुदेव ! मेरी भाभी ! वे तो माँ के समान हैं !! मैं वहाँ इस ढंग से जाकर बिस्तर लगाऊँ कि लोग मुझे गलत समझें !! गुरुदेव ! इससे तो मरना श्रेष्ठ है।”

वशिष्ठजीः “बेटा ! बद होना बुरा है किन्तु बदनाम होना बुरा नहीं है। तुम्हारे इस दुष्कृत्य को नष्ट करने का सबसे सुगम उपाय मुझे यही लगता है।”

आखिर हाँ-ना करते-करते राजा सहमत हुआ और उसने गुरुआज्ञा को शिरोधार्य किया।

सैनिक को जब अपने सेनापति का कोई आदेश मिलता है तो अपनी जान की परवाह किये बिना ही वह उस आदेश का पालन करता है। जो चार पैसे कमाता है, वह सैनिक भी आदेश मानकर अपनी जान दे देता है तो जिसको परमात्मतत्त्व पाना है, वह अपने गुरु का आदेश मानकर उऩ्हें अपना अहं दे दे तो इसमें उसका घाटा क्या है ?

तू मुझे तेरा उर-आँगन दे दे, मैं अमृत की वर्षा कर दूँ।

तू मुझे तेरा अहं दे दे, मैं परमात्मा का रस भर दूँ।।

राजा को तीन दिन हो गये अपनी भाभी के प्रांगण में बिस्तर बिछाए हुए, उसका तीन हिस्सा कोढ़ गायब हो गया और एक दो घण्टे की नींद भी आने लगी। राजा प्रसन्न होकर पहुँचा अपने गुरुदेव के श्रीचरणों में एवं प्रणाम करता हुआ बोलाः “गुरुदेव ! बिना औषधि के ही तीन हिस्सा कोढ़ गायब हो गया ! थोड़ी-थोड़ी नींद भी आने लगी है।”

गुरुदेव ने पुनः संकल्प करके राजा की आँखों पर हाथ रखा तो राजा क्या देखता है कि गंदगी का ढेर जो काला पहाड़ था वह तीन हिस्सा गायब हो चुका है।

फिर गुरुदेव बोलेः “चार दिन और यही प्रयोग करो।”

राजा ने चार दिन पुनः वही प्रयोग किया तो पूरा कोढ़ मिट गया, केवल एक नन्हीं सी फुँसी बच गयी। तब राजा ने कहाः “गुरुदेव ! पूरा कोढ़ मिट गया है और अब तो नींद भी बढ़िया आती है लेकिन एक छोटी सी फुँसी बच गयी है और इसमें जरा सी खुजलाहट होती रहती है।”

तब गुरुदेव ने कहाः “राजन् ! अगर मैं भी थोड़ी निंदा कर दूँ तो यह मिट जायेगी। लेकिन मैं जानता हूँ कि तुम निर्दोष हो। अतः निंदा करके मैं अपने सिर पर पाप क्यों चढ़ाऊँ ? इसे अब तुम ही भोग लो।”

निर्दोष व्यक्ति की जब बदनामी होती है तब भगत लोग, सीधे-सादे लोग घबरा जाते हैं। “बापू ! हमने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा फिर भी पड़ोसी लोग हमारे साथ ऐसा-ऐसा दुर्व्यवहार करते हैं….”

अरे भाई ! तुम्हारे चेहरे पर खुशी या  प्रसन्नता देखकर कोई ऐसा वैसा सोचता या बदनामी करता है तो तुम घबराओ मत। ऐसे अवसर पर इक्ष्वाकु कुल के राजा की इस कथा को याद कर लिया करो। कभी-कभी तुम्हारा धन-वैभव एवं यश देखकर अथवा किसी संत महापुरुष का तुम पर प्रेम है-यह देखकर कोई जलता है। तुम तो उसे जलाने का प्रयत्न नहीं करते हो, अतः इसमें तुम्हारा दोष नहीं है।

जब बिजली चमकती है तब बिजली का कोई इरादा नहीं होता कि हम गधी को परेशान करें। बिजली को तो पता तक नहीं होता कि गधी परेशान हो रही है लेकिन जब बिजली चमकती है तो गधी दुलत्ती मारती है। हालाँकि बिजली को वह दुलत्ती लगती भी नहीं है। इसी प्रकार जब तुम्हारे जीवन में चमक आये और किसी की बुद्धि दुलत्ती मारने लगे अर्थात् निंदा करने लगे तो तुम चिंता क्यों करते हो ? तुम तो टिके रहो अपनी गरिमा में, अपनी महिमा में।

स्वामी रामतीर्थ कहते थेः “अपने सिद्धान्तों के लिए अपने प्राण न्योछावर करने की अपेक्षा जीवित रहकर अपने सिद्धान्तों के विरोधियों से टक्कर लेना श्रेष्ठ है।”

एकांत में बैठकर समाधि करने से जो फायदा होता है, वही फायदा, वही आनंद और वही सामर्थ्य, संसार में ईश्वर को साक्षी रखकर दैवी कार्य करते-करते व्यक्ति पा सकता है। योगी को गिरि-गुफा में बैठकर निर्विकल्प समाधि से, ध्यान करने से जो उपलब्धियाँ होती हैं वे ही उपलब्धियाँ उऩ्हें भी मिल जाती हैं जो संसार में सुख बाँटने की दृष्टि से काम करते हैं और कभी-कभार संतों के चरणों में बैठकर अपनी बुद्धि को बुद्धिदाता का ज्ञान पाने में लगा देते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 1999, पृष्ठ संख्या 23-25, अंक 78

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