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काम-क्रोध से बचो – पूज्य पाद संत श्री आशारामजी बापू


अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न कियाः

अथ केन प्रयुक्तोयं पापंच चरति पूरूषः।

अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः।।

ʹहे कृष्ण ! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात् लगाये हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है ?ʹ (गीताः3.36)

भगवान श्रीकृष्ण ने कहाः

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।

महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्।।

ʹहे अर्जुन ! रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यही महाशन अर्थात् अग्नि के सदृश भोगों से तृप्त न होने वाला बड़ा पापी है। इस विषय में इसको ही तू वैरी जान।ʹ (गीताः 3.37)

काम और क्रोध जीव को वास्तविक सुख से, वास्तविक जीवन से दूर ले जाते हैं। ये ʹमहापाप्माʹ हैं। जीव का पतन करने वाले हैं। चित्त में अनेक कामनाएं उठती हैं और वह उन कामनाओं की पूर्ति करके सुखी होना चाहता है किन्तु जब कामनापूर्ति करने जाता है तो कामनापूर्ति होने पर लोभ, लालच बढ़ जाते हैं। अगर कामनापूर्ति नहीं होती है और उसमें कोई बड़ा आदमी विघ्नरूप बनता है तो भय होता है, छोटा आदमी विघ्नरूप बनता है तो क्रोध होता है और बराबरी का आदमी विघ्नरूप बनता है तो ईर्ष्या होती है, द्वेष पैदा होता है। सच्चा सुख तो कामना निवृत्त करने से मिलता है।

प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।

आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।।

ʹहे अर्जुन ! जिस काल में पुरुष मन में स्थित संपूर्ण कामनाओं को त्याग देता है, उस काल में आत्मा से ही आत्मा में संतुष्ट हुआ स्थिर बुद्धिवाला कहा जाता है।ʹ (गीताः 2.55)

वह स्थिरबुद्धि वाला पुरुष ही आत्मशांति को प्राप्त हो सकता है। जैसे सागर में तरंगें उठती रहती हैं वैसे ही जिसके चित्त में इच्छारूपी तरंगें उठती रहती हैं वह आत्मशांति नहीं पा सकता है। वासनायुक्त चित्त से उठती हुई इच्छाओं की पूर्ति करते रहने से इच्छाएँ शांत नहीं होती हैं अपितु बढ़ती चली जाती हैं, चित्त में गहरी उतरती जाती हैं। इसी इच्छापूर्ति में तो आयुष्य पूरा हो जाता है परन्तु इच्छाएँ पूरी नहीं होती हैं। इसलिए भर्तृहरि ने कहा हैः

तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः।

इच्छा-तृष्णा तो जीर्ण नहीं होती है किन्तु हम जीर्ण हो जाते हैं। हमारा मन, हमारी बुद्धि, इन्द्रियाँ जीर्ण होती जाती हैं।

जिसको यह बात समझ में आ जाती है वह फिर इच्छापूर्ति में नहीं, इच्छानिवृत्ति में लग जाता है। नासमझ आदमी इच्छापूर्ति में लगा रहता है और अपनी आयुष्य गंवाता रहता है।

मिथिला का राजा निमि भी इच्छापूर्ति करके सुखी होना चाहता था। कामनापूर्ति से कामना बढ़ती है। एक रानी होते हुए भी उसे दूसरी रानी लाने की इच्छा हुई। फिर तीसरी, चौथी, पाँचवीं…. ऐसे कई रानियाँ ले आया। जो जी में आया वह खाया-पिया और भोगा। इस तरह भोगते-भोगते शरीर रोगी हो गया लेकिन कामना नहीं मिटी।

राजा निमि को दाहज्वर हो गया। उसकी हालत देखकर हकीमों ने कहाः

“राजन् ! मृत्यु का समय निकट है। अब केवल एक ही उपाय है। कोई प्रेम से चंदन घिसे और आपके शरीर पर उसका लेप करे तो दाहज्वर में आपको थोड़ा आराम हो सकता है।”

कामनाएँ दाह और तपन पैदा करती हैं। भय, शोक, ईर्ष्या और चिंता पैदा करती हैं। नरकों की यात्रा करने वाली कमबख्त कामनाएँ ही हैं। नहीं तो आपको भला कौन नरक में ले जा सकता है ?

राजा दाहज्वर से पीड़ित अवस्था में सोया हुआ था। रानियाँ प्रेम से चंदन घिसने लगीं। चंदन घिसते वक्त रानियों के हाथ की जो चूड़ियाँ खनकती थीं। राजा को चूड़ियों की आवाज से भी पीड़ा हो रही थी। उसने रानियों सेः “चंदन घिसना है तो घिसो, किन्तु आवाज मत करो।”

पतिपरायणा नारियों ने सौभाग्य की निशानी के रूप में एक-एक चूड़ी रखी। बाकी की चूड़ियाँ उतारकर रख दीं तो चंदन घिसते वक्त जो आवाज हो रही थी, वह बंद हो गई। राजा ने पूछाः

“चंदन घिसना बंद कर दिया क्या ?”

“नहीं। चंदन तो घिस रहे हैं लेकिन आपने कहा इसलिए हमने आवाज बंद कर दी है।”

“कैसे बंद की ?”

“हाथों में चूड़ियाँ ज्यादा थीं तो खनक रही थीं। अब केवल एक ही रखी है, बाकी की चूड़ियाँ उतार दी हैं।”

राजा निमि का पूर्व का कोई पुण्य उदय हुआ। उसे हुआ कि बहुतों में खटपट होती है, अकेले में ही शांति है। वह तो उसी दाहज्वर में उठा। गृहलक्ष्मी और राज्यलक्ष्मी को दूर से प्रणाम करके आत्मलक्ष्मी पाने के लिए गुरु के द्वार जा बैठा।

अमीरी की तो ऐसी की कि सब जर लुटा बैठे।

फकीरी की तो ऐसी की कि गुरु के दर आ बैठे।।

वह ऐसा फकीर बन गया कि उसने इच्छा-वासनाओं की फाकी कर ली, संशय व फिकर की फाकी कर ली। मौत के पहले अमर आत्मपद में स्थित हो गया। भोगसम्राट में से योगसम्राट हो गया।

वास्तव में जीवमात्र योगसम्राट है लेकिन अभागी कामनाएँ ही उसे भोग का कीड़ा बना देती हैं।

सब लोगों की सब कामनाएँ-इच्छाएँ पूरी हो जाएँ, यह संभव नहीं है। यह किसी के वश की बात भी नहीं है। इच्छा पूर्ति में प्रारब्ध चाहिए, पुरुषार्थ चाहिए। साथियों का, समाज का सहयोग चाहिए लेकिन इच्छानिवृत्ति में हम स्वतंत्र हैं। ज्यों-ज्यों इच्छा निवृत्त करते जायेंगे, त्यों-त्यों इच्छारहित आत्मपद में विश्रांति पाते जाएँगे। विश्रांति से सामर्थ्य प्रगट होता है। उस सामर्थ्य के सदुपयोग की कला आ जाए तो सत्यस्वरूप आत्मा की यात्रा पूर्ण हो जायेगी।

यदि इस संसाररूपी दलदल से आप बचना चाहते हैं तो सदा सावधानी रखें। इन्द्रियाँ बार-बार फिसल जाती हैं, कामनाएँ चित्त को घसीटती रहती हैं। इसको रोकने के लिए विवेक-वैराग्य को सदा जागृत रखें।

श्रद्धा, भक्ति, विवेक से हमारी रक्षा होती है। कामनापूर्ति करते-करते तो युग बीत जाते हैं लेकिन जन्म-मरण के चक्कर से हमारा पिंड नहीं छूटता। इसलिए बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह कामना-निवृत्ति में ही लगा रहे। इस संदर्भ में एक कहानी हैः

सिंध देश की बात है। किसी गुंडे आदमी ने एक व्यापारी से 100 रूपये उधार लिये। उस समय के 100 रूपये माने आज के करीब 8000-9000 रूपये या डेढ़ तोला सोना।

कुछ दिन बीतने पर व्यापारी ने उस गुंडे से कहाः

“तुमने मुझसे 100 रूपये लिये थे। मैं तुमसे ब्याज तो नहीं माँगता हूँ लेकिन 100 रूपये दे दो तो ठीक होगा।”

हालांकि व्यापारी जानता था कि वह देने वाला नहीं है, फिर भी मिल जायें तो ठीक।

गुंडे ने कहाः “रूपये तो मैं देना चाहता हूँ किन्तु मेरी एक बात तुम्हें माननी होगी।”

“अरे ! एक तो क्या तीन-तीन बात मान लूँगा। तुम पैसे वापस दे दो, बस।”

“मैं पैसे वापस तो देना चाहता हूँ किन्तु तुम सौ के कर दो साठ।”

“ठीक है चलो, साठ ही सही।”

“आधा कर दो काट।”

“ठीक है। बाकी के 30 तो दे दो !”

“दस देंगे, दस दिलवायेंगे और दस के जोड़ेंगे हाथ।”

तो अब बाकी क्या बचा ? कुछ नहीं। ऐसे ही आपके मन में सौ-सौ कामनाएँ उठें तो आप मन से कह दोः “सौ की कर दे साठ। आधा कर दे काट। दस कामनाएँ पूरी करेंगे। दस बाद में पूरी करवायेंगे। दस के लिए हाथ जोड़ेंगे। अभी तो राम में लगने दे, यार ! अभी तो समाहितचित्त होने दे…. अंतर्यामी आत्मा में शांत होने दे।ʹ

मन की ʹयह चाहिए….. वह चाहिए…..ʹ की आदत पुरानी है। जिसकी चाह होगी वह नहीं मिलेगा तो मन अशांत होगा। काम-क्रोध में बह जाएगा। इसलिए प्रयत्नपूर्वक मन को काम-क्रोधादि आवेगों में बहने से बचाकर बार-बार आत्मा में लगाओ। क्योंकि…..

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।

काम क्रोधास्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।

ʹकाम, क्रोध और लोभ ये तीन प्रकार के नरक के द्वार हैं, आत्मा का नाश करने वाले अर्थात् अधोगति में ले जाने वाले हैं। अतः इन तीनों को त्याग देना चाहिए।ʹ (गीताः 16.21)

धन के ढेर इकट्ठे करना, सत्ता के ऊँचे शिखरों पर पहुँचने की कामना करना मूर्खता है। मन को कामना-वासनारहित करके प्रारब्धवेग से निष्काम प्रवृत्ति करना या निवृत्ति में रहना बुद्धिमानी है। बुद्धिमान पुरुष बुद्धि की धारा में, विचार की धारा में जीता है लेकिन बुद्धि को जहाँ से सत्ता-स्फूर्ति मिलती है उसी चैतन्य में बुद्धि को स्थित करना चाहिए। विचार की धारा के बीच माने एक विचार  उठा, दूसरा उठने को है उसके बीच जो अवकाश है उसमें जो टिकता है वह चैतन्य, साक्षी, शुद्धस्वरूप में जीता है। कामनापूर्ति के पीछे यदि भागता रहे तो उस भागदौड़ का कभी अंत नहीं होगा किन्तु कामनानिवृत्ति में जो लगता है वह देर-सबेर बुद्धत्व को पा लेता है। इसलिए श्रीकृष्ण ने कहा हैः

एवं बुद्धेः परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना।

जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।

ʹइस प्रकार बुद्धि से परे अर्थात् सूक्ष्म तथा सब प्रकार से बलवान और श्रेष्ठ अपने आत्मा को जानकर बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो ! अपनी शक्ति को समझकर इस दुर्जय कामरूप शत्रु को तू मार।ʹ (गीताः 3.43)

कई जन्मों से हम कामनाओं के पीछे बरबाद होते आ रहे हैं। अब इस जन्म में तो दृढ़ निश्चय कर लो कि अमर आत्मपद को पाकर ही रहेंगे। जिन्होंने भी दृढ़ निश्चय किया और तत्परता से लगे रहे, काम-क्रोधादि से सावधान होकर संयमी जीवन जिये उन्होंने उस आत्मपद को पा लिया। आप भी उस पद को पा सकते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 1996, पृष्ठ संख्या 3,4,5 अंक 46

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ईश्वरीय विधान का आदर


पूज्यपाद संत श्री आशारामजी बापू

एक होता है ऐहिक विधान और दूसरा होता है ईश्वरीय विधान। ऐहिक विधान का निर्माण ऐहिक लोगों द्वारा होता है और इसमें भिन्नता होती है। अलग-अलग राष्ट्र अपने-अपने हिसाब से अपना विधान बनाते हैं।

ऐहिक विधान बनाने वाले कभी गलती भी कर लेते हैं और अमल कराने वाले भी कई घूस, लांच-रिश्वत ले लेते हैं। ऐहिक विधान का उल्लंघन करने वाला कई बार बच भी जाता है।

ईश्वरीय विधान गाँव-गाँव के लिए, राज्य-राज्य के लिए, राष्ट्र-राष्ट्र के लिए अलग नहीं होता। अनंत ब्रह्माण्डों में एक ही ईश्वरीय विधान काम करता है। देवताओं का विधान, दैत्यों का विधान, मनुष्यों का विधान अलग-अलग हो सकता है लेकिन ईश्वरीय विधान अलग नहीं होता। ईश्वरीय विधान के अनुकूल जो चलता है वह ईश्वर की प्रसन्नता पाता है लेकिन ईश्वरीय विधान के विपरीत चलने वाले को प्रकृति पचा-पचाकर सबक सिखा देती है।

ऐहिक विधान में छूट-छाट है। उसमें पोल चल जाती है लेकिन ईश्वरीय विधान में पोल नहीं चलती। ईश्वरीय विधान का अनादर करने से आदमी को बहुत सहन करना पड़ता है। हम जब-जब दुःखी होते हैं, अशान्त होते हैं, भयभीत होते हैं तब निश्चित समझ लेना चाहिए कि हमारे द्वारा जाने-अनजाने ईश्वरीय विधान का उल्लंघन हुआ है।

द्रौपदी के साथ कितना अन्याय हुआ था ! भरी सभा में दुर्योधन ने द्रौपदी को अपनी जाँघ पर बैठने के लिए ललकारा था। कर्ण ने मजाक उड़ाते हुए उसे ʹवेश्याʹ कहा था। दुःशासन ने कौरव वंश के तमाम महानुभावों के सामने द्रौपदी के वस्त्र खींचे, फिर भी किसी ने अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठायी। ऐसा घोर अन्याय करने वालों के प्रति जब पांडव कुछ प्रतिक्रिया करते हैं तो वे ही दुष्ट लोग धर्म की दुहाई देने लगते हैं।

युद्ध के मैदान में जब कर्ण के रथ का पहिया फँस गया था और वह रथ से नीचे उतर कर पहिया बाहर निकाल रहा था, उस समय अर्जुन द्वारा बाण का निशाना लगाने पर कर्ण धर्ण की दुहाई देते हुए कहताहैः

“यह धर्मयुद्ध नहीं है। मैं निःशस्त्र हूँ और तुम मेरे पर निशाना साध रहे हो ?”

तब श्रीकृष्ण ने कहाः “जब कौरवों के राजभवन में द्रौपदी के केश खींचे जा रहे थे, उसकी निर्भर्त्सना हो रही थी, तब कहाँ गया था तेरा धर्म ? अब यहाँ धर्म की दुहाई दे रहा है ?”

कभी-कभी तो लुच्चे राक्षस भी आपत्तिकाल में धर्म की दुहाई देने लग जाते हैं। आपत्तिकाल में धर्म की दुहाई देकर अपना बचाव करना, यह कोई धर्म के अनुकूल बात नहीं है। आपत्तिकाल में भी अपने धर्म में लगे रहना चाहिए, ईश्वरीय विधान के अनुसार चलना चाहिए और ईश्वरीय विधान यही है कि तुम्हारी तरक्की होनी चाहिए, जीवन में उन्नति होनी चाहिए।

यदि आप ईमानदारी से, सजग होकर तरक्की करते हैं तो ईश्वरीय विधान आपकी मदद करता है और यदि आप उन्नति से मुँह मोड़ते हैं तो बड़ी हानि होती है। कालचक्र कभी रुकता नहीं है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी में भी तरक्की है। ये सब भी तरक्की करते करते मानव देह में आते हैं। जब मानव देह मिल गई, बुद्धि मिल गई, फिर भी आप विकसित नहीं हुए तो ईश्वरीय विधान आपको फिर से  चौरासी लाख योनियों में ढकेल देता है।

भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और कृपाचार्य जैसे लोग  भी अधर्म के पक्ष में होते हैं तो ईश्वरीय विधान उनको भी युद्ध के मैदान में ठिकाने लगा देता है।

कोई सोच सकता हैः “भगवान श्रीकृष्ण तो आये थे धर्म की स्थापना करने के लिए और इतने सारे लोग मारे गये ! सारे कौरव मारे गये ! अठारह अक्षौहिणी सेना खत्म हो गयी ! यह तो अधर्म हुआ….ʹ

नहीं, अधर्म नहीं हुआ। लगता तो है अधर्म हुआ लेकिन धर्म की स्थापना हुई। यदि दुर्योधन नहीं मरता, उसकी पीठ ठोकने वाले नहीं मरते और दुर्योधन जीत जाता तो अधर्म की जीत होती और धर्म का नाश हो जाता। भगवान श्रीकृष्ण ने अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना की। धर्म के अनुसार, ईश्वरीय विधान के अनुसार जीव की उन्नति में ही कल्याण है।

जीव की उन्नति का अवरोधक है जीव का इन्द्रियों की ओर खिंचाव, विषय-विकारों की तरफ उसका आकर्षण। जीव की तरक्की है धर्म, नियम और संयम में। ʹयह करना… यह नहीं करना….. इसका उपयोग करना…. इसका उपयोग नहीं करना….ʹ इस प्रकार के नियंत्रण करके जीव को संयमी बनाकर, अपने शिवस्वरूप में जगाने का विधान ही ईश्वरीय विधान है।

ईश्वरीय विधान का अल्लंघन करके ज्यों-ज्यों आदमी इन्द्रियों को पोसता है, किसी का शोषण करता है तो अशान्त और भयभीत रहता है और मरने के बाद भी घटीयंत्र की नाई जन्म-मरण के चक्र में फँसता है और दुःख सहता है। लेकिन ज्यों-ज्यों आदमी सीधे ढंग से, ईश्वरीय स्वभाव, ईश्वरीय ज्ञान, ईश्वरीय शांति की ओर चलने लगता है त्यों-त्यों उसका जीवन सहज और सरल हो जाता है।

सख्खर में विलायतराय नामक एक संत हो गये। वे सीधा-सादा गृहस्थ जीवन बिताते थे। गृहस्थ होते हुए भी ईश्वरीय विधान का पालन करते थे।

लीलाराम नाम के एक मुनीम पर पैसे की लेन-देने में हेराफेरी के गुनाह में अदालत में मुकद्दमा चल रहा था। लीलाराम बहुत घबराया और विलायतराय के चरणों में आकर खूब रोया और बोलाः

“महाराज ! मैं आपकी शरण आया हूँ। मुझे बचाओ। मैं दुबारा गलती नहीं करूँगा। न्यायाधीश सजा करके जेल में भेज दे उसकी अपेक्षा आप मुझे जो सजा देंगे, मैं स्वीकार कर लूँगा।”

संत विलायतराय का हृदय पिघल गया। वे बोलेः “अच्छा ! अब तू अपना केस रख दे उस शहनशाह परमात्मा पर। उन शहनशाह पर विश्वास रख। जिसके विधान का तूने उल्लंघन किया उसी की शरण हो जा।”

लीलाराम ने गुरु की बात मान ली। बस, जब देखो, तब ʹशहनशाह…. शहनशाह….।ʹ उसका मन शहनशाह में तदाकार हो गया।

लीलाराम मुकद्दमे के दिन पहुँचा अदालत में, तब न्यायाधीश ने पूछाः

“तुमने कितने पैसों का गोलमाल किया है ? सब सच-सच बता दो।”

लीलारामः “शहनशाह।”

“तेरा नाम क्या है ?”

“शहनशाह।”

“ऐसा क्यों किया ?”

“शहनशाह।”

सरकारी वकील ने खूब पूछताछ की लेकिन जवाब एक ही आता थाः

“शहनशाह।”

“यह अदालत है। ढोंग मत कर, नहीं तो तेरी खाल खींच लेंगे।” “शहनशाह।”

अनेक भय दिखाये लेकिन कोई फर्क नहीं। ईश्वरीय विधानः ʹमंत्र मूलं गुरोर्वाक्यम्ʹ में वह एकदम तदाकार हो गया… ध्यानस्थ हो गया।

लीलाराम को हथकड़ी पहनाकर सजा फरमाने की तैयारी की गयी लेकिन उस वक्त भी लीलाराम के मुख पर शोक न था। वह तो बस, ʹशहनशाह…. शहनशाह….ʹ की रट लगाये था।

जैसे अंतिम समय पर राष्ट्रपति का संदेश आ जाता है और सजा रूक जाती है वैसे ही परमात्मा की प्रेरणा से न्यायाधीश के मन में भी विचार आया कि ʹइतना अपमान करते हैं, इतनी गालियाँ देते हैं, सिपाही इतना तोछड़ा व्यवहार करते हैं फिर भी इसको कुछ असर नहीं होता ?” न्यायाधीश ने कहाः “कहाँ से पकड़ लाये इस पागल को ? यह केस रद्द है।”

लीलाराम छूट गया और आया विलायतराय के चरणों में। विलायतराय ने पूछाः “छूट गया केस से, बेटा ?”

लीलारामः “शहनशाह।”

“भूख लगी है ?”

“शहनशाह।”

गुरु ने देखा कि बिल्कुल सच्चाई से मेरे वचन लिये हैं… यह देखकर उनका हृदय प्रसन्न हो गया। उन्होंने अपने संकल्प से ʹशहनशाहʹ के भाव का नियंत्रण कर दियाः “अच्छा ! जब जरूरत पड़े तब बोलना-शहनशाह।”

फिर तो वह लीलाराम गुरु के आश्रम में ही रहने लगा।

अब लीलाराम से कोई कहे कि ʹपेट में दर्द हैʹ तो वह पेट पर हाथ घुमाकर कह देताः ʹशहनशाहʹ तो पेट का दर्द गायब हो जाता। कोई कहता कि ʹधन्धा नहीं चलता है।ʹ लीलाराम एक थप्पड़ मार देता और कहताः ʹशहनशाहʹ तो उसका धन्धा रोजगार चलने लगता।

धीरे-धीरे लोगों की भीड़ बढ़ने लगी। इधर लीलाराम को अपनी सफलता का अभिमान आ गया।

ईश्वरीय विधान पर चलने से कीर्ति तो मिलती है लेकिन कीर्ति में फँसना नहीं चाहिए, उससे भी आगे की उन्नति की ओर बढ़ना चाहिए। लीलाराम की मति बिगड़ी। लोगों का काम बन जाता तो वे लीलाराम के लिए कुछ-न-कुछ चीज वस्तुएँ लाने लगे। धीरे-धीरे लीलाराम नीचे गिरा और शराबी-कबाबी हो गया। इससे विलायतराय के हृदय को ठेस पहुँची।

गुरु इलाज तो बताते हैं, प्राणायाम आदि सिखाते हैं, आशीर्वाद देते हैं। उनमें जिसकी श्रद्धा होती है वह तो उन्नति की राह पर चल पड़ता है लेकिन जिसकी श्रद्धा इतनी न हो, अभिमान आ जाये तो वह वहीं का वहीं रह जाता है। शिष्य गुरु की आज्ञा मानकर चलता है तो गुरु का चित्त प्रसन्न हो जाता है और गुरु के चित्त की प्रसन्नता से शक्तियाँ विकसित होने लगती हैं। किन्तु उन शक्तियों का अभिमान आ जाने से गुरु के चित्त को अगर क्षोभ हो जाय तो शिष्य का अवश्य ही अमंगल होता है।

एक दिन विलायतराय कहीं जा रहे थे। रास्ते में ही लीलाराम की कुटिया आती थी। दो पाँच शिष्य भी साथ में थे। उन्होंने लीलाराम को भी साथ में ले लिया। मार्ग में नदी आने पर विलायतराय जी कहाः “अब हम नदी में स्नान करेंगे।”

सेवक ने साबुन व लोटा दिया। विलायतराय जी ने स्नान करते-करते लीलाराम से कहाः “तू भी गोता मार ले।”

लीलाराम जैसे ही गोता मारकर बाहर निकलता है तो क्या देखता है कि खुद लीलाराम से लीलाबाई बन गया ! आसपास तो न नदी है, न गुरुजी हैं, न कोई गुरुभाई है। अकेली सुंदरी लीलाबाई रह गई….! लीलाराम बहुत शरमिंदा हो गया कि ʹमैं लीलाराम…..! ʹशहनशाहʹ कहने वाला…. आज क्या बन गया हूँ !ʹ

उसी समय वहाँ चार चाण्डाल आये और पूछने लगेः “क्योंरी ! इधर बैठी है अकेली ?”

अब वह कैसे बोले कि ʹमैं लीलाराम हूँ।ʹ यह तो संत विलायतराय जी का चमत्कार था। जैसे श्रीकृष्ण ने नारदजी को नारदी बना दिया था, ऐसे ही उन्होंने लीलाराम में से लीलाबाई बना दिया।

चारों चाण्डाल आपस में झगड़ा करने लगे लीलाबाई के साथ शादी करने के लिए। आखिर चारों में से जो ज्यादा बलवान था उसके साथ लीलाबाई का गंधर्व विवाह हो गया।

समय बीता। लीलाबाई को तीन बेटे हुए, तीन बेटियाँ हुई। बेटियों की शादी चाण्डालों के घर में हुई। परिवार बढ़ता गया…। सुख-दुःख के प्रसंग आते-जाते रहे। लीलाबाई साठ साल की बूढ़ी हो गई। बहुत सारे दुःख भोगे। पति मर गया तो वह अपना सिर कूटने लगीः

ʹहाय राम ! मैं विधवा हो गयी। हे भगवान ! मैं क्या करूँ ? तुम मुझे भी अपने पास बुला लो….ʹ

ऐसा करते-करते जैसे ही आँखें खोली तो वही नदी और वही स्नान ! गुरु जी, गुरुभाई सब उपस्थित थे। लीलाराम चकित हो गया कि ʹमैं लीलाबाई बन गया था, मेरे इतने बेटे-बेटियाँ हुए, साठ साल का चाण्डाली का जीवन देखा, मेरा चाण्डाल पति मर गया….. और यहाँ तो अभी स्नान भी पूरा नहीं हुआ है ! यह सब क्या है ?

विलायतराय मुस्कराते हुए बोलेः

“देख ! शूली में से काँटा हो गया। तेरा चाण्डाल होने का प्रारब्ध तो कट गया, तेरी पहले की गयी भक्ति से, पश्चाताप से। लेकिन अब तेरे पास पहले जैसी शक्ति नहीं रहेगी। वैद्य का धन्धा करके अपना गुजारा करते रहना। आज के बाद मुझे मुँह मत दिखाना।”

ईश्वरीय विधान का हम आदर करते हैं तो उन्नति होती है और अनादर करते हैं तो अवनति होती है। ईश्वरीय विधान का आदर यह है कि हमारे पास जो कुछ भी है वह सब हमारा व्यक्तिगत नहीं है। सब उस जगन्नियंता का है लेकिन जब हम ʹहमारा है….. हमारे लिए हैʹ ऐसा मानने लगते हैं, तब ईश्वरीय विधान का अऩादर करते हैं। फलस्वरूप दण्ड के रूप में दुःख, चिन्ता, क्लेश शुरु हो जाते हैं।

बाह्य वस्तुओं से अगर कोई सुखी होना चाहता है तो समझो कि तिनखों के ढेर को जलाकर उससे ठंडक पाना चाहता है अथवा तो आग को पेट्रोल के फुहारे से बुझाना चाहता है। बाह्य वस्तुओं से आज तक कोई भी न तो पूर्ण सुखी हुआ है और न होगा। यदि मनुष्य ने पूर्ण सुख पाया है तो वह केवल अपने अंतरात्मादेव में विश्रांति पाकर ही… और अंतरात्मा में विश्रांति पायी जा सकती है केवल ईश्वरीय विधान का आदर करके ही।

मुझे एक अधिकारी ने बतायाः “एक संत के लिए षडयंत्र रचने वाले कुछ लोगों में एक पुलिस अधिकारी (D.S.P.) का विशेष योगदान था और अन्ततः वह D.S.P. गोधरा (पंचमहाल, गुजरात) के जंगलों में बंदूकधारी अंगरक्षकों के होते हुए भी एक बघेड़े का (चित्ते का) शिकार हो गया।

एक संत पर मिथ्या आरोप लगाने में क्रूर भूमिका अदा करने वाली उस टुकड़ी के D.S.P.  को जंगल में बघेड़े से बचाने के लिए अंगरक्षक ने गोली चलायी लेकिन गोली बघेड़े को न लगी और बघेड़े का शिकार हो गया D.S.P.  ।

मुझे बताया गयाः “बापू जी ! अब उसे बघेड़ा बनना पड़ेगा क्योंकि मरते समय बघेड़े का चिंतन करते हुए मरा है। जंगलों में भटकेगा, जंगली प्राणियों का चिन्तन करता मरेगा और कई दुष्ट योनियों में जायेगा।”

अतः कर्म करने में मनुष्य यदि ईश्वरीय विधान का अनादर कर क्रूरता करता है तो कुदरत भी उसे देर-सबेर नीच गति में धकेलकर क्रूरता का मजा चखाती है।

अतः सावधान ! अपने से ऐसे कर्म न हों जिसमें ईश्वरीय विधान का अनादर हो हमें जंगली जानवर अथवा पेड़े-पौधे बनकर सूख-सूखकर मरना पड़े।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 1996, पृष्ठ संख्या 11,12,13,14 अंक 46

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गुरुदेव के दिये हुए गुरुमंत्र का अमोघ प्रभाव


आत्मारामी संत पूज्य बापू जी के आशीर्वाद से ही मुझे पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। उसका नाम नारायण रखा । पूरे परिवार में एक खुशी की लहर दौड़ गई। मैंने मन ही मन पूज्य गुरुदेव की पूजा-अर्चना की। मैं खुशी से फूली न समा रही थी।

मैंने सुना था कि कोई आत्मवेत्ता संत अपनी आत्मानंद की मस्ती में गोता लगाकर जो बोल देते हैं वह पत्थर पर लकीर हो जाता है। पूज्य बापू जी के द्वारा पुत्रप्राप्ति के लिए दिये गये प्रसाद के एक साल बाद मैं पूज्य गुरुदेव की कृपा को नवजात शिशु के रूप में प्रत्यक्ष देख रही थी।

लेकिन सब एक दिन से नहीं रहते।

कुछ दिन बीते कि अचानक दिनांकः 24-7-96 को नारायण का स्वास्थ्य बिगड़ा। उसको अस्पताल में दाखिल किया। डॉक्टर ने सभी परीक्षण करके बताया कि आपके पुत्र को जहरी मलेरिया हो गया।

डॉक्टर ने तत्काल दवा व इंजैक्शन आदि से उसका उपचार आरम्भ किया लेकिन जैसे-जैसे समय गुजरता जा रहा था। वैसे-वैसे उसकी तबीयत बिगड़ती ही जा रही थी। डॉक्टर ने आशा छोड़ दी थी, फिर भी प्रयत्न चालू रखा था।

नारायण के मस्तिष्क में मलेरिया का बुरा असर हो चुका था। सारे शरीर में तनाव शुरु हो गया।  पूरा शरीर अकड़ गया। नाड़ी की धड़कनें बढ़ गयीं। मुँह से झाग आना शुरु हो गया। फिर एकाएक उसका शरीर ठंडा हो गया। हृदय की धड़कनें सी बंद हो गयीं। शरीर निस्तेज हो गया। गर्दन एक ओर झुक गयी। मैं फफककर रो पड़ी। मैं उस विधि के विधान के आगे कर भी क्या सकती थी ? अब सिर्फ एक ही रास्ता था।

मैंने उस निस्तेज शरीर के सामने बैठकर गुरुमंत्र का जप शुरु कर दिया। दृढ़ संकल्प किया कि मेरा बच्चा ठीक हो जायेगा तो श्री आसारामायण का पाठ करूँगी। दूसरी तरफ मेरी बेटी ने श्रीमदभगवदगीता के 18 वें अध्याय का पाठ प्रारंभ कर दिया था। पाठ पूरा होते ही उसने गुरुमंत्र का जप शुरु किया व सामने कटोरी में रखे पानी में निहारा। फिर वही पानी गुरु मंत्र का जप करते-करते नारायण पर छाँटा।

आश्चर्य !

बच्चे के शरीर में थोड़ी हलचल हुई। इस हलचल को देखकर हमारे हृदयों में कुछ आशाओं का संचार हुआ। कुछ ही क्षणों में नारायण ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। शरीर में एक दिव्य चेतना का संचार हुआ। मेरी आँखों से आनंदाश्रुओं की अविरत धारा बह निकली।

जिनके कृपा-प्रसाद से उसे यह जन्म मिला, उन्हीं की करूणा-कृपा से उसे नया जीवनदान मिला। मैं आज ऐसे सदगुरुदेव के सत्संग सान्निध्य व मंत्रदीक्षा के कारण मिले धैर्य, श्रद्धा, भक्ति के कारण अपने आप में धन्यता का अनुभव कर रही हूँ।

चंद्रिकाबहन प्रवीणचंद पांचाल, लुणावाड़ा, पंचमहाल।

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विपत्ति में गुरुदेव की दिव्य प्रेरणा ने बचाया

मैं राजेन्द्र प्रसाद शर्मा मन्डी बोर्ड उज्जैन में सब इंजीनियर पद पर कार्यरत हूँ। दिनांक 4 अप्रैल 96 को रात्रि करीब 10-30 बजे हरदा इन्दौर मार्ग पर चापड़ा से इन्दौर के लिए टैक्सी से रवाना हुआ। साथ में मेरे एक करीबी मित्र भी थे। रास्ते में टैक्सी का टायर पंक्चर हुआ। ड्रायवर ने पच्चीस-तीस मिनट के श्रम से टायर बदल दिया। रात्रि के 11 बज चुके थे। वहाँ से चार-पाँच कि.मी. ही चले थे कि हम पर विपत्तियों का पहाड़ टूटा। जंगल में घाट पर करनावद फाटा से चढ़ते ही कंजरों ने गाड़ी को घेर लिया और पत्थर बरसाने लगे। हमने टैक्सी भगानी चाही लेकिन सड़क पर झाड़-झंखार डाल रखे थे। अब क्या होगा ? मेरे मन में तुरंत विचार आयाः अपने रक्षक तो पूज्य सदगुरुदेव हैं। मैंने मौन होकर बापू को याद कियाः प्रभु ! मैं तो बस, आपका ही हूँ।

तेरे फूलों से भी प्यार तेरे काँटों से भी प्यार।

जो भी देना चाहे दे दे किरतार।।

ग्वालियर सत्संग-कार्यक्रम में पूज्य बापू ने प्रपत्तियोग का समर्पण भाव बताया थाः ʹतेरा हूँ… तेरा हूँ….ʹ बस फिर क्या था ? ʹतेरा हूँ…ʹ की महिमा याद आ गई। मेरे मुँह से निकल पड़ाः

“ड्राइवर ! गाड़ी को झाड़-झंखार के ऊपर से ही कुदा दो।”

वही हुआ। गाड़ी वहाँ से ऐसे दौड़ी कि गाँव की चौकी पर ही जाकर रुकी। हमने रिपोर्ट लिखाई। पुलिस स्थल घटना स्थल को रवाना हुआ और हम अपने सफर में चल पड़े। दूसरे दिन 5 अप्रैल को इन्दौर से प्रकाशित सभी समाचार पत्रों में छपा था कि उस रास्ते आ रही शिवशक्ति बस को लूटा गया। हम दोनों मित्र एक दूसरे की ओर देखने लगे क्योंकि वह बस हमारे पीछे-पीछे ही आ रही थी।

गुरुदेव  कृपा से हम विपत्तियों से किस तरह बचे यह पूरा-पूरा वर्णन करना हमारे बस की बात नहीं। मैं तो बस, इतना ही कहूँगा कि विपत्ति में पूरी श्रद्धा से ऐसे आत्मारामी संतों का स्मरण करने पर दिव्य प्रेरणा मिलती ही है। श्रद्धाहीन, नास्तिक निगुरे बेचारे क्या जानें ?

गुरुदेव का चरणसेवक,

राजेन्द्र प्रसाद शर्मा, 2/6, अलखधाम नगर, उज्जैन (म.प्र.)

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