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Sharir Swasthya

स्वास्थ्य व पर्यावरण सुरक्षा का अमोघ उपायः गाय का घी


देशी गाय का घी शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक विकास एवं रोग-निवारण के साथ पर्यावरण-शुद्धि का एक महत्त्वपूर्ण साधन है।

इसके सेवन से-

बल, वीर्य व आयुष्य बढ़ता है, पित्त शांत होता है।

स्त्री एवं पुरुष संबंधी अनेक समस्याएँ भी दूर हो जाती हैं।

अम्लपित्त (एसिडिटी) व कब्जियत मिटती है।

एक गिलास दूध में एक चम्मच गोघृत और मिश्री मिलाकर पीने से शारीरिक, मानसिक व दिमागी कमजोरी दूर होती है।

युवावस्था दीर्घकाल तक रहती है। काली गाय के घी से वृद्ध व्यक्ति भी युवा समान हो जाता है।

गर्भवती माँ घी-सेवन करे तो गर्भस्थ शिशु बलवान, पुष्ट और बुद्धिमान बनता है।

गाय के घी का सेवन हृदय को मजबूत बनाता है। यह कोलेस्ट्रोल को नहीं बढ़ाता। दही को मथनी से मथकर बनाये गये मक्खन से बना घी हृदयरोगों  भी लाभदायी है।

देशी गाय के घी में कैंसर से लड़ने व उसकी रोकथाम की आश्चर्यजनक क्षमता है।

ध्यान दें- घी के अति सेवन से अजीर्ण होता है। प्रतिदिन 10 से 15 ग्राम घी पर्याप्त है।

नाक में घी डालने से-

मानसिक शांति व मस्तिष्क को शांति मिलती है। स्मरणशक्ति वे नेत्रज्योति बढ़ती है। आधासीसी (माइग्रेन) में राहत मिलती है।

नाक की खुश्की मिटती है।

बाल झड़ना व सफेद होना बंद होकर नये बाल आने लगते हैं।

शाम को दोनों नथुनों में 2-2 बूँद गाय का घी डालने तथा रात को नाभि व पैर के तलुओं में गोघृत लगाकर सोने से गहरी नींद आती है।

मात्रा 4 से 8 बूँद।

गोघृत से करें वातावरण शुद्ध व पवित्र

अग्नि में गाय के घी की आहुति देने से उसका धुआँ जहाँ तक फैलता है, वहाँ तक सारा वातावरण प्रदूषण और आण्विक विकिरणों से मुक्त हो जाता है। मात्र 1 चम्मच गोघृत की आहुति देने से एक टन प्राणवायु (आक्सीजन) बनती है, जो अन्य किसी भी उपाय से सम्भव नहीं है।

गोघृत और चावल की आहुति देने से कई महत्त्वपूर्ण गैसे जैसे – आक्साइड, प्रोपिलीन आक्साइड, फार्मल्डीहाइड आदि उत्पन्न होती हैं। इथिलीन आक्साइड गैस आजकल सबसे अधिक प्रयुक्त होने वाली जीवाणुरोधक गैस है, जो शल्य चिकित्सा (आपरेशन) से लेकर जीवनरक्षक औषधियाँ बनाने तक में उपयोगी है।

मनुष्य शरीर में पहुँचे रेडियोधर्मी विकिरणों का दुष्प्रभाव नष्ट करने की असीम क्षमता गोघृत में है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2013, अंक 249

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आयु अनुसार विशेष आहार


शरीर को स्वस्थ व मजबूत बनाने के लिए प्रोटीन्स, विटामिन्स व खनिज (Minerals) युक्त  पोषक पदार्थों की आवश्यकता जीवनभर होती है। विभिन्न आयुवर्गों हेतु विभिन्न पोषक तत्त्व जरूरी होते हैं, किस उम्र में कौन-सा तत्त्व सर्वाधिक आवश्यक है यह दिया जा रहा है।

जन्म से लेकर 5 वर्ष की आयु तकः इस उम्र में बच्चों के स्वस्थ शरीर तथा मजबूत हड्डियों के लिए विटामिन ʹडीʹ जो कैल्शियम ग्रहण करने में मदद करता है व लौह तत्त्व अत्यावश्यक होता है। विटामिन ʹडीʹ की पूर्ति में दूध, घी, मक्खन, गेहूँ, मक्का जैसे पोषक पदार्थ तथा प्रातःकालीन सूर्य की किरणें दोनों अत्यंत मददरूप होते हैं। किसी एक की भी कमी होने से बच्चों की हड्डियाँ कमजोर व पतली रह जाती हैं, वे सूखा रोग से ग्रस्त हो जाते हैं। लौह तत्त्व की कमी से बुद्धि का स्तर भी कम रहता है, अतः स्तनपान छुड़ाने के बाद बच्चों के आहार में लौह व विटामिन ʹडीʹ युक्त पदार्थ जरूर शामिल करने चाहिए।

6 से 19 वर्ष की आयु तकः 6 से 12 वर्ष की आयु बाल्यावस्था और 13 से 19 वर्ष की आयु किशोरावस्था है। इस आयु में शरीर तथा हड्डियों का तेजी से विकास होता है इसलिए कैल्शियम की परम आवश्यकता होती है। बड़ी उम्र में हड्डियों की मजबूती इस आयु में लिए गये कैल्शियम की मात्रा पर निर्भर रहती है। दूध, छाछ, दही, मक्खन, तिल, मूँगफली, अरहर, मूँग, पत्तागोभी, गाजर, गन्ना, संतरा, शलजम, सूखे मेवों व अश्वगंधा में कैल्शियम खूब होता है। आहार-विशेषज्ञों के अनुसार इस आयुवर्ग को कैल्शियम की आपूर्ति के लिए प्रतिदिन एक गिलास दूध अवश्य पीना चाहिए।

इस उम्र में लौह की कमी से बौद्धिक व शारीरिक विकास में रूकावट आती है। राजगिरा, पालक, मेथी, पुदीना, चौलाई आदि हरी सब्जियों एवं खजूर, किशमिश, मुनक्का, अंजीर, काजू, खुरमानी आदि सूखे मेवों तथा करेले, गाजर, टमाटर, नारियल, अंगूर, अनार, अरहर, चना, उड़द, सोयाबीन आदि पदार्थों के उपयोग से लौह तत्त्व की आपूर्ति सहजता से की जा सकती है।

किशोरावस्था में प्रजनन क्षमता के विकास हेतु जस्ता () एक महत्त्वपूर्ण खनिज है। सभी अनाजों में यह पाया जाता है। इस आयु में खनिज की कमी से  बालकों का स्वभाव हिंसक व क्रोधी हो जाता है तथा बालिकाओं में भूख की कमी एवं मानसिक तनाव पैदा होता है। अनाज, दालों, सब्जियों व कंदमूलों (गाजर, शकरकंदी, मूली, चुकन्दर आदि) में खनिज विपुल मात्रा में होते हैं।

20 से 30 वर्ष की आयु तकः इस युवावस्था में सर्वाधिक आवश्यकता होती लौह तत्त्व, एंटी-ऑक्सीडैन्टस, फॉलिक एसिड तथा विटामिन ʹईʹ व ʹसीʹ की।

लौह तत्त्वः मासिक धर्म के कारण पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को लौह तत्त्व की दोगुना जरूरत होती है।

एंटी-ऑक्सीडैंट्सः कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त होने से बचाने हेतु तथा स्त्री-पुरुषों के प्रजनन-संस्थान को स्वस्थ बनाये रखने के लिए एंटी-ऑक्सीडेन्टस आवश्यक होते हैं। आँवला, मुनक्का, अंगूर, अनार, सेवफल, जामुन, बेर, नारंगी, आलूबुखारा, स्ट्राबेरी, रसभरी, पालक, टमाटर में एंटी-आक्सीडेंट्स अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। फलों के छिलके व बिना पकाये पदार्थ जैसे सलाद चटनी आदि में भी ये विपुल मात्रा में होते हैं। अन्न को अधिक पकाने से वे घट जाते हैं।

फॉलिक ऐसिड- महिलाओं में युवावस्था में प्रारम्भिक गर्भावस्था में फॉलिक एसिड की भी आवश्यकता होती है। यह फूलगोभी, केला, संतरा, सेम पत्तेदार हरी सब्जियों, खट्टे-रसदार फलों, आड़ू, मटर, पालक, फलियों व शतावरी आदि में पाया जाता है।

विटामिन ʹʹपुरुषों में पुंसत्वशक्ति व स्त्रियों में गर्भधारण क्षमता बनाये रखने के लिए इसकी आवश्यकता होती है। यह हृदय व रक्तवाहिनियों को स्वस्थ रखकर रक्तदाब नियंत्रित रखता है। इससे गम्भीर हृदयरोगों से रक्षा होती है। अंकुरित अनाज, वनस्पतिजन्य तेल (तिल, मूँगफली, सोयाबीन, नारियल तेल आदि) व सूखे मेवे विटामिन ई के अच्छे स्रोत हैं। एक चुटकी तुलसी के बीज रात को भिगोकर सुबह सेवन करने से भी विटामिन ई प्राप्त होता है।

विटामिन ʹसीʹरक्त को शुद्ध व रक्तवाहिनियों को लचीला बनाये रखने के तथा हड्डियों की मजबूती के लिए यह आवश्यक है। संतरा, आँवला, नींबू, अनानास, आदि खट्टे व रसदार फल, टमाटर, मूली, पपीता, केला, अमरूद, चुकंदर आदि में यह अच्छी मात्रा में पाया जाता है।

31 से 50 वर्ष की आयु तकः इस प्रौढ़ावस्था के दौरान कैल्शियम, विटामिन ई और फॉलिक एसिड की आवश्यकता अधिक होती है। फॉलिक एसिड व विटामिन ई हृदयरोगों की सम्भावनाओं को कम करते हैं

महिलाओं में रजोनिवृत्ति के बाद इस्ट्रोजन हार्मोन स्रावित होना बंद हो जाता है, जिसके अभाव में कैल्शियम का अवशोषण मंद पड़ जाता है, अतः रजोनिवृत्ति के बाद हड्डियों को कमजोर होने से बचाने के लिए कैल्शियमयुक्त पदार्थों की जररूत अधिक होती है।

51 से 70 वर्ष या इससे ऊपर की आयुः इस उम्र के दौरान कोशिकाओं में होने वाले वार्धक्यजन्य परिवर्तनों को रोकने के लिए एंटी-आक्सीडेंट्स सहायक तत्त्व हैं। इनके अभाव में लकवा, हृदयरोग तथा ज्ञानतंतु व ज्ञानेन्द्रियों की दुर्बलता एवं कैंसर होने की सम्भावना अधिक होती है। वृद्धावस्था में रक्तचाप को सामान्य रखने में पोटाशियमयुक्त पदार्थ लाभदायी हैं। फलों और सब्जियों, खुरमानी, आलूबुखारा, आड़ू, मुनक्का, खजूर, सूखे नारियल आदि में पोटाशियम समुचित मात्रा में मौजूद होता है। इस आयु में दूध, फल और सब्जियों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।

इस प्रकार आयु अनुसार आहार लेने से व्यक्ति स्वस्थ रोगमुक्त रहता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2013, पृष्ठ संख्या 30,31 अंक 248

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शरीर शुद्धिकर फलः नींबू


नींबू अनुष्ण अर्थात् न अति उष्ण है, न अति शीत। यह उत्तम जठराग्निवर्धक, पित्त व वातशामक, रक्त, हृदय व यकृत की शुद्धि करने वाला, कृमिनाशक तथा पेट के लिए हितकारी है। हृदयरोगों को ठीक करने के लिए यह अंगूर से भी अधिक गुणकारी सिद्ध हुआ है। इसमें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध विटामिन ʹसीʹ शरीर की रोगप्रतिकारक शक्ति को बढ़ाता है।

आधुनिक खानपान, मानसिक तनाव एवं प्रदूषित वातावरण से शरीर में सामान्य मात्रा से कहीं अधिक अम्ल (एसिड) उत्पन्न होता है, जिसके शरीर पर होने वाले परिणाम अत्यंत घातक हैं। यह अतिरिक्त अम्ल कोशिकाओं को क्षति पहुँचाकर अकाल वार्धक्य व धातुक्षयजन्य रोग  उत्पन्न करता है।

नींबू स्वाद में अम्ल में परन्तु पाचन के उपरान्त इसका प्रभाव मधुर हो जाता है। यह माधुर्य अम्लता को आसानी से नष्ट कर देता है। एक गिलास गर्म पानी में एक नींबू व 25 तुलसी के पत्तों का रस मिला के हफ्ते में 2 से 4 दिन पीने से शरीर में संचित विषाक्त द्रव्य, हानिकारक जीवाणु व अतिरिक्त चर्बी नष्ट होकर कई गम्भीर रोगों से रक्षा होती है।

डॉ. रेड्डी मेलर के अनुसार ʹकुछ दिन ही नींबू का सेवन रक्त को शुद्ध करने में अत्यधिक मदद करता है। शुद्ध रक्त शरीर को खूब स्फूर्ति व मांसपेशियों को नयी ताकत देता है।ʹ

औषधीय प्रयोग

अम्लपित्त (एसिडिटी)- नींबू पानी में मिश्री व सेंधा नमक मिला के पीने से अम्लपित्त में राहत मिलती है। रोग पुराना हो तो गुनगुने पानी में नींबू निचोड़कर सुबह खाली पेट कुछ दिनों तक नियमित लेना चाहिए।

पेट की गड़बड़ियाँ- भोजन से पूर्व नींबू, अदरक व सेंधा नमक का उपयोग अरुचि, भूख की कमी, गैस, कब्ज, उलटी व पेटदर्द में लाभदायी है।

यूरिक एसिड की वृद्धिः राजमा, उड़द, पनीर जैसे अधिक प्रोटीनयुक्त पदार्थों का अति  सेवन करने से शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे जोड़ों में खासकर एड़ी में दर्द होने लगता है। सुबह खाली पेट गुनगुने पानी में नींबू का रस लेने से यह यूरिक एसिड पेशाब के द्वारा निकल जाता है। इसमें नींबू की आधी मात्रा में अदरक का रस मिलाना विशेष लाभदायी है।

मुँह के रोगः नींबू मुँह में कीटाणुओं की वृद्धि को रोकता है। भोजन के बाद नींबू-पानी से कुल्ला करने से मुँह की दुर्गन्ध ठीक हो जाती है।

विटामिन ʹसीʹ की कमी से होने वाले स्कर्वी रोग में मसूड़ों से खून आने लगता है, दाँत हिलने लगते हैं। कुछ दिनों तक नींबू के सेवन से व एक नींबू के रस को एक कटोरी पानी में मिलाकर कुल्ले करने से इसमें लाभ होता है। नींबू का छिलका मसूड़ों पर घिसने से मसूड़ों से मवाद आना बंद हो जाता है।

पेशाब की जलनः मिश्रीयुक्त नींबू पानी उपयुक्त है।

हैजाः नींबू का रस हैजे को कीटाणुओं को शीघ्रता से नष्ट करता है।

उपवास के दिन गुनगुने पानी में नींबू का रस व शहद मिला के पीने से शरीर की शुद्धि होकर स्फूर्ति आती है।

रस की मात्राः 5 से 10 मि.ली.

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2013, पृष्ठ संख्या 32, अंक 247

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