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Sharir Swasthya

शरद ऋतु में पथ्य-अपथ्य


(शरद ऋतुः 22 अगस्त 2012 से 21 अक्तूबर 2012 तक)

शरद ऋतु में पित्त कुपित व जठराग्नि मंद रहती है, जिससे पित्त-प्रकोपजन्य अनेक व्याधियाँ उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है। अतः इस ऋतु में पित्तशामक आहार लेना चाहिए।

पथ्य आहारः इस ऋतु में मधुर, कड़वा, कसैला, पित्तशामक तथा लघु मात्रा में आहार लेना चाहिए। अनाजों में जौ, मूँग, सब्जियों में पका पेठा, परवल, तोरई, गिल्की, पालक, खीरा, गाजर, शलगम, नींबू, मसालों में जीरा, हरा धनिया, सौंफ, हल्दी, फलों में अनार, आँवला, अमरूद, सीताफल, संतरा, पका पपीता, गन्ना, सूखे मेवों में अंजीर, किशमिश, मुनक्का, नारियल सेवनीय हैं। घी व दूध उत्तम पित्तशामक हैं।

शरद पूनम की रात को चन्द्रमा की शीतल चाँदनी में रखी दूध-चावल की खीर पित्तशामक, शीतल व सात्त्विक आहार है।

हितकर विहारः शरद ऋतु में रात्रि-जागरण व रात्रि-भ्रमण लाभदायी है। रात्रि जागरण 12 बजे तक ही माना जाता है। अधिक जागरण कर दिन में सोने से त्रिदोष प्रकुपित होते हैं।

त्याज्य आहार-विहारः पित्त को बढ़ाने वाले खट्टे, खारे, तीखे, तले, पचने में भारी पदार्थ, बाजरा, उड़द, बैंगन, टमाटर, मूँगफली, सरसों, तिल, दही, खट्टी छाछ आदि के सेवन से बचें। अधिक भोजन, अधिक उपवास, अधिक श्रम, दिन में शयन, धूप का सेवन आदि वर्जित है।

कुछ विशेष प्रयोगः

पित्तजन्य विकारों से रक्षा हेतु हरड़ में समभाग मिश्री मिलाकर दिन में 1-2 बार सेवन करें। इससे रसायन के लाभ भी प्राप्त होते हैं।

धनिया, सौंफ, आँवला व मिश्री समभाग लेकर पीस लें। 1 चम्मच मिश्रण 2 घंटे पानी में भिगोकर रखें फिर मसलकर पियें। इससे अम्लपित्त (एसिडिटी), उलटी, बवासीर, पेशाब व आँखों में जलन आदि पित्तजन्य अनेक विकार दूर होते हैं।

एक बड़ा नींबू काटकर रात भर ओस में पड़ा रहने दें। सुबक उसका शरबत बनाकर उसमें काला नमक डाल के पीने से कब्ज दूर होता है।

दस्त लगने पर सौंफ व जीरा समभाग लेकर तवे पर भून लें। 3 ग्राम चूर्ण दिन में तीन बार पानी के साथ लें। खिचड़ी में गाय का शुद्ध घी डाल के खाने से भी दस्त में आराम होता है।

पापनाशक, बुद्धिवर्धक स्नान

(पूज्य बापू जी की अमृतवाणी)

जो लोग साबुन या शैम्पू से नहाते हैं वे अपने दिमाग के साथ अन्याय करते हैं। इनसे मैल तो कटता है लेकिन इनमें प्रयुक्त रसायनों से बहुत हानि होती है। तो किससे नहायें ?

नहाने का साबुन तो लगभघ 125 से 200 रूपये किलो मिलता है। मैं तुमको घरेलु उबटन बनाने की युक्ति बताता हूँ। उससे नहाओगे तो साबुन से नहाने से सौ गुना ज्यादा फायदा होगा और सस्ता भी पड़ेगा। जो आप कर सकते हो, जिससे आपको फायदा होगा मैं वही बताता हूँ।

गेहूँ, चावल, जौ, तिल, चना, मूँग और उड़द – इन सात चीजों को समभाग लेकर पीस लो। फिर कटोरी में उस आटे का रबड़ी जैसा घोल बना लो। उसे सबसे पहले थोड़ा सिर पर लगाओ, ललाट पर त्रिपुंड लगाओ, बाजुओं पर, नाभि पर, बाद में सारे शरीर पर मलकर 4-5 मिनट रूक के सूखने के बाद स्नान करो। यह पापनाशक और बुद्धिवर्धक स्नान होगा। इससे आपको उसी दिन फायदा होगा। आप अनुभव करेंगे की ʹआहा ! कितना आनंद, कितनी प्रसन्नता ! इतना फायदा होता है !ʹ

होली, शिवरात्रि, एकादशी, अमावस्या या अपने जन्मदिन पर देशी गाय का मूत्र और गोबर अथवा केवल गोमूत्र रगड़कर स्नान करने से पाप नष्ट और स्वास्थ्य बढ़िया होता है। अगर गोमूत्र से सिर के बालों को भिगोकर रखें और थोड़ी देर बाद धोयें तो बाल रेशम जैसे मुलायम होते हैं।

गोदुग्ध से बने दही को शरीर पर रगड़कर स्नान करने से रूपये-पैसे में बरकत आती है, रोजी-रोटी का रास्ता निकलता है।

पुष्टिदायक सिंघाड़ा

सिंघाड़ा आश्विन-कार्तिक (अक्तूबर नवम्बर) मास में आने वाला एक लोकप्रिय फल है। कच्चे सिंघाड़े को दुधिया सिंघाड़ा भी कहते हैं। अधिकतर इसे उबाल कर खाया जाता है। सिंघाड़े को फलाहार में शामिल किया गया है अतः इसकी मींगी सुखा-पीसकर आटा बना के उपवास में सेवन की जाती है।

100 ग्राम सिंघाड़े में पोषक तत्त्वः

  ताजा सिंघाड़ा सूखा सिंघाड़ा
प्रोटीन (ग्राम) 4.7 13.4
कार्बोहाइड्रेटस (ग्राम) 23.3 69.8
कैल्शियम (मि.ग्रा.) 20 70
फास्फोरस (मि.ग्रा.) 150 440
आयरन (मि.ग्रा.) 1.35 2.4

साथ ही इसमें भैंस के दूध की तुलना में 22 प्रतिशत अधिक खनिज व क्षार तत्त्व पाये जाते हैं।

दाह, रक्तस्राव, प्रमेह, स्वप्नदोष, शरीर के क्षय व दुर्बलता में तथा पित्त प्रकृतिवालों को विशेष रूप से इसका सेवन करना चाहिए।

औषधि-प्रयोग

गर्भस्थापक व गर्भपोषकः सिंघाड़ा सगर्भावस्था में अत्यधिक लाभकारी होता है। यह गर्भस्थापक व गर्भपोषक है। इसका नियमित और उपयुक्त मात्रा में सेवन गर्भस्थ शिशु को कुपोषण से बचाकर स्वस्थ व सुंदर बनाता है। यदि गर्भाशय की दुर्बलता या पित्त की अधिकता के कारण गर्भ न ठहरता हो, बार-बार गर्भस्राव या गर्भपात हो जाता हो तो सिंघाड़े के आटे से बने हलवे का सेवन करें।

श्वेतप्रदर व रक्तप्रदरः श्वेतप्रदर में पाचनशक्ति के अनुसार 20-30 ग्राम सिंघाड़े के आटे से बने हलवे तथा रक्तप्रदर में इसके आटे से बनी रोटियों का सेवन करने से रोगमुक्ति के साथ शरीर भी पुष्ट होता है।

मूत्रकृच्छता, पेशाब की जलन व मूत्रसंबंधी अन्य बीमीरियों में सिंघाड़े के क्वाथ का प्रयोग लाभकारी है।

धातु-दौर्बल्यः इसमें 5 से 10 ग्राम सिंघाड़े का आटा गुनगुने मिश्रीयुक्त दूध के साथ सेवन करने से पर्याप्त लाभ होता है।

सिंघाड़ा ज्ञानतंतुओं के लिए विशेष बलप्रद है।

दाह, ज्वर, रक्तपित्त या बेचैनीः इनमें प्रतिदिन पाचनशक्ति के अनुसार 10-20 ग्राम सिंघाड़े के रस का सेवन करें।

मात्राः सिंघाड़ा सेवन की उचित मात्रा 3 से 6 ग्राम है।

सावधानियाँ- सिंघाड़ा पचने में भारी होता है, अतः उचित मात्रा में ही इसका सेवन करना चाहिए। वात और कफ प्रकृति के लोग इसका सेवन अल्प मात्रा में करें।

कच्चा व आधा उबला सिंघाड़ा न खायें।

सिंघाड़ा खाकर तुरंत पानी न पियें। कब्ज हो तो इसका सेवन न करें।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2012, पृष्ठ संख्या 29, 30 अंक 237

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वर्षा ऋतु में लाभदायी अजवायन


अजवायन उष्ण, तीक्ष्ण, जठराग्निवर्धक, उत्तम वायु व कफनाशक, आमपाचक व पित्तवर्धक है। वर्षा ऋतु में होने वाले पेट के विकार, जोड़ों के दर्द, कृमिरोग तथा कफजन्य विकारों में अजवायन खूब लाभदायी है।

अजवायन में थोड़ा-सा काला नमक मिलाकर गुनगुने पानी के साथ लेने से मंदाग्नि, अजीर्ण, अफरा, पेट का दर्द एवं अम्लपित्त (एसिडिटी) में राहत मिलती है।

भोजन के पहले कौर के साथ अजवायन खाने से जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है। संधिवात और गठिया में अजवायन के तेल की मालिश खूब लाभदायी है।

तेल बनाने की विधिः 250 ग्राम तिल के तेल को गर्म करके नीचे उतार लें। उसमें 15 से 20 ग्राम अजवायन डालकर कुछ देर तक ढक के रखें फिर छान लें, अजवायन का तेल तैयार ! इससे दिन में दो बार मालिश करें।

अधिक मात्रा में बार-बार पेशाब आता हो तो अजवायन और तिल समभाग मिलाकर दिन में एक से दो बार खायें।

मासिक धर्म के समय पीड़ा होती हो तो 15 से 30 दिनों तक भोजन के बाद या बीच में गुनगुने पानी के साथ अजवायन लेने से दर्द मिट जाता है। मासिक अधिक आता हो, गर्मी अधिक हो तो यह प्रयोग न करें। सुबह खाली पेट 2-4 गिलास पानी पीने से अनियमित मासिक स्राव में लाभ होता है।

उलटी में अजवायन और एक लौंग का चूर्ण शहद में मिलाकर चाटना लाभदायी है।

सभी प्रयोगों में अजवायन की मात्राः आधा से दो ग्राम।

सावधानीः शरद व ग्रीष्म ऋतु में तथा पित्त प्रकृतिवालों को अजवायन का उपयोग अत्यल्प मात्रा में करना चाहिए।

स्वास्थ्य वर्धक ʹजौʹ

आयुर्वेद ने ʹजौʹ की गणना नित्य सेवनीय द्रव्यों में की है। जौ कफ-पित्तशामक, शक्ति व पुष्टिवर्धक है। यह पचने में थोड़ा भारी, वायुवर्धक, मलवर्धक वे पेशाब खुलकर लाने वाला है। जौ चर्बी व कफ को घटाता है। अतः सर्दी, खाँसी, दमा आदि कफजन्य विकार, दाह, जलन, रक्तपित्त आदि पित्तजन्य विकार, मूत्रसंबंधी रोग व मोटापे में जौ खूब लाभदायी है। यह जठराग्नि व मेधा को बढ़ाने वाला तथा कंठ को सुरीला बनाने वाला है। इसके सेवन से उत्तम वर्ण की प्राप्ति होती है। जौ कंठ व चर्म रोगों में लाभदायी है।

कोलेस्ट्रोल व एलडीएल की वृद्धि, हृदयरोग, उच्च रक्तदाब, किडनी फेल्युअर व कैंसर में गेहूँ के स्थान पर जौ का उपयोग हितकारी सिद्ध हुआ है। जौ की  पतली राब बनाकर ठंडी होने पर शहद मिला के पीने से उलटी, पेट का दर्द, जलन, बुखार में राहत मिलती है। पित्तजन्य विकारों में जौ का भात घी व दूध मिलाकर खाना लाभदायी है।

80 प्रतिशत गेहूँ के आटे में 20 प्रतिशत जौ का आटा मिलाकर बनायी गयी रोटी  पौष्टिक, स्वास्थ्य-प्रदायक व बड़ी हितकारी होती है। जौ का मीठा या नमकीन दलिया भी बना सकते हैं।

अदरक व सोंठ

यह तीखी, उष्ण, कफ-वातशामक एवं जठराग्निवर्धक है। यह जुकाम, खाँसी, श्वास, मंदाग्नि आदि वर्षा ऋतु जन्य अनेक तकलीफों में लाभदायी व हृदय की क्रियाशक्ति को बढ़ाने वाली है।

औषधि-प्रयोगः दूध में 1-2 चुटकी सोंठ मिलाकर पीना हृदय के लिए बलदायी है अथवा तज का छोटा टुकड़ा डालकर उबाला हुआ दूध पी जायें (तज का टुकड़ा खाना नहीं है)।

ताजी छाछ में चुटकीभर सोंठ, सेंधा नमक व काली मिर्च मिलाकर पीने से आँव, मरोड़ तथा दस्त दूर होकर भोजन में रूचि बढ़ती है।

10 मि.ली. अदरक के रस में 1 चम्मच घी मिलाकर पीने से पीठ, कमर व जाँघ के दर्द में राहत मिलती है।

अदरक के रस में सेंधा नमक या हींग मिलाकर मालिश करने से जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है।

घृतकुमारी रस

घृतकुमारी (ग्वारापाठा) के विषय में सभी धर्मग्रन्थों में सम्मानपूर्वक विवरण मिलता है। प्राचीन काल से भारतीय इसे औषधि के रूप में उपयोग में ला रहे हैं। यह स्वास्थ्य-रक्षक, सौंदर्यवर्धक व रोगनिवारक गुणों के कारण विख्यात रही है। यह आश्चर्यजनक औषधि 220 से भी अधिक रोगों में उपयुक्त सिद्ध हुई है।

घृतकुमारी शरीरगत दोषों व मल के उत्सर्जन के द्वारा शरीर को शुद्ध व सप्तधातुओं को पुष्ट कर रसायन का कार्य करती है। यह जंतुघ्न (एंटीबायोटिक) व विषनाशक भी है। यह स्वस्थ कोशिकाओं का निर्माण कर रोगप्रतिरोधक प्रणाली को मजबूत करने में अति उपयोगी है। आयुर्वेद के अनुसार ग्वारपाठा वात-पित्त-कफशामक, जठराग्निवर्ध, मलनिस्सारक, बल, पुष्टि व वीर्य़वर्धक तथा नेत्रों के लिए हितकारी है। यह यकृत (लीवर) के समस्त दोषों  निवारण कर उसकी कार्यप्रणाली को सशक्त बनाता है, अतः यह यकृत के लिए वरदानस्वरूप है।

विविध त्वचाविकार, पीलिया, रक्ताल्पता, कफजन्य ज्वर, जीर्ण ज्वर (हड्डी का बुखार), खाँसी, तिल्ली की वृद्धि, नेत्ररोग, स्त्रीरोग, हर्पीज(Herpes), वातरक्त(gout), जलोदर(Ascitis), घुटनों व अन्य जोड़ों का दर्द, जलन, बालों का झड़ना आदि में उपयोगी है। पेट के पुराने रोग, चर्मरोग, गठिया व मधुमेह (डायबिटीज) में यह विशेष लाभप्रद है।

रस की मात्राः बच्चों के लिए 5 से 15 मि.ली. तथा बड़ों के लिए 15 से 25 मि.ली.) सुबह खाली पेट।

नीता वैद्य, वंदना वैद्य

(टिप्पणीः यह सभी आश्रमों व समितियों के सेवाकेन्द्रों पर सेवाभाव से सस्ते में मिलेगी।)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2012, पृष्ठ संख्या 29,30 अंक 236

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वर्षा ऋतु विशेष


(वर्षा ऋतुः 20 जून से 21 अगस्त)

ग्रीष्म ऋतु में दुर्बल हुआ शरीर वर्षा ऋतु में धीरे-धीरे बल प्राप्त करने लगता है। आर्द्र वातावरण जठराग्नि को मंद करता है। वर्षा ऋतु में वात-पित्तजनित व अजीर्णजन्य रोगों का प्रादुर्भाव होता है, अतः सुपाच्य, जठराग्नि प्रदीप्त करने वाला वात-पित्तनाशक आहार लेना चाहिए।

हितकर आहारः इस ऋतु में जठराग्नि प्रदीप्त करने वाले अदरक, लहसुन, नींबू, पुदीना, हरा धनिया, सोंठ, अजवायन, मेथी, जीरा, हींग, काली मिर्च, पीपरामूल का प्रयोग करें। जौ, खीरा, लौकी, गिल्की, पेठा, तोरई, जामुन, पपीता, सूरन, गाय का घी, तिल का तेल तथा द्राक्ष सेवनीय हैं। ताजी छाछ में काली मिर्च, सेंधा नमक, जीरा, धनिया, पुदीना डालकर दोपहर भोजन के बाद ले सकते हैं। उपवास और लघु भोजन हितकारी है। रात को देर से भोजन न करें।

अहितकर आहारः देर से पचने वाले, भारी तले, तीखे पदार्थ न लें। जलेबी, बिस्कुट, डबलरोटी आदि मैदे की चीजें, बेकरी की चीजें, उड़द, अंकुरित अऩाज, ठंडे पेय पदार्थ व आइसक्रीम के सेवन से बचें। वर्षा ऋतु में दही पूर्णतः निषिद्ध है। श्रावण मास में दूध व सब्जियाँ वर्जित हैं।

हितकर विहारः उबटन से स्नान, तेल की मालिश, हलका व्यायाम, स्वच्छ व हलके वस्त्र पहनना हितकारी है। वातारवरण में नमी और आर्द्ररता के कारण उत्पन्न कीटाणुओं से सुरक्षा हेतु आश्रमनिर्मित धूप वह हवन से वातावरण को शुद्ध तथा गौसेवा फिनायल या गोमूत्र से घर को स्वच्छ रखें। घर के आसपास पानी इकट्ठा न होने दें। मच्छरों से सुरक्षा के लिए घर में गेंदे के पौधों के गमले अथवा गेंदे के फूल रखें और नीम के पत्ते, गोबर के कंडे व गूगल आदि का धुआँ करें।

अपथ्य विहारः दिन में शयन, रात्रि जागरण, खुले में शयन, अति व्यायाम और परिश्रम, नदी में नहाना, बारिश में भीगना वर्जित है। कपड़े गीले हो गये हों तो तुरंत बदल दें।

कुछ खास प्रयोगः

500 ग्राम हरड़ चूर्ण व 50 ग्राम सेंधा नमक का मिश्रण बना लें। (उसमें 125 ग्राम सोंठ भी मिला सकते हैं।) 2-4 ग्राम यह मिश्रण दिन में 1-2 बार लेने से ʹरसायनʹ के लाभ प्राप्त होते हैं।

नागरमोथा, बड़ी हरड़ और सोंठ तीनों को समान मात्रा में लेकर बारीक पीस के चूर्ण बना लें। इस चूर्ण से दुगनी मात्रा में गुड़ मिलाकर बेर समान गोलियाँ बना लें। दिन में 4-5 बार 1-1 गोली चूसने से कफयुक्त खाँसी में राहत मिलती है।

1 से 3 लौंग भूनकर तुलसी पत्तों के साथ चबाकर खाने से सभी प्रकार की खाँसी में लाभ होता है।

वर्षा ऋतु में दमे के रोगियों की साँस फूले तो 10-20 ग्राम तिल के तेल को गर्म करके पीने से राहत मिलती है। ऊपर से गर्म पानी पियें।

भोजन के बाद पूर्व नींबू और अदरक के रस में सेंधा नमक डालकर पीने से मंदाग्नि व अजीर्ण में लाभ होता है।

कब्ज की तकलीफ होने पर रात में त्रिफला चूर्ण लें। रात का रखा हुआ आधा से एक लीटर पानी सुबह बासी मुँह पीने से कब्ज का नाश होता है।

मुनक्का एवं किशमिश

अंगूर को जब विशेषरूप से सुखाया जाता है तब उसे मुनक्का कहते हैं। अंगूर के लगभग सभी गुण मुनक्के में होते हैं। यह दो प्रकार का होता है – लाल और काला। मुनक्का पचने में भारी, मधुर, शीत, वीर्यवर्धक, तृप्तिकारक, वायु को गुदाद्वार से सरलता से निकलने वाला, कफ-पित्तहारी, हृदय के लिए हितकारक, श्रमनाशक, रक्तवर्धक, रक्तशोधक, मलशोधक तथा रक्तपित्त व रक्त-प्रदर में भी लाभदायी है।

किशमिश भी सूखे हुए अंगूर का दूसरा रूप है। इसमें भी अंगूर के सारे गुण विद्यमान होते हैं। दूध के लगभग सभी तत्त्व किशमिश में पाये जाते हैं। दूध के अभाव में इसका उपयोग किया जा सकता है। किशमिश दूध की अपेक्षा शीघ्र पचती है। मुनक्के के नित्य सेवन से थोड़े ही दिनों में रस, रक्त, शुक्र आदि धातुओं तथा ओज की वृद्धि होती है। वृद्धावस्था में किशमिश या मुनक्के का प्रयोग न केवल स्वास्थ्य की रक्षा करता है बल्कि आयु को बढ़ाने में भी सहायक होता है। किशमिश और मुनक्के की शर्करा शरीर में अतिशीघ्र पचकर आत्मसात् हो जाती है, जिससे शीघ्र ही शक्ति व स्फूर्ति प्राप्त होती है।

100 ग्राम किशमिश में 77 मि.ग्रा. लौह तत्त्व, 87 मि.ग्रा. कैल्शियम, 2 ग्रा. खनिज तत्त्व तथा 308 किलो कैलोरी ऊर्जा पायी जाती है।

किशमिश एवं मुनक्के के कुछ

स्वास्थ्य-प्रदायक प्रयोग

दौर्बल्यः अधिक परिश्रम, कुपोषण, वृद्धावस्था या किसी बड़ी बीमारी के बाद शरीर जब क्षीण व दुर्बल हो जाता है, तब शीघ्र बल प्राप्त करने के लिए किशमिश बहुत ही लाभदायी है। 10-12 ग्राम किशमिश 200 मि.ली. पानी में भिगोकर रखें व दो घंटे बाद खा लें।

रक्ताल्पताः मुनक्के में लौह तथा सभी जीवनसत्त्व (विटामिन्स) प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। 10-15 ग्राम काला मुनक्का एक कटोरी पानी में भिगोकर रखें। इसमें थोड़ा-सा नींबू का रस मिलायें। 4-5 घंटे बाद मुनक्का चबा-चबाकर खायें, इससे रक्ताल्पता मिटती है।

अम्लपित्तः किशमिश मधुर, स्निग्ध, शीतल व पित्तशामक है। इसे पानी में भिगोकर बनाया गया शरबत सुबह-शाम लेने से पित्तशमन, वायु-अनुलोमन व मल-निस्सारण होता है, जिससे अम्लपित्त में शीघ्र ही राहत मिलती है। रक्तपित्त, दाह व जीर्णज्वर में भी यह प्रयोग लाभदायी है। इसके सेवन के दिनों में आहार में पाचनशक्ति के अनुसार गाय के दूध तथा घी का उपयोग करें।

कब्जः किशमिश में उपस्थित मैलिक एसिड मल-निस्सारण का कार्य करता है। 25 से 30 ग्राम किशमिश व 1 अंजीर रात को 250 मि.ली. पानी में भिगोकर रखें। सुबह खूब मसलकर छान लें। फिर उसमें आधा चम्मच नींबू का रस व 2 चम्मच शहद मिलाकर धीरे-धीरे पियें। कुछ ही दिनों में कब्ज दूर हो जायगी।

शराब के नशे से छुटकाराः शराब पीने की इच्छा हो तब शराब की जगह 10 से 12 ग्राम किशमिश चबा-चबाकर खाते रहें या किशमिश का शरबत पियें। शराब पीने से ज्ञानतंतु सुस्त हो जाते हैं परंतु किशमिश के सेवन से शीघ्र ही पोषण मिलने से मनुष्य उत्साह, शक्ति और प्रसन्नता का अनुभव करने लगता है। यह प्रयोग प्रयत्नपूर्वक करते रहने से कुछ ही दिनों में शराब छूट जायेगी।

आवश्यक निर्देशः किशमिश, मुनक्का व अंजीर को अच्छी तरह से धोने के बाद ही उपयोग करें, जिससे धूल-मिट्टी, कीड़े, जंतुनाशक दवाई का प्रभाव आदि निकल जायें।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2012, पृष्ठ संख्या 31, अंक 235

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