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Sharir Swasthya

स्वास्थ्य एवं पर्यावरण रक्षक प्रकृति के अनमोल उपहार


अन्न, जल और वायु हमारे जीवन के आधार हैं । सामान्य मनुष्य प्रतिदिन औसतन 1 किलो अन्न और 2 किलो जल लेता है परंतु इनके साथ वह करीब 10000 लीटर (12 से 13.5 किलो) वायु भी लेता है । इसलिए स्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु शुद्ध वायु अत्यंत आवश्यक है ।

प्रदूषणयुक्त, ऋण-आयनों की कमीवाली एवं ओजोनरहित हवा से रोगप्रतिकारक शक्ति का ह्रास होता है व कई प्रकार की शारीरिक-मानसिक बीमारियाँ होती हैं ।

सन् 1975 की तुलना में वर्तमान समय में दमे के मरीज दुगने हो गये हैं । हर 9 में से 1 बच्चा दमे से पीड़ित है । दमे के कारण मरने वालों की संख्या वयस्कों में तीन गुना हो गयी है और 5 से 9 वर्ष की उम्र के बच्चों में चार गुनी हो गयी है । पीपल का वृक्ष दमानाशक, हृदयपोषक, ऋणआयनों का खजाना, रोगनाशक, आह्लाद व मानसिक प्रसन्नता का खजाना तथा रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ाने वाला है । बुद्धू बालकों तथा हताश-निराश लोगों को भी पीपल के स्पर्श एवं उसकी छाया में बैठने से अमिट स्वास्थ्य-लाभ व पुण्य लाभ होता है । पीपल की जितनी महिमा गायें, कम है । पर्यावरण की शुद्धि के लिए जनता-जनार्दन एवं सरकार को बबूल, नीलगिरी (युकेलिप्टस) आदि जीवनशक्ति का ह्रास करने वाले वृक्ष सड़कों एवं अन्य स्थानों से हटाने चाहिए और पीपल, आँवला, तुलसी, वटवृक्ष व नीम के वृक्ष दिल खोल के लगाने चाहिए । इससे अरबों रुपयों की दवाइयों का खर्च बच जायेगा । ये वृक्ष शुद्ध वायु के द्वारा प्राणिमात्र को एक प्रकार का उत्तम भोजन प्रदान करते हैं । पूज्य बापू जी कहते हैं कि ये वृक्ष लगाने से आपके द्वारा प्राणिमात्र की बड़ी सेवा होगी । यह लेख पढ़ने के बाद सरकार में अमलदारों व अधिकारियों को सूचित करना भी एक सेवा होगी । खुद वृक्ष लगाना और दूसरों को प्रेरित करना भी एक सेवा होगी ।

पीपलः यह धुएँ तथा धूलि के दोषों को वातावरण से सोखकर पर्यावरण की रखा करने वाला एक महत्त्वपूर्ण वृक्ष है । यह चौबीसों घंटे ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है । इसके नित्य स्पर्श से रोग प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि, मनःशुद्धि, आलस्य में कमी, ग्रहपीड़ा का शमन, शरीर के आभामंडल की शुद्धि और विचारधारा में धनात्मक परिवर्तन होता है । बालकों के लिए पीपल का स्पर्श बुद्धिवर्धक है । रविवार को पीपल का स्पर्श न करें ।

आँवलाः आँवले का वृक्ष भगवान विष्णु को प्रिय है । इसके स्मरणमात्र से गोदान का फल प्राप्त होता है । इसके दर्शन से दुगना और फल खाने से तिगुना पुण्य होता है । आँवले के वृक्ष का पूजन कामनापूर्ति में सहायक है । कार्तिक में आँवले के वन में भगवान श्रीहरि की पूजा तथा आँवले की छाया में भोजन पापनाशक है । आँवले के वृक्षों से वातावरण में ऋणायनों की वृद्धि होती है तथा शरीर में शक्ति का, धनात्मक ऊर्जा का संचार होता है ।

आँवले से नित्य स्नान पुण्यमय माना जाता है और लक्ष्मीप्राप्ति में सहायक है । जिस घर में सदा आँवला रखा रहता है वहाँ भूत, प्रेत और राक्षस नहीं जाते ।

तुलसीः प्रदूषित वायु के शुद्धिकरण में तुलसी का योगदान सर्वाधिक है । तुलसी का पौधा उच्छवास में स्फूर्तिप्रद ओजोन (O3) वायु छोड़ता है, जिसमें ऑक्सीजन के दो के स्थान पर तीन परमाणु होते हैं । ओजोन वायु वातावरण के बैक्टीरिया, वायरस, फंगस आदि को नष्ट करके ऑक्सीजन में रूपांतरित हो जाती है । तुलसी उत्तम प्रदूषणनाशक है । फ्रेंच डॉ, विक्टर रेसीन कहते हैं- ‘तुलसी एक अदभुत औषधि है । यह रक्तचाप व पाचनक्रिया का नियमन तथा रक्त की वृद्धि करती है ।’

वटवृक्षः यह वैज्ञानिक दृष्टि से पृथ्वी में जल की मात्रा का स्थिरीकरण करने वाला एकमात्र वृक्ष है । यह भूमिक्षरण को रोकता है । इस  वृक्ष के समस्त भाग औषधि का कार्य करते हैं । यह स्मरणशक्ति व एकाग्रता की वृद्धि करता है । इसमें देवो का वास माना जाता है ।  इसकी छाया में साधना करना बहुत लाभदायी है । वातावरण शुद्धि में सहायक हवन के लिए वट और पीपल की समिधा का वैज्ञानिक महत्त्व है ।

नीमः नीम की शीतल छाया कितनी सुखद और तृप्तिकर होती है, इसका अनुभव सभी को होगा । नीम में ऐसी कीटाणुनाशक शक्ति मौजूद है कि यदि नियमित नीम की छाया में दिन के समय विश्राम किया जाय तो सहसा कोई रोग होने की सम्भावना ही नहीं रहती ।

नीम के अंग-प्रत्यंग (पत्तियाँ, फूल, फल, छाल, लकड़ी) उपयोगी और औषधियुक्त होते हैं । इसकी कोंपलों और पकी हुई पत्तियों में प्रोटीन, कैल्शियम, लौह और विटामिन ‘ए’ पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं ।

नीलगिरी के वृक्ष भूल से भी न लगायें, ये जमीन को बंजर बना देते हैं । जिस भूमि पर ये लगाये जाते हैं उसकी शुद्धि 12 वर्ष बाद होती है, ऐसा माना जाता है । इसकी शाखाओं पर ज्यादातर पक्षी घोंसला नहीं बनाते, इसके मूल में प्रायः कोई प्राणी बिल नहीं बनाते, यह इतना हानिकारक, जीवन-विघातक वृक्ष है । हे समझदार मनुष्यो ! पक्षी एवं प्राणियों जितनी अक्ल तो हमें रखनी चाहिए । हानिकर वृक्ष हटाओ और तुलसी, पीपल, आँवला आदि लगाओ ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2009, पृष्ठ संख्या 28 अंक 200

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यज्ञोपवीत से स्वास्थ्य लाभ


यज्ञोपवीत धारण करने से हृदय, आँतों व फेफड़ों की क्रियाओं पर अत्यंत अनुकूल प्रभाव पड़ता है ।

मल-मूत्र त्याग के समय कान पर कसकर जनेऊ लपेटने से हृदय मजबूत होता है । आँतों की गतिशीलता बढ़ती है, जिससे कब्ज दूर होता है । मूत्राशय की माँसपेशियों का संकोचन वेग के साथ होता है । जनेऊ से कान के पास की नसें दब जाने से बढ़ा हुआ रक्तचाप नियंत्रित तथा कष्ट से होने वाली श्वसनक्रिया सामान्य हो जाती है, इसके अतिरिक्त स्मरणशक्ति व नेत्रज्योति में भी वृद्धि होती है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2009, पृष्ठ संख्या 8 अंक 199

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अमृतकण

कुसंग केवल मनुष्यों का ही नहीं होता, शरीर से होने वाले काम, इन्द्रियों के सारे विषय, स्थान, साहित्य, व्यापार, नौकरी, अर्थ-सम्पत्ति, खानपान, वेशभूषा आदि सभी कुसंग बन सकते हैं ।

भगवद्दर्शन की इतनी चिंता न करें, भगवद्चिंतन की अधिक चिंता करें । किसी भी प्रकार परमात्मा की शरण में जाने से माया छूट सकती है । जब तक अहं और आवश्यकता रहती है तब तक परमात्मा में तल्लीन नहीं हो पाते ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2009, पृष्ठ संख्या 11 अंक 199

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एक तो कर्तव्य-पालन में अपनी निष्ठा, दूसरा, वासुदेव सर्वत्र है और तीसरा, यह आत्मा ब्रह्म है ऐसा मानने से हर काम में आप सफल हो जायेंगे और कभी थोड़ा विफल भी हो जायेंगे तो विषाद नहीं होगा । – पूज्य बापू जी ।

जिन संतों के हृदय में सबकी भलाई की भावना है, जिनका सबके ऊपर प्रेम है ऐसे संतों को सताने के लिए मूढ़ लोग तैयार हो जाते हैं । पेड़ की छाया में बैठकर अपनी गर्मी मिटाने की अपेक्षा उस पेड़ की जड़ों को काटने लग जायें तो सोचो यह कैसी मूर्खताभरी बात है । पेड़ की छाया का लाभ ले ले न ! अपनी तपन मिटा… पर उसकी जड़े ही काटने की बात करे तो उसे मूर्ख नहीं तो क्या कहा जाय !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2009, पृष्ठ संख्या 15 अंक 199

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वस्त्र धोने के बाद निचोड़ते समय दोनों हाथों की होने वाली विशिष्ट क्रिया से हृदय के स्नायु मजबूत बनते हैं ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2009, पृष्ठ संख्या 30 अंक 199

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शारीरिक शुद्धि


जितना ध्यान हम शरीर की पुष्टि की तरफ देते हैं, उतना ही ध्यान शरीर की शुद्धि की तरफ देना भी आवश्यक है । अवशिष्ट पदार्थों का निष्कासन करने वाली शोधन प्रणालियों का कार्य कुशलता से नहीं होगा तो पोषण तंत्र का कार्य अपने-आप मंद अथवा बंद हो जायेगा ।

शरीर से निष्कासन का कार्य मुख्यतः चार अवयवों द्वारा होता हैः आँतें, गुर्दे, फेफड़े व त्वचा।

हर रोज लगभग 2.5 लिटर पानी, नत्रजन, 250 ग्राम कार्बन व 2 किलो अन्य तत्त्व एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर से इन अवयवों द्वारा निष्कासित किये जाते हैं ।

1. आँतें– आँतों के द्वारा प्रतिदिन अन्न का अपाचित व अनवशोषित भाग, जीवाणु (बैक्टीरिया), कार्बन-डाई-ऑक्साइड, हाइड्रोजन आदि वायु, पानी व अन्य तत्त्व मल के रूप में बाहर निकल जाते हैं ।

मल के वेग को रोकना, बिना चबाये, शीघ्रता से, अति मात्रा में, असमय, अनुचित आहार का सेवन, शारीरिक परिश्रम व व्यायाम का अभाव, रात्रि जागरण, सुबह देर तक सोना, सतत व्यग्रता, चिंता व शोक आँतों की कार्यक्षमता को क्षीण करते हैं ।

उपवास (सप्ताह अथवा पंद्रह दिन में एक दिन पूर्णतः निराहार रहना), उषःपान (रात का रखा हुआ छः अंजली जल प्रातः सूर्योदय से पूर्व पीना), चंक्रमण (सुबह शाम तेज गति से चलना), योगासन, उड्डीयान व मूल बंध तथा सम्यक् आहार आँतों को स्वच्छ व सशक्त करते हैं ।

2. गुर्दे (किडनियाँ)- गुर्दे प्रतिदिन 170 से 200 लीटर रक्त को छानकर डेढ़ से दो लीटर मूत्र की उत्पत्ति करते हैं । मूत्र के द्वारा अतिरिक्त जल, नत्रजन, नमक, यूरिक ऐसिड आदि निष्कासित किये जाते हैं ।

मूत्र के वेग को बार-बार रोकना, मूत्रवेग को रोककर जलपान, भोजन, संभोग करना, पचने में भारी, अति रूक्ष, ऊष्ण-तीक्ष्ण पदार्थ व नमक का अधिक सेवन, मांसाहार, नशीले पदार्थ, अंग्रेजी दवाइयाँ तथा शरीर का क्षीण होना गुर्दों व मूत्राशय (यूरिनरी ब्लैडर) की कार्यक्षमता को घटाते हैं ।

पर्याप्त शुद्ध जलपान, उषःपान, सोने से पूर्व, प्रातः उठते ही तथा व्यायाम व भोजन के बाद मूत्रत्याग, कटिपिंडमर्दनासन, पादपश्चिमोत्तानासन गुर्दे व मूत्राशय को स्वस्थ रखते हैं ।

3. फेफड़ेः फेफड़ों के द्वारा प्रतिदिन लगभग 250 मि.ली. पानी, 200 ग्राम कार्बन, उष्णता व 50 ग्राम अन्य तत्त्व बाहर फेंक दिये जाते हैं ।

मल-मूत्र, छींक, डकार आदि के वेगों को रोकना, भूख लगने पर व्यायाम करना, शक्ति से अधिक व कठोर परिश्रम करना, रूक्ष-शीत पदार्थों का अति सेवन, प्रदूषित हवा व धातुक्षय से फेफड़ों में विकृति आ जाती है ।

प्राणायाम (नाड़ी-शोधन, भस्त्रिका, उज्जायी, कपालभाति आदि), जहाँ जीवनीशक्ति की अधिकता हो ऐसे पहाड़, जंगल या नदी किनारे खुली हवा में घूमना फेफड़ों को स्वच्छ व सक्रिय बनाता है ।

4. त्वचाः त्वचा के द्वार पसीने के रूप में प्रतिदिन लगभग 600 मि.ली. पानी, 5 ग्राम कार्बन, 3-4 ग्राम नत्रजन, नमक, अमोनिया आदि तत्त्व निष्कासित होते हैं ।

विरूद्ध आहार (जैसे दूध के साथ फल, खट्टे व नमकयुक्त पदार्थों का सेवन), खट्टे, तीखे, तले हुए पदार्थ त्वचा को दूषित करते हैं ।

मालिश, उबटन व सूर्यस्नान से त्वचा निर्मल एवं दृढ़ होती है । अतः प्रातःकाल सौम्य धूप में सिर ढककर सूर्यस्नान अवश्य-अवश्य करना चाहिए । यह रोगनाशक व जीवनदायक है । सूर्यस्नान से सभी शोधन-प्रणालियाँ अपना काम सुचारु रूप से करने लगती हैं । प्रातः तुलसी के 5-7 व नीम के 10-15 पत्तों का सेवन शरीर को शुद्ध कर रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ाता है । मलिन पदार्थों का शरीर में संचय गंभीर व्याधियों को आमंत्रित करता है तथा इनका पूर्णरूप से शरीर से बाहर निकल जाना, ताजगी, स्फूर्ति व निरोगता लाता है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2009, पृष्ठ संख्या 29,30 अंक 198

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