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Sharir Swasthya

हेमन्त ऋतु में स्वास्थ्य-रक्षा


शीत ऋतु के दो माह, मार्गशीर्ष और पौष को हेमन्त ऋतु कहते हैं। यह ऋतु विसर्गकाल अर्थात् दक्षिणायन का अंत कहलाती है। इस काल में चंद्रमा की शक्ति सूर्य की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होती है। इसलिए इस ऋतु में औषधियों, वृक्ष, पृथ्वी की पौष्टिकता में भरपूर वृद्धि होती है व जीव-जंतु भी पुष्ट होते हैं। इस ऋतु में शरीर में कफ का संचय होता है तथा पित्तदोष का नाश होता है।

शीत ऋतु में जठराग्नि अत्यधिक प्रबल रहती है। अतः इस समय लिया गया पौष्टिक और बलवर्धक आहार वर्षभर शरीर को तेज, बल और पुष्टि प्रदान करता है। इस ऋतु में एक स्वस्थ व्यक्ति को अपनी सेहत की तंदुरुस्ती के लिए किस प्रकार का आहार लेना चाहिए ? शरीर की रक्षा कैसे करनी चाहिए ? आइये, उसे जानें-

शीत ऋतु में खट्टा, खारा तथा मधु रस प्रधान आहार लेना चाहिए।

पचने में भारी, पौष्टिकता से भरपूर, गरिष्ठ और घी से बने पदार्थों का सेवन अधिक करना चाहिए।

इस ऋतु में सेवन किये हुए खाद्य पदार्थों से ही वर्षभर शरीर की स्वास्थ्य-रक्षा हेतु शक्ति का भण्डार एकत्रित होता है। अतः उड़दपाक, सालमपाक, सोंठपाक जैसे वाजीकारक पदार्थों अथवा च्यवनप्राश आदि का उपयोग करना चाहिए।

जो पदार्थ पचने में भारी होने के साथ गरम व स्निग्ध प्रकृति के होते हैं, ऐसे पदार्थ लेने चाहिए।

दूध, घी, मक्खन, गुड़, खजूर, तिल, खोपरा, सूखा मेवा तथा चरबी बढ़ाने वाले अन्य पौष्टिक पदार्थ इस ऋतु में सेवन योग्य माने जाते हैं।

इन दिनों में ठंडा भोजन न करते हुए थोड़ा गर्म और घी-तेल की प्रधानतावाला भोजन करना चाहिए।

इस ऋतु में बर्फ अथवा बर्फ का या फ्रिज का पानी, कसैले, तीखे तथा कड़वे रसप्रधान द्रव्यों का सेवन लाभदायक नहीं है। हलका भोजन भी निषिद्ध है।

इन दिनों में उपवास अधिक नहीं करने चाहिए। वातकारक, रूखे-सूखे, बासी पदार्थ और जो पदार्थ व्यक्ति की प्रकृति के अनुकूल न हों, उनका सेवन न करें।

शरीर को ठंडी हवा के संपर्क में अधिक देर तक न आने दें।

प्रतिदिन प्रातःकाल में व्यायाम, कसरत व शरीर की मालिश करें।

इस ऋतु में गर्म जल से स्नान करना चाहिए।

शरीर की चंपी करवाना और यदि कुश्ती या अन्य कसरतें आती हों तो उन्हें करना हितावह है।

तेल मालिश के बाद शरीर पर  उबटन लगाकर स्नान करना हितकारी होता है।

कमरे और शरीर को थोड़ा गर्म रखें। सूती मोटे तथा ऊनी वस्त्र इस मौसम में लाभकारी होते हैं।

प्रातःकाल सूर्य की किरणों का सेवन करें। पैर ठंडे न हों इस हेतु जूते पहनें।

स्कूटर जैसे दुपहिये खुले वाहनों द्वारा इन दिनों लंबा सफर न करते हुए बस, रेल, कार जैसे दरवाजे-खिड़की वाले वाहनों से ही सफर करने का प्रयास करें।

हाथ पैरे धोने में भी यदि गुनगुने पानी का प्रयोग किया जाये तो हितकर होगा।

बिस्तर, कुर्सी अथवा बैठने के स्थान पर कम्बल, चटाई, प्लास्टिक अथवा टाट की बोरी बिछाकर ही बैठें। सूती कपड़े पर न बैठें।

दशमूलारिष्ट, लोहासव, अश्वगंधारिष्ट, च्यवनप्राश अथवा अश्वगंधावलेह जैसी देशी व आयुर्वेदिक औषधियों का इस काल में सेवन करने से वर्षभर के लिए पर्याप्त शक्ति का संचय किया जा सकता है।

गरिष्ठ खाद्य पदार्थों के सेवन से पहले अदरक के टुकड़ों पर नमक व नींबू का रस डालकर खाने से जठराग्नि अधिक प्रबल होती है।

भोजन पचाने के लिए भोजन के बाद निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ पेट पर बायाँ हाथ दक्षिणावर्त घुमा लेना चाहिए, जिससे भोजन शीघ्रता से पच सके।

अगस्त्यं कुभकर्णच शनिं च बडवानलम्।

आहारपरिपाकार्थ स्मरेद् भीमं च पंचमम्।।

इस ऋतु में सर्दी, खाँसी, जुकाम या कभी बुखार की संभावना भी बनी रहती है, जिनसे बचने के उपाय निम्नलिखित हैं-

सर्दी-जुकाम और खाँसी में सुबह तथा रात्रि को सोते समय हल्दी नमकवाले ताजे, भुने हुए एक मुट्ठी चने खायें, किन्तु उनके बाद कोई भी पेय पदार्थ, यहाँ तक की पानी भी न पियें। भोजन में घी, दूध, शक्कर, गुड़ व खटाई का सेवन बंद कर दें। सर्दी खाँसी वाले स्थायी मरीज के लिए यह एक सस्ता प्रयोग है।

भोजन के पश्चात् हल्दी-नमकवाली भुनी हुई अजवाइन को मुखवास के रूप में नित्य सेवन करने से सर्दी-खाँसी मिट जाती है। अजवाइन का धुआँ लेना चाहिए। अजवाइन की पोटली से छाती की सेंक करनी चाहिए। मिठाई, खटाई और चिकनाईयुक्त चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।

प्रतिदिन मुखवास के रूप में दालचीनी का प्रयोग करें। 2 ग्राम सोंठ, आधा ग्राम दालचीनी तथा 5 ग्राम पुराना गुड़, इन तीनों को कटोरी में गरम करके रोज ताजा खाने से सर्दी मिटती है।

सर्दी जुकाम अधिक होने पर नाक बंद हो जाती है, सिर भी भारी हो जाता है और बहुत बेचैनी होती है। ऐसे समय में एक तपेली में पानी को खूब गरम करके उसमें थोड़ा दर्दशामक मलहम (पेनबाम), नीलगिरि का तेल अथवा कपूर डालकर सिर व तपेली ढँक जाय ऐसा कोई मोटा कपड़ा या तौलिया ओढ़कर गरम पानी की भाप लें। ऐसा करने से कुछ ही मिनटों में लाभ होगा। सर्दी से राहत मिलेगी।

मिश्री के बारीक चूर्ण को नसवार की तरह सूँघें।

स्थायी सर्दी-जुकाम और खाँसी के मरीज को 2 ग्राम सोंठ, 10 से 12 ग्राम गुड़ और थोड़ा घी एक कटोरी में लेकर उतनी देर तक गरम करना चाहिए जब तक गुड़ पिघल न जाये। फिर सबको मिलाकर रोज सुबह खाली पेट गरम-गरम खा लें। भोजन में मीठी, खट्टी, चिकनी और गरिष्ठ वस्तुएँ न लें। रोज सादे पानी की जगह पर सोंठ की डली डालकर उबाला हुआ पानी ही पियें या गरम किया हुआ पानी ही पियें। इस प्रयोग से रोग मिट जायेगा।

सर्दी के कारण होने वाले सिरदर्द, छाती के दर्द और बेचैनी में सोंठ का चूर्ण पानी में डालकर गरम करके पीड़ावाले स्थान पर थोड़ा लेप करें। सोंठ की डली डालकर उबाला गया पानी पियें। सोंठ का चूर्ण शहद में मिलाकर थोड़ा-थोड़ा रोज़ चाटें। भोजन में मूँग, बाजरा, मेथी और लहसुन का प्रयोग करें। इससे भी सर्दी मिटती है।

हल्दी को अंगारों पर डालकर उसकी धूनी लें। हल्दी के चूर्ण को दूध में उबालकर पीने से लाभ होता है।

बुखार मिटाने के उपायः

मोठ या मोठ की दाल का सूप बना कर पीने से बुखार मिटता है। उस सूप में हरी धनिया तथा मिश्री डालने से मुँह अथवा मल द्वारा निकलता खून बंद हो जाता है।

कॉफी बनाते समय उसमें तुलसी और पुदीना के पत्ते डालकर उबालें। फिर नीचे उतारकर 10 मिनट ढँककर रखें। उसमें शहद डालकर पीने से बुखार में राहत मिलती है और शरीर की शिथिलता दूर होती है।

1 से 2 ग्राम पीपरामूल-चूर्ण शहद के साथ सेवन कर फिर गर्म दूध पीने से मलेरिया कम होता है।

5 से 10 ग्राम लहसुन की कलियों को काटकर तिल के तेल अथवा घी में तलें और सेंधा नमक डालकर रोज़ खायें। इससे मलेरिया का बुखार दूर होता है।

सौंफ तथा धनिया के काढ़े में मिश्री मिलाकर पीने से पित्तज्वर का शमन होता है।

हींग तथा कपूर को समान मात्रा में लेकर बनायी गयी एक-दो गोली लें, उसे अदरक के रस में घोंटकर रोगी की जीभ पर लगायें, रगड़ें। दर्दी अगर दवा पी सके तो यही दवा पीये। इससे नाड़ी सुव्यवस्थित होगी और बुखार मिटेगा।

कई बार बुखार 103-104 फेरनहाइट से ऊपर हो जाता है, तब मरीज के लिए खतरा पैदा हो जाता है। ऐसे समय में ठण्डे पानी में खाने का नमक, नौसादर या कोलनवॉटर डालें। उस पानी में पतले कपड़े के टुकड़े डुबोकर, मरीज की हथेली, पाँव के तलवों और सिर (ललाट) पर रखें। जब रखा हुआ कपड़ा सूख जाय तो तुरंत ही दूसरा कपड़ा दूसरे साफ पानी में डुबायें और निचोड़कर दर्दी के सिर, हथेली और पैर के तलवों पर रखें। इस प्रकार थोड़ी-थोड़ी देर में ठंडे पानी की पट्टियाँ बदलते रहने से अथवा बर्फ घिसने से बुखार कम होगा।

खाँसी के लिए इलाज

वायु की सूखी खाँसी में अथवा गर्मी की खाँसी में, खून गिरने में, छाती के दर्द में, मानसिक दुर्बलता में तथा नपुंसकता के रोग में गेहूँ के आटे में गुड़ अथवा शक्कर और घी डालकर बनाया गया हलुआ विशेष हितकर है। वायु की खाँसी में गुड़ के हलुए में सोंठ डालें। खून गिरने के रोग में मिश्री-घी में हलुआ बनाकर किशमिश डालें। मानसिक दौर्बल्य में हलुए में बादाम डालकर खायें। कफजन्य खाँसी तथा श्वास के दर्द में गुनगुने पानी के साथ अजवाइन खाने तथा उसकी बीड़ी अथवा चिलम बनाकर धूम्रपान (तम्बाकू बिना) करने से लाभ होता है। कफोत्पत्ति बन्द होती है। पीपरामूल, सोंठ और बहेड़ादल का चूर्ण बनाकर शहद में मिलाकर प्रतिदिन खाने से सर्दी-कफ की खाँसी मिटती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2002, पृष्ठ संख्या 27-29

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जल-पान विचार


तृप्ति, संतोष व उत्साह की उत्पत्ति, अन्न के पाचन, रसादि धातुओं के रूपान्तरण और सम्पूर्ण शरीर में रक्त के यथायोग्य परिभ्रमण के लिए जल तथा अन्य पेय पदार्थों की आवश्यकता होती है। सभी पेय पदार्थों में पानी सर्वश्रेष्ठ है। इसे जीवन कहा गया है। शारीरिक बल, आरोग्य और पुष्टि की वृद्धि में जल सहायक होता है।

पानी कब, कितना और कैसे पीना चाहिए ? इसके बारे में संशय उत्पन्न हो जाय, इतने मत-मतान्तर प्रचलित हैं। आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार पानी का समयानुसार प्रयोग अलग-अलग परिणाम दिखाता है।

अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम्।

भोजने चामृतं वारि भोजनान्ति विषप्रदम्।।

‘अर्थात् अजीर्ण होने पर जलपान औषधवत् काम करता है। भोजन के पच जाने पर अर्थात् दो घंटे बाद पानी पीना बलदायक होता है। भोजन के मध्यकाल में पानी पीना अमृत के समान और भोजन के अंतकाल में विष के समान अर्थात् पाचनक्रिया के लिए हानिकारक होता है।’

जठराग्नि प्रदीप्त रखने के लिए थोड़ा-थोड़ा पानी बार-बार पीना चाहिए। भोजन से पहले पानी पीने से जठराग्नि मंद हो जाती है, शरीर कृश हो जाता है। भोजन के बाद तुरंत पानी पीने से स्थूलता आती है परन्तु भोजन के बीच में पानी पीने से पाचनक्रिया ठीक होती है, धातुसाम्य व शरीर का संतुलन बना रहता है।

आमाशय के चार भाग मानकर दो भाग अन्न सेवन करें। एक भाग जल तथा पेय पदार्थों से भरें और एक भाग वायु के संचरण के लिए रखें। यह उचित भोजन पद्धति है। इससे भोजन के बाद पेट में भारीपन, हृदय की गति में अवरोध अथवा श्वासोच्छ्वास में कष्ट का अनुभव नहीं होता है।

स्वस्थ, निरोगी अवस्था में पानी की अधिक आवश्यकता नहीं होती। ग्रीष्म व शरद ऋतु को छोड़कर अन्य ऋतुओं में पानी कम मात्रा में ही पीना चाहिए। इन दो ऋतुओं में नैसर्गिक उष्णता व पित्त प्रकोप हो जाने के कारण पानी की अधिक आवश्यकता होती है।

जल पान के साथ इस बात पर भी ध्यान देना आवश्यक है कि भोजन में पानी का उपयोग, द्रव-तरल व स्निग्ध पदार्थों का समावेश सही मात्रा में हो। भोजन रूखा-सूखा नहीं होना चाहिए। भोजन में पतली दाल, सब्जी, कढ़ी, रस, छाछ आदि का समावेश करने से पानी की आवश्यक मात्रा की पूर्ति अपने-आप हो जाती है।

ऊषःपान

ऊषःपान अर्थात् सूर्योदय से पहले पानी पीना। आयुर्वेद के ‘योगरत्नाकर ग्रंथ’ में इसके बारे में लिखा गया हैः

विगत घननिशीथे प्रातरूत्थान नित्यं।

पिबति खलु नरो यो घ्राणरन्ध्रेण वारि।।

स भवतिमतिपूर्णश्चक्षुषातार्क्ष्यतुल्यः।

वलियलितविहीनः सर्वरोगविमुक्तः।।

प्रातः सूर्योदय से पहले, कुल्ला करके, रात का रखा हुआ दो से चार बड़े गिलास अर्थात् आधे से सवा लीटर पानी रोज नियमित रूप से पीने से सब रोगों से मुक्ति होती है। ऊषःपान से मति व दृष्टि गरूड़ के समान तीक्ष्ण हो जाती है।

अनेक कष्टसाध्य बीमारियों जैसे-मधुमेह, दमा, संधिवात, अम्लपित्त, मोटापा तथा पेट के विविध प्रकार के रोगों, स्त्रियों के अनियमित मासिक तथा श्वेतप्रदर में इस प्रयोग से चमत्कारिक लाभ दिखायी देते हैं।

यह अत्यंत सरल प्रयोग प्रत्येक व्यक्ति कर सकता है। प्रारम्भ में एक साथ चार गिलास पानी नहीं पी सकें तो एक गिलास से शुरु करके धीरे-धीरे एक-एक गिलास बढ़ाते जायें। फिर नियमित रूप से यह प्रयोग जारी रखें। प्रातः पानी पीने के बाद लगभग एक घंटे तक कुछ खाये पियें नहीं। सुबह के अल्पाहार तथा दोपहर व रात्रि के भोजन के बाद दो घंटे बीत जाने पर ही पानी पीयें।

जल पान के लिए ताम्र का पात्र आरोग्यप्रदायक व पवित्र माना जाता है। जल चिकित्सा (हाइड्रोथैरेपी) के अनुसार रात भर ताँबे के बर्तन में रखा हुआ पानी अधिक लाभदायी है। ताँबे का बर्तन भी जमीन के ऊपर न रखा हो। उसे लकड़ी जैसे विद्युत के कुचालक पदार्थ पर रखना चाहिए। सुबह वह पानी पीते समय पीने वाले के पैर भी जमीने का स्पर्श न करें यानी कम्बल या टाट पर बैठकर पानी पीना चाहिए।

विविध व्याधियों में जल-पान विचार

1.ज्वरः ज्वर में उबालकर आधा किया हुआ पानी ही पिलायें। तीव्र ज्वर में अधिक पानी की आवश्यकता होती है। 1 लीटर पानी में सोंठ, पित्तपापड़ा, नागरमोथ, खस, कालीखस, चंदन इऩ सबका 1-1 ग्राम चूर्ण मिलाकर पानी एक चौथाई रह जाय तब तक उबालें। फिर छानकर, ठंडा किया हुआ पानी थोड़ा-थोड़ा करके बार-बार रोगी को पिलायें। इस समय 72 घंटे अन्य औषध या आहार न दें। इससे आम का पाचन होने से ज्वर से छुटकारा मिलता है।

2.सूतिकावस्थाः प्रसूति के बाद अजवायन, वायविडंग व जीरा डालकर उबाला हुआ पानी पीने से अनेक व्याधियों से रक्षा होती है। भूख खुलकर लगती है व गर्भाशय की शुद्धि होती है।

3.अजीर्ण, अफरा व पेट के अन्य विकारः एक लीटर पानी में एक चम्मच अजवायन  डालकर उबालें। जब पानी आधा रह जाय तब छानकर गुनगुना पानी बार-बार रोगी को पिलायें।

4.अतिसारः उपरोक्त विधि (नंबर 3) में अजवायन की जगह साबुत सौंठ डालकर पानी बनायें। कपड़े से दो बार छानकर यह पानी दिनभर पीने के काम में लायें। आहार न लें। इससे आम का पाचन व मल का संग्रहण होता है।

बहूमूत्रता (पेशाब का अधिक आना), दमा, श्वास व अन्य कफविकारों में भी यह सिद्ध जल बहुत लाभदायी है। लाभ होने के बाद भी कुछ दिन तक यह प्रयोग चालू रखें।

पित्तविकारः उपरोक्त विधि (नंबर 3) में अजवायन की जगह सूखे धनिये का बनाया हुआ सिद्ध जल शरीर तथा आँखों की जलन, अम्लपित्त, पेट के छाले, खूनी बवासीर में अत्यंत उपयोगी है। मिश्री मिलाकर पीने से अधिक फायदा होता है।

चाय काफी तथा अन्य मादक द्रव्यों का सेवन करने वाले व्यक्तियों हेतु यह प्रयोग विषनाशक है।

उष्णोदक पान

गुनगुना पानी आम का नाश करने वाला, अग्निदीपक व कफ-वातनाशक होता है। उष्णोदक पान (गरम पानी) से मल-मूत्र की प्रवृत्ति साफ होती है। श्वास व कास (खाँसी) व्याधियों में उष्णोदक पान हितावह है।

मोटापे में प्यास लगने पर अथवा भोजन के बीच में भी केवल उष्णोदक पान करने से वज़न घटने लगता है। सुबह हलके गुनगुने पानी में शहद मिलाकर लें। गरम पानी व शहद मिलाकर लेना विरुद्ध आहार होने के कारण निषिद्ध है।

जल-पान निषेध

जलोदर में पानी पूर्णतः निषिद्ध है।

प्लीहावृद्धि, पांडुरोग, अतिसार, बवासीर, ग्रहणी, मंदाग्नि व सूजन में अत्यन्त आवश्यक हो तभी अल्प मात्रा में तथा उपरोक्त विधि से औषध द्रव्यों से बनाया हुआ सिद्ध जल ही देना चाहिए।

अत्यंत शीतल जल का सेवन न करें। इससे गले के रोग, कफ तथा वातविकार व अग्निमांद्य होने की संभावना रहती है।

तेज धूप से आकर व अत्यन्त भूख लगने पर पानी पीना विषपान करने के समान है।

बासी पानी का प्रयोग बहुत प्यास लगने पर भी न करें। यह अम्लधर्मी होने के कारण कफ को बढ़ाता है।

अंजलि से पानी नहीं पीना चाहिए।

आजकल प्यास लगने पर अथवा भोजन के समय भी पानी की जगह कोल्ड ड्रिंक्स अथवा आईसक्रीम का उपयोग फैशन के नाम पर किया जाता है। ये शरीर में थोड़े समय के लिए तो ठंडक उत्पन्न करते हैं परन्तु आंतरिक गर्मी को बढ़ाते हैं, मज्जाजंतुओं को उद्दीप्त करते हैं और कामोत्तेजना बढ़ाते हैं। इनके सेवन से झूठी भूख लगती है व स्थूलता आती है। अतः इनका सेवन न करें।

साँईं श्री लीलाशाह जी उपचार केन्द्र, जहाँगीर पुरा, सूरत।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2002, पृष्ठ संख्या 27,28 अंक 114

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जीवनी शक्ति


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

हमारे स्वास्थ्य का आधार है – जीवनी शक्ति (वाईटल एनर्जी)। यदि हमारी जीवनी शक्ति ठीक है तो हम रोगमुक्त रह सकते हैं। अगर जीवनी शक्ति दुर्बल है तो रोगों का आक्रमण होता है और जीवनी शक्ति नष्ट होने से मृत्यु आ जाती है।

जीवनी शक्ति के तीन प्रमुख कार्य हैं-

शरीर का पोषण, निर्माण एवं विकास करना।

विजातीय द्रव्यों को बाहर निकालना।

शरीर की मरम्मत करना।

शरीर में उत्पन्न होने वाले मल-मूत्र, पसीना, कफ आदि का पूर्ण विकास न होने पर, उन विजातीय पदार्थों के शरीर में ही जमा रहने पर रोग उत्पन्न होते हैं।

इन विजातीय पदार्थों के रक्त में मिलने से बुखार, हृदयरोग एवं चर्मरोग उत्पन्न होते हैं। आँतों में जमा होने पर कब्ज, गैस, दस्त-पेचिश, बवासीर, भगंदर, हर्निया एवं एपेण्डीसाईटीस को जन्म देते हैं। मस्तिष्क पर उनका प्रभाव पड़ने पर सिरदर्द, अनिद्रा, मिर्गी व पागलपन आदि उत्पन्न होते हैं। गुर्दों में प्रभाव पड़ने से पथरी आदि की सम्भावना बढ़ जाती है। फेफड़ों में उन विजातीय पदार्थों के जमा होने पर सर्दी, खाँसी, दमा, न्यूमोनिया, क्षय एवं कैंसर की सम्भावना रहती है।

मानसिक तनाव, चिंता, क्रोध, दुःख, आवेश, भावुकता तथा अधीरता आदि के कारण हृदय, मस्तिष्क एवं स्नायु के रोग होते हैं।

जीवनी शक्ति दुर्बल होने के पाँच मुख्य कारण हैं-

सामर्थ्य से अधिक शारीरिक तथा मानसिक कार्य करना एवं आवश्यक विश्राम न लेना।

भय, चिंता, क्रोध आदि के कारण शरीर व मन को तनाव में रखना।

पौष्टिक आहार का अभाव या आवश्यकता से अधिक खाना। नशीली वस्तुओं एवं गलत आहार का सेवन। रात्रि को देर से भोजन करना व दिन को भोजन करके सोना।

उपवास की महत्ता न समझने से भी जीवनी शक्ति का ह्रास होता है। भविष्य में कभी भी किसी प्रकार की पीड़ा का अनुभव करें तो उपवास करें अथवा रसाहार या फलाहार पर रह कर, जीवनी शक्ति को पाचन कार्य में कम व्यस्त रखकर शरीर की शुद्धि तथा मरम्मत के लिए अवसर देंगे तो तुरंत स्वास्थ्य लाभ होगा।

वीर्यरक्षा (ब्रह्मचर्य) की उपेक्षा करना।

विषैली औषधियों, इंजेक्शनों का प्रयोग तथा ऑपरेशन कराना एवं प्रकृति के स्वास्थ्यवर्धक तत्त्वों से अपने को दूर रखना।

उपरोक्त 5 कारणों को समझकर अपने जीवन में सुधार लाने से हम अपनी जीवनी शक्ति को प्रबल रखकर सदा स्वस्थ रह सकते हैं।

अगर जीवनी शक्ति मजबूत है तो रोग आयेंगे ही नहीं और अगर आयें भी तो टिकेंगे नहीं। जीवनी शक्ति प्राणायाम से बढ़ती है। सूर्य की किरणों में भी रोगप्रतिकारक शक्ति होती है।

सूर्य की किरणों में बैठकर 10 प्राणायाम करें और शवासन में लेट जायें। जहाँ रोग है वहाँ हाथ घुमाकर रोग को मिटाने का संकल्प करें। इससे बड़ा लाभ होता है।

प्राणायाम करने से मनोबल भी बढ़ता है और बुद्धिबल भी बढ़ता है। बहुत से ऐसे रोग होते हैं जिनमें कसरत करना संभव नहीं होता लेकिन प्राणायाम किये जा सकते हैं।

प्राणायाम करने से एक विशेष फायदा यह होता है कि हमारे रोमकूप खुलने लगते हैं। हमारे शरीर में कई हजार रोम छिद्र हैं। उनमें से किसी मनुष्य के 200, किसी के 300 तो किसी-किसी के 500 छिद्र काम करते हैं शेष सब छिद्र बंद पड़े रहते हैं। प्राणायाम से ये बंद छिद्र खुल जाते हैं।

जो लोग प्राणायाम नहीं करते उनके ये छिद्र बंद ही पड़े रहते हैं। इससे उनकी प्राणशक्ति कमजोर हो जाती है और उन बंद छिद्रों में जीवाणु उत्पन्न होते हैं। ज्यों ही रोगप्रतिकारक शक्ति कम होती है वे जीवाणु दमा, टी.बी. आदि बीमारियों का रूप ले लेते हैं। प्राणायाम के अभ्यास से ऐसे कई रोगों के जीवाणु बाहर चले जाते हैं।

प्राणायाम से रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है और इस शक्ति से भी कई जीवाणु मर जाते हैं। प्राणायाम करने से विजातीय द्रव्य नष्ट हो जाते हैं और सजातीय द्रव्य बढ़ते हैं। इससे भी कई रोगों से बचाव हो जाता है।

प्राणायाम से वात-पित्त-कफ के दोषों का शमन होता है। अगर प्राण ठीक से चलने लगेंगे तो वात-पित्त-कफ आदि त्रिदोषों में जो गड़बड़ है, वह गड़बड़ी ठीक होने लगेगी।

वात-पित्त-कफ का शमन करने के लिए तुलसी के पत्ते वरदान सिद्ध होते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि आप 50 ग्राम तुलसी के पत्ते खा लो। ऐसा करने से गर्मी बढ़ जायेगी। तुलसी के 5-7 पत्ते खाने हितकारी हैं।

मंत्रजाप भी जीवनी शक्ति को बढ़ाता है।

इस प्रकार नियमित प्राणायाम, सुबह की हवा, सूर्य की किरणें एवं तुलसी के पत्तों का सेवन तथा मंत्रजाप – ये रोगप्रतिकारक शक्ति को बढ़ाते हैं, मन को प्रफुल्लित रखते हैं और बुद्धि को तेजस्वी बनाने में सहायक होते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2002, पृष्ठ संख्या 29,30 अंक 110

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