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Sharir Swasthya

ग्रीष्म ऋतु में आहार-विहार


वैसे तो स्वस्थ व नीरोगी रहने के लिए प्रत्येक ऋतु में ऋतु के अनुकूल आहार-विहार जरूरी होता है लेकिन ग्रीष्म ऋतु में आदानकाल का समय होने से आहार-विहार पर विशेष ध्यान देना पड़ता है क्योंकि इसमें प्राकृतिक रूप से शरीर के पोषण की अपेक्षा शोषण होता है। अतः उचित आहार-विहार में की गई लापरवाही हमारे लिये कष्टदायक हो सकती है।

वसंतु ऋतु की समाप्ति के बाद ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ होता है। सूर्य उत्तर दिशा की तरफ होने से उसकी प्रचंड गर्मी के कारण पृथ्वी एवं प्राणियों का जलीयांश कम हो जाने से जीवों में रूखापन बढ़ता है। परिणामस्वरूप पित्त के विदग्ध होने से जठराग्नि मंद हो जाती है, भूख कम लगती है, आहार का पाचन नहीं होता, अतः इस ऋतु में दस्त, उल्टी, कमजोरी, बेचैनी आदि परेशानियाँ पैदा हो जाती हैं। ऐसे समय में कम आहार लेना व शीतल जल पीना अधिक हितकर है।

आहारः ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की तीव्र किरणों द्वारा संसार के जड़-चेतन का स्नेहांश सोख लेने के कारण रूक्ष रस की वृद्धि हो जाती है। अतः इस ऋतु में शीतवीर्य, मधुर रसयुक्त पदार्थ एवं स्निग्ध तथा बलवर्धक खाद्य व पेय पदार्थों का सेवन उपयोगी होता है। वाग्भट के अनुसार ग्रीष्मकाल में मीठे, हल्के, चिकनाई युक्त, शीतल व तरल पदार्थों का सेवन विशेष रूप से करना चाहिए। इस ऋतु में फलों में तरबूज, खरबूजा, मौसम्बी, सन्तरा, केला, मीठे आम, मीठे अंगूर आदि, सब्जियों में परवल, करेला, पके लाल टमाटर, पोदीना, हरा धनिया, नींबू आदि का सेवन करें।

विहारः इस ऋतु में प्रातः वायु सेवन, योगासन, व्यायाम, तेल मालिस हितकारी है।

अपथ्यः तेज मिर्च-मसालेवाले, तले, नमकीन, रूखे, बासे, कसैले, कड़वे, चटपटे, दुर्गन्ध युक्त पदार्थों का सेवन न करें। देर रात तक जागना, सुबह देर तक सोना, दिन में सोना, अधिक देर तक धूप में घूमना, कठोर परिश्रम, अधिक व्यायाम, अधिक स्त्री-पुरुष का सहवास, भूख-प्यास सहन करना, मलमूत्र के वेग को रोकना हानिप्रद है।

विशेषः ग्रीष्म ऋतु में पित्त दोष की प्रधानता से पित्त के रोग अधिक होते हैं जैसे दाह, उष्णता, आलस्य, मूर्च्छा, अपच, दस्त, नेत्रविकार आदि। अतः गर्मियों में घर से बाहर निकलते समय लू से बचने के लिए सिर पर कपड़ा रखें व एक गिलास पानी पीकर निकलें। जेब में कपूर रखें। गर्मियों में फ्रीज का ठंडा पानी पीने से गले, दाँत, आमाशय व आँतों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अतः फ्रीज का पानी न पीकर मटके का या सुराही का पानी पियें।

टमाटर

गुण-धर्मः टमाटर खट्टा मीठा, रूचिवर्धक, अग्निदीपक व शक्तिवर्धक है। इसके सेवन से शरीर की स्थूलता, उदररोग, अतिसार आदि रोगों का नाश होता है। इसमें लौहतत्त्व दूध की अपेक्षा दोगुना व अण्डे की अपेक्षा पाँच गुना अधिक है। सब्जियों व फलों की अपेक्षा इसमें लौहतत्त्व डेढ़ गुना अधिक होता है।

50 से 200 ग्राम टमाटर के नियमित सेवन से शरीर में बलवृद्धि होती है। रक्त शुद्ध होता है। सप्तधातुओं के लिए टमाटर अत्यंत उपादेय है, साथ ही यह पाचनतंत्र को सुचारू बनाये रखता है।

भोजन के पूर्व टमाटर का सेवन करने से भूख खुलकर लगती है व भोजन शीघ्र पचता है।

रक्ताल्पता के रोगियों को इसका सेवन अवश्य करना चाहिए। यकृत, पित्त, बदहजमी से पीड़ित रोगियों के लिए भी यह लाभकारी है। मधुमेह के रोगियों के लिए टमाटर का सेवन हितकारी है। नेत्रविकार, रतौंधी, मसूढ़े कमजोर हो गये हों, मुँह में बार-बार छाले पड़ना आदि चर्म रोगों में इसका सेवन अवश्य करना चाहिए।

टमाटर में ताँबा अधिक होता है। फलस्वरूप वह रक्त में लाल कणों की वृद्धि करता है। वैज्ञानिक मतानुसार टमाटर खाद्य पदार्थों में अत्यंत महत्त्वपूर्ण और उपयोगी है। शरीर संवर्धन के लिए सभी उपयोगी तत्त्व टमाटर में प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं। गर्भवती स्त्रियों के लिए व प्रसूति के बाद शारीरिक व मानसिक शक्ति बढ़ाने के लिए इसका रस लाभदायक है।

मधुमेहः मधुमेह के रोगियों के लिए टमाटर अत्यंत हितकारी है। इस रोग में प्रातः व सायं 150 -200 ग्राम टमाटर के रस का सेवन करें। परिणामतः मूत्र में शर्करा की मात्रा धीरे-धीरे कम होकर मधुमेह दूर हो जायेगा।

रक्तदोषः रक्तविकार के कारण त्वचा पर लाल लाल चकते निकलना, मसूढ़ों में सूजन व खून का आना, इसमें 20-20 ग्राम टमाटर का रस दिन में तीन से चार बार पियें।

उल्टीः 100 ग्राम टमाटर का रस व 25 ग्राम शक्कर, लौंग, काली मिर्च व इलायची का थोड़ा सा चूर्ण – इन सबको मिलाकर पीने से उल्टियाँ बंद हो जाती है।

वायुविकारः टमाटर उत्तम वायुनाशक है। इसके रस में पुदीना व अदरक का रस मिलाकर चुटकी भर सैंधव नमक डालकर पीने से वायुविकार नष्ट होते हैं।

विशेषः पथरी के रोगी को टमाटर नहीं खाना चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 1997, पृष्ठ संख्या 27,28 अंक 52

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शरीर स्वास्थ्य


दही

दही की प्रकृति (तासीर) गर्म होती है। इसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। दही जमने की प्रक्रिया में ʹबीʹ विटामिन विशेषकर थायमिन, रिबोफ्लेबीन और निकोटेमाइड की मात्रा दुगुनी हो जाती है। विशेषतः दूध की अपेक्षा दही सरलता से पच जाता है।

उच्च रक्तदाब, मोटापा तथा गुर्दे (किडनी) की बीमारियों में दही अत्यधिक लाभप्रद बताया गया है।

अमेरिका के प्रो. जार्ज शीमान के अनुसार दही हृदयरोग की रोक-थाम के लिए उत्तम वस्तु है।

कोलेस्ट्रॉल नामक हानिकारक पदार्थ रक्तवाहिनियों में जमकर रक्त के प्रवाह को रोकता है। परिणामतः हृदय रोगों की उत्पत्ति होती है। दही कोलेस्ट्रॉल की अधिक मात्रा को नियंत्रित करता है।

विभिन्न रोगों में उपचार

केन्सरः करनाल, 24 जुलाई 1973 में राष्ट्रीय डेयरी संस्थान के वैज्ञानिकों ने काफी परीक्षणों के बाद बताया कि दही कई प्रकार के केंसर की संभावना को समाप्त करता है। दही का सेवन स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है।

वैज्ञानिकों के अनुसार दहीसेवन के एक घंटे के अंदर ही उसके लगभग 80 प्रतिशत अंश को शरीर आत्मसात कर लेता है जबकि दूध का सिर्फ 32 प्रतिशत अंश ही शरीर आत्मसात कर पाता है। दही से शरीर की फालतू चर्बी कम होती है अतः मोटापा कम करने के लिए भी दही या मट्ठे का सेवन लाभदायक है।

बाल गिरनाः आवश्यकता से अधिक भावनात्मक दबाव के कारण बाल अधिक गिरते हैं। महिलाओं में एस्ट्रोजन हारमोन की कमी के कारण बाल अधिक गिरते हैं। भोजन में लौह तत्त्व व आयोडीन की कमी से भी बाल असमय गिरते हैं।

दही में वे सभी तत्त्व होते हैं जिनकी बालों को आवश्यकता रहती है।

एक कप दही में पिसी हुई 8-10 काली मिर्च मिलाकर सिर धोने से सफाई अच्छी होती है। बाल मुलायम व काले रहते हैं एवं गिरना बन्द हो जाते हैं। कम से कम सप्ताह में एक बार इसी तरह बाल धोयें।

अपचः सेंका व पिसा हुआ जीरा, काली मिर्च व सेंधा नमक दही में डालकर नित्य खाने से अपच ठीक हो जाता है। भोजन शीघ्र पचता है।

सिरदर्द (आधे सिर में)

दही, चावल व मिश्री मिलाकर सूर्य़ोदय से पहले खाने से  सूर्योदय के साथ बढ़ने घटने वाला सिरदर्द ठीक हो जाता है। यह प्रयोग कम से कम छः दिन करें।

आँतें- वैज्ञानिकों के अऩुसार एऩ्टीबायटिक्स देने के पश्चात आँतों के बेक्टीरियल फ्लोरा पर पड़े कुप्रभाव को दही के सेवन से हटाया जा सकता है।

भाँग के नशे में- ताजा दही खिलाने से भाँग का नशा उतर जाता है।

गंजापनः प्याज का रस सिर में लगायें। एक घंटे बाद खट्टा दही लगायें। पाँच-दस मिनट बाद सिर धो लें। इस प्रयोग से गंजे को भी बाल होने लगेंगे।

विशेषः दही में मिश्री या शहद डालकर खाने से इसके गुणों में वृद्धि होती है।

सावधानीः दमा, श्वास, खांसी, कफ, शोथ, पित्त, ज्वर में दही का सेवन हानिप्रद है।

ईख (गन्ना)

आजकल अधिकांशतः लोग मशीन, ज्यूसर आदि से निकाला हुआ रस पीते हैं। ʹसुश्रुत संहिताʹ के अनुसार यंत्र (मशीन, ज्यूसर आदि) से निकाला हुआ रस भारी, दाहकारी, कब्जकारक होने के साथ ही संक्रामक कीटाणुओं से युक्त भी हो सकता है।

अविदाही कफकरो वातपित्त निवारणः।

वक्त्र प्रहलादनो वृष्यो दन्तनिष्पीडितो रसः।।

ʹसुश्रुत संहिताʹ के अनुसार दाँतों से चबाकर रस चूसने पर गन्ना दाहकारी नहीं होता और इससे दाँत मजबूत होते हैं। अतः गन्ना चूसकर खाना चाहिए।

ʹभावप्रकाश निघण्टुʹ के अनुसार गन्ना रक्तपित्त नामक व्याधि को नष्ट करने वाला, बलवर्धक, वीर्यवर्धक, कफकारक, पाक तथा रस में मधुर, स्निग्ध, भारी मूत्रवर्धक व शीतल होता है। ये सब पके हुए गन्ने के गुण हैं।

उपयोगः गन्ना नित्य प्रायः चूसते रहने से पथरी टुकड़े-टुकड़े होकर निकल जाती है।

पित्त की उल्टी होने पर एक गिलास गन्ने के रस में दो चम्मच शहद मिलाकर पिलाने से लाभ होता है।

एक कप गन्ने के रस में आधा कप अनार का रस मिलाकर सुबह-शाम पिलाने से रक्तातिसार मिटता है।

विशेषः लिवर की कमजोरी वाले, हिचकी, रक्तविकार, नेत्ररोग,  पीलिया, पित्तप्रकोप व जलीय अंश की कमी के रोगी को गन्ना चूसकर ही सेवन करना चाहिए। इसके नियमित सेवन से दुबलापन दूर होता है और पेट की गर्मी पर हृदय की जलन दूर होती है। शरीर में थकावट दूर होकर तरावट आती है। पेशाब की रूकावट में जलन भी दूर होती है।

निषेधः मधुमेह (डायबिटीज), पाचनशक्ति की मंदता, कफ व कृमि के रोगवालों को गन्ने के रस का सेवन नहीं करना चाहिए। कमजोर मसूढ़े वाले, पायरिया व दाँतों के रोगियों को गन्ना चूसकर नहीं करना चाहिए। मुख्य बातः बाजारू मशीनों द्वारा निकाले गये रस से (यदि शुद्धतापूर्वक नहीं निकाला गया है तो) संक्रामक रोग होने की संभावना रहती है। अतः गन्ने का रस निकलवाते समय शुद्धता का विशेष ध्य़ान रखें।

पायरिया

दाँतों का एक बहुत ही प्रचलित रोग है पायरिया ! यह रोग आज की सभ्यता की देन है। डब्बों में बंद खाद्य पदार्थ, शक्कर, मैदा, पालिश वाले चावलों की ओर ज्यों-ज्यों हमारा आकर्षण बढ़ रहा है त्यों-त्यों इस रोग से आक्रांत लोगों की भी संख्या बढ़ती जा रही है।

निवारणः भोजन में क्षार की मात्रा भी होनी चाहिए जो कि चोकरदार आटा, दूध, ताजे पके पल व हरी कच्ची तरकारियों में अधिक मात्रा में होता है। यदि इसका ध्यान रखा जाये तो यह रोग कभी भी होगा नहीं।

कैल्शियम की कमीः अक्सर लोग कहा करते हैं कि चीनी खाने से दाँत खराब होते हैं। यह काफी अंशों में सही बात है। गन्ने के रस से जब चीनी बनती है, तो उसमें कैल्शियम (चूने) का अंश नहीं रह जाता और चीनी कैल्शियम के साथ बिना पचती नहीं। अतः चीनी के पाचन के लिए कैल्शियम हड्डियों से खिंचकर आता है। फलतः हड्डियाँ कमजोर हो जाती है। प्रभाव तो इसका शरीर के अऩ्दर हड्डियों के सारे ढाँचे पर पड़ता है किन्तु दाँत बाहर होने के कारण उसका प्रभाव उऩ पर प्रत्यक्ष दिखायी देता है। अतः दाँत के रोग समाप्त करने हैं तो भोजन में कैल्शियम की समुचित मात्रा होनी चाहिए जो कि हरी तरकारियों जैसे की फूलगोभी, टमाटर, लौकी, गाजर, खीरा, पालक, नारंगी, तिल व दूध में अधिक मात्रा में पाया जाता है।

दाँतों की कसरतः और अँगों की तरह दाँतों की कसरत भी आवश्यक है जो कि हलवा पूरी खाने से नहीं, अपितु कच्ची तरकारियाँ खाने से अथवा दोपहर शाम मुट्ठीभर भिगोये हुए गेहूँ चबा लिया जाये तो दाँतों की पूरी कसरत हो जाये। अंकुरित गेहूँ और भी लाभप्रद हैं। अंकुरित गेहूँ में विटामिन ई भी पैदा हो जाता है कि बाँझपन, नपुँसकता, गर्भपात हो जाना, जख्म जल्दी न भरना आदि रोगों में बहुत ही लाभप्रद है। यह प्रयोग कब्ज का भी नाश करता है।

दाँतों की बीमारी के साथ-साथ जिन्हें मसूढ़ों में भी तकलीफ रहती है वे विटामिन सी प्रधान संतरा, नींबू, टमाटर, पत्तागोभी, अनानास, अंगूर आदि का भी सेवन करें।

दाँत के लिए विशेष प्रयोग

जिनका रोग बढ़ गया है उन्हें अपने मसूढ़ों पर नित्य कुछ दिन दस-पन्द्रह मिनट तक भाप लगानी चाहिए। एक लोटे में थोड़ा पानी डालकर आग पर चढ़ा दीजिये। भाप निकलने लगे तो लोटे के मुँह पर एक चिल्म उल्टी रख दीजिये। चिलम की नली से भाप निकलने पर इच्छित स्थान पर आप भाप ले सकते हैं। भाप लेने के बीच दो-तीन बार ताजा जल से एक दो कुल्ला करें। यदि चेहरे पर भाप लगे तो चिन्ता की कोई बात नहीं है।

सुबह उठते समय व रात को सोने से पहले दाँत अवश्य साफ करें।

बाजारू दवाएँ लगाकर दाँतों को निकम्मा न बनायें अपितु सेंधा नमक मिला सरसों का तेल अथवा नींबू का रस लगाना काफी होगा।

भोजन के बाद मूली, गाजर, ककड़ी, सेव, अमरूद जैसी कोई कड़ी चीज का अवश्य सेवन करें। फल व तरकारियों का क्षार दाँतों को साफ करता है। इनका कोई अंश दाँतों में रह भी जाये तो इतना जल्दी नहीं सड़ता, जितना जल्दी पकी चीज का अंश सड़ता है। इस तरह यह प्रयोग करने से पायरिया की बीमारी तो समाप्त होगी ही, साथ ही दाँतों की पीड़ा, दाँतों का हिलना, मसूढ़ों की खराबी आदि भी समाप्त हो जायेगी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 1997, पृष्ठ संख्या 28,29,30 अंक 51

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शरीर स्वास्थ्य


वर्ष के दो भाग होते हैं जिसमें पहले भाग आदान काल में सूर्य उत्तर की ओर गति करता है, दूसरे भाग विसर्ग काल में सूर्य दक्षिण की ओर गति करता है। आदान काल में शिशिर, वसन्त एवं ग्रीष्म ऋतुएँ होती हैं। आदान काल में वर्षा, शरद एवं हेमन्त ऋतुएँ होती हैं। आदान काल के समय सूर्य बलवान और चन्द्र क्षीणबल रहता है।

शिशिर ऋतु उत्तम बलवाली, वसन्त ऋतु मध्यम बलवाली और ग्रीष्म ऋतु दौर्बल्यवाली होती है। विसर्ग काल में चन्द्र बलवान और सूर्य क्षीणबल रहता है। चन्द्र पोषण करने वाला होता है। वर्षा ऋतु दौर्बल्यवाली, शरद ऋतु मध्यम बल व हेमन्त ऋतु उत्तम बलवाली होती है।

वसन्त ऋतु

शीत ऋतु व ग्रीष्म ऋतु का सन्धिकाल वसन्त ऋतु का होता है। इस समय में न अधिक सर्दी होती है न अधिक गर्मी होती है। इस मौसम में सर्वत्र मनमोहक आमों के बौर से युक्त सुगन्धित वायु चलती है। वसन्त ऋतु को ऋतुराज भी कहा जाता है। वसन्त पंचमी के शुभ पर्व पर प्रकृति सरसों के पीले फूलों का परिधान पहनकर मन को लुभाने लगती है। वसन्तु ऋतु में रक्तसंचार तीव्र हो जाता है जिससे शरीर में स्फूर्ति रहती है।

वसन्त ऋतु में न तो गर्मी की भीषण जलन तपन होती है और न वर्षा की बाढ़ और न ही शिशिर की ठंडी हवा, हिमपात व कोहरा होता है। इन्हीं कारणों से वसन्तु ऋतु को ʹऋतुराजʹ कहा गया है।

वसन्ते निचितः श्लेष्मा दिनकृभ्दाभिरीरितः।

चरक संहिता के अनुसार हेमन्त ऋतु में संचित हुआ कफ वसन्त ऋतु में सूर्य की किरणों से प्रेरित (द्रवीभूत) होकर कुपित होता है जिससे वसन्तकाल में खाँसी, सर्दी-जुकाम, टॉन्सिल्स में सूजन, गले में खराश, शरीर में सुस्ती व भारीपन आदि की शिकायत होने की सम्भावना रहती है। जठराग्नि मन्द हो जाती है अतः इस ऋतु में आहार-विहार के प्रति सावधान रहो।

वसन्त ऋतु में आहार-विहार

      इस ऋतु में कफ को कुपित करने वाले, पौष्टिक और गरिष्ठ पदार्थों की मात्रा धीरे-धीरे कम करते हुए गर्मी बढ़ते ही बन्द कर सादा सुपाच्य आहार लेना शुरु कर देना चाहिए। चरक के अनुसार इस ऋतु में भारी, चिकनाई वाले, खट्टे और मीठे पदार्थों का सेवन व दिन में सोना वर्जित है। इस ऋतु में कटु, तिक्त, कषारस-प्रधान द्रव्यों का सेवन करना हितकारी है। प्रातः वायुसेवन के लिए घूमते समय 15-20 नीम की नई कोंपलें चबा-चबाकर खायें। इस प्रयोग से वर्ष भर चर्मरोग, रक्तविकार और ज्वर आदि रोगों से रक्षा करने की प्रतिरोधक शक्ति पैदा होती है।

यदि वसन्त ऋतु में आहार विहार के उचित पालन पर पूरा ध्यान दिया जाय और बदपरहेजी न की जाये तो वर्त्तमानकाल में स्वास्थ्य की रक्षा होती है। साथ ही ग्रीष्म व वर्षा ऋतु में स्वास्थ्य की रक्षा करने की सुविधा हो जाती है। प्रत्येक ऋतु में स्वास्थ्य की दृष्टि से यदि आहार का महत्त्व है तो विहार भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।

इस ऋतु में उबटन लगाना, तैल मालिश, धूप का सेवन, हल्के गर्म पानी से स्नान, योगासन व हल्का व्यायाम करना चाहिए। देर रात तक जागने और सुबह देर तक सोने से मल सूखता है, आँख व चेहरे की कान्ति क्षीण होती है अतः इस ऋतु में देर रात तक जागना, सुबह देर तक सोना स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद है। हरड़े के चूर्ण का नियमित सेवन करने वाले इस ऋतु में थोड़े से शहद में यह चूर्ण मिलाकर चाटें।

आयुर्वैदिक योग

शरीरपुष्टिः एक गिलास पानी में एक नींबू का रस निचोड़कर उसमें दो किशमिश रात्रि में भिगो दें। सुबह स्नानादि के बाद छानकर पानी पी जाएँ व किशमिश चबा जाएँ। यह एक अदभुत शक्तिवर्धक योग है।

एपेन्डिक्सः दो मिनट और अभ्यास होने पर चार-पाँच मिनट पादपश्चिमोत्तानासन करने से कुछ ही दिनों में एपेन्डिक्स मिट जाता है। यह अनुभूत प्रयोग है।

नकसीर (नाक से रक्त गिरना)- फिटकरी के पानी की कुछ बूँदें नाक में डालने पर नाक से खून आना बंद हो जाता है।

सफेद दागः गाय के मूत्र में तीन ग्राम हल्दी मिलाकर या तुलसी का रस लगाने व 5-7 ग्राम शहद में 10 ग्राम तुलसी का रस पीने से सफेद दाग मिटते हैं।

आयुर्वैदिक चायः गेहूँ के आटे को छानने पर जो चोकर शेष बचता है वह स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक है। 10 ग्राम छान (चोकर) को एक प्याले पानी में अच्छी प्रकार उबालकर कपड़े से छान लें। तत्पश्चात उसमें दूध व मिश्री मिलाकर प्रातः व सायं पियें। इसके निरन्तर सेवन से शरीर दृढ़ व शक्तिशाली बनता है। यदि इसमें पाँच बादाम अच्छी तरह मिला दिये जायें तो वृद्धत्व शीघ्र नहीं आता व दिमाग तेज होता है। नजला, जुकाम, सिरदर्द के लिए गुणकारी है।

गंजापनः सिर पर पत्तागोभी के रस की निरन्तर मालिश की जाय तो गंजापन, बाल झड़ना आदि रोग दूर हो जाते हैं।

पेट के अनेक रोगों के लिएः अजवायन 250 ग्राम व काला नमक 60 ग्राम, दोनों को किसी काँच के बर्तन या चीनी के बर्तन में डालकर इतना नींबू का रस डालें कि दोनों वस्तुएँ डूब जायें। तत्पश्चात इस बर्तन को रेत या मिट्टी से दूर किसी छायादार स्थान पर रख दें। जब नींबू का रस सूख जाय तो पुनः इतना रस डाल दें कि दोनों दवाएँ डूब जायें। इस प्रकार 5 से 7 बार करें। दवा तैयार है। 2 ग्राम दवा प्रातः व सायं भोजन के पश्चात गुनगुने पानी के साथ पी लें। पेट के अनेक रोगों को दूर करने के लिए यह अदभुत दवा है। इससे भूख खूब लगती है। भोजन पच जाता है। अफारा व पेट-दर्द दूर होता है। उल्टी व जी मिचलाने में भी लाभ होता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 1997, पृष्ठ संख्या 25,32 अंक 50

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