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Prerak Prasang

भक्त तुलाधार


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

श्री रामचरितमानस में आया हैः

गौधन गजधन बाजिधन, और रतन धन खान।

जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान।।

भक्त तुलाधार इसी संतोषरूपी धन के धनी थे। उन्होंने अयाचक व्रत ( न माँगने का  व्रत) धारण किया था। वे खेत में फसल कटने पर अन्न के गिरे हुए दाने बीनकर एकत्र कर लेते थे एवं उन्हीं से अपनी क्षुधा शांत कर लेते थे। शरीर पर वस्त्र के नाम पर एक ही फटी धोती एवं फटा गमछा था।

पत्नी भी ऐसी ही पवित्र थी। वह पति के व्रत में सहयोगी थी। दोनों भगवद भजन में मस्त रहते थे। इच्छाएँ छोड़कर भगवान के रस में इतने तृप्त हो गये थे कि बड़े-बड़े राजाओं का सुख भी उनको आत्मसुख के आगे तुच्छ दिखता था। जो निष्कामी होते हैं, निःस्पृहि होते हैं, आत्मारामी होते हैं, ऐसे पवित्र संतों को प्रसिद्ध करने के लिए भगवान भी कभी कुछ-न-कुछ लीला कर लिया करते हैं !

तुलाधार स्वयं तो कुछ नहीं चाहते थे लेकिन उनकी महिमा बढ़ाने के लिए भगवान ने उनकी परीक्षा की। एक दिन जब तुलाधार स्नान करने के लिए नदी पर गये तो देखा कि चार-पाँच नये वस्त्र पड़े हैं। तुलाधार ने देखा लेकिन मन-ही-मन विचार करने लगे कि मेरा गुजारा तो इस फटी धोती से ही हो जाता है। जिस शरीर को ढँकता हूँ, वह शरीर भी एक दिन न रहेगा तो ढँकने का साधन ये वस्त्र कितने दिन तक ? किसी के पड़े हुए वस्त्र मैं क्यों लूँ ? जिस शरीर को एक दिन जला देना है उसके लिए चिंता क्यों करूँ ? मुझे तो भगवान का चिंतन करना चाहिए।

तुलाधार ने वस्त्र न उठाये, स्नान करके अपने घर चले गये। भगवान ने देखा कि है तो पक्का। दूसरे दिन भगवान ने मार्ग में तुलाधार को दिखे इस प्रकार अशर्फियों से भरा घड़ा रख दिया।

तुलाधार स्नान करने के लिए गये तो देखा कि अशर्फियों से भरा घड़ा ! सोने की मोहरें देखकर उन्हें अपनी दरिद्रता का ख्याल भी आया। परंतु उनके हृदय ने कहाः ‘मैंने तो अयाचक व्रत लिया है। मेरा सोना तो मेरा आत्मा, मेरा राम है। मेरा सोना तो पवित्र आचार है। फिर भी मैं अगर यह धन ले लूँ तो धन तो अनर्थों की जड़ है। धन आते ही भोग की इच्छा बढ़ने लगती है। धन आते ही अहंकार बढ़ने लगता है। धन आते ही कुटुंबी और स्वजनों में राग-द्वेष बढ़ने लगता है।

तुलाधार सोने की अशर्फियों को वहीं छोड़कर स्नान करके चले गये।

भगवान ने देखाः तुलाधार बड़ा पक्का है। इतनी स्वर्णमुहरें भी उसके चित्त को चलित न कर पायीं ! अब भगवान से रहा न गया… परीक्षा का पेपर जितना बढ़िया होता है उतनी कड़क जाँच होती है, वैसे ही भक्त जितना बढ़िया होता है उतनी कसौटी भी ज्यादा होती है।

भगवान एक ज्योतिषी का रूप लेकर भक्त के नगर में प्रविष्ट हुए। किसी का हाथ देखते थे, किसी का ललाट देखते थे और उसका भविष्य बता देते थे। देखते-देखते वे तुलाधार के पड़ोस में पहुँचे। तुलाधार की पत्नी ने देखाः कोई बड़े ज्योतिषी आये हैं और सब सच-सच बता देते हैं’ वह भी गयी ज्योतिषी के पास ?

उसे देखते ही ज्योतिषी ने कहाः

“आपके पति का नाम तुलाधार है।”

पत्नीः “आप धन्य हैं महाराज ! धन्य हैं।”

ज्योतिषीः “आपके पति अयाचक व्रत में दृढ़ नहीं हैं। आप गरीबी नहीं चाहती हो लेकिन पतिव्रता होने के कारण आपने पति की इच्छा को में मिला दिया है।”

पत्नीः “महाराज ! आप बिल्कुल सच कहते हैं।”

ज्योतिषीः “आपके पास ही एक ही साड़ी है। उसी को स्नान के पश्चात गीली होने पर रसोईघर में वहाँ की गरमी से अपने तन पर सुखाती हो। आप लोग खेत में अन्न के दाने चुनकर लाते हो और उन्हीं से सत्तू बनाकर भगवान को भोग लगाकर खा लेते हो। आज तक भगवान ने आपको कुछ न दिया, फिर भी उसी भगवान का आप भजन करते हो?”

पत्नीः “महाराज ! ऐसा न कहें। आपकी बात तो सच है, लेकिन हम धन या अन्न वस्त्र पाने के लिए उन्हें नहीं रिझाते।”

ज्योतिषीः दो दिन पहले ही आपके पति जब नदीं में नहाने के लिए गये थे, तब उन्हें रास्ते में पाँच-छः सुंदर धोती और साड़ियाँ पड़ी मिली थीं। आपके पति ने उन्हें छुआ तक नहीं और नहाकर वापस चले आये।”

पत्नीः “महाराज ! आप सच कहते हैं ?”

ज्योतिषी तो भगवान का स्वरूप थे। वे सच न बोलेंगे तो कौन बोलेगा ?

पत्नी भागी-भागी गयी अपने पति के पास और बोलीः “एक अंतर्यामी महाराज आये हैं, वे पूरे अंतर्यामी हैं। आप भी चलकर उनका दर्शन करें।”

तुलाधार ने आकर ज्योतिषी को प्रणाम किया और कहाः

“महाराज ! जरा आप हमारा भी ललाट देखें परंतु हमारे पास देने के लिए दक्षिणा नहीं है।”

ज्योतिषी ने कहाः “हम दक्षिणा लेते ही नहीं हैं। हम लेने को नहीं देने को निकले हैं।”

फिर तुलाधार का हाथ देखते हुए बोलेः “आपको दो दिन पहले धोती और साड़ियाँ मिली थीं, परन्तु आपने उन्हें नहीं लिया। धन की रेखा तो है लेकिन ‘ना-ना’ करके यह चौकड़ी आ गयी हैं। आज सुबह भी आपको स्वर्णमुद्राओ से भरा कलश  मिला था….”

यह सुनकर तुलाधार को बड़ा आश्चर्य हुआः “महाराज ! ये बातें तो मैंने किसी को नहीं बतायीं, आपको कैसे पता चल गयी ?

ज्योतिषीः “किसी को नहीं बतायीं  लेकिन रेखाएँ साफ—साफ बोल रही हैं। आपने उन स्वर्णमुहरों को देखा, आपको अपनी गरीबी भी याद आयी। फिर भी आपने नहीं ली।”

तुलाधारः “महाराज ! आपकी बात सही है।”

ज्योतिषीः “तुलाधार ! आप अपने भाग्य को स्वयं ठोकर मारते हो। हम ज्योतिषी हैं इसलिए सच्ची बात बताते हैं। सब गुण धन में आश्रित होते हैं। धनवान के अवगुण दब जाते हैं। धन से आदमी होम-हवन, यज्ञ-याग कर सकता है। धन से आदमी माता-पिता और गुरुजनों की सेवा करके आशीर्वाद पा सकता है। धन से क्या नहीं हो सकता है ?”

तुलाधारः “महाराज ! धन से सब कुछ होता है। धन से स्वर्ग का सुख मिलता है और स्वर्ग का सुख भोगकर फिर नरक में जाना पड़ता है। धन से अभिमान बढ़ता है, धन से भोग-वासना बढ़ती है, धन से लोभ बढ़ता है और धन की रक्षा-रक्षा में आदमी की आयुष्य पूरी हो जाती है।”

ज्योतिषी महाराज कहते हैं कि धन से सब कुछ होता है और तुलाधार भी कहते हैं कि धन से सब कुछ होता है, लेकिन जहाँ ज्योतिषी धन का प्रलोभन दिखा रहे हैं, वही तुलाधार धन के दोष बता रहे हैं। जिनको आत्मधन मिल गया वे नश्वर धन की कामना क्यों करेंगे ? जिनको आत्मसुख मिल गया वे संसार के नश्वर सुख की इच्छा क्यों करेंगे ? जिनको आत्मजीवन मिल गया वे देह की आसक्ति क्यों करेंगे ?

आखिरी ज्योतिषी चुप हो गये क्योंकि सत्य के आगे तो न्यायाधीशों को भी चुप रहना पड़ता है। तुलाधार धन के पूरे दोष बताने में सफल हो गये तो भगवान मौन हो गये। भगवान भीतर से बड़े प्रसन्न हो गये और अपनी प्रसन्नता की जरा-सी निगाह तुलाधार पर डाल दी।

अब तुलाधार को हुआः ‘हमारा हित चाहने के लिए इन्होंने इतनी बातें बतायीं और मैंने इनकी सब बातें काट दीं, फिर भी ये क्रोधित न हुए। जिसको कामना होती है, उसी को क्रोध आता है। मालूम होता है कि ये कोई महात्मा हैं या फिर स्वयं परमात्मा हैं क्योंकि इन्हें तनिक भी क्रोध नहीं आया।’

तुलाधार ने गहराई से देखा तो उसके चित्त में शांति और प्रसन्नता का साम्राज्य बढ़ा। उन्होंने ज्योतिषी के चरण पकड़ लिये और बोलेः

“भगवान ! आप और इस वेश में ! आप यह छलिया-वेश धारण करके आये ! अब आप अपने असली वेश में प्रगट हो जायें कृपा करें…. प्रभु !”

भगवान नारायण अपने असली रूप में प्रगट हो गये और तुलाधार को गले से लगा लिया।

जिनको कोई कामना नहीं है उन्हीं को भगवान अपने गले से लगाते हैं। कामना घटाने दो तरीके हैं-

ईश्वर से प्रीति इतनी हो जाये कि उनके सिवाय कोई कामना उठे ही नहीं।

अगर कामना उठे भी तो खुद सुख लेने की नहीं, वरन् दूसरों को सुख देने की कामना उठे। जो दूसरों को सुख देता है, वह स्वयं सुख का दाता हो जाता है। राजवैभव से युक्त जनक, श्रीकृष्ण, श्रीराम तथा विरक्त प्रारब्धप्रधान शुकदेव और तुलाधार ये सभी अनासक्ति एवं आत्मसुख की तृप्ति के अनुभव में एक ही थे।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 18-20, अंक 108

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भक्त मोहन


(अमदावाद में मार्च 2001 में आयोजित विद्यार्थी शिविर में देश के नन्हें-नन्हें भावी कर्णधारों को प्रेरक प्रसंग के माध्यम से भक्तिकी महिमा समझाते हुए पूज्य श्री ने कहाः)

मोहन की माँ ने उसे पढ़ने के लिए गुरुकुल में भेजा। मोहन के पिता का बचपन में ही स्वर्गवास हो गया था। गरीब ब्राह्मणी ने अपने इकलौते बेटे को गाँव से  5 मील दूर गुरुकुल में प्रवेश करवाया। गुरुकुल जाते समय बीच में जंगल का रास्ता पड़ता था।

एक दिन घर लौटने में मोहन को देर हो गयी। भयानक जानवरों की आवाजें आने लगीं। कहीं चीता, कहीं शेर तो कहीं सियार…. मोहन थर-थर काँपने लगा। मोहन जैसे-तैसे करके जंगल से बाहर निकला। उसकी माँ राह देख रही थी। माँ ने कहाः

”बेटा ! क्यों डरता है?”

मोहनः ”माँ ! अँधेरा हो गया था। हिंसक प्राणियों की भयानक आवाजें आ रही थीं। माँ ! इसलिए बड़ा डर लगता था। भगवान का नाम लेता-लेता मैं किसी तरह भाग आया।”

माँ- ”तू अपने भाई को बुला लेता।”

मोहनः ”माँ ! मेरा कोई भाई भी है क्या ?”

माँ- ”हाँ, हाँ,बेटा ! तेरा बड़ा भाई है।”

मोहनः ”कहाँ है?”

माँ- ”जहाँ से बुलाओ, आ जाता है।”

मोहनः ”भाई का नाम क्या है ? माँ !”

माँ- ”बेटा! तेरे भाई का नाम है गोपाल। कोई उसको गोपाल बुलाता है,कोई गोविन्द,कोई कृष्ण बोलता है,कोई केशव। वही तेरा बड़ा भाई है, बेटा ! जब भी डर लगे तब तू ‘गोपाल भैया…. गोपाल भैया’ करके उसको पुकारना तो वह आ जायेगा।”

दूसरे दिन गुरुकुल से लौटते वक्त जंगल में मोहन को डर लगा। उसने पुकाराः

”गोपाल भैया ! गोपाल भैया ! आ जाओ न, मुझे बड़ा डर लग रहा है… गोपाल भैया।”

इतने में मोहन को बड़ा ही मधुर स्वर सुनायी दियाः ”भैया ! तू डर मत। मैं यह आया।”

गोपाल भैया का हाथ पकड़कर मोहन निडर होकर चलने लगा। जंगल की सीमा तक मोहन को लौटाकर गोपाल लौटने लगा।

मोहनः ”गोपाल भैया ! घर चलो।”

गोपालः ”नहीं भैया ! मुझे और भी काम हैं।”

घर जाकर मोहन ने माँ को सारी बात बतायीः ”माँ ! माँ ! आज भी देर हो गयी। जंगल में डर लगने लगा तो मैंने गोपाल भैया को पुकारा। वे मुझे गाँव की सीमा तक छोड़ गये।”

माँ समझ गयी  कि जो दयामय द्रौपदी और निर्दोष गजेन्द्र की पुकार  पर दौड़ पड़े थे, मेरे भोले, निर्दोष और दृढ़ श्रद्धावाले बालक की पुकार पर भी वे ही आये थे।

अब मोहन वन में पहुँचते ही गोपाल भैया को पुकारता और वे झट आ जाते।

एक दिन गुरुकुल में गुरुजी के यहाँ सारे बच्चे और कुछ शिक्षक उपस्थित हुए। गुरुजी के यहाँ दूसरे दिन श्राद्ध था। कौन बच्चा इस निमित्त क्या लायेगा, इस पर बातचीत हो रही थी। किसी ने कहाः ”मैं दूध लाऊँगा।”

किसी ने कहाः ”मैं शक्कर लाऊँगा.”

किसी ने कहाः ”चावल लाऊँगा।”

किसी ने कहाः ”चारोली और इलायची लाऊँगा।”

मोहन गरीब था फिर भी उसने कहाः ”गुरु जी ! गुरु जी ! मैं दूध लाऊँगा। अपनी माँ से जाकर कहूँगा तो मेरी माँ दूध का खूब बड़ा लोटा भर देगी, मैं ले आऊँगा।

गुरु जी को पता था कि ”यह गरीब है क्या लायेगा ?”

मोहन ने घर जाकर गुरु के यहाँ श्राद्ध की बात कही और कहाः ”माँ ! मुझे भी एक लोटा दूध ले जाना है।”

गरीब माँ कहाँ से दूध लाती ? माँ ने कहाः ”बेटा जब गुरुकुल जायेगा न तो गोपाल भैया को पुकारना। तू गोपाल भैया से दूध माँग लेना, वे ले आयेंगे।”

दूसरे दिन मोहन ने जंगल में जाते ही गोपाल भैया को पुकारा और कहाः आज मेरे गुरु जी के पिता का श्राद्ध है। मुझे एक लोटा दूध लेकर जाना है। माँ ने कहा है कि गोपाल भैया से माँग लेना।

गोपाल ने मोहन के हाथ में देते हुए कहाः अपने गुरु जी को दे देना।

मोहन लोटा लेकर गुरुकुल पहुँचा। कोई ढेर सारे चावल लाया, तो कोई शक्कर और यह तो केवल एक लोटा दूध लाया !

मोहनः गुरु जी, गुरु जी ! गोपाल भैया ने दूध भेजा है।

गुरु जी व्यस्त थे, सामने तक न देखा। उन्हें पता न था कि गरीब मोहन क्या लाया होगा।

मोहन ने फिर से कहाः गुरु जी, गुरु जी ! मैं दूध लाया हूँ,गोपाल भैया ने दिया है।

गुरु जीः बैठ, अभी।

थोड़ी देर बाद मोहन फिर बोलाः गुरु जी, गुरु जी मैं दूध लाया हूँ, गोपाल भैया ने दिया।

गुरु जी ने कहाः सेवक ! ले जा। जरा-सा दूध लाया है और सिर खपा दिया। जा, इसका लोटा खाली कर दे।

सेवक लोटा ले गया। खाली बर्तन में दूध डाला बर्तन भर गया। दूसरे बर्तन में डाला, दूसरा बर्तन भी भर गया। जितने बर्तनों में दूध डालता बर्तन भर जाते,पर लोटा खाली न होता होता  सेवक चौंका। उसने गुरु जी को जाकर बताया।

गुरु जीः कहाँ से लाया है यह अक्षय पात्र?

मोहनः एक मेरा गोपाल भैया है, उनसे माँगकर लाया हूँ।

गुरुजीः तेरी आवाज सुनकर गोपाल भैया कैसे आ गये?

मोहनः मेरी माँ ने बताया था कि कोई यदि प्रेम से और विश्वास से उसको पुकारे, ध्यान करे तो वह प्रकट हो जाता है। एक दिन घर जाने में देर हो गयी थी। जंगल में शेर चीतों की आवाज सुनकर मैं घबरा गया और उसको पुकारा तो वह आ गया। आज मैंने गोपाल भैया से कहा कि दूध चाहिए। तो वह दूध ले आया।

गुरु जी ने मोहन को प्रणाम किया और कहाः मोहन, मुझे भी ले चल, अपने गोपाल भैया के दर्शन करा।

मोहनः चलिये, गुरु जी। जब मैं घर जाऊँगा तब जंगल के रास्ते में गोपाल भैया को बुलाऊँगा। आप भी देख लेना।

श्राद्ध विधि पूरी होने के बाद गुरु जी मोहन के साथ चले। रास्ते में जंगल आया। मोहन ने आवाज लगायीः गोपाल भैया, गोपाल भैया, आ जाओ न।

मोहन को आवाज सुनायी दीः आज तुम अकेले तो हो नहीं, डर तो लगता नहीं, फिर मुझे क्यों बुलाते हो ?

मोहनः गोपाल भैया, डर तो नहीं लगता लेकिन मेरे गुरु जी तुम्हारे दर्शन करना चाहते हैं।

गुरु जीः मेरे कर्म ऐसे हैं कि मुझे देखकर भगवान नहीं आते। तू दूर जाकर पुकार।

मोहन ने दूर जाकर पुकारा। गोपाल भैया दिखे। मोहन ने कहाः मेरे गुरु जी को भी दर्शन दो न।

गोपालः वे मेरा तेज सहन नहीं कर सकेंगे। तेरी माँ तो बचपन से भक्त थी, तू भी बचपन से भक्ति करता है। तुम्हारे गुरु जी ने इतनी भक्ति नहीं की है। गुरु जी से कहो कि जो प्रकाश पुंज  दिखेगा, वही गोपाल भैया है। जाओ, गुरु जी को मेरे प्रकाश का दर्शन हो जायेगा। उसी से उनका कल्याण हो जायेगा।

मोहन ने आकर कहाः देखो, गुरु जी गोपाल भैया खड़े हैं।

गुरु जीः मेरे को गोपाल भैया नहीं दिखते, केवल प्रकाश दिखता है।

मोहनः हाँ, वही है, वही है गोपाल भैया।

गुरु जी गदगद हो गये। उनका रोम रोम आनंदित हो उठा, अष्टसात्विक भाव प्रकट हो गये। गुरुजीः गोपाल,गोपाल करके पुकार उठे। अब तो गुरुजी मोहन को अपना गुरु मानने लगे क्योंकि उसी ने भगवद् दर्शन का रास्ता बताया।

तुम भी मोहन की नाँईं भगवन्नाम जपते जाओ। गोपाल भैया तुम पर भी प्रसन्न हो जायेंगे… स्वप्न में भी दर्शन दे देंगे। बच्चों पर तो वे जल्दी खुश होते हैं। तुम भी भगवान के साथ सेवक स्वामी, सखा भैया के भाव से कोई भी सम्बंध जोड़कर प्रेम से उन्हें पुकारोगे तो तुम्हारे हृदय में भी आनंद प्रकट हो जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 27-29, अंक 107

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वास्तविक अमृत कहाँ ?


राजा भोज के दरबार में चर्चा हो रही थी किः “अमृत कहाँ होगा ?”

एक विद्वान ने कहाः “अमृत कहाँ होगा पूछने की क्या जरूरत है ? स्वर्ग में अमृत है।”

दूसरे विद्वान ने कहाः “ठहरो। स्वर्ग में अगर अमृत होता तो फिर स्वर्ग से पतन नहीं होना चाहिए। पुण्यों का नाश नहीं होना चाहिए और स्वर्ग में राग द्वेष नहीं होना चाहिए। हम स्वर्ग में वास्तविक अमृत नहीं समझते हैं।”

तीसरे विद्वान ने कहाः “अमृत चन्द्रमा में है। चंद्रमा अमृत बरसाता है। उसी से पेड़-पौधे एवं औषधियाँ पुष्ट होती हैं।”

चौथे विद्वान ने कहाः “अगर चन्द्रमा में अमृत है तो उसका क्षय क्यों होता है ? पूनम के बाद फिर क्षय होने लगता है। दूसरे, उसमें कलंक क्यों दिखता है ?”

अनजान कामी कवियों के रंग में रंगे कलयुगी मति के कवि ने कहाः “अमृत न स्वर्ग में है, न चंद्रमा में है। अमृत तो स्त्री के होठों में है, अधरामृत।”

किसी जानकार ने कहाः “स्त्री में अगर अमृत है तो वह विधवा क्यों होती है ? दुःखी क्यों होती है ? उसके होठों के नजदीक बदबू क्यों आती है ?”

किसी ने कहाः “अमृत तो सर्पों के पास होता है तो दूसरे ने कहा मणिधारों के पास अगर अमृत होता है तो उनमें विष कहाँ से आता है ? विष भी अमृत हो जाना चाहिए।”

किसी ने कहाः “सागर में अमृत में है।”

“अगर सागर में अमृत होता तो सागर खारा क्यों होता ?”

इस प्रकार चर्चा चल रही थी। इतने में कालीदास जी आये। सबने उनसे पूछाः “अमृत कहाँ होता है ?”

“तुम्हारा क्या निर्णय है ?”

किसी ने कहा, स्वर्ग में होता है। किसी ने कहा, मणिधारों के पास होता है। किसी ने स्त्री में बताया। किसी ने चन्द्रमा में तो किसी ने सागर में बताया।

आशिर प्रश्न का उत्तर पाने के लिए सबने कालिदास जी को प्रणाम किया और कहाः “आप ही बताइये।”

उन्होंने बतायाः “न स्वर्ग में वास्तविक अमृत है, न पृथ्वी पर वास्तविक अमृत है, न स्त्री में अमृत है, न सागर में शाश्वत अमृत है, न चन्द्रमा में शाश्वत अमृत है। स्वर्ग का अमृत तो दरिया का क्षोभ करने से पैदा हुआ था और स्त्री को अमृत मानते हो तो विकारी को उसमें अमृत दिखता है, निर्विकारी को तो नहीं दिखता। रज-वीर्य से तो शरीर बना फिर उसमें अमृत कहाँ से आया ? अमृत तो हमें मिला संतों की सभा में जहाँ अमर तत्त्व की बात सुनते सुनते ये मृत चित्त और मृत शरीर भी अमृत जैसे आनंद में सराबोर हो जाते हैं। अमृत हमने संतों की सभा में पाया।” अमृत हमने सत्संग में पाया और उसी अमृत के बल से हम चित्त के प्रसाद से, आत्म-अमृत से संतुष्ट हैं और तुम पर निगाह डालता हूँ तो तुम्हें भी संतोष हो रहा है, आनंद आ रहा है। सच्चा अमृत तो संतों की सभा में है।

स्वर्ग का अमृत तो दरिया का मंथन करने से निकला था लेकिन संत के हृदय का अमृत तो परमात्मा का चिंतन करने से, परमात्म तत्त्व के बोध के प्रभाव से आनंद उत्पन्न करते करते निकलता है। स्वर्ग का अमृत तो क्षोभ से निकला था, मंथन से निकला था। लेकिन संत के हृदय से परमात्मा की चर्चा शीतलता और शांति से निकलती है। वही सच्चा अमृत है।

कंठे सुधा वसति वै भगवज्जनानाम्।

भगवान के प्यारे भक्तों, संतों के कंठ में, उनकी आत्मिक वाणी में ही वास्विक अमृत होता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 17 अंक 105

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