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Prerak Prasang

महापुरुषों के पास हजारों युक्तियाँ हैं


संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

19-10-1982 की सत्संग कैसेट से

मनुष्य का कर्तव्य है कि उसे जिस चीज से लाभ होता है, उस लाभ को वह दूसरों तक पहुँचाये। जिस चीज से अपनी भलाई हुई, मानवता के नाते वैसी ही भलाई दूसरों की भी हो ऐसा प्रयत्न करना चाहिए। फिर भले ही वह किसी भी जाति का हो, मनुष्य होने के नाते यह उसका कर्तव्य हो जाता है।

जापान में एक इन्स्टीट्यूट खुला। उसमें प्राकृतिक आहार-विहार एवं आसनों के द्वारा चिकित्सा होती थी और लोग तंदरुस्त हो जाते थे। अखबारों में, रेडियो में, टी.वी. में उस इन्स्टीट्यूट के समाचारों को प्रकाशित किया गया एवं कई बड़े-बड़े समारोह हुए। राष्ट्र स्तर पर उसका प्रचार हो गया।

इन्स्टीट्यूट के संचालक से पूछा गया किः “आपको इन्स्टीट्यूट खोलने की प्रेरणा कहाँ से मिली ?”

तब उस जापानी ने कहाः “मुझे ये विचार भारत के श्वासन से मिले। भारतीय योग के शवासन से तंदरुस्त होने की पद्धति मैंने पायी।”

भारत के केवल एक शवासन से जापानी ने तंदरुस्त होने की तकनीक पायी, संस्था चलायी और राष्ट्र-स्तर पर प्रसिद्ध हो गया। लोगों को घर बैठे संदेश मिला किः ‘ऐसे तंदरुस्त हो सकते हैं।’ उन लोगों को भारतीय संस्कृति की दिव्यता की जरा-सी युक्ति (तकनीक) मिल जाती है तो पूरे देश में फैला देते हैं और यहाँ… इतना सारा खजाना मिल रहा है फिर भी फायदा नहीं उठाते….. कैसी दुर्दशा है !

हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने योगदृष्टि से, अंतर्दृष्टि से जीवन का सूक्ष्म निरीक्षण करके मानव जीवन की उन्नति के गहनतम रहस्य खोज लिये थे। केवल तन की तंदरुस्ती ही नहीं, बल्कि मन की प्रसन्नता एवं बुद्धि के विकास के अनेकों प्रयोग बताये थे। योगविद्या व ब्रह्मविद्या के सूक्ष्मतम रहस्यों का लाभ जाने-अनजाने में भी आम जनता तक पहुँच जाये, इसलिए प्रज्ञावान ऋषि-महर्षियों ने सनातन सत्य की अनुभूति के लिए जीवन-प्रणाली बनाई। विधि-निषेध का ज्ञान देने वाले शास्त्र और विभिन्न स्मृतियों की रचना का ताकि हम उत्तरोत्तर उन्नति के मार्ग पर चलकर अंत में आत्म-विश्रांति के पद पर पहुँच जायें। लेकिन आज के मानव का आलस्य कहो, नादानी कहो, स्वार्थपना कहो, खुदगर्जी कहो….. किसी महापुरुष के पास कितना खजाना है यह नहीं देखेंगे, उनकी वाणी से कितना लाभ होता है यह नहीं देखेंगे, उनकी वाणी से कितना लाभ होता है यह नहीं देखेंगे, उनके सान्निध्य से जीवन कितना उन्नत होता है यह नहीं देखेंगे, वरन् ‘विवेकानंद ऐसा करते थे…. स्वामी रामतीर्थ ऐसा करते थे…. और ये तो ऐसा करते हैं…. वैसा करते हैं…..’ ऐसा करके कुप्रचार में लग जाते हैं और महापुरुषों के पास जो आत्मखजाना है उसे लेने में ऐसे ही अभागे रह जाते हैं।

संत-महापुरुष आते हैं तो कई शिष्य साधक धीरे-धीरे सेवा करके कुछ आश्रमादि बनाते हैं। संत विद्यमान हैं तब तक तो सब ठीक लेकिन संत चले जाते हैं तो ट्रस्टी लोग उनके मालिक बनकर बैठ जाते हैं। फिर न किसी साधु-संत की सेवा न समाज की सेवा, बल्कि अपने अहंकार की सेवा में आश्रमों को लगा देते हैं। आश्रमों को खण्डहर जैसे बना देते हैं।

बाहर से रंग-रोगन तो बहुत करते हैं लेकिन जिस आश्रम में संत नहीं, वह आश्रम क्या, खण्डहर ही है। जैसे शरीर में प्राण, वैसे आश्रम में संत। इतने बड़े-बड़े सुंदर आश्रम बने हैं, फिर नया बनाने की कोई जरूरत नहीं है लेकिन जो बने हैं वे ऐसे खुदगर्ज लोगों के हाथों में हैं जो केवल अपना अहंकार पुजवाना चाहते हैं। साधकों के लिए, सत्पुरुषों के लिए, संतों के लिए उन आश्रमों में जगह नहीं है।

आप हरिद्वार में साधना करने जाओ तो बड़े-बड़े आश्रम दिखेंगे लेकिन आप साधना नहीं कर पाओगे। आपको पर्णकुटीर बाँधनी पड़ेगी। नर्मदा किनारे भी बड़े-बड़े आश्रम हैं लेकिन आप वहाँ साधना करने जाओ तो नहीं कर सकते क्योंकि वहाँ ऐसे-ऐसे नाग बैठे हैं कि उनकी गुलामी से ही आपको ऊँचे नहीं आने देंगे।

भारत में कई ऐसे महापुरुष हैं जिनके पास अमाप सामर्थ्य है, अखूट आत्म-खजाना है, दिव्य आत्म-अमृत है लेकिन ऐसा कोई दुर्भाग्य है भारतवासियों का कि वे पूरा लाभ नहीं उठा पाते। सारा  विश्वव जिनके दिव्य अमृत की एक बूँद को पाकर ही परितृप्ति का एहसास कर सकता है उनके अमृत की एक बूँद पाना भी मुनासिब नहीं हो पा रहा।

खेत सूख रहा है और कुएँ में पानी लबालब भरा है ! मोटर लगी हुई है, नालियाँ भी बनी हुई हैं लेकिन मोटर चालू करके खेत में पानी पिलाने का किसी को सूझता नहीं नहीं है। समाज में अशांति, भय, विरोध, परेशानियों से जीवनरूपी खेत सूख रहा है और उसको हरा भरा बनाने में समर्थ तत्त्ववेत्ता, योगी, ज्ञानी, परोपकारी, प्रसन्नात्मा महापुरुषरूपी कुएँ लबालब भरे हुए हैं। फिर भी समाजरूपी खेत बेचारा सूखता जा रहा है। धनभागी हैं वो संत और समाज के बीच सेवा की धारा बनकर, समाजरूपी खेत को सींचकर सुपल्लवित करना चाहते हैं। जिनमें ईर्ष्या, अहंकार और दम्भ को छोड़कर सच्चाई, स्नेह, विनम्रता का सदगुण है, आप अमानी रहकर दूसरों को मान देने का सदगुण है वे धनभागी लोग समाज व संत के बीच धारा बनने में सफल हो जाते हैं।

ईश्वर को पाना कोई कठिन नहीं है। केवल अपनी बुद्धि को छोड़ना कठिन है, अपना स्वार्थपना छोड़ना कठिन है, अपने अहंकार की पूजा छोड़ना कठिन है।

स्वामी विवेकानन्द ने किसी से कहाः “मेरा शिष्य, मेरा शेर किसी की गुलामी करे ? किसी के यहाँ रहे ?”

उसने कहाः “स्वामी जी ! फिर मैं क्या करूँ ?”

विवेकानंदः “क्या करूँ, क्या ? त्यागपत्र दे दे, संन्यासी हो जा। भिक्षापात्र ले, भीख माँगकर आ….. ‘नारायण हरि कर…. अपने को बिखेर दे।”

शिष्य गया। भिक्षा लेकर आया तो विवेकानन्द ने कहाः “तुमको भिखारी बनाने के लिए यह भिक्षापात्र नहीं दिया है लेकिन जन्म मरण का भिखारीपना मिटाने के लिए मैंने यह भिक्षापात्र दिया है।”

संत-महापुरुषों की प्रत्येक चेष्टा में बड़ा राज होता है। हमारा मन जिसको अच्छा मानता है उसको करता है और जिसको अच्छा नहीं मानता उसको नहीं करता। लेकिन गुरु को जैसा अच्छा लगता है, महापुरुषों को जैसा अच्छा लगता है वैसा करो तो कल्याण ही कल्याण है।

महापुरुषों की इच्छानुसार चलने वाले तो कोई विरले ही होते हैं, बाकी तो अपना स्वार्थ सिद्ध करने वालों की भीड़ होती है कुछ तो ऐसे अभागे होते हैं कि संत-महापुरुषों के पास जाना तो दूर, उनके व्यवहार की कमियों को ढूँढकर उनके ही कुप्रचार में लग जाते हैं। ऐसे अभागे मनुष्य स्वयं तो अपना नुकसान करते ही हैं, औरों की श्रद्धा को ठेस पहुँचाने को बड़ा पाप भी अपने सिर पर ले लेते हैं।

भारतवासियो ! सावधान !! ऐसे लोगों के कुचक्रों एवं षडयन्त्रों से सावधान रहना। उनके चक्कर में कभी न आना। याद रखनाः तुम उन्हीं ऋषि-मुनियों की संतान हो जिन्होंने केवल तन की तंदरुस्ती के ही उपाय नहीं खोजे हैं वरन् मन की प्रसन्नता और बुद्धि को बुद्धिदाता में लगाने की युक्तियाँ भी खोजी हैं। मानव को उसके महेश्वर पद तक पहुँचाने की युक्तियाँ जिन्होंने बतायी है, तुम उन्ही ऋषि-मुनियों की  संतान हो। एक जापानी केवल शवासन से स्वस्थ रहने की तकनीक जानकर जापानियों को लाभान्वित कर सकता है तो तुम्हारे महापुरुषों के पास तो ऐसी हजारों तकनीकें है, हजारों युक्तियाँ हैं जिन्हें आजमाकर तुम सुखी, समृद्ध एवं सम्मानित जीवन जी सकते हो और परम सुखस्वरूप परमात्मा के आनंद को भी पा सकते हो। उठो…. जागो…. देर मत करो। अभी भी वक्त है चेतने का। अतः चेत जाओ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2001, पृष्ठ संख्या 10-12, अंक 101

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समय बड़ा बलवान….


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

श्रीकृष्ण के स्वधामगमन के बाद अर्जुन उनकी आज्ञा के अनुसार द्वारिका से यदुवंश की स्त्रियों, वृद्धों एवं बच्चों को लेकर इन्द्रप्रस्थ की ओर चल पड़े। चलते-चलते बुद्धिमान एवं सामर्थ्यशाली अर्जुन ने अत्यंत समृद्धशाली पंचनद देश (पंजाब) में पहुँचकर पड़ाव डाला।

एकमात्र अर्जुन के संरक्षण में ले जायी जाती हुई इतनी अनाथ स्त्रियों को देखकर वहाँ रहने वाले लुटेरों के मन में लोभ पैदा हुआ। आपस में चर्चा करके उन्होंने अर्जुन के साथ आये हुए लोगों पर धावा बोल दिया। यह देखकर अर्जुन अपने गांडीव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने लगे। बड़ी मुश्किल से गांडीव पर प्रत्यंचा चढ़ी परन्तु जब वे अपने अस्त्र-शस्त्रों का, मंत्रों का चिंतन करने लगे तब उनकी याद बिल्कुल नहीं आयी। वे बड़े लज्जित हुए। लुटेरे यदुवंशी स्त्रियों को ले चले।

समय बड़ा बलवान है, मनुज नहीं बलवान।

काबे अर्जुन लूटिया, वही धनुष वे ही बाण।।

जिस गांडीव से अर्जुन ने अनेक महारथियों को परास्त किया था, उसी गांडीव से आज वे यदुवंश की स्त्रियों की रक्षा तक न कर सके। लुटेरों से वे परास्त हो गये। अर्जुन के देखते ही देखते लुटेरे स्त्रियों को ले गये। कुछ स्त्रियों को वे जबरन ले जा रहे थे तो कुछ स्त्रियाँ उनके आतंक के भय से चुपचाप स्वयं ही उनके साथ चली गयीं।

अर्जुन ने अपहरण से बची हुई कुछ स्त्रियों को जहाँ-तहाँ बसा दिया तथा कुछ वृद्धों, बालकों एवं स्त्रियों को लेकर वे इन्द्रप्रस्थ आये। इस प्रकार सबकी समयोचित व्यवस्था करके अर्जुन आँसू बहाते हुए महर्षि व्यासजी के आश्रम पर गये एवं वहाँ उनके दर्शन किये।

अर्जुन ने वेदव्यासजी को प्रणाम किया। वेदव्यासजी ने उनकी तेजोहीन अवस्था देखकर पूछाः “पार्थ ! क्या तुमने रजस्वला स्त्री से समागम किया है या किसी ब्राह्मण का वध कर दिया है ? कहीं तुम युद्ध में परास्त तो नहीं हो गये क्योंकि तुम श्रीहीन से दिखाई देते हो ? भरतश्रेष्ठ ! तुम कभी पराजित हुए हो – यह मैं नहीं जानता, फिर तुम्हारी ऐसी दशा क्यों है ? पार्थ ! यदि मेरे सुनने योग्य हो तो अपनी इस मलिनता का कारण मुझे शीघ्र बताओ।”

तब अर्जुन ने कहाः “भगवन् ! भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीला समेट ली है। हम उनके दर्शन करते थे, तब हमारे बाणों में बल था। हमारे कई असंभव से कार्य भी श्रीकृष्ण की कृपा से सफल हो जाते थे। श्रीकृष्ण मुझे छोड़कर चले गये। मैं इस संसार में उनके बिना नहीं रहना चाहता। इसके सिवा जो दूसरी घटना घटित हुई है, वह इससे भी अधिक कष्टदायक है। आप इसे सुनिये।

जब मैं इस घटना का चिंतन करता हूँ, तब मेरा हृदय बारंबार विदीर्ण होने लगता है। ब्रह्मन् ! पंजाब में लुटेरों ने मुझसे युद्ध ठानकर मेरे देखते-देखते यदुवंश की हजारों स्त्रियों का अपहरण कर लिया। मैंने अपने गांडीव धनुष से उनका सामना करना चाहा परन्तु उन्हें परास्त न कर सका। मेरी भुजाओं में पहले जैसा बल था, वैसा अब नहीं रहा। महामुने ! नाना प्रकार के अस्त्रों का जो मुझे ज्ञान था वह अब विलुप्त हो गया है। मेरे सभी बाण सब ओर जाकर क्षण भर में नष्ट हो गये। मेरा पराक्रम नष्ट हो गया।”

वेदव्यासजी बोलेः “कुन्तीकुमार ! वे समस्त यदुवंशी देवताओं के अंश थे। वे देवाधिदेव श्रीकृष्ण के साथ ही यहाँ आये थे और साथ ही चले गये। यही कालचक्र का प्रभाव है।

समय-समय की बात है। वह भी समय था जब तुम विजयी होते थे और शत्रु हारते थे। यह भी समय का ही प्रभाव है  साधारण लोगों से तुम हार गये।

यदवंशीजन ब्राह्मणों के शाप से दग्ध होकर नष्ट हुए हैं। अतः तुम उनके लिए शोक न करो। उन महामनस्वी वीरों की भवितव्यता ही ऐसी थी। तुम्हारे देखते-देखते स्त्रियों का जो अपहरण हुआ है उसमें भी एक रहस्य है।

वे स्त्रियाँ पूर्वजन्म में अप्सराएँ थीं। एक बार आत्मज्ञानी अष्टावक्र मुनि जल में खड़े-खड़े अपने ब्रह्मानंद में विश्रांति पा रहे थे। मुनि के सिर पर केवल जटाओं का ही भार था, शेष पूरा शरीर जलाशय में था। ये अप्सराएँ वहाँ से गुजरीं और उन्होंने मुनि की स्तुति करके उन्हें प्रसन्न किया।

मुनि ने कहाः ‘तुम्हारी स्तुति से मैं प्रसन्न हूँ। जो तुम्हें चाहिए, माँग लो।’

उर्वशी ने कहाः ‘हमने आपकी प्रसन्नता प्राप्त कर ली, अब और क्या माँगना ? हमें तो सब  मिल गया।’

….लेकिन दूसरी अप्सराओं ने कहाः ‘हम यही वरदान चाहती हैं कि हम श्रीहरि के साथ क्रीड़ा करें। हमारे पति वासुदेव हों।’

अष्टावक्र मुनिः ‘अच्छा….ऐसा ही होगा।’

ऐसा कहकर जब वे जल से बाहर निकले तो उनके शरीर के टेढ़े मेढ़े अंग देखकर अप्सराओं को हँसी आ गयी। मुनीश्वर को पता चल गया कि मेरी देह को देखकर इन्हें हँसी आ रही है। वे बोलेः

‘श्रीकृष्ण को तुम वरोगी लेकिन अंत में तुम्हारी दुर्गति होगी। तुमको दस्यु ले जायेंगे।’

मुनि ने शाप दे दिया। अप्सराओं ने क्षमायाचना की तो प्रसन्न होकर मुनि ने कहाः

‘अच्छा… उसके बाद तुम्हारा देहत्याग होगा और तुम पुनः स्वर्ग में पहुँच जाओगी।’

मुनि के शापवश वे  लुटेरों (दस्युओं) के हाथों पड़ीं। इसीलिए अर्जुन ! तुम्हारे बल का क्षय हुआ ताकि वे शाप से छुटकारा पा जायें। अब वे अपना पूर्व रूप और स्थान पा चुकी हैं अतः उनके लिए भी शोक करने की आवश्यकता नहीं है।

जो स्नेहवश तुम्हारे रथ के आगे चलते थे, सारथि का काम करते थे तो वे वासुदेव कोई साधारण पुरुष नहीं अपितु साक्षात चक्र-गदाधारी पुरातन ऋषि चतुर्भुज नारायण थे। वे विशाल नेत्रों वाले श्रीकृष्ण इस पृथ्वी का भार उतार कर शरीर त्याग करके अपने उत्तम परम धाम को जा पहुँचे हैं।

पुरुषप्रवर ! महाबाहो ! तुमने भी भीमसेन और नकुल-सहदेव की सहायता से देवताओं का महान कार्य सिद्ध किया है। कुरुश्रेष्ठ ! मैं समझता हूँ कि अब तुम लोगों ने अपना कर्तव्य पूर्ण कर लिया है। तुम्हें सब प्रकार से सफलता प्राप्त हो चुकी है। अब तुम्हारे परलोकगमन का समय आया है और यही तुम लोगों के लिए श्रेय़स्कर है।

भरतनंदन ! जब उदभव का समय आता है तब इसी प्रकार मनुष्य की बुद्धि, तेज और ज्ञान का विकास होता है और जब विपरीत समय उपस्थित होता है, तब इन सबका नाश हो जाता है।

कालमूलमिदं सर्वं जगद्वीजं धनंजय।

काल एव समादत्ते पुनरेव यदृच्छया।।

‘धनंजय ! काल ही इन सबकी जड़ है। संसार की उत्पत्ति का बीज भी काल है और काल ही फिर अकस्मात सबका संहार कर देता है।’

(श्रीमहाभारत, कौसल पर्वः 8.33,34)

काल का प्रभाव सब पर पड़ता ही है अतः मनुष्य को चाहिए कि वह कालातीत श्रीहरि के तत्त्व में विश्रांति पा ले।”

श्रीहरि के तत्त्व में विश्रांति पा लें तो फिर उतारर-चढ़ाव की तकलीफें नहीं सहनी पड़तीं।

वेदव्यास जी कहते हैं- “अर्जुन ! अब तुम भी अपने भाइयों समेत परम गति को प्राप्त हो जाओ। हिमालय में जाकर तप करो। इन्द्रियों को मन में, मन को बुद्धि में और बुद्धि को अपने परब्रह्म परमात्मा में लीन करो तभी तुम्हें शांति मिलेगी। इसी में तुम्हारा परम कल्याण निहित है।”

जिसके साथ श्रीकृष्ण थे ऐसे अर्जुन को भी इन्द्रियों को समेटकर मन में, मन को बुद्धि में और बुद्धि को अपने वास्तविक स्वरूप में लाना पड़ता है। यही बात अगर हमें अभी समझ में आ जाये तो हमारा भी बेड़ा पार हो जाये।

इसके लिए समय बचाकर अन्तर्मुख होना चाहिए। अन्तर्मुख नहीं हुए तो महाराज ! समय बड़ा बलवान…. वही बात। समय के फेर से कभी कोई ऊँचा तो कभी कोई नीचा, कभी कोई धनवान तो कभी निर्धन, कभी कोई राजा तो कभी रंक हो जाता है। कभी कोई व्यक्ति कुटुम्बियों से पूजा जाता है तो कभी कोई उन्हीं से धिक्कारा जाता है।

वही व्यक्ति जो दुकान पर था, कमाता था, बच्चों के लिए परिश्रम करता था, मकान बनवाता था तो सबको प्रिय लगता था। अब बूढ़ा हो गया, दुकान चलाने के लायक न रहा तो घर में अपने ही बेटों से दुतकारा जाता है।

वही व्यक्ति था जो सप्ताह भर के लिए एकान्त में, मौनमंदिर जाना चाहता था तो घरवाली रोती थी, बच्चे रोते थे…. जब बूढा हो जाता है तो लोग मनौतियाँ मानते हैं कि ‘काका का कुछ हो जाये ! (यह बूढ़ा मर जाये तो अच्छा।)’ समय बड़ा बलवान्….

इसीलिए ईश्वर के सिवाय कहीं भी मन लगाया तो अंत में पछताना ही पड़ता है, रोना ही पड़ता है।

अभी जो मित्र दिखते हैं वे ही समय पाकर पराये हो जाते हैं और जो पराये दिखते हैं वे अपने हो जाते हैं। अपना-पराया यह मन और बुद्धि का धोखा है। वास्तव में अपने आत्मा-परमात्मा के सिवाय कोई अपना नहीं है।

जैसे नदी की धारा में सब बह जाता है, ऐसे ही समय की धारा में सब प्रवाहित हो जाता है। नदी दो पहाड़ियों के बीच से बह रही है…. लकड़ियाँ गिरी, नदी के बहाव में मिलीं, थोड़ी दूर पर फिर दूसरी मिलीं, कोई किसी किनारे रूकी तो कोई किसी किनारे रूकी और कोई सागर में चली गयीं…. ऐसे ही शादी ब्याह हुआ, पति पत्नी मिले, संतति हुई, समय चलता रहा….. आखिर में कोई किसी किनारे पर गया तो कोई किसी किनारे पर गया….. यही तो संसार है। और क्या है ? ऐसे ही मित्र मिले, पड़ोसी मिले… फिर बिछुड़े। जैसे, बहती गंगा की धारा में बालू के कण मिलते हैं, पत्थर-कंकड़ मिलते हैं फिर बिछुड़ते हैं ऐसे ही काल की धारा में कोई मिलता है तो कोई बिछुड़ता है… सब सपना हो जाता है। शिवजी कहते हैं-

उमा कहउँ मैं अनुभव अपना।

सत हरि भजन जगत सब सपना।।

(श्रीरामचरित.)

इस संसार में केवल ईश्वर भजन ही सार है।

कोई कहे कि हरि के जाने के बाद उनके कुल की स्त्रियों को ही लुटेरे ले गये, उनका धन छीनकर ले गये तो ऐसे हरि का भजन करके हमें क्या फायदा होगा ? नहीं…. ऐसी बात नहीं है। श्री हरि का विग्रह माया में लीन हो सकता है लेकिन श्रीहरि का तत्त्व तो सदैव, सर्वत्र सब दिलों में विद्यमान है। उन श्रीहरि का चिन्तन ध्यान करने से मन-बुद्धि की चंचलता एवं बेवकूफी दूर होती है, जीव के कल्मष दूर होने लगते हैं तथा वह अपने हरि-स्वरूप के निकट आने लगता है। उन श्रीहरि को सत्य समझकर अंतर्मुख होने से जीव का वास्तविक कल्याण हो जाता है। बाकी तो समय के फेर से महारथी अर्जुन जैसे भी दस्युओं से हार गये। कभी धनी निर्धन हो जाते हैं, अमीर गरीब हो जाते हैं, गरीब अमीर हो जाते हैं।

श्री वशिष्ठजी महाराज कहते हैं- “हे राम जी ! यह कालचक्र बड़ा विलक्षण है। जो धन मिला सो मिला, जो गया सो गया। जो मान मिला सो मिला, जो अपमान हुआ सो हुआ। जो सुखद अवस्थाएँ आयीं सो आयी और जो दुःखद अवस्थाएँ गयीं सो गयीं। समय की धारा में सब बीता जा रहा है।” अतः हे साधक ! बीते हुए पर शोक न कर। आने वाले भविष्य में बाह्य जगत में कुछ विशेष बनने की वासना न कर। वर्त्तमान में अपने परमात्म-स्वभाव में, साक्षी सच्चिदानंद ईश्वर में स्थित होना ही सब सारों का सार है। उसी के सुमिरन, उसी के आनंद, उसी के चिंतन में लगे रहो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, पृष्ठ संख्या 15-18, अंक 100

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चारित्रिक क्रान्ति के उन्नायक पूज्य बापू


भारत की इस पावन धरा तथा ऋषियों के वंशजों पर भगवान की विशेष कृपा रही है। जब कभी भी इस भारत भूमि पर मानवजाति को किसी दुर्गुण ने ग्रसित किया, उसको पतनोन्मुख बनाने की कुचेष्टा की तब-तब यहाँ भगवान एवं भगवद् प्राप्त महापुरुषों का अवतरण होता रहा है। विश्व के किसी भी दूसरे देश में ऐसा अनुपम उदाहरण नहीं मिलता है।

इस भारतभूमि पर तो भगवान ने स्वयं प्रतिज्ञा की हैः

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।

‘हे भारत ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात् साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ।’ (गीताः 4.7)

इस अनंत कालचक्र से जूझ रहे मानव के समक्ष समय-समय पर ऐसी बाधाएँ आती हैं जो उसकी वास्तविक उन्नति में बाधक बन जाती हैं। काल का दुष्प्रभाव और उसके पुराने कुसंस्कार सामाजिक संस्कारों को विकृत कर देते हैं जिससे पूरा समाज पतन के गर्त में गिरता चला जाता है।

समाज कको ऐसी विकट परिस्थिति से निकालकर उसे सच्ची सुख-शांति एवं वास्तविक उन्नति के मार्ग पर ले जाने के लिए ही भगवान तथा भगवद् प्राप्त महापुरुष इस अवनि पर अवतरित होते हैं। विभिन्न युक्तियों से मानव का वास्तविक कल्याण करने में समर्थ ऐसे अलौकिक पुरुष विरले ही होते हैं। परन्तु यह बात भी उतनी ही सच है कि यह भारतभूमि ऐसे विरले सत्पुरुषों से रिक्त कभी नहीं हुई।

आज जब भारतवासी अपनी महान संस्कृति को भूलकर विकृत पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण करने में लगे हुए हैं और इसके दुष्प्रभाव से विश्वगुरु कहलाने वाले भारत में चारित्रिक पतन का विनाशकारी तांडव चल रहा है। ऐसे समय में चारित्रिक क्रान्ति के उन्नायक पूज्यपाद संत श्री आसाराम जी बापू हमारे बीच उपस्थित हैं।

भारतीय ब्रह्मर्षियों की गूढ़ रहस्यमयी आत्मविद्या के आचार्य तथा योग-सामर्थ्य के धनी पूज्य बापू भारतभूमि के ऐसे ही एक दुर्लभ संतरत्न है। भारतवर्ष की आध्यात्मिक एवं चारित्रिक उन्नति की बागडोर अपने समर्थ हाथों में लेकर आपने जागृति का जो शंखनाद किया है वह एक अभूतपूर्व दैवी कार्य है।

‘धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ-कुछ गया परन्तु चरित्र गया तो सब कुछ गया।’ भारतीय मनीषियों के इस सिद्धान्त को स्वीकार करते हुए आप भी चरित्रनिर्माण पर विशेष बल देते हैं। चरित्रनिर्माण के साथ आध्यात्मिकता का संगम करके आप मानव को महामानव तथा महामानव को महेश्वर बनाने के एक अदभुत मार्ग पर ले जा रहे हैं।

पूज्य बापू जी के इस  महान दैवी कार्य का जीवंत उदाहरण यह छोटी सी घटना है जो छोटी होने पर भी बहुत कुछ सीख दे देती है।

एक बार साबरमती, अमदावाद में स्थित संत श्री आसारामजी आश्रम में ‘ध्यान योग शिविर’ चल रहा था। उस समय आश्रम छोटा-सा ही था अतः साधकों के लिए नहाने-धोने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी। साबरमती नदी में पानी की गहरी धारा बह रही थी उसी पर महिलाओं एवं पुरुषों के नहाने-धोने के लिए दो अलग-अलग घाट बना दिये गये।

नदी के उस पार भारतीय सेना की छावनी है जिसे ‘हनुमान कैम्प’ कहा जाता है। सुबह के समय सेना के दो जवान दौड़ लगाते हुए नदी के किनारे तक पहुँच गये जहाँ महिलाओं के स्नान का घाट बना था। उनके कारण उन शिविरार्थी साधिकाओं को नहाने में परेशानी हो रही थी क्योंकि वे दोनों जवान जानबूझकर वहाँ से खड़े-खड़े साधिकाओं को घूर रहे थे।

पूज्य बापू नित्य सुबह नदी किनारे घूमने जाया करते थे। पूज्य श्री की दृष्टि दूर से उन जवानों पर पड़ी। घट-घट की जानने वाले समर्थ योगी को वस्तुस्थिति समझने में कैसे देर लगती ? पूज्य श्री शीघ्र ही उन जवानों के पास पहुँचे और उनके हाथ पकड़कर बोलेः “चुपचाप मेरे साथ चलो।”

पूज्य बापू के मुखमण्डल तथा वाणी के तेज को देखकर वे जवान मानो सूखी लकड़ी के खम्भे से हो गये। उनकी हिम्मत ही नहीं हुई कि वे कुछ बोलें या प्रतिकार करें। रस्सी से बँधी गाय की तरह वे पूज्य बापू के साथ चल दिये।

दोनों को नाव से इस पार लाया गया। पूज्य श्री दोनों का गिरेबान (कॉलर) पकड़कर अपनी कुटिया की ओर बढ़ने लगे। कुछ आश्रमवासियों ने देखा तो दौड़कर पूज्यश्री के पास आये और बोलेः

“बापू जी ! हम पकड़ें ?”

पूज्य बापू जी ने दृढ़तापूर्वक उत्तर दियाः “नहीं, इनमें इतनी शक्ति नहीं है कि अपने-आपको मुझसे छुड़ा सकें।” फिर उन्हें अपनी कुटिया में  ले जाकर बंद कर दिया और सेवकों को आदेश दिया किः “इनके मुखिया को फोन करके कहो कि यदि अपने जवान चाहिए तो यहाँ आकर ले जाय।”

थोड़ी ही देर बाद सेना का एक ऑफिसर गाड़ी लेकर आश्रम में पहुँचा। गाड़ी से उतरते ही वह कुटिया की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा तो भक्तों ने उसे रोककर कहाः “भाई साहब ! आपके जूते उतार दो। यह बापू जी का निवासस्थान है। जूते ले जाना मना है।”

इस पर उसने चिढ़कर जवाब दियाः “हम  मिलेट्रीवाले जूते नहीं उतारते। ये हमारी वर्दी के अन्तर्गत आते हैं, समझे ?” लेकिन ज्यों ही उसने अपना पैर दूसरी सीढ़ी पर रखना चाहा त्यों ही उसका शरीर पसीना-पसीना हो गया। उसने शायद ही कभी सोचा होगा कि ऐसा भी हो सकता है। उसका पैर पहली सीढ़ी से आगे नहीं बढ़ सका। लाख प्रयास करने के बाद भी वह अपने पैर को ऊपर की सीढ़ी पर नहीं रख सका। अब उसकी सारी अक्कड़ धूल में मिल चुकी थी। घबराते हुए वह नीचे उतरा और जूते उतारकर बड़े नम्र भाव से कुटिया को प्रणाम करके अंदर गया। अंदर पहुँचते ही उसने पूज्य बापू  देखकर प्रणाम किया।

पूज्य श्री ने उसे डाँटते हुए कहाः “तुम लोग देश के रक्षक हो या भक्षक ? देशवासियों ने तुम्हें यह वर्दी इस देश की माँ-बहनों की लाज बचाने के लिए पहनाई है या उन पर बुरी नजर डालने के लिए ? जब तुम लोग ही ऐसा पाप करने लगोगे तो दूसरों को कैसे सुधारा जायेगा ?”

पूज्य श्री की निर्भीक तेजस्वी वाणी को सुनकर वह थर-थर काँपने लगा। इन समर्थ योगी की महान शक्ति का छोटा सा अनुभव तो वह सीढ़ियों पर चढ़ते समय ही कर चुका था। गिड़गिड़ाते हुए उसने पूज्य श्री से क्षमा माँगी और वचन दिया किः “जो आप कहेंगे इनको वही सजा दी जायेगी।”

पूज्य श्री ने उन दोनों जवानों को कमरे से बाहर निकाला। उन्हें चरित्र की महानता बतायी और फिर तीनों को प्रसाद दिया। पूज्य बापू ने उनके ऑफीसर से कहाः “इन्हें कोई सजा नहीं देना। अब ये दुबारा ऐसी गलती नहीं करेंगे।”

वाह री संतों की करुणा ! कैसी महानता है ! क्रोध ऐसा कि मानो अभी प्रलय हो जाय और कुछ ही देर में प्रेम भी उतना ही ! संसार में रहकर भी संसार से परे। अपनी अविचल आत्ममस्ती में रमण करने वाले संतों की लीला को कोई संत ही जान सकते हैं।

15-20 दिन बाद वे दोनों जवान सत्संग में आये और बापू जी को प्रणाम करके बोलेः

“महाराज ! जब आपने हमें पकड़ा था तब हमारी शक्ति पता नहीं कहाँ चली गई थी ! उस दिन के बाद हमें अण्डा, माँस, शराब आदि से घृणा होने लगी है। हमारे दुर्गुण अपने आप पलायन हो रहे हैं और कोई अदृश्य शक्ति हमें बार-बार यहाँ सत्संग में आने की प्रेरणा देती है।”

कैसी अदभुत लीला होती है संतों की ! जवानों का कॉलर पकड़कर लाये, कमरे में बंद किया, डाँट लगायी परन्तु इस कठोरता के द्वारा उन्हें सच्चे मनुष्य बना दिये। प्रेम करके तो कृपा करते ही हैं लेकन सजा देकर भी वैसी ही कृपा करते हैं। दोनों तरफ से कल्याण करने की शक्ति भगवान और भगवद् प्राप्त संतों के अलावा और भला किसमें हो सकती है ?

‘श्रीरामचरितमानस’ में संतों की करुणा-कृपा का बखान करते हुए संत श्री तुलसीदास जी कहते हैं किः ‘कवियों ने संतों के हृदय को मक्खन के समान कह तो दिया परन्तु वे असली बात नहीं कह सके। क्योंकि मक्खन तो अपने को ताप मिलने के कारण पिघलता है जबकि परम पवित्र संत दूसरों के दुःख से पिघलते हैं।’

भारत के नवयुवकों में बढ़ रहे चारित्रिक पतन को देखते हुए पूज्य बापू ने युवाओं के चारित्रिक एवं आध्यात्मिक उत्थान के लिए ‘युवाधन सुरक्षा अभियान’ के रूप में चारित्रिक क्रांति का सूत्रपात किया है। पूज्य श्री के मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद से यह अभियान पूरे भारत में चल रहा है। आइये, हम सभी इस महान् भारत  भावी कर्णधारों को सुसंस्कारवान् एवं चरित्रवान बनाने के दैवी कार्य में सहभागी बनकर अपना जीवन सार्थक करें।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2001, पृष्ठ संख्या 13-15, अंक 100

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