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Prerak Prasang

मन एक कल्पवृक्ष


(पूज्य बापू जी की पावन अमृतवाणी)

कोई सुप्रसिद्ध वैद्यराज थे। रात्रि को किसी बूढ़े आदमी की तबीयत गम्भीर होने पर उन्हें बुलाया गया। वैद्यराज ने देखा कि ‘बूढ़ा है, पका हुआ पत्ता है, पुराना अस्थमा है, फेफड़े इन्कार कर चुके हैं, रक्तवाहिनियाँ भी चोड़ी हो गयी है, पुर्जे सब पूरे घिस गये हैं अब बूढ़े का बचना असम्भव है, बहुत-बहुत तो 40 से 48 घंटे निकाल सकता है। वैद्य ने ठीक से जाँच की। बड़ा सात्त्विक वैद्य था, अच्छी परख थी उसकी।

बूढ़े ने कहाः “बताओ मेरा क्या होगा ? कोई दवाई लगती नहीं, दो साल से पड़ा हूँ बिस्तर पर, ऐसा है-वैसा है….।”

वैद्य ने कहाः “चिंता न करो। मैं जाता हूँ, जाँच पड़ताल करके चिट्ठी भेजता हूँ और दवाई भी भेजता हूँ।”

वैद्य ने कहाः “चिंता न करो। मैं जाता हूँ, जाँच पड़ताल करके चिट्ठी भेजता हूँ और दवाई भी भेजता हूँ।”

वैद्य अपने घर की ओर लौटा। रास्ते में याद आया कि ‘धनी सेठ का लड़का जो बीमार है, दवाई मँगा रहा था, जरा उसे देखता जाऊँ।’

वैद्य ने युवक को देखा। युवक भी बिस्तर पर कराह रहा था कि “मेरी तबीयत खराब है, कमजोरी है, मेरे को ऐसा है वैसा है…। क्या पता कब ठीक होऊँगा ?”

वैद्य ने कहाः “चिंता की बात नहीं, ठीक हो जाओगे। तुमको बीमारी का वहम ज्यादा है, वहम निकाल दो।”

बोलेः “मुझे रोग क्या है यह तो बताओ वैद्यराज ?”

वैद्यराज ने कहाः “मैं अभी जाता हूँ, अपने औषधालय से पूरा विश्लेषण करके तुमको चिट्ठी भी भेजता हूँ, दवाई भी भेजता हूँ।”

वैद्य ने दो चिट्ठियाँ लिखीं और दोनों की दवाइयाँ साथ में भेज दीं। अब  जो चिट्ठी और दवाई जवान को देनी थी वह बूढ़े के पास पहुँच गयी और जो बूढ़े को देनी थी वह गलती से जवान को मिल गयी। उस चिट्ठी में बूढ़े के लिये लिखा थाः “शरीर का कोई भरोसा नहीं। पद का भी कोई भरोसा नहीं। शरीर का ही भरोसा नहीं तो पदों का भरोसा कैसे ! सारे पद शरीर पर आधारति हैं। जितना हो सके हरि स्मरण करो और अपनी धन सम्पत्ति बच्चों के हवाले करने के लिए तुम्हारे अंदर थोड़ी शक्ति आ जाये, ऐसी उत्तेजक दवा भेजता हूँ। परमात्मा का खूब सुमिरन करो, शरीर तो किसी का सदा रहा नहीं ! भगवान हरि ही तुम्हारी शरण हैं, अंतिम गति हैं। संसार में अब तुम्हारे ज्यादा दिन नहीं हैं। एक दो दिन के तुम मेहमान हो।”

जवान ने ज्यों चिट्ठी पढ़ी महाराज ! ऐसा ढला कि फिर उठ न सका। करवट बदलने के लिए पत्नी को बुलाया। रात भर चीखा-चिल्लाया। सुबह होते-होते आदमी वैद्यराज को बुलाने गयेः

“हालत गम्भीर है, चलो।”

वैद्य ने कहाः “गम्भीर-वम्भीर कुछ नहीं, अब मेरे आने की कोई जरूरत नहीं। मैं कल देखकर आया हूँ। अभी मेरे पूजा-पाठ का समय है।”

नौकर ने जाकर कहाः “वैद्य बोलते हैं कि अब मेरे आने की जरूरत नहीं है।” जवान को लगा कि ‘सचमुच अब मैं जाने वाला हूँ, वैद्य आकर क्या करेगा !” उसकी तबीयत और खराब हो गयी। दोपहर तक उसकी ऐसी हालत हो गयी कि जैसे अब गया… अब गया…। वैद्य के मन में हुआ कि ‘आदमी पर आदमी आ रहे है। चलो, जरा देखकर आयें।’

वैद्यराज ने उस युवक को देखा और बोलेः “कल तक तो इस जवान की हालत ठीक-ठीक थी, अब ऐसी कैसे हो गयी ! क्या हो गया ?”

वह बोलाः “आप ही ने तो कहा कि, तुम एक दो दिन के मेहमान हो।’ रात को आपकी चिट्ठी पढ़ने से तो मेरी तबीयत और खराब हो गयी और मुझे तो सामने मृत्यु ही दिखती है कि मैं मर जाऊँगा। वैद्यराज ! मैंने अपने कुटुम्बियों को, ससुराल वालों को तार भेज दिये। मैं तुम्हारे पैर पकड़ता हूँ, वचन देता हूँ, मैं लिखकर दे दूँ कि मेरी धन-सम्पदा सब आपको अर्पण करता हूँ। मुझे ठीक कर दो, मुझे जीवन दे दो….।”

वह युवक ‘अब मरा ! अब मरा !’ – इसक प्रकार का विलाप कर रहा था। वैद्य ने चिट्ठी माँगी कि इतन कैसे लड़खड़ा गया ! पढ़ी तो खूब हँसा। बोलाः “अरे ! यह तो कल मैं जिस बूढ़े को देखकर आया था, उसकी चिट्ठी है और यह उत्तेजक दवा उसके लिये है। तेरे को तो थोड़ा-सा बुखार है, तेरी दवा अलग है। उस आदमी ने बेवकूफी की जो तेरे को दे दी। मुझसे गलती हो गयी, अब ऐसे आदमियों के द्वारा चिट्ठी नहीं भिजवाऊँगा।”

वैद्य ने कुछ विश्वास की बातें सुनायीं तो वह उठ के खड़ा हो गया। बोलाः “अच्छा, ऐसी बात है !” वैद्य ने कहाः “हाँ, हाँ सचमुच !” वह खाना वाना खाकर बोलता हैः “अच्छा चलो, बूढ़े का हाल देखकर आयें। उसका क्या हुआ ?” वे दोनों उस बूढ़े के पास गये। वैद्य ने देखा कि इसका बिस्तर तो पहली मंजिल पर रहता था, यह अब नीचे कैसे आ गया ! जो अभी मरीज था, मर रहा था, पलंग पर से करवट बदलने के लिए जिसे स्त्री के सहयोग की जरूरत थी, देखा तो वह रसोई में रोटी और दूध खा रहा है। वैद्य को देखकर बूढ़ा बोल उठाः “मेरे वैद्यराज भगवान ! तुम्हारा भला हो। तुम्हारी दवा में तो क्या चमक थी ! तुम्हारी चिट्ठी पढ़ी कि ‘कोई खास रोग नहीं, जरा कमजोरी है। तुम तो बिना मतलब के वहम में फँसे हो।’ सचमुच, मैंने वहम छोड़ दिया और मुझमें शक्ति आ गयी। मैं गद्दे से उतरकर खाने आ गया हूँ लो !”

वह जवान बोलने ही जा रहा था कि ‘भाई ! वह तो मेरी चिट्ठी है।’ “वैद्यराज ने उसको संकेत कर दिया कि ‘चुप रहो अब ! इधर तो काम बन गया !’ बूढ़ा बोलाः “वैद्यराज! दो साल से तो मैं दवाइयाँ कर रहा था। ऐसे लल्लू-पंजू वैद्यों के चक्कर में था कि बीमार-ही-बीमार रहा। तुम्हारे जैसे वैद्य की दवा पहले करता तो दो साल मुझे बिस्तर पर नहीं पड़े रहना पड़ता। वैद्यराज ! तुम्हारा मंगल हो, खूब जियो !”

वैद्य के वचन से जो बिस्तर पर था, वह व्यक्ति तीन महीने और जिया। ऐसे कई दृष्टांत तुमने समाज में देखे होंगे।

और एक्स रे करके लुटेरे डॉक्टर कितना तुम्हे नोच लेते हैं और कितना तुम्हें गहरा मरीज बना देते हैं ! यह है, वह है…. एक्स रे के काले पन्ने दिखाकर तुम्हें और तुम्हारे कुटुम्बियों को डरा के अपनी काली मुरादें पूरी कर लेते हैं।

दया बहन शेवानी का पुत्र, पति और दया बहन स्वयं थकी हारी थीं। लगता था कि अब जाने वाली हैं। वे लोग हमारे पास आये और अभी भी दया बहन जीवित हैं।

श्रीमती दया बहन, प्रह्लाद शेवानी और परिवार चकित हो रहा है कि ‘मृत्यु के मुख से बापू बाहर ले आये !’ मृत्यु के मुख से बाहर नहीं लाये, जिन्होंने लूटने के लिए धकेला था और जिन्हें ऑपरेशन करना था, उन शिकारियों के शिकंजे से बापू उनको बाहर ले आये और आश्रम के वैद्यों ने निष्काम भाव से थोड़ा इलाज किया। डॉक्टरों की अंग्रेजी औषधियों से सब बाल झड़ रहे थे, मुंडित-तुंदित लग रही थी। अब तो उन्हें नये काले बाल भी उभर रहे हैं। यह देखकर तो उनकी बहूरानी भी दंग रह गयी !

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम – ये छः सदगुण जहाँ रहते हैं, वहाँ परमात्मा पग-पग पर अपनी करूणा-कृपा छलकाते हैं, छलकाते हैं, इसमें संदेह नहीं है।

जो डॉक्टर लापरवाही बरतते हैं या मरीज को डराते हैं और उनको लूटने का इरादा बनाते हैं, भगवान उनको सदबुद्धि दें। वे सुधर जायें, सुधरने का सीजन है।

तुम्हारे गहरे मन में इतना सामर्थ्य है कि ढले हुए शरीर को जीवन दे सकता है और जीवन वाले शरीर को ढला सकता है। तुम मन में जैसा दृढ़ संकल्प करो, वैसा होने लगता है।

मन एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः।

मन ही तुम्हारे बंधन और मुक्ति का कारण है। जैसा-जैसा आदमी सोचता है न, वैसा-वैसा बन जाता है। जो नकारात्मक सोचता है, घृणात्मक सोचता है उसको घृणा ही मिलती है और नकारा जाता है। जो वाह-वाह सोचता है, धन्यवाद सोचता है, ‘कर लूँगा, हो जायेगा…. हो जायेगा’ – ऐसा सोचता है, निराशा-हताशा की बातें नहीं सोचता उसके काम हो जाते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2011, पृष्ठ संख्या 20, 21, 22 अंक 218

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भूषणानां भूषणं क्षमा


एक साधक ने अपने दामाद को तीन लाख रूपये व्यापार के लिये दिये। उसका व्यापार बहुत अच्छा जम गया लेकिन उसने रूपये ससुरजी को नहीं लौटाये। आखिर दोनों में झगड़ा हो गया। झगड़ा इस सीमा तक बढ़ गया कि दोनों का एक दूसरे के यहाँ आना जाना बिल्कुल बंद हो गया। घृणा व द्वेष का आंतरिक संबंध अत्यंत गहरा हो गया। साधक हर समय हर संबंधी के सामने अपने दामाद की निंदा, निरादर व आलोचना करने लगे। उनकी साधना लड़खड़ाने लगी। भजन पूजन के समय भी उन्हें दामाद का चिंतन होने लगा। मानसिक व्यथा का प्रभाव तन पर भी पड़ने लगा। बेचैनी बढ़ गयी। समाधान नहीं मिल रहा था। आखिर वे एक संत के पास गये और अपनी व्यथा कह सुनायी।

संत श्री ने कहाः ‘बेटा ! तू चिंता मत कर। ईश्वरकृपा से सब ठीक हो जायेगा। तुम कुछ फल व मिठाइयाँ लेकर दामाद के यहाँ जाना और मिलते ही उससे केवल इतना कहना, बेटा ! सारी भूल मुझसे हुई है, मुझे क्षमा कर दो।’

साधक ने कहाः “महाराज ! मैंने ही उसकी मदद की है और क्षमा भी मैं ही माँगू !”

संत श्री ने उत्तर दियाः “परिवार में ऐसा कोई भी संघर्ष नहीं हो सकता, जिसमें दोनों पक्षों की गलती न हो। चाहे एक पक्ष की भूल एक प्रतिशत हो दूसरे पक्ष की निन्यानवे प्रतिशत, पर भूल दोनों तरफ से होगी।”

साधक की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उसने कहाः “महाराज ! मुझसे क्या भूल हुई ?”

“बेटा ! तुमने मन ही मन अपने दामाद को बुरा सामाझ – यह है तुम्हारी भूल। तुमने उसकी निंदा, आलोचना व तिरस्कार किया – यह है तुम्हारी दूसरी भूल। क्रोध पूर्ण आँखों से उसके दोषों को देखा – यह है तुम्हारी तीसरी भूल। अपने कानों से उसकी निंदा सुनी – यह है तुम्हारी चौथी भूल। तुम्हारे हृदय में दामाद के प्रति क्रोध व घृणा है – यह है तुम्हारी आखिरी भूल। अपनी इन भूलों से तुमने अपने दामाद को दुःख दिया है। तुम्हारा दिया दुःख ही कई गुना हो तुम्हारे पास लौटा है। जाओ, अपनी भूलों के लिए क्षमा माँगो। नहीं तो तुम न चैन से जी सकोगे, न चैन से मर सकोगे। क्षमा माँगना बहुत बड़ी साधना है।”

साधक की आँखें खुल गयीं। संत श्री को प्रणाम करके वे दामाद के घर पहुँचे। सब लोग भोजन की तैयारी में थे। उन्होंने दरवाजा खटखटाया। दरवाजा उनके दोहते ने खोला। सामने नाना जी को देखकर वह अवाक् सा रह गया और खुशी से झूमकर जोर जोर से चिल्लाने लगाः “मम्मी ! पापा !! देखो तो नाना जी आये हैं, नाना जी आये हैं….।”

माता पिता ने दरवाजे की तरफ देखा। सोचा, ‘कहीं हम सपना तो नहीं देख रहे !’ बेटी हर्ष से पुलकित हो उठी, ‘अहा ! पन्द्रह वर्ष के बाद आज पिता जी आये हैं।’ प्रेम से गला रूँध गया, कुछ बोल न सकी। साधक ने फल व मिठाइयाँ टेबल पर रखीं और दोनों हाथ जोड़कर दामाद को कहाः “बेटा ! सारी भूल मुझसे हुई है, मुझे क्षमा करो।”

“क्षमा” शब्द निकलते ही उनके हृदय का प्रेम अश्रु बनकर बहने लगा। दामाद उनके चरणों में गिर गये और अपनी भूल के लिए रो-रोकर क्षमा याचना करने लगे। ससुरजी के प्रेमाश्रु दामाद की पीठ पर और दामाद के पश्चाताप व प्रेममिश्रित अश्रु ससुरजी के चरणों में गिरने लगे। पिता पुत्री से और पुत्री अपने वृद्ध पिता से क्षमा माँगने लगी। क्षमा व प्रेम का अथाह सागर फूट पड़ा। सब शांत, चुप ! सबकी आँखों सके अविरल अश्रुधारा बहने लगी। दामाद उठे और रूपये लाकर ससुर जी के सामने रख दिये। ससुरजी कहने लगेः “बेटा ! आज मैं इन कौड़ियों को लेने के लिए नहीं आया हूँ। मैं अपनी भूल मिटाने, अपनी साधना को सजीव बनाने और द्वेष का नाश करके प्रेम की गंगा बहाने आया हूँ। मेरा आना सफल हो गया, मेरा दुःख मिट गया। अब मुझे आनंद का एहसास हो रहा है।”

दामाद ने कहाः “पिताजी ! जब तक आप ये रूपये नहीं लेंगे तब तक मेरे हृदय की तपन नहीं मिटेगी। कृपा करके आप ये रूपये ले लें।”

साधक ने दामाद से रूपये लिये और अपनी इच्छानुसार बेटी व नातियों में  बाँट दिये। सब कार में बैठे, घर पहुँचे। पन्द्रह वर्ष बाद उस अर्धरात्रि में जब माँ-बेटी, भाई-बहन, ननद-भाभी व बालकों का मिलन हुआ तो ऐसा लग रहा था कि मानो साक्षात् प्रेम ही शरीर धारण किये वहाँ पहुँच गया हो। सारा परिवार प्रेम के अथाह सागर में मस्त हो रहा था। क्षमा माँगने के बाद उस साधक के दुःख, चिंता, तनाव, भय, निराशारूपी मानसिक रोग जड़ से ही मिट गये और साधना सजीव हो उठी।

क्षमा वीरों का भूषण है, साधकों की उच्चतम साधना है। अपनी भूल के लिए क्षमा माँग लेना और भूल करने वाले को क्षमा कर देना मानव का सुंदरतम आभूषण है। क्षमा अपने व्यक्तिगत व पारिवारिक जीवन को सरसतम बनाने की अनुपम विद्या है।

नरस्य भूषणं रूपं रूपस्य भूषणं गुणम्।

गुणस्य भूषणं ज्ञानं ज्ञानस्य भूषणं क्षमा।।

किसी के पास प्रकृतिप्रदत्त सुंदर रूप हो तो लौकिक दृष्टि से एक गुण माना जा सकता है। सुंदर रूप तो हो पर सदगुणविहीन हो तो ऐसा रूप भी किस काम का ! अतः रूप की शोभा गुणों से है। उत्तम गुणों से सम्पन्न होने पर भी यदि ज्ञान न हो तो व्यक्ति के सारे दुःख नहीं मिटेंगे।

यहाँ ज्ञान का तात्पर्य लौकिक ज्ञान से नहीं बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान से है। यह भगवद्ज्ञान ही समस्त सदगुणों का धाम है और इसका आभूषण है ‘क्षमा’। जैसे वृक्ष फलयुक्त होकर झुक जाते हैं, वैसे ही ज्ञान से व्यक्ति क्षमाशील व नम्र हो जाता है। लौकिक ज्ञान तो स्कूल कालेजों में मिल जाता है पर भगवद्ज्ञान तो संतों के संग से ही मिलता है। वासुदेवः सर्वम्…. की सुंदर सीख तो संतों के पावन सान्निध्य से ही मिलती है। व्यक्ति के जीवन में यदि इस प्रकार के आध्यात्मिक ज्ञान का समन्वय न हो तो उसके सारे सदगुण उसके अहंकार को पुष्ट करके उसे पतन की खाई में धकेल देते हैं। यह अध्यात्म-ज्ञान जब जीवन में आता है तब क्षमाशीलता बुलानी नहीं पड़ती, स्वतः आ जाती है। क्षमा तो आभूषणों का भी आभूषण है !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2011, पृष्ठ संख्या 22, अंक 217

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संत के अपमान का फल


(पूज्य बापू जी के सत्संग प्रवचन से)

सेमिका महर्षि का आज्ञाकारी शिष्य था गौरमुख। मन में सुख आये तो उसको देखे, दुःख आये तो देखे, बीमारी आये तो देखे, तंदुरुस्ती आये तो देखे, – इन सबको जाननेवाला जो परमात्म है वही मेरा आत्मा है और वह सर्वव्यापक है। सदगुरू से ऐसी ऊँची साधना सीखकर गौरमुख एक जंगल में आश्रम बनाकर रहता था।

गौरमुख के शिष्य वेदपाठ करते समय कभी गलती से कोई स्वर गलत उच्चारित कर देते तो चैतन्य परमात्मा पक्षियों के मुख से वेदोच्चारण की गलती ठीक करवा देते, सुधरवा देते थे। उनकी गुरुभक्ति का प्रभाव ऐसा था।

एक दिन क्या हुआ, उस देश का राजा दुर्जय विचरण करता हुआ वहाँ आया। गौरमुख ने देखा कि राजा ने अपने पूरे सैन्यसहित मेरे आश्रम में प्रवेश किया है।

गौरमुख ने कहाः “राजन ! आपका स्वागत है, आपकी सेना और सेनापतियों का भी स्वागत है।” राजा दुर्जय सेनापति सहित महर्षि के विशाल आश्रम में प्रविष्ट हुआ।

अपनी सेना, अंगरक्षकों और दर्जनों बंदूकधारियों को लेकर किसी संत के पास जाना, संत की कुटिया की तरफ घुसना, यह नीच बुद्धि का परिचायक है।

हकीकत में गौरमुख को कहना चाहिए था कि ‘राजन ! आप आये तो अच्छी बात है लेकिन सेना की इस आश्रम में जरूरत नहीं है। सेना आश्रम के बाहर होनी चाहिए थी। खैर आ गयी है तो ठीक है। आप इन्हें आज्ञा कर दीजिये कि बाहर विश्राम करें।’ स्वागत है बोल दिया तो उनके खाने पीने की, रहने की व्यवस्था का जिम्मा सिर पर आ गया। गौरमुख ने सोचा कि “मैंने स्वागत किया है तो अब इनके खाने पीने, रहने की व्यवस्था भी तो मुझे करनी पड़ेगी।”

उसने भगवान विष्णु का चिंतन किया और प्रार्थना की ‘हे प्रभु ! अब क्या करूँ ? दुर्जय राजा सेना सहित आये हैं, उनका स्वागत करना है।’ अपने लिए कुछ न माँगने वाले, निर्दोष गौरमुख की प्रार्थना पर सोऽहं स्वभाव अंतर्यामी परमेश्वर ने उसके आगे प्रकट होकर उसे चिंतन करने मात्र से कार्यसिद्धि प्रदान करने वाली चिंतामणि दी और कहा कि “तुम इसके आगे जो भी चिंतन करोगे, चाहोगे उसकी सब व्यवस्था चिंतामणि कर देगी।

गौरमुख ने चिंतामणि के सामने बैठकर कहाः “हे नारायण की दी हुई प्रसादी ! मेरे आश्रम में इन सेनापतियों के रहने योग्य जगह बन जाय और सेना के योग्य भोजन बन जाय। घोड़ों के लिए दाना, हाथियों के लिए चारा और राजा के लिए उनके अनुरूप निवास व भोजन बन जाये।”

गौरमुख चिंतामणि के आगे चिंतन करते गये और खूब सारी व्यवस्था हो गयी। यह देखकर दुर्जय राजा दंग रह गया। इतनी आवभगत करने वाले मुनि को मस्का मारते हुए राजा ने कहाः “मुनि ! आपने हमें स्वागत-सत्कार से खूब प्रसन्न किया है। आप भी कभी हमारे अतिथि बनिये।”

अब मेहमान बनाकर वह अपना अहंकार दिखाना चाहता था। इन्होंने तो अतिथि समझकर उसका स्वागत किया लेकिन उस अहंकारी राजा की नीयत खराब हो गयी। अगले दिन जब राजा सेना सहित वहाँ से जाने लगा तो मणि की बनायी हुई सभी चीजें गायब हो गयीं। यह सब सम्भव है। ऐसे संतों के बारे में मैंने सुना है। समर्थ रामदासजी और तुकारामजी भी सब प्रकट कर देते थे। भारद्वाज ऋषि ने भी भरत के स्वागत में उनके साथ आयी हुई सारी जनता का यथायोग्य स्वागत करने वाली सामग्री प्रकट कर दी थी। अभी भी ऐसे सिद्धपुरुष हैं, जो अपने शिष्यों के साथ विचरण करते हैं और जहाँ मौज आ गयी वहाँ शिष्यों को कहते हैं, ‘यहाँ लगा लो तम्बू।’ सारी व्यवस्था हो जाती है, सारी चीजें आ जाती हैं और जितने दिन रहना है रहे, फिर गुरु जी बोलते हैं, ‘चलो !’ जब वहाँ से चलते हैं तो सारी सामग्री पंचभूतों में विलय हो जाती हैं। ऐसे महापुरुष से मेरी मुलाकात हुई थी, जिनके लिए स्वयं नर्मदाजी भोजन लेकर आती थीं।

राजा उस मणि की शक्ति को देख आश्चर्यचकित रह गया। दुर्जय की दुर्मति ने मंत्री को आज्ञा दीः “जाओ ! गौरमुख को बोलो कि चिंतामणि हमें दे दे। वह चिंतामणि बड़ी प्रभावशाली है। उस साधु को क्या जरूरत है उसकी !”

हरामी लोग साधु को तो कंगला देखने चाहते हैं और सब चीजें अपने अधीन करना चाहते हैं। भगवान के भक्त और प्यारों को पराधीन रखना चाहते हैं और वे अहंकारी, घमंडी आतंकवादियों से डरते रहते हैं। गौरमुख ने मंत्री को संदेश देकर वापस भेज दिया कि ‘भगवान के द्वारा दिया गया ऐसा उपहार स्वार्थपूर्ति के लिए नहीं होता। उसका उपयोग केवल समाजहित के लिए ही होना चाहिए।’

संदेश सुनकर राजा बहुत क्रोधित हुआ और उसने गौरमुख के आश्रम में अपनी सेना भेजकर मणि को बलपूर्वक लाने की आज्ञा दी।

गौरमुख ने देखा कि राजा आतंकी हो रहा है, पोषक शोषक हो रहा है तो उन्होंने भगवान से प्रार्थना कीः ‘हे नारायण ! रक्षमाम्… रक्षमाम्… ! प्रभु जी ! यह क्या हो रहा है ? यह सैन्य अंदर घुस रहा है !… प्रभु ! अपने सैन्य से ठीक करा दो।’

उन्होंने चिंतामणि के आगे अस्त्र-शस्त्रों मे सुसज्जित एक विशाल सेना का चिंतन किया और वह प्रकट हुई, जिससे निमेष भर में दुर्जय का सैन्य धूल चाटता हुआ चला गया। जब दुर्जय और उसके खास मंत्री सैनिकों के साथ गौरमुख के आश्रम पर पहुँचे तब गौरमुख ने भगवान नारायण का पुनः स्मरण किया। ईश्वरीय सत्ता ने मात्र एक निमेष (एक बार पलक झपकने में जितना समय व्यतीत होता है) में सुदर्शन चक्र द्वारा सेनासहित दुर्जय को नष्ट कर डाला।

भगवान बोलेः “महर्षि ! इन वन में सारे दुष्ट एक निमेष में ही नष्ट हो गये हैं इसलिए लोग इसे नैमिषारण्य क्षेत्र के नाम से जानेंगे। इस पुण्यभूमि में ऋषियों, मुनियों का समुचित निवास होगा और सत्संग, ज्ञानचर्चा व ध्यान उपासना होगी।”

तब से उस जगह का नाम नैमिषारण्य पड़ा। यह वही जगह है जहाँ सूत जी ने शौनकादि महामुनियों को श्रीमद भागवत सुनाया।

नैमिषारण्य आज भी हमें संदेश देता है कि जो अपनी शक्ति का अहंकार व योग्यता का दुरूपयोग करके महापुरुषों का अपमान करता है, उसका दैत्यों, मानवों और देवताओं पर भी विजय प्राप्त करने वाले महाप्रतापी राजा दुर्जय की तरह निश्चित ही सर्वनाश होता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 16,17, अंक 215

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