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Tatva Gyan

परम शांति


पूज्यपाद संत श्री आशारामजी

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं-

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शांतिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।

ʹहे भारत ! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा शाश्वत परमधाम को प्राप्त होगा।ʹ श्रीमद् भगवद् गीता 18.62)

शांति तीन प्रकार की होती है।

आधिभौतिक शांति।

आधिदैविक शांति।

आध्यात्मिक शांति।

उपरोक्त तीनों प्रकार की शांति हमारे व्यवहार में दिखती है।

किसी भी प्रकार का उपद्रव होवे और वह दूर हो जाये  कहेंगे किः ʹहाशઽઽઽ…..! शांति……!ʹ यह है आधिभौतिक शांति।

किसी देवी देवता का कोप हुआ हो, नौकरी नहीं मिलती हो, लड़के लड़की की शादी की चिंता सताती हो, आदि। जब ये विघ्न हट जाते हैं तो कहेंगे किः ʹहाशઽઽઽ…. ! शांति….!ʹ यह है आधिदैविक शांति।

ये शांतियाँ तो बेचारी दिन में कितनी ही बार आएँ और फिर चली जायें लेकिन एक बार परम शांति मिल जाय तो मौत भी तुमको अशांत नहीं कर सकेगी, इन्द्र का वैभव भी तुमको प्रलोभन में नहीं डाल सकेगा और शुकदेवजी जैसी कौपीनधारी अवस्था भी तुमको अपने में दीनभाव उत्पन्न नहीं करने देगी।

धन से जो गरीब है वह गरीब नहीं है, सत्ता से जो गरीब है वह गरीब नहीं है लेकिन विचारों से जो गरीब है, वह महादरिद्र है और विचारों से जो सेठ है वो सेठों का भी सेठ है।

राजा परीक्षित कोई साधारण राजा न थे। उनके पास सात द्वीपों का स्थायी राज्य था और अनेक राजाओं पर उन्होंने विजय प्राप्त की थी। इतना विशाल राज्य और सैन्यबल होते हुए भी परीक्षित कहते हैं कि कोई महापुरुष मिले और ईश्वर-तत्त्व का प्रसाद दे तभी मुझे परम शांति मिलेगी, बाकी सब तो मैंने देख लिया।

जब शुकदेवजी महाराज मिले तब परीक्षित पहला प्रश्न करते हैं- “जब मृत्यु निकट हो तब जीव को क्या करना चाहिए ?”

शुकदेवजी कहते हैं- “इन्द्रियों के भोगों में रत जीवों के लिए सात दिन तो क्या सात जन्म भी कम हैं लेकिन तुझ जैसे बुद्धिमान के लिए  सात दिन भी अधिक हैं। जो नश्वर पदार्थों को नश्वर जानते हुए शाश्वत में प्रीति रखें, ऐसों के लिए तो सात दिन भी अधिक हैं। हे परीक्षित ! तू  भगवान की शऱण जा।”

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

गाँधी जी के जीवन में भी जब चमत्कार होते तब गाँधी जी वे अनुभव लोगों को सुनाते थे। गोलमेज कार्यक्रम में भाग लेने आईऩ्स्टीन जर्मनी से आये थे और गाँधी जी भारत से गये थे। उसमें गाँधीजी ने इतना सुन्दर व्याख्यान किया कि उनका उपहास करने वाले लोग भी उऩसे प्रभावित हो गये तथा उऩकी हँसी उड़ाने वाले अंग्रेजों ने भी तालियाँ बजाईं और उऩका अनुमोदन किया।

लोगों ने गाँधी जी से पूछाः “आप ऐसा प्रवचन कहाँ से पढ़कर आये ? यह सब तैयारी कैसे की ?”

गाँधी जी कहते हैं- “मैं जब बोलता हूँ तब मैं नहीं रहता, भगवान की शरण चला जाता हूँ। मेरे बोलने के पीछे मेरे राम का हाथ होता है इसलिए मेरी बोली प्रभावयुक्त होती है।”

हम भी शिष्टाचार में कह देते हैं कि मेरे काम के पीछे ईश्वर का हाथ है लेकिन यदि सफल हुए तो भीतर ʹमैंʹ बैठा ही होता है कि ʹयह तो मैंने कियाʹ और यदि विफल हुए तो कहेंगे कि ʹइसकी गलती…. उसकी गलती….ʹ या ʹजो भगवान की मर्जी….ʹ मानो भगवान ही काम बिगाड़ते को बैठे हैं।

वस्तुतः जीव के प्रत्येक कार्य के पीछे ईश्वर की सत्ता है। ईश्वर की सत्ता जब तक महसूस नहीं होती तब तक मनुष्य अहं में, जीवभाव में बैठा होता है। जब तक मनुष्य सत्संग नहीं करता तब तक उसे ईश्वर के रस की अनुभूति नहीं होती। जब तक ईश्वरीय रस की अनुभूति नहीं होती तब तक बाहर के रस का आकर्षण-विकर्षण एवं अशांति नहीं मिटती एवं दुःख निर्मूल नहीं होते। दुनिया की सब चीजें एक व्यक्ति को दे दो। खुशियों का उसे सरताज पहना दो, सारा सौन्दर्य, सारा धन एक व्यक्ति को दे दो लेकिन जब तक उसके जीवन में गीता रूपी ज्ञान नहीं होगा, उपनिषदों का अमृत नहीं होगा तब तक उसका दुर्भाग्य तो उसके साथ ही रहेगा। मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है बार-बार जन्मना और बार-बार मरना। बड़े में बड़ा सौभाग्य हैः

लभ्ध्वा ज्ञानं परां शांतिमचिरेणाधिगच्छति।

उस आत्मज्ञान की उपलब्धि होवे तो परम शांति। शुकदेव जी उस परम शांति को प्राप्त हुए महापुरुष थे। परीक्षित के सभामंडप में पहुँचने से पहले कुछ अज्ञानी लोगों ने उनका अपमान किया, पत्थर उछाले लेकिन उनके चित्त में अशांति नहीं हुई और सोने के सिंहासन पर बिठाकर परीक्षित उनका अर्घ्य-पाद्य से पूजन करते हैं तब भी शुकदेव जी को हर्ष नहीं होता।

जैसे सूर्य के निकट रात्रि नहीं जा सकती, सूर्य को दीमक नहीं लग सकती,  ऐसे ही जिसको परम शांति हो गई हो, आत्मा-परमात्मा का जिसको अनुभव हो चुका हो, ज्ञान का दीपक जिसमें एक बार प्रकाशित हो चुका हो उसे कोई आँधी नहीं बुझा सकती। उसी की प्राप्ति के लिए मनुष्य को बुद्धि मिली है। सच में सुखी भी वही रह सकता है जिसने परम शांति का अनुभव कर लिया है।

लभ्ध्वा ज्ञानं परां शांतिम्…..

अधिकांश लोग कहते हैं- “बाबा जी ! समय नहीं मिलता…. समय का अभाव है।ʹʹ अरे भाई ! आपके पास जो काम है, उससे भी अधिक काम पुराने समय के राजाओं के पास रहता था और आप लोगों के पास जितनी सुविधाएँ हैं, पुराने व्यक्तियों के पास उतनी न थीं। अभी हम बस में, रेल में, हवाई जहाज में सफर कर कार्य शीघ्रता से पूरा कर सकते हैं। पुराने समय में तो बैलगाड़ी जोतनी पड़ती थी। कहीं दूर जाना हो तो हफ्ताभर पहले से तैयारियाँ करनी पड़ती थीं।

गाड़ा जोतते-जोतते पटेल शहर जाय।

गाम का लाय और घर का भूल आय।।

ऐसा करते हुए भी लोग समय बचाते थे। गलाडूब व्यवहार में रहते हुए भी राजा-महाराजा लोग समय बचाकर गुरुओं के द्वार पर जाते थे और आत्मज्ञान पाते थे। आत्मतेज से वे तेजस्वी रहते थे और परम शांति पाते थे।

साधुओं का नाम लेवें तो शुकदेव जी महाराज का नंबर पहले आता है। ऐसे शुकदेव जी महाराज के गुरु राजा जनक योगशक्ति से सम्पन्न अठारह वर्षीय युवती सुलभा का पूजन करते हैं।

सुलभा जब राजा जनक के दरबार में पहुँची  उसके निर्दोष, संयमी व प्रभावशाली व्यक्तित्व एवं ज्ञाननिष्ठा को देखकर राजा जनक की दृष्टि स्थिर हो गई। उन्होंने पूछाः “तुम क्या चाहती हो ?”

सुलभा ने कहाः “राजन् ! में आपसे शास्त्रार्थ करना चाहती हूँ। आपको राजकाज के गलाडूब व्यवहार में परमशांति कैसे हुई ? अगर मेरा परिचय पूछो तो ʹसुलभाʹ मेरा नाम है। क्षत्रिय कुल में मेरा जन्म हुआ है।”

संतशिरोमणी शुकदेव जी के गुरु आनंदित होकर योगिनी सुलभा का पूजन करते हैं। यह आत्मविद्या कैसी है ! जनक जैसे राजा बारह वर्षीय अष्टावक्र का पूजन करते हैं। यह आत्मविद्या की ही महिमा है।

बारह वर्षीय अष्टावक्र के शरीर में आठ चक्र हैं। ठिगना कद, काला रंग व टेढ़े मेढ़े अंग….. एकदम कुरुप…. और चलें  तो ऐसा लगे कोई विचित्र प्राणी आया। फिर भी उऩमें आत्मविद्या चमकती है और उऩकी पूजा होती है।

हम सब भी अपने ʹमैंʹ रूपी अहंकार का विसर्जन करते हुए उस परमेश्वर की, परमेश्वर के अनुभव का रसपान कराने वाले आत्मविद्या के समर्थ आचार्य किसी सदगुरु की शऱण लेकर उस परम शांति व परमानंद को प्राप्त करने का यत्न करें जिसकी प्राप्ति के बाद और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रहता तथा जिससे बढ़कर अन्य कोई लाभ नहीं होता, हम उसी की प्राप्ति का दृढ़ संकल्प करें…..

ૐ आनंद… ૐ शांति….. ૐ…..ૐ…..ૐ…..

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 1997, पृष्ठ संख्या 2,3,4 अंक 53

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आत्मज्ञान की महिमा


पूज्यपाद संत श्री आशारामजी बापू

आत्मज्ञान की बड़ी महिमा है। एक व्यक्ति को दुनियाभर का धन दे दो, दुनियाभर का सौन्दर्य दे दो लेकिन आत्मज्ञान से अगर वचिंत रखा तो वह अभागा रह जायेगा। उसके हृदय में अशांति जरूर रहेगी, खटकाव जरूर रहेगा और जन्म-मरण का चक्र उसके सिर पर मँडराता ही रहेगा। फिर किसी-न-किसी माता के गर्भ में उलटा लटकता ही रहेगा। यदि उसे आप और कुछ भी न दो, परन्तु किसी ब्रह्मज्ञानी गुरु की मधुर निगाहों की माधुर्यता की एक झलक दिला दो, उसकी रूचि ईश्वराभिमुख कर दो तो महाराज ! आपने उसे ऐसा दे डाला, ऐसा दे डाला कि हजारों जन्मों के माँ-बाप तक न दे सकें। हजारों-हजारों जन्म कों के दोस्त रिश्ते-नाते न दे सकें, ऐसी चीज आपने उसको हँसते-हँसते दिला दी। आप उसके परम हितैषी हो गये।

आत्मज्ञान की ऐसी महिमा है। भगवान श्रीकृष्ण युद्ध के मैदान में मुस्कराते हुए अर्जुन को आत्मज्ञान दे रहे हैं। श्रीकृष्ण आये हैं तो कैसे ? विषम परिस्थितियों में आये हैं। गीता का भगवान कैसा अनूठा है ! किसी का भगवान सातवें अर्स पर रहता है, किसी का खुदा कहीं होता है, किसी का भगवान कहीं होता है लेकिन भारत का भगवान ! जीव को रथ पर बिठाता है और खुद सारथि होकर, छोटा होकर भी जीव को ब्रह्म का साक्षात्कार कराने में संकोच नहीं करता। श्रीकृष्ण तो यह भी नहीं कहते कि ʹइतना नियम करो, इतना व्रत करो, इतना तप करो, फिर मैं मिलूँगा।ʹ नहीं ! वे तो कहते हैं-

अपि चेदसी पापेभ्यः सर्वेभ्य पापकृत्तमः।

सर्व ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सतंरिष्यसि।।

ʹयदि तू सब पापियों से भी अधिक ताप करने वाला है तो भी ज्ञानरूप नौका द्वारा निःसन्देह संपूर्ण पापों को अच्छी प्रकार तर जायेगा।ʹ गीताः 4.36

भगवान कहते हैं ʹपापकृत्तमʹ। जैसे प्रिय, प्रियतर, प्रियतम होता है ऐसे ही कृत, कृत्तर और कृत्तम अर्थात् पापियों में भी आखिरी पंक्ति का हो, वह भी यदि इस ब्रह्मज्ञान की, आत्मज्ञान की नाव में बैठेगा तो तर जायेगा।

भगवदगीता जिस देश में हो, उसे देश के वासी जरा-जरा सी बात में चिढ़ जायें, दुःखी हो जायें, भयभीत हो जायें, ईर्ष्या करने लगें तो यह गीता से विमुखता के ही दर्शन हो रहे हैं। यदि हम गीता के ज्ञान के सन्मुख हो जायें तो हमारा यह दुर्भाग्य नहीं रह सकता।

जरा-जरा सी बात में जर्मन टॉय जैसा बन जाना, कोई दो शब्द बोल जाये तो आग बबूला हो जाना अथवा किसी ने जरा सी बड़ाई कर दी, दो शब्द मीठे कह दिये तो फूल जाना, इतना तो लालिया, मोतिया और कालिया कुत्ता भी जानता है। जलेबी देखकर पूँछ हिलाना और डण्डा देखकर दुम दबा देना, इतनी अक्ल तो उसके पास भी है। अगर इतना ही ज्ञान आपके पास है तो इतनी पढ़ाई-लिखाई का फल क्या ? मनुष्य होने का फल क्या ? फिर तो हम लोग भी द्विपाद पशु हो गये।

भगवान कहते हैं कि तुम कितने भी ठगे गये हो लेकिन जब गीता की शरण आ जाओ। अभी-अभी तुमको हम राजमार्ग दिखा देते हैं। जैसे हवाई जहाज छः घण्टों में दरिया पार पहुँचा देता है किन्तु बैलगाड़ी वाला छः साल चलता रहे फिर भी दरिया-पार करना उसके लिए संभव नहीं। मनमानी सुख की बैलगाड़ी को छोड़कर अब तुम आत्म-परमात्मसुख के जहाज में बैठ जाओ तो भवसागर से भी तर जाओगे।

ज्ञान भिडई ज्ञानडी ज्ञान तो ब्रह्मज्ञान।

जैसे गोला तोप का सोलह सो मैदान।।

जगत के और ज्ञान, छोटे-मोटे तो ज्ञानडो हैं लेकिन ब्रह्मज्ञान तोप का गोला है, जो सारी मुसीबतों को मार भगाता है। उस ज्ञान को पाने का तरीका भी भगवान सहज, सरल बता रहे हैं और वह तुम कर सकते हो। उसमें जो अड़चनें आती हैं उनका कारण भी भगवान बता रहे हैं और उन अड़चनों को कुचलने का उपाय भी भगवान बता रहे हैं। केवल तुमको गाँठ बाँधनी है कि ʹईश्वरप्राप्ति करके ही रहेंगे। हमको इस संसारभट्ठी में पच-पचकर नहीं मरना है बल्कि हमको शहंशाह होकर जीना है और शहंशाह होकर ही परम शहंशाह से मिलना है।ʹ

राजा से मिलने जब जाते हैं तो भीखमंगों के कपड़े पहनकर नहीं जाते। किसी मिनिस्टर, कलेक्टर से मिलने जब व्यक्ति जाता है तो उस दिन कपड़े जरा ठीकठाक करके जाता है। जब मिनिस्टर, चीफ मिनिस्टर से मिलना है तो सज-धजकर जाते हैं तो उस ब्रह्मांडनायक परमेश्वर से मिलना हो तो शहंशाह होकर जाओ। दीनता, हीनता, वासना, चिंता, मुसीबतें, काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, मात्सर्य, यह कचरा लेकर कहाँ मुलाकात करने जाते हो ? इन विकारों से बचने का उपाय, संसार में सुगमता से स्वर्गीय जीवन जीने का उपाय और परमसुखस्वरूप उस परमेश्वर को पाने का उपाय, ये सब बातें श्रीमदभागवत में व भगवदगीता में बतायी गयी हैं। कोई भी व्यक्ति गीता के अध्ययन, मनन और निदिध्यासन से अपने जीवन-पुष्प को महका सकता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 1997, पृष्ठ संख्या 12,13 अंक 53

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वास्तविक सुख किस में ?


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

मच्चित्ता गद् गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुषयन्ति च रमन्ति च।।

ʹनिरन्तर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले भक्तजन, सदा ही मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा, आपस में मेरे प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं।ʹ (भगवद् गीताः 10.9)

भोगी को विषय-भोगों में वह सुख नहीं मिलता जो भक्त को भगवद् प्रभाव के चिंतन एवं परस्पर कथन में मिलता है।

वस्तु-व्यक्तियों से क्रिया करके जो सुख मिलता है उसे क्रियाजन्य सुख कहते हैं। सूँघने, चखने, स्पर्श करने आदि क्रियाजन्य सुख में ही मनुष्य अटका रहा तो मनुष्य रूपेण मृगाश्चरन्ति। वह मनुष्य के रूप में पशु माना गया है। क्रियाजन्य सुख तो कुत्ते-कुत्ती भी भोगते हैं, जिसमें क्रिया, परिश्रम तो ज्यादा होते हैं और सुख घड़ीभर का मिलता है। ऐसे ही खाने पीने, सूँघने-सुनने आदि से मिलने वाला सुख क्रियाजन्य सुख है।

दूसरा सुख है भावजन्य सुख। क्रियाजन्य सुख की अपेक्षा भावजन्य सुख में मेहनत कम है और सुख ज्यादा है। भगवान या गुरु की मूर्ति को निहारने से या मन में भावना करने से हृदय में सुख मिलता है। भावजन्य सुख में परिश्रम कम है और सुख क्रियाजन्य सुख से ज्यादा है।

भावजन्य सुख हृदय को शुद्ध करता है स्वतंत्रता की ओर ले जाता है। क्रियाजन्य सुख में बल-बुद्धि तेज-तन्दुरुस्ती का नाश होता है और भावजन्य सुख हृदय को भगवदभाव से भरता है।

भावजन्य सुख से भी बढ़कर है ध्यानजन्य सुख। भाव ज्यादा देर नहीं टिकता लेकिन ध्यान उससे ज्यादा देर टिकता है। हालाँकि ध्यान भी निरन्तर नहीं होता है और समाधि भी सतत नहीं होती है। अतः उससे भी आगे है विचारजन्य सुख।

विचारजन्य सुख अर्थात् भगवदविचार करना, भगवदज्ञान की, आत्मज्ञान की बातें करना। जब दो दीवानें मिल जाते हैं तो वहाँ ईश्वर विषयक चर्चा की मेहफिल शुरु हो जाती है जिससे मन भगवदाकार, ब्रह्माकार होने लगता है। ऐसा करते-करते मनुष्य तात्त्विक सुख का अधिकारी होने लगता है। आत्म-साक्षात्कारी महापुरुष तात्त्विक सुख को पाते हैं।

सदा समाधि संत की आठों प्रहर आनंद।

अकलमता कोई ऊपजा गिने इन्द्र को रंक।।

ऐसा माधुर्य, संतोष और ऐसा रस उन महापुरुष को मिलने लगता है जहाँ इन्द्र का सुख भी तुच्छ हो जाता है।

मनुष्य जन्म का लक्ष्य उसी रस को, उसी तात्त्विक सुख को पाना है। क्रियाजन्य सुख तो पशु भी ले रहे हैं, मूर्ख भी ले रहे हैं। भावजन्य सुख भक्त लेते हैं और विचारजन्य सुख भक्त और ज्ञानी लेते हैं। तत्त्व का सुख पाने के लिए परस्पर परमात्मतत्त्व का कथन-चिंतन-मनन करना चाहिए।

बुद्धिमान मनुष्य तो वह है जो भगवदचिंतन, भगवदस्वरूप का श्रवण करे कि ʹभगवान क्या हैं ? जीवात्मा क्या है ? परमात्मा क्या है ? सुख-दुःख आते हैं, चले जाते हैं लेकिन उनको भी जो देखने वाला है उस साक्षीस्वरूप में मैं कैसे टिकूँ ? इससे भी आगे चलकर साक्षी और साक्ष्य के पार परमात्मपद में पूर्णता कैसे पाऊँ ?ʹ ऐसा विचार करने वाला व्यक्ति उस परम सुख को पाता है, तात्त्विक सुख को पाता है।

छः व्यक्तियों से हमें कभी हानि नहीं होती, लाभ ही लाभ होता हैः

सात्त्विक एवं बुद्धिमान मित्र, विद्वान पुत्र, पतिव्रता स्त्री, दयालु मालिक, सोच-समझकर बोलने वाला, सोच-समझकर काम करने वाला। इनसे कभी हानि नहीं होती है।

श्रीकृष्ण अथवा श्रीकृष्णतत्त्व को पाये हुए महापुरुषों को हम ʹसाधुʹ कहते हैं। गुरुवाणी में आता हैः

साधु ते होवहि न कारज हानि।

ब्रह्मज्ञानी ते कछु बुरा न भया।।

जिन्होंने तात्त्विक सुख पा लिया है, परम सुख पा लिया है, आत्मा का सुख पा लिया है उनसे कभी हमारा बुरा नहीं होता है। ऐसे तत्त्ववेत्ता होने के लिए जो दीवाने चल पड़ते हैं, उनकी ही बात भगवान यहाँ कर रहे हैः मच्चिता मद् गतप्राणाः।

परमेश्वर की ही बातों के परस्पर कथन से ज्ञान पुष्ट होता है, तात्त्विक सुख दृढ़ होता है। जिज्ञासु द्वारा ईश्वर विषयक ज्ञान सुनने से जिज्ञासा की पूर्ति तो होती है, आत्मज्ञान सुनकर कुछ संतोष तो होता है किन्तु उससे सब दुःख नहीं मिटते। सत्संग से कुछ दुःखों की निवृति अवश्य होती है किन्तु बाकी के दुःख मिटाने के लिए उस सत्संग से जो ज्ञान मिला, उस ज्ञान का परस्पर कथन करके उस ज्ञान में टिकने का प्रयास करना चाहिए।

जब तक गुरु का ज्ञान नहीं मिला था, गुरूदीक्षा नहीं मिली थी तब तक संसार की छोटी-छोटी बातें भी बड़ा प्रभाव डालती थीं लेकिन गुरुदीक्षा मिलने के बाद, सत्संग सुनने के बाद उनका पहले जैसा प्रभाव तो नहीं पड़ता किन्तु दुःख बना रहता है, विक्षेप बना रहता है। निगुरे को ज्यादा तो सगुरे को कम। ….और यह विक्षेप तब तक बना रहता है जब तक आत्मनिष्ठा दृढ़ नहीं हुई। इसलिए निष्ठा को दृढ़ करने के लिए भी आत्मा की बातें, सत्संग की बातें करनी चाहिए और उसी में संतुष्ट होना चाहिए। इधर उधर की बातें करके अपने चित्त से सत्संग की बातों का प्रभाव घटने नहीं देना चाहिए अपितु सत्संग की बातों से इधर-उधर की बातों के प्रभाव को हटा देना चाहिए।

अगर चारों तरफ से मुसीबतें आ जायें, चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा दिखने लगे, तब भी यह चिंतन करना चाहिए किः ʹदुःख आये हैं तो जाएँगे, सदा नहीं रहेंगे। जब सृष्टि पहले नहीं थी, बाद में भी नहीं रहेगी और अभी भी ʹनहींʹ की ओर ही जा रही है तो दुःख भी पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा और अभी भी ʹनहींʹ की ओर ही जा रही है तो दुःख भी पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा और अभी भी नहीं की ओर ही जा रहा है। परमात्मा  तो पहले भी था, अब भी है और बाद में भी रहेगा। वही परमात्मा मेरा आत्मा है, वही श्रीराम है, वही यशोदानन्दन श्रीकृष्ण है और वही गुरु है।ʹ ऐसा चिंतन करके दुःख के बीच भी आप दो मिनट के लिए पूरे सुख में आ सकते हैं।

बाहर से तो दुःख, दुःख ही दिखता है लेकिन दुःख दिखता है दुःखाकार वृत्ति से। उस दुःखाकार वृत्ति को यदि दो मिनट के लिए भी भगवदाकार वृत्ति बना दें तो आप दो मिनट के लिए निर्दुःख हो सकते हैं तो दस मिनट भी हो सकते हैं। हृदय में जब दुःखाकार वृत्ति होती है तब दुःख होता है। अनुकूलवेदनीयं सुखं प्रतिकूलवेदनीयं दुःखं। जो अनुकूल लगता है उसे हम सुख मानते हैं और प्रतिकूल लगता है उसे दुःख मानते हैं। जैसे बेटे की शादी में माँ को गालियाँ मिलती हैं तो उसे दुःख नहीं होता है। दुश्मन का आशीर्वाद भी खटकता है और सज्जन की गाली भी अच्छी लगती है। गाली तो गाली होती है लेकिन वहाँ दुःखाकार वृत्ति उत्पन्न नहीं होती वरन् ʹमित्र की गाली हैʹ ऐसा सोचकर सुखाकार वृत्ति बनने के कारण सुख होता है।

धन चले जाने से सबको दुःख होता है लेकिन वही धन जब सत्कर्म में लगाते हैं तो अंदर से औदार्य की वृत्ति उत्पन्न होती है। अतः धन देते समय भी सुख होता है। नहीं तो धन देना अच्छा लगता है क्या ? कुछ भी न मिले और धन देना पड़े तो…..? फिर भी सत्कर्म में धन देने पर सुख होता है क्योंकि वहाँ धन का महत्त्व नहीं है वरन् आपकी वृत्ति सुखाकार होती है इसीलिए आप मठ-मंदिर, आश्रम आदि में धन अर्पण करते हो। वही पचास रूपये हैं – यदि सत्कर्म में लगाते हो तो सुख होता है और दण्ड के रूप में भरना पड़े तो दुःख होता है।

मदालसा जब अपने बेटों को दूध पिलाती, तब ब्रह्मज्ञान की बातें करती थी। मच्चित्ता मद् गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। मानो, गीता का यह वचन चरिथार्थ कर रही हो। इस प्रकार शैशव से ही भगवदभाव के विचारों से ओतप्रोत बातें करके उसने अपने बच्चों को ब्रह्मज्ञानी बना दिया।

बाल्यकाल में ही एक के बाद एक बालक ब्रह्मज्ञानी होकर विरक्त होने लगा। तब मदालसा के पति ने कहाः “यदि सभी बच्चों को तुम इस प्रकार विरक्त बना दोगी तो मेरी गादी कौन संभालेगा ? राजगादी संभालने के लिए कुछ तो आसक्ति चाहिए, कुछ तो अज्ञान चाहिए… तभी वह संभाली जा सकेगी। विरक्त क्या संभालेगा ? अतः एक बालक को तो अज्ञानी रखो।

अलर्क नामक छोटे बेटे को ब्रह्मज्ञान देने से राजा ने मदालसा को इन्कार कर दिया। मदालसा ने सोचा किः ʹचलो, भले यह अलर्क राज्य संभाले लेकिन मेरा बेटा राज्य करके अंत में मरे और फिर दुबारा जन्म ले तो मेरा जन्म देना व्यर्थ है।ʹ अतः उसे ब्रह्मज्ञान के थोड़े संस्कार तो दिये ही, जाते-जाते एक ताबीज भी दे गयी और बोलीः

“बेटा ! यह ताबीज कभी खोलना मत। जब चारों तरफ से अंधेरा नजर आने लगे, चारों ओर से मुसीबतों के पहाड़ टूटने लगें, तभी इस ताबीज को खोलना।”

समय पाकर मदालसा और उसके पति का देहान्त हो गया और अलर्क राज-काज संभालने लगा। ऐसा कोई राजा नहीं, जिसके जीवन में कभी कोई दुःख न आया हो। ज्यों ही राज्य को ʹमेराʹ माना, आसक्ति हुई त्यों ही दुःख आना शुरु हो जाता है। यह ईश्वर की नियति है।

जहाँ तुमने वस्तुओं में, व्यक्ति में, परिस्थिति में आसक्ति की कि ʹहाश ! अब मजे से जियेंगेʹ तभी कोई-न-कोई दुःख आना शुरु हो जायेगा क्योंकि परमात्मा तुम्हें सदैव इस मिथ्या मजे में ही नहीं रखना चाहते हैं। इसीलिए दुःखहारी श्रीहरि दुःख देकर भी तुम्हें परिपक्व करना चाहते हैं। यदि आप ʹवेलसेटʹ हो गये हो तो समझ लो कि ʹअपसेटʹ होने का सामान भी तैयार हो रहा है और यह कहानी केवल एक-दो की ही हो ऐसी बात नहीं है, सबकी यही कहानी है।

अलर्क भी राज-काज संभालते-संभालते उसमें ही गरकाव होने लगा तब उसके भाइयो को हुआ कि ʹहमारा भाई अज्ञानी क्यों रह जाए ? अब वह राज्य में आसक्त होता जा रहा है अतः उसकी आसक्ति छुड़ाने का उपाय भी करना होगा।ʹ

वे जीवन्मुक्त भाई गये अलर्क के पास और बोलेः “हमें हमारे राज्य का हिस्सा दे दो।”

अलर्कः “राज्य मुझे मिला है, आप लोगों को कैसे दे दूँ ?”

भाईः “हम तुम्हारे भाई लगते हैं, अपना हक क्यों छोड़ें ?”

जितना संसार से सुख मिलता है उतनी ही उससे आसक्ति भी होती है। अलर्क ने राज्य देने से इन्कार कर दिया। तब उसके भाइयों ने काशीनरेश से विचारविमर्श किया कि ʹहमें अपने भाई को जगाना है, उसे मुसीबत में डालकर सदा के लिए जन्म-मरणरूपी मुसीबत से छुटकारा दिलवाना है। अतः आप हमारी सहायता करें।ʹ काशीनरेश ने अपना सैन्य भेज दिया।

अलर्क का राज्य तो छोटा-सा था और काशीनरेश की विशाल सेना। अलर्क को हुआ कि ʹइतनी बड़ी सेना लेकर आये हुए अपने संत भाइयों से मैं कैसे लड़ूँगा ? वह बड़ा दुःखी और चिंतित हो उठा और ऐसी मुसीबत के समय में उसने माँ का दिया हुआ ताबीज खोला जिसमें एक छोटी चिट्ठी थी। उस चिट्ठी में लिखा थाः

दुःख पड़े तो संतशरण जाइये।

उस समय नगर के बाहर जोगी गोरखनाथ ठहरे हुए थे। अलर्क पहुँचा जोगी गोरखना के श्रीचरणों में और बोलाः “महाराज ! मैं बड़ा दुःखी हूँ।”

गोरखनाथः “तू मदालसा का बेटा होकर दुःखी है ? मैं अभी तेरा दुःख निकाल देता हूँ। बता, कहाँ है दुःख ?”

अलर्कः “महाराज ! हृदय में बड़ा दुःख है।”

जोगी गोरखनाथ ने तपाया चिमटा और बोलेः “बता, कहाँ है दुःख ? अभी उसे यह चिमटा लगाता हूँ।”

अलर्कः “महाराज ! आप चिमटा मेरे दुःख को कैसे लगाओगे ?”

गोरखनाथः “दुःख है कहाँ ?

अलर्कः “भीतर है।”

गोरखनाथः “चल, अभी लगाता हूँ।”

अलर्कः “महाराज ! यह क्या ? चिमटे से दुःख दूर कैसे होगा ?”

गोरखनाथः “तू केवल बता कि दुःख भीतर कहाँ पर है और कैसे है ? दुःख है कि दुःख का भाव है ?”

अलर्कः “महाराज ! भाई लोग काशीनरेश की सेना लेकर राज्य पर चढ़ाई करने आये हैं, इसलिए मन में दुःख का भाव है।”

गोरखनाथः “यह दुःख नहीं है, वरन् ʹयह राज्य जाये नहींʹ इस आसक्ति के कारण दुःखाकार वृत्ति है। इस दुःखाकार वृत्ति को तू बदलना चाहे तो बदल सकता है। यह केवल एक वृत्ति है और वृत्ति जहाँ से उत्पन्न होती है वह उत्पन्न करने वाला पूर्ण स्वतन्त्र है। उसे जान ले तो सब दुःखों से सदा के लिए मुक्त हो जायेगा।”

“महाराज ! उसे कैसे जानूँ ?”

“अलर्क ! संसार तू लाया नहीं था, राज्य तू लाया नहीं था, ले भी नहीं जायेगा और अभी भी नहीं के तरफ ही जा रहा है। उसमें आसक्ति मत कर।”

इस प्रकार परस्पर आत्मबोध की बात सुनते-सुनते अलर्क को अनुभव होने लगा।

मच्चित्ता मद् गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।।

अलर्क को उस तात्त्विक सुख का अनुभव हुआ जो उसे राज्य-भोग में कभी नहीं मिला था। राज्य सुख तो क्रियाजन्य सुख था, कभी-कभार पूजा में भावजन्य सुख मिला था किन्तु यह सुख तात्त्विक सुख था। तात्त्विक सुख ही सब सुखों का मूल है।

कृतकृत्य होकर अलर्क ने गुरु गोरखनाथ के चरणों में प्रणाम करके विदा माँगी और राज्य में जाकर अपने भाइयों को संदेश भिजवायाः “आज तक मैंने यह राज्यरूपी बैलगाड़ी खूब खींची। आप लोग मेरे बड़े भाई हैं अतः इस झंझट को अब आप ही संभाल लें। अब मैं राज्य से निवृत्त हो जाना चाहता हूँ।”

तब भाइयों ने कहाः “पागल ! इस झंझट को झंझट समझकर निवृत्ति का सुख तुझे मिल जाये इसीलिए हमने यह आयोजन किया था। बस, अब तू ही इसे संभाल। हमें इसकी जरूरत नहीं है। राज्य के प्रति तेरी आसक्ति एवं तेरी नासमझी को मिटाने के लिए ही हमने यह सारा स्वांग रचा था।”

ऐसे ही परमात्मा तुम्हारे साथ स्वाँग रचता है। परमात्मा परम सुहृद है। वह जो भी करता है हमारे मंगल के लिए ही करता है। हम हार न जाएँ, घबरा न जाएँ, थक न जायें और तुच्छ सुख-दुःख में बह न जाएँ – केवल इतनी ही सावधानी रखें और यह सावधानी तब आयेगी जब भगवान के प्यारों के बीच जायेंगे, उनसे भगवदसंबंधी वार्तालाप सुनेंगे, भगवदविचार का मनन-चिंतन करेंगे एवं बार-बार भगवदाकार वृत्ति उत्पन्न करेंगे…. ऐसा करने से उन परम सुहृद परमात्मा में रमण करने की योग्यता अपने आप विकसित हो उठेगी। इसलिए भगवान ने कहा हैः मच्चित्ता मद् गतप्राणा….

ʹनिरन्तर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले भक्तजन, सदा ही मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा, आपस में मेरे प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं।ʹ

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 1997, पृष्ठ संख्या 2,3,4,5,6 अंक 51

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