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Tatva Gyan

यह कर लो तो सारी परेशानियाँ भाग जायेंगी ! – पूज्य बापू जी


एक होती है सत्-वस्तु, दूसरी होती है मिथ्या वस्तु । मन की जो कल्पनाएँ, जो फुरने हैं यह है मिथ्या वस्तु । ‘यह करूँगा तो सुखी होऊँगा’, ‘यह पाऊँगा तो सुखी होऊँगा’ ‘यहाँ जाऊँगा तो सुखी होऊँगा’…. इन वस्तुओं में उलझ-उलझकर ही आपने अपने जीवन को टुकड़े-टुकड़े कर डाला है ।

सत्-वस्तु से तात्पर्य है  अपना आत्मा-परमात्मा । सत्संग के द्वारा सत्त्वगुण बढ़ाकर हम अपने उस सत्यस्वरूप को पा लें । दो चीजें होती हैं, एक होती है नित्य, दूसरी होती है मिथ्या । बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो मिथ्या वस्तु के बजाय नित्य वस्तु को पसंद करे, सत्-वस्तु को पसंद करे । वास्तव में सत्-वस्तु तो एक ही है और वह है परमात्मा । फिर उसे परमात्मा कहो या आत्मा, ब्रह्म कहो या ईश्वर, राम कहो या शिव… सब तत्त्वरूप से एक ही है है ।

मानव को जो नित्य है उसकी प्राप्ति का यत्न करना चाहिए और जो मिथअया है उसका उपयोग करना चाहिए । परंतु आप करते क्या हैं ? जो नित्य है उसकी ओर ध्यान ही नहीं देते और मिथ्या की प्राप्ति में ही अपना पूरा जीवन नष्ट कर डालते हैं । जो वस्तु मिलती है वह पहले हमारे पास नहीं होती तभी तो मिलती है और बाद में भी वह हमारे पास से चली जाती है मिथ्या होने से । जो पहले नहीं था वह मिला और जो मिला उसे छोड़ना ही पड़ेगा । किंतु परमात्मा मिलता नहीं इसलिए वह छूटता भी नहीं, वह सदा प्राप्त है ।

ऐसी कोई मिली हुई वस्तु नहीं जिसे आप सदा रख सकें । आपको जो वस्तु मिली, मिलने से पूर्व वह आपके पास नहीं थी, तभी तो मिली । अतः जो वस्तु आपको मिली वह आपकी नहीं है और जो आपकी नहीं है वह आपके पास सदा के लिए रह भी नहीं सकती । देर-सवेर उसे आपको छोड़ना ही पड़ेगा या तो वह वस्तु स्वयं आपको छोड़कर चली जायेगी । चाहे फिर नौकरी हो, मकान हो, परिवार हो, पति हो, पत्नी हो, चाहे तुम्हारी स्वयं की देह ही क्यों न हो…. देह भी तुम्हें मिली है अतः देह को भी छोड़ना पड़ेगा ।

बचपन मिला था, छूट गया । जवानी तुम्हें मिली है, छूट जायेगी । बुढ़ापा तुम्हें मिलेगा, वह भी छूट जायेगा । मौत भी आकर छूट जायेगी लेकिन तुममें मिलना और छूटना नहीं है क्योंकि तुम शाश्वत हो । जो मिली हुई चीजी है उसको आप सदा रख नहीं सकते और अपने आपको आप छोड़ नहीं सकते, कितना सनातन सत्य है ! लोग बोलते हैं कि संसार को छोड़ना कठिन है किंतु संत कहते हैं, संतों का अनुभव है कि संसार को सदा रखना असम्भव है और परमात्मा को छोड़ना असम्भव है । ईश्वर को आप छोड़ नहीं सकते और संसार को आप रख नहीं सकते ।

बचपन को आपने छोड़ने की मेहनत की थी क्या ? नहीं ! छूट गया । जवानी को छोड़ना चाहते हो क्या ? अपने-आप छूट रही है । बुढ़ापे को आप छोड़ना चाहते हो क्या ? अरे, आप रखना चाहो तो भी छूट जायेगा । ऐसे ही निंदा छोड़ूँ… स्तुति छोड़ूँ…. मान छोड़ूँ…. अपमान छोड़ूँ… नहीं, सब अपने-आप छूटते जा रहे हैं । एक साल पहले जो तुम्हारी निंदा-स्तुति हुई थी उसका दुःख या सुख आज तुम्हें होता है क्या ? नहीं, पुराना हो गया ।

पहले दिन जो निंदा हुई वह बड़ी भयानक लगी होगी, जो स्तुति हुई वह मीठी लगी होगी किंतु आज देखो तो वे पुरानी हो गयी, तुच्छ हो गयीं । संसार की ऐसी कोई परिस्थिति नहीं जिसे आप रख सकें । आपको छोड़ना नहीं पड़ा है भैया ! सब छूटा चला जा रहा है । जिसको आप कभी छोड़ नहीं सकते वह है सत्-वस्तु और जिसको आप सदा रख नहीं सकते वह है मिथ्या वस्तु । अतः मिथ्या का उपयोग करो और सत् का साक्षात्कार कर लो । सत्संग यही सिखाता है ।

दो वस्तु देखी गयी हैः एक वह है जो बह रही है और दूसरी वह है जो रह रही है । बहने वाली वस्तु है संसार और रहने वाली वस्तु है परमात्मा । बहने वाली वस्तु के बहने का मजा लो और रहने वाली वस्तु का साक्षात्कार करके रहने का मजा ले लो तो सदा मजे में ही रहोगे । व्यक्ति तभी दुःखी होता है जब बहने वाली वस्तु को रखना चाहता है और रहने वाली वस्तु से मुख मोड़ लेता है ।

जब-जब दुःख और मुसीबतों से व्यक्ति घर जाय तब-तब वह समझ ले कि बहने वाले मिथ्या जगत की आसक्ति उसको परेशान कर रही है और रहने वाले आत्मा के विषय का उसको ज्ञान नहीं है, उसकी प्रीति नहीं है इसीलिए वह परेशान है । जब भी मुसीबत आये….. दुःख, चिंता, शोक, भय – ये तमाम प्रकार की जो मुसीबतें हैं, इन सारी मुसीबतों का एक ही इलाज है कि बहने वाली वस्तु को बहने वाली मानो और रहने वाले आत्मा से प्रीति कर लो तो सारी परेशानियाँ भाग जायेंगी ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल-मई 2020, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 328-329

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…..तो 33 करोड़ देवता भी उसके आगे हो जायें नतमस्तक – पूज्य बापू जी


मैंने एक पौराणिक कथा सुनी है । एक बार देवर्षि नारद जी ने किसी बूढ़े को कहाः “काका ! इतने बीमार हो । संसार तो संसार है, चलो मैं तुम्हें स्वर्ग ले चलता हूँ ।”

बूढ़े ने कहाः “नारदजी ! मैं स्वर्ग दो जरूर आऊँ लेकिन मेरी एक इच्चा पूरी हो जाय बस ! मेरे दूसरे बेटे ने खूब सेवा की है । मैं जरा ठीक हो जाऊँ, बेटे का विवाह हो जाय फिर चलूँगा ।”

नारद जी ने आशीर्वाद दिया व कुछ प्रयोग बताये । काका ठीक हो गया, बेटे का विवाह हो गया । नारदजी आये, बोलेः “काका ! चलो ।”

काकाः “देखो, बहू नयी-नयी है । जरा बहू के घर झूला बँध जाय (संतान हो जाय) फिर चलेंगे ।”

महाराज ! झूला बँध गया । नारदजी आये, बोलेः “चलो काका !”

काका बोलाः “तुम्हें कोई और मिलता नहीं क्या ?”

नारदजीः “काका ! यह आसक्ति छुड़ाने के लिए मैं आ रहा हूँ । जैसे बंदर सँकरे मुँह के बर्तन में हाथ डालता है और गुड़-चना आदि मुट्ठी में भरकर अपना हाथ फँसा लेता है और स्वयं मुठ्ठी खोल के मुक्त नहीं होता । फिर बंदर पकड़ने वाले आते हैं और डंडा मार के जबरन उसकी मुठ्ठी खुलवाते हैं तथा उसके गले में पट्टा बाँध के ले जाते हैं । ऐसे ही मौत आयेगी और डंडा मारकर गले में पट्टा बाँध के ले जाय तो ठीक नहीं क्योंकि संत-मिलन के बाद भी कोई व्यक्ति नरक जाय तो अच्छा नहीं इसलिए पहले से बोल रहा हूँ ।”

“मैं नरक-वरक नहीं जाऊँगा । फिर आना, अभी जाओ ।”

नारदजी 2-4 वर्ष बाद आये, पूछाः “काका कहाँ गये ?”

“काका तो चल बसे, ढाई वर्ष हो गये ।”

नारद जी ने देखा कि वह लालिया (कुत्ता) हो के आया है, पूँछ हिला रहा है । नारदजी ने शक्ति देकर कहाः “क्या काका ! अभी लालिया हो के आये हो ! मैंने कहा था न, कि संसार में मजा नहीं है ।”

वह बोलाः “अरे ! पोता छोटा है, घर में बहू अकेली है, बहू की जवानी है, ये सुख-सुविधाओं का उपभोग करते थक जाते हैं तो रात को रखवाली करने के लिए मेरी जरूरत है । मेरा कमाया हुआ धन मेरा बेटा खराब कर देगा, बहू नहीं सँभाल सकेगी इसलिए मैं यहाँ आया हूँ और तुम मेरे पीछे पड़े हो !”

आसक्ति व्यक्ति को कैसा कर देती है ! नारदजी कुछ वर्षों के बाद फिर आये उस घर में । देखा तो लालिया दिखा नहीं, किसी से पूछाः “वह लालिया कहाँ गया ?”

“वह तो चला गया । बड़ी सेवा करता था ! रात को भौंकता था और पोता जब सुबह-सुबह शौच जाता तो उसके पीछे-पीछे वह भी जाता था तथा कभी पोते को चाट भी लेता था ।”

ममता थी पोते में । मर गया, एकदम तमस मे आया तो कौन-सी योनि में गया होगा ? नारदजी ने योगबल से देखा, ‘ओहो ! नाली में मेंढक हो के पड़ा है ।’

उसके पास गये, बोलेः “मेंढकराज ! अब तो चलो ।”

वह बोलाः “भले अब मैं नाली में रह रहा हूँ और मेरे को बहू, बेटा, पोता नहीं जानते लेकिन मैं तो सुख मान रहा हूँ कि मेरा पुत्र है, पोता है, मेरा घर है, गाड़ी है…. यह देखकर आनंद लेता हूँ । तुम मेरे पीछे क्यों पड़े हो ?”

संग व्यक्ति को इतना दीन करता है कि नाली में पड़ने के बाद भी उसे पता नहीं कि मेरी यह दुर्दशा हो रही है । अब आप जरा सोचिये कि क्या हम लोग उसी के पड़ोसी नहीं हैं ? जहाँ संग में पड़ जाता है, जहाँ आसक्ति हो जाती है वहाँ व्यक्ति न जाने कौन-कौनसी नालियों के रास्ते से भी ममता को पोसता है । आपका मन जितना इन्द्रियों के संग में आ जाता है, इन्द्रियाँ पदार्थों के संग में आ जाती है और पदार्थ व परिस्थितियाँ आपके ऊपर प्रभाव डालने लगते हैं उतना आप छोटे होने लगते हैं और उनका महत्त्व बढ़ जाता है । वास्तव में आपका महत्त्व होना चाहिए । हैं तो आप असंगी, हैं तो आत्मा, चैतन्य, अजन्मा, शुद्ध-बुद्ध, 33 करोड़ देवता भी जिसके आगे नतमस्तक हो जायें ऐसा आपका वास्तविक स्वरूप है लेकिन इस संग ने आपको दीन-हीन बना दिया ।

निःसङ्गो मां भजेद् विद्वानप्रमत्तो जितेन्द्रियः । (श्रीमद् भागवतः 11.25.34)

जितना आप निस्संग होते हैं, जितना आपका मनोबल ऊँचा है, मन शुद्ध है उतना आपका प्रभाव गहरा होता है । जो उस ब्रह्म को जानते हैं, अपने निस्संग स्वभाव को जानते हैं उनका दर्शन करके देवता लोग भी अपना भाग्य बना लेते हैं ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल-मई 2020, पृष्ठ संख्या 29,30 अंक 328-329

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पंचमहाभूतों का विश्लेषण


सम्पूर्ण जगत है क्षेत्र और उसको जानने वाला है क्षेत्रज्ञ

साख्य शास्त्र के अनुसार प्रकृति से तीन गुणों का विकास होता हैः सत्वगुण (ज्ञानशक्ति), रजोगुण (क्रियाशक्ति) और तमोगुण (स्थायित्वशक्ति) । प्रकृति मूल कारण है, वह किसी का कार्य नहीं है । उसमें त्रिगुण साम्यावस्था में रहते हैं । प्रकृति में क्षोभ होने पर उससे महत्-तत्त्व (समष्टि बुद्धि) होता है, महत्-तत्तव से अहंकार और अहंकार से पंचभूत । इस प्रकार महत्-तत्त्व और अहंकार कार्य भी है और कारण भी हैं । पंचभूत प्रकृति के अंतिम कार्य हैं अतः वे किसी के कारण नहीं हैं । इन्द्रियाँ, शरीरादि पंचभूतों के कार्य नहीं हैं बल्कि विकार हैं । प्रकृति के हर कार्य-स्तर पर गुणों का विकास होता है । हर कार्य सत्त्वगुणी, रजोगुणी, तमोगुणी – तीन-तीन विभागों में बँट जाता है । यह प्रक्रिया वेदांत में भी स्वीकार्य है ।

अब हम विवेक की स्पष्टता के लिए क्षेत्र के इन 31 तत्त्वों पर थोड़ा-थोड़ा विचार करते हैं ।

1. पंचमहाभूत और उनका विस्तार

प्रकृति के अंतिम कार्य पंचमहाभूत हैं – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश । नाम-रूप आकारयुक्त जितने भी पदार्थ या वस्तुएँ हैं वे सब इन्हीं के विकार हैं । वृक्ष, पशु, पक्षी, कीट-पतंग, मनुष्य, नदी, पर्वत आदि सब वस्तुएँ इन्हीं पंचमहाभूतों से बनती हैं और उपादान (उपादान यानि वह सामग्री जिससे कोई वस्तु तैयार होती है, जैसे घड़े का उपादान मिटटी है) रूप से ये सब वस्तुओं में व्यापक है ।

पृथ्वी आदि वस्तुरूप जो हमारी इन्द्रियों से जानी जाती है और जो पृथ्वी आदि पंचभूत तत्त्व है, उनमें अंतर है । वस्तुओं में ये पाँचों तत्त्व मिले रहते हैं । तकनीकी भाषा में बोलें तो वस्तुओं में पंचमहाभूत पंचीकृत (एक विशिष्ट प्रक्रिया से मिश्रित) हैं किंतु जो तत्त्व हैं वे अपंचीकृत रूप में हैं । उनको ‘तन्मात्र’ अर्थात् ‘सिर्फ वही’ भी कहते हैं । इनका अनुभव जिन रूपों में किया जाता है उनको ‘पंचतन्मात्र’ कहते हैं । आकाश का तन्मात्र ‘शब्द’ है, वायु का तन्मात्र ‘स्पर्श’ है, अग्नि का तन्मात्र ‘रूप’ है, जल का तन्मात्र ‘रस’ है और पृथ्वी का तन्मात्र ‘गंध’ है ।

ये पंचतन्मात्र तीन स्थानों में दिख पड़ते हैं – विषय में, इन्द्रियों में और मन में । विषय में उनका जो रूप है वह ‘अधिभूत’ कहलाता है और इन्द्रिय एवं मन में जो रूप है वह ‘अध्यात्म’ कहलाता है । इसके अतिरिक्त एक रूप इनका और भी मानना पड़ता है और वह है अधिदैव । ‘अधिदैव’ एक ओर तो अधिभूत और अध्यात्म के संयोग में हेतु बनता है और दूसरी ओर अध्यात्म को अधिभूत में व्यवस्थित (दृढ़ता से स्थित) करता है । प्रत्येक तन्मात्र के ये तीन रूप तीन गुणों के कारण हुए हैं- सत्त्वगुण से अध्यात्म, रजोगुण से अधिदैव और तमोगुण से अधिभूत ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2020, पृष्ठ संख्या 25 अंक 325

(पिछले अंक में हमने तन्मात्र व उनके दिखने के तीनों स्थानों (विषय, इन्द्रिय और मन) के बारे में एवं उनके अधिभूत, अध्यात्म एवं अधिदैव रूप के बारे में जाना । इस अंक में उसी विषय को स्पष्टता को आगे उदाहरण के साथ समझेंगे-)

उदाहरणार्थः अग्नि या तेज के तन्मात्र ‘रूप’ को लें । इसका अधिभूत रूप है विषय-वस्तु का रंग और आकार, इसका अध्यात्म रूप ‘चक्षु’ है और अधिदैव रूप ‘सूर्य’ है । इसी प्रकार प्रत्येक तन्मात्र के तीन-तीन रूप हैं । अध्यात्म, अधिदैव और अधिभूत के इस तरह पाँच ‘त्रिक’ बनते हैं ।  प्रत्येक त्रिक को त्रिपुटी कहते हैं । ज्ञानेन्द्रियों की इन त्रिपुटियों को सारणी में प्रदर्शित किया गया है ।

ज्ञानेन्द्रियों की त्रिपुटी

पंचभूत तन्मात्र अधिभूत अध्यात्म अधिदैव
आकाश शब्द शब्द विषय श्रोत्रेन्द्रिय दिशा
वायु स्पर्श स्पर्श विषय त्वगिन्द्रिय वायुदेव
अग्नि रूप रूप विषय चक्षुरिन्द्रिय सूर्यदेव
जल रस रस विषय रसनेन्द्रिय वरूणदेव
पृथ्वी गंध गंध विषय घ्राणेन्द्रिय अश्विनी कुमार

वैज्ञानिक लोग पदार्थ की छानबीन करके तत्त्व का निश्चय करते हैं । यह आधिभौतिक प्रणाली है । प्राचीन भारतीय प्रणाली यह है कि हम अपने अनुभव की छानबीन करके तत्त्व का निश्चय करते हैं । यह आध्यात्मिक प्रणाली है ।

ज्ञानेन्द्रिय किनसे बनी हैं ?

ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में प्रमाण हैं । श्रोत्र से केवल शब्द ही ज्ञात होता है और शब्द किसी अन्य इन्द्रिय से ज्ञात नहीं हो सकता । अतः शब्द के विषय में केवल श्रोत्र ही प्रमाण है । यह इसलिए है कि श्रोत्र केवल आकाश का तन्मात्र ही है । इसी प्रकार प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय में एक-एक तत्त्व का तन्मात्र ही है । इसी बात को यों कहते हैं कि ज्ञानेन्द्रियाँ अपंचीकृत महाभूतों से बनी हैं ।

पंचीकरण क्या है    ?

एक गुलाब का फूल । उसमें पाँचों तत्त्व उपस्थित हैं किंतु नेत्र केवल उसका रूप देखते हैं, त्वचा उसकी कोमलता जानती है, रसना उसका स्वाद बताती है, नाक उसकी गंध बताती है और कान उसका चट-चट शब्द बताते हैं । यद्यपि एक-एक भूत से बनी ज्ञानेन्द्रियाँ फूल के एक-एक गुण का ही प्रकाश करती हैं तथापि फूल में पाँचों भूत हैं और उन सब ज्ञानों का समन्वित रूप फूल का ज्ञान है । यह ज्ञान का अंतःकरण से होता है । इसलिए फूल में और मन में दोनों में पंचभूत हैं । फूल में पंचीकृत रूप में हैं और मन में अपंचीकृत रूप में ।

फूल की तरह सारे पदार्थ पंचभूतों की रचना हैं । पाँचों भूतों के परस्पर मिलने की प्रक्रिया को पंचीकरण कहते हैं । जिस पदार्थ में जिस भूत की प्रधानता रहती है उसमें उस तत्त्व का 50 % भाग रहता है । शेष 50 % में बचे हुए चार तत्त्वों का बराबर-बराबर संयोग रहता है । मिलने की यह प्रक्रिया ‘पंचीकरण’ कहलाती है । उदाहरणार्थ – मिट्टी में आधा भाग पृथ्वी का है और शेष आधे भाग में जल, तेज, वायु और आकाश बराबर-बराबर भाग  में मिले हुए हैं ।

हमारा स्थूल शरीर भी पंचीकृत महाभूतों का विकार है । ज्ञानेन्द्रियाँ और मन (अंतःकरण-चतुष्टय) अपंचीकृत महाभूतों से बने हैं ।

मन पाँचों तन्मात्रों को ग्रहण करता है । ज्ञानेन्द्रियों से विशेष बात मन की यह है कि ज्ञानेन्द्रियाँ तो केवल अपने-अपने विषय का और वह भी विद्यमान विषय का प्रकाश करती हैं जब मन पाँचों विषयों का भूत-भविष्य-वर्तमान के विषयों का प्रकाश करता है । मन में स्मृति (चित्त) और कल्पना (बुद्धि) विशेष है । इस पर भी मन से एक समय में एक विषय का ही ग्रहण होता है । अतः मन अपंचीकृत महाभूतों का संघात (समूह) है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2020, पृष्ठ संख्या 22, 25 अंक 326

पंचमहाभूतों के तन्मात्रों की रचना व उनके कार्य

पंचमहाभूतों के सात्त्विक तन्मात्र से मन और ज्ञानेन्द्रियाँ बनती हैं, राजस तन्मात्र से कर्मेन्द्रियाँ बनती हैं तथा तामस तन्मात्र से विषय और बाह्य पदार्थ बनते हैं ।

मन चार प्रसिद्ध हैं- मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार । इसी को अंतःकरण चतुष्टय कहते हैं ।

ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं– श्रोत्र (कान) त्वक् (त्वचा), चक्षु (नेत्र), रसना (जिह्वा) और घ्राण (नासिका) ।

कर्मेन्द्रियाँ पाँच हैं– वाक्, पाणि (हाथ), पाद (पैर), उपस्थ (जननेन्द्रिय) और पायु (गुदा) ।

प्राण दस हैं- इनमें पाँच मुख्य प्राण हैं – प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान । पाँच उपप्राण हैं – नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय ।

आकाश से राजस तन्मात्र से ‘वाक्’ कर्मेन्द्रिय बनती है, जिससे शब्द बोलते हैं और ‘व्यान’ नामक प्राण बनता है जो शरीर के सब अंगों में रहकर संधियों की क्रिया की व्यवस्था करता है । वायु के राजस तन्मात्र से ‘पाणि (हाथ) इन्द्रिय बनती है, जिससे आदान-प्रदानरूप कर्म होता है और समान नामक प्राण बनता है जिसका स्थान नाभि-प्रदेश है । इसी प्रकार तेज के राजस तन्मात्र से ‘पाद’ (पैर) कर्मेन्द्रिय बनती है, जिससे गमनागमनरूप कर्म होता है तथा उदानवायु का निर्माण होता है जो हृदय से ऊपर के भाग में विचरण करता है । जल के राजस तन्मात्र से ‘जननेन्द्रिय’ और प्राण की रचना होती है । जननेन्द्रिय से मूत्र-त्याग एवं सन्तानोत्पत्तिरूप कर्म होता है और प्राण हृदय-प्रदेश में रहता है । पृथ्वी के राजस तन्मात्र से ‘गुदा’ कर्मेन्द्रिय बनती है, जिससे मल-त्याग और वायु-निष्कासनरूप कर्म होता है तथा अपानवायु का निर्माण होता है, जिसके कार्य का स्थान गुदा है । शरीर में इन सबके गुण धर्म प्रत्यक्ष हैं ।

पंचभूतों के राजस तन्मात्रों से बनी कर्मेन्द्रियाँ, प्राण आदि से संबंधित सारणी

पंचभूत कर्मेन्द्रिय प्राण प्राण का कार्य-स्थल
आकाश वाक् व्यान सभी अंग
वायु हाथ समान नाभि-प्रदेश
तेज पैर उदान हृदय से ऊपर का भाग
जल जननेन्द्रिय प्राण हृदय-प्रदेश
पृथ्वी गुदा अपान गुदा

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2020 पृष्ठ संख्या 22 अंक 327

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