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Tatva Gyan

निरावरण तत्त्व की महिमा – पूज्य बापू जी


तत्त्वदृष्टि से जीव और ईश्वर एक ही हैं, फिर भी भिन्नता दिखती है । क्यों ? क्योंकि जब शुद्ध चैतन्य में स्फुरण हुआ तब अपने स्वरूप को भूलकर जो स्फुरण के साथ एक हो गया, वह जीव हो गया परंतु स्फुरण होते हुए भी जो अपने स्वरूप को नहीं भूले, अपने को स्फुरण से अलग जानकर अपने स्वभाव में डटे रहे, वे ईश्वर कोटि के हो गये । जैसे – ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं, श्रीराम हैं, जगदम्बा हैं…. ।

उन्हें निरावरण भी कहते हैं । जो स्फुरण के साथ बह गये, अपने को भूलकर लड़खड़ाने लगे वे जीव हो गये, उन्हें सावरण (आवरणसहित) कहते हैं । जो निरावरण हैं वे माया को वश में करके जीते हं । माया को वश करके जीने वाले चैतन्य को ‘ईश्वर’ कहते हैं । अविद्या के वश होकर जीने वाले चैतन्य को ‘जीव’ कहते हैं, कारण कि उसे जीने की इच्छा हुई और देह को मैं मानने लगा ।

ईश्वर का चिन्मय वपु वास्तविक ‘मैं’ होता है । जहाँ से स्फुरण उठता है वह वास्तविक मैं है । जितने भी उच्च कोटि के महापुरुष हो गये, वे भी जन्म लेते हैं तब तो सावरण होते हैं लेकिन स्फुरण का ज्ञान पा के अपने चिन्मय वपु में ‘मैं’ पना दृढ़ कर लेते हैं तो निरावरण हो जाते हैं, ब्रह्म्स्वरूप हो जाते हैं । ऐसे ब्रह्मस्वरूप महापुरुष हमें युक्ति-प्रयुक्ति से, विधि-विधान से निरावरण होने का उपाय बताते हैं, ज्ञान देते हैं । सद्गुरु के रूप में हम उनकी पूजा करते हैं । यदि ईश्वर और सद्गुरु दोनों आकर खड़े हो जायें तो….. संत कबीर जी कहते हैं –

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय ।

बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय ।।

हम पहले सद्गुरु को पूजेंगे क्योंकि सद्गुरु ने ही हमें अपने निरावरण तत्त्व का ज्ञान दिया है ।

ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्तिभेदविभागिने ।

ईश्वर और गुरु की आकृतियाँ दो दिखती हैं, वास्तव में दोनों अलग नहीं हैं ।

जो महापुरुष निरावरण पद को प्राप्त हो जाते हैं वे ईश्वर कोटि के हो जाते हैं । वे मौज में आकर कह दें कि ‘ऐसा हो जायेगा’ तो वह हो जाता है । यह निरावरण तत्त्व में स्थिति का सामर्थ्य है ।

जैसे बिजली घर द्वारा बिजली की आपूर्ति तो वही की वही है लेकिन उसका उपयोग जहाँ होता है वह साधन जिस किस्म का होगा, परिणाम भी उसी किस्म का होगा, जैसे गीजर, फ्रिज, मोटर आदि में एक ही विद्युत-शक्ति कार्य करती है लेकिन परिणाम साधन अनुरूप होते हैं । ईश्वर का संकल्प जहाँ से स्फुरित होता है वही चैतन्य आपका भी है । आपका संकल्प भी वहीं से स्फुरित होता है । ईश्वर के साधन बढ़िया हैं और आपके अंतःकरण और इन्द्रियाँ रूपी साधन घटिया हैं । है तो वही चैतन्य फिर भी उसका सामर्थ्य आपके साधनों द्वारा सीमित प्रभाव दिखाता है । जब आपकी निरावरण स्वरूप में स्थिति हो जाती है, तब आप उसके सत्ता-सामर्थ्य को जान पाते हैं क्योंकि आप भी वही चैतन्यस्वरूप हो जाते हैं । अब भी आपका स्वरूप वही है मगर जानते नहीं हैं न ! नश्वर संसार के नाम और रूप में आसक्त होकर उसमें ही उलझ गये हैं । नाम और रूप का आधार तो एक ही है । तत्त्वज्ञान के अभाव में भेद दिखता है । वास्तव में भेद नहीं है । जीव और ईश्वर भी कहने भर को दो हैं, वास्तव में दो नहीं हैं वेदांत की दृष्टि से ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2019, पृष्ठ संख्या 4 अंक 321

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प्रवृत्ति को बदलें सत्प्रवृत्ति में


स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं- “अपने ‘मैं’ (अहं) को धन-सम्पत्ति, प्रभुत्व, नाम-यश द्वारा सर्वदा बढ़ाने का यत्न करना, जो कुछ मिले उसी को पकड़े रखना, सारे समय सभी वस्तुओं को इस ‘मैं’ रूपी केन्द्र में ही संग्रहित करना – इसी का नाम है ‘प्रवृत्ति’ ।”

यह बंधनकारक है किंतु इसके बदले अगर कोई अपनी धन-सम्पत्ति, सुविधाओं, साधनों और समय-शक्ति को सबकी हितभावना से सदुपयोग में, परहित में लगाये तो सत्प्रवृत्ति हो जायेगी ।

हर कर्म के मूल में विचार, संकल्प या भाव होता है । यदि हमारे भाव ‘सत्’ के रस में डूबे हुए हों तो उन सद्भावों से जो कर्म होंगे वे निश्चय ही सत्कर्म होंगे । अतः जीवन में सद्भाव की अत्यंत आवश्यकता है ।

‘सत्’ की स्वीकृति से सद्भाव का प्राकट्य अपने-आप, बड़ी सहजता से हो जाता है । ‘सत्’ की स्वीकृति के बारे में पूज्य बापू जी के सत्संग में आता हैः “ईश्वर की दृष्टि में अपनी दृष्टि मिला दें । ईश्वर को जैसा जगत दिखता है और ‘स्व’ दिखता है ऐसा तू अपने को, ‘स्व’ को देख और जगत को देख । स्वीकृति दे दे, हो गया काम ! तो साधना का मतलब है आपकी स्वीकृति देने की तैयारी । ईश्वर की ‘हाँ’ में ‘हाँ’, सदगुरु की ‘हाँ’ में  ‘हाँ’ । साधन श्रमसाध्य नहीं है, स्वीकृति-साध्य है और ज्यों स्वीकृति दी त्यों ईश्वर और गुरु के अनुभव में एक होने में आसानी हो जायेगी ।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2019, पृष्ठ संख्या 17, अंक 319

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‘यह’, ‘वह’ के द्रष्टा ‘मैं’ की असलियत जानो तो पार…. पूज्य बापू जी


दुनिया का व्यवहार तीन ढंग से देखा गया है । एक तो ‘यह’ – जो रू बरू है, यह वस्तु यह व्यक्ति…. दूसरा ‘वह’ – वह वस्तु, वह व्यक्ति, वह भगवान… तीसरा ‘मैं’ । ‘यह’, ‘वह’ और ‘मैं’ – इन तीन से ही सारा  व्यवहार सम्पन्न होता है । ‘यह’ को जानने में ‘मैं’ की जरूरत है, ‘वह’ को जानने में भी ‘मैं’ की जरूरत है लेकिन ‘मैं’ को जानने में न ‘यह’ की जरूरत है न ‘वह’ की जरूरत है, ‘मैं’ स्वयंप्रकाश है । ‘मैं’ सदा रहता है । ‘यह’ और ‘वह’ पहले नहीं थे, अभी दिख रहे हैं और बाद में नहीं रहेंगे ।

तो संसारी बोलते हैं, हमारे लिए उपनिषद् कहती है कि यह जो दुनिया है इसमें त्याग से जियो । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा….. ‘यह’ का ठीक उपयोग करो तो भगवान मिलेंगे । लोभ, लालच छोड़ो, काम विकार छोड़ो, यह छोड़ो, वह छोड़ो…..।

उपासक बोलते हैं कि जब वह (भगवान) राज़ी होगा तब मिलेगा ।

सोई जानइ जेहि देहु जनाई ।

जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई ।। (श्री रामचरित. अयो.कां. 126.2)

वह अपने को जतायेगा तब मिलेगा ।

कर्मी बोलता है कि ‘यह’ का  उपयोग करो । कर्मयोग करो, सेवा करो, यह करो, वह करो… लेकिन वेदांत को जानने वाले बोलते हैं कि ‘यह’ और ‘वह’ की सिद्धि ‘मैं’ के बिना हो सकती है क्या ? नहीं हो सकती ।

तो जो ‘वह’ में ईश्वर खोजता है अथवा ‘यह’ में ईश्वर खोजता है उसको बहुत श्रम पड़ता है । कुछ चमत्कार दिखते हैं और उसमें उलझ भी जाता है । ‘मैं सिद्ध हूँ, मैं लंकापति रावण…. मैं हिरण्यकशिपु….’ हिरण्यकशिपु ने ‘यह’ में और ‘वह’ में 11500 वर्ष तपस्या की और आधिदैविक जगत की शक्तियाँ हस्तगत कीं । फिर भी हिरण्यकशिपु और उसकी प्रजा सुखी नहीं रही भगवान के रस के बिना, मैं की खोज के बिना ।

‘यह’ में, ‘वह’ में खोज-खोजकर कुछ चमत्कार देखते हैं, कुछ संतुष्टि रहती है, कुछ असंतुष्टि रहती है लेकिन ‘मैं’ में आते ही जैसे तरंग अपने असली स्वरूप पानी को खोजे तो तरंग सागर है, ऐसे ही यह ‘मैं’ अपनी असलियत को खोजे तो परमात्मा की सत्ता से ही यह स्फुरित होता है ।

संत ज्ञानेश्वर जी ने कहा कि ‘उपासक अपनी भावना के  बल से भगवान को प्रकट कर लेता है लेकिन द्वैत बना रहता है कि यह भगवान है अथवा वह भगवान है ।’ तो ‘यह’ और ‘वह’ जिससे सिद्ध होता है उस मैं को भगवानरूप में जानो । ‘यह’ को देखना हो तो ‘मैं’ चाहिए, ‘वह’ को देखना हो तो ‘मैं’ चाहिए, लेकिन ‘मैं’ की असलियत को जानो तो भगवान तुम्हारा आत्मा ! विश्रांति योग हो जायेगा । विभुर्व्याप्य सर्वत्र….. सर्वगत, सर्वव्यापक मैं चैतन्यस्वरूप…. जैसे घड़ा अपने को घड़ा न जानकर घटाकाश, महाकाश जाने ऐसे ही जीव अपने को परमेश्वर का, परमेश्वर को अपना जाने तो उसके बंधन छूट जाते हैं ।

कर्मी ‘यह’ को शुद्ध करके भगवान को खोज रहा है । उपासक ‘वह’ में भावना, कल्पना करके उसको खोज रहा है लेकिन सच्चे संत का शिष्य ‘मैं’ में आकर ‘मैं’ की शुद्धरूपता जान लेता है । मैं शरीर हूँ ? नहीं । मैं इन्द्रियाँ हूँ ? नहीं । मैं मन हूँ ? नहीं, मन को जानता हूँ । बुद्धि को भी जानता हूँ । अहं को भी जानता हूँ । सबको जो जानता है वह कौन है ? उसमें विश्रांति पाकर ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर लेता है ।

भगवान प्रेमस्वरूप हैं, ज्ञानस्वरूप हैं…. अपने ‘मैं’ में छुपे हैं भगवान ! शरीर में नहीं, मन में नहीं, इन्द्रियों में नहीं, जहाँ से ‘मैं’ उठता है…. अहंकार में नहीं, अहंकार की गहराई में परमात्मा छुपे हैं । ‘यह’ में भगवान मिलना कठिन है । ‘वह’ में भगवान खोजना कल्पना है लेकिन ‘मैं’ में भगवान हाजरा-हुजूर है ।

मौन, एकांत में रहकर, सात्तविक आहार पर रह के ध्यान व जप करें तो आत्म-ईश्वर तो हैं ही । जहाँ बैठे हों वहाँ पानी है लेकिन कंकड़-पत्थर हटाओ, कुआँ खोदो, बोरिंग करो तो पानी ही पानी है । ऐसे ही अपने अंतरात्मा म  आओ तो ईश्वर ही ईश्वर है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2019, पृष्ठ संख्या 5,6 अंक 319

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