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Tatva Gyan

Rishi Prasad 269 May 2015

ईश्वर क्या है ?…. एक रहस्यमय खोज


‘ईश्वर क्या है ?’ – टेहरी राजवंश के 15-16 वर्षीय राजकुमार के हृदय में यह प्रश्न उठा। वह स्वामी रामतीर्थ के चरणों में पहुँचा और प्रणाम करके पूछाः “स्वामी जी ! ईश्वर क्या है ?”
उसकी प्रबल जिज्ञासा को देखकर रामतीर्थ जी ने कहा, “अपना परिचय लिखकर दो।”
उसने लिखा, “मैं अमुक राजा का पुत्र हूँ और अमुक मेरा नाम है।’
रामतीर्थ जी ने पत्र देखा और कहा, “अरे राजकुमार ! तुम नहीं जानते कि तुम कौन हो। तुम उस निरक्षर, अनाड़ी आदमी की तरह हो, जो तुम्हारे पिता अर्थात् राजा से मिलना चाहता है पर अपना नाम तक नहीं लिख सकता। क्या राजा उससे मिलेगा ? अतः तुम अपना नाम ठीक से बताओ, तब ईश्वर तुमसे मिलेगा।”
लड़के ने कुछ देर चिंतन करके कहा, “अब मैं समझा मैंने केवल शरीर का पता बताया। मैं मन हूँ। क्या वास्तव में ऐसा ही है ?”
“अच्छा कुमार ! यदि यह बात सही है तो बताओ कि आज सवेरे तुमने जो भोजन किया था, वह तुम्हारे शरीर में कहाँ रखा है ?”
“जी, मेरी बुद्धि वहाँ तक नहीं पहुँचती और मेरा मन इसकी धारणा नहीं कर सकता।”
“प्यारे राजकुमार ! तुम्हारी बातों से सिद्ध होता है कि तुम मन, बुद्धि नहीं हो। तो तुम खूब विचारो, तब मुझे बताओ कि तुम क्या हो ? उसी समय ईश्वर तुम तक आ जायेगा।”
खूब मनन कर लड़का बोला, “मेरा मन, मेरी बुद्धि वहाँ तक जाने में जवाब दे देते हैं।”
“अब तक तुम्हारी बुद्धि जहाँ तक पहुँची है, उस पर विचार करो कि ‘मैं शरीर नहीं हूँ, मैं मन नहीं हूँ, मैं बुद्धि नहीं हूँ।’ यदि ऐसा है तो इसकी अनुभूति करो। अमल में लाओ। यदि तुम सत्य का केवल इतना अंश भी व्यवहार में लाना सीख जाते हो तो तुम्हारी समस्त शोक-चिंताएँ समाप्त हो जायेंगी।” बालक को यह जताने में रामतीर्थ जी द्वारा कुछ उपदेश दिया गया कि वह स्वयं क्या है।
इसके बाद रामतीर्थ जी द्वारा दिन भर में किये गये कार्यों का विवरण पूछने पर राजकुमार ने अपने जागने, स्नान व भोजन करने, पढ़ने एवं चिट्ठियाँ लिखने आदि का ब्यौरा बताया। रामतीर्थ जी- “राजकुमार ! इन छोटे-छोटे कामों के अतिरिक्त तुमने अगणित कार्य किये हैं।”
राजकुमार किंकर्तव्यविमूढ़ होकर उनकी बात पर मनन करने लगा।
रामतीर्थ जीः “तुम भोजन करते हो, उसे आमाशय में पहुँचाते हो, उसका रस बनाते हो, रक्त, मांस, मज्जा बनाते हो, हृदयगति चलाते हो, शरीर की शिरा-शिरा में रक्त का संचार करते हो। तुम्हीं बाल उगाते हो, शरीर के प्रत्येक अंग को पुष्ट करते हो। अब ध्यान दो कि कितने कार्य, कितनी क्रियाएँ तुम प्रत्येक क्षण करते रहते हो।”
लड़का बारम्बार सोचने लगा और बोलाः “महाराज जी ! वस्तुतः इस शरीर में हजारों क्रियाएँ एक साथ हो रही हैं, जिन्हें बुद्धि नहीं जानती, मन जिनसे बेखबर है और फिर भी वे सब क्रियाएँ हो रही हैं। इन सबका कारण अवश्य मैं ही हो सकता हूँ। इन सबका कर्ता मैं ही हूँ। अतः मेरा यह कथन सर्वथा गलत था कि मैंने कुछ ही काम किये हैं।”
रामतीर्थ जी ने शरीर में इच्छा और अनिच्छा से होने वाले कार्यों के बारे में समझाते हुए कहाः “लोग यह भयंकर भूल करते हैं कि केवल उन्हीं कार्यों को अपने किये हुए मानते हैं जो मन अथवा बुद्धि के माध्यम से होते हैं और उन सब कार्यों को अस्वीकार कर देते हैं जो मन अथवा बुद्धि के माध्यम के बिना सीधे-सीधे हो रहे हैं। इस भूल तथा लापरवाही से ही वे अपने शुद्ध स्वरूप को मन के बंदीगृह में बंदी बना लेते हैं। इस प्रकार वे असीम को ससीम और परिच्छिन्न (सीमित) बनाकर दुःख भोगते हैं। ईश्वर तुम्हारे भीतर हैं और वह ईश्वर तुम स्वयं हो।
तुम जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का साक्षी हो। तुम सर्वत्र विराजमान हो। तुम्हारी शक्ति सर्वव्यापिनी है। वही सितारों को चमका रही है, वही तुम्हारी आँखों में देखने की शक्ति दे रही है, वही नदियों को प्रवाहित कर रही है, वही ब्रह्माण्डों को क्षण-प्रतिक्षण बना-बिगाड़ रही है। क्या तुम वह शक्ति नहीं हो ? सचमुच तुम वही शक्ति हो, वही चैतन्य हो जो मन बुद्धि से परे है, जो सम्पूर्ण विश्व का शासन कर रहा है। वही आत्मदेव तुम हो, वही अज्ञेय, वही तेज, तत्त्व, शक्ति, जो जी चाहे कह लो, वही सर्वरूप जो सर्वत्र विद्यमान है, वही तुम हो।” इस प्रकार स्वामी रामतीर्थ ने बालक को आत्मानुभव की झलक चखा दी और वह उनके मार्गदर्शन अनुसार आत्मानुसंधान कर आत्मस्वरूप में स्थित हुआ, ज्ञातज्ञेय हो गया।
राजकुमारः “मैंने सवाल किया था कि ईश्वर क्या है ? और मुझे पता चल गया कि मेरा अपना आपा ही ईश्वर है। मैंने कैसा बेहूदा प्रश्न किया था। मुझे अपने को ही जानना था। मेरे जानने से ईश्वर का पता लग गया।”
‘ईश्वर क्या है ?’, ‘मैं कौन हूँ ?’ – ये प्रश्न बहुत सरल लगते हैं लेकिन इनका जवाब पाने की जिज्ञासा जिनके हृदय में जागती है, उनके माता-पिता धन्य हैं, कुल गोत्र धन्य हैं। धन्या माता पिता धन्यो…. ऐसे लोग बहुत कम होते हैं। जिन्हें इसका जवाब पाये बिना चैन नहीं आता, ऐसे तो कोई-कोई विरले होते हैं और ऐसे सच्चे जिज्ञासु को ईश्वर-तत्त्व का अनुभव किये हुए किन्हीं महापुरुष की शरण मिल जाये तो फिर इस खोज को पूर्ण होने में बहुत देर नहीं लगती।
भगवान श्रीराम जी के गुरुदेव वसिष्ठजी महाराज कहते हैं, “हे राम जी ! ज्ञान समझना मात्र है, कुछ यत्न नहीं। संतों के पास जाकर प्रश्न करना कि ‘मैं कौन हूँ ? जगत क्या है ? जीव क्या है ? परमात्मा क्या है ? संसार-बंधन क्या है ? और इससे तरकर कैसे परम पद को प्राप्त होऊँ ?’ फिर ज्ञानवान जो उपदेश करें, उसके अभ्यास से आत्मपद को प्राप्त होगा, अन्यथा न होगा।”
पूज्य बापू जी यह युक्ति बताते हुए कहते हैं, “तुम अपने-आपसे पूछो- “मैं कौन हूँ ?’ खाओ, पियो, चलो, घूमो, फिर पूछोः ‘मैं कौन हूँ ?’
‘मैं रमणलाल हूँ।’
यह तो तुम्हारी देह का नाम है। तुम कौन हो ? अपने को पूछा करो। जितनी गहराई से पूछोगे, उतना दिव्य अनुभव होने लगेगा। एकांत में शांत वातावरण में बैठकर ऐसा पूछो…. ऐसा पूछो कि बस, पूछना ही हो जाओ। लगे रहो। खूब अभ्यास करोगे तब ‘मैं कौन हूँ ? ईश्वर क्या है ?’ यह प्रकट होने लगेगा और मन की चंचलता मिटने लगेगी, बुद्धि के विकार नष्ट होने लगेंगे तथा शरीर के व्यर्थ के विकार शांत होने लगेंगे। यदि ईमानदारी से साधना करने लगो न, तो छः महीने में वहाँ पहुँच जाओगे जहाँ छः साल से चला हुआ व्यक्ति भी नहीं पहुँच पाता है। तत्त्वज्ञान हवाई जहाज की यात्रा है।”
महापुरुषों के सत्संग का जीवन में जितना आदर होता है, जितनी ‘ईश्वर क्या है ? मैं कौन हूँ ?’ यह जानने की जिज्ञासा तीव्र होती है, उतनी महापुरुषों की कृपा शीघ्र पचती है और जीव चौरासी लाख योनियों की भटकान से बचकर अपने ईश्वरत्व का, अपने ब्रह्मत्व का साक्षात्कार कर लेता है।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2015, पृष्ठ संख्या 9,10 अंक 269
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Rishi Prasad 267 Mar 2015

गीता में शांति पाने के 6 उपाय – पूज्य बापू जी


वेद सनातन सत्य है, अपौरूषेय है। उस वेद की वाणी उपनिषदों में और उपनिषदों का प्रसाद भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में प्रकट करवाया है। गीता श्रीकृष्ण के अनुभव की पोथी है। भगवान कहते हैं- गीता मे हृदयं पार्थ। ‘गीता मेरा हृदय है।’ गीता में शांति पाने के 6 उपाय बताये गये हैं।
किसी जगह पर जाकर आने से शांति पायी तो आपने शांति को पहचाना ही नहीं। असली शांति सदगुरु की कृपाकुंजी के बिना मिलती ही नहीं।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिम्…. उसे परम शांति कहते हैं। इस परम शांति को पाने के उपाय गीता में श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
एक, वैराग्य हो। विवेक से ही वैराग्य आता है। कुछ आ गया, कुछ झटका लग गया और वैराग्य हो गया, वह श्मशानी वैराग्य है। पत्नी ने कुछ कह दिया और पत्नी से वैराग्य हो गया, धंधे में घाटा पड़ा और वैराग्य हो गया, टिकट नहीं मिली तो राजनीति से वैराग्य हो गया… यह वैराग्य नहीं है। सत्संग के द्वारा सूझबूझ बढ़ी कि अनित्य शरीर है, अऩित्य वस्तुएँ हैं, हिरण्यकशिपु जैसी उपलब्धियों के बाद भी पतन है, रावण के जैसी उपलब्धियों के बाद भी जीवन नगण्य है, आखिर कोई सार नहीं – ऐसा वैराग्य ! विवेक के द्वारा वैराग्य जगे।
दूसरा, श्रद्धा। शास्त्र, भगवान और आत्मवेत्ता महापुरुषों के प्रति श्रद्धा। श्रद्धा एक ऐसा अमृत-रस है, एक ऐसा सम्बल है कि निराशा की खाई में गिरे हुए व्यक्ति को आशा की सीढ़ी मिल जाती है, हतोत्साही को उत्साह मिल जाता है। रूखे हृदय में मधुरता का संचार करने का काम श्रद्धादेवी का है। मैँ बच्चे की जैसे संभाल रखती है, उससे भी ज्यादा सुरक्षा कर देती है श्रद्धादेवी। जीवन में श्रद्धा बहुत जरूरी है लेकिन श्रद्धा के साथ तत्परता और इन्द्रिय-संयम बेड़ा पार कर देता है। श्रद्धा ईश्वर से मिलाने में अदभुत साथ-सहकार देती है लेकिन वह अगर सत्संग, ज्ञान और गुरु के संकेत के बिना की है तो वह चकरावे में भी डाल देती है।
अपनी ‘हाँ’ में ‘हाँ’ की तो गुरु महाराज हैं, नहीं तो बोरी बिस्तर बाँधकर चलते बने, यह श्रद्धा नहीं। और श्रद्धेय के हृदय को चोट न लगे ऐसा श्रद्धालु का ध्यान होता है तथा श्रद्धेय के सिद्धान्त में अपना मन वाह ! वाह !! वाह !!!….’
तेरे फूलों से भी प्यार, तेरे काँटों से भी प्यार।
जो देना चाहे दे दे करतार, हमें दोनों हैं स्वीकार।।
क्योंकि देने वाले हाथ किसके हैं ? हाथों का महत्त्व है। श्रद्धा इसका नाम है ! मेरे गुरु जी ने जब भी मुझे कभी कुछ कहा तो बाहर के लोग समझते होंगे अथवा जो मुझे गुरु शरण से भगाना चाहते थे वे लोग सोचते होंगे कि ‘गुरु जी इनको कोसते हैं’ लेकिन मेरे गुरु जी मुझे कोसें ऐसे नहीं थे। वे किसी को नहीं कोसते थे। साँप को प्यार कर सकते हैं वे, बिच्छू नाम के पौधे का भी हित चाहते हैं, ऐसे मेरे गुरु जी मेरे को क्या कोसेंगे ? हाँ मेरी गलती है अथवा किसी ने गलत जानकारी दी है तो गुरु जी ने भले की भावना से कहा है न ! बस, बात पूरी हो गयी।
साधु ते होई न कारज हानी।
ब्रह्म गिआनी ते कछु बुरा न भइया।।
ऐसी श्रद्धा हो !

तीसरा, गीताकार कहते हैं कि आपके जीवन में भगवद्-अर्थ कर्म हों। यश, सुविधा के लिए कर्म करते हैं, वासना के अनुसार काम करते हैं तो भवबंधन में फँसते हैं। भगवत्प्रीति के लिए कर्म करो फिर चाहे वह कर्म बाहर से बढ़िया दिखे, चाहे घटिया दिखे। जैसे – एक ब्रह्मचारी रात्रि को लंका में दर-दर चक्कर काट रहे हैं…. हनुमान जी की गरिमा से बहुत तुच्छ काम हैं लेकिन
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम।
श्री रामचरित. सुं.कां. 1
लंका की गली-गली खोजते हैं, घर-घर छानते हैं कि ‘सीता जी कहाँ हैं…. सीता जी कहाँ हैं ?’ न जाने किन-किन राक्षसी बच्चियों को, माइयो को और गंदे लोगों को देखते-देखते भी सीता जी की खोज जारी रखते हैं क्योंकि काम किसका है ? स्वामी का है… तो भगवद्-अर्थ कर्म हों।
जो गुरु के जी में आये या गुरु का संकेत मिले, वह काम आपको प्यारा लगे भगवद्-संकेत, गुरु-संकेत से, तब सझना कि आपका कर्म वासनारहित है, भगवद् और गुरु प्रसन्नता के लिए है।
चौथी बात है कि आपके अंदर में भक्ति हो। भक्ति ऐसी नहीं हो कि बाँके बिहारी के लिए भक्ति हुई और बेटा नहीं हुआ तो बाँके बिहारी को निकाल दिया, दिल से निकाल दिया। ये भक्त के लक्षण नहीं हैं।
पाँचवाँ है महापुरुषों की शरण।
भगवान कहते हैं- ‘उस ज्ञान को तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ, उनको भलीभाँति दंडवत् प्रणाम करने से, उऩकी सेवा करने से व कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म-तत्त्व को भलीभाँति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश करेंगे।’ (गीताः 4.34)
और छठी बात है कि सब रूपों में मेरा महेश्वर ही है। आप दीन-हीन, गरीब को देखते हैं तो ‘यह बेचारा गरीब है और मैं इसको नहीं देता तो क्या होता….’ इस वहम में मत पड़ना। ‘गरीब के रूप में भी वही मेरा जगत्पति जगदीश्वर, महेश्वर है। माँ-बाप के रूप में, गुरु के रूप में, अमीर के रूप में, कंगले के रूप में…. अरे, कुत्ते के रूप में भी वह उसका उपभोग करने वाला मेरा चैतन्य है।’ – यह नजरिया मिल जाये तो काम बन जाय !
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।। (गीताः 5.29)
मैं यज्ञ का, तप का फल भोगने वाला सबका अंतरात्मा महेश्वर हूँ, ईश्वरों का ईश्वर हूँ। देव की पूजा करते हो अथवा मुख्य देव ब्रह्मा-विष्णु-महेश की पूजा-उपासना करते हो तब भी उस महेश्वर के संकल्प से ही, उस अंतर्यामी देव की कृपा से ही आपका मनोरथ फलता है। गुरुदेव की उपासना करते हो, प्रार्थना करते हो तब भी गुरुदेव के अंतरात्मा के चैतन्य से ही फलता है। अर्थात् जो भी देव हैं उन देवों में वास्तविक देव वह सर्व-अनुस्यूत परब्रह्म परमात्मा है और ‘वे परमात्मा मेरे सुहृद हैं’ ऐसा जो जानता है, मानता है उसको परमात्म-शांति सहज में मिलती है। आप ऐसे भगवान का चिंतन करके शांत होने का अभ्यास करो।
मैं आबू की नल गुफा में रहता था। वहाँ मनोहरलाल नाम का एक तारबाबू आया था। वह कोई साधक नहीं था। मुझे किराये का अच्छा मकान मिल जाये, यह आशीर्वाद लेने सुबह-सुबह आया था बंदा। मैंने कहाः “अभी थोड़ी देर बैठो आँखें मूंदकर भगवान का नाम लो फिर मैं बात करता हूँ।” वह बैठा तो बैठा…. सुबह साढ़े छः के पास आसपास आया होगा, सूर्य को मैंने लाल देखा था उस समय। 9, बज गये, 10 बज गये…. मैंने कहाः ‘अब बैठा है तो बेचारे को बैठने दें।’ ऐसे करते-करते आखिर मुझे शाम का लाल सूर्य दिखाई दिया, करीब छः बजे होंगे। सुबह साढ़े छः बजे का बैठा शाम के छः बज गये उसी आसन पर बैठे ! और वह कोई साधक नहीं था, शाकाहारी नहीं था। अंडा खाने वाला, दारू पीने वाला था। आज्ञा मानी, बैठा तो सुबह और शाम को सूर्यास्त के समय मैंने उसको उठाया। मैंने पूछाः “क्या है ?” आया था किराये का मकान मिले इसलिए, लेकिन ऐसे मकान में (अपने वास्तविक घर में) अनजाने में गति हो गयी कि बोलेः “बस….” अहोभाव से भर गया। अपना मनमाना कितना भी करें…. हजारों वर्ष तपस्या की थी हिरण्यकशिपु ने, रावण ने ! आपकी एकाग्रता उनके आगे क्या मायना रखती है ! आपकी योग्यता उनकी योग्यताओं के आगे क्या मायना रखती है ! फिर भी वे संसार से हार के गये। शबरी भीलन, रैदासजी, धन्ना जाट, सदना संसार से जीत गये क्योंकि
गुरुकृपा ही केवलं शिष्यस्य परं मंगलम्।
ऐसे आत्मानुभवी गुरु जिनको मिले हैं, वे धनभागी हैं ! ईश्वरप्राप्ति की इच्छा जिनकी तीव्र है उनको भी धन्यवाद है ! उनके माँ बाप को भी धन्यवाद है, नमस्कार है !
स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2015, पृष्ठ संख्या 6,7,10 अंक 267
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ऐसा महान स्वरूप है !


ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों ने मानव-समाज को ऐसे ऐसे खजाने दे रखे हैं कि संसार के हीरे-मोतियों के खजानों का मूल्य उनके आगे कंकड़-पत्थर जितना भी नहीं है। काली कमली वाले बाबा द्वारा रचित ‘पक्षपातरहित अनुभवप्रकाश’ ग्रंथ जो ‘आध्यात्मिक विष्णु पुराण’ के नाम से भी जाना जाता है, यह वह सद्ग्रंथ है जिसमें अपने परम आनंदमय आत्मस्वरूप के ज्ञान को खुले रूप में मानवमात्र को दिया गया है। यह सद्ग्रंथ पूज्य बापू को परम प्रिय है और पूज्य श्री ने यह ज्ञानामृत ‘ऋषि प्रसाद’ के माध्यम से अपने आत्मीय मानवमात्र तक पहुँचने का निर्देश दिया था। इसे उन्हीं का प्रसाद मानकर हम प्राशन करेंगे-
महर्षि पराशर जी शिष्य मैत्रेय को अपने स्वरूप का वर्णन संतों की स्थिति के माध्यम से बताते हुए कहते हैं कि वामदेव आदि संतों ने ध्रुव को कहाः “काम-क्रोधादिरूप भी हम ही स्वप्नद्रष्टा हैं तथा काम-क्रोध से रहित उनके साक्षीरूप भी हम ही हैं। अमानित्व आदि दैवी गुण तथा दम्भ आद आसुरी गुणरूप भी हम ही हैं और इनसे रहित इनका साक्षीरूप असंगी हम ही चैतन्य हैं। ज्ञान-अज्ञान, शुभ-अशुभ आदि सर्व द्वन्द्वरूप स्वप्न हम ही हैं तथा इनसे रहित इनका द्रष्टारूप भी हम ही स्वप्नद्रष्टा हैं। स्वप्न में ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि मूर्तिरूप होकर भी हम स्वप्नद्रष्टा असंग, निर्विकार इनके प्रकाशक चैतन्य साक्षीभूत हैं।
जीव-ईश्वरूप हम चैतन्य जीव-ईश्वर भाव से रहित हैं। आत्मा-अनात्मा भेद सहित भी हम चैतन्य इस भेद से रहित हैं। कायिक, वाचिक, मानसिक सर्व चेष्टा करते भी हम चैतन्य अकर्ता हैं। स्फुरणरूप भी हम चैतन्य वास्तव में अस्फुरणरूप है। माया से महाकर्ता, महाभोक्ता, महात्यागी हम चैतन्य आत्मा वास्तव में अकर्ता, अभोक्ता, अत्यागी हैं। सर्व देश, काल, वस्तुरूप भी हम पूर्ण चैतन्य आत्मा वास्तव में देश, काल, वस्तु से तथा इनके भेद से रहित हैं। धर्म-अधर्मरूप भी हम चैतन्य वास्तव में धर्म-अधर्म से रहित हैं। सुख-दुःखरूप भी हम अनंत आत्मा वास्तव में सुख-दुःख से रहित हैं।
हम चैतन्य ही इस मन आदि जड़ जगत की चेष्टा कराते हैं, जैसे तंत्री पुरुष जड़ पुतलियों की चेष्टा कराते हैं। हम चैतन्य आधाररहित भी सर्व के आधार हैं। हम चैतन्य ही सर्व मन आदि नाम-रूपमय जगत के प्रकाशक, द्रष्टा, अधिष्ठान हैं। हम चैतन्य का प्रकाशक, द्रष्टा, अधिष्ठान कोई नहीं। इसी से हम चैतन्य स्वयंप्रकाशरूप हैं। भूत, भविष्य, वर्तमान – तीनों कालों के तथा तीनों कालों में विद्यमान पदार्थों के हम चैतन्य ही सिद्धकर्ता हैं। हमारे चैतन्यस्वरूप में ज्ञान-अज्ञान नहीं। जैसे सूर्य में दिन रात नहीं उलटा सूर्य से ही दिन रात्रि की सिद्धि होती है, उसी प्रकार ज्ञान-अज्ञान की हम चैतन्य से ही सिद्धि होती है।
जैसे दो पुरुषों के झगड़े में साक्षी पुरुष को उनकी हानि-लाभ में किंचित भी कर्तव्य नहीं होता, उसी प्रकार सुख-दुःख आदि के साक्षी हम चैतन्य आत्मा को सुख-दुःख की प्राप्ति-निवृत्ति संबंधित किंचिन्मात्र भी कर्तव्य नहीं।”
(‘आध्यात्मिक विष्णु पुराण’ से)
स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2015, पृष्ठ संख्या 25, अंक 266
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