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Tatva Gyan

ॐ सत्य के साक्षात्कार का एकमात्र मार्ग


सत्य का साक्षात्कार करने के लिए देशांतर कालांतर या वस्तवंतर (वस्तु-अंतर=अन्य-अन्य वस्तु) की ओर दौड़ना और उनके और-छोर को प्राप्त कर लेने का प्रयास करना निरर्थक है। उनके स्वरूप को जानने के लिए दृश्य की और से अनुसंधान का मुख मोड़ना पड़ेगा। द्रष्टा ही ज्ञान है, भान अनुभव है। अतः दृश्य से विमुख होकर अपने अतंरात्मा की ओर उन्मुख होना ही एकमात्र मार्ग है। इसी को जिज्ञासा अर्थात् ज्ञान का स्वरूप जानने की इच्छा कहते हैं। आप स्वयं देख सकते हैं कि आप सत्य को ज्ञान का विषय-ज्ञेय बनाना चाहते हैं अथवा स्वयं ज्ञानस्वरूप आत्मा से जो विमुखता है, अपना ही बनाया हुआ आवरण है, उसको भंग करना चाहते हैं ?
आप मानिये या मत मानिये, आप अपने विचार की तलवार से आवरण भंग करने के लिए चाहे जितना तलवार का वार कीजिये किंतु यदि दृश्य में महत्त्वबुद्धि है, चाहे वह कहीं भी क्यों न हो –अंतर्दृश्य में, बहिर्दृश्य में, अहं में, इदं में, त्वं में, तत् में तो आप अपनी उस मानी हुई महान वस्तु को काट नहीं सकेंगे। अतः कालांतर की समाधि की कल्पना छोड़िये, देशांतर के ब्रह्मलोक का लोभ छोड़िये, वस्त्वंतर की उपलब्धि का मोह छोड़िये। आप दृढ़ता से अपने उस भानस्वरूप आत्मा का अनुसंधान कीजिये सब प्रकाशित होता है और जिसको अपने को या किसी दूसरे को प्रकाशित करने के लिए प्रकाशांतर की आवश्यकता नहीं।
इसमें संदेह नहीं कि जब तक दृश्य की किसी भी आंतर-बाह्य रूपरेखा में महत्त्वबुद्धि, हेयबुद्धि (त्याज्यबुद्धि), उपादेयबुद्धि (ग्रहणबुद्धि), सुखबुद्धि, दुःखबुद्धि बनी रहेगी, तब तक आपकी बुद्धि अपने को प्रकाश देने वाले सत्य आत्मा का आवरण भंग करने में समर्थ नहीं होगी। यदि बुद्धि अपने द्वारा प्रकाशित को भी देखना चाहेगी और राग की रक्तिमा तथा द्वेष की कालिमा से दृश्य को सटाने-हटाने में संलग्न रहेगी तो विमल-धवल होकर अपने स्वप्रकाश अधिष्ठान से अभिन्नता को नहीं जान पायेगी, जो कि स्वतः सिद्ध है। इसी प्रक्रिया को श्रुति-शास्त्र ने निवृत्ति, वैराग्य अथवा अंतःशुद्धि के नाम से कहा है।
हमारे दुराग्रह के दो रूप हैं – एक तो अपने व्यक्तित्व में, चाहे वह स्थूल हो या सूक्ष्म हो या कारण ही क्यों न हो, यह नैसर्गिक है। दूसरा शास्त्र के द्वारा आरोपित लोक-परलोकगामी संसारित्व में। शास्त्र द्वारा आरोपित पदार्थ दुराग्रह शास्त्र के ही विचार से बाधित हो जाता है परंतु अपने व्यक्तित्व में जो नैसर्गिक आग्रह है, उसकी निवृत्ति तीव्र अभीप्सा एवं आत्मा के निरीक्षण-परीक्षण-समीक्षण की अपेक्षा रखती है। यह इतना दृढ़मूल है कि हम ईश्वर, समाधि अथवा मोक्ष की प्राप्ति के द्वारा भी अपने व्यक्तित्व को ही आभूषित करना चाहते हैं। परंतु सत्य का साक्षात्कार व्यक्तित्व का भूषण नहीं है, वह व्यक्त और अव्यक्त के भेद को सर्वथा निरस्त कर देता है।
अतः श्रुति, शास्त्र, सत्सम्प्रदाय एवं सदगुरुओं का यह कहना है कि अपने को दृश्य की किसी कक्षा की कुक्षि में मत बाँधो। जो अदृश्य, अग्राह्य है, अमृत है, अविज्ञात है, अदृश्य-द्रष्ट है, उस निर्विवाद सत्य की उपलब्धि ही राग-द्वेष की आत्यंतिक निवर्तक है।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2015, पृष्ठ संख्या 20, अंक 266
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बस भूल हटा दी कि आनंद


सम्पूर्ण विषयों में जो व्यापक है, सब विषयों का जो प्रकाशक, ग्रहण करने वाला है, सब विषयों को जो अपने में समेट लेता है (खा जाता है) और जिसका भाव सदा बना रहता है, उसको आत्मा कहते हैं। ये चारों बातें अपने (आत्मा) में हैं और यह आत्मा आनंदस्वरूप ही है।

जहाँ अपने से भिन्न आनंद लेना होता है वहाँ तो करण की, इन्द्रियों की जरूरत होती है परंतु स्वरूपभूत आनंद के आस्वादन के लिए किसी करण की जरूरत नहीं है। शांत, विक्षिप्त, सविषयक, निर्विषयक आदि वृत्तियों की भी जरूरत नहीं है। सब वृत्तियों का प्रकाशक आत्मा ही है। अतः आत्मानंद करण-सापेक्ष नहीं है। अतः उसके लिए प्रयत्न की भी जरूरत नहीं है।

ऐसे आत्मा में दुःख और बंधन केवल अज्ञान से, भूल से हैं। आत्मा की भूल से नहीं, मनुष्य की भूल से। यह मनुष्य की देह में अभिमान करने वाला अज्ञानी हो गया है। वह अपनी भूल भ्रम दूर कर दे तो स्वयं आनंदस्वरूप ही है।

ये रोग,  अभाव, मौत मुझसे भिन्न कुछ हैं और ये मेरा कुछ नष्ट कर सकते हैं या कर रहे हैं – यह अपने से भिन्न कुछ मानना भ्रम है। यह द्वैत प्रपंच है। इसका उपशम (निराकरण) होना चाहिए। सारे साधनमात्र इसी के लिए हैं। अपने स्वरूप निर्माण के लिए साधन नहीं है। उपशम होते ही स्वस्थता प्राप्त हो जायेगी। अतः वेदान्त- विद्या का प्रयोजन अपने स्वरूप का अद्वैत-बोध ही है। प्रपंच का उपशम कर्म, उपासना, योग आदि साधनों से नहीं हो सकता क्योंकि द्वैत प्रपंच अविद्या की कृति है, अतः ब्रह्म विद्या से ही इसका उपशम होगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद नवम्बर 2014, पृष्ठ संख्या 13, अंक 263

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जीव-सृष्टि से ही दुःख निकला


अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष और अभिनिवेश – ‘योगदर्शन’ के अनुसार ये दुःख के कारण हैं। योगी कहते हैं कि अविद्या के इस परिवार का नाश कर दो विवेक-ख्याति से। वह होगी चित्तवृत्तियों के निरोध से। समाधि में जब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित होगा, तब व्युत्थान-दशा में जान जायेगा कि संसार की किसी वस्तु से मेरा संबंध नहीं है। वह वस्तु फिर आये या जाय। योगदर्शन कहता है कि दुःख-क्लेश आविद्यक (अविद्या से उत्पन्न) हैं। अतः अविद्या की निवृत्ति यदि कर दो तो तुम्हारा क्लेश मिट जायेगा किंतु संसार प्राकृत है अतः संसार ज्यों का त्यों बना रहेगा। प्राकृत संसार न सुख देता है न दुःख।

वेदांत दर्शन कहता है कि सृष्टि दो प्रकार की है – एक जीव-सृष्टि और दूसरी ईश्वर सृष्टि। पृथ्वी, जलादि पंचभूत, शब्द स्पर्शादि तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, अंतःकरण तथा स्त्री, पुरुष आदि प्राणी इत्यादि ईश्वर-सृष्टि हैं। ईश्वर सृष्टि दुःखद नहीं है। किंतु ‘यह मैं हूँ और यह मेरा है’, ‘यह मैं नहीं हूँ और यह मेरा नहीं है’ – यह जीव की बनायी हुई सृष्टि है, जो दुःखद है। ‘तैत्तिरीय उपनिषद्’ का कहना है कि आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। अर्थात् आनन्द से ही ये सब भूत उत्पन्न होते हैं। तो ईश्वर की सृष्टि का उपादान तो आनंद है। सृष्टि आनन्द से निकली है, आनंद में स्थित है, आनंद में ही लीन हो जायेगी, अतः सृष्टि आनंदरूप है। हुआ यह कि ‘इतना मेरा, इतना तेरा’ – यह जो जीव ने मान लिया, इस जीव सृष्टि से ही दुःख निकल पड़ा। मनुष्य ने कभी विचार नहीं किया। यह विचार न करना ही अविद्या है, अज्ञान है।

मूल आत्म-परमात्म तत्व का विचार न करना तथा बुद्धि के राग-द्वेष में, मन के विकारी आकर्षण में और झूठ की आपाधापी में सत् बुद्धि करके उलझना दुःखों और जन्म मरण का मूल है।

पूज्य बापू जी कहते हैं कि “अपना सहज स्वभाव, शाश्वत स्वभाव जो जाग्रत को जानता है, वही स्वप्न को जानता है, वही गहरी नींद का अनुभव करता है, वही तुरीय तत्व अपना-आपा है। जिसको हम छोड़ नहीं सकते वह परब्रह्म-परमात्मा है। जिसको हम रख नहीं सकते वह संसार है, जीव की कल्पना का जगत है। सत्- जो सदा रहे। शरीर के पहले हम थे, बाद में हम रहेंगे, हम ‘सत्’ हैं। शरीर मिथ्या है, सुख-दुःख मिथ्या है। चिद्-हम ज्ञानस्वरूप हैं। हाथ को पता नहीं कि ‘मैं हाथ हूँ’, हमको पता है। मन-बुद्धि का भी हमको पता है। हम चिदरूप हैं। हाथ पैर, मन-बुद्धि को सुख नहीं हैं। हमारे सुखस्वभाव, आनंदस्वभाव से ही ये सुखी होते हैं। जिनको गुरुकृपा पच जाती है उनका यह कहना युक्तियुक्त हैः

देखा अपने आपको मेरा दिल दीवाना हो गया।

न छेड़ो मुझे यारो मैं खुद पे मस्ताना हो गया।।

ऐहिक संसार तो क्या, स्वर्ग और ब्रह्मलोक भी उस महापुरुष को आकर्षित नहीं कर सकते !

धन्या माता पिता धन्यो….. उसके माता पिता धन्य हैं। गोत्रं धन्यं कुलोद् भवः। उसका कुल गोत्र धन्य है।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2014, पृष्ठ संख्या 14, अंक 262

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