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Tatva Gyan

आत्मसुख में बाधक व साधक बातें


(पूज्य बापू जी की प्रेरणादायी वाणी)

आत्मसुख में पाँच चीजें बाधक और पाँच चीजें साधक हैं।

आत्मसुख में बाधक हैः

बहुत प्रकार के ग्रंथों को पढ़ना, बहुत दृश्यों को देखना, पिक्चरें देखना।

बहिर्मुख लोगों की बातों में आना और उनकी लिखी हुई पुस्तकें पढ़ना, बहुत सारे समाचार सुनना, अखबार-उपन्यास पढ़ना।

बुद्धि को बहुत चीजों से उलझाने से आप ईश्वर की शांति से, ईश्वर के माधुर्य से, चिन्मय सुख से फिसल सकते हैं इसलिए अपने को बहुत चीजों में मत फँसाओ।

बहिर्मुख लोगों की संगति करना, उनसे हाथ मिलाना,  उनके श्वासोच्छवासा में ज्यादा समय रहना-साधक के लिए उचित नहीं है।

किसी भी व्यक्ति-वस्तु परिस्थिति में आसक्ति करना।

वासना के आवेग में आकर आप सुखी होना चाहते हैं। राग से, द्वेष से, मोह से उत्पन्न वासना से आक्रान्त होते हैं तो आप परमात्म-सुख से चिन्मय सुख की योग्यता से गिर जाते हैं। अगर आप इनसे आक्रान्त नहीं होते तो आप चिन्मय सुख के अधिकारी हो जाते हैं।

अधिकारी न होते हुए भी उपदेशक या वक्ता बनना।

आत्मसुख में सहायक हैः

भगवच्चरित्र का श्रवण। भगवान के प्यारे संत और भगवत्स्वरूप ब्रह्मज्ञानियों के जीवन-चरित्र सुनना या पढ़ना।

भगवान की स्तुति।

भजन, सुमिरन, ध्यान।

भगवान और भगवत्प्राप्त महापुरुषों में श्रद्धा बढ़े ऐसी ही चर्चा करना-सुनना, ईश्वर की कथा सुनना।

सदैव ईश्वर की स्मृति करते-करते आनंद में रहने की आदत।

तो आज से साधना में बाधक बातों का त्याग करके साधना में सहायक बातों का अवलम्बन लो और अपने लक्ष्य जीवन्मुक्ति को पा लो। आत्मसुख में बाधक कमियों को निकालने के लिए भगवान से प्रार्थना करना कि ʹप्रभु ! मैं तुम्हारा हूँ, तुम मेरे हो। मुझे वासना, विकार से बचाकर हे निर्विकार नारायण ! अपने राम स्वभाव में जगाना-

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना।

ताहि भजनु तजि भाव न आना।।

(श्रीरामचरित. सुं.कां. 33.2)

हे अंतर्यामी राम ! आपके स्वभाव को जान लें तो हम आपसे एकाकार हो जायेंगे। मैं कई जन्मों से वासना-विकारों का आदी हूँ इसलिए फिसल रहा हूँ, तुम मुझे बचाते रहना।

फिसलते-फिसलते कई बार फिसलने के बाद भी आप उठ खड़ें होंगे। जैसे बचपन में कई बार गिरने के बाद भी आप अभी दौड़ने से काबिल हो गये। बचपन में एक बार, दो बार, पाँच बार गिरे फिर भी आप चलने का अभ्यास करते रहे। नहीं करते तो अभी विकलांग होकर पड़े रहते लेकिन गिरने को आपने गिरा-अगिरा समझकर चलने का प्रयास चालू रखा तो अभी चल भी सकते हो, दौड़ भी सकते हो, कूद भी सकते हो। चलते समय जब आप गिरे थे तब यदि डरकर बैठ जाते तो अभी आपकी स्थिति कैसी नाजुक होती !

ऐसे ही ईश्वर के रास्ते भी आप कई बार फिसलें तो भी चिंता नहीं करना। ʹहम फिसल गयेʹ, यह भ्रम मत करना। यह सोचना कि ʹपुरानी आदत के कारण मन फिसल गया है, हम तो भगवान के हैं।ʹ तो आप फिसलाहट से जल्दी बच जाओगे।

कहीं बढ़िया चीज है तो ʹवहाँ बढ़िया मजा आयेगाʹ – इस भाव से जाओगे तो आप फिसलते चले जाओगे। बढ़िया-में-बढ़िया सुख का सागर मेरा प्रभु है। बाहर कितना भी रहोगे लेकिन अंत में रात को थककर सोने के लिए तो अपने अंतरात्मा में आओगे। इसलिए किसी दृश्य को, किसी सुंदरे-सुंदरी को किसी चरपरे-चटपटे भोग को महत्त्व नहीं दोगे तो आप चिन्मय सुख की, आत्मा-परमात्मा के सुख की लगन होने से उसमें अच्छी तरह से स्थिति पा लोगे।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2012, पृष्ठ संख्या 8,10 अंक 230

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स्वतः सिद्ध आत्मा और स्वतः निवृत्त प्रकृति


(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं- “हे रामजी ! यह जगत मिथ्या है। कोई पुरुष इस जगत को सत् जानता है और कहता है कि हम मुक्त होंगे तो ऐसा है जैसे अंधे कूप में जन्म का अंधा गिरे और कहे कि ʹअंधकार में मैं सुखी होऊँगा।ʹ वह मूर्ख है क्योंकि जीव आत्मज्ञान बिना मुक्त नहीं होता।

हे रामजी ! इस आत्मदेव से भिन्न जो सूर्य, चन्द्रमा आदि की भेद पूजा है, सो तुच्छ है। जब तुम आत्मपूजा में स्थित होओगे, तब और पूजा तुमको सूखे तृण की नाईं भासेगी। आत्मदेव की पूजा के निमित्त फूल भी चाहिए। आत्मविचार करके चित्त की वृत्ति अंतर्मुख करना और यथालाभ में संतुष्ट रहकर संतों की संगति करना – यह आत्मदेव को फूल निवेदित करना है।”

यथालाभ में संतुष्ट होकर संतों की संगति करनी चाहिए। जो धन मिल गया सो मिल गया, जो खो गया सो खो गया। ऐसा दुनिया में कौन है जिसके सब काम पूरे हो गये !

बहूरानी सासुजी की चरणचम्पी कर रही है। सासु ने पूछाः “बेटा ! सब काम पूरे हो गये ?”

बहूरानी बोलीः “जी माँजी ! आज तो जो भोजन बनाया सबको खिला दिया, कुछ बचा नहीं और बर्तन भी माँज दिये।”

“अच्छा बेटा !”

“बब्बू के पापा को खाँसी हो गयी थी तो थोड़ा सा गुड़ और पाँच काली मिर्च का काढ़ा बना कर दिया। आज रविवार है, तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए इसलिए ऐसे ही काढ़ा दे दिया। उनकी खाँसी में आराम है, सो गये हैं और काढ़े की तपेली भी माँज के रख दी है।”

“कोई काम बाकी नहीं है तो बेटा ! जा के सो जा।”

सुबह हुई, सासु ने बहू से पूछाः “बेटा ! कोई काम बाकी तो नहीं ?”

“माँजी ! सब बाकी हैं। बच्चों को नहलाना, विद्यालय भेजना, गाय दुहना, रसोई बनाना…. सब काम बाकी हैं।”

रात को तो सारा काम पूरा करके सोयी, सुबह सब काम बाकी !

जगत के कार्य कोई पूरे हो गये क्या सबके ? निवृत्त हो रहे हैं, पूरे नहीं हो रहे हैं। हो-हो के निवृत्त हो रहे हैं। कोई कैसे, कोई कैसे निवृत्त हो रहे हैं। तो स्वतः सिद्ध है आत्मा और स्वतः प्रवृत्त में से निवृत्त हो रही  है प्रकृति।

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्मणि सर्वशः।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।

ʹवास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं तो भी जिसका अंतःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी ʹमैं कर्ता हूँʹ ऐसा मानता है।ʹ (गीताः 3.27)

देह को ʹमैंʹ मानकर जो अहंका हो गया, वह अपने शरीर की, इन्द्रियों की प्रवृत्ति-निवृत्ति को अपनी प्रवृत्ति-निवृत्ति, अपना कर्ता-भोक्तापन मानता है। अहंकार से जो विमूढ़ हो गया, वह अपने को कर्ता मान रहा है। हकीकत में कर्ता नहीं… कर्ता भी नहीं, भोक्ता भी नहीं। कुछ लोग अपने को भोग्य बना लेते हैं। ऐसा रूप, ऐसा रंग-रोगन करके घूमें तो लोगों का हमारी तरफ ध्यान जाय….. तो लोग हो गये भोक्ता और हम हो गये उनके भोग्य !

न आप किसी के भोक्ता बनो, न किसी के भोग्य बनो। आप अनुमंता रहो, जो एकरस तत्त्व है, शाश्वत तत्त्व है। अनुमंता – स्वतः प्राप्त, स्वतः सिद्ध तत्त्व। इसमें जो टिकने का अभ्यास करता है, इसमें जो सजग हो जाता है, वह विश्वविजेता हो जाता है। अष्टावक्रजी कहते हैं- तस्य तुलना केन जायते ? उसकी तुलना किससे करोगे ?

एक श्वास लिया और छोड़ दिया तो बीच का जो एक जरा-सा सैकेंड-आधा सैकेंड का क्षण है, वह स्वतः सिद्ध ʹहैʹ तत्त्व है, वह परमात्मा है। यह परमात्म-अवस्था सदा-प्राप्त तत्त्व है। जो बदल रहा है वह सदा-निवृत्त तत्त्व है। इसका अभ्यास करे दीर्घकाल तक। बुद्धि थोड़ी सूक्ष्म हो, पवित्र हो। आहार व्यवहार सात्त्विक होता है, पवित्र होता है तो कोई कठिन नहीं है। इतनी संसारी प्रवृत्ति न करे कि अपने को थका दे और इतना आलसी न हो कि परमात्म-तत्त्व का विचार करने की योग्यता ही मर जाय। सजग रहे। इतना भावुक न रहे की ऊँची बात समझने की घड़ियाँ आयें तो भाव में ही रह जाय या बह जाय। भाव में बहे नहीं, रहे नहीं और इतना रूखा भी न रहे कि भाव-रस से कंगाल रह जाय।

एक माई थी बड़ी भावनावाली। ʹगुरुजी घर कब आओगे – कब आओगे….ʹ पति-पत्नी ने गुरु को रिझाते-रिझाते ʹहाँʹ भरवा ली। गुरु जी घर पधारे। क्या-क्या व्यंजन बने ! गुरुजी को भोजन परोस रही है और पूछ रही हैः “गुरु जी ! खीर कैसी है ?”

“बिटिया ! बहुत बढ़िया है।”

“गुरुजी ! यह कैसा है ?”

“यह सब ठीक है।”

भोजन भी अच्छा बनाया, गुरु जी को भी संतोष है किंतु ʹमैं कैसी भाग्यशाली हूँ !ʹ – ऐसा करते-करते भाव-भाव में ऐसा भाव चढ़ गया कि धबाक्-से गिर पड़ी थाली पर। गुरु जी की दाढ़ी में और धोती पर खीर लग गयी। पूड़ी उधर गयी, सब्जी इधर गिरी तो कुछ कहीं गिरा…. अब गुरु जी को भोजन कराया कि मुसीबत कर दी !

भावना तो ठीक है लेकिन भावना के साथ-साथ विचारशक्ति भी हो। अकेला विचार रूखा हो जायेगा और अकेली भावना अंधी हो जायेगी। भावना के साथ विवेक-विचार, विवेक-विचार के साथ भावना। विचार भी हो, सदभाव भी हो। उसमें फिर सावधानी से सत्कर्म। सत्कर्म भी निवृत्ति के लिए है। सत्कर्म करके अपना फायदा लेने की वासना होगी तो प्रवृत्ति बढ़ेगी। प्रवृत्ति करके भी निवृत्ति हो जायेगी और एकदम निवृत्त हो गये तब भी निवृत्त हो जायेंगे। कितने भी कर्म करेंगे, प्रवृत्ति करेंगे तब भी आखिर निवृत्ति आयेगी और निवृत्ति के लिए करेंगे तो भी निवृत्ति आयेगी। बहुत ऊँची बात है !

ऐसा ज्ञान हो गया तो कैसी अनुभूति होगी अंदर में ! पंचदशीकार ने लिखा हैः

मायामेघो जगन्नीरं वर्षत्वेष यथा तथा।

चिदाकाशस्य नो हानिर्न वा लाभ इति स्थितिः।।

ʹमायारूपी मेघ जगतरूपी जल की वर्षा चाहे जैसे करे, न इससे चिदाकाश का कुछ लाभ है न हानि, यह सिद्धान्त है।ʹ (पंचदशीः 8.75)

फलानी जगह बाढ़ आयी है लेकिन आकाश को कौन डुबा सका ! ऐसे ही प्रलय में जो नहीं मिटता वो हम हैं। प्रलय हो जाय, बारह सूरज तप जायें, शरीर जल के खाक हो जाय, धरती पर हाहाकार मच जाय….. अग्नि, अग्नि, अग्नि हो जाय…. कुछ नहीं रहता ऐसा भी समय आता है और ऐसा एक बार नहीं आया, कई बार ऐसी सृष्टियाँ हुई और लीन हो गयीं। तुम कौन-सी चीज को सँभाल के रखना चाहते हो ? सब निवृत्त हो रहा है प्रवृत्त हो के।

किआ मागउ किछु थिरू न रहाई।

देखत नैन चलिओ जगु जाई।।

आँखों के देखते-देखते जगत बीत रहा है, सब पसार हो रहा है। प्रवृत्ति….. प्रवृत्ति में से निवृत्ति… निवृत्ति में से प्रवृत्ति…..

तो स्वतः सिद्ध और स्वतः निवृत्त ये दो तत्त्व हैं। स्वतः निवृत्त प्रकृति है और स्वतः सिद्ध परमात्मा है। प्रकृति आपका शरीर है, मन है, बुद्धि है और उसको देखने वाला आपका परमात्मा और शरीर है आपकी माया !

वसिष्ठजी कहते हैं- “हे रामजी ! संतों का संग करके और सत्शास्त्रों को सुनकर स्वरूप का अभ्यास करो। इससे आत्मपद की प्राप्ति होती है। ये तीनों परस्पर सहकारी हैं।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2012, पृष्ठ संख्या 27,28, 31 अंक 229

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सर्वसमर्थ आत्मदेव


पूज्य बापू जी

(संत रविदास जयंतीः 7 फरवरी)

मंदिरों में, पूजा-पाठ में, इधर-उधर जा-जाकर आखिर उस प्रेमस्वभाव अपने अंतरात्मा में आये, हृदय ही प्रेम से भरपूर मंदिर बन जाय तो समझो हो गयी भक्ति, हो गया ज्ञान, हो गया ध्यान ! ऐसी भक्ति जिनके जीवन में हो, वे चाहे किसी भी उम्र के हों, किसी जाति के हों, किसी मत, पंथ, महजब के हों, वे सम्मान के योग्य हैं, पूजने योग्य हैं।

चित्तौड़ के राणा ने भगवान श्रीकृष्ण का एक मंदिर बनवाया। फिर सोचा कि ʹमंदिर में मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा किसके हाथों की जाय ?ʹ विचार विमर्श के बाद राणा को लगा कि संत रविदास जी को ही आमंत्रित किया जाये। आमंत्रण भेजा गया और राणा का आमंत्रण संत रविदास जी ने स्वीकार भी कर लिया।

प्राण-प्रतिष्ठा के निर्धारित दिन से पहले ही संत रविदास जी चित्तौड़गढ़ पहुँच गये। अपने शरीर को, जाति को ही विशेष मानने वाले ब्राह्मणों के जमघट ने आपस में कानाफूसी कीः ʹयह तो अनर्थ हो रहा है ! रविदास जाति का चमार है और वह भगवान की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा करेगा ! जूता सीने वाले व्यक्ति के हाथ से श्रीकृष्ण की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा ! कौन जायेगा मंदिर में ? वैदिक मंत्रोच्चारण करने वाले ब्राह्मण से प्राण-प्रतिष्ठा करानी चाहिए। पर राजा का विरोध करना भी सहज नहीं है। अब क्या करें ?ʹ

चित्तौड़ के राणा के कान भरे गये कि ʹयह अनर्थ हो जायेगा !ʹ

राणा ने कहाः “जो भगवान के प्रेमी भक्त हैं, उन भक्तों की, संतों की जाति नहीं होती। संत की जाति क्यों मानते हो ?”

ब्राह्मणों ने देखा कि राजा रविदास के प्रभाव में है लेकिन हमें भी अपना तो कुछ करना पड़ेगा। जिस मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा होने वाली थी, उसे अपनी व्यूह रचना से चुरा लिया।

जब प्राण-प्रतिष्ठा का मौका आया तो वह मूर्ति नहीं है ! हाहाकार मच गया। राणा बड़े चिंतित हो गये क्योंकि राज्य की इज्जत का सवाल है। ब्राह्मण लोग राणा के पास आये और बोलेः “आप कहते हो कि रविदास श्रेष्ठ संत हैं। अगर वे ऐसे हैं तो भगवान की मूर्ति को प्रकट करके दिखाएँ। फिर हम लोग उनके हाथों प्राण-प्रतिष्ठा कराने का विरोध नहीं करेंगे।”

राणा ने रविदासजी से प्रार्थना कीः “महाराज ! जिस मूर्ति की आप प्राण-प्रतिष्ठा करने वाले हैं, वह अदृश्य हो गयी है। अब इस समस्या का समाधान राज्यसत्ता से नहीं हो सकता। साम, दाम, दंड, भेद से यह काम  नहीं हो सकता है। केवल आप जैसे संत-महापुरुष चाहें तो राज्य की इज्जत बचा सकते हैं। अन्यथा शत्रु राजाओं को भी मेरी खिल्ली उड़ाने का अवसर मिलेगा।”

रविदास जी ने कहाः “इस छोटी सी बात के लिए चिंता क्यों करते हो, ठीक है, मिल जायेगी। मंदिर के द्वार बंद करवा दो।”

रविदास जी शांत हो गये, “भगवान हैं और वे सर्वसमर्थ हैं, सर्वश्रेष्ठ हैं, प्रेमस्वरूप हैं, सौंदर्य के भंडार हैं, ʹकर्तुं शक्यं अकर्तुं शक्यं अन्यथा कर्तुं शक्यम्ʹ सामर्थ्य के धनी हैं। फिर चिंता किस बात की ? हमारा चित्त समर्थ के हाथों में है, पूर्ण के हाथों में है।ʹ

चित्त को उस चैतन्यस्वरूप प्रभु की स्मृति में लगाकर रविदास जी एकांत में बैठ गये। कोई भी बड़े-में-बड़ी समस्या आ जाय तो आप समस्या को अधिक महत्त्व न देना, सृष्टिकर्ता को महत्त्व देना। आप अपने अहं को महत्त्व न देना, परमात्मा को महत्त्व देना। अहं हार मान ले और परमात्मा की श्रेष्ठता, समर्थता स्वीकार कर ले तो प्रार्थना फलने में देर नहीं होती।

रविदास जी ने ध्यानस्थ होकर प्रार्थना कीः “महाराज ! आपकी मूर्ति इन हठी ब्राह्मणों ने कहाँ रखी है यह हम नहीं जानते। अब वह मूर्ति कैसे लायी जाय यह भी हमें पता नहीं लेकिन महाराज ! आप इतने ब्रह्माण्ड बना लेते हो तो अपने-आपकी मूर्ति मंदिर में स्थित कर दो न ! महाराज ! लाज रखो राज्य की और अपने रविदास की, महाराज ! प्रभु जी ! नमो भगवते वासुदेवाय….

जो सब जगह बस रहा है, उस परमेश्वर को मैं नमन करता हूँ। जो सबका अंतरात्मा है, जो दूर नहीं, दुर्लभ नहीं, परे नहीं और सदा सबका प्यारा है, उसको मैं नमन करता हूँ। ૐ… ૐ… प्रभु जी ! हे आनन्ददाता, ज्ञानदाता ! कर्तुं शक्यं अकर्तुं शक्यं अन्यथा कर्तुं शक्यम्। हे देव!

श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे !

हे नाथ नारायण वासुदेवा !….ʹ

प्रीतिपूर्वक भगवान की स्मृति करते-करते अपने संकल्प को भगवान में विलय कर देना ही सच्ची प्रार्थना है।

कुछ समय बीतने के बाद रविदास जी को संतोष हुआ, अंतरात्मा में प्रेरणा हुई कि ठाकुर जी आ गये हैं।

रविदासजीः “महाराज ! शहनाइयाँ, बिगुल, बाजे आदि बजवाओ। भगवान पधार गये हैं।”

राणाः “मूर्ति मिल गयी ?”

“अरे, मिल क्या गयी, भगवान आ गये हैं !”

“कैसे, कौन उठा लाया ?”

“ये उठा के लाने वाले भगवान नहीं, स्वयं आने वाले भगवान हैं।”

मंदिर के कपाट खोले तो… ʹओ हो, ठाकुर जी मूर्ति ! जय हो, कृष्ण-कन्हैया लाल की जय !ʹ रविदास जी ने विधिवत मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा की। ब्राह्मणों ने रविदास जी का जयघोष किया, कृष्णजी का जयघोष किया। प्राण-प्रतिष्ठा के निमित्त उत्सव हुआ। उत्सव के बाद भोजन होता है। भोजन में बहुत से पकवान एवं व्यंजन बने-घी के लड्डू, चावल, दाल, सब्जी आदि।

राणा ने कहाः “ऐसे महापुरुष हमारे बीच में ही भोजन करेंगे।”

ब्राह्मणों ने कहाः “हद हो गयी ! फिर वही चमार हमारे साथ आ के भोजन करेगा ! यह कैसा आदमी है ! जहाँ रविदास बैठेंगे, वहाँ हम नहीं खायेंगे।”

रविदास जी के कान में बात गयी। रविदासजी ने सोचा, ʹराजा की बाजी बिगड़ेगी।ʹ उन्होंने कहाः “नहीं-नहीं, मैं ब्राह्मणों के बीच बैठने के योग्य नहीं हूँ। ब्राह्मण देवता हैं, जन्मजात शुद्ध हैं, और भी इनके वैदिक कर्म हैं। मैं इनके बीच नहीं बैठूँगा। मैं मंदिर परिसर के बाहर रहूँगा। ब्राह्मणों का भोजन आदि हो जायेगा, बाद में जब मुझे आज्ञा मिलेगी तब मैं आऊँगा। उनकी पत्तलें आदि उठाऊँगा, जो भी सेवा होगी करूँगा।”

रविदास जी बाहर चले गये। मंदिर के परिसर में ब्राह्मणों की कतारें लगीं, भोजन परोसा गया। और ज्यों ही वे लोग ʹनमः पार्वतीपते ! हर हर महादेव !ʹ करके ग्रास लेने लगे, त्यों ही एक ब्राह्मण ने दायीं ओर देखा कि ʹरविदास तो इधर बैठा है ! उसने बोला था बाहर चला जाता हूँ।ʹ बायीं ओर देखा तो उधर भी रविदास ! एक को नहीं, सभी ब्राह्मणों को ऐसा दिख रहा था। अपने को छोड़ के सब रविदास, रविदास ! ब्राह्मण चौंके। इतने सारे रविदास ! कहाँ से आ गये ?

तुम्हारे आत्मा में कितना सामर्थ्य है, कितनी शक्ति है ! अगर योग-सामर्थ्य, ध्यान के अभ्यास से आप अपनी गहराई में जाओ तो आपको ताज्जुब होगा कि “मैं फालतू गिड़गिड़ा रहा था – नौकरी मिल जाय, नौकर बन जाऊँ….. प्रमाणपत्र मिल जाय, ऐसा बन जाऊँ – वैसा बन जाऊँ….ʹ

अरे, तू जो है उसमें गोता मार !

आठवें अर्श1 तेरा नूर चमकदा, होर2 भी उचा हो।।

फकीरा ! आपे अल्लाह हो।

1.आकाश। 2. और।

तेरा खुद खुदा आत्मदेव है। कुछ ब्राह्मण चौकन्ने होकर मंदिर-परिसर से बाहर गये। देखा तो रविदास तो ब्राह्मणों के जूते साफ कर रहे हैं।

ब्राह्मण बोलेः “क्या तुम अंदर घुस गये थे ? हम भोजन कर रहे थे तब तुम हमारे बीच बैठ गये थे क्या ?”

“नहीं-नहीं, मैं तो यही हूँ।”

ब्राह्मणों ने सोचा, ʹयह सच्चा कि वह सच्चा ?ʹ

महाराज ! सच्चा तो वह परमेश्वर है। परमेश्वर जिसको अपना मान लेता है, जो प्रीतिपूर्वक भगवान को भजता है उसको भगवान बुद्धियोग तो देते ही हैं, साथ में अपना सामर्थ्य-योग भी दे देते हैं। उस दाता को देने में कोई देर नहीं लगती। किसको, कब, कहाँ से उठाकर कहाँ पहुँचा दे !

ब्राह्मणों की बुद्धि का प्रेरक, रविदासजी की बुद्धि का प्रेरक ऐसी लीला रचकर हम सबकी आध्यात्मिकता की तरफ चलने की योग्यता भी तो जगा रहा है ! यदि ब्राह्मण ऐसा नहीं करते तो रविदास जी का नाम नहीं चमकता। इस प्रसंग से आने वाली पीढ़ियों को प्रभुप्राप्ति, प्रभुविश्वास की प्रेरणा भी मिली।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2012, पृष्ठ संख्या 6,7,8 अंक 229

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