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Tatva Gyan

भगवत्स्मृति से भगवत्साक्षात्कार-पूज्य बापू जी


‘भगवद्गीता’ में अर्जुन कहते हैं- नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा….. मोह अर्थात् जो उल्टा ज्ञान था, शरीर को मैं मानता था, संसार को सच्चा मानता था, वह मेरा मोह नष्ट हो गया । स्मृतिर्लब्धा… अर्थात् मुझे स्मृति हुई । कैसी स्मृति हुई ? कि ‘मैं सत्-चित्-आनंदस्वरूप आत्मा हूँ….’ अपने आत्मस्वभाव की स्मृति हुई, ब्रह्मस्वभाव की स्मृति हुई । सभी सत्कर्मों का फल भी यही है कि आपके ब्रह्मस्वभाव की स्मृति जग जाय, आपको ब्रह्मज्ञान हो जाय । संत कबीर जी कहते हैं-

सुमिरन ऐसा कीजिये खरे निशाने चोट ।

मन ईश्वर में लीन हो हले न जिह्वा होठ ।।

मन अपने आत्मा-परमात्मा, ईश्वर में लीन हो तो ईश्वरीय सुख, ईश्वरीय शांति, ईश्वर-प्रसादजा बुद्धि बन जाती है । भगवत्स्मृति करके भगवद्विश्रांति, भगवत्सुख में स्थिति करनी है ।

बुध विश्राम सकल जन रंजनि ।

रामकथा कलि कलुष बिभंजनि ।। (श्री रामचरित. बाल. कां. 30.3)

भगवत्कथा कलियुग के दोषों को मिटाती है और भगवान की स्मृति का सुख-सामर्थ्य देती है । लक्ष्मणजी ने भगवान राम से पूछा कि

कहहु ग्यान बिराग अरू माया ।

ज्ञान किसको बोलते हैं ? वैराग्य किसको बोलते हैं ? माया किसको बोलते हैं ?

कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया ।। (श्री रामचरित. अर.कां. 13.4)

उस भक्ति को कहिये जिसके कारण आपकी दया और सुख का प्रसाद मिले ।

ईश्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ ।

ईश्वर किसको बोलते हैं ? जीव किसको बोलते हैं ? इसका सारा भेद मुझे समझाइये ।

जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ ।। (श्री रामचरित. अर.का. 14)

जिससे भगवान के चरणों में प्रीति हो और हमारा शोक, मोह और भ्रम सदा के लिए मिट जाय ।

राम जी के चरणों में लक्ष्मण जी ने ऐसे प्रश्न किये हैं । राम जी कृपा करके लक्ष्मण को सत्संग सुनाते हैं । जो राम जी का दर्शन करता है, राम जी की सेवा करता है, राम जी का भाई है, उसको भी सत्संग की जरूरत है ।

रावण के पास सोने की लंका, पूरी जमीन-जायदाद, उड़ने की शक्ति थी लेकिन ब्रह्मज्ञान के सुख के अभाव में विकारी आकर्षण नहीं गया । रावण की क्या गति हुई दुनिया जानती है । बड़े-बड़े धनी लोग, बड़े-बड़े सत्तावान लोग भगवद रस और भगवत् सत्संग के बिना दुराचार, विकार व्यसन में पड़कर अपना जन्म-जन्मांतर खराब कर लेते हैं बेचारे !

बिनु सतसंग बिबेक न होई ।

राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ।। (श्री रामचरित. बा.कां. 2.4)

बिना सत्संग के इस जीवात्मा को अपने परमात्मस्वरूप का विवेक नहीं होता  और भगवान की कृपा के बिना सत्संग नहीं मिलता ।

देखें रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ ।। (श्री रामचरित. अयो.कां. 182)

भगवत्शांति, भगवद्ज्ञान, भगवत्सुख के बिना जीवात्मा को सताने वाली यह वासना नहीं मिटती, दुःख नहीं मिटते । श्री राम जी की सेवा करते-करते लक्ष्मण भैया सत्संग में गति करते हैं और प्रश्न पूछते हैं कि माया क्या है, ईश्वर क्या है, ब्रह्म क्या है, जगत क्या है और भगवद् रस में, भगवत्सुख में प्रीति कैसे जगह ?

राम जी कहते हैं-

थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई ।

सुनहु तात मति मन चित लाई ।। (श्री रामचरित. अर.कां. 14.1)

सुनो लक्ष्मण ! तुम अपने मन को भी लगाओ, अपनी बुद्धि को भी लगाओ, अपने चित्त को भी लगाओ, मैं थोड़े में तुमको सब बताता हूँ ।

भगवान रामचन्द्र जी लक्ष्मण को थोड़े में ही सब बताते हैं । विभीषण मंदोदरी को सत्संग की बात सुनाते हैं, रावण को भी सुनाते हैं । रावण को हनुमान जी भी सत्संग सुनाते हैं । मंदोदरी भी रावण को सत्संग की बात सुनाती है । कई पात्रों ने रावण को सत्संग सुनाया लेकिन रावण ने सत्संग का आदर नहीं किया । अपने अहं में, अपनी मान्यता में, असत्य संसार में, असत्य शरीर में जिसकी प्रीति होती है, वह सत्संग का इतना फायदा नहीं लेता है जितना फायदा सत्यस्वरूप ईश्वर में प्रीति करने वाले ले लेते हैं । जैसी-जैसी अंदर की रूचि होती है वैसी-वैसी व्यवस्था आदमी करता है । सत्संग में आने की रूचि होती है तो इधर पहुँचने की व्यवस्था भी करते हो ।

राजा भर्तृहरि को सत्संग के द्वारा भगवत्प्राप्ति की रूचि हुई तो राज्य छोड़कर भी लग गये और भगवान को पा लिया । राजा भगीरथ ने भी भगवत्प्रीति के बाद लोक-मांगल्य किया । जो राजा होने पर भी नहीं कर पाये ते वह स्थायी लोक-कल्याण भगवत्प्राप्ति के बाद करने में सफल हुए । स्थायी लोक-कल्याण करके वास्तव में समाजोद्धार किया । जो वास्तविक तत्त्व को नहीं पाता, उसकी सेवा से भी वास्तविक कल्याण सम्भव नहीं । राजा भगीरथ राजपाट छोड़कर त्रितल ऋषि के चरणों में ब्रह्मज्ञन पाने के लिए तत्पर हो गये ओ। परमार्थप्राप्ति के बाद गंगा जी को धरती पर ले आये । भगीरथ संकल्प से भागीरथ कहलाये । न जाने कितने करोड़ों लोगों का मंगल कर चुके और आगे भी होता रहेगा । भगवत्प्राप्त महापुरुषों के द्वारा उनकी हयाती के बाद भी सच्ची उन्नति होती रहती है ।

जिसके जीवन में सत्संग का महत्त्व है वह पार हो जाता है । तपस्या से भी ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों के सत्संग का महत्त्व ज्यादा है । लल्लू-पंजू लोग सत्संग के नाम पर भाषण करते हैं… इधर-उधर के शास्त्रों से उठाया हुआ रटा-रटी का भाषण ! सत्संग तो सत्य का साक्षात्कार किये हुए महापुरुषों का ही होता है । महापुरुषों का साहित्य पढ़कर भाषण करना अलग बात है और महापुरुषों का सत्संग अलग बात है ।

दुनिया में एक से बढ़कर एक श्रेष्ठ वस्तुएँ हैं लेकिन सबसे श्रेष्ठ है कल्पवृक्ष, जो हर कामना पूरी करता है लेकिन उसमें भी श्रेष्ठ है सत्संग, जो नश्वर आकर्षण और नश्वर कामनाओँ को मिटाकर शाश्वत परमात्मा के प्रेम-प्रसाद से परितृप्त कर देता है । भगवान की और सब कृपाओं से बड़ी कृपा है कि

जब द्रवै दीनदयालु राघव, साधु-संगति पाइये । (विनय पत्रिकाः 136.10)

जब भगवान बहुत ज्यादा प्रसन्न होते हैं तब संतों का संग देते हैं ।

यह भगवत्कृपा सबसे श्रेष्ठ है, विशेष कृपा है । जैसे माँ कृपा करती है, कभी माँ बच्चे को बहुत प्रेम करती है तो उसके स्तन से दूध बह चलता है, ऐसे ही भगवत्कृपा विशेष होती है तो संतों के सत्संग में आनंद, माधुर्य आने लगता है । राम जी लक्ष्मण को सत्संग की भगवत्कृपामयी प्रसादी देते हैं ।

मैं अरु तोर मोर तैं माया ।

जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया ।। (श्री रामचरित. अर. कां. 14.1)

शरीर को मैं मानते हैं, संसार को सच्चा मानते हैं । ‘यह मेरा है, यह तेरा है’, इसी झूठे ज्ञान को माया बोलते हैं, धोखा । जैसे सभी तरंगे पानी हैं, ऐसे ही सब लोग चैतन्य हैं । शरीर में आकर जीने की इच्छा करता है वह जीव है और माया को वश करके जो चैतन्य संसार का नियमन करता है उसको ईश्वर बोलते हैं ।

जीव ईश्वर नहीं बनता है लेकिन जीवात्मा और ईश्वर का आत्मा दोनों एक हैं । जीवात्मा ईश्वर के आत्मा से अपने मिलन का अनुभव करके मुक्तात्मा हो जाता है । जीव-ईश्वर एक हैं तो ऐसा नहीं कि जीव चतुर्भुजी होकर सृष्टि कर लेगा । जीव चतुर्भुजी नारायण की आकृति धारण करके ईश्वर के धाम में जा सकता है लेकिन ईश्वर का सृष्टि करने का सामर्थ्य तो ईश्वरीय सत्ता के पास ही होता है । जैसे केबिन का आकाश और घड़े का आकाश एक है तो घड़ा केबिन नहीं बन सकता और केबिन घड़ा नहीं बन सकती, लेकिन केबिन और घड़ा हटा दो तो आकाश दोनों का एक है । ऐसे ही गंगू तेली का तेल का धंधा छोड़ दो और राजा भोज की राजगद्दी छोड़ दो तो मानवता तो दोनों में एक हैं । ऐसे ही छोटा बुलबुला बड़ी तरंग नहीं बनता, बड़ी तरंग छोटा बुलबला नहीं है फिर भी दोनों पानीरूप से एक हैं ।

नाक में पहनी आधे ग्राम की बाली भी सोना है और हाथ में पहना 50 ग्राम का कंगन भी सोना है । बाली कंगन नहीं है, कंगन बाली नहीं है लेकिन दोनों सोना हैं, ऐसे ही जीव और ईश्वर दोनों चैतन्य हैं, ब्रह्म हैं । ऐसे जो ब्रह्मस्वभाव का चिंतन करता है वह दुःखों से, शोकों से पार हो जाता है । उसकी बुद्धि ब्रह्ममय हो जाती है ।

ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर, कार्य रहे न शेष ।

इस प्रकार का सत्संग-प्रसाद भगवान राम जी ने लक्ष्मण को दिया ।

भगवान में प्रीति कैसे हो ? अऩेक में एक देखें और एक में से ही अनेक की लीला देखें तो भगवान की जहाँ-तहाँ स्मृति होती है । इससे भगवत्प्रसादजा मति बन जाती है । मति से ही आदमी की ऊँचाई-नीचाई होती है । छोटी मति होती है तो छोटा जीवन होता है, ऊँची मति होती है तो ऊँचा जीवन होता है । राजसी मति होती है तो राजसी, सात्त्विक मति होती है तो सात्त्विक जीवन होता है । भगवत्-अर्थदा मति होती है तो भगवत्-अर्थदा जीवन होता है, भगवत्प्रसादाजा मति बनती है ।

ज्यों-जयों सत्संग सुनते हैं, ध्यान करते हैं और नियम करते हैं त्यों-त्यों अपनी मति भगवान के प्रसाद से पावन हो जाती है । जैसे बच्चा ज्यों-ज्यों ध्यान से पढ़ता है त्यों-त्यों वह उस विषय में मास्टरी ले लेता है, एम. ए. हो जाता है, ऐसे ही सत्संग से भगवत्स्मृति हो जाती है और भगवत्साक्षात्कार होता है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2011, पृष्ठ संख्या 16-18 अंक 226

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संसार-आसक्तिरूप रोग के औषधः आत्मवेत्ता संत


गरुड़ जी ने भगवान से कहाः “हे दयासिंधो ! अज्ञान के कारण जीव जन्म-मरणरूपी संसारचक्र में पड़ता है, अनंत बार उत्पन्न होता है और मरता है। इस श्रृंखला का कोई अंत नहीं है। हे प्रभो ! किस उपाय से इस जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त हो सकती है ?”

श्री भगवान ने कहाः “हे गरूड़ ! यह संसार दुःख का मूल कारण है, इसलिए इस संसार में जिसका संबंध है वही दुःखी है और जिसने इसका (जगत की सत्यता व आसक्ति का) त्याग किया वही मनुष्य सुखी  है। दूसरा कोई भी सुखी नहीं है। यह संसार सभी प्रकार के दुःखों का उत्पत्ति-स्थान है, सभी आपत्तियों का घर है और सभी पापों का आश्रय-स्थान है, इसलिए ऐसे संसार को (उसकी सत्यता व उसके प्रति राग को) त्याग देना चाहिए।

यह खेद की बात है कि अज्ञान से मोहित होकर सभी जीव अपनी देह, धन, पत्नी आदि में आसक्त होकर बार-बार पैदा होते हैं और मर जाते हैं, इसलिए (शरीर, घर, बेटे, बेटियाँ आदि के प्रति) सदा आसक्ति का त्याग कर देना चाहिए। आत्मवेत्ता संतों-महापुरुषों का सान्निध्य-सेवन करना चाहिए क्योंकि वे संसार-आसक्तिरूप रोग के औषध हैं।

सत्संगश्च विवेश्च निर्मलं नयनद्वयम।

यस्य नास्ति नरः

सोऽन्धः कथं न स्यादमार्गगः।।

‘सत्संग और विवेक – ये दोनों ही व्यक्ति के दो निर्मल नेत्र हैं। जिस व्यक्ति के पास ये नहीं है, वह अंधा है। वह अंधा मनुष्य कुमार्गगामी क्यों नहीं होगा !’

हे गरूड़ ! मुक्ति न वेदाध्ययन से प्राप्त होती है और न शास्त्रों के अध्ययन से ही, मोक्ष की प्राप्ति तो ज्ञान से ही होती है किसी दूसरे उपाय से नहीं।

सद्गुरु का वचन ही मोक्ष देने वाला है, अन्य सब विद्याएँ विडम्बनामात्र है। लकड़ी के हजारों भारों की अपेक्षा एक संजीवनी ही श्रेष्ठ है। कर्मकाण्ड और वेद-शास्त्रादि के अध्ययनरूपी परिश्रम से रहित केवल गुरुमुख से प्राप्त अद्वैत ज्ञान ही कल्याणकारी कहा गया है, अन्य करोड़ों शास्त्रों को पढ़ने से कोई लाभ नहीं। इसलिए हे गरूड़ ! यदि अपने मोक्ष की इच्छा हो तो सर्वदा सम्पूर्ण प्रयत्नों के साथ सभी अवस्थाओं में निरंतर आत्मज्ञान की प्राप्ति में संलग्न रहकर श्रीगुरुमुख से आत्मतत्त्व-विषयक ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। ज्ञान प्राप्त होने पर प्राणी इस घोर संसार-बंधन से सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है।” (श्री गरूड़ पुराण, अध्यायः16)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 26 अंक 225

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भगवान का उद्देश्य – पूज्य बापू जी


जैसे कोई फैक्ट्री बनाता है तो उद्देश्य पैसा कमाना होता है, कोई चुनाव लड़ता है तो उद्देश्य पद का होता है, ऐसे ही भगवान का उद्देश्य क्या है ?

भगवान ने हमें दास बनाने के लिए अथवा संसारी पिट्ठू बनने के लिए जन्म नहीं दिया। हमने अपनी अक्ल-होशियारी से, अपने बलबूते से यह शरीर नहीं बनाया। हमने अपने-आप यह नहीं रचा है और शरीर जिनसे रचा गया वे हमारी अपनी वस्तुएँ नहीं हैं। यह सृष्टिकर्ता की सृष्टि प्रक्रिया की व्यवस्था है। तो क्या उद्देश्य होगा उसका जिसने शरीर दिया है ?

उस शरीर को पालने की जिम्मेदारी भी होती है। हम जन्मेंगे तो क्या पियेंगे, क्या खायेंगे, कैसे मिलेगा इसकी न हमने, न माँ-बाप ने चिंता की। तो शरीर को पोषित करने की व्यवस्था की जिम्मेदारी भगवान की है, बिल्कुल सच्ची बात है। अन्न, जल और श्वास से हमारा निर्वाह होता है,  उस निर्वाह की व्यवस्था ईश्वर ने अपने जिम्मे ले रखी है। किंतु वासना-निर्वाह हो, जैसे – कपड़े हों तो ऐसे हों, आवास हो तो ऐसा बढ़िया हो – इस वासनापूर्ति का उसने ठेका नहीं ले रखा। निर्वाह का उसका ठेका है और निर्वाह सभी का होता है, अनपढ़ का भी, पढ़े हुए का भी। पुण्यात्मा का भी और पापी का भी निर्वाह होता है। शरीर का निर्वाह सहज में होता है। इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए। ‘बेटी का क्या होगा, बेटे का क्या होगा, हमारा क्या होगा ?….’ निर्वाह की जिम्मेदारी ईश्वर की है। ईश्वर का उद्देश्य है कि ‘हमारा जीवन रसमय, सुखमय एवं तृप्त हो।’ जैसे बच्चा दूध पीकर तृप्त होता है। मनुष्य अन्न और गाय भैंस चारा खाकर तृप्त होते हैं। तो निर्वाह से तृप्ति की जिम्मेदारी ईश्वर की है। ऐसे ही हम अपनी दुर्वासनाओं से बचने के लिए अगर ईश्वर-सत्ता को स्वीकार करें, ईश्वर करूणा को स्वीकार करें, ईश्वर के उद्देश्य में हम अपनी हाँ मिला दें तो मुक्ति पाना सहज है। शराबी, जुआरी, भँगेड़ी अपने संग में आने वाले को अपने रंग से रंग डालते हैं, ऐसे ही ईश्वर मुक्त हैं, आनंदस्वरूप हैं, उनका चिंतन करने वाला भी मुक्तात्मा, आनंदस्वरूप हो जाता है। हम अपनी तरफ से बाधा छोड़ दें तो मुक्ति तो मुफ्त में ही है।

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।

मनः संयम्य मच्चितो युक्त आसीत मत्परः।। (गीताः 6.14)

प्रशांतात्मा प्र उपसर्ग है – आधिभौतिक, आधिदैविक व आध्यात्मिक – ये मानसिक शांतियाँ नहीं – परम शांति मिल जाती है।

जैसे ब्रह्मचारी गुरु के आश्रम में विद्या के लिए ठहरता है और फिर सेवा करता है तथा विद्या के लिए तत्पर होता है। ऐसे ही भगवान की जो ब्रह्मविद्या है, भगवान हमें जो ब्रह्मविद्या देना चाहते हैं, प्रेमाभक्ति के दवारा ज्ञानयोग के द्वारा, सेवायोग के द्वारा उसमें हम अड़चन न बनें। हम अपनी कल्पना न करें कि ‘भगवान ऐसे हैं अथवा भगवान ऐसा कर दें, ऐसा दें दें।’ नहीं-नहीं, ‘तेरी मर्जी पूरण हो। वाह प्रभु ! वाह !!’ अपमान हो गया, वाह ! अनुकूलता आ गयी, वाह ! प्रतिकूलता आ गयी, वाह ! थोड़े दिन यह प्रयोग करके देखो, आपको लगेगा कि ‘हम तो खामखाह परेशान हो रहे थे।’ यशोदा यश दे रही है ठाकुरजी को। नंदबाबा विवेक हैं तो यशोदा जी यशदात्री हैं। व विवेक का तो हाथ पकड़ते हैं श्रीकृष्ण लेकिन यशदात्री मति के तो हृदय से लगते हैं। यशोद कृष्ण को हृदय से लगाती रहती हैं। आप ईश्वर की ‘हाँ’ में ‘हाँ’ करते जाओ। यश उसे देते जाओ, ‘वाह प्रभु ! बहुत बढ़िया, बहुत बढ़िया।’ तो आपके हृदय से भगवान चिपके रहेंगे। कठिन नहीं है। कठिनाई, अड़चन तो तब बनती है जब इस बदलने वाले मिथ्या व्यवहार, मिथ्या जगत को सच्चा मानते हैं और अबदल अंतरात्मा कृष्ण को दूर मानते हैं, दो हाथ-पैरवाला मानते हैं, तब हम अड़चन की तानाबुनी करते हैं।

गोपियों का क्या भाग्य रहा होगा ! अरे, हम भी तो ग्वाल-गोपियाँ ही हैं। ‘गो’ माने इन्द्रियाँ। इन्द्रियों के द्वारा जो भगवद् रस पी ले वह गोपी है और गोप है। योगी समाधि से शांति रस पीता है, ध्यान रस पीता है लेकिन जो भगवान को धन्यवाद देकर अपनी पकड़, वासना छोड़ देता है वह गोपी है। अभी आप ईश्वर को धन्यवाद देते जाओः ‘क्या तेरी लीला है ! क्या तेरा आनंद है !’ और ‘तेरा-तेरा’ अभी कह रहे हैं, कुछ समय बीतेगा तो अपना ‘मैं’पन मिटेगा तो ईश्वर का ‘तेरा’पन भी मिटेगा। हम न तुम, दफ्तर गुम ! दूरी मिट जायेगी। साधन में शुरुआत में ‘वे भगवान हैं, दयालु हैं, वे ऐसे हैं’, तृतीय पुरुष सर्वनाम चलता है। फिर द्वितीय पुरुष सर्वनाम – ‘तुम दयालु हो, तुम ऐसे हो, तुम मेरे हो’ और फिर आगे चलकर ‘तुम-तुम’ क्या, हम न तुम दफ्तर गुम…. ‘वह मेरा ही स्वरूप है।’

सौ बार तेरा दामन, हाथों में मेरे आया।

जब आँख खुली देखा, अपना ही गिरेबाँ है।।

आपका भाव उस रूप में हो जाता है। भाव की गहराई में जाओ तो आपका परेश्वर ही आपका आत्मा है। दूर नहीं, दुर्लभ नहीं !

आप केवल ठान लो। आप ठान लो कि ‘यह शरीर हम नहीं है।’ वास्तव में जब तुम किसी को देखते तो शरीर दिखता है कि अविनाशी तत्त्व ! तो हम आपको मानना पड़ेगा कि शरीर दिखता है। भगवान कहते हैं कि ‘शरीर को जिससे देखते हो वह ‘मैं’ हूँ। कितना निकट हूँ ! कहाँ रहा मैं तुमसे दूर !’ ऐसे ही आप भगवान को देखते हो कि भगवान की मूर्ति को देखते हो ? भगवान की मूर्ति जिससे दिखती है वही तो भगवान है ! वह छुपाछुपी के खेल में दूर लगता है वरना हाजरा-हुजूर, जागंदी ज्योत… ज्ञानस्वरूप है, चैतन्यस्वरूप है, आनंदस्वरूप है, अपना-आपा है और वह अपने-आप की याद दिलाता रहता है। जैसे निर्वाह की उसकी जिम्मेदारी, ऐसे अपने स्वरूप का प्रसाद देने की भी उसकी जिम्मेदारी है। जैसे माँ-बाप की जिम्मेदारी होती है न, कि बच्चे का पालन-पोषण करें। केवल पालन-पोषण नहीं, पढ़ाना-लिखाना भी वे करते हैं। ऐसे ही अपनी विद्या देने को भी परमात्मा की अपनी जिम्मेदारी है। हम उसके हैं। हम अपनी तरफ से जब वासना के आवेग में आते हैं तो वह बोला है,  ‘अच्छा, कर लो बेटे !’ जब समझते हैं कि अपनी वासना के चक्कर में आ-आकर कीट-पतंग बनना, नीच योनियों में जाना है। ‘नहीं बाबा ! तेरी मर्जी पूरण हो। ऐ वासना दूर हट !….’ वासना को हटाने के लिए ऊँची वासना की जाती है। ‘यह मिल जाय, वह मिल जाय….’ – इस वासना को मिटाने के लिए ‘हे परमेश्वर ! मेरे ऐसे दिन कब आयेंगे कि तुममें विश्रांति पाऊँगा ?’ ऐसे काँटे से काँटा निकालो। सत्-चित्-आनंदस्वरूप परमात्मा की ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाकर, उनके उद्देश्य से अपना उद्देश्य मिलाकर मुक्तात्मा हो जाओ, यही भगवान का उद्देश्य है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 24,25 अंक 225

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