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Tatva Gyan

कैसी सत्ता है !


पूज्य बापू जी की अमृतवाणी

शरणानंद जी महाराज हो गये। सूरदास थे लेकिन अँदर की आँखें पूरी खुलीं थीं। दस साल की उम्र में उनकी आँखें चली गयीं, उदास रहे। संतों के सम्पर्क में आये, उदासी और दुःख मिटा लेकिन दुःखहारी की चर्चा सुनते-सुनते इतने उच्च कोटि के महापुरुष बन गये कि आँखें नहीं थीं फिर भी पढ़े हुए लोग अखण्डानंद जी, आनंदमयी माँ, गाँधी जी जैसे, पंडित दीनदयाल, मदन मोहन मालवीय जी, नेहरू जी और भी कुछ राजेन्द्र बाबू जैसे उनके सत्संग का आस्वादन करके धन्यता का एहसास करते थे। शरणानंद महाराज की भगवान में ऐसी  प्रीति थी कि उनकी भगवत् व्याख्या, भगवत्कृपा और भगवद्-अनुभूति की बातें बिल्कुल शास्त्रसम्मत आती हैं।

उनका ईश्वर में बड़ा विश्वास था। विश्वासः फलदायकः। वे बताते थे कि एक बार वे हरिद्वार से यमुनोत्री जा रहे थे। यमुना किनारे यात्रा करते-करते बीमार पड़ गये। वैसे तो लोग थे उनके साथ लेकिन भक्त लोग थे, हिमालय की यात्रा थी, पैदल का जमाना था। कुछ यात्री रुके, कोई एक दिन, कोई दो दिन, कोई तीन दिन…. आखिर कोई कब तक देखता है ! सब चले गये, शरणानंद महाराज अकेले रह गये। स्वस्थ हुए तो फिर चलते गये-चलते गये तो क्या हुआ कि कहीं से कोई ढेर  गिर पड़ा यमुना जी में धप्पऽऽ ! इन्हें धक्का लगा और ये खुद भी यमुना में जा गिरे। तैरना तो जानते थे पर यमुना माँ के बहाव में बहे जा रहे थे। हाथ से लकड़ी छूट गयी। अब किधर को जायें, आँखें तो थीं नहीं ! किंतु हृदय में ईश्वर का, उसकी सत्ता-सामर्थ्य का विश्वास था।

‘अब तेरी मर्जी पूर्ण हो।’ – इतना कहा कि दूसरे क्षण में रेतीला स्थान मिल गया, उसके सहारे खड़े हो गये। आँखों तो थी नहीं फिर भी लकड़ी हाथ में आ गयी !

‘तू कैसा है, कैसी तेरी सत्ता है ! कितना तू ख्याल करता है !….’

भगवान की कृपा-करुणा से, अहोभाव से हृदय पावन हो गया, भर गया।

गुलाब में उसी की चेतना है। कैसा रंग… कैसा बीज…. कैसी सुगंध! मोगरे-मोतिये की अपनी सुगंध है, तुलसी के अपने गुण-धर्म हैं। हैं तो एक लेकिन जहाँ-जहाँ जाता है, जैसा-जैसा निमित्त है, वैसा-वैसा उसमें कैसा खेल करता है ! वाह प्रभु !

परमात्मा का चिंतन करके हृदय सुख से, सद्बुद्धि से, सद्भाव से इतना भर जाता है कि दुनिया के टॉनिक तुच्छ हो जाते हैं।

है तो हृदय छोटा सा लेकिन उसके द्वारा कितने-कितने काम करवा देता है ! और हृदय जिस शरीर में रहता है उस शरीर का आरम्भ होता है पानी की बूँद से। पिता की एक चिकनी बूँद से वह शरीर बना और उसमें कैसा-कैसा डला है ! कैसी सत्ता है कि सुनती है, बोलती है, सूँघती है, चखती है ! कैसी सत्ता है कि सोचती है, विचारती है ! पानी की एक बूँद….!

उस नियंता की, सृष्टिकर्ता की, सर्वेश्वर की, परमेश्वर की कैसी महिमा है ! तेरी महिमा तू ही जाने ! हे जग के पालनहार ! मेरे प्यारे ! मेरे इष्टदेव ! मेरे परमेश्वर ! तू कैसा है मैं नहीं जानता पर मैं जैसा-तैसा हूँ तेरा हूँ मेरे प्यारे ! मैं तुझे किस तरह पहचानूँ मुझे समझ में नहीं आता लेकिन तू मुझे किस तरह मिले तेरे से अजान नहीं है। मैं तुझे कैसे खोजूँ, मैं नहीं जानता। मैं तुझे कैसे पाऊँ, मैं नहीं जानता हूँ। लेकिन तू मुझे अपनी प्यास कैसे दे सकता है, यह तू जानता है और प्यास जगा-जगा के, भूख जगा-जगा के फिर तू मिले तो क्या रस आयेगा तू ही जानता है, क्या निर्भरता आयेगी यह तू ही जानता है। हे प्रभु ! हे देव ! हे मेरे प्यारे ! नहीं मिला था तो कितने तड़प रहे थे और मिला तो लगा कि कितने आसान हो, कितने सरल हो हे प्रभु ! हे मेरे देव !

एक महात्मा के पास कोई पके केले ले गया। बाबा ने केला उठाया, छीला तो गिरी दिखी (भीतर का गूदा दिखा)। महात्मा की आँखों से प्रेम के आँसू बरसे…. इतना बढ़िया हलवा, इतनी सारी कैलोरी कैसे कवर (आवरण) में छुपा के रखी और यहाँ तक लाने की उसे प्रेरणा दी ! तू कैसा है प्रभु ! किसने इसमें मिठास भर दी ! यह कबर कैसे बना ! ऐसा सदैव-सदैव सुहावना, कोमल-कोमल केले का हलवा… यह तू कैसे बनाता है !

महात्मा को वह केला नहीं दिखता है ! भगवान का प्रसाद दिख रहा है। महात्मा वह प्रसाद खा रहे हैं। लारी वाले के पास केले थे, भक्त के पास वस्तु थी, महात्मा के पास भगवान की प्रसादी थी। प्रसाद बनकर तू आया और खाने की सत्ता भी तू ही देता है, हे प्रभु ! हे परमेश्वर !

जिसका रसमय, प्रेममय, भावमय हृदय है वह भगवान की लीला, भगवान की सत्ता, भगवान की करुणा, भगवान की प्रेरणा का चिंतन करते-करते भगवन्मय हो जाता है। जिसमें वैराग्य की तीव्रता है, विचार की शक्ति है, वह सोचे, ‘मैं….. मैं…. मैं क्या है ? यह हाथ मैं नहीं हूँ, पैर मैं नहीं हूँ, सिर मैं नहीं हूँ। फिर ‘नेति-नेति’ करते-करते ‘आखिर मैं कौन हूँ’ खोजे। वेदांत शास्त्र का अभ्यास करते हुए ‘मैं कौन हूँ’ इसको खोजता जाय।

शरीर पंचभौतिक है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश – ये पाँच भूत, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच सूक्ष्म ज्ञानेन्द्रियाँ,  पाँच तन्मात्राएँ – ये बीस और मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार ये सब मिलाकर कुल चौबीस तत्त्व – ये सब प्रकृति के हैं, इनमें सत्ता तेरी। जैसे फूल, फल ये सब चीजें अलग-अलग हैं लेकिन सत्ता उनमें सूर्य की है। सूर्य अपने स्थान पर होते हुए भी सबमें मिला हुआ है। ये चीजें बन-बन के बिगड़ जायें, मिट जायें लेकिन सूर्य वही का वही ! आकाश सबसे मिला है, सबको ठौर देता है। हे आकाश ! तुझे नमस्कार है। तू भी ईश्वरस्वरूप है। जैसे ईश्वर पाँच भूतों को ठौर देता है, ऐसे ही तुमने सबको ठौर दे रखी है। हे जल देवता ! तुझे नमस्कार है। जैसे ईश्वर सम है, रसस्वरूप है ऐसे ही तू रस देता है। हे अग्निदेव ! तुझे नमस्कार है। जैसे ईश्वर-चिंतन करने से मन, बुद्धि रसमय हो जाते हैं, ऐसे ही अग्निदेव ! तुम्हारा उपयोग करने से सारे व्यंजन रसमय बनते हैं। साकार ईश्वर – ये पाँच भूत और निराकार ईश्वर इन चौबीस तत्त्वों से न्यारा, इनको देखने वाला….. इस प्रकार ज्ञानदृष्टि से ईश्वर का श्रवण करें, ईश्वर का चिंतन-मनन करें, अपने ईश्वर के ज्ञान में रहें।

ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं।

फिर कोई माप-तौल, कल्पना नहीं।

देख ब्रह्म समान सब माहीं।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2011, पृष्ठ संख्या 6,7 अंक 221

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स्मृति जैसा मूल्यवान और कुछ नहीं पूज्य बापू जी


स्मृति ऐसी नहर है कि जहाँ चाहे इसको ले जा सकते हैं। इस स्मृति को चाहे संसार में ले जाओ – बेचैनी ले आओ, चाहे उसी से आनन्द ले आओ अथवा उसी से परमात्मा को प्रकट करो। जीवन में स्मृति जैसा मूल्यवान और कुछ नहीं है और स्मृति जैसा खतरनाक भी और कुछ नहीं है। स्मृति दुःख की करो तो दुःखद प्रसंग न होते हुए भी आदमी दुःखी हो जाता है। स्मृति विकार की करो तो स्त्री न होते हुए, विकारी चीज न होते हुए भी आदमी विकारों की चपेट में आ जाता है। गुलाब की शय्या बनी हो, इत्र छँटे हों, अप्सरा आ के कंठ लगे, कामदेव का सब वातावरण हो लेकिन हमारी स्मृति परमात्मा में लगी है तो विकार कुछ नहीं कर सकता।

हम भीड़ भड़ाके में हों, नगाड़े बजते हों लेकिन हमारी वृत्ति किसी और चिंतन में लगी है तो हमको उसका ख्याल नहीं होता। हम मंदिर में बैठे हैं, आरती हो रही है, अगरबत्ती जल रही है, धूप-दीप से भक्त लोग भगवान की आराधना कर रहे हैं लेकिन हमारी स्मृति किसी गंदी जगह पर है तो हम वही हैं, मंदिर में नहीं ! हम अच्छे, पवित्र वातावरण में हैं लेकिन स्मृति मन में द्वेष की हो रही है, राग की हो रही है, शंका की हो रही है तो वातावरण में शांति के स्पंदन होते हुए भी हम उसका अनुभव नहीं कर सकते हैं, उसकी गरिमा को नहीं छू सकते हैं। हमारी स्मृति अगर शंकाशील है, इधर-उधर की है अथवा हमारे मन में कोई सांसारिक समस्या है तो ‘हमको बाबाजी कब बुलायें, हमसे कब बात करें ?’ – ऐसी स्मृति बनी रहेगी और सत्संग ग्रहण नहीं हो पायेगा।

स्मृति में बड़ी शक्ति है। स्मृति एक ऐसी धारा है, जो रसोईघर में भी जाती है, पूजागृह में भी जाती है, स्नानागार में भी जाती है और शिवालय में, शिवाभिषेक में भी जाती है।

जीवन एक बाढ़ की धारा है। जीवन तो पसार हो रहा है लेकिन स्मृति के प्रवाह को खींचकर उचित जगह पर ले जायें। जैसे हिमालय से गंगाजल आता है, सागर की तरफ बहता है। जो पानी खारा होने को जा रहा है, नहरें बनाकर उससे ही गन्ना पैदा किया जाता है। वही पानी कई जगहों पर औषधियों के काम आता है और उसी की एक शाखा तीर्थों में जाती है और लोग ‘गंगे हर’ करके आनन्दित होते हैं, पूजा करते हैं। ऐसे ही हमारी स्मृतियाँ हमारे जीवन का लक्ष्य बन जाती है, इसलिए स्मृति जैसी-तैसी बात में लगाना नहीं, जैसी तैसी बातों को स्मृति में भरकर बेचैन होना नहीं। कई लोग थोड़ा-सा दुःख होता है लेकिन उस दुःख का सुमिरन करके अपने को ज्यादा दुःखी बना लेते हैं।

सुमिरन कर-करके घबरा जाना, सुमिरन कर-करके दुःखी हो जाना यह भी सुमिरन के अधीन है और सुमिरन करके दुःखी न होन, सुमिरन करके उचित मार्ग निकाल के निश्चिंत होना यह भी सुमिरन के अधीन है। जहाँ से स्मरण होता है, उस परमात्म-स्वभाव को ‘मैं’ रूप में जानना, यह साक्षात्कार है।

सुमिरन ऐसा कीजिये खरे निशाने चोट।

मन ईश्वर में लीन हो हले न जिह्वा ओठ।।

विश्रांति योग…..स्मरण करते-करते स्मरण के मूल में पहुँच गये। शिवोऽहम्….चैतन्योऽहम्…..विश्रान्ति….. यह भी एक अवस्था है। अवस्था स्थिर नहीं है। उस परमेश्वर में छोटी मोटी अवस्थाएँ और यह ऊँची अवस्था शिवोऽहम् वाली अध्यस्थ हैं। लेकिन परमात्म-तत्त्व तो सबका अधिष्ठान, आधार है, उसको ‘मैं’ रूप में जानने वाले कितने महान आत्मा, कितने परम पुरुष दिव्य हैं !

ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर, कार्य रहे न शेष।

मोह कभी न ठग सके, इच्छा नहीं लवलेश।।

पूर्ण गुरु कृपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान।

आसुमल से हो गये, साँईं आसाराम।।

अवस्था का प्रकाशक सत्य है। सत्य की प्रकाशक अवस्था नहीं है।

‘मुझे घाव हो गया। अरे ! मैं मर गया। अब मेरा क्या होगा ? हाय रे ! घाव हो गया।’ – ऐसा सुमिरन करके मैं घाव के दुःख को सहयोग दूँ, यह भी स्मृति से होगा और उसी वृत्ति से सोचूँ कि ‘इसको रोगप्रतिकारक दवाओं से धो लेना चाहिए, कोई मलहम लगा देना चाहिये’, यह भी तो स्मृति से होता है। तो इस प्रकार स्मृति का उपयोग तो कर लिया लेकिन फिर इस स्मृति को और ऊँची बनायें कि ‘शरीर में घाव हुआ है, इस शरीर को रोगप्रतिकारक दवाएँ लग रही हैं लेकिन जिस वक्त शरीर में घाव हुआ था उस वक्त भी चेतना मेरे परमात्मा की ही थी, इस वक्त उसको देखने वाला भी वही है, रोग मिट जायेगा तब भी देखने वाला वही मेरा परमात्मा सत्य है। वही मैं हूँ। मेरी सत्ता से स्मृतियाँ होती हैं। हम हैं अपने आप, हर परिस्थिति और स्मृति के बाप ! जिसकी सत्ता से स्मृतियाँ होती हैं, वही मैं साक्षी सत्य हूँ। हरि ॐ तत् सत्, और सब गपशप’ तो मैंने स्मृति का एकदम ऊँचा उपयोग किया।

समझो मैं दुकान पर गया, ऑफिस में गया दिलचस्पी से धंधा-व्यवहार किया, ऑफिस का काम किया लेकिन दिलचस्पी से काम करते समय भी अगर मेरी स्मृति परमात्मा के प्रति है तो मैं धंधा-व्यवहार करते हुए भी परमात्मा की भक्ति कर ली। समझ लो मैं महिला हूँ, घर की रसोई बनाती हूँ। रसोई बनाते-बनाते अगर मेरी स्मृति परमात्मा के प्रति है तो मैंने रोटी बनाते हुए भी परमात्मा की भक्ति कर ली। यदि मैं घंटी बजा रहा हूँ और मुझे स्मृति किसी विकार की हो तो मैंने पूजा नहीं की, मैंने विकार की स्मृति को महत्त्व दिया।

स्मृति का बहुत मूल्य है। तुम बाहर से क्या करते हो, उसकी कोई ज्यादा कीमत नहीं है। तुम्हारी स्मृति का तुम कैसा उपयोग करते हो, तुम्हारे चिंतन का तुम कैसा उपयोग करते हो, उसी पर तुम्हारा भविष्य बन जाता है। ऐसा नहीं कि कोई देवी-देवता कहीं बैठकर तुम्हारा भाग्य बना रहा है, तुम्हारी जैसी-जैसी स्मृतियाँ अंदर पड़ी हैं, जैसे-जैसे संस्कार पड़े हैं, जैसी-जैसी मान्यताएँ पड़ी हैं अथवा जैसी तुम बनाते हो, जिनको तुम महत्त्व देते हो ऐसा ही तुम्हारा भविष्य बनता है। जैसे कैसेट चलती है तो जहाँ जो टोन, जहाँ जो शब्द, उपदेश, तरंगे उसने रिकॉर्ड कर रखी है, वह जगह जब आती है तो वह ध्वनि हम सुनते हैं, ऐसे ही हमारी स्मृति है। उसमें अनन्त जन्मों के संस्कार पड़े हैं, वातावरण के संस्कार, माता-पिता, नाना-नानी, दादा-दादी के संस्कार ये सब स्मृति में जुड़ जाते हैं, फिर उसके अनुसार हम जगत को देखने लग जाते हैं। अब बहादुरी यह है कि इन सबको नगण्य मानकर नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्ध्या….. शरीर को ‘मैं’ संस्कारों को ‘मेरा’ और स्वयं को संस्कारों की कठपुतली न मानकर संस्कारों को नष्ट करके जैसे अर्जुन ने स्मृति जगायी, ऐसे ही अपने स्वरूप में जागो।

घर से निकले, आश्रम तक पहुँचे। आँखों ने तो बहुत लोग देखे होंगे लेकिन किसी की स्मृति नहीं, जिससे तुम्हारा परिचय था उसकी स्मृति रही कि ‘फलाना भाई मिला था’ और जिससे तुम्हारा द्वेष था वह भी स्मृति में रह गया कि ‘अरे ! अपशकुनी का मुँह देखा तो मजा नहीं आया।’ ये दोनों स्मृति में रह गये, बाकी के कोई गहरे नहीं रहे।

आपने 40 साल, 30 साल, 20 साल में जो कुछ कमाया उसे छोड़कर दरिद्र होना है तो एक क्षण में हो सकते हैं। ऐसे ही कई जन्मों की वृत्तियाँ, कई जन्मों की स्मृतियाँ, कई जन्मों के संस्कार आप सँभालकर रखेंगे तो कई जन्म और मिलेंगे। लेकिन मुक्त होना हो तो सब वृत्तियाँ परमात्मा को समर्पित करके जो परमात्मा वृत्तियों का उदगम्-स्थान, ‘साक्षी’ है, उस साक्षीभाव में आ जाओ… बेड़ा पार हो जाय। बड़ा आसान है। ईश्वर हमसे दूर होना चाहे, हमसे अलग होना चाहे तो उस के बस की बात नहीं है लेकिन हम लोगों का दुर्भाग्य है कि हमारी स्मृति संसार में फैल गयी। हमारी स्मृति की धारा देह और देह की अनुकूलता में चली गयी और जहाँ से स्मृति, वृत्ति प्रकट होती है, वहाँ हम अंतर्मुख नहीं होते इसीलिए हमको दुःख भोगने पड़ते हैं।

अगर हमारे पास परमात्मा के लिए थोड़ी भी तड़प है, जिज्ञासा है और संसार की नश्वरता का ज्ञान है तो हम उसी स्मृति को परमात्मा में लगाकर जीवन्मुक्त भी हो सकते हैं।

‘महाभारत’ में आता है कि

यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात्।

विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवै प्रभविष्णवे।।

‘जिसके स्मरणमात्र से मनुष्य आवागमनरूप बंधन से छूट जाता है, सबको उत्पन्न करने वाले उस परम प्रभु श्रीविष्णु (जो सबमें बस रहा है, सबरूप है) को बार बार नमस्कार है।’

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2011, पृष्ठ संख्या 4,5,6 अंक 219

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हवाई जहाज की यात्राः तत्त्वज्ञान


(पूज्य बापू जी की पावन अमृतवाणी)

उद्धव ने देखा कि अब सोने की द्वारिका के साथ पूरा यदुवंश यानी भगवान का पूरा परिवार उनकी आँखों के सामने खत्म हो रहा है, फिर भी श्रीकृष्ण को कोई शोक नहीं, आसक्ति नहीं। वे आत्मा में निष्ठ हैं, तत्त्व में खड़े हैं। वे प्रपंच को सत्य नहीं मानते। सब प्रपंच मिथ्या है।

यह मिथ्या प्रपंच का विसर्जन हो रहा था। उद्धव ने देखा कि भगवान अपनी माया समेट रहे हैं। अब वे स्वधाम जाने की तैयारी में हैं। उन्होंने कहाः “प्रभु ! दया करो। मुझे साथ में ले चलो।”

श्रीकृष्ण ने कहाः “उद्धव ! साथ में कोई आया नहीं और साथ में कोई जायेगा नहीं।

यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः।

नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम्।।

(श्रीमद् भागवतः 11.7.7)

मन से, वाणी से, आँख से, कान से जो कुछ अनुभव में आता है वह सब नश्वर है, मनोमय है, मायामात्र है – ऐसा समझ लो। हे उद्धव ! मैं तुझे तत्त्वज्ञान सुनाता हूँ। वह सुनकर तू बदरिकाश्रम चला जा, एकांत में बैठ जा। ‘मैं आत्मा हूँ तो कैसा हूँ ?’ यह खोज। ‘मैं कौन हूँ….? मैं कौन हूँ ?’ यह अपने आपको गहराई से पूछ।”

बच्चा ‘यह क्या है ? वह क्या है ? यह कौन है ?’ ऐसा पूछता है लेकिन ‘मैं कौन हूँ ?’ ऐसा संसार के किसी बच्चे ने नहीं पूछा। वह आत्मज्ञान का खजाना बंद का बंद रह गया।

अब तुम अपने-आपसे पूछोः ‘मैं कौन हूँ ?’ खाओ, पियो, चलो, घूमों फिर पूछोः ‘मैं कौन हूँ?’

‘मैं रमणलाल हूँ।’

यह तो तुम्हारी देह का नाम है। तुम कौन हो ? अपने को पूछा करो। जितनी गहराई से पूछोगे, उतना दिव्य अनुभव होने लगेगा। एकांत में, शांत वातावरण में बैठकर ऐसा पूछो…. ऐसा पूछो कि बस, पूछना ही हो जाओ। एक दिन, दो दिन, दस दिन में यह काम नहीं होगा। खूब अभ्यास करोगे तब ‘मैं कौन हूँ?’ यह प्रगट होने लगेगा और मन की चंचलता मिटने लगेगी, बुद्धि के विकार नष्ट होने लगेंगे तथा शरीर का तूफान शांत होने लगेगा। यदि ईमानदारी से साधना करने लगो न, तो छः महीने में वहाँ पहुँच जाओगे, जहाँ छः साल बैलगाड़ी चले और छः घण्टे हवाई जहाज उड़े तो कौन आगे पहुँचेगा ? तत्त्वज्ञान हवाई जहाज की यात्रा है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- “हे उद्धव ! तू बदरिकाश्रम चला जा। कोई किसी का नहीं है। कोई किसी के साथ आया नहीं, कोई किसी के साथ जायेगा नहीं। तू बोलता है कि मैं तुम्हारे साथ चलूँ लेकिन तू मेरे साथ आया नहीं, न मैं तेरे साथ आया हूँ। सब अकेले-अकेले जायेंगे। मुझसे तू तत्त्वज्ञान सुन ले। फिर मुझसे तू ऐसा मिलेगा कि बिछुड़ने का दुर्भाग्य ही नहीं आयेगा।”

ऐसे तो श्रीकृष्ण उद्धव के सिर पर हाथ रख देतेः ‘फुर्रर्र…. ! तू मुक्त हो गया !’ नहीं, श्रीकृष्ण ने तत्त्वज्ञान का उपदेश दिया और कहा कि ‘जो उपदेश दिया है, उसका बराबर अनुभव कर !’

पशु होते हैं न, वे पहले घास ऐसे ही खाते हैं, फिर बैठे-बैठे जुगाली करते हैं। ऐसे ही तुम भी कथा-सत्संग सुन लो, फिर एकांत में जाकर उसका चिंतन-मनन करो।

जितनी देर सुनते हो उससे दस गुना मनन करना चाहिए। मनन से दस गुना निदिध्यासन करना चाहिए। हम भी डीसा में अपने-आपमें डूबे रहते थे। पूज्यपाद गुरुदेव के आशीर्वाद के बाद तुरंत निकल पड़ते समाज में हुश हो…. हुश हो…. तो काम नहीं बनता। सुनो और एकांत में बैठकर जमाओ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2011, पृष्ठ संख्या 24,26, अंक 219

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