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Tatva Gyan

वहम का भूत


(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

आपके चेतन में, आपकी कल्पनाओं में बड़ी अद्भुत शक्ति है । आप जैसी कल्पना करते हैं ऐसा प्रतीत होता है, जैसा आप सोचते हैं वैसा दिखने लगता है । शरीर अनित्य है, मन परिवर्तनशील है और आप नित्य हैं लेकिन जब आप शरीर की उपाधि अपने में आरोपित कर देते हैं और ‘मैं बीमार हूँ, मैं कमजोर हूँ…. मुझे किसी ने कुछ कर दिया है….’ यह स्वीकार कर लेते हैं, तो किसी ने कुछ किया हो या न किया हो लेकिन आपने मान लिया तो फिर कोई कितना समझाये लेकिन आपकी मान्यता के कारण नब्बे प्रतिशत वही भास होगा जो आपने मान लिया है । ‘मेरे को दुश्मन ने कुछ कर दिया है’, ऐसा सोचते हैं तो मन उसी प्रकार का दुःख बना लेता है । यह वहम की जो मुसीबत है न, वह किसी वैद्य से, किसी डॉक्टर से तो क्या, किसी गुरु से भी नहीं निकलती !

अपना वास्तविक ‘मैं’ नित्य है, विकार अनित्य है लेकिन मन में यह घुस गया है कि ‘मैं विकारी हूँ’ तो अनित्य विकार भी नित्य जैसे लगते हैं । गहराई में अगर कोई वहम घुस जाता है तो उसको निकालना बड़ा कठिन हो जाता है । बीमारी तो निकाल सकते हैं क्योंकि बीमारी शरीर में है लेकिन वहम मन में होता है । जब तक मन का वहम स्वयं नहीं निकालते तब तक हकीम, डॉक्टर, गुरु मिलकर भी हमारा वहम नहीं निकाल सकते, हमें ठीक नहीं कर सकते । अपनी मान्यता आप नहीं छोड़ेंगे तब तक कोई नहीं छुड़ा सकता । जब तक आप नहीं सोचते हैं कि यह तो ‘भाई ! शरीर का है…  मन का है… चलता है’, तब तक आपका वहम कोई नहीं निकाल सकता है । आपने वहम छोड़ दिया तो बस दूर हो गया !

ऐसे ही दोष तो निर्जीव हैं लेकिन ‘मेरे में दोष हैं’ ऐसा मान लिया तो उनको बल दे दिया, फिर दोष मिटाने लगेंगे तो और मजबूत होंगे, दोष के अनुसार करेंगे तो भी आप दोषी हो जायेंगे, जब उनकी उपेक्षा करेंगे तो दोष हैं ही नहीं !

जैसे कुशवारी आप जाला बना के उसी में फँस मरती है, ऐस ही कभी-कभी भोले आदमी अपनी ही कल्पनाओं के जाल में बुरी तरह फँस जाते हैं । जब तक अपनी कल्पना से आप कल्पना नहीं काटते, तब तक दूसरा कोई काट भी नहीं सकता, आपने अपने-आप में जो विचार भर दिया है, वह आप नहीं छोड़ेंगे तो दूसरा कोई भी छुड़ा नहीं सकता । जैसे कन्या ने मान लिया कि मैंने फेरे फिर लिये, मैं फलाने की पत्नी हूँ ।’ अब लाख उपाय करो उसे समझाने के कि तू फलाने की पत्नी नहीं है, तो भी बोलेगीः ‘क्या बोलते हो !’ मन में घुस गया कि ‘मैं फलाने की पत्नी हूँ, मैं फलाने का पति हूँ, मैं फलानि जाति का हूँ….’ मन में घुसेड़ दिया न ! वास्तव में देखो तो जात-पात कहाँ है ? कल्पना ही तो है ! तो हमने अपने में जो भर दिया, वह हम नहीं हटाते तब तक हटता नहीं ।

जैसे आसुमल, भूरो, भगवान जी, भगवान, प्रभु जी, आसाराम, बापू जी…. जैसा-जैसा लोगों ने बोला, हम भी बोलेः ठीक है । तो कोई इस नाम के लिए निंदो, चाहे वंदो… कुछ भी नहीं, सब काल्पनिक है, तो हमें तो मौज है लेकिन मैं मान लूँ कि ‘मेरा नाम ही आसाराम है, मैं ही आसाराम हूँ, मैं ही बापू जी हूँ….’ फिर उसकी वाहवाही में तो फूलूँ और निंदा में सिकुड़के दुःखी होऊँ । नहीं-नहीं, गुरु जी ने मुझे इस वहम से पार कर दिया । मुझे पता है कि यह तो रखा हुआ नाम है, थोपा हुआ है । ऐसे ज्ञान से ही कल्पनाएँ कटती हैं ।

दुःख की, सुख की कल्पनाएँ हो-हो के बदल जाती हैं, हम नित्य हैं । नित्य को अनित्य क्या करेगा ? अमर को मरने वाला क्या करेगा ? फिर भी डर-डर के परेशान हो रहे हैं- ‘मेरे से यह गलती हो गयी, मेरे से यह हो गया, मेरे से वह हो गया, मेरे को नींद नहीं आती….’ नहीं आये तो नहीं आये । ‘नींद नहीं आती, नहीं आती….’ थोड़ी नींद कम आयी तो उतनी देर भगवान का नाम ले । कल्पनाओं का जाल बुनकर अपने को फँसाओ मत, सताओ मत, नींद आने का मंत्र जान लो बस ! और लोगों की कल्पानाएँ – लोग यह कहेंगे, वह कहेंगे…. उनकी कल्पनाओं में भी उलझो मत । सब बीत रहा है, बीतता जायेगा । संसार-स्वप्न को बीतने दो, अपने को ज्ञानस्वभाव में, प्रभुप्रेम स्वभाव में जगाओ । क्यों, जगाओगे न ! शाबाश वीर, शाबाश ! हिम्मत करो । संसार में पच मरने के लिए तुम्हारा जन्म नहीं हुआ, संसार के पिठ्ठू बनने तुम नहीं आये हो । शरीर की मौत के बाद भी जिसका  बाल बाँका नहीं होता, तुम वह ज्ञानस्वरूप, चैतन्यस्वरूप अमर आत्मा हो । अपने अमर स्वभाव को जानो ।

यह शरीर है, कभी कमजोरी, कभी गर्मी, कभी कुछ, कभी कुछ…. – यह सब तो होता रहता है, दिन भर उसी का चिंतन कर-करके मारे जा रहे हैं । जो बीमारी का चिंतन करता है, दुःख का चिंतन करता है, शत्रु का चिंतन करता है….. वह उसको बल देता है । आप तो निश्चिंत नारायण में मस्त रहो ।

चिंता से चतुराई घटे, घटे रूप और ज्ञान ।

चिंता बड़ी अभागिनी, चिंता चिता समान ।

तुलसी भरोसे राम के, निश्चिंत होई सोय ।

अनहोनी होनी नहीं, होनी होय सो होय ।।

इस समझ को पक्का कर लो । जो होनी हो सो हो । फिकर फेंक कुएँ में, जो होगा देखा जायेगा ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2009, पृष्ठ संख्या 21,22 अंक 203

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योगविद्या से भी ऊँची है आत्मविद्या


योगविद्या में मन का निरोध होता है, एकाग्रता से सामर्थ्य आता है – पूज्य बापू जी

परंतु ब्रह्मविद्या में मन बाधित हो जाता है और तत्त्व का बोध हो जाता है ।

योग में चित्तवृत्ति का निरोध हो जाता है और व्यक्ति समाधिस्थ हो जाता है । समाधि से सामर्थ्य आता है परंतु जीवत्व बाकी रह जाता है । ‘पातंजल योगदर्शन’ और कुंडलिनी योग’ के अनुसार अभ्यास करने पर मनोजय हो जाता है, समाधि हो जाती है, सामर्थ्य आ जाता है परंतु जब साधक समाधि से उठता है तो उसे जगत सच्चा लगता है ।

योगविद्या से मन का निरोध होता है जबकि आत्मविद्या से मन का बाध हो जाता है ।

मन के बाध और निरोध में क्या फर्क है ?

आपने रस्सी में साँप देखा और आपको भय लगा । किसी ने आपको आश्वासन दिया और वीरता की अच्छी बातें कहीं । आपने सोचा कि ‘यह साँप मेरा क्या बिगाड़ेगा ?’ और आप खाने-पीने में, सुख-सुविधा के साधनों में मस्त हो गये । इस प्रकार रस्सी में दिखने वाले साँप से आपका भय गायब हो गया । परंतु फिर जब रस्सी में दिखने वाले साँप की तरफ गये तो हृदय की धड़कनें बढ़ गयीं…. अर्थात् आप कुछ समय के लिए साँप की सत्यता भूल गये, फिर आपने देखा तो वही रस्सी साँप होकर भासने लगी । यह है मन का निरोध होना ।

अगर टार्च लेकर आपने रस्सी को देख लिया तो फिर रस्सी दिखेगी तो साँप के आकार की, परंतु साँप आपको सच्चा नहीं लगेगा क्योंकि वह बाधित हो गया । यह है मन का बाध होना ।

ऐसे ही आत्मविद्या संसाररूपी सर्प को बाधित कर देती है और योगविद्या मन का निरोध कर देती है तो संसाररूपी सर्प नहीं दिखता । योगविद्या के साथ आत्मविद्या नहीं है तो योगविद्यावाले का पतन हो सकता है । इसलिए गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हैः योगभ्रष्टोऽभिजायते । पतन से तात्पर्य संसारी व्यक्ति की तरह पतन से नहीं, संसारी की जो स्थिति है उससे तो योगविद्यावाले बहुत ऊँचे होते हैं परंतु आत्मविद्या की ऊचाई के आगे वे बच्चे हैं ।

जब तक आत्मविद्या को ठीक से नहीं समझते, तब तक धन की, विद्या की, सत्ता की कोई-न-कोई माँग बनी रहती है और तुच्छ चीजों का, प्रकृति के गुण-दोषों का आरोप अपने में करके हम लोग एक दायरा बना लेते हैं और उस दायरे से बाहर नहीं निकल पाते । ‘मैं पटेल’, ‘मैं सिंधी’, ‘मैं गुजराती’ – इसी दायरे में उलझकर रह जाते हैं । लोग भले कहें और हम भी ऊपर-ऊपर से ‘हाँ’ कहें परंतु भीतर से समझना चाहिए कि ‘हम गुजराती भी नहीं, पटेल भी नहीं, सिंधी भी नहीं, हम तो हम ही हैं । जो उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय में एकरस साक्षी है, वह परम सत्ता और हम एक हैं ।’

जिस सत्ता से यह तन पैदा हुआ, यह मन उत्पन्न हुआ, बुद्धि व अहं उत्पन्न हुए और बदलते रहते हैं, जो इन सबको सत्ता-स्फूर्ति देता है, वह चैतन्य आत्मा हम हैं । उसी को तत्त्वरूप से जानना यह आत्मविद्या का लक्ष्य है ।

ऋद्धि-सिद्धि का सामर्थ्य, सफलता आदि सब प्रकृति के अंतर्गत होते हैं । जिन्होंने पानी को घी बना दिया ऐसे योगियों का नाम मैंने सुना है । बीमार को ठीक कर दिया…. मुर्दे को जिंदा कर दिया… ये सब ठीक हैं, परंतु हैं सब प्रकृति के अंतर्गत । तत्त्वज्ञान इससे बहुत ऊँची चीज है । तत्त्वज्ञान पाने के लिए चरित्रवान की जिज्ञासा और गुरु की कृपा हो जाय बस ! हो गया बेड़ा पार ! जनक की जिज्ञासा थी और आत्मज्ञानी अष्टावक्र की कृपा हुई, परीक्षित की जिज्ञासा थी और आत्मज्ञानी शुकदेव जी की कृपा हुई । यह सर्वोपरि पद है । आत्मज्ञान का धन अष्टसिद्धि, नवनिधि के धन से भी ऊँचा है । यह परम धन है । श्रीकृष्ण भी इसकी प्रशंसा करते हैं । रमण महर्षि ने, अष्टावक्र मुनि ने इसी परम पद को पाया । क्या तुम इसे नहीं पाओगे ? कब तक परेशानियों में पचते रहोगे भैया !

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।

‘उठो, जागो ! आत्मज्ञानी गुरु को खोजो और श्रेष्ठ उस आत्मज्ञान को पाओ ।’ (कठोपनिषदः 1.3.14)

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ।।

‘उस ज्ञान को तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ । उनको भली भाँति दण्डवत् प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म-तत्त्व को भली-भाँति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश करेंगे ।’ (गीताः 4.34)

योगविद्या में मन का निरोध होता है, एकाग्रता से सामर्थ्य आता है परंतु ब्रह्मविद्या में मन बाधित हो जाता है और आत्मतत्त्व का बोध हो जाता है ।

मन आत्मा में लय हो जाय यह एक बात है और मन बाधित हो जाय यह दूसरी बात है । जैसे विश्वासपात्र व्यक्ति ने सर्प से निश्चिंत कर दिया तो आप निश्चिंत हो गये, परंतु विश्वासपात्र व्यक्ति की जगह कोई दूसरा आकर कहने लगे कि ‘भाई ! उन्होंने भले कह दिया कि साँप नहीं काटेगा परंतु आप सँभलना….’ तो उसकी सत्यता मौजूद रहेगी । ऐसे ही योगविद्या में कितने भी ऊँचे चले जाओ तो भी योगी को थोड़े-बहुत पतन का भय बना रहता है, परंतु ज्ञानी को कोई भय नहीं क्योंकि ज्ञानी के लिए जगत बाधित हो जाता है । जैसे टॉर्च से रस्सी को रस्सी जानकर सर्प की सत्यता चली जाती है, ऐसे ही आत्मज्ञानी के लिए जगतरूपी सर्प बाधित हो जाता है । ऐसा ज्ञानवान जगत से निर्लेप हो जाता है । कर्तृत्व-भोक्तृत्व के बंधन से मुक्त, जीवन्मुक्त अर्थात् जीते-जी मुक्त हो जाता है । इसके आगे बाकी मुक्तियाँ छोटी हो जाती है ।

जैसे सूर्य अपने स्थान पर रहकर जगत को अपने किरणरूपी हाथ से छू लेता है फिर भी निर्लिप्त रहता है । सूर्य जब पेड़ पौधों को छूता है और उसी की सत्ता से सब जीते है, फलते-फूलते हैं परंतु वे मिट जायें, नष्ट हो जायें तो भी सूर्यनारायण का बाल तक बाँका नहीं होता ।

ऐसे सूर्यनारायण में भी जिसकी सत्ता है उस सत्ता का कुछ नहीं बिगड़ता । वही सत्ता आँखों के द्वार देखती है, कानों के द्वारा सुनती है, जिह्वा के द्वारा बोलती है, मन के द्वारा सोचती है, बुद्धि के द्वारा निर्णय लेती है, उसी से सत्ता पाकर अहं ‘मैं-मैं’ करता है । वही सत्तास्वरूप ‘मैं’ हूँ, ऐसा बोध हो जाना यह आत्मविद्या का उद्देश्य है ।

जीव का यह स्वभाव है कि वह जिस शरीर में आता है उसी को मैं मानकर अपना आयुष्य गिनता है । वास्तव में देखा जाय तो उसने हजारों शरीरों में कई-कई बार जन्म लिये और जिस-जिस शरीर में जन्म लिया उसी को ‘मैं’ मान लिया परंतु वह वास्तव में ‘मैं’ नहीं है । अगर वह शरीर ‘मैं’ होता तो शरीर चला जाने के बाद ‘मैं’ भी चला जाता…. परन्तु ऐसा नहीं है ।

प्राकृतिक गुण-दोष और पदार्थ आने-जाने वाले हैं, आपका वास्तविक स्वरूप हीं आता-जाता नहीं है – ऐसा ज्ञान हो जाना आत्मविद्या का लक्ष्य है ।

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।

‘निश्चय रूप से इस संसार में ज्ञान के समान कोई पवित्र वस्तु नहीं है ।’

यदि कोई इस आत्मविद्या के विचार में नित्य तल्लीन रहे तो उसकी कामनाएँ, आकर्षण आदि दूर हो जाते हैं । कामनाएँ दूर होते ही काम्य पदार्थ उसकी शरण खोजने आते हैं । फिर उसे यश की इच्छा नहीं होगी तब भी यश उसके पीछे पड़ेगा, उसे धन की इच्छा नहीं होगी तब भी धन उसकी गुलामी करेगा, भोग की इच्छा नहीं होगी तब भी भोग उसके इर्दगिर्द मँडरायेंगे । कोई कहे कि ‘महाराज ! हमें भी तो यश, धन, भोग की कोई इच्छा नहीं है फिर भी यश तो नहीं मिला ।’ अरे ! ‘इच्छा नहीं है कहकर भी यश तो चाहते हैं, गहराई में तो इच्छा है ! भीतर से इच्छा हटनी चाहिए । गहराई से इच्छा हटते ही इच्छित पदार्थ आपके इर्दगिर्द मँडराने लगते हैं – यह प्रकृति का नियम है ।

जिसके चित्त में कोई इच्छा नहीं होती, उसके चित्त में राग-द्वेष भी कैसे हो सकता है ? जिन्होंने अपने हृदय में ठीक से साक्षी होकर अपने स्वरूप को जान लिया, उनको सदैव-सर्वत्र अपना-आपा ही नज़र आता है । ऐसे महापुरुषों के चित्त में राग-द्वेष कहाँ ?

प्रारम्भ में राग-द्वेष से बचा जाता है, बाद में देश काल की माया से भी बचा जाता है । अमुक देश में, अमुक काल में प्रीति करना – यह भी माया है । यह माया भी आत्मविद्या की प्राप्ति के बाद छूट जाती है ।

योगविद्या में तो राग-द्वेष से बचने पर प्रवेश मिल जाता है और पहुँच भी हो जाती है परंतु आत्मविद्या तो राग-द्वेष से पार करके देश-काल से भी पार कर देती है और परब्रह्म-परमात्मस्वरूप में जगा देती है । ऐसी आत्मविद्या की महिमा है !

स्नातं तेन सर्व तीर्थं दातं तेन सर्व दानम् ।

कृतं तेन सर्व यज्ञं येन क्षणं मनः ब्रह्मविचारे स्थिरं कृतम् ।।

‘जिसने मन को एक क्षण भी ब्रह्मज्ञान, ब्रह्मविचार में लगाया, उसने सारे तीर्थों में स्नान कर लिया, सारे दान कर दिये तथा अश्वमेध आदि सारे यज्ञ कर डाले ।’

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2009, पृष्ठ संख्या 3-5 अंक 200

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सदोष और निर्दोष सुख


(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

जिन-जिन लोगों ने पूर्व समय में मनुष्य जन्म पाकर समय, शक्ति का सदुपयोग नहीं किया है वे ही अभी वृक्ष, कीट-पतंग आदि योनियों में दुःखी, परेशान होते दिखायी देते हैं ।

भगवान ने हमें दुःखी बनाने के लिए थोड़े ही पैदा किया था ? शुद्ध सुख में हमारी गति हो जाय इसीलिए तो मनुष्य जन्म दिया था और हमने उसका दुरुपयोग कर दिया, निर्दोष सुख न लिया । मनुष्य जितना ज्यादा सदोष (दोषमुक्त) सुख लेता है, उसे फिर उतना ही ज्यादा हलकी योनियों में जाना पड़ता है ।

हम सदोष सुख लेते-लेते इतने दोषी हो जाते हैं कि फिर चौरासी लाख योनियों में जन्म लेना पड़ता है । जो बहुत विलासी होता है वह पेड़ बन जाता है, फिर कुल्हाड़े की मार, पक्षियों की चोंचें, आँधी-तूफान आदि सहता है और फरियाद करने की, कुछ कहने की क्षमता नहीं रहती । पशु बनो, जंतु बनो… क्यों ? क्योंकि मनुष्य जन्म मिला था जिस निर्दोष सुख को लेने के लिए, उस सुख के लिए तो कुछ किया नहीं, संदोष सुख में जीवन गँवा दिया ।

ऐसे लोग जिनका ज्यादा विलासी-विकारी जीवन नहीं है वे दुबारा मनुष्य बन जाते हैं और यदि वे थोड़ा निर्दोष सुख लेने की तरफ भक्ति की तरफ बढ़ते हैं तो देवता बन जाते हैं । लेकिन यदि जीते जी कोई आत्मवेत्ता महापुरुष मिल गये और शुद्ध सुख, निर्दोष सुख लिया तो निर्दोष सुख लेते-लेते स्वयं निर्दोष हो जायेगा, फिर चौरासी लाख जन्मों में मिलने वाली पीड़ा सब माफ हो जाती है ! निर्दोष ब्रह्म हो जाता है । इसलिए निर्दोष सुख लेना चाहिए । निर्दोष सुख तो अपना आपा है । निर्दोष सुख लेने वाला स्वयं भी दुःखी नहीं होता और दूसरे का भी शोषण नहीं करता । सदोष सुख लेने  वाला स्वयं भी पीड़ित होता है और दूसरों को भी पीड़ा पहुँचाता है ।

साधू ऐसा चाहिए दुखे दुखावे नाहिं ।

फूल पात तोड़े नहीं रहे बगीचे माँहिं ।।

संसार रूपी बगीचे में रहे लेकिन दूसरे को दुःख नहीं दे और खुद भी दुःखी न हो । भोगी आदमी स्वयं भी दुःखी होता है, औरों को भी दुःख देता है, औरों से भी ठगी-बेईमानी करता है ।

बोलेः ‘बच्चों के लिए, पत्नी-परिवार के लिए इतना तो करना पड़ता है ।’

अरे ! ये सब चीजें साथ में चलेंगी नहीं लेकिन इनको प्राप्त करने के लिए जो कूड़-कपट, पाप किया वे सब साथ में चलेंगे । जिस शरीर की सुविधा के लिए इतने-इतने पापकर्म किये, वह शरीर तो इधर ही जला देना है लेकिन गलत कर्म करके जो मन मलिन बनाया वह तो साथ में चलेगा । इस शरीर को सुखी करने के लिए, ऐश कराने के लिए क्या-क्या किया – दारू पिया, मांस खाया, झूठ बोले…. । यह शरीर तो एक दिन जला देना है । तो जिसको जला देना है उसके लिए सारी जिंदगी दोषयुक्त कर्म किये और मर जाने के बाद जो अंतःकरण साथ में चलेगा वह भी दोषी हो गया । जड़ शरीर की तरफ लगाव ज्यादा हो गया तो फिर वृक्ष, हाथी, भैंसा आदि की देह मिलती रहेगी । जड़ शरीर के साथ जितनी प्रीति, उतना फिर अपना अंतःकरण जड़ीभाव को प्राप्त होता है । निर्दोष सुख, आत्मा की तरफ जितनी प्रीति, उतना अंतःकरण आत्मामय हो जाता है । जैसे पानी न, दूध में मिलाओ तो दूध का रंग और शराब में मिलाओ तो शराब का रंग पकड़ लेता है, ऐसे ही मन को देह के साथ मिलाओ तो देहमय हो जायेगा । पटेल, सिंधी, गुजराती जिस भाव के साथ मिलाओ, वैसा अपने-आपको मानने लग जायेगा । ऊपर-ऊपर से मानने लगे और अंदर से जाने कि ‘यह सब कल्पना है, वास्तव में चैतन्य आत्मा हूँ’ तो कोई हरकत नहीं । लेकिन अब उसी मन को ब्रह्म में मिला दो जिससे वह ब्रह्म हो जाय । निर्दोष सुख लेने से मनुष्य स्वयं निहाल हो जाता है और जो उसके संपर्क में आते हैं उनका भी बेड़ा पार हो जाता है । जैसे भगवान राम जी थे, गुरु की सेवा की, गुरु की आज्ञा में रहे, आत्मविचार किया, ‘स्व’ के सच्चिदानंद स्वभाव को जाना तो कैसा जीवन बना लिया ! निर्दोष सुख  लिया तो स्वयं सुखी हुए और उनका सुमिरन करके अभी हजारों लोगों को शांति मिलती है । जबकि रावण ने सत्ता का, पद, विलास का सदोष सुख लिया तो अभी हर वर्ष दे दियासिलाई !

तो कोई भी ज्ञानी संत होंगे तो उनके पास श्रद्धापूर्वक जाने से सत्संगियों को, सज्जनों को लगेगा ये बाबा अपने हैं, उनके प्रति अपनत्व लगेगा क्योंकि वे निर्दोष आत्मामय हो गये हैं और आत्मा तो सबके निकट है । इसीलिए हम लोग कहते हैं- ‘राम राम राम, मेरे राम…।’ ‘मेरे रावण, मेरे रावण….’ – ऐसा नहीं कह पायेंगे । ‘मेरा सिकंदर, मेरा सिकंदर…’ नहीं कह पायेंगे । हम जो दोष, अहंकार को पोसकर सुख लेना चाहते हैं, वह सदोष सुख है और जो आत्मा की ओर होकर सुखी होना चाहते हैं वह निर्दोष सुख है । संसार में विष और अमृत दोनों चीजें मिलती हैं, पसंदगी तुम्हारी है । रीति-रिवाज, रिश्ते-नाते, भाईचारा वाहवाही द्वारा अहंकार बढ़ाने वाला वातावरण भी मिलेगा और जिसकी सत्ता से देह चलती है वह चैतन्य परमात्मा ही सब कुछ है, ऐसा करके अपने अहंकार को विसर्जित कराने वाला सत्संग भी मिलेगा । अहंकार तो देह में होगा । देह को जो सुखी करना चाहते हैं वे सदोष सुख चाहते हैं ।

बोलेः ‘फिर संत-महात्मा भी तो बिस्तर पर बैठते हैं, सोते हैं, गद्दी पर बैठते हैं, फूलहार-मालाएँ पहनते हैं, कार में, जहाज में घूमते हैं वे भी तो मजा लेते हैं ।’

देखो, साधु-महात्मा जहाज में, कार में बैठते हैं लेकिन उनका साधु बनने का उद्देश्य क्या है ?

जहाज में बैठने के लिए, फूलमाला पहनने के लिए अगर साधु बने हैं तो ऐसे साधुओं को कोई पूछता भी नहीं । जो परमात्मा के लिए साधुताई में उतर आये हैं और उनको तो कार में, जहाज में या इन वस्तुओं में सुखबुद्धि नहीं होती । वे इन उपकरणों का उपयोगमात्र करते हैं । दूसरों को निर्दोष सुख, ईश्वर का रस पहुँचाने के लिए इन साधनों का उपयोग करते हैं । अब किसी महात्मा को दरिया-पार जाना है तो चलकर तो जायेंगे नहीं, साधन का उपयोग तो करेगे ही ।

देखो, एक आदमी है जो मनौतियाँ मानता है कि जहाज में बैठ जाऊँगा तो प्रसाद बाँटूगा, नारियल फोड़ूँगा । वह पैसा भी खर्च रहा है और  जहाज की यात्रा करने के बाद नारियल भी फोड़ता है, प्रसाद भी बाँटता है, खुशियाँ मनाता है । लेकिन जहाज में नौकरी करने वाल पायलट तथा दूसरे मददगार लोग जहाज में बैठते भी हैं, ऊपर से पैसा भी लेते हैं और घड़ी देखते रहते हैं कि कब समय पूरा हो । डयूटी पूरी हुई ततो ‘हाश ! जान छूटी !’ करके घर पहुँचते हैं क्योंकि वे सुख लेने के लिए जहाज में नहीं बैठते, डयूटी के लिए बैठते हैं । जैसे यात्री सैर करने को जाता है, ऐसे पायलट के मन में सैरबुद्धि नहीं है । साधन में होते हुए भी उसमें सुखबुद्धि नहीं है । ऐसे ही देहरूपी साधन में ब्रह्मवेत्ता भी होगा और अज्ञानी भी होगा, बुद्धू भी होगा और बुद्ध भी होगा लेकिन बुद्धु शरीररूपी साधनन में सुखबुद्धि करके जियेगा और बुद्धपुरुष शरीररूपी साधन का उपयोग करने के लिए जियेगा । यात्री और पायलट दोनों बैठे तो हैं जहाज में लेकिन एक डयूटी कर रहा है, दूसरा सैर करने जा रहा है । ऐसे ही हम लोग इस शरीर में जी रहे हैं, जा रहे हैं, आ रहे हैं तो सैर करने की बुद्धि से जा रहे हैं, आ रहे हैं तो सैर करने की बुद्धि से जी रहे हैं कि किसी के उपयोग में आने के लिए जी रहे हैं ? अगर किसी के उपयोग में आने के लिए जी रहे हैं, खा-पी रहे हैं, जहाज में आ-जा रहे हैं तो हो गया निर्दोष जीवन और विलास करने के लिए जी रहे हैं तो हो गया सदोष जीवन ।

मनुष्य जन्म में संभावना है । आप जितना महान होना चाहें, जितना ऊँचा उठना चाहें उठ सकते हैं और जितना नीचे गिरना चाहें गिर भी सकते हैं । अपना जीवन ईश्वर के ज्ञान से, ईश्वर की भक्ति से, सेवा से, परोपकार से, निर्दोषता से जितना भरना चाहें उतना भर सकते हैं और जितना खाली कर डालें उतना खाली हो सकता है । पुण्यकर्म करके ऊँचा उठना यह मनुष्य-जन्म का तप है । पशु पुण्य नहीं कर सकता, पाप मिटा नहीं सकता । मनुष्य कर्म को काट भी सकता है, कर्म बढ़ा भी सकता है ।

एहि तन कर फल बिषय न भाई । (श्री रामचरित. उ.कां. 43.1)

यह शरीर विषयभोग के लिए नहीं मिला । यह शरीर मिला है निर्दोष परमात्मा का सुख लेने के लिए, शुद्ध आनंद लेने के लिए । शुद्ध कृत्य करते-करते हृदय शुद्ध होता जायेगा । हृदय जितना शुद्ध होगा उतना शांत रहेगा और जितना शांत रहेगा उतना शांतस्वरूप परमात्मा के करीब आ जायेगा । इसके लिए केवल तड़प हो जाय बस, बाकी का काम तो भगवान कर देते हैं ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2009, पृष्ठ संख्या 20-22 अंक 199

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