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Tatva Gyan

जिसके बिना जीवन अधूरा….- पूज्य बापू जी


चित्त की विश्रांति से सामर्थ्य प्रकट होता है और सामर्थ्य का सदुपयोग करने से निर्भयता आती है । चित्त की विश्रांति प्रभुरस को प्रकट करने वाली कुंजी है । चित्त की विश्रांति प्रसाद की जननी है । विश्रांति साधन ब्रह्मज्ञान कराने में समर्थ है । जैसे – काम करते-करते थक जाते हैं फिर आराम करते हैं तो काम करने की शक्ति संचित होती है । बोलते-बोलते थक जाते हैं फिर नहीं बोलते तो बोलने की शक्ति संचित होती है । दिन भर परिश्रम करते हैं, अपनी ऊर्जा खर्च होती है और रात को कुछ नहीं करते – सो जाते हैं तो दूसरे दिन काम करने की ऊर्जा संचित होती है । यह सबके अनुभव की बात है ।

अभी अपराधियों से पूछताछ करने वालों ने एक नया तरीका खोज लिया है । पहले तो अपराधी को मार-पीटकर सच्ची बात उगलवाते थे । अब अपराधी को रात को सोने नहीं देते तो वह इतना विह्वल हो जाता है कि कोई भी गोपनीय बात छुपा नहीं सकता । सच्ची बात बोलकर वह जान छुड़ा लेता है तो मानना पड़ेगा कि अपराधी व्यक्ति को भी आराम चाहिए ।

आराम तीन प्रकार का होता हैः स्थूल आराम, सूक्ष्म आराम और वास्तविक आराम ।

स्थूल आरामः काम करके थके हैं और नींद आयी, यह स्थूल आराम है ।

सूक्ष्म आरामः कर्म ऐसे सुन्दर, सुहावने मंगलकारी करें कि हृदय में संतोष मिले । आपको भूख लगी है, भोजन की थाली तैयार है परंतु आपने देखा कि कोई व्यक्ति है जो अपने से भी ज्यादा भूखा या दुखियारा है । यदि खुद को थोड़ा भूखा रखकर भी आपने उसको खिला दिया तो उसको तो भूख की पीड़ा से आराम मिलेगा परंतु आपको सूक्ष्म आराम मिलेगा । ऐसे ही माता-पिता व मित्रों के काम आ गये, संस्कृति व धर्म के काम आ गये तो उसमें स्थूल आराम तो नहीं होता, कठोर परिश्रम होता है । जैसे गुरु गोविन्दसिंह जी के बेटे दीवाल में चुने जा रहे थे, उनका स्थूल आराम तो तबाह हो रहा था, मौत आ रही थी लेकिन आत्मसंतोष हो रहा था कि अपने धर्म के लिए दीवाल में चुन जा रहे हैं । बहू कैसी भी हो, सास उसे बेटी समझकर बड़ा दिल रख के उससे व्यवहार करती है, ‘बहू मेरे साथ बुरा व्यवहार करती है किंतु मैं तो बुरा व्यवहार नहीं करूँगी । उसकी गति वह जाने ।’ – ऐसा सोचती है अथवा बहू सास की सब बातें सहन कर लेती है और अपनी तरफ से सास के साथ मंगलमय व्यवहार करती है तो उनको एक प्रकार का आत्मसंतोष का आराम मिलता है ।

लालबहादुर शास्त्री, मोरारजी भाई देसाई जैसे कोई नेता जिन्होंने अपने क्षेत्र में कार्य किया हो, उन्हें चुनाव में हारने पर भी इस प्रकार का आत्मसंतोष होता है कि चलो भाई ! हम तीन बार जीते, चौथी बार हार गये अथवा कभी मंत्री नहीं बने तो भी कोई बात नहीं, हमने अपने इलाके के लोगों की सेवा की है ।’ लेकिन इससे जीवात्मा का परम कल्याण नहीं होता । वह तो होता है वास्तविक आराम पाने से ही ।

वास्तविक आरामः चतुर्मास में देवशयनी एकादशी से देवउठी एकादशी तक भगवान नारायण क्षीरसागर में लेटे-लेटे वास्तविक आराम पाते हैं और उनके संकल्प के प्रभाव से सृष्टि चलती है । आप रात्रि को निद्रा में आराम पाते हैं और सुबह प्रभात काल में जो निर्णय करते हैं वे अच्छे होते हैं तथा झंझटों से बचाने वाले होते हैं । रात्रि की निद्रा को अगर आप योगनिद्रा बनाने में सक्षम हो जायें तो स्थूल आराम के साथ सूक्ष्म आराम और सूक्ष्म आराम के साथ वास्तविक आराम तक आप पहुँच सकते हैं । वास्तविक आराम पाने के लिए ही मनुष्य जन्म मिला है । नींद तो भैंसा भी कर लेता है, पक्षी भी अपने घोंसले में आराम कर लेते हैं । हर जीव को निद्रा चाहिए और वह कर लेता है । स्थूल आराम करना कोई बड़ी बात नहीं है । सूक्ष्म आराम करना कुछ-कुछ अच्छाई है किंतु जिसने वास्तविक आराम पा लिया उसने अपना और अपनी सात पीढ़ियों का वास्तविक कल्याण कर लिया ।

दुनिया के तमाम श्रेष्ठ ग्रंथों में विश्व-साहित् में सबका मंगल चाहने वाले सर्वोपरि ग्रंथ हैं चार वेद । वेद कहते हैं-

ॐ द्यौः शांतिरन्तरिक्षं शांतिः पृथिवी शांतिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः । वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ।।

‘स्वर्गलोक, अन्तरिक्षलोक तथा पृथ्वीलोक हमें शान्ति प्रदान करें । जल शांतिप्रदायक हो, औषधियाँ तथा वनस्पतियाँ शांति प्रदान करने वाली हों । सभी देवगण शांति प्रदान करें । सर्वव्यापी परमात्मा सम्पूर्ण जगत में शांति स्थापित करें । शांति भी हमें परम शांति प्रदान करे ।’ (यजुर्वेदः 36.17)

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ।।

‘सभी सुखी हों, सभी नीरोगी रहें, सभी सबका मंगल देखें और किसी को भी किसी दुःख की प्राप्ति न हो ।’

पशुओं को, पक्षियों को, पेड़-पौधों को भी सुख-शांति मिले । सबको सुख-शांति व वास्तविक आराम मिले ।

वास्तविक आराम के बिना जो कुछ मिलेगा वह एक दिन छीना जायेगा । आज तक जो आपने जाना है, पाया है और आज के बाद जो जानोगे, पाओगे वह सब मृत्यु के एक झटके में छूट जायेगा लेकिन जो वास्तविक तत्त्व है उसको एक बार जान लो या पा लो तो मौत का बाप और तैंतीस करोड़ देवता व भगवान नारायण मिलकर भी उसे छीन नहीं सकते । भगवान नारायण सहित सब देवता मिलें और देवताओं तथा भगवान नारायण का आधारस्वरूप आत्मा (वास्तविक आराम) नहीं मिला तो जीवन अधूरा है । उर्वशी अप्सरा को ठुकराने की ताकत रखने वाले अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण मिले, फिर भी उसका रुदन चालू था । 16000 राजकन्याओं के साथ एक ही दिन में विवाह सम्पन्न करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपने उतने ही रूप बना लिये और उतने ही रूप गर्गाचार्यों के भी बना दिये थे । ऐसे समर्थ श्रीकृष्ण जिसके सारथी हैं, ऐसे अर्जुन को भी जब तक वास्तविक तत्त्व का ज्ञान नहीं मिला तब तक उसके सर्व दुःखों की निवृत्ति नहीं हुई और जब वास्तविक तत्त्व का ज्ञान हुआ, वास्तविक आराम मिला तो वही अर्जुन कहता हैः

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा…..

‘मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है ।’ (गीताः 18.73) अर्थात् अपने शुद्ध, बुद्ध, नित्य, मुक्त आत्मस्वभाव की स्मृति ।

आपकी पत्नी राज़ी हो गयी, पति राज़ी हो गया, बॉस राज़ी हो गया, लोगों ने तालियाँ बजाकर आपका ‘वोट बैंक’ पक्का कर दिया तो भी आप पूरे निश्चिंत नहीं हो सकते । कुछ भी मिल जाय फिर भी सारे दुःखों की निवृत्ति और पूर्ण सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती । मदालसा रानी ने अपने चारों बेटों को वास्तविक आराम दिला के ब्रह्मज्ञानी बना दिया । ‘गुरुवाणी’ में आता हैः

पूरा प्रभु आराधिआ पूरा जा का नाउ ।

नानक पूरा पाइआ पूरे के गुन गाउ ।।

जिस मनुष्य ने अटल नाम वाले पूर्ण प्रभु का स्मरण करके आत्मारामी सद्गुरुओं की कृपाप्रसादी को पचाया है, उसे पूर्ण प्रभु मिल गया है । पूर्ण पुरुषों से पूर्ण स्वरूप का ज्ञान पाकर, अपनी पूर्णता की अनुभूति कराने वाले साधन को समझकर सजाग हो जाना चाहिए, अपनी पूर्णता का अनुभव करना चाहिए ।

पूर्ण परमात्मा की आराधना करके उसमें शांत होना सीखो, सम होना सीखो तो आपका परम मंगल हो जायेगा, परम कल्याण हो जायेगा ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2008 पृष्ठ संख्या 2-4

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परिश्रम और मजदूरी


संत श्री आसाराम बापू जी के सत्संग-प्रवचन से

परिश्रम दो प्रकार का होता है- शारीरिक और मानसिक। कई लोग कुदाली-फावड़े चलाकर शारीरिक परिश्रम करते हैं तो कई विचारों को दौड़ाकर मानसिक परिश्रम करते हैं। ज्ञानी दोनों परिश्रम छोड़कर स्वरूप मैं बैठे हैं, इसीलिए वे दोनों के गुरु हैं। स्थूल परिश्रम छोड़कर जितने सूक्ष्म बनोगे, सामर्थ्य उतना ही ज्यादा आयेगा।

पटरियों पर दौड़ती रेलगाड़ी को इंजन खींच ले जाता है, क्योंकि डिब्बों की अपेक्षा इंजन में ज्यादा सूक्ष्मता है। इंजन पर भी ड्राइवर के हाथ का नियंत्रण है। हाथ पर नियंत्रण है ड्राइवर के मन का। मन में गाड़ी को चलाने का संकल्प हो हाथ को इंजन चलाने का आदेश मिल जाता है और रोकने का संकल्प करे तो हाथ ब्रेक पर पहुँच जाता है। इस प्रकार ड्राइवर का मन गाड़ी के डिब्बों, इंजन और उसके शरीर से भी सूक्ष्म है, इसीलिए वह इन सब पर राज्य करता है।

इस मन से भी सूक्ष्म है बुद्धि और बुद्धि से भी सूक्ष्म है आत्मा। आत्मा की सत्ता से ही मन में स्फुरणा होती है और मन पुनः आत्मा में लीन होता है। इससे सबसे ज्यादा सामर्थ्यवान है आत्मा। यह आत्मा कहीं दूर नहीं है वरन् हमारा मूल स्वरूप ही है।

ज्ञानी महापुरुष इस रहस्य को पूर्णरूप से जान लेते हैं, इसीलिए सबसे ज्यादा सामर्थ्य के धनी होते हैं। बाहर से निष्क्रिय जैसे दिखते हुए भी ज्ञानी के एक संकल्पमात्र से पूरे विश्व में बदलाहट आने लगती है। नंगे पैर तीर्थयात्रा, गंगास्नान, चान्द्रायण आदि व्रत, शरीर को सताकर किये गये उपवास – इन सबसे जो पुण्य मिलता है, उससे ज्यादा पुण्य, शांति और आनंद का अनुभव आत्मसाक्षात्कारी महापुरुषों के दर्शन-सत्संग से होता है। उनके क्षणमात्र के कृपा-कटाक्ष से अज्ञानी जीव के जन्मों-जन्मों के बंधन कट जाते हैं।

मजदूर को सारे दिन के शारीरिक परिश्रम से क्या मिलता है ?

“बाबा जी ! दो पाली में मजदूरी करता हूँ, तब भी पूरा नहीं पड़ता।”

कहाँ से होगा ? और अगर हो भी गया तो क्या ? सब अधूरा है। उससे केवल स्थूल शरीर का पोषण होगा। काम तो तब पूरा होगा जब परम सूक्ष्मता में पहुँचोगे, आत्मा को जानोगे, परमात्मा को पाओगे, आत्मसाक्षात्कार करोगे….

इसमें कोई मजदूरी नहीं है, परिश्रम नहीं है। सौदा सस्ता है लेकिन लोग यह सौदा करने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्हें जन्मों से ही नहीं, सदियों से मजदूरी करने की आदत पड़ गयी है कि कुछ मेहनत करने से ही सब मिलता है। बाह्य जीवन में उनकी इस ग्रंथि को पोषण भी मिलता है लेकिन परमात्मा को पाने के लिए इन सब ग्रंथियों को छोड़ देना पड़ेगा। शरीर और मन की मजदूरी छोड़ दो। शरीर की मजदूरी शायद होती भी रहे, शरीर से सेवा होती भी रहे परंतु मन की मजदूरी को, संकल्प-विकल्पों के जाल को तो काटो ही। शरीर का श्रम तो अनिवार्य है, मन के संकल्प-विकल्प का श्रम छोड़ने से बेड़ा पार है।

आत्मनिष्ठ महापुरुष के सान्निध्य में जाओ। उनकी उपस्थिति में संकल्प-विकल्प कम होते जायेंगे और एक दिन ऐसा आयेगा कि तुम निःसंकल्प अवस्था में आ जाओगे। उस समय वह परम समर्थ तुम्हारा आत्मदेव प्रकट हो जायेगा और तुम उस अवस्था में स्थिर हो जाओगे।

लोग जब ध्यान करने बैठते हैं, तब भी भारी होकर बैठते हैं। शारीरिक परिश्रम छोड़कर मानसिक परिश्रम चालू कर देते हैं। अरे भाई ! ध्यान को बोझ नहीं बनाना है, ध्यान से तो आनंदमय होना है। गुरु गोरखनाथ ने कहा है—

बसती न सुन्यं सुन्यं न बसती अगम अगोचर ऐसा।

गगन सिषर महिं बालक बौले ताका नाँव धरहुगे कैसा।।

हसिबो खेलिबो धरिबा ध्यान। अहनिसि कथिबा ब्रह्म गियान।

हंसै षेलै न करे मन भंग। ते निहचल सदा नाथ कै संग।।

हँसते खेलते, प्रसन्न होकर ध्यान करो, आत्मचिंतन करो, रात दिन ब्रह्मज्ञान की चर्चा करो। आत्मनिरीक्षण करो कि ‘मैं कौन हूँ ? कहाँ से आया हूँ ? किसलिए आया हूँ ? कहाँ जाना है ? मेरा परम कर्तव्य क्या है ? जीव क्या है ? जगत क्या है ?’ आदि। इन प्रश्नों की गहराई में उतरो और अपने अस्तित्व की गहराई में से इनके जवाब ढूँढ निकालो। शास्त्र के सिद्धान्त, गुरु के उपदेश और स्वानुभव की कसौटी पर उन जवाबों को कसो। भूसी साबित हों उन्हें फेंक दो और दाने साबित हों तो उन्हें संभाल लो।

जो साधक इस आत्मचिंतन में ही दिन रात लगा रहता है, यथायोग्य खाता पीता है किंतु संसार के विषयों में मन को आसक्त नहीं होने देता और आत्मचिंतन की धारा को टूटने नहीं देता, वह साधक सहज ही सिद्धस्वरूप में जग जाता है।

हसिबो खेलिबो धरिबा ध्यानं….. ऐसे तो मूर्ख लोग भी हँसते-खेलते हैं, ‘हा-हा-ही-ही’ में पूरा जीवन बिता देते हैं। उनकी हा-हा-ही-ही और साधकों की प्रसन्नता में बड़ा फरक है।

वे विषय लम्पट हैं, नट-नटियों का चिंतन करते हैं, विषय विकारों का चिंतन करते हैं, राग-द्वेष में फँसते हैं जबकि साधक निर्विषय आध्यात्मिक आनंद पाने के मार्ग पर है। वह परमात्मा का ध्यान करता है, विषय विकारों को पैरों तले कुचलकर, राग-द्वेष के जाल को काटकर गुणातीत होने का प्रयत्न करता है।

मूर्ख लोग संसाररूपी कीचड़ में कीड़े की तरह बिलबिलाते हैं. जबकि साधक कीचड़ में रहकर भी गगनगामी दृष्टि रखकर ऊपर उठता है और कमल की तरह जीवन को स्वच्छ, निर्लेप, सुंदर और सुरभित करता है।

यदि वेदान्ती जीवन जिया जाय तो देश के सभी प्रश्न हल हो जायें। ऐसे साधनों की जरूरत नहीं है जो देशवासियों की इच्छा-वासना भड़कायें वरन् ऐसे वातावरण की जरूरत है, जिससे उन्हें संयम-सदाचार, सादगीपूर्ण और तेजस्वी जीवन जीने की प्रेरणा मिले, वे अपना कर्तव्यपालन करने में तत्पर बनें, अपने दैनिक जीवन में, नौकरी धंधे में छल-कपट छोड़कर कुटुम्ब का, समाज का, देश का हित हो ऐसा आचरण करें।

ऐसा वातावरण मिलेगा वेदान्ती जीवन वाले महापुरुषों के चरणों में… वे महापुरुष आत्मा-परमात्मा के अनुभव से सम्पन्न होते हैं। वही परमात्मा, सबमें स्थित सर्वेश्वर, अनेकों में छुपा हुआ एक ईश्वर, कर्मफल का दाता, हमारे कर्मों का साक्षी, हमारे सभी कर्मों को निहार रहा है…. ऐसे ज्ञान की समाज और देश को जरूरत है।

यदि देशवासियों को इस वेदान्त दर्शन का ज्ञान नहीं होगा, धर्म का ज्ञान नहीं होगा तो रक्षक ही भक्षक बन जायेगा, पोषक ही शोषक बन जायेगा, चौकीदार ही चोर बन जायेगा…. तो भोग वासना भड़काने वाला वातावरण बनता रहेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2002, पृष्ठ संख्या 11,12 अंक 120

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गीता का अविकम्प योग


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग प्रवचन से

शास्त्र कहते हैं कि जब तक सामने वाला पूछे नहीं, नम्र न हो तब तक ऊँची बात नहीं बोलनी चाहिए, किंतु अर्जुन के न पूछने पर भी भगवान बोलते हैं। जैसे – कोई अन्धा गड्ढे में गिरता हो, उसको नहीं दिखता किंतु आपको दिखता है तो आपका हृदय थोड़े ही मानेगा कि चुप बैठें। ऐसे ही भगवान देखते हैं कि ये जीव बेचारे अलग-अलग ढंग से माया की खाई में गिर रहे हैं। इसीलिए भगवान बोलते हैं और अधिकारी भेद से अलग-अलग बोलते हैं।

भगवान ने उद्धव से कहाः ‘तुम सब कुछ छोड़कर बदरीकाश्रम में जाओ और मैंने जो उपदेश दिया है, उसका अभ्यास करके मुझसे ऐसे मिलो जैसे – दूध से दूध। जैसे सागर की लहर सागर से मिलती है, ऐसे ही जीवात्मा मुझ अंतर्यामी परमात्मा से मिले।’

भगवान ने अर्जुन से कहाः ‘मेरा स्मरण करते हुए युद्ध कर और मुझसे मिल। कर्म करते हुए मुझसे मिल।’

संयमी राजा अंबरीष से भगवान ने कहाः ‘एकादशी का उपवास करो, प्रजा का ठीक से पालन करो और कर्ता, धर्ता एवं भोक्ता महेश्वर है – ऐसा समझकर कर्म करते जाओ। जो कर्म का प्रेरक और फलदाता है उस ईश्वर का स्मरण करके सत्कर्म करते हुए, राजकाज करते हुए मुझसे मिलो।’

भगवान ने गोपियों से कहाः ‘तुम जहाँ भी हो, जैसी भी हो किंतु किसकी हो, यह सदा याद रखो।’

दूध दुहते रहो, दही बिलोते रहो, गाय चराते रहो किंतु किसके लिए कर रहे हो और वह कैसा है, यह सदा याद रखो। वह ईश्वर है, सर्वगुण-सम्पन्न है, महान है यह भी मत सोचो। जैसा तैसा है किंतु वह हमारा है। यशोदा की ओखली से बंधता है लेकिन है हमारा कन्हैया !

भगवान से अपनत्व रखने से तुम्हारी प्रीति कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग हो जायेगी। भक्ति कैसी होनी चाहिए ? नारद जी ने कहाः यथा गोपिकानाम्। जैसी गोपियों की थी। श्रीकृष्ण ने पढ़े लिखे उद्धव को अनपढ़ गोपियों से उपदेश दिलवाया।

पाँचवें तरीके से उपदेश देते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहाः

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।

सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सतंरिष्यसि।।

‘यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी तू ज्ञानरूप नौका द्वारा निःसंदेह सम्पूर्ण पाप-समुद्र से भलीभाँति तर जायेगा।’ गीता- 4.36

इन पाँच तरीकों में से कोई भी तरीका अपने जीवन में नहीं है तो जीवन वर्तमान में भी विक्षेप और विलासिता से भरा होगा और भविष्य में भी दुःखदायी होगा। चाहे संसारी स्वार्थ का जीवन हो चाहे भगवत्प्राप्ति का…. परोपकार के बिना जीवन में निखार नहीं आता। परोपकार तो करें किंतु बेचारे दीन-हीन हैं — ऐसी बुद्धि से नहीं, जिनकी सेवा करते हो, उनमें मेरा परमात्मा है – इस भाव से सेवा करें।

यह अर्जुन का जमाना नहीं है, युद्ध की अभी जरूरत नहीं है। सब कुछ छोड़कर बद्रीनाथ जाओ ऐसा भी मैं नहीं कहता। किंतु आपसे वही कहता हूँ जो भगवान ने अंबरीष से कहा।

‘सबकी गहराई में मेरा परमात्मा है।’ – यह दृष्टिकोण आपके जीवन में अविकम्प योग लायेगा। यदि आपकी यह समझ है तो युद्ध करते हुए, राज्य करते हुए, रोटी बनाते हुए, गुरु के दैवी कार्य करते हुए भी आपका अविकम्प योग हो जायेगा।

आप पूजा-मंदिर में रहे तो आपका योग हुआ, किंतु बाहर आये तो आपका योग कम्पित हो गया। आप समाधि में रहे तो आपका योग रहा, आप व्यवहार में आये तो समाधि नहीं है, आपका योग कम्पित हो गया।

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्वतः।

सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः।।

‘जो पुरुष मेरी इस परमैश्वर्यरूप विभूति को और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है, वह निश्चल भक्तियोग से युक्त हो जाता है-इसमें कोई संदेह नहीं है।’ गीता- 10.7

इस अविकम्प योग को समझने से आप कर्म करते हुए भी भगवान की भक्ति में सफल हो जाओगे, इसमें संशय मत करो।

आज के युग में तुमको कहें कि ‘तुम हिमालय चले जाओ, समाधि करो, भगवान को पाओ फिर संसार में आओ’ तो यह तुम्हारे बस की बात नहीं। तुमको कहें कि ‘तुम गोपियों की नाईं भक्ति करो तो यह भी तुम्हारे बस की बात नहीं है।

तुम जहाँ हो, जैसे हो, पढ़े हो या अनपढ़ हो, मंदिर में हो चाहे दुकान में हो लेकिन तुम्हारा दृष्टिकोण बदल जाये। जहाँ-जहाँ सौंदर्य दिखे, जहाँ-जहाँ शुभ दिखे, मंगलमय दिखे वहाँ भगवान का वैभव है। जहाँ-जहाँ विघ्न-बाधा दिखे, गड़बड़ दिखे वहाँ भगवान के अनुशासन की शक्ति काम कर रही है – ऐसा समझें। जैसे, हाथी अपने रास्ते से चलता है तो ठीक, नहीं तो महावत ऊपर से नियंत्रण करता है। ऐसे ही यह जीवात्मा अपने ईश्वरत्व को पाने के लिए आया है लेकिन अगर रास्ता भूलता है और कुछ गलत करता है तो देर-सवेर उसको तकलीफ होती है।

जैसे – माँ बच्चे को सुख-सुविधा और  मिठाई देकर भी मंगल चाहती है और कभी-कभी बच्चे के न चाहते हुए भी उसकी नाक दबोचकर साफ करती है, साबुन रगड़कर नहला-धुलाकर तैयार करती है। माँ की चेष्टाएँ बच्चे को अच्छी नहीं लेकिन माँ की सारी चेष्टाएँ बच्चे की भलाई के लिए होती हैं।

आपके जीवन में कभी चढ़ाव आता है तो कभी उतार आता है। किंतु उतार में आप मायूस न होना और चढ़ाव में आप फूलना मत। चढ़ाव और उतार ये जीवन के ताने बाने हैं। हो सकता है कि जीवन में यदि विघ्न बाधाएँ न आतीं तो ऐसा सत्संग न मिलता अथवा संत की कृपा न होती तो ऐसा सत्संग न मिलता।

कभी चिंतित न हों, कभी दुःखी न हों। चिंता आये तो चिंतित न हों वरन् विचार करो कि चिंता आयी है तो मन में आयी है। चिंता नहीं थी तब भी कोई था, चिंता है तब भी कोई है और चिंता आयी है तो जायेगी भी क्योंकि जो आता है वह जाता भी है।

चिंता से आप जुड़ जाते हैं तो कमजोर हो जाते हैं, दुःखी हो जाते हैं। अहंकार से आप जुड़ जाते हो तो परेशान हो जाते हैं। सफलता से जुड़ जाते हैं तो अहंकार आता है और विफलता से जुड़ जाते हैं तो चिंतित हो जाते हैं। यदि आप इनसे न जुड़े तो ये आपको मजबूत बनाकर चले जायेंगे।

बीमार या तन्दुरुस्त किसी का तन हो सकता है, अच्छा या बुरा किसी का मन नहीं हो सकता है, बुद्धु या विद्वान किसी की बुद्धि हो सकती है लेकिन वह तो वही है जो तू है। जहाँ से तू ‘मैं’ बोलता है, तेरा वही ‘मैं’ आत्मदेव है। मित्र की गहराई में भी तू है और शत्रु की गहराई में भी तू है। भगवान कहते हैं कि ‘मेरी विभूति को देखें। जहाँ-जहाँ सुन्दर सुहावना है, उस सुन्दर वस्तु और व्यक्ति की गुलामी न करें। उसको जो सुन्दरता और सुहावनापन मिला है, वह मुझ आत्मा का है। मैं आत्मरूप से सबके साथ हूँ।’ इस प्रकार की नज़र आपको अविकम्प योग के राजमार्ग पर ला देती है।

जैसे, अँगूठी, चेन आदि गहने अलग होते हैं किंतु सबका मूल पदार्थ सोना एक है, तरंग और बुलबुले अनेक होते हैं किंतु सागर का पानी एक होता है, ऐसे ही जीवों की आकृतियाँ अनेक होती हैं किंतु सबकी गहराई में सच्चिदानंद चैतन्य परमात्मा एक ही है। नज़र एक सच्चिदानंद परमात्मा पर रहे तो हो गया – अविकम्प योग। पूजा-पाठ, जप-तप, साधन-भजन करके इस अविकम्प योग का अभ्यास करना चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2002, पृष्ठ संख्या 3,4 अंक 120

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