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Tatva Gyan

दो प्रकार का जगत


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग प्रवचन से

सारा जगत मन की कल्पना से उत्पन्न हुआ है और उसी में फँसा हुआ है। मन की कल्पना सुख बनाती है तब सुखी हो जाते हैं और मन की कल्पना दुःख बनाती है तब दुःखी हो जाते हैं। परंतु जब मन की कल्पना दिखती है, जीव मन की कल्पनाओं के पार पहुँचता है तब न सुख होता है, न दुःख होता है, जीव परमानंद को पा लेता है।

मन की कल्पना में पुण्य और पाप ही हैं। किसी मुसलमान को मंदिर में ले जाओ तो उसके धर्म के लोग कहेंगे- “तूने पाप किया है।” किंतु हिंदू अगर मंदिर में जाता है तो समझता है- ‘मुझे पुण्य हुआ।’

वास्तव में पाप-पुण्य किसको कहते हैं?

जो अंतर्यामी परमेश्वर की ओर ले जाय, कल्पनाओं से पार पहुँचाये उसको पुण्यकर्म कहते हैं और जो ईश्वर से दूर करके कल्पनाओं में भटका दे उसको पाप कर्म कहते हैं।

यह कल्पनामात्र है कि फलानी चीज मिलेगी तो मैं सुखी होऊँगा, फलाना शत्रु मर जाय तो मैं सुखी होऊँगा, फलाना मित्र मिलेगा तो सुखी होऊँगा….. इस सुख की कल्पना-कल्पना में ही जीवन बीत जाता है और मरते समय भी कोई न कोई परेशानी बनी ही रहती है।

मेरा भाई मुझे कहता था- ‘तुम होशियार हो। मेरा साथ दो तो हम फलाने सेठ से भी आगे बढ़ सकते हैं। तुम्हारी जरा सी युक्ति होती है तो हमारा छक्का लगता है। तुम सुधर जाओ तो हम इससे भी बड़े हो सकते हैं।’

मेरे बड़े भाई की कल्पना थी कि फलाने सेठ की बराबरी कर ली तो मानो, जीवन का लक्ष्य ही पूरा हो गया, लेकिन मेरी कल्पना कुछ और ही थी कि गुरु के पास जायेंगे, आत्मा-परमात्मा को पायेंगे। मेरी कल्पना सात्त्विक थी तो हम गुरु के पास गये और जब गुरु ने कल्पनाओं से परे पहुँचाया तो सारे-के-सारे सेठ कतार में लगकर मत्था टेकने लग गये !

जगत भी कल्पित है और जगत के सुख-दुःख भी कल्पित हैं लेकिन जिस परमात्मा की सत्ता से इसका अनुभव होता है वह आत्मा अकल्पित, अजर-अमर है, वही शाश्वत है। वह एक हृदय में है इसलिए उसको आत्मा कहते हैं और सब हृदयों में वही बस रहा है इसलिए उसको परमात्मा कहते हैं। अपने दिल की ओर इशारा करके बोलते हैं तो कहते हैं कि ‘आत्मा है लेकिन सर्वव्यापक की ओर इशारा करना है तो कहते हैं  कि परमात्मा है।

न भगवान जलते हैं और न भगवान निकलते हैं। यदि भगवान जल जायें तो भगवान अमर कैसे और यदि निकल जायें तो भगवान सर्वव्यापी कैसे ? भगवान तो सर्वव्यापक और अमर हैं। जैसे घड़ा नष्ट हो जाता है लेकिन घड़े में आया हुआ आकाश नष्ट नहीं होता है, ऐसे ही परमात्मा कभी नष्ट  नहीं होते हैं।

पशु-पक्षी मरते हैं, पेड़-पौधे नष्ट होते हैं। मरता तो वह है जिसका जन्म हुआ है। भगवान तो अजन्मे हैं, वे कैसे मर सकते हैं ? भगवान अजर हैं, अमर हैं, अविनाशी हैं, अनादि हैं, अनंत हैं और सच्चिदानंदस्वरूप हैं और वे ही भगवान सबकी आत्मा बनकर बैठे हैं लेकिन हम कल्पनाओं के जगत में ही बन-बनकर मरते जा रहे हैं कि मैं फलाना हूँ, मैं फलाने का पति हूँ, मैं फलाने का बेटा हूँ, मैं साहब हूँ, मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ आदि-आदि।

हकीकत तो यह है कि मैं इन सबको सत्ता देने वाले परमात्मा का सनातन अंश हूँ। भगवान भी कहते हैं- ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। जैसे घड़े का आकाश महाकाश का सनातन अंश है, वैसे ही जीवात्मा परमात्मा का सनातन अविभाज्य अंश है।

अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछाः “ब्रह्म क्या है?”

श्री कृष्ण ने कहाः “जो अविनाशी है वह ब्रह्म है।”

अर्जुनः “अविनाशी ब्रह्म है लेकिन यहाँ तो सब विनाशी है।”

श्रीकृष्णः “यहाँ जो दिखता है वह विनाशी है लेकिन जो उसे देखता है वह अविनाशी है। जब तुम ऊपर-ऊपर से देखोगे तो विनाशी लगेगा और गहराई से देखोगे तो पता चलेगा कि अविनाशी है।”

जब आप माला अथवा फूल को बाहर की आँख से देखते हो तो विनाशी है और भीतर के अस्तित्त्व की आँख से देखते हो तो अविनाशी है। समय पाकर माला का, फूल का नाम-रूप मिट जायेगा फिर भी कुछ शेष रहेगा। जो रहता है वह अविनाशी है और जो दिखता है वह विनाशी है।

अविनाशी के आधार पर ही विनाशी टिकता है। अस्तित्व के आधार पर ही नाम रूप टिकता है। ‘अस्ति – है, भाति – जानने में आता है और प्रिय – प्रियता।’ – यह अविनाशी का स्वभाव है। नाम और रूप – यह विनाशी माया का स्वभाव है। हम विनाशी माया को अविनाशी करना चाहते हैं और अविनाशी की खबर नहीं रखते हैं।

कोई यह कहकर रोता है कि ‘मेरा बेटा मर गया…..।’ अरे, बेटा कभी मरता नहीं है फिर भी हम रोते हैं क्योंकि हमारे खिचड़ी जगत (कल्पना जगत) का बेटा मर गया है।

दो प्रकार का जगत होता है

ईश्वर का जगत, कल्पना का जगत।

अपना कल्पना का जगत होता है तो अपने जगत में जीवन और मृत्यु सत्य लगते हैं, परंतु ईश्वर के जगत में न मौत है न जीवन। उस जगत में न कोई मरता है और न कोई जीता है।

आपने स्वप्न में देखा कि बहुत से लोग पैदा हुए, फले-फूले, फिर मर गये। जब आँख खुलती है तो पता चलता है कि यह तो स्वप्न था। फिर भी जिसकी सत्ता से स्वप्न चला था वह द्रष्टा ज्यों-का-त्यों रहा। स्वप्न शुरु नहीं हुआ तब भी वह (द्रष्टा) था, स्वप्न चल रहा था तब भी वह था और स्वप्न टूट गया तब भी वह है। उसी को नानक जी कहते हैं-

आदि सचु जुगादि सचु। है भी सच नानक होसी भी सचु।।

स्वप्न के आदि में भी वह सत् है। स्वप्न के मध्य में भी वह सत् है और स्वप्न टूट जाने के बाद भी वह सत् है। जन्म से पहले भी यह बेटा किसी और रूप में था और मृत्यु के बाद भी किसी और रूप में रहेगा। उसके अस्तित्व का नाश नहीं होता। किंतु अभी जिस रूप में है, अभी जिस माँ का बेटा है उसका (नाम-रूप) का नाश हो सकता है, लेकिन अस्तित्व का नाश नहीं होता।

अभी जो हमारा कल्पना का जगत है उसमें आना जाना, जन्मना मरना सच्चा भासता है। ईश्वर के जगत में देखो तो ईश्वर को छोड़कर कोई बाहर जा ही नहीं सकता। ईश्वर  सत्य है तो ईश्वर से जो कुछ बना है वह भी तो सत्य है। सत्य इस अर्थ में है कि नाम और रूप को हटाकर सत्य है।

एक गाँव में दो भाई थे अमर और गणेश। उनको एक-एक पुत्र था। दोनों के बेटे दूर के शहर में पढ़ाई करने गये। अमर के बेटे ने सदाचारी दोस्तों की संगत की, पढ़ा लिखा और इंजीनियर बन गया। उसने एक छोटा सा कारखाना खोल लिया। लाखों रूपये कमाये।

दूसरे ने, गणेश के बेटे ने दुराचार किया, क्लबों में गया, विदेशी खान-पान किया, रॉक एण्ड रोल किया….. आजकल के आधुनिक समझदार कहलाने वाले लोग जो करते हैं, वह किया और अशांत होता गया। ज्यों-ज्यों सुख खोजते-खोजते सुविधा में गिरता गया, त्यों-त्यों दुःख हाथ लगा और खुद को पिस्तौल से गोली मारकर मर गया।

गणेश का  लड़का मर गया और अमर का लड़का उन्नत हो गया। वहाँ से कोई व्यक्ति गाँव आ रहा था, उसके द्वारा अमर के बेटे ने समाचार भेजाः ‘मेरे चाचा जी को बता देना कि आपका बेटा आत्महत्या करके मर गया है और मेरे पिता को बता देना कि मैंने कारखाना लगाया है और लाखों रूपये कमाये हैं।’

आने वाले व्यक्ति ने सोचा कि अमर जी बहुत कंजूस हैं। अगर उनको यह खुशखबरी सुनाऊँगा तो इनाम नहीं मिलेगा और गणेश जी दिलदार हैं। अतः उसने गणेश जी को जो खबर देनी थी वह अमर जी को दे दी और जो अमर जी को खबर देनी थी वह गणेश जी को दे दी। ईश्वर की सृष्टि में गणेश का बेटा मर गया है और अमर का जीवित है लेकिन कल्पना के जगत में गणेश का बेटा मौजूद है और अमर का मर गया है।

जब गणेश जी ने सुना कि मेरा बेटा इंजीनियर हो गया है और उसने कारखाना खोल लिया है तो उन्होंने समाचार  लाने वाले को अपनी अँगूठी उतार कर दे दी, घर में हलवा-पूरी बनवायी और खूब खुश हुए। ईश्वर की सृष्टि में तो उनका बेटा मर गया लेकिन उनकी सृष्टि में जिंदा है।

ईश्वर की सृष्टि में कोई आता है या जाता है तो कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि उसको कुछ छोड़कर कहीं आना-जाना नहीं होता है। केवल नाम-रूप बदल जाते हैं।

अमर जी का बेटा ईश्वर की सृष्टि में तो जीवित था लेकिन जब उनको सुनाया कि उनका बेटा मर गया तो वे रोने बैठ गये क्योंकि उनकी सृष्टि में उनका बेटा मर गया।

जहाँ-जहाँ और जितनी-जितनी हमारी ममता अथवा लगाव होता है, वहाँ-वहाँ और उतना-उतना हमें सुख-दुःख महसूस होता है। अभी भी कितने ही मरीज अस्पताल में कराहते होंगे, उनसे हमारा कोई लगाव या ममता नहीं है तो हमको कुछ नहीं होता है। लेकिन जहाँ हमारा लगाव होता है वहाँ कह उठते हैं- ‘हाय रे, मैं मर गया…।’

‘अरे, तू तो जिंदा है, क्या हुआ ?’

‘मेरी पत्नी बीमार है।’

अगर सगाई से पहले उस लड़की (पत्नी) को कुछ हो जाता तो ? अथवा तलाक के बाद उसे कुछ हो जाता तो ?

तब दुःख नहीं होता क्योंकि उससे लगाव नहीं है। …तो यह हमारा खिचड़ी जगत है। यह हमारे मन की मान्यता है। खिचड़ी जगत में ही राग-द्वेष होता है, हर्ष शोक आता है क्योंकि हमने अपने शरीर को ही मैं मान लिया है और शरीर के संबंधियों को मेरा मान लिया है।

संत तुलसी दास जी ने कहा है-

मैं अरु मोर तोर की माया। बश कर दीन्हीं जीवन काया।।

श्रुति कहती है कि मैं और मेरा करके ही तुम सुखी-दुःखी हो रहे हो। अब वेदांत की ओर आ जाओ। वेद भगवान की ओर आ जाओ। तुम अपने असली अस्तित्व की ओर देखो, जो कभी नहीं मिटता है।

शरीर मर जायेगा और जला दिया जायेगा तब इसमें जो अग्नितत्त्व है वह तेज में मिल जायेगा। इसमें जो जल तत्त्व है वह व्यापक जलतत्त्व में मिल जायेगा। शरीर का पृथ्वी तत्त्व राख व हड्डियाँ नदीं में बहा दी जायेंगी। शरीर का आकाश तत्त्व आकाश में मिल जायेगा और वायुतत्त्व भी वायु में मिल जायेगा।

वास्तव में देखा जाय तो शरीर का भी नाश नहीं होता बल्कि रूपांतरण होता है। न शरीर का नाश होता है, न जीव का नाश होता है। लौकिक दृष्टि से जब शरीर और जीव का नाश नहीं है तो आत्मशिव का नाश कैसे हो सकता है ? कड़ाही में तेल गर्म करो तो कड़ाही में आया हुआ चाँद गर्म नहीं होता और तेल के ठंडा होने पर ठंडा नहीं होता तो असली चाँद को ठंडक या गर्मी कैसी ?

फिर भी शरीर रूपी कड़ाही में बैठकर कमबख़्त जीव मान रहा है कि कड़ाही ठंडी हुई तो मैं ठंडा हो गया और कड़ाही गर्म हुई तो मैं मर गया….. यह कल्पनामात्र है, खिचड़ी जगत है। मूर्छा में भी कोई सुख-दुःख नहीं होता, लय में भी सुख-दुःख नहीं होता और समाधि में भी सुख-दुःख नहीं होता है। खिचड़ी जगत में ही सुख-दुःख होता है।

सुख-दुःख केवल वृत्तियों का खेल है। ऐसे ही धर्म-अधर्म भी आपकी वृत्तियों का खेल है। हिंदूपना और मुसलमानपना – यह भी आपकी वृत्तियों का खेल है। तुम लड़की हो या लड़का हो – यह भी तुमको सुनाया गया है और यह सत्य नहीं है।

न तुम लड़की हो, न लड़का हो। न तुम सेठ हो, न नौकर हो। न तुम भक्त हो, न अभक्त हो। न तुम भारतवासी हो, न विदेशी हो। वास्तव में तुम ऐसे हो कि जिसका बयान करना बेवकूफी है। नानक जी कहते हैं-

मत करो वर्णन हरि बेअंत है। क्या जाने वो कैसो रे ?

कोई बोलता है कि ‘मरूँगा तब सुखी होऊँगा…’ तो समझो उसके लिए यहाँ सुख का द्वार बंद है। उपासक कहता है कि ‘मरते समय भगवान याद आयेंगे तो भगवान के लोक में जायेंगे’ तो उसके लिए मरते समय की उपासना जरूरी है।

कर्मी के लिए कर्म जरूरी है, भोगी के लिए भोग जरूरी है, त्यागी के लिए त्याग जरूरी है, उपासक के लिए उपासना जरूरी है लेकिन ज्ञानी के लिए कुछ जरूरी नहीं है। इसलिए ज्ञानी सदा निर्लेप होता है।

ब्रह्म गिआनी सदा निरलेप।।

जैसे जल महि कमल अलेप।।

ब्रह्म गिआनी मुकति जुगति जीअ का दाता।।

ब्रह्म गिआनी पूरन पुरखु बिधाता।।

ब्रह्म गिआनी का कथिआ न जाई अध्याखरू।।

ब्रह्म गिआनी सरब का ठाकुरू।।

ब्रह्म गिआनी की मिति कउनु बखानै।।

ब्रह्म गिआनी की गति ब्रह्म गिआनी जानै।।

हरखु सोगु जा कै नहीं बैरी मीत समानि।।

कहु नानक सुनि रे मन मुकति ताहि तै जानि।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2002, पृष्ठ संख्या 2-5, अंक 119

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जीवनोपयोगी सूत्र


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से
जीवन की शोभा और ऊँचाई आवश्यकता पूर्ति और वासना-निवृत्ति में है। मनुष्य में एक होती है वासना से प्रेरित चेष्टा और दूसरी होती है आवश्यकता की पूर्ति। इच्छाओं को सुनिंयत्रित करके निवृत्त करने से जीवन चमकता है और आवश्यकता की सहज में ही पूर्ति होती है।
जीवन में यदि सही दशा नहीं तो जीवन बोझिल हो जाता है, परिवार और समाज के लिए श्राप बन जाता है, लोगों को आतंक व मारकाट की कगार पर पहुँचाने वाला, हिंसक और चरित्रहीन बन जाता है।
जीवन का लक्ष्य है शांति, मुक्ति आवश्यकता-पूर्ति और इच्छा की निवृत्ति। यदि इच्छा निवृत्ति की दिशा नहीं मिली तो इच्छाएँ आगे बढ़कर आदमी को ही दबोच लेती हैं।
साधक को कैसा जीवन-जीना, क्या नियम लेना, किन कारणों से पतन होता है, किन कारणों से वह भगवान और गुरुओं से दूर हो जाता है और किन कारणों से भगवद् तत्त्व के नजदीक आ जाता है – इस प्रकार का अध्ययन, चिंतन, बीती बात का सिंहावलोकन व उन्नति के लिए नये संकल्प करने चाहिए।
‘आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है ? जगत क्या है, मैं कौन हूँ ?’ इसका श्रवण करो, मनन तथा निदिध्यासन करो और अंततः उस तत्त्व का साक्षात्कार करो। यही वेदान्त की रीति है।
जैसे उपयोगी पत्थर, लोहे का टुकड़ा या अन्य वस्तुओं को हम सँभालते हैं, वैसे ही कर्तव्य, कर्म करता हुआ ईश्वर का भक्त स्वयं प्रभु के लिए उपयोगी बन जाता है, उसे फलाकांक्षा की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। अंतर्यामी ईश्वर स्वयं उसकी सँभाल लेते हैं। समाज और प्रकृति उसकी सेवा में सजग रहते हैं। ऐसी दशा में निष्काम कर्मवीर को इच्छा करने की क्या आवश्यकता ? वह तो सत्यकर्म की रीतियों पर चलकर स्वयं को योग्य बनाता है। फल की इच्छा से उसका क्या सरोकार ?
किसी के दिल को ठेस न पहुँचे, किसी का कहीं कुछ बुरा न हो, कोई हानि न हो, इसका ध्यान रखते हुए जो कर्म किया जाता है वह कर्म यज्ञ है, पूजा है, उपासना है। ऐसा कर्म करने वाला साधक ही परमात्मा के समग्र रूप का साक्षात्कार कर सकता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार पुजारी वह है, जो पूजा तो भगवान की करता है, पर मंदिर या मन-मंदिर में नहीं। उसकी पूजा न तो मूर्ति पूजा है और न ही मानस-पूजा। वह तो अपने कर्मों के द्वारा भगवान की पूजा करता है। वह निष्काम कर्म करता है और वह भी ईश्वरार्पण भाव से।
गीता में समाधि से भी श्रेष्ठ एक अन्य वस्तु वर्णित है – ‘समत्व’। समाधि के बाद भी पतन हो सकता है, भक्त की भावना बदल सकती है, परंतु साधक यदि एक बार समता के सिंहासन पर आरूढ़ हो जाता है तो फिर वहाँ से उसका पतन नहीं हो सकता।
शक्ति की उपासना सामर्थ्य-प्रदायिनी है। ज्ञान की समझ शांतिदात्री है।
आओ मेरे प्यारे साधको ! अपनी ऐहिक और पारमार्थिक उन्नति के इच्छुको ! आ जाओ। तुम यशस्वी बनो। तुम संयमी बनो। तुम तेजस्वी बनो। तुम अपना और अपने पूर्वजों का नाम रोशन करो। तुम अपने और अपने कुल में आने वाले वंशजों के मार्गदर्शक बनो – तुम ऐसे महान आत्मा बनो।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2002, पृष्ठ संख्या 30, अंक 117
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दो प्रकार के साधन


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से
वेदों में मुख्य रूप से दो प्रकार के साधन बताये गये हैं- विधेयात्मक और निषेधात्मक।
यजुर्वेद के बृहदारण्यक उपनिषद् में आता है अहं ब्रह्मास्मि। अर्थात् ‘मैं ब्रह्म हूँ…’ तो जो मैं-मैं बोलता है, वह वास्तव में ब्रह्म है। लेकिन देह को मैं मानकर आप ब्रह्म नहीं होगे। आपका जोर देह पर है कि चेतन पर ? अहं पर जोर है कि ब्रह्म पर ? अहं ब्रह्मास्मि। ‘मैं ब्रह्म हूँ… मैं साक्षी हूँ….’ तो स्थूल ‘मैं’ पर जोर है कि शुद्ध ‘साक्षी’ पर ? यदि ‘मैं’ पर जोर है तो इससे अहंकार बढ़ने की संभावना है और ‘ब्रह्म1 पर जोर है तो अहंकार के विसर्जन की संभावना है। यह साधना है विधेयात्मक।
‘बीमारी होती है तो शरीर को होती है। दुःख होता है तो मन को होता है। राग-द्वेष होता है तो बुद्धि को होता है। गरीबी-अमीरी सामाजिक व्यवस्था में होती है। मैं इन सबसे निराला हूँ। बीमारी के समय में भी मैं बीमारी का साक्षी हूँ। दुःख के समय भी मन में दुःखाकार वृत्ति हुई उस वृत्ति का मैं साक्षी हूँ….’ इस प्रकार साक्षी स्वभाव…. ‘अहं ब्रह्मास्मि’ की भावना वाली साधना को बोलते हैं कि विधेयात्मक साधना। किन्तु इसमें अहंकार होने की संभावना है कि ‘मैं ब्रह्म हूँ…. मैं चेतन हूँ… मैं साक्षी हूँ…. ये लोग संसारी हैं। मैं अकर्त्ता हूँ, ये लोग कर्त्ता हैं।’
दूसरी जो निषेधात्मक साधना है उसमें अहंकार के घुसने की जगह नहीं है। कैसे ?
निषेधात्मक साधना में साधक यह चिंतना करता हैः ‘ मैं शरीर नहीं हूँ… इन्द्रियाँ नहीं हूँ… चित्त नहीं हूँ… अहंकार नहीं हूँ…’ इत्यादि। इस प्रकार ‘यह नहीं…. यह नहीं…… नेति…. नेति….. ‘ करते-करते फिर जो बाकी उसमें वह शांत होता जायेगा।
‘मैं आत्म-साक्षात्कार करके ही रहूँगा….’ इसमें अहंकार हो सकता है। ‘मुझे आत्म-साक्षात्कार नहीं करना है…’ यह भी अहंकार है, परंतु ‘मुझे तो पाना है… मुझे अपना अहं मिटाना है….’ तो मिटने में अहंकार को घुसने की जगह नहीं मिलती है। इसलिए वह बड़ा सुरक्षित मार्ग हो जाता है।
इस तरह निषेधात्मक साधना भी विधेयात्मक साधना से ज्यादा सुरक्षित रूप से हमें परमात्मा की विश्रांति में पहुँचा देती है। लेकिन जो निराशावादी हैं उनके लिए निषेधात्मक साधना की अपेक्षा विधेयात्मक साधना ज्यादा लाभकारी है। इसीलिए वेदों में दोनों मार्ग बताये गये हैं।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2002, पृष्ठ संख्या 9,10 अंक 115
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