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Tatva Gyan

अद्वैत ज्ञान की महिमा


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

दुःख क्यों होता है ?

मानव की प्रज्ञा पूर्ण विकसित नहीं है तथा उसे आत्मज्ञान में रुचि नहीं है इसीलिए दुःख होता है। यदि आत्मज्ञान में रुचि हो तो दुःख टिक नहीं सकता और अगर ज्ञान में रुचि न हो तो सुख टिक नहीं सकता।

जिसको अज्ञान ने घेर रखा है वह कहीं-न-कहीं दुःख बना ही लेगा और जो ज्ञान से परितृप्त है वह चारों ओर दुःख होते हुए भी सुखी रहेगा। ज्ञान ऐसी चीज है।

हम अपने मन के अनुसार, अपनी कल्पना के अनुसार जगत को देखना चाहते हैं। कल्पना की इस दासता को मिटाने के लिए घर छोड़ना पड़े, नौकरी छोड़नी पड़े तो भी सब कुछ छोड़कर इस आत्मविद्या को पा लेना चाहिए। ज्ञान बेवकूफी छुड़ाता है और ब्रह्म-परमात्मा का सुख देता है। यह आत्म-साक्षात्कार का रास्ता है। ब्रह्मविद्या ब्रह्म परमात्मा के पद पर प्रतिष्ठित कर देती है और चित्त की बेवकूफी छुड़ा देती है।

जगत में जो भी दुःख होते हैं सब चित्त की बेवकूफी के कारण होते हैं। जितनी बेवकूफी मजबूत उतना दुःख मजबूत, जितनी बेवकूफी कम उतना दुःख कम और बेवकूफी नहीं तो दुःख भी नहीं। तो कृपानाथ ! आप अपने ऊपर कृपा करना कि जब दुःख आये तो समझ लेना कि बेवकूफी के कारण दुःख आया है।

ईश्वर तथा प्रकृति कुछ और चाहते हैं और आप कुछ और चाहते हैं… आप वस्तु, व्यक्ति, परिस्थितियों को पकड़े रखना चाहते हैं तभी आप दुःखी होते हैं। आप अपने को जानते नहीं हैं और पकड़ रखते हैं, इस बेवकूफी के कारण ही दुःख होता है। आप अपने को जानते नहीं हैं और कहते हैं कि ‘यह मेरा सिद्धान्त है।’ फिर अपने सिद्धान्त के विपरीत कुछ होता है तो दुःखी हो जाते हैं।

जिन्होंने अपने-आपको जान लिया है, ऐसे ही किन्हीं महापुरुष के वचन हैं-

देखा अपने आपको मेरा दिल दीवाना हो गया।

न छेड़ो मुझे यारों मैं खुद पे मस्ताना हो गया।।

अपने आप पर जो मस्ताना हो गया, अपने-आपको जिसने जान लिया उसे फिर दुनिया का कोई भी दुःख दुःखी नहीं कर सकता और कोई भी सुख सुखी नहीं कर सकता।

जब तक अपने-आपको नहीं जाना था, तब तक हम भी न जाने क्या-क्या सोचते थे ! परमात्मा कहाँ होंगे ? कैसे होंगे ?…. तपस्या करेंगे, भगवान शिवजी आयेंगे और कहेंगे कि ‘वरदान माँगो।’ हम कहेंगे कि ‘कुछ नहीं चाहिए।’ शिवजी प्रसन्न हो जायेंगे और आलिंगन करेंगे, सिर पर हाथ रखेंगे…..’ आदि-आदि।

किन्तु जब गुरु की कृपा हुई तब पता चला कि शिव भी हम हैं और काली भी हम हैं, राम भी हम हैं और रहमान भी हम हैं, श्रोता भी हम हैं और वक्ता भी हम हैं…. केवल हम-ही-हम हैं गैर का नामोनिशान भी नहीं है।

कीड़ी में तू नानो लागे हाथी में तू मोटो क्यूँ ?

बन महावत ने माथे बैठो हाकणवालो तू को तू….

ऐसा आत्मज्ञान जिसको हो गया उसको दुःख कहाँ ? काल भी आ जाय तो काल की क्या ताकत ? ‘काल में भी मेरा ही स्वरूप है।’ ऐसा उसको बोध हो जाता है।

दुःख में द्वैत होता है, भय द्वैत में होता है, क्रोध दूसरे पर होता है, आकर्षण दूसरे से होता है। कितना भी भयानक आदमी हो, डरावना हो अपने-आपसे डरेगा क्या ? कितना भी सुन्दर आदमी हो उसे अपने-आपसे काम वासना होगी क्या ? कितना भी आदमी खराब हो उसे अपने आप पर क्रोध आयेगा क्या नहीं ? अपने-आपसे कैसा भय ? अपने-आप पर कैसा क्रोध ? अपने-आपसे कैसा आकर्षण ?

जहाँ दूसरा दिखता है वहीं सब मुसीबतें आ जाती हैं। ऐसा कोई दुर्गुण नहीं है जो द्वैत की भावना से न आये और ऐसा कोई सदगुण नहीं है जो अद्वैत की भावना से न खिले। ऐसा कोई आनंद और सामर्थ्य नहीं है जो अद्वैत की भावना से पैदा न हो।

लेकिन भेद ज्ञान के कारण, द्वैत के कारण हम अभेद ज्ञान से, अद्वैत ज्ञान से दूर चले गये। समाज में जब त्याग-वैराग्य की भावना थी, बुद्धि का  विकास था, उस समय उपनिषदों के ज्ञान का प्रचार था। जब समाज से त्याग-वैराग्य और संयम छूटता गया, ब्रह्म को जानने  वाले महापुरुष कम होते गये और धन-धान्य को प्यार करने वाले व्यक्ति बढ़ते गये, उनका प्रभाव बढ़ता गया, क्षुद्र वस्तुओं में उलझने वाले व्यक्तियों का प्रभाव बढ़ता गया, भोग को ही सार मानने वाले भोगियों का प्रभाव बढ़ता गया तबसे सेवाधर्म का प्रचार-प्रसार हुआ।

‘सेवा करेंगे तो हमें पुण्य मिलेगा…. स्वर्ग का सुख मिलेगा…. ‘ ऐसा सोचकर सेवा करने से पुण्य तो होता है किन्तु जन्म-मरण का चक्र नहीं छूटता। इसीलिए ज्ञानवान महापुरुष कहते हैं कि किसी को वस्तुएँ देकर, किसी की सुविधाएँ बढ़ाकर, किसी को सुख देकर किसी के अभावग्रस्त जीवन में सहायक होकर तुम अपने को कर्त्ता मत मानो। वरन् कर्त्ता-भर्ता श्रीहरि को मानकर तुम निष्काम हो जाओ।

निष्काम हो जाओगे तो स्वर्ग की वासना नहीं रहेगी। ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए तुमने सेवाएँ की तो वासनाएँ नष्ट हो जायेंगी, अंतःकरण शुद्ध हो जायेगा, कल्मष क्षीण हो जायेंगे और तुम ज्ञान के अधिकारी बन जाओगे।

जो लोग सेवा तो करते हैं परन्तु वाहवाही नहीं चाहते, ईश्वर को ही चाहते हैं उनका अंतःकरण शुद्ध हो जाता है, कल्मष क्षीण होते जाते हैं और कल्मष क्षीण होते ही उनमें ब्रह्म विद्या को पाने की प्यास जगती है।

जिसके कल्मष ज्यादा होते हैं उसको आत्मज्ञान पाने की रुचि नहीं होती और जबरन कोई सुनाये तो इस विद्या पर उसे विश्वास नहीं होता।

‘मैं आत्मा हो सकता हूँ ? मैं अमर हो सकता हूँ ? मैं पहले आत्मा को देखूँगा फिर मानूँगा…..

‘पहले तू आत्मा को देखेगा फिर मानेगा तो तू कौन है ?’

‘मैं गोविन्द भाई हूँ, पशा काका का भतीजा हूँ।’ इस तरह की मान्यताओं में ऐसे लोग उलझे रहते हैं।

स्वल्पपुण्यवतां राजन् विश्वासो नैव जायते….

जिनके पुण्य कमजोर हैं वे सत्संग सुन भी नहीं सकते। कुछ पुण्य होंगे तब सत्संग सुन तो पायेंगे किंतु सत्संग की बातों पर, ब्रह्मज्ञान की बातों पर उन्हें विश्वास नहीं होगा और यदि विश्वास होगा भी तो पुरानी मान्यता एक तरफ खींचेगी तथा आत्मज्ञान दूसरी तरफ खींचेगा। फिर वे जिसको मदद करेंगे उस ओर आगे बढ़ जायेंगे।

अगर दो चार सामाजिक फर्ज एक साथ निभाने को आ जायें तो पहले कौन सा निभाना चाहिए ? इसका निर्णय करने में कई लोग फिसल जाते हैं। फिर वर्षों बीत जाते हैं तथा इन काल्पनिक फर्जों को निभाते-निभाते जीवन पूरा हो जाता है और मुख्य कर्तव्य रह जाता है।

वास्तविक जीवन जीने की आदत पड़ जाय तो काल्पनिक जीवन का प्रभाव ही न पड़े। किन्तु वास्तविक जीवन जीने की पद्धति ही नहीं जानते हैं इसीलिए काल्पनिक जीवन जीने का इतना प्रभाव है कि संसार से सिवा कुछ दिखता ही नहीं है।

संसारी जिसे दुःख मानते हैं वह तो दुःख है ही लेकिन अनजान लोग जिसको सुख मानते हैं वह भी दुःख से भरा है। सुख चला न जाय इस दुःख से भरा है। भोग भोगने के लिए भी भोग देना पड़ता है।

जिसको अंदर का सुख नहीं मिला वह बाहर के सुखों को टिकाने में ही जिंदगी पूरी कर देता है फिर भी सुख तो टिकता नहीं है और सुख को सँभालने की मजदूरी सिर पर आ पड़ती है। पति को रिझाओ, पत्नी को रिझाओ, साहब को रिझाओ, सेठ को रिझाओ, नेता को रिझाओ, जनता को रिझाओ…. इन सबको रिझाने के पीछे माँग तो सुख की ही है और सुख तो टिकता नहीं है किन्तु रिझाने-रिझाने में ही जीवन पूरा हो जाता है।

परन्तु जो अपना मुख्य कर्तव्य निभा लेता है, अपने-आप में आराम पा लेता है, अपने आपको जान लेता है, वह किसी को रिझाने के चक्कर में नहीं पड़ता है बल्कि लोग उसको रिझाने के लिए उसके पीछे-पीछे फिरकर अपना भाग्य बना लेते हैं।

एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाय।

एक मुख्य फर्ज (परमात्म-ज्ञान) को पा लिया तो बाकी के सब फर्ज पूरे हो जाते हैं।

आप अगर अध्यात्म-ज्ञान के रास्ते चलोगे तो दूसरों को मान देना, दूसरों का हित चाहना, दूसरों का भला चाहना – यह आपका स्वभाव हो जायेगा।

एक बार कोई केवल तीन मिनट के लिए भी अपने स्वरूप में जग जाय तो उसका तो बेड़ा पार हो ही जायेगा, उसका दर्शन करके यक्ष, गंधर्व, किन्नरादि भी अपना भाग्य बना लेंगे। ऐसा  परमात्मा सबके हृदय में छुपा है फिर भी सब दुःखी हो रहे हैं…..

वह दूर भी नहीं है और उसको पाना कठिन भी नहीं है केवल अपनी उलटी मान्यताएँ छोड़ते चले जायें और सही मान्यताएँ,  वेद, उपनिषद् अथवा गीता के वचन और महापुरुषों के उपदेश को स्वीकार करते जायें। बेवकूफी के संस्कारों को छोड़ते जायें और वेदान्त के संस्कारों को प्रगट होने दें बस, बेड़ा पार हो जायेगा।

मानव का मन  अकारण फालतू विचार करने वाला  कारखाना है। मन अकारण दुःख बना लेता है, अकारण कल्पना कर लेता है। जो-जो विचार व्यक्ति के मन में आते हैं उन्हें ईमानदारी से लिखता जाय तो उसे लगेगा कि ‘लोग कहते हैं कि पागलखाना फलानी जगह है लेकिन पागलखाना तो मेरे ही पास है।’

एक बार पंडित जवाहरलाल नेहरू किसी मानसिक चिकित्सालय में गये। वहाँ किसी पागल ने नेहरू जी से पूछाः “तुम कौन हो ?”

नेहरू जी ने मुस्कराते हुए कहाः “मैं भारत का प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू हूँ।”

पागल ने कहाः “मैं भी पहले ऐसा ही बोलता था। आप यहाँ भर्ती हो जाओ, ठीक हो जाओगे।”

तो ये पूरी दुनिया एक पागलखाना है। पागल की नजर में नेहरू जी कैसे दिखते हैं ? ऐसे ही संसारियों की नजर में ब्रह्मवेत्ता दिखते हैं। जैसे वह पागल नेहरू जी को अपनी पंक्ति में लाना चाहता था, वैसे ही हम लोग भी आत्मारामी महापुरुषों को अपनी तराजू में तौलना चाहते हैं और अपनी पंक्ति में लाना चाहते हैं।

एक बार भगवान बुद्ध अपने प्यारे शिष्य आनन्द के साथ कहीं जा रहे थे। रास्ते में एक कुआँ था। एक आदमी पानी भरने के लिए बार-बार बालटी को कुएँ में डाल रहा था। बालटी छिद्रवाली थी। वह आदमी पानी भरने के बाद बालटी को ऊपर खींचता था लेकिन जब बालटी हाथ में आती थी खाली हो जाती थी। एक चुल्लू पानी भी उसके हाथ में नहीं आ पाता था। लगता तो ऐसा था कि कुएँ में कोई बड़ा काम चल रहा है, बड़ी प्रगति हो रही है परन्तु वह कमबख्त खुद भी प्यासा रहा और दूसरों को भी उसने प्यासा ही रखा।

करीब आधे घंटे तक बुद्ध वहीं ठहरे, फिर आगे गये। थोड़ी दूर जाने पर उन्होंने आनन्द से कहाः

“देखा ? वह आदमी क्या कर रहा था ? वह अभागा खुद भी नहीं पी पा रहा था और दूसरों को भी नहीं पिला पा रहा था। वह केवल अकेला ही ऐसा नहीं है। सारा संसार ऐसा ही है।

संसारी लोग भी बहुत परिश्रम करते हैं, शोर भी बहुत होता है, लगता है कि वे बहुत काम कर रहे हैं, बहुत प्रगति कर रहे हैं लेकिन वे अज्ञानी होकर जन्मे और अज्ञानी होकर ही मरेंगे। आत्मा का अमृत न वे खुद पी पाते हैं न किसी को पिला पाते हैं…. उनकी भी हृदयरूपी बालटी खाली की खाली ही रह जाती है…. हृदय आत्मरस से वंचित ही रह जाता।

अगर हृदय को आत्मरस से भरना है तो उपाय यही है कि संसार की चीजों को नश्वर मानकर अमर आत्मा से प्रीति कर लो। आत्मविचार को महत्व दो और उसे अपना बना लो। वेदान्त के अनुभवों को खूब प्यार करो और उसे अपना बना लो। फिर जैसे सूर्य अंधकार को खोजने जाय, रात्रि को खोजने जाय तो उसके वह मुश्किल है, वैसे ही आपके लिए परेशानियों को खोजना मुश्किल हो जायेगा।

अगर आप परेशानी को खोजने जाओगे तो परेशानी-को-परेशानी हो जायेगी कि यह मेरे पीछे क्यों पड़ा है ? आपको आत्म ज्ञान हो जाये फिर आप मुसीबत खोजो। लोग मुसीबत भेजेंगे अथवा आप पैदा भी कर लोगे तो मुसीबत-को-मुसीबत हो जायेगी कि ‘मैं कौन से घर आ गयी ?’ ऐसा है आत्मज्ञान ! ऐसी है ब्रह्मविद्या !

ब्रह्मज्ञानी आप भी निर्दुःख हैं और औरों को भी निर्दुःख करता है। जैसे पर्वत आप भी अडिग है तथा औरों को भी तरंगों की मार से बचाता है, ऐसे ही ज्ञानी भी अपने परमात्मस्वरूप में अडिग है और जो संसार की कल्पना की तरंगों की थपेड़ें खाकर थक-हारकर ज्ञानी के नजदीक आते हैं, उनको भी धीरज मिल जाती है, शांति मिल जाती है। लेकिन वे फिर उन्हीं तरंगों में दूर चले जाते हैं और जब थपेड़ें लगती हैं तब फिर पर्वत की ओर आते हैं। ऐसा करते-करते भी पर्वत पर ठहरने की आदत हो जाय तो बेड़ा पार हो जाय….

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2002, पृष्ठ संख्या 6-9, अंक 113

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सामान्य ज्ञान और विशेष ज्ञान


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

ज्ञान नित्य है, अनादि है और अनंत है। ज्ञान का न जन्म होता है न मृत्यु।

ज्ञान दो प्रकार का होता है – एक होता है सामान्य सत्ता का ज्ञान और दूसरा होता है करणजन्य ज्ञान।

सामान्य सत्ता का ज्ञान नित्य है। करणजन्य विशेष ज्ञान सापेक्ष है। वह देश, काल और वस्तु के इर्द-गिर्द मंडराता है। सामान्य सत्ता के ज्ञान से ही करणजन्य विशेष ज्ञान होता है। जैसे सूर्य का प्रकाश सामान्य सत्ता के रूप में है। दर्पण लिया और विशेष दिखा तो यह विशेष की विशेषता सामान्य के आश्रय से ही है।

सामान्य सत्ता का ज्ञान परमात्मा है और करण कहा जाता है इन्द्रियों को। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार – ये अंदर की इन्द्रियाँ हैं, उन्हें अंतःकरण कहा जाता है।  आँख, नाक, कान आदि इंद्रियाँ बहिःकरण कहलाती है।। इनसे (करण विशेष से) जो ज्ञान होता है वह परमात्मा (सामान्य सत्ता के कारण ही होता है।

इन इन्द्रियों के कारण जगत में भिन्नता दिखती है किन्तु जिस सामान्य सत्ता से दिखती है, वह सदा एकरस है तथा उसी का ज्ञान पाना मानव-जीवन का परम लक्ष्य है।

जिस ज्ञान की मौत नहीं होती, जिस ज्ञान का जन्म नहीं होता, वही हमारी आत्मा है और वही परमात्मा है। जब तक उसका ज्ञान नहीं होता तब तक लगता है कि ‘परमात्मा मरने के बाद मिलेंगे… वैकुण्ठ में जायेंगे तब मिलेंगे… गुरु कृपा करेंगे फिर मिलेंगे….।’ परन्तु जब गुरुकृपा हुई और ठीक से जान लिया तो लगेगा कि उसे पाना कितना सरल है !

इतना सरल कि अर्जुन को युद्ध के मैदान में मिल गया, राजा जनक को घोड़े की रकाब में पैर डालते-डालते मिल गया, राजा खट्वांग को दो मुहूर्त में मिल गया और राजा परीक्षित को सात दिन में कथा सुनते-सुनते मिल गया।!

परमात्मा को पाना सरल भी है और कठिन भी। तीव्र, तीव्रतर अथवा तीव्रतम जिज्ञासा तथा छटपटाहट हो व पवित्रता हो और सदगुरु मिल जायें तो बड़ा सरल हो जाता है।

एक छोटा सा विनोदी दृष्टांत है-

बुद्धुसिंह की बड़े घर में शादी हो गयी। उसे दहेज भी खूब मिला। यहाँ तक की सूई भई सोने की मिली। बुद्धुसिंह उस सूई से कढ़ाई करने लगा। कढ़ाई करते-करते सुई हाथ से गिर गयी। संध्या का समय था। वह भागा और बाहर सड़क के किनारे बिजली के खंभे की रोशनी में सूई ढूँढने लगा।

सड़क पर चलते लोगों ने पूछाः

“भाई ! क्या कर रहे हो ?”

बुद्धुसिंह- “क्या बताऊँ ? अभी फुर्सत नहीं है, बाद में बताऊँगा।”

लोगों ने फिर पूछा- “आखिर बात क्या है ?”

बुद्धुसिंहः “मेरी सोने की सूई खो गयी है। मैं किसी साधारण सूई के लिए मेहनत नहीं कर रहा हूँ।”

लोगः “सोने की सूई है तो खोजनी ही पड़ेगी लेकिन यहाँ कैसे गिरी ?”

बुद्धुसिंहः “गिरी तो घर में थी किन्तु उधर दीया जलाना पड़ता, इसलिए इधर ढूँढ रहा हूँ।”

अब यह बुद्धुसिंह की चतुराई है या बेवकूफी कि घर में कौन दीया जलाये ? इससे तो अच्छा है बाहर रोशनी में ही ढूँढ लें।

ऐसे ही हम भी जहाँ आनन्द का खजाना छुपा है, जहाँ सुख का सागर लहरा रहा है तथा जहाँ सब दुःखों के अंत की कुंजी पड़ी है, उस अंतर्यामी आत्मदेव में गोता नहीं मारते और सुख के लिए बाहर भटकते रहते हैं।

उस बुद्धुसिंह ने तो 2-4 घंटे गँवाये होंगे परन्तु हम तो कई सदियों से, कई जन्मों से संसार की मजदूरी में समय गँवाते आ रहे हैं। सुख को बाहर खोजते आ रहे हैं कि सर्टिफिकेट मिल जाय तो सुखी हो जाऊँ…. नौकरी मिल जाय तो सुखी हो जाऊँ… शादी हो जाय तो सुखी हो जाऊँ… दुश्मन मर जाय तो सुखी हो जाऊँ…

यह सब हो जाय तब भी हम पूर्ण सुखी तो होते नहीं केवल कुछ समय के लिए सुखाभास होता है। फिर भी इन बाह्य सुखों के पीछे ही अपनी जिंदगी बरबाद किये जा रहे हैं और यह केवल एक-दो लोगों की बात नहीं है। गोरखनाथ जी कहते हैं-

एक भूला दूजा भूला, भूला सब संसार।

बिन भूल्या एक गोरखा, जाके गुरु का आधार।।

सारा संसार यही भूल कर रहा है। सभी बाह्य सुखों में उलझ रहे हैं। इससे तो केवल वही बच पाता है जिसको सदगुरु का आधार है।

आप जो मेहनत कर रहे हैं वह किसलिये कर रहे हैं ? दुःखों का अंत हो और सुखों की प्राप्ति हो इसीलिए मेहनत कर रहे हैं। सारी जिंदगी बीत जाती है फिर भी दुःखों का अंत नहीं होता है। कुछ न कुछ दुःख बना ही रहता है और जो सुख मिलते हैं वे भी स्थायी नहीं होते हैं क्योंकि खोज होती है बाहर….।

कभी न छूटे पिंड दुःखों से, जिसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं।

मूल है सामान्य ज्ञान, उसके आश्रय से वृत्तियाँ उठती हैं और विशेष-विशेष में भटकाती हैं, सामान्य में नहीं आती हैं। सोकर जब प्रभात में उठते हैं तब ‘मैं हूँ’ यह खबर सामान्य ज्ञान से आती है, फिर विशेष ज्ञान चालू हो जाता है कि ‘मैं मोहन हूँ…. मैं सोहन हूँ… मैं कमला हूँ।’

सामान्य ज्ञान नित्य है। सृष्टि से पहले भी ज्ञान है। सृष्टि हुई तब भी ज्ञान रहता है और सृष्टि का प्रलय हो जाता है तब भी ज्ञान रहता है। प्रलय हो जाता है, कुछ नहीं रहता तब भी उस प्रलय को देखने वाला रहता है।

एक व्यक्ति ने महल बनवाया। बड़ा आलीशान महल था। वह व्यक्ति मेहमानों को महल दिखाने ले गया। महल देखकर लौटते समय उसने अपने पुत्र से कहाः “जाओ, अन्दर देखकर आओ कि कोई रह तो नहीं गया ?”

बेटा गया और महल के ऊपर की छत से बोलाः “पिता जी ! यहाँ कोई नहीं है।”

पिताजी मुख्य द्वार को ताला लगाने लगे। बेटे ने पूछाः “पिता जी ! ताला क्यों लगा रहे हैं ?”

पिताः “तुमने ही तो कहा कि कोई नहीं है। इसीलिए ताला लगा रहा हूँ।”

पुत्रः “पिता जी ! ‘कोई नहीं है’ – ऐसा बोलने वाला मैं तो हूँ।”

‘कोई नहीं है।’ कहने वाला तो कोई है। इसी प्रकार महाप्रलय हो जाता है, कुछ भी नहीं रहता है, ब्रह्मा, विष्णु और शिव के लोक भी महाप्रलय में लीन हो जाते हैं, उसकी भी खबर नित्य ज्ञान देता है। ‘रात्रि में बड़ी अच्छी नींद आयी, कुछ नहीं दिखा।’ तो अच्छी नींद आयी, कुछ नहीं दिखा… इसको तो कोई देख रहा है। इसको जो देख रहा है वही प्रलय का ज्ञान भी दे रहा है। दोनों एक ही हैं।

यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे… जो पिंड में है वही ब्रह्मांड में है। जो पानी की बूँद में है वही सागर में है। जो श्वास तुम्हारे नाक के द्वारा जाता है वह विराट के वायुतत्त्व के साथ जुड़ा है, जो जलतत्त्व तुम्हारे भीतर है वह व्यापक जलतत्त्व से जुड़ा है। इसी प्रकार अन्य तत्त्व भी जुड़े हुए हैं।

अगर सूर्य ठंडा हो जाय तो वैज्ञानिक कहने को भी नहीं रहेंगे कि तुम प्रकाश की कुछ व्यवस्था करो। जिस समय सूर्य ठंडा हो गया उस समय आप भी नहीं रहेंगे। जैसे सूर्य से आपका ताप जुड़ा है, वैसे ही सामान्य ज्ञान के साथ विशेष ज्ञान जुड़ा है और उसी विशेष ज्ञान में उलझकर हम मर रहे हैं।

‘हमें यह मिले…. यह मिले…’ में ही जीवन पूरा हो जाता है। जो अपनी इच्छा के अनुसार जगत की चीजें पाता है, उसे संदेह और डर बना ही रहता है। ‘पत्नी तो सुंदर होनी चाहिए….’ अगर सुंदर मिल गयी तो शंका के शिकार हो जाते हैं कि ‘बड़ी सुंदर है, पड़ोसी देखते होंगे, फलाना देखता होगा।’ तो गया मजा।

ऐसे ही धन मिला तो फिर उसको रखने की चिंता रहती है और धन चला न जाय इसका भय रहता है। धन आया है तो चला जायेगा – यह बात पक्की है। या तो धन चला जायेगा या धन को सँभालने वाला चला जायेगा।

ऐसा कोई सुखभोग नहीं, जिसके पीछे भय, दुःख, रोग नहीं।

ऐसा कोई संयोग नहीं, जिसका कभी वियोग न हो।।

भोगी होकर सब पछताते हैं…

हमें सुख लेने के लिए जो मजदूरी करते हैं वही हमारे दुःख का कारण बन जाता है। इससे तो अच्छा है कि सुख बाँटो और अपने आत्मविश्रांति के सच्चे सुख से एकाकार हो। सुख-भोग की वासना को हटाओ। जो सुख के दाता बनते हैं वे कभी दुःखी नहीं हो सकते। जो यश के दाता बनते हैं उन्हें यश की कमी नहीं होती। अतः सुख के भोक्ता मत बनो, यश के भोक्ता मत बनो।

मिलता है विशेष, सामान्य नहीं। सामान्य तो सदा मौजूद रहता है। विशेष मिलता है तो बिछुड़ भी जाता है। जो मिलता है वह बिछुड़ता है, ऐसा समझकर उसका उपयोग कर लो और सामान्य में विश्रांति पाओ।

अगर सामान्य सत्ता में आ गये तो आप सारी विशेषताओं के स्वामी हो गये। अपने घड़े का पानी सरोवर में डाल दिया तो घड़े का सारा पानी सरोवर हो गया।

जल में कुंभ कुंभ में जल बाहर भीतर पानी ।

फूटा कुंभ जल जले समाना यह अचरज है ज्ञानी।।

अपना घड़ा आप सरोवर में डालते हैं और भरकर उठाते हैं तब भारी लगता है परन्तु सरोवर में रहता है तब भारी नहीं लगता। अगर घड़ा फूट गया तो सरोवर का पानी और घड़े का पानी एक हो जाता है।

ऐसे ही आप मन-बुद्धि में आये हुए ‘मैं-मेरे’ को छोड़ दो और अपने सामान्य ज्ञान में आ जाओ तो सारा जगत आपका अपना-आपा हो जायेगा, सारा विश्व आपकी विहार वाटिका हो जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2002, पृष्ठ संख्या 2-4, अंक 112

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स्वभाव पर विजय


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

श्री कृष्ण से उद्धवजी ने पूछाः

“बड़े में बड़ा पुरुषार्थ क्या है ? बड़ी उपलब्धि क्या है ? बड़ी बहादुरी किसमें है ?”

श्रीकृष्ण ने कहाः “स्वभावं विजयः शौर्यः …… विषयों के प्रति इन्द्रियों का आकर्षित होने का जो स्वभाव है उस पर विजय पाकर आत्मसुख में स्थित होना यह बड़ी शूरता है।” आँख रूप की तरफ आकर्षित करती है, जीभ चटोरेपन की तरफ हलवाई की दुकान की तरफ ले जाती है, नाम इत्र आदि सुगंधित पदार्थों की तरफ भटकाती है, कान शब्द के लिए भटकाता है तो शरीर स्पर्श के लिए, विकारी काम के लिए खींचता है।

पाँच विषयों की तरफ भटकने वाला यह जीव अपनी इस विकारी भटकान पर विजय पा ले – यह बड़ी बहादुरी है। रणभूमि में किसी को मात कर दिया अथवा कहीं बम-धड़ाका कर दिया…. यह कोई बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात तो यह है कि जीव अपने विकारी आकर्षणों पर विजय पाकर निर्विकारी परमात्मा के सुख को, परमात्मा की सत्ता को, अपने परमात्म-स्वभाव को जान ले।

फिर भी मनुष्य अपने पुराने विकारी स्वभाव में भटककर अपने को लाचार बना देता है। फिर हे वाहवाही ! तू सुख दे… हे स्वाद ! तू सुख दे… हे इत्र ! तू सुख दे… करके स्वयं को खपा देता है।

जो बिछुड़े हैं पियारे से दरबदर भटकते फिरते हैं।

हमारा यार है हममें हमन को बेकरारी क्या ?

विषय-विकारों में जीव दरबदर भटकता फिरता है। कोई विरले संत ही होते हैं जो अपने आप में रहते हैं (अपने स्वरूप में जगे होते हैं।) और अपने आप में आये हुओं का संग ही जीव को मुक्तात्मा बना देता है। वशिष्ठजी कहते हैं- ‘इस जीव में चिरकाल की वासना और इन्द्रिय-सुखों के प्रति आकर्षित होने का स्वभाव है। इसलिए अभ्यास भी चिरकाल तक करना चाहिए।’

सारी पृथ्वी पर राज करना – यह कोई बड़ी बात बहादुरी का काम नहीं है। मौत के आगे तो किसी की दाल नहीं गलती। शूरमा तो वह है जो अपने आत्म-स्वभाव को जगाता है। स्वभावं विजयः शौर्यः …… जो अपने आत्म-स्वभाव में स्थिति करे, अपने जीवभाव पर विजय पाये, वही वास्तव में शूर है।

जो शूरवीर होता है वह दूसरों को भी शूरवीर बनाता है और जो डरपोक होता है वह दूसरों को भी डरपोक बनाता है। ‘ऐसा हो जायेगा तो ? हम मर जायेंगे तो ?….’ अरे ! आप मर सकें ऐसी चीज़ हैं क्या ? ऐसी कौन सी मौत है जो आपको मारेगी ? मारेगी तो शरीर को मारेगी और शरीर तो एक दिन ऐसे भी मरेगा ही। अतः, ऐसा हीन चिंतन करके डरना क्यों ?

काम विकार में गिरना, लोभ में फँसना, मोह ममता में फँसना, अहंकार में उलझना, चिंता में चूर होना इत्यादि जीव का स्वभाव है। इन तुच्छ स्वभावों पर विजय पाकर अपने आत्म स्वभाव को जगाना यही शूरता है।

जिस स्वभाव से दुःख पैदा होता है, चिंता पैदा होती है, पाप पैदा होता है तथा आप ईश्वर से दूर होते जाते हैं उस स्वभाव पर विजय पायें। ईश्वर के निकट आयें, पुण्यमय हो जायें, निश्चिंत हो जायें, निर्दुःख हो जायें, आत्मा को जानने वाला स्वभाव हो जाय – ऐसा यत्न करना चाहिए।

अपना असली स्वभाव तो सहज में है ही, केवल अपने नीच स्वभाव पर विजय पाना है। असली स्वभाव पर विजय नहीं पाना है, नीच स्वभाव पर विजय पाना है। असली स्वभाव तो आपका अमर आत्मा है।

आप रोग छोड़ दो तो तंदुरुस्ती आपका स्वभाव है, चिंता छोड़ दो निश्चिंतता आपका स्वभाव है, आप दुःख छोड़ दो तो सुख आपका स्वभाव है।

एक होता है नश्वर सुख, दूसरा होता है शाश्वत सुख। आप नश्वर सुख के आकर्षण पर विजय पाइये तो शाश्वत सुख को कहीं ले जाना नहीं पड़ेगा। वह तो आपके पास है ही। जैसे, कपड़े का मैलापन गया को स्वच्छता तो उसका स्वभाव है ही। हमने कपड़े को सफेद नहीं किया केवल उसका मैल हटाया। ऐसे ही जीवात्मा का स्वभाव है नित्यता, शाश्वतता, अमरता और मुक्ति….

जीव का स्वभाव वास्तव में शाश्वत है, नित्य है और वह परमात्मा का अविभाज्य अंग है परन्तु शरीर नश्वर है, अनित्य है और विकारों से आक्रान्त है। मन में क्रोध आया, आप क्रोधी हो गये, क्रोध चला गया तो आप शांत हो गये। मन में काम आया, आप कामी हो गये, काम चला गया तो आप शांत हो गये… तो शांति आपका स्वभाव है, निश्चिंतता आपका स्वभाव है, सुख आपका स्वभाव है।

अकेला सैनिक होता है तो उसे डर लगता है। किन्तु जब सैनिक सोचता है कि मेरे पीछे सेनापति है, सेनापति सोचता है कि मेरे पीछे राष्ट्रपति है, राष्ट्रपति सोचता है कि मेरे पीछे राष्ट्र का संविधान है तो इससे बल मिलता है। ऐसे ही साधक सोचे कि ‘मेरे पीछे भगवान हैं, शास्त्र हैं। मेरे पीछे गुरु की कृपा है, शुभ संकल्प है, गुरुमंत्र है। शास्त्र का संविधान, भगवान की नियति मेरे साथ है। मैं अपने स्वभाव पर विजय पाऊँगा। मैं अवश्य आगे बढ़ूँगा।

और आगे बढ़ने के प्रयास में एक बार नहीं, दसों बार फिसल जाओ फिर भी डरो नहीं। ग्यारहवाँ कदम फिर रखो। सौ बार गिर गये तो कोई बात नहीं, Try and try, you will be successful. स्वभाव पर विजय पाने का यत्न करते रहो, सफलता अवश्य मिलेगी। स्वभाव पर विजय पाने का दृढ़ संकल्प करो और उस संकल्प को पूरा करने का कोई न कोई व्रत ले लो। इससे सफलता शीघ्र मिलेगी।

कुछ लोग बोलते हैं कि ‘मैं कोशिश करूँगा, मैं देखूँगा हो सकता है कि नहीं…..’ ऐसे  विचार करना अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।

शिकागो (अमेरिका) में जंगली प्याज होती थी। वहाँ बहुत बड़ा प्याज का जंगल था। ‘प्याज के जंगल का हम लोग बढ़िया शहर बनायेंगे। We will do it.’ वहाँ के कुछ लोगों ने ऐसा संकल्प किया और प्याज का वह जंगल समय पाकर अमेरिका का प्रसिद्ध शहर शिकागो हो गया।

ऐसे ही आप परमात्मा को पाने का इरादा पक्का करो और उस  इरादे को रोज याद करो। अपना लक्ष्य सदैव ऊँचा रखो। शास्त्र और संतों के साथ कदम मिलाकर चलो अर्थात् उनके उपदेशानुसार चला तो सफलता आपके कदम चूमेगी।

लक्ष्य न ओझल होने पाये, कदम मिलाकर चल।

सफलता तेरे चरण चूमेगी, आज नहीं तो कल।।

परमात्म-सुख पाने का ऊँचा लक्ष्य बनायें और उस लक्ष्य को बार-बार याद करते रहें। शास्त्र और संत के उपदेश के अनुसार अपना प्रयास जारी रखें तो एक दिन सफलता अवश्य मिलेगी। भगवान आपके साथ हैं, सदगुरु की कृपा आपके साथ है। उनकी मदद कदम-कदम पर मिलती ही है। इसलिए आप उनसे दूर जाने के बजाय अपने स्वभाव पर विजय पा लें। यही शूरवीरता है। सारे विश्व में यही बड़ी बहादुरी का काम है।

संगी साथी चल गये सारे कोई न निभियो साथ।

कह नानक इह विपत में टेक एक रघुनाथ।।

आप जगत में जिनको संगी-साथी मानते हैं वे सभी शरीर के संगी-साथी हैं और एक दिन आपको छोड़कर अलविदा हो जाते हैं किन्तु जो वास्तव में आपके संगी-साथी हैं वे ईश्वर तो आपके रोम-रोम में रम रहे हैं।

जो जीव के पाप-तापों को हर लेते हैं और उसमें अपने सच्चे स्वभाव को भर देते हैं उन परमात्मा की शरण गये बिना इस जीव का परम मंगल नहीं हो सकता, परम कल्याण उसी से हो सकता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2002, पृष्ठ संख्या 5,6 अंक 111

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