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Tatva Gyan

सत्यस्वरूप की जिज्ञासा


संत श्री आशारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

जब बुद्धि सात्त्विक होती है तब बुद्धि में बुद्धि के प्रकाशक के विषय़ में जानने की जिज्ञासा होती है।

कईयों की तर्कप्रधान बुद्धि होती है तो कईयों की स्वीकृतप्रधान बुद्धि होती है। जिसकी बुद्धि तर्कप्रधान होगी उसे प्रश्न उठेगा कि जगत का रचयिता कौन है ? जिसकी बुद्धि स्वीकृतिप्रधान होगी वह स्वीकार करेगा कि जगत है तो उसका रचयिता भी है। रचयिता को मानने लग जाये- वह है भक्त और रचयिता को जानने की जिज्ञासा करे वह है जिज्ञासु। जिज्ञासु जानकर फिर मानता है और भक्त मानकर फिर परमेश्वर के स्वरूप को जान लेता है।

जब वह परमेश्वर के स्वरूप को जान लेता है तब उसकी सारी हृदय-ग्रंथियाँ खुल जाती हैं। सृष्टि के सारे रहस्य उसके आगे प्रगट हो जाते हैं। फिर उसे संसार की विचित्रता देखकर दुःख नहीं होता। हाँ, दुःखियों को देखकर करूणा होती है। दुःखियों को भी वह सुखी होने के रास्ते पर ले चलता है। साधारण लोग जिस प्रकार जगत को सच्चा मानकर जरा-जरा बात में सुखी-दुःखी होते हैं, वैसे पूर्ण भक्त या ज्ञानी सुखी-दुःखी नहीं होते हैं। उसे सुख-दुःख मन का खिलवाड़ मात्र लगता है। उसके लिए सुख भी मिथ्या है, दुःख भी मिथ्या है। खाना भी मिथ्या है, सोना भी मिथ्या है। जीवन भी मिथ्या है, मृत्यु भी मिथ्या है। सत्यस्वरूप एक परमात्मा है। वही ज्ञानस्वरूप एवं अनंत ब्रह्म है। सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म..… ऐसे सत्यस्वरूप, ज्ञानस्वरूप अनंतस्वरूप ब्रह्म में वह जाग जाता है।

इस सत्य को जानने की जिज्ञासा बहुत पुण्य से उत्पन्न होती है और बहुत पुण्य उत्पन्न भी करती है। एक बार साधक के हृदय में अपने स्वरूप को पाने की जिज्ञासा उत्पन्न हो जाये तो फिर सदगुरु उसे हँसते-खेलते, विनोद करते हुए उस दरबार में ले जाते हैं, जहाँ पहुँचने के बाद फिर पतन नहीं होता है। ….लेकिन हमारी जिज्ञासा तीव्र होनी चाहिए।

सत्यस्वरूप को पाने की जिज्ञासा तीव्र हो गयी तो समझो, आपके भाग्य में चार चाँद लग गये। जिनके कल्मष क्षीण हो जाते हैं, दूर हो जाते हैं उन्हीं को अपने राम में आराम पाने की इच्छा होती है।

हम लोग अपने को धार्मिक मानते हैं लेकिन धर्म का उदघाटन हृदय में नहीं होता है। धर्मानुष्ठान करने से हृदय में वैराग्य होना चाहिए। धर्म ते विरति, योग ते ज्ञाना। वैराग्य उत्पन्न हो गया तो वह भी पर्याप्त नहीं है, फिर योग की आवश्यकता होती है। इन्द्रिय संयम करके, अपने उदगम स्थान परमात्मा में  विश्रांति पाना-यह योग है। यह योग ही सत्यस्वरूप के ज्ञान को प्रगट कर देता है।

केवल वेदान्त के विचार शुष्कता ले आयेंगे। अकेला योग लय ले लायेगा। अकेला त्याग अभिमान ले आयेगा। अगर ज्ञान होगा तो अहंकार का विलय होगा।

बाबा काली कमलीवाले द्वारा रचित ‘पक्षपात रहित अनुभवप्रकाश’ में आता हैः

वशिष्ठजी के पौत्र और शक्ति के पुत्र पाराशरजी मित्रा के पुत्र मैत्रेय से कहते हैं-

“पहले तो यह अभिमान था कि मैं देह हूँ। अगर आत्मविचार करके देहाध्यास नहीं मिटाया तो वेष बनाने का दूसरा अभिमान आ जायेगा कि ‘मैं साधू हूँ…. मेरा बड़ा आश्रम है।’ इस अभिमान को निकालने के लिए बड़ा परिश्रम करना पड़ता है। यह जीव कोई न कोई अभिमान पकड़ लेता है और अभिमान ही बंधन का कारण बन जाता है।

एक बार उस परब्रह्म परमात्मा को पाने की तीव्र जिज्ञासा हो जाये और कलुषित संस्कारों को छोड़ने की इच्छा हो जाये तो ब्रह्मवेत्ता महापुरुष तुमको भगवदस्वरूप में हँसते-खेलते पहुँचा देंगे, तुमको पता भी न चलेगा।

ब्रह्मविद्या, सत्यस्वरूप का ज्ञान कोई मजबूरी करके पाने की चीज नहीं है। यह तो शहंशाहों का मार्ग है। इस ब्रह्मविद्या के द्वारा जिनके संशय क्षीण हो गये हैं, वे यह नहीं सोचते किः ‘यह उपासना ठीक है या वह उपासना ठीक है ? श्रीराम की भक्ति बड़ी है कि श्रीकृष्ण की भक्ति बड़ी है ? योग बड़ा है कि ज्ञान बड़ा है ? सत्संग बड़ा है कि कीर्तन बड़ा है ?’ ऐसी दुविधाएँ जिनकी शांत हो गयी हैं उनके प्रत्येक कार्य सहज-स्वाभाविक होते हैं, उन्हें करने नहीं पड़ते।

वे ज्ञानवान महापुरुष स्वर्ग की लालच से अथवा नर्क के भय से सत्कर्म नहीं करते हैं, वाहवाही की लालच से लोककल्याण के कार्य नहीं करते हैं और निंदा के भय से विशुद्ध कार्य नहीं छोड़ते हैं। उनका तो सहज स्वभाव होता है- सर्वभूतहिते रताः। फिर उन कल्याण के कार्यों के लिए चाहे उऩ्हें कष्ट सहना पड़े तो भी उनके लिए विनोद है और यश-अपयश मिल जाये तो भी उनके लिए विनोद है।

वे महापुरुष अपना कोई प्रयोजन लेकर नहीं चलते हैं, वे अपना स्वार्थ लेकर नहीं चलते हैं, वे अपना स्वार्थ लेकर नहीं चलते हैं, उनका सहज स्वभाव होता है। हम लोग कोई न कोई स्वार्थ प्रयोजन लेकर चलते हैं।

प्रयोजन तीन प्रकार के होते हैं- सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक। ज्ञानवान महापुरुषों का न धार्मिक प्रयोजन होता है, न सामाजिक प्रयोजन होता है और न ही आध्यात्मिक प्रयोजन होता है। उनकी प्रवृत्ति निष्प्रयोजन भी नहीं होती है वरन् निष्काम प्रवृत्ति होती है। उनका सहज स्वभाव होता है-जगाना, उनका सहज स्वभाव होता है-शीतल। ज्ञानवान को पहचानने के लिए शास्त्रों ने कई शुभ लक्षण बतलाये हैं। उनमें प्रमुख लक्षण यह है कि उनके श्रीचरणों में आदरसहित चुपचाप बैठने से हृदय में शांति आने लग जाये। यदि ऐसा होता है तो समझ लो कि विश्वनियंता के साथ उनका संबंध जुड़ा है। ऐसे महापुरुषों के मार्गदर्शन से हमारा जीवन भी समुन्नत हो सकता है और हमें उन्नत करने का उन पर कोई बोझा नहीं होता, उनकी स्वाभाविक स्थिति होती है।

किसी ने उन पर बोझ नहीं डाला है किः ‘आपका यह कर्त्तव्य है कि उपदेश दें, सत्संग करें, आश्रम सँभालें, लोगों से मिलें…..’ नहीं, उनके ऊपर कोई बोझ नहीं है। जब साधक को बोध हो जाता है तो गुरुदेव भी ऐसा नहीं कहते कि तुम ऐसा करना।’ गुरु भी स्वाभाविक कहते हैं किः ‘बेटा ! हो सके तो ऐसा जीना।’ वह भी यदि शिष्य पूछता है तो…… नहीं तो गुरु बोलते हैं किः ‘हम भी मुक्त तुम भी मुक्त।’

भावनगर में एक संत पधारे। वहाँ कोई साधक गायत्री पुरश्चरण कर रहा था। उसने संत के पैर पकड़े और कहाः “गुरु महाराज ! आप मुझे एक बार साक्षात्कार करा दीजिये। फिर आप जो कहेंगे  वही करूँगा।”

संतः “अरे ! यदि साक्षात्कार हो जाये तो आज्ञा करने की क्या जरूरत है ? फिर तो तेरे द्वारा जो भी होगा उससे लोगों का कल्याण होने लगेगा।”

शिष्य को बोध होने के बाद, सत्यस्वरूप का ज्ञान होने के बाद, सदगुरु आज्ञा नहीं करते किः ‘तुम यह करना,।’ यदि शिष्य पूछता है किः ‘क्या आज्ञा है गुरुदेव ?’ फिर गुरुदेव जो कह दें। बोलना पड़ता है तो बोल देते हैं बाकी उनको ऐसा नहीं होता किः ‘शिष्य ऐसा करे, वैसा करे….. मेरा नाम उज्जवल करे…. मेरे सिद्धान्त को फैलाये…..’ ऐसी इच्छाएँ ज्ञानवान को नहीं होती हैं।

वे अपने जागे हुए शिष्य को आज्ञा नहीं देते। हाँ, अगर जागे हुए में थोड़ी कमी है, थोड़ा कच्चापन है तो आदेश देंगे किः ‘ऐसा ऐसा करो…..’ ताकि कहीं गिर न जाए। आदेश भई उसके कल्याण के लिए देंगे। ऐसे ज्ञानवान महापुरुषों के लिए अष्टावक्र महाराज जी कहते हैं- ‘तस्य तुलना केन जायते ?’ उसकी तुलना किससे करें ? ऐसे ज्ञानवान महापुरुषों के संकेत के अनुसार चलने से प्रत्येक जीव शिवपद को प्राप्त कर सकता है। शर्त इतनी ही है कि उसमें सत्यस्वरूप के ज्ञान को पाने की तीव्र जिज्ञासा हो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2001, पृष्ठ संख्या 3,4 अंक 102

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ब्रह्मज्ञान की महिमा


संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।

छिन्नद्वेधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।

‘जिनके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गये हैं, जो संपूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शान्त ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। (गीताः 5.25)

संसार स्वप्न जैसा है। जन्म से लेकर जीवनभर मजदूरी करो लेकिन कुछ हाथ नहीं लगता है, जैसे भूसी को छडने से कुछ हाथ नहीं लगता है। संसार की बातें करना भूसी छड़ना है। माया से पार होने की बातें करना धान छड़ना है और ब्रह्म-परमात्मा की बातें करना चावल छड़ना है। जो ब्रह्म-परमात्मा को पाये हुए हैं उनके लिए संसार एक खेलमात्र है।

तुलसी पूर्व के पाप से हरिचर्चा न सुहाय।

जैसे  ज्वर के जोर से भूख विदा हो जाय।।

जिनके पाप जोर करते हैं उनको हरि चर्चा, ब्रह्म परमात्मा की चर्चा नहीं सुहाती है, उनके मन में तो माया के (भूसी छड़ने के) विचार घूमते हैं। जिनके सब पाप निवृत्त हो गये हैं वे माया में रहते हुए भी माया के विचारों से लेपायमान नहीं होते हैं। ज्ञान के द्वारा जिनके सब संशय निवृत्त हो गये हैं ऐसे पुण्यात्मा को अपने स्वरूप के विषय में कोई संशय नहीं रहता है।

जगत सत्य है या मिथ्या ? आत्मा सत्य है कि परमात्मा सत्य है ? आत्मा और परमात्मा भिन्न हैं कि अभिन्न हैं ? जीते जी मुक्ति मिलती है कि मरने के बाद मिलती है ? जीव ब्रह्म में भिन्नता है कि अभिन्नता ? इस विषय में उनके संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो जाते हैं। मैं जन्मने मरने वाला तुच्छ जीव नहीं हूँ किन्तु सर्वव्यापक ब्रह्म हूँ… मैं व्यक्ति विशेष परिच्छिन्न नहीं हूँ किन्तु अखण्ड ब्रह्माण्ड में व्यापक परब्रह्म हूँ…. इसमें उनको कोई संदेह नहीं होता है क्योंकि उन्होंने अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान पा लिया है।

जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत रहते हैं, वे ज्ञानी महापुरुष हैं। हर प्राणी का अपना-अपना प्रारब्ध होता है, अपना-अपना स्वभाव होता है, अपनी-अपनी पकड़ होती है और अपनी-अपनी मान्यता होती है। ज्ञानी महापुरुष सबमें स्थित परमात्मा में विश्रांति पाते हैं। अतः अपने स्वरूप में विश्रांति पाये हुए ऐसे महात्मा को देखकर सब प्रसन्न होते हैं और उनको स्नेह करते हैं। पशु पक्षियों पर भी यदि ज्ञानवान की दृष्टि जाती है वे उनमें भी अपनी आत्मा को निहारते हैं। दूसरों में आत्मस्वरूप निहारना यह भी उनका हित करने का बड़ा साधन है। जैसे ‘एक्स रे’ मशीन अपनी जगह पर होते हुए भी हड्डियों तक की फोटो ले लेती है वैसे ही ज्ञानी महापुरुषों की ब्रह्मभावपूर्ण निगाहें हम पर पड़ती हैं तो हमारे लिए भी अपने स्वरूप तक पहुँचने का मार्ग सरल हो जाता है।

शास्त्र में तो यहाँ तक कहा गया है कि लकड़ी पत्थर इत्यादि जड़ वस्तुओं को यदि ज्ञानी छूते हैं यह उन पर उनकी दृष्टि पड़ती है, स्पर्श मिलता है तो देर-सवेर उनका भी उद्धार हो जाता है तो चेतन जीवों का कल्याण हो जाये इसमें क्या आश्चर्य है ? इसीलिए ज्ञानी ‘सर्वभूतहिते रताः’ कहे गये हैं।

‘सर्वभूतहिते रताः का अर्थ यह नहीं है कि सब प्राणी अपना जैसा हित चाहते हैं वैसा हित। बच्चा अपनी बुद्धि के अनुसार अपना हित चाहता है, कामी अपनी बुद्धि के अनुसार अपना हित चाहता है, लोभी अपनी बुद्धि के अनुसार अपना हित चाहता है, अहंकारी अपनी बुद्धि के अनुसार अपना हित चाहता है। वास्तव में उनका उसमें हित नहीं है लेकिन ज्ञानी उनमें ब्रह्मदृष्टि की निगाह डालते हैं और उसी में सबका हित निहित है। इसी दृष्टि से कहा गया है कि ज्ञानी महापुरुष सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत रहते हैं।

आत्मज्ञान के पश्चात ज्ञानी महापुरुष का शेष जीवन लोगों को आत्मज्ञान पाने के प्रति जागृत करने में बीतता है। यह आत्म-जागृति का कार्य भी उनका स्वनिर्मित विनोद है। जो विनोदमय कार्य होता है उसमें थकान नहीं लगती है और उसमें कर्तापन का भाव भी नहीं होता है। जो थोपा जाता है वह थकान लाता है और जो किया जाता है वह कर्तापन लाता है लेकिन जो विनोद से होता है उसमें न कर्तापन होता है न थकान।

विनोदमात्र व्यवहार जेना ब्रह्मनिष्ठ प्रमाण।

ऐसे महापुरुषों का प्रत्येक व्यवहार विनोदमात्र होता है। उनका राज्य करना भी विनोदमात्र और भिक्षा माँगना भी विनोदमात्र…. उनका युद्ध करना भी विनोदमात्र और ‘रणछोड़राय’ कहलाकर भाग जाना भी विनोदमात्र। उनके लिए तो सब विनोदमात्र है लेकिन सामने वाले का जीवन बदल जाता है। सूर्य के लिए प्रकाश देना तो स्वाभाविक है लेकिन सारी वसुन्धरा के लिए जीवनदान हो जाता है। ऐसे ही ज्ञानी महापुरुषों की तो स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है लेकिन हम लोगों के हृदय में आनंद और उल्लास छा जाता है, हमारे जीवन में ताजगी और स्फूर्ति छा जाती है, सदप्रेरणा, सदप्रवृत्ति सत्स्वरूप परमात्म-प्रीति जागृत हो जाती है। हमारे जीवन में एक नई रोशनी छा जाती है, समझ आ जाती है। वे ही बताते हैं-

ऐ तालबेमंजिले तू मंजिल किधर देखता है ?

दिल ही तेरी मंजिल है, तू अपने दिल की ओर देख।

ऐ सुख के तलबगार ! ऐ सुख को ढूँढने वाले !

तू सुख को कहाँ खोजता है ?

सुखस्वरूप तेरा अपना-आपा है, उसी में तू देख।

लुत्फ कुछ भी नहीं जहाँ में, लेकिन दुनिया जान दे देती है।

बंदे को अगर खुद की खुदाई का पता होता, न जाने क्या कर देता ?

तू सुख को कहाँ खोजता है ?

अपना आनंद, अपनी खुशी, अपना ज्ञान, अपना आत्मिक खजाना अगर समझ में आ जाये तो बंदा कितना धन्य धन्य हो जाये !

यह ब्रह्मविद्या अदभुतत चमत्कार करती है। शरीर का ढाँचा वही का वही, नाम वही का वही, लेकिन गुरुदेव थोड़ी समझ बदल देते हैं तो दुनिया कुछ और ही  निगाहों से दिखने लगती है। यह ब्रह्मविद्या ही है, जिससे सब शोक, चिंताएँ, क्लेश, दुःख नष्ट हो जाते हैं।

छिन्नद्वेधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।

ब्रह्मवेत्ता महापुरुष की दृष्टि जहाँ तक पड़ती है एवं जहाँ तक उनकी वाणी जाती है वहाँ तक के जीवों को तो शांति मिलती ही है लेकिन जब वे मौन होते हैं, एकांत में होते हैं तो ब्रह्मलोक तक के जीवों को मदद मिलती है और उन्हें पता भी नहीं होता है कि मैंने किस-किस को मदद की है। जैसे सूर्य नारायण सदा अपनी महिमा में स्थित रहते हैं। उनके प्रकाश से कितने जीवों ने जीवन पाया-क्या वे इसकी गिनती रखते होंगे ? नहीं। सूर्यदेव अपनी जगह पर स्थित होते हुए भी, ब्रह्माकार वृत्ति से ब्रह्माण्डों को छूते हुए भी सबसे अलिप्त रहते हैं। सचमुच में बढ़िया से बढ़िया काम, बढ़िया से बढ़िया सेवा तो ब्रह्मवेत्ता ही कर सकते हैं। उनकी सेवा के आगे हमारी सेवा की तो कोई कीमत ही नहीं है। ऐसे ही आत्मसाक्षात्कारी पुरुष ‘सर्वभूतहिते रताः हैं।

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणं…. जिनका जीता हुआ मन निश्चल भाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

मन को जीतने के हजार-हजार उपाय किये जायें लेकिन जब तक मन को भीतर का रस ठीक से नहीं मिलता तब तक वह ठीक से जीता नहीं जा सकता। तुलसीदासजी महाराज कहते हैं-

निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा।

‘निज का सुख, अपने आत्मस्वरूप का सुख जब तक नहीं मिला तब तक मन स्थिर नहीं होता है।’

व्रत-उपवास करने से, एकांत जगह में रहने से कुछ समय के लिए मन शांत हो जाता है लेकिन फिर से बहिर्मुख हो जाता है। जैसे ठण्ड के दिनों में प्रभातकाल की ठण्डी से साँप ठिठुर जाता है एवं चुपचाप पड़ा रहता है लेकिन ज्यों ही सूर्य की किरणें मिलीं कि वह अपनी चाल चलने लगता है। ऐसे ही व्रत-उपवास, एकांतसेवन करने से थोड़ी देर के लिए तो मन स्थिर होता है लेकिन ज्यों ही भोग-सामग्री सामने आती है त्यों ही मन उसमें आसक्त हो जाता है क्योंकि उसे भीतर का रस नहीं मिला है। जिन्होंने भीतर के रस को पा लिया है उनका मन तो शांत होता ही है, साथ ही ऐसे महापुरुषों के सम्पर्क में आने वालों का मन भी शांत होने लगता है।

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः….

जिनके कल्मष दूर हो गये हैं, पाप दूर हो गये हैं वे ऋषि ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होते हैं।

बड़े में बड़ा पा है जगत के भोगों को सच्चा मानकर जगदीश्वर को भूलना। जो जगत को सत्य मानकर व्यवहार करता है वह चौरासी के चक्कर में ही घूमता रहता है लेकिन जो जगत को मिथ्या मानकर जगदीश्वर में मन लगाता है, संयम सदाचार को अपनाता है वह देर-सवेर जगदीश्वर तत्त्व का अनुभव पाने में भी सफल हो जाता है।

इसीलिए भगवान कहते हैं-

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।

छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2001, पृष्ठ संख्या 2-4, अंक 101

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ठीक अभ्यास करें


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

अभ्यासयोगेनयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।

परमं पुरुषं दिव्यं याति  पार्थानुचिन्तयन्।।

‘हे पार्थ ! परमेश्वर के ध्यान के अभ्यासरूप योग से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरन्तर चिन्तन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाशरूप दिव्य पुरुष को अर्थात् परमेश्वर को ही प्राप्त होता है।’ (गीताः 8.8)

अभ्यास तो सब करते हैं लेकिन भगवान कहते हैं कि आप अपने अभ्यास को योग बना लो। ऐसा अभ्यास करो कि निरन्तर उस परमेश्वर का ही चिन्तन हो।

जो जिसका चिन्तन करता है उसके गुण सहज ही उसमें आने लगते हैं। ईश्वर के गुण जीव में छुपे हुए ही हैं लेकिन फालतू चिन्तन से जो परतें चढ़ गयी हैं उन परतों को हटाने के लिए ईश्वर के चिन्तन की जरूरत पड़ती है। व्यर्थ का चिन्तन हटाने के लिए सार्थक चिन्तन करना पड़ता है। व्यर्थ का चिन्तन हट जाये तो सार्थक चिन्तन करने की जरूरत नहीं पड़ती, स्वतः होने लगता है। व्यर्थ का अभ्यास मिट जाये तो सार्थक अभ्यास करना नहीं पड़ता, सार्थक स्वभाव प्रगट हो जाता है।

जैसे, पार्वती जी जाना चाहती थीं अपने पिता के यज्ञ में और शिवजी ने कहा कि यह उचित नहीं है। लेकिन पार्वती जी को ऐसा था किः ‘माँ एवं बहनों से जरा मिल लूँगी।’ वे चली गयीं तो शिवजी ने क्या किया ? व्यर्थ का चिन्तन नहीं किया वरन् ….

संकर सहज सरूपु सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा।।

शिवजी ने ऐसा नहीं कहा किः ‘मैं तलाक दे दूँगा… दूसरी ले आऊँगा….’ नहीं। शिवजी अपने स्वरूप में स्थित हो गये, उनकी अखंड समाधि लग गयी।

ऐसे ही आपका भी वही सहज स्वरूप है जो शिवजी का है लेकिन अभ्यासयोगे न होने के कारण मन इधर-उधर की फालतू बातों में जाता है और दुःख बनाता है। इसीलिए भगवान कहते हैं-

अभ्यासयोगेनयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।

अभ्यास तो सब करते हैं। जैसे, रोटी बनाने, पढ़ाई करने, ड्राइविंग करने, मिट्टी का काम करने का अभ्यास… लेकिन ये अभ्यास प्रकृतिजन्य चीजों में उलझाने वाले होते हैं। अभ्यास तो ऐसा करो कि उस परमात्मा से, प्रकृति के स्वामी से आपका योग हो जाये। वास्तव में तो उसके साथ स्वतः योग सदा ही है। गलत अभ्यास के कारण उससे वियोग हो रहा है। उस वियोग के संस्कार हट जायें तो ईश्वर के साथ आपका नित्य संयोग हो जाये। फिर आपका चित्त कहीं और जायेगा ही नहीं।

फिर दिखेगी तो गाय लेकिन गहराई में चिन्तन होगा कि ‘गाय के अन्दर देखने एवं दूध बनाने की सत्ता भी परमात्मा की है….’ दिखेगा कोई व्यक्ति लेकिन उस व्यक्ति की गहराई में वही परमात्मा है…. दिखेगी तो रोटी और मक्खन लेकिन वह भी तो तू ही है… कैसे ? रोटी और मक्खन इसी धरती से उत्पन्न हुए। रोटी गेहुँ से बनी और गेहूँ धरती से उत्पन्न हुए। धरती का अधिष्ठान जल, जल का तेज, तेज का वायु, वायु का आकाश और आकाश का अधिष्ठान प्रकृति है। प्रकृति का भी अधिष्ठान है परमात्मा अर्थात् सर्वाधार परमात्मा से ही सब उत्पन्न हुआ है।

नहीं तो यूँ कह दो कि धरती, जल, हवा, प्रकाश और किसान की काम करने की चेतना यह सब भगवान का है। इससे गेहूँ उत्पन्न हुए एवं गेहूँ से रोटी बनी तो वह भी तो भगवन्मय है। ‘तेरी सत्ता से ही सब दिखता है…तेरी सत्ता से ही खाया-पिया जाता है… तू ही तू है। प्रभु ! तेरी जय हो….’

सब कुछ तू ही है  लेकिन बीच में  उल्टा अभ्यास हो गया ‘मैं’ का। देखती हैं आँखें लेकिन अहं बोलता है कि ‘मैं देखता हूँ…’ सोचता है मन किन्तु अहं बोलता है कि ‘मैं सोचता हूँ….’ निर्णय करती है बुद्धि लेकिन अहं बोलता है कि ‘मेरा निर्णय है….’ इस उल्टे अभ्यास को निकालने के लिए सुलटा अभ्यास करना पड़ता है।

जैसे केले के वृक्ष का तना बड़ा ठोस दिखता है लेकिन पत्तियाँ हटाओ तो कुछ भी नहीं… केवल परतें इकट्ठी हो गयी हैं तो ठोस लगता है। प्याज देखने में बड़ा ठोस लगता है, छिलके हटाओ तो कुछ नहीं। ऐसे ही इस अहं की परतें हटाते जाओ तो ‘अहं’ जैसी कोई चीज नहीं है। केवल वही परमात्मा है लेकिन बेवकूफी से अहं ने परेशान कर रखा है।

नुक्ते की हेरफेर से खुदा से जुदा हुआ।

नुक्ता अगर ऊपर रखो तो जुदा से खुदा हुआ।।

जहाँ सचमुच में ‘मैं’ है वहाँ मन जाता नहीं और जो ‘यह’ है उसे ‘मैं’ मान बैठे हैं… यही उल्टा अभ्यास पड़ गया है। ‘यह सिर… यह मुँह…. यह हाथ…. यह पैर…. यह पेट…’ कहते तो हैं लेकिन किडनी खराब हुई तो कहेंगेः ‘मैं बीमार हूँ….’ फिर आयुर्वेदिक रीति से ठीक हुई और कोई पूछे किः ‘कैसे हो ?’ ….तो जवाब मिलेगाः ‘मैं ठीक हूँ।’

वास्तव में आप बीमार भी नहीं होते और ठीक भी नहीं होते। बीमार होता है शरीर… ठीक होता है शरीर… मरता है शरीर…. आप तो ज्यो-के-त्यों हैं। लेकिन आप अपने असली ‘मैं’ को नहीं जानते बल्कि इस शरीर को ‘मैं’ मानते हैं इसीलिए दुःखी, चिंतित और परेशान होते रहते हैं। अगर शरीर को ‘मैं’ न मानें एवं वास्तविक ‘मैं’ का ज्ञान हो जाय तो सारी खटपटें सदा के लिए दूर हो जायें।

शास्त्र में दो प्रकार की युक्तियाँ आती हैं- विधेयात्मक एवं निषेधात्मक। संतों-महापुरुषों का यह अनुभव है कि विधेयात्मक की अपेक्षा निषेधात्मक युक्ति ज्यादा कारगर सिद्ध होती है। विधेयात्मक युक्ति से इतना शीघ्र तत्त्वज्ञान नहीं होता, जितना निषेधात्मक युक्ति से होता है।

जैसे, अहं ब्रह्माsमि। ‘मैं ब्रह्म हूँ… मैं चैतन्य हूँ… मैं शुद्ध-बुद्ध सच्चिदानन्द हूँ…. मैं अमर हूँ… मैं मुक्त हूँ….’ बात तो बिल्कुल सत्य है लेकिन साधारण आदमी ऐसा सोचे एवं सावधान न रहे, संयमी न रहे तो उसके लिए खतरा पैदा हो सकता है। ‘मैं ब्रह्म हूँ…’ इसमें ‘मैं’ पर जोर है कि ‘ब्रह्म’ पर जोर है यह देखना  पड़ता है। आदमी सावधान न रहे तो ‘अहं ब्रह्माsस्मि’ करके उसमें अहंकार भी आ जाता है अथवा वासनाओं की पूर्ति के लिए खुलेआम रास्ता भी बना लेता है।

इसकी अपेक्षा तो निषेधात्मक विधि सरल है किः ‘यह शरीर मैं नहीं हूँ… मन मैं नहीं हूँ… बुद्धि मैं नहीं हूँ….’ आदि आदि।

‘यह हाथ है।’ ….तो जो ‘यह’ है वह ‘मैं’ नहीं हूँ। जो ‘इदं’ है वह ‘अहं’ नहीं हो सकता और जो वास्तव में ‘अहं’ है वह कभी मिट नहीं सकता। ‘यह’ तो बदलता रहता है लेकिन ‘मैं’ वही-का-वही रहता है। ‘यह’ मर जाता है लेकिन ‘मैं’ नहीं मरता। वास्तविक अहं अमर आत्मा है…. आत्मा-परमात्मा का सनातन संबंध है। ॐ आनंद….ॐ माधुर्य… ॐ शांति…

स्वामी रामतीर्थ अमेरिका में किसी बगीचे में बैठे हुए थे। संन्यासी वेश था उनका…. नंगे पैर, मुंडन किया हुआ सिर और काषाय वस्त्र। उन लोगों ने पहले कभी किसी भारतीय संन्यासी को इस प्रकार देखा नहीं होगा। कुछ लोग यह कहकर उनकी मखौल उड़ाने लगेः “होयsss…. होयsss …. रेड मंकी….”

स्वामी रामतीर्थ यह सुन नाचने लगे और वे भी कहने लगेः होयsss…. होयsss… रेड मंकी…..”

स्वामी रामतीर्थ को भी ऐसा कहते देख उन लोगों ने कहाः “हम तुम्हीं को बोल रहे हैं।”

स्वामी रामतीर्थः “हाँ हाँ…….. मैं भी इसी को बोल रहा हूँ।”

उनको तो यह और पागलपन लगा। बोलेः

“अरे ! इसको बोल रहा हूँ’ का क्या मतलब ? यही तो तुम हो।”

स्वामी रामतीर्थः “नहीं, मैं यह नहीं हूँ। यह तो ‘रेड मंकी’ है। मैं तो ब्रह्म हूँ। ॐ…..ॐ….ॐ….”

लोगों को आश्चर्य हुआ कि कैसा विचित्र व्यक्ति है ! उन्होंने और चिढ़ाया लेकिन स्वामी रामतीर्थ बड़े प्रसन्न… इतने में कोई सज्जन वहाँ पहुँचे। उन्होंने देखा किः ‘ये तो भारत के कोई पहुँचे हुए महापुरुष लगते हैं। जीसस के लिए तो केवल सुना हैः ‘King of God…. King of Kings….’ लेकिन ये महापुरुष तो सचमुच में राजाओं के राजा लगते हैं। शरीर में होते हुए भी अपने को शरीर से परे मानते हैं इसलिए इन पर अपमान का कोई असर नहीं हो रहा है।’

उन्होंने स्वामी रामतीर्थ को प्रणाम किया और जहाँ उन्हें जाना था वहाँ पहुँचा दिया।

जिस घर में स्वामी रामतीर्थ ठहरे हुए थे उस घर के लोगों ने आज स्वामी जी को ज्यादा प्रसन्न देखकर पूछाः

“स्वामी जी ! आज आप ज्यादा प्रसन्न दिखाई दे रहे हैं… क्या बात है ?”

स्वामी रामतीर्थः “आज हमने ‘इसका’ मजा लिया। इस ‘रेड मंकी’ को देखकर लोग भी खुश हो रहे थे और मैं भी खुश हो रहा था।”

“कहाँ है रेड मंकी ?”

“यह है रेड मंकी….” अपने शरीर की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा।

“नहीं नहीं। यह तो शरीर है और हर सात साल में इसकी हड्डियों तक के सब कण बदल जाते हैं। लोग इसका मजाक उड़ा रहे थे तो हम भी मजा ले रहे थे।”

तब उनको महसूस हुआ कि अपने को शरीर से पृथक मानकर ही स्वामी जी ऐसा कह रहे हैं।

‘यह’ को ‘मैं-मेरा’ मानना – यही सारे दुःखों, पापों, अपराधों एवं राग-द्वेष की जड़ है। ‘यह’ शरीर है, मन है, बुद्धि है। ‘शरीर बदलता है और उसे देखने वाला मैं हूँ… मन बदलता है और उसे देखने वाला मैं हूँ… बुद्धि बदलती है और उसे देखने वाला मैं हूँ…..’

नानकजी ने ठीक ही कहा हैः

मन तू ज्योतिस्वरूप, अपना मूल पिछान।

मनुष्य ‘यह’ को ‘मैं-मेरा’ मानकर अपने में योग्यताएँ देखता है तो अहंकार आता है और दुर्गुण देखता है तो विषाद होता है। ‘कुछ करके, कुछ छोड़कर या कुछ पाकर बढ़िया बनूँ….’ यह सब फुरने ‘यह’ को ‘मैं’ मानने से ही उपजते हैं। ‘यह’ को ‘मैं-मेरा’ मानने से गलतियाँ भी ज्यादा होती हैं और दुःख भी बढ़ता है।

‘यह’ को ‘यह’ मानें और ‘मैं’ को ‘मैं’ मानें तो कोई दुःख नहीं होता। इस अभ्यास से सारे दुर्गुण निकलने लगते हैं, सदगुण आने लगते हैं और आध्यात्मिक बल बढ़ने लगता है।

जैसे, सूरज के उदय होते ही वातावरण में जो होना चाहिए वह होने लगता है। पृथ्वी से अंधकार विदा हो जाता है, हानिकारक जीवाणु नष्ट होने लगते हैं, पेड़ पौधों का पोषण होने लगता है, ऑक्सीजन बढ़ने लगता है आदि-आदि। इसके लिए सूरज को कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती। ऐसे ही आप ‘यह’ को ‘यह’ और ‘मैं’ को ‘मैं’ जान लेंगे तो आपसे जो होना चाहिए वह होने लगेगा और जो नहीं होना चाहिए वह मिटने लगेगा। इसके लिए आपको कोई मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। सब स्वाभाविक ही होने लगेगा।

अतः हिम्मत करके अपने सत्य स्वरूप को पाने में लग जायें। मन-बुद्धि व व्यवहार में जितनी सच्चाई होगी उतना ही सत्यस्वरूप परमात्मा अपने आत्मबल में प्रगट होने लगेगा। परमात्म-आनंद व नित्य नवीन रस अपने सहज स्वरूप को संभालते ही प्राप्त होने लगेगा। यह बहुत ऊँची  स्थिति है। इसके लिए सच्चाई से अवश्य लगना चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2001, पृष्ठ संख्या 6-8, अंक 100

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