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Tatva Gyan

जन्म कर्म चे मे दिव्यम्….


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग प्रवचन से

गीता में भगवान कहते हैं-

जन्म कर्म चे मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

व्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोsर्जुन।।

‘हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात् निर्मल और अलौकिक हैं – इस प्रकार जो मनुष्य तत्त्व से मुझे जान लेता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, किन्तु मुझे ही प्राप्त होता है।’ (गीताः4.7)

भगवान अपने जन्म और कर्म दिव्य क्यों बता रहे हैं ? इसलिए कि सुनने वालों के कर्म भी दिव्य हो जायें।

भगवान जो बताते हैं हम लोगों के मंगल के लिये ही बताते हैं। जैसे साधारण व्यक्ति का जन्म होता है कर्मबन्धन से, वासना वेग से, दुःख-सुख की थप्पड़ें खाने के लिए-ऐसा भगवान का जन्म नहीं होता। भगवान एवं कारक पुरुषों का जन्म वासना के वेग से नहीं होता, करुणा-कृपा से होता है। परहित से भरे अंतःकरण से होता है।

भगवान का जन्म दिव्य है अर्थात् भगवान देह को ‘मैं’ नहीं मानते और स्वयं को कर्मों का कर्त्ता-भोक्ता नहीं मानते, कर्म के फल की इच्छा नहीं रखते। जैसे भगवान अपने को देह नहीं मानते वैसे ही आप भी इस पंचभौतिक शरीर को ‘मैं’ न मानें तो आपका कर्म भी दिव्यता की खबर देगा। आप अपने को कर्मों का कर्त्ता न मानें, दूसरे को नीचा दिखाने के लिए दिखाने के लिए कर्म न करें, कर्म में लापरवाही न रखें तो आपके कर्म दिव्य हो जायेंगे।

जैसे, दीया जगमगाता है और प्रकाश देता है, ऐसे ही भगवान का जन्म और कर्म हम लोगों को प्रकाश देता है। महापुरुषों के जन्म और कर्म हम लोगों के लिए प्रकाशदायी हैं।

जन्म तो मेरा नहीं हुआ है शरीर का हुआ है और आपको भी याद दिलाता हूँ कि आप भी ऐसा जन्म दिन मनाना कि शरीर होते हुए भी शरीर से न्यारे…..

देह छता जेनी दशा वर्ते देहातीत।

ते ज्ञानीनां चरणमां हो वंदन अगणित।।

भगवान की दिव्यता स्वतः सिद्ध है और हमें साधन से सिद्ध करनी पड़ती है, कर्मों से सिद्ध करनी पड़ती है। कर्म दिव्य कैसे बनायें ?

किसी व्यक्ति को नीचा दिखाने के लिए कर्म करते हैं, अहंकार सजाने के लिए कर्म करते हैं, वासना-पूर्ति के लिए कर्म करते हैं तो कर्म बन्धन रूप हो जाता है लेकिन भगवदप्रीति के लिए, भगवद आनन्द उभारने के लिए, अपना असली सुख, आत्मप्रकाश जगमगाने के लिए जब कर्म किये जाते हैं तो कर्म दिव्य हो जाते हैं। फिर चाहे गुरु आश्रम में शबरी भीलन की बुहारी हो या मीरा का मेवाड़ में कीर्तन…. चाहे भर्तृहरि का तप हो या गोपीचंद का त्याग… उनके कर्म दिव्य हो गये।

वेद मे ‘सेतूगान’ आता हैः ‘अश्रद्धा की दीवार को श्रद्धा से तोड़ दें, असत्य की दीवार को सत्य से तोड़ दें, क्रोध की दीवार को अक्रोध से तोड़ दें और लोभ की दीवार को दान से तोड़ दें।

जीवात्मा को बंधन में डालने वाली ये चार दीवारें हैं। इन चार दीवारों को तोड़कर हम अपने मुक्त ज्ञानस्वभाव में जग जायें। जैसे, दिया जगमग-जगमग प्रकाशता है ऐसे ही हम साक्षी, अमर आत्मस्वभाव में प्रकाशित हो जायें….

बड़े में बड़ा दुर्भाग्य है कर्म बन्धन बढ़ाते जाना। कर्मों को कर्मों से काटने की कैंची या युक्ति सत्संग से ही मिलती है। इसीलिए राजे-महाराजे राजपाट छोड़कर महापुरुषों को खोजते थे,  सत्संग खोजते थे। सत्संग से कर्मों में दिव्यता आती है और कर्मों की दिव्यता आपके जन्म को भी सफल बना देती है।

भगवान और साधारण व्यक्ति के जन्म में, कारक पुरुष और साधारण व्यक्ति के जन्म में फर्क है, लेकिन भगवान ने सबको ऐसा अवसर दिया है कि अपने कर्मों को दिव्य बना सकें। जिसके कर्म दिव्य हो गये उसका जन्म का फल भी दिव्य हो जाता है। उसका दुबारा जन्म ही नहीं होगा तो फल दिव्य हो गया….

साधारण व्यक्ति कर्म करता है तो कर्म का कर्त्तापन मौजूद होता है लेकिन भगवान कर्म करते हैं तो कर्त्तापन न होने के कारण भगवान के उन कर्मों से नये कर्म नहीं बनते। भगवान के भी नहीं बनते और भगवान को जिन्होंने जान लिया उनके भी नहीं बनते। ये हो गयी दिव्यता….

साधारण जन्म और कर्म एवं दिव्य जन्म और कर्म में जो ठीक से फर्क जान लेता है और दृढ़ता से मान लेता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता।

भगवान के दिव्य जन्म और कर्मों को जाने और लाभ उठायें। भगवान परमात्मा हैं और हम उसके सनातन अंश आत्मा हैं।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।

जो भगवान का आत्म चैतन्य है, उसी से अभिन्न हमारा चैतन्य है। जैसे, जिस विद्युत से राष्ट्रपति का पूजागृह जगमगा रहा है उसी विद्युत से गरीब मोहताज का बाथरूम भी प्रकाशित हो रहा है। विद्युत तत्त्व वही का वही है। काँच के महल में दिया जगमगा रहा है और मिट्टी की हाँडी में दिया जगमगा रहा है तो काँच के महल की चमक कुछ सुहावनी दिख रही है और मिट्टी की हाँडी के दिये की चमक नपी तुली है लेकिन स्वभाव दोनों का एक है। ऐसे ही तुम्हारे अंतःकरण में जो ज्ञानस्वरूप ईश्वर है, जिसका कभी जन्म हुआ ही नहीं और जिसकी कभी मौत होती ही नहीं है ऐसा तुम्हारा ज्ञानस्वरूप आत्मा और परमात्मा दोनों एक हैं।

मन तू ज्योतिस्वरूप, अपना मूल पिछान।

आपके शरीर के जन्म को अपना जन्म न मानो, शरीर के बुढ़ापे को अपना बुढ़ापा मत मानो, शरीर की बीमारी को अपनी बीमारी मत मानो, शरीर की पीड़ा को अपनी पीड़ा मत मानो…. शरीर की पीड़ा को अपनी पीड़ा मानोगे तो हो जायेगा दुःख और शरीर की पीड़ा को शरीर की पीड़ा मानोगे, ज्ञान से देखोगे तो हो जायेगी तपस्या !

‘जेलर’ होकर जेल में चक्कर लगाओगे तो वेतन भी मिलेगा और सलामी भी…. लेकिन कैदी होकर जेल में धकेले गये तो बेइज्जती होगी। है तो दोनों जेल में। ऐसे ही आप शरीर में धकेले जाते हो तो हो जाती है कैद, लेकिन ज्ञान है और अपने ढंग से जीते हो, शरीर में होते हुए भी शरीर से पृथक होकर जीते हो तो हो जाते हो मुक्त…

शास्त्र, संत और भगवान जिसके लिए मना करते हैं वह न करें तो आप अपने ज्ञान में आ जाते हैं, मुक्त हो जाते हैं लेकिन शास्त्र, संत और भगवान जिसके लिए मना करते हैं वही करें तो आप हल्की योनियों में धकेल दिये जाते हैं, कैद हो जाते हैं। किसी को भी पकड़कर जेल में नहीं डाला जाता। कानूनी अपराध होता है, अपराध साबित होता है तभी कोई जेल में भेजता है। ऐसे ही प्रकृति के नियम तोड़ने से, ईश्वरीय नियम तोड़ने से, मनमाना करने से रजो-तमोगुणी स्वभाव बन जाता है।

भगवान अपने जन्म-कर्म की दिव्यता बताते हुए कहते हैं कि आप भी अपने स्वभाव में दिव्यता लायें अपने कर्म में दिव्यता लायें। दिव्यता मतलब ? अपने स्वभाव में, अपने कर्म में ज्ञान का प्रकाश लायें। क्या करना क्या न करना ? क्या खाना क्या न खाना ? आदि का विवेक करते हुए अपने कर्मों को दिव्य बनायें तो आपका जन्म फल भी दिव्य हो जायेगा फिर मोक्षफल मिल जायेगा। भगवान की ‘मैं’ के साथ आपकी ‘मैं’ मिल जायेगी तो जैसे भगवान का जन्म-कर्म दिव्य हैं वैसे ही आत्म परायण होकर आपके जन्म कर्म भी दिव्य हो जायेंगे…. अतः अपने जन्म-दिवस या किसी के जन्म दिवस के अवसरों पर भगवान के इन वचनों को विचारें और रहस्य समझें तथा परम रहस्यमय परमात्म सुख पा लें। ॐ शांति…. ॐ…. ॐ….

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2001, पृष्ठ संख्या 3,4 अंक 100

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सुख-दुःख में स्वस्थ रहें…


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

श्रीमद् भगवदगीता में आता हैः

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।

तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः।।

ʹजो निरन्तर आत्म भाव में स्थित, दुःख-सुख को समान समझने वाला, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समान भाववाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रिय को एक-सा मानने वाला और अपनी निन्दा स्तुति में समान भाववाला है (ऐसा पुरुष गुणातीत कहा जाता है)ʹʹ गीताः 14.24

यह श्लोक बताता है कि हमारे जीवन में उपलब्धि की पराकाष्ठा है समता। यह समता तभी आती है जब हममें अभ्यासयोह हो। अभ्यास का तात्पर्य क्या है ? किसी भी चीज को बार-बार सोच-विचारकर उसमें तदाकार होना-यह अभ्यास है। ऐसा अभ्यास तो बहुत होता है लेकिन अभ्यास में अगर योग न मिले ते वह अभ्यास संसारचक्र में घुमाता है। गीताकार भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।

परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्।।

ʹहे पार्थ ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यासरूप योग से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरन्तर चिंतन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाशरूप दिव्य पुरुष को अर्थात् परमेश्वर को ही प्राप्त होता है।ʹ (गीताः8.8)

अभ्यास तो सभी करते हैं… कोई रोटी बनाने का, कोई पढ़ने का तो कोई सेवा करने का  अभ्यास करते हैं लेकिन जब तक अभ्यास में योग नहीं मिलता तब तक जीव संसार-भट्टी में ही पचता रहता है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- ʹहे अर्जुन ! तू ऐसा ज्ञानी बन जो सुख-दुःख और निंदा-स्तुति में सम रहता है। मिट्टी, पत्थर एवं स्वर्ण में जिसको समान भाव रहता है। उसको बाहर से तो भेद दिखता है लेकिन उसके चित्त में से सुवर्ण की आसक्ति और मिट्टी से घृणा, सुख की आसक्ति और दुःख का भय चला जाता है।ʹ

ऐसा पुरुष अपनी आत्मा में स्थित रहता है, वही स्वस्थ कहा जाता है।

जिसको अपनी आत्मा का ज्ञान नहीं है ऐसा मनुष्य दुःख में तो दुःख से अस्वस्थ रहता ही है, सुख में भी स्वस्थ नहीं रहता है। ʹसुख आये तो सदा टिका रहे एवं और ज्यादा बढ़े…..ʹ इस चिंता-चिंता में वह उस प्राप्त सुख को नहीं भोग सकता। इसलिए वह सुख में भी अस्वस्थ रहता है। लेकिन जिनको आत्मज्ञान हो चुका है ऐसे महापुरुष सुख-दुःख दोनों में स्वस्थ रहते हैं।

जो स्वस्थ होता है उसको सुख-दुःख भयभीत नहीं कर सकते। अस्वस्थ व्यक्ति पर ही जहर का असर होता है। जो संपूर्णतः स्वस्थ है वह जहर को भी पचा लेता है। महाबली भीम को जहर दिया गया तो उनका बल बढ़ गया था। जो स्वस्थ होता है उसे संसार में दुःख-मुसीबत के कड़वे घूँट मिलते हैं तो उसकी योग्यता बढ़ती है और संसार के लोगों का प्यार मिलता है तो भी आनंद में रहता है। मीराबाई को जहर का प्याला मिला तो भी स्वस्थ रहीं और प्रेम से तो गिरधर के भजन गाती ही थीं।

सुख-दुःख में स्वस्थ रहना ही योग है। हम भगवान की मूर्ति के आगे फल-फूल रखकर पूजा करते हैं, वह तो अच्छा है लेकिन उसमें योग मिलाना चाहिए, नहीं तो वही अभ्यास सालों तक चलता रहेगा। पूजा अच्छी होगी तो मन स्वस्थ रहेगा और अच्छे से न होगी तो वह दिन बेकार लगेगा एवं मन अस्वस्थ रहेगा। क्यों ? क्योंकि सेवा-पूजा करने का अभ्यास तो है लेकिन उसमें योग नहीं है।

साधना अभ्यास में अगर योग मिल जाये तो साधक सिद्ध पुरुष हो जाये। फिर वह पूजा करे तो भगवान की पूजा है ही और पूजा न करे भी भगवान की पूजा है।

भगवान श्रीकृष्ण जी कुछ करते हैं वह योग हो जाता है क्योंकि वे सुख-दुःख में स्वस्थ हैं। कंस उनकी कितनी भी निंदा करे, उनके खिलाफ षड्यन्त्र करे फिर भी वे भयभीत नहीं होते हैं और ग्वाल गोपियाँ प्रेम करती हैं फिर उनमें आसक्त नहीं होते हैं। भगवान श्रीकृष्ण को माता यशोदा से प्रेम मिलता है और पूतना से जहर मिलता है फिर भी वे जो गति यशोदा को देते हैं वही गति पूतना को भी देते हैं क्योंकि उनकी दृष्टि में सब अपना ही स्वरूप है।

भगवान श्रीरामचन्द्रजी को 14 वर्ष का वनवास दिलाने में जिसने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थई ऐसी मंथरा से मिलने श्रीरामजी स्वयं गये और राजमहल में ले आये। श्रीरामजी के आगे मेघनाथ अपनी बढ़ाई हाँकता है फिर भी वे स्वस्थ हैं और रावण का भाई विभीषण उनकी शरण में आता है फिर भी वे स्वस्थ हैं क्योंकि वे सदैव अपने आत्मस्वरूप में स्थित हैं। ऐसे ही राजा जनक, शुकदेवजी महाराज, रानी मदालसा, गार्गी, सुलभा, नानकजी, कबीरजी, श्रीरामकृष्ण परमहंस आदि अनेकों महापुरुष अपने आत्मस्वरूप में स्थित थे। अब साईं आसाराम की ऐसी आशा है कि ‘आप सब भी स्वस्थ हो जाओ।’

कोई कहे किः ‘बापू ! हमें सर्दी, बुखार आदि कुछ भी नहीं है। हम स्वस्थ हैं।’

नहीं…. हकीकत में तो आपका शरीर स्वस्थ है, आप स्वस्थ नहीं हो। ‘स्व’ में स्थित होना ही ‘स्वस्थ’ होना है। ‘स्व’ हमारी आत्मा है, मुक्ति है, अमरता है। ‘स्व’ हमारा परमात्मा है। ‘स्व’ को पाना हमारा निजी जन्मसिद्ध अधिकार है। यदि उसको प्राप्त कर लें तो हम सदा के लिए स्वस्थ हो जायें। फिर हमारा शरीर बड़े-बड़े महलों में रहे तो हममें उसका अहंकार न आये और झोंपड़ी में रहे तो उसका हमें विषाद न हो क्योंकि हम ‘स्वस्थ’ अर्थात् ‘स्व’ में स्थित हो चुके हैं।

पूरे हैं वो मर्द जो हर हाल में खुश हैं….

मिला अगर माल तो उस माल में खुश हैं।

हो गये बेहाल तो उस हाल में खुश हैं।

कभी ओढ़े टाट तो कभी बाट में खुश हैं।।

चित्त की समता हमारी आंतरिक शक्तियों को बढ़ाती है जबकि विषमता हमारे बल और ओज को क्षीण कर देती है।

हमारा चित्त यदि अपवित्र होता हो तो उसके दो कारण हैं। वे दो कारण यदि समझ में आ जायें तो चित्त की अपवित्रता दूर हो जाये। एक है सुख की लालसा और दूसरा है दुःख का भय। इन दो कारणों से हमारा चित्त अपवित्र होता है। सुख के दुष्परिणामों से हमारा चित्त अपवित्र होता है। सुख के दुष्परिणामों को जानते हुए भी हम उसकी तीव्रता से प्रभावित होने के कारण उसके प्रति अज्ञानी हो जाते हैं, समझदार होकर भी नासमझी में फिसल जाते हैं, समझदार होकर भी नासमझी में फिसल जाते हैं।

घर से भरपेट भोजन करके निकले। रास्ते में किसी चीज की खुशबू आयी… जानते हैं कि उसे खाने से अम्लपित्त (एसिडिटी) होगी फिर भी खा लिया तो यह हुआ समझदार होकर भी नासमझी का व्यवहार। जगत के सुख में जो फिसल जाता है, वह बुद्धिमान होते हुए भी मूर्ख है।

लेकिन जिन्होंने सुख-दुःख, मान-अपमान और प्रिय-अप्रिय में चित्त की समता को प्राप्त कर लिया है, जो सुख-दुःख को स्वप्नवत् समझते हैं ऐसे ज्ञानी महापुरुष ही ‘स्वस्थ’ हैं।

संसार में सुख-दुःख का सिलसिला तो चलता ही रहता है। ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जहाँ सुख होता है वहाँ दुःख भी अवश्य होता है और जहाँ दुःख होता है वहाँ सुख भी आता ही है। सुख-दुःख तो आते जाते रहते हैं लेकिन हम उनसे मिल जाते हैं इसीलिए सुखी-दुःखी होते रहते हैं। उनसे अलग होकर हम अपने-आपको जान लें तो बेड़ा पार हो जाये… उनके साक्षी होकर हम अपने आत्मस्वरूप में स्थित हो जायें तो कल्याण हो जाये।

संत नामदेव जी महाराज एक ऐसे ही महापुरुष थे जो अपने आत्मस्वरूप में स्थित थे। उनके जीवन में कितनी ही अनुकूलता-प्रतिकूलताएँ आयीं लेकिन वे न तो अनुकूलता में आसक्त होते थे और न ही प्रतिकूलता से भयभीत होते थे।

एक बार उनके घर उनकी पत्नी के दो भाई अतिथि होकर आये। पत्नी ने कहाः

“आप तो पूरा दिन ‘विट्ठल…विट्ठल….’ करते रहते हैं। मेरे भाई आये हैं। उनके भोजन की क्या व्यवस्था करेंगे ? उनको क्या खिलायेंगे ?”

नामदेवजीः “तू भोजन की चिंता क्यों करती है ? अभी दोपहर को आये हैं। शाम तक के भोजन की व्यवस्था तो है। कल एकादशी को उपवास है। ठाकुरजी का जो प्रसाद होगा, वही उन को देंगे और हम भी उसे ग्रहण करेंगे। परसों की दोपहर आने में 48 घंटों की देर है, उसकी अभी से चिंता क्यों करती है ? अभी तो ‘विट्ठल…. विट्ठल…’ करो।”

वह तो संसार में सत्यबुद्धि रखने वाली थी अतः चिंता करती रही किन्तु नामदेव जी चले भगवान विट्ठल के मंदिर में। ‘विट्ठल….. विट्ठल….’ का कीर्तन करते-करते वे तो विट्ठल के ध्यान तल्लीन हो गये, उनके साथ एकाकार हो गये और भूल ही गये कि कीर्तन कर रहे हैं.. उनका देहाध्यास छूट गया।

अब विट्ठल को चिंता हो गयी नामदेव के व्यवाहरिक सम्बन्धों की। वे उनके घर एक सेठ के वेश में गये एवं उनकी पत्नी से उन्होंने पूछाः

“नामदेव कहाँ हैं?”

पत्नीः “विट्ठल के मंदिर में गये हैं।”

सेठः “उनको ये थैली देना और कहना कि जितने सोने के सिक्के उपयोग में लेने हों, उतने ले लें। पाँच-छः महीने बाद आऊँगा। थोड़े बहुत सिक्के बचे होंगे तो ले जाऊँगा, नहीं तो कोई बात नहीं। ….और नामदेव को मेरा प्रणाम कहना।”

उनकी पत्नी को अत्यन्त आश्चर्य हुआ ! उसने पूछाः “आपका नाम क्या है ?”

सेठः “तुमको जो नाम रखना हो वह रख सकती हो।”

पत्नीः “मैं मेरे पतिदेव से क्या कहूँगी कि यह थैली कौन लाया है ?”

सेठः “नामदेवजी से कह देना कि केशवसेठी नाम के सेठ आये थे, वे यह थैली दे गये हैं।”

संध्या हुई। नामदेव जी महाराज ध्यान से उठे एवं घर आये। केशवसेठी जो कह गये थे वे सारी बातें पत्नी ने उनको बताईं।

सुख-दुःख में स्वस्थ रहने वाले नामदेवजी को पहचानने में देर न लगी कि केशवसेठी के रूप में स्वयं विट्ठल ही यह थैली दे गये हैं। वे बोलेः “उपयोग में लाने को ही कह गये हैं न ? प्रभात होने दे।”

प्रभात हुई। नामदेव जी साधु-संतों को आमंत्रित करके भण्डारा कर दिया। सोने की कुछ मुहरें बाकी थी किन्तु वे भी उन्होंने बाँट दीं। एक शाम को सोने की मुहरों से भरी थैली आयी एवं दूसरी शाम होने से पहले ही वह खाली हो गयी।

नामदेव जी की पत्नी को हुआ किः ‘इतनी गरीबी में सोने के सिक्के मिले फिर भी उन्हें बचाकर रखे नहीं। अच्छा हुआ कि उनमें से दो कटोरी मुहरें निकालकर मैंने अलग रख दिये हैं, नहीं तो वे भी बँट जाते।

नामदेव जी को इस बात का पता नहीं था लेकिन वे जिसका ध्यान करते थे उस सर्वेश्वर को तो सब पता था। उसने जिस थैली में सोने की मुहरें छिपाकर रखी थी वह उसे देखने गयी। थैली खोलकर देखी तो कोयले ! उसे आश्चर्य हुआ कि थैली की गाँठ लगाकर रखी थी फिर कोयले कैसे हुए ?

वह लज्जा से भर उठी। आखिर उससे रहा न गया। उसने अपने पतिदेव को सारी बातें बता दीं-

“आपके लिए केशवसेठी जो स्वर्ण मुहरें दे गये थे उनमें से दो कटोरी मुहरें मैंने छुपाकर रख दी थीं क्योंकि आप तो सोने और मिट्टटी को समान जानते हैं। आप सभी मुहरें बाँट दोगे इस डर से उन्हें छुपा रखी थीं लेकिन जब मैंने थैली खोलकर देखी तो उसमें से कोयले निकले !”

नामदेवजीः वे मुहरें सोने से कोयले बन सकती हैं तो कोयले से सोना भी बन सकती हैं…  इसमें क्या बड़ी बात है ? उन्हें इधर ले आ । ”

पत्नी ले आयी। नामदेव जी ने जैसे ही हाथ घुमाया वैसे ही कोयले की वे मुहरें तुरन्त पहले जैसी सोने की हो गयीं।

नामदेव जी की पत्नी को बड़ा पश्चाताप हुआ किः ‘जिनके हाथ घुमाते ही कोयला सोना हो गया ऐसे भगवद्स्वरूप पति को मैं दिन रात परेशान करती रहती हूँ।’ उसने क्षमा माँगी।

नामदेवजी सुख-दुःख में स्वस्थ रहे तो प्रकृति भी उनके अनुकूल हो गयी एवं अनुकूलता में भी आसक्त न हुए तो प्रतिकूल पत्नी भी धीरे-धीरे उनकी भक्त होने लगी।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने सुंदर कहा हैः

समदुःखसुखःस्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।

तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2001, पृष्ठ संख्या 5-8, अंक 99

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मन के जीते जीत….


संत श्री आसाराम बापू जी के सत्संग प्रवचन से

जैसे, सागर से लहरियाँ उठती हैं, ऐसे ही सच्चिदानंद परब्रह्म परमात्मारूपी सागर से आपका मन उभरता है। मन के दो छोर हैं- चैतन्यस्वरूप परमात्मा और संसार।

जैसे, एक पुल नदी के दो किनारों को जोड़ता है, ऐसे ही परमात्मा एवं जगत को जोड़ने वाले सेतु का नाम है मन। मन अगर शरीर एवं संसार को मैं-मेरा मानकर चलता है तो नश्वर संसार में ही जीवन खप जाता है लेकिन वही मन अगर परमात्मा को ही अपना वास्तविक स्वरूप मानकर उसे पाने का यत्न करता है तो शाश्वत अमर पद को पा लेता है।

किन्हीं महापुरुष ने ठीक ही कहा हैः

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।

मन से ही तो पाइये परब्रह्म की प्रीत।।

मन से मनुष्य संसार-बंधन में बँधता है एवं मन से ही इससे मुक्त होता है। शास्त्रों में भी कहा गया हैः

मनः एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः।

‘मन ही मनुष्यों के बंधन एवं मोक्ष का कारण है।’

मन है प्रकृति का और कल्पना होती है मन की। प्रकृति परिवर्तनशील है तो मन भी परिवर्तनशील है और मन परिवर्तनशील है तो कल्पना भी परिवर्तनशील है। इसलिए अपने मन को ऐसा बनाओ कि दुःख का प्रभाव न पड़े और सुख की गुलामी न रहे। मन को मन से जगाओ। जैसे, उधार के पैसों से तीर्थयात्रा करने वाला व्यक्ति यात्रा का गर्व नहीं करता, दूसरे के सहारे नदी पार करने वाला व्यक्ति तैरने का अभिमान नहीं करता, जन्मांध देखने का गर्व नहीं करता, विधवा सुहागिन होने का गर्व नहीं करती, ऐसे ही इस मन को किसी चीज का गर्व न होने दो क्योंकि परमात्मा के बिना वह कंगाल है, परमात्म-सत्ता के बिना वह विधवा जैसा। परमात्म-चेतना के बिना मन जन्मांध है। मन को परमात्मा की चेतना मिलती है, परमात्मा का सुहाग एवं ऐश्वर्य मिलता है ऐसी समझ से मन को समझदार बनाओ।

दुःखी होने का अभिमान न करो। ‘मैं दुःखी हूँ…’ यह अभिमान से होता है क्योंकि मन में ‘मैं हूँ’ की कल्पना है तो तभी तो ‘मैं दुःखी हूँ….’ यह महसूस होता है। ऐसे ही ‘मैं सुखी हूँ….’ यह भी अभिमान से होता है। लेकिन भगवान की सत्ता के बिना मन का ‘मैं पैदा नहीं हो सकता। जैसे पानी के बिना लहर पैदा नहीं हो सकती, मिट्टी के बिना मिट्टी के घड़े नहीं बन सकते, रुई के बिना सूती कपड़े नहीं बन सकते, ऐसे ही परमात्मा के बिना मन का ‘मैं’ पैदा नहीं हो सकता। जो कुछ मन में है, वह परमात्मा की सत्ता लेकर है। मन इस सत्ता को भूल जाता है और कल्पना में उलझ जाता है।

“क्या हाल है ?”

“मैं दुःखी हूँ…. मैं ठीक हूँ….”

‘मैं दुःखी हूँ…… मैं ठीक हूँ…’ यह भी परमात्मा की सत्ता से बोलता है। परमात्मा की सत्ता वही-की-वही है लेकिन मन जैसी-जैसी कल्पना या भावना करता है ऐसा उसे दिखता है और जैसा-जैसा देखने-सोचने का ढंग होता है ऐसी-ऐसी कल्पना या भावना बनती है। इसलिए देखने-सोचने का ढंग ऊँचा कर दो, अपनी नजर बदल दो।

 नजर बदली तो नजारे बदल गये।

किश्ती ने बदला रुख तो किनारे बदल गये।।

जो मन का रुख परमात्मा से मोड़कर संसार के भोग की तरफ ले जाते हैं, वस्तु-व्यक्ति से सुख लेने की तरफ ले जाते हैं, पाप की तरफ ले जाते हैं वे देर-सबेर पाप-ताप में तपते रहते हैं और जो प्रभु के ज्ञान ध्यान में ले जाते हैं वे देर-सबेर प्रभुमय हो जाते हैं। संसार की वस्तु संसारर के काम आये और अपना अंतरात्मा परमेश्वर अपने पर संतुष्ट रहे ऐसा यत्न करना चाहिए।

यज्ञ, तप, व्रत, दान आदि करने से जितना पुण्य होता है, उससे भी अधिक पुण्य शास्त्र-अध्ययन एवं सत्संग करने से और भगवान के ज्ञान-ध्यान का अनुसंधान करने से हो जाता है। मन को इसमें लगाये तो मनुष्य परमात्मा हो जाता है।

एक होते हैं पापात्मा, दूसरे होते हैं पुण्यात्मा और तीसरे होते हैं महात्मा। महात्मा भी तो मन से ही होते हैं। ‘महात्मा’ अर्थात् महान आत्मा। जिनको महान परमात्मा का ज्ञान, गुरु का प्रसाद पच गया है उन ब्रह्मज्ञानी संत के कर्म न पापात्मा की नाईं कर्त्ता होकर आते हैं और न पुण्यात्मा की नांईं कर्त्ता होकर आते हैं वरन् उनके कर्म आत्मज्ञानी होकर आते हैं इसलिए वे न पुण्यात्मा होते हैं, न पापात्मा होते हैं। ऐसे महात्मा स्वयं तो संसार के बंधनों एवं प्रभावों से छूट जाते हैं, साथ ही औरों को भी उनसे छूटने का उपाय बताकर उन्हें मुक्ति के पथ पर अग्रसर कर देते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2001, पृष्ठ संख्या 11,12 अंक 99

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