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Tatva Gyan

संतकृपा से चित्रकेतु का मोहभंग


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

सदगुरु मेरा शूरमा, करे शब्द की चोट।

मारे गोला प्रेम का, हरे भरम की कोट।।

ʹमैं शरीर हूँ… यह मेरा नाम है… यह मेरी नात-जात है…. यह मेरी पत्नी है… यह मेरा पुत्र-परिवार है…. यह मेरा कर्त्तव्य है….ʹ ये सब भरम हमारे अंदर घुस गये हैं। ʹहम जी रहे हैं…ʹ यह भी भरम है और ʹहम मर जायेंगे….ʹ यह भी भरम है। ʹहम माई हैं…. हम भाई हैं…. हम निर्धन हैं… हम पापी है… हम पुण्यात्मा हैं….. हम अच्छे हैं.. हम बुरे हैं…ʹ इस प्रकार न जाने कितने-कितने भरमों में हम उलझे रहते हैं और वास्तव में हम क्या हैं इसका हमें पता ही नहीं है।

जिनको वेदों, शास्त्रों और परमात्मा का ज्ञान नहीं है – ऐसे लोगों से जो हम सुनते हैं, वही अपने को मान लेते हैं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।

ʹइस देह में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है।ʹ

आप सनातन हो, जन्मने-मरने वाले नहीं हो। व्यवहार में जो दिखता है कि ʹयह माई है… यह भाई है….ʹ यह सब कल्पित है और कल्पनाएँ बदलती रहती हैं जबकि आप तो अबदल, एकरस आत्मा हो।

न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः।

पिता नैव मे नैव माता न जन्म।

न बन्धुनः मित्रं गुरुर्नैव शिष्य।

चिदानन्दरूपः शिवोहं शिवोहम्।।

जहाँ न कोई पिता है, न माता है, न बन्धु है, न मित्र है – ऐसी अवस्था में आप पहुँच जाओ तो अपने चिदानंदस्वरूप का ज्ञान हो जाये। वही आपका वास्तविक स्वरूप है। अगर आप अपने उस शिवस्वरूप में तीन मिनट के लिए भी विश्रांति पा लो तो फिर देवता लोग भी आपका दीदार करके अपना भाग्य बना लेंगे। आप वह चिदघन चैतन्य आत्मा हो।

कहाँ तो आकाश से भी सूक्ष्म और व्यापक आपका चैतन्यस्वरूप और कहाँ अपने को शरीर मानकर उसके सुख-दुःख, मान-अपमान, हानि-लाभ आदि में उलझी रहने वाली आपकी स्थूल बुद्धि। कई जन्मों से अपने को माई-भाई, अच्छा-बुरा, पापी-धर्मात्मा, सुखी-दुःखी आदि मानकर स्वयं को ही सताते आये हो। ʹयह चाहिए….. वह चाहिए… यह समस्या है अतः इसको रिझाऊँ… इसको ठीक करूँ…. डॉक्टर बन जाऊँ…. इंजीनियर बन जाऊँ….ʹ लेकिन ये सब हो भी गये तो आखिर क्या ? अंत में जब मौत आएगी तब ये सब एक झटके में ही छूट जायेंगे।

ʹमैं गरीब हूँ…. धनवान हो जाऊँ…ʹ चलो, बन गये करोड़पति। अरे! हो गये भूपति, तो क्या हो गया काम पूरा ? ʹअब हम करोड़पति हैं… पाँच-पचीस आदमी हमारी इज्जत करते हैं…ʹ यदि ऐसा करके सुखी होना चाहते हो तो यह अहंकार का सुख है। इज्जत देने वाले भी मरने वाले हैं और जिस शरीर को इज्जत मिल रही है वह भी मरने वाला है। इससे आपको क्या मिला ? आपकी तो भ्रांति दृढ़ हुई कि ʹये मेरी इज्जत करते हैं।ʹ शरीर तो जड़ है। शरीर को तो पता ही नहीं है कि क्या इज्जत और क्या बेइज्जती ? आप इज्जत-बेइज्जत से परे हो किन्तु भ्रान्ति से मान लेते हो कि ʹमेरी इज्जत हुई या मेरी बेइज्जती हुई।ʹ जब तक अपने शुद्ध स्वरूप को नहीं जान  पाये, तब तक ʹमैं-मेरे की भ्रान्ति नहीं मिटती।ʹ

श्रीमद् भागवत के छठवें स्कन्ध के 14वें अध्याय में एक प्रसंग आता हैः

शूरसेन देश के चक्रवर्ती सम्राट चित्रकेतु अनेक सुख-सुविधाओं, साधन-सम्पत्तियों, दास-दासियों से सम्पन्न थे एवं उनकी बहुत सी सुन्दर रानियाँ थीं। पृथ्वी का सारा सुख-वैभव उनके अधिकार में था। इतना सब होने पर भी वे भीतर से सुखी एवं शांत न थे।

सुविधा होना अलग बात है, सुख होना अलग बात है। धन होना अलग बात है और तृप्ति होना अलग बात है। किसी के पास धन हो सकता है, सुविधाएं हो सकती हैं लेकिन वह भीतर से सुखी भी हो, यह जरूरी नहीं है।

चित्रकेतु के पास भी बहुत सारी सम्पदा और सुविधाएँ थीं, अनेको रानियाँ थीं फिर भी सदैव चिंतित रहते थे क्योंकि उन्हें कोई पुत्र न था। पुत्र के अभाव में सारी सुविधाएँ उन्हें बेकार लग रही थीं।

एक दिन शाप और वरदान देने में समर्थ अंगिरा ऋषि स्वच्छन्दरूप से विभिन्न लोकों में विचरते हुए राजा चित्रकेतु के महल में पहुँच गये। राजा द्वारा आतिथ्य सत्कार किये जाने के बाद ऋषि अंगिरा ने पूछाः “राजन् ! तुम्हारे मुँह पर किसी आंतरिक चिन्ता के लक्षण दृष्टिगोचर हो रहे हैं। तुम्हारी उदासी का क्या कारण है ?”

चित्रकेतु ने कहाः “भगवन् ! मुझे पृथ्वी का साम्राज्य, ऐश्वर्य और सम्पत्तियाँ, जिनके लिए लोकपाल भी लालायित रहते हैं, प्राप्त हैं। परन्तु सन्तान न होने के कारण मुझे इन सुख-भोगों से तनिक भी शांति नहीं मिल रही है। अब आप ही कृपा करें। मुझे संतान देकर मेरा दुःख दूर करें।”

चित्रकेतु की  प्रार्थना से संतुष्ट होकर सर्वसमर्थ अंगिरा ऋषि ने ʹत्वष्टाʹ देवता के योग्य चरू का निर्माण करके उससे देवता का यजन किया एवं चित्रकेतु से यज्ञ करवाया। यज्ञ का अवशेष प्रसाद चित्रकेतु की सबसे बड़ी रानी कृतद्युति को दिया। महारानी कृतद्युति को गर्भ रह गया। समय पाकर उनके गर्भ से एक सुन्दर पुत्र का जन्म हुआ। पूरे राजमहल में आनंदोत्सव मनाया गया। राजकुमार के जन्म का समाचार पाकर शूरसेन देश की प्रजा भी अत्यन्त आनंदित हो उठी।

संसार का ऐसा कोई सुख नहीं, जिसके पीछे दुःख न लगा हुआ हो। संसार का ऐसा कोई लाभ नहीं, जिसके पीछे हानि न लगी हुई हो। संसार का ऐसा कोई संयोग नहीं, जिसके पीछे वियोग न जुड़ा हुआ हो। एकमात्र भगवान ही ऐसे सुखस्वरूप हैं कि जिनको प्राप्त करके सदा के लिए दु-खों का अंत हो जाता है। बाकी तो प्रत्येक सुख के पीछे दुःख लगा ही रहता है।

यह संसार का अटल नियम है कि जिससे आप अत्यंत प्रीति करोगे, वही आपको आखिर में रूलायेगा। आप यदि चाहो कि ʹजैसा प्रेमभरा व्यवहार पत्नी आज करती है, वैसा ही सदा करती रहे….ʹ तो यह असंभव है। ऐसे ही पत्नी यदि पति से चाहे तो यह भी असंभव है। कोई व्यक्ति, कोई वस्तु, कोई परिस्थिति, कोई भाव और गुण सदा एक जैसे नहीं रह सकते – यह संसार का नियम है।

परिवर्तन प्रकृति का अटल नियम है। सागर से लहरें उठती हैं और समाप्त हो जाती है। यदि आप लहरों को सदा बनाये रखना चाहो या सदा उनका एक-सा प्रवाह चाहो तो यह असंभव है। हवा का रुख यदि पूर्व की ओर होगा तो लहरें पूर्व की ओर चलेंगी और यदि पश्चिम की ओर होगा तो पश्चिम की ओर दौड़ती दिखेंगी। जिस ओर भी हवा का रुख होगा, उसी ओर लहरें दौड़ेंगी। ऐसे ही व्यक्ति का जैसा स्वभाव और उसके गुण रहेंगे, वैसा ही उसका धर्म रहेगा।

न कोई किसी को सुख देता है, न कोई किसी को दुःख देता है। मनुष्य अपनी ही कल्पना से सुखी-दुःखी होता रहता है।

काहू न कोउ सुख दुःख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता।।

मनुष्य अपने कर्मों का फल ही सुख-दुःख के रूप में भोगता है। अतः उसे चाहिए कि वह कर्म करने में सावधान और भोगने में प्रसन्न रहे। कर्मों के फलस्वरूप सुख-दुःख तो मिलेगा ही, लेकिन उसमें सुखी-दुःखी होना-न-होना यह हमारे हाथ की बात है।

सुख-दुः की चोटें जीवन में, आती हैं, आकर जाती हैं।

ज्ञानी के हृदय में क्षोभ नहीं, मूरख को नाच नचाती हैं।।

सुख भी आया, दुःख भी आया। लाभ भी आया, हानि भी आयी। जीवन आया तो मरण भी आया। ज्ञानी वही है, बुद्धिमान वही है, गुरुभक्त वही है, जो सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान, निंदा-प्रशंसा आदि सब प्रसंगों में समभाव रहता है क्योंकि संसार में तो ये आते और जाते ही रहेंगे।

जहाँ बजती है शहनाई, वहाँ मातम भी होते हैं…..

ऐसा ही हुआ चित्रकेतु के राजमहल में। जिस रानी से पुत्र उत्पन्न हुआ, उस रानी के प्रति राजा का मोह बढ़ गया। बड़ी उम्र में बेटा हुआ तो बेटे में भी आसक्ति बढ़ गयी।

अन्य रानियों को महसूस हुआ किः ʹराजा अब बड़ी रानी से ज्यादा प्रेम करने लगे हैं और हमारे प्रति राजा का प्रेम कम हो गया है।ʹ अतः उनमें बड़ी रानी के प्रति बहुत द्वेष उत्पन्न हो गया। द्वेष के कारण उनकी बुद्धि मारी गयी और उनके चित्त में क्रूरता छा गयी। अतः उन्होंने द्वेषवश नन्हें से राजकुमार को विष दे दिया।

सगे-सम्बन्धी स्वार्थ के हैं। स्वार्थ का संसार है।।

तुच्छ स्वार्थ के लिए रानियों ने राजा की परवाह न की, बड़ी रानी की चिंता न की, यहाँ तक कि उस नन्हें निर्दोष राजकुमार की भी परवाह न की और उसे जहर देकर मार डाला।

राजकुमार को मरा हुआ देखकर पूरा राजमहल शोक में डूब गया। राजा चित्रकेतु मूर्च्छित हो गये। लोग प्रयत्न करके राजा को ज्यों-ही होश में लाते, त्यों ही वे ʹहाय… मेरा इकलौता बेटा !ʹ कहकर फिर से बेहोश हो जाते।

महर्षि अंगिरा और देवर्षि नारद ने देखा कि राजा चित्रकेतु पुत्रशोक के कारण चेतनाहीन हो रहे हैं। तब वे दोनों वहाँ आये एवं चित्रकेतु को समझाने लगेः “राजन् ! जिसके लिए तुम इतना शोक कर रहे हो, वह बालक इस जन्म औऱ पहले के जन्मों में तुम्हारा कौन था ? तुम उसके कौन थे ? फिर अगले जन्मों में भी उसके साथ तुम्हारे क्या संबंध रहेंगे ?

इस पर जरा विचार करो।

राजन् ! हम तुम और हम लोगों के साथ इस नश्वर जगत में जितने भी प्राणी विद्यमान हैं, वे सब अपने जन्म के पहले नहीं थे और मृत्यु के पश्चात नहीं रहेंगे। इससे सिद्ध है कि इस समय भी उऩका वास्तविक अस्तित्व नहीं है क्योंकि सत्य वस्तु तो सब समय एक-सी रहती है।

वयं च त्वं च ये चेमे तुल्यकालाश्चराचराः।

जन्ममृत्योर्यथा पश्चात प्राङनैवमधुनापि भोः।।

(श्रीमद् भागवतः 6.15.5)

इस प्रकार महर्षि अंगिरा एवं देवर्षि नारद ने अनेक युक्तियों से राजा को समझाया एवं कहाः “राजन् ! तुम मोह के वशीभूत न होओ क्योंकि मोह ही सर्व व्याधियों का मूल है। तुम स्वयं अनुभव कर रही हो कि पुत्रवानों को कितना दुःख होता है। अतः अब तुम अपने मन को विषयों में भटकने से रोककर शांत करो, स्वस्थ करो और उस मन के द्वारा अपने वास्तविक स्वरूप का विचार करके परम शांतिस्वरूप परमात्मा में स्थिर हो जाओ।”

उसके बाद देवर्षि ने मृत राजकुमार के जीवात्मा को शोकाकुल स्वजनों के समक्ष प्रत्यक्ष बुलाकर कहाः “जीवात्मन् ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे माता-पिता एवं स्वजन तुम्हारे वियोग से अत्यंत दुःखी हो रहे हैं, अतः तुम अपने मृत शरीर में वापस आ जाओ और शेष आयु अपने स्वजनों के साथ ही रहकर व्यतीत करो। अपने पिता के दिये हुए भोगों को भोगो और राजसिंहासन पर बैठो।”

जीवात्मा ने कहाः “देवर्षि। मैं अपने कर्मों के अनुसार देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि योनियों में न जाने कितने जन्मों से भटक रहा हूँ। कौन किसका बेटा और कौन किसका पिता ? जब तक जिसका जिस वस्तु से संबंध रहता है, तभी तक उसको उस वस्तु से ममता रहती है। जीव नित्य और अहंकाररहित है। वह गर्भ में आकर जब तक जिस शरीर में रहता है, तभी तक उस शरीर को अपना समझता है। उसका न तो कोई अत्यन्त प्रिय है न अप्रिय, न कोई अपना है न पराया।”

यह कहकर जीवात्मा पुनः चला गया।

जीवात्मा की ये बातें सुनकर सभी स्वजन विस्मित हो उठे एवं उनका रहा-सहा मोह भी जाता रहा। राजा चित्रकेतु की बुद्धि में वैराग्य जाग उठा। उन्होंने सोचा कि ʹमेरा बेटा…. मेरा बेटा…ʹ करके मैं अकारण ही मोह कर रहा था। ʹमेरा महल… मेरी रानियाँ… मेरा राज्य….ʹ तो कहता हूँ लेकिन ये सब कब तक मेरे रहेंगे ? जिस चैतन्य परमात्मा की सत्ता से ʹमेरा-मेराʹ कह रहा हूँ, वह परमात्मा ही वास्तव में मेरा है, वही सदा मेरे साथ रहता है। बाकी के ये सब तो दो दिन के रैन बसेरे हैं।

अंगिरा ऋषि और नारदजी के उपदेश से राजा का मोह भंग हो गया। देवर्षि नारद ने राजा चित्रकेतु को सात दिन के अनुष्ठान की विधि बतायी। चित्रकेतु के सत्कर्मों के फलस्वरूप एवं संत-दर्शन के पुण्य के कारण उनका विवेक जाग उठा। उन्होंने देवर्षि नारद के द्वारा बतायी गयी विधि से सात दिन तक केवल जल पीकर बड़ी एकाग्रता से अनुष्ठान किया। उस अनुष्ठान के फलस्वरूप उन्हें विद्याधरों का अखंड आधिपत्य प्राप्त हो गये एवं कुछ ही दिनों में भगवद् दर्शन भी हो गये। अनेक स्तुतियों से राजा ने भगवान की प्रार्थना की। भगवान प्रसन्न हो गये। उन्होंने चित्रकेतु को आशीर्वाद तो दिया ही, साथ ही एक दिव्य विमान भी दिया जो सर्वत्र गति कर सकता था।

विचरण करते-करते राजा एक बार शिवलोक में गये। वहाँ भगवान शिव, पार्वती जी को गोद में बिठाकर ऋषियों को तत्त्वज्ञान का उपदेश दे रहे थे किः “वास्तविक तत्त्व आत्मा है, ब्रह्म है। हम सब उसी में रमण करते हैं। प्राणिमात्र का स्वरूप वही है लेकिन जो उसे नहीं जानते हैं वे इन्द्रियों में, मन में, मिथ्या संसार में रमण करते हैं। हालाँकि रमण करने की सत्ता भी तो उसी चैतन्यस्वरूप की है और वही शुद्ध ब्रह्म है। उसी को साक्षी, द्रष्टा, चिदघन चैतन्य आदि जो कहते है, बाकी तो अपना-आपा है। अपना जो नित्य अनुभव है, जो अपरोक्ष अनुभव है, बस वही वह सत्ता है। यह ʹमैं-मेरा… तू-तेरा…ʹ आदि प्रत्यक्ष है, स्वर्गादि परोक्ष हैं परन्तु अपना जो आत्मस्वरूप है वह अपरोक्ष है। उसे जानने के लिए आँख, कान आदि इन्द्रियों की जरूरत नहीं पड़ती है। वह स्वयंप्रकाश, स्वसंवेद्य है। ऐसा जो जानता है वही मुझ शिव को ठीक से जानता है।”

इस प्रकार शिवजी अति गूढ़ ज्ञान का वर्णन कर रहे थे। राजा होने के कारण चित्रकेतु के मन में निर्णय करने की आदत गहरी घुसी थी कि ʹयह ठीक है और वह ठीक नहीं है…. यह अच्छा है और वह बुरा है… ऐसा होना चाहिए और वैसा नहीं होना चाहिए…ʹ आदत तो सदैव साथ रहती है। राजा यदि बुद्धि को ब्रह्म-परमात्मा में लगाते तो बुद्धि शुद्ध हो जाती, परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया था इसलिए वे सोचने लगेः ʹशिवजी होकर भी अपनी स्त्री में इतनी आसक्ति रखते हैं ! बातें तो ब्रह्मज्ञान की सुनाते हैं लेकिन स्त्री का आसक्ति नहीं छोड़ पाते हैं। शिवजी को ऐसा रहना ठीक नहीं हैʹ यह सोचकर उन्होंने शिवजी को कुछ भला-बुरा सुना दिया।

भगवान सांबसदाशिव तो गुणातीत, देशातीत, कालातीत, आकाशस्वरूप चैतन्य पद में स्थित थे, परन्तु राजा के द्वारा किया गया शिवजी का यह अपमान माता पार्वती जी से सहन नहीं हुआ। पार्वती जी ने उनकी यह धृष्टता देखकर क्रोध से कहाः “जान पड़ता है कि ब्रह्माजी, भृगु, नारद आदि, उनके पुत्र सनकादि, महर्षि कपिलदेव और मनु आदि बड़े-बड़े महापुरुष धर्म का रहस्य नहीं जानते, तभी वे धर्म-मर्यादा का  उल्लंघन करने वाले भगवान शिव को इस काम से नहीं रोकते।”

माता पार्वती ने सोचाः ʹब्रह्मा आदि समस्त महापुरुष जिनके चरणकमलों का ध्यान करते हैं, उन्हीं मंगलों को मंगल बनाने वाले साक्षात् जगदगुरु भगवान का और उनके अऩुयायी महात्माओं का इस अधम क्षत्रिय ने तिरस्कार किया है और शासन करने की चेष्टा की है। इसलिए यह ढीठ सर्वथा दण्ड का घमण्ड है। जिनकी उपासना बड़े-बड़े सत्पुरुष किया करते हैं, भगवान श्रीहरि के उन चरणकमलों में यह मूर्ख रहने योग्य नहीं है।ʹ

उन्होंने चित्रकेतु को संबोधन कर कहाः “हे दुर्मते ! तुम पापमय असुर योनि में जाओ। ऐसा होन से बेटा ! तुम फिर कभी किसी महापुरुष का अपमान नहीं कर सकोगे।”

जब पार्वती जी ने इस प्रकार चित्रकेतु को शाप दिया तब वे विमान से उतर पड़े और सिर झुकाकर उन्हें प्रसन्न करने लगेः “चित्रकेतु ने कहाः “माता-पार्वती जी ! मैं बड़ी प्रसन्नता से दोनों हाथ जोड़कर आपका शाप स्वीकार करता हूँ, क्योंकि देवता लोग मनुष्यों को जो कुछ कह देते हैं, वह उनके प्रारब्धानुसार मिलने वाले फल की पूर्व सूचनामात्र होती है।

देवी ! यह जीव अज्ञान से मोहित हो रहा है और इसी कारण इस संसार चक्र में भटकता रहता है तथा सदा-सर्वदा एवं  सर्वत्र सुख-दुःख भोगता रहता है।

माता जी ! सुख और दुःख को देने वाली न तो अपनी आत्मा है और न कोई अन्य। जो अज्ञानी हैं, वे ही अपने को अथवा दूसरों को सुख-दुःख का कर्त्ता मानते हैं।

यह जगत सत्त्व-रज-तम आदि गुणों का स्वाभाविक प्रवाह है। इसमें क्या शाप क्या अनुग्रह ? क्या स्वर्ग क्या नरक ? क्या सुख क्या दुःख ? एकमात्र परिपूर्णतम भगवन ही बिना किसी की सहायता के अपनी आत्मस्वरूपिणी माया के द्वारा समस्त प्राणियों की तथा उनके बन्धन मोक्ष और सुख-दुःख की रचना करते हैं। माता जी ! भगवान श्रीहरि सबमें सम और माया आदि मल से रहित हैं। उनका कोई प्रिय-अप्रिय, जाति-बन्धु, अपना-पराया नहीं है। जब सुख में उनका राग नहीं है, तब उनमें राग जन्य क्रोध हो ही कैसे सकता है ? तथापि उनकी माया-शक्ति के कार्य पाप और पुण्य ही प्राणियों के सुख-दुःख, हित-अहित, बन्धन-मोक्ष, जन्म-मरण और आवागमन के कारण बनते हैं। मैं शाप से मुक्त होने के लिए आपको प्रसन्न नहीं कर रहा हूँ। मैं तो यह चाहता हूँ कि आपको मेरी जो बात अनुचित प्रतीत हुई हो, उसके लिए क्षमा करें।

तब भगवान शंकर ने देवता, ऋषि, दैत्य, सिद्ध और पार्षदों के सामने ही भगवती पार्वती जी से यह बात कही।

भगवान शंकर ने कहाः “सुन्दरी ! दिव्यलीलाविहारी भगवान के निःस्पृह और उदारहृदय दासानुदासों की महिमा तुमने अपनी आँखों देख ली।

जो लोग भगवान के शरणागत होते हैं, वे किसी से भी नहीं डरते क्योंकि उऩ्हें स्वर्ग, मोक्ष और नरकों में भी एक वस्तु के केवल भगवान के ही दर्शन होते हैं।

जीवों को भगवान की लीला से ही देह का संयोग होने के कारण सुख-दुःख, जन्म-मरण और शाप-अनुग्रह आदि द्वन्द्व प्राप्त होते हैं। जैसे स्वप्न में भेद-भ्रम, सुख-दुःख आदि की प्रतीति होती है और जाग्रत अवस्था में भ्रमवश रस्सी में ही सर्पबुद्धि होती है, वैसे ही मनुष्य अज्ञानवश आत्मा में देवता, मनुष्य आदि भेद तथा गुण-दोष आदि की कल्पना कर लेता है।

जिनके पास ज्ञान और वैराग्य बल है और जो भगवान वासुदेव के चरणों में भक्तिभाव रखते हैं उनके लिए इस जगत में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे वे हेय या उपादेय समझकर राग-द्वेष करें।

भगवान को न कोई प्रिय है और न अप्रिय। उनका न कोई अपना है न पराया। वे सभी प्राणियों की आत्मा हैं, इसलिए सभी प्राणियों के प्रियतम हैं। प्रिये ! यह परम भाग्यवान चित्रकेतु उन्हीं का प्रिय अनुचर, शांत एवं समदर्शी है और मैं भी भगवान श्रीहरि का ही प्रिय हूँ।

इसलिए तुम भगवान के प्यारे भक्त, शान्त, समदर्शी, महात्मा पुरुषों के सम्बन्ध में किसी प्रकार का आश्चर्य नहीं करना चाहिए।”

ये ही विद्याधर चित्रकेतु दानव योनि का आश्रय लेकर त्वष्टा के दक्षिणाग्नि से पैदा हुए, वहाँ इनका नाम वृत्रासुर हुआ और वहाँ भी वे भगवद् स्वरूप के ज्ञान एवं भक्ति से परिपूर्ण ही रहे।

शरीर चाहे पशु का मिले या असुर का, चाहे किसी भी योनि में जन्म लेना पड़े लेकिन हमारे मन से भगवद् भक्ति नहीं जानी चाहिए। भगवान की भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ एवं सदा सुखदायी है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2000, पृष्ठ संख्या 9-14, अंक 86

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मृत्यु का रहस्य


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

ʹश्रीमद् भगवदगीताʹ में आता हैः

ʹन जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

अजो नित्यः शाश्वतोयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।

ʹयह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता। (गीताः 2.20)

परमात्मा कहते हैं- ʹहे जीवात्मा तू अजर है, अमर है। जिस स्वरूप को जाने लेने से तेरी फिर कभी मौत नहीं होती, उसे जानकर अमर हो जा। यही तेरा कर्त्तव्य है।ʹ

यदि आप परमात्मा की इस बात को मान लो तो आपकी, आपके ससुराल की एवं आपके ननिहाल की सात-सात पीढ़ियों का अर्थात् कुल 21 पीढ़ियों का उद्धार हो जाये।

भगवान की बात मान लेने से हमारा कल्याण हो जाये, लेकिन हम करते क्या हैं ? हम दोस्त की बात मानते हैं, संबंधियों की बात मानते हैं, परिवारवालों की बात मानते हैं और अपनी इच्छा-वासना पूरी करने के पीछे सारा जीवन खपा देते हैं और जन्म-मृत्यु के चक्र में उलझ जाते हैं। दूसरों की बातें तो सदियों से मानते आ रहे हो किन्तु यदि एक बार भी परमात्मा की बात मान लो तो फिर जीते-जी मुक्ति पाना आपके लिए सहज हो जायेगा।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

देहिनोस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।

तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।

ʹजैसे इस मनुष्य देह में जीवात्मा की बाल्यावस्था, जवानी और वृद्धावस्था आती है, वैसे ही अन्य प्रकार के शरीरों की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।ʹ (गीताः 2.13)

जिस प्रकार कपड़े पुराने एवं जीर्ण-शीर्ण हो जाने पर मनुष्य उन्हें बदलकर नये कपड़े धारण करता है, वैसे ही यह शरीर जब बाल्यावस्था एवं यौवनावस्था को पार कर जरावस्था में पहुँचता है तब हमारी आत्मा इसको त्यागकर नया शरीर धारण करती है। अतः इसमें दुःखी होने की, भयभीत होने की क्या बात है ? पुराने कपड़े उतारकर नये कपड़े पहनने में रूदन किस बात का ? पुराना झोंपड़ा छोड़ नये महल में जाने पर शोक किस बात का ? पुरानी जीर्ण-शीर्ण कार छोड़कर नयी चमचमाती हुई कार में बैठने में भय किस बात का ? इसी प्रकार जब यह शरीर पुराना हो जाता है, जर्जर हो जाता है तब प्रकृति माता इस शरीर को उठाकर, जीव को अपनी गोद में ले लेती है और कुछ समय आराम करवाकर फिर उसे नये शरीर में भेज देती है। यह तो उन अनन्त की, विराट की यात्रा में, मंजिल तक पहुँचने की यात्रा में एक प्रक्रियामात्र है, पड़ावमात्र है। जैसे कन्या ससुराल से थक-हारकर कुछ तरोताजा होने के लिए मायके जाती है, वहाँ कुछ दिन अपनी माँ के साथ स्वतंत्र होकर रहती है और माँ कुछ दिन बाद उसे समझाकर, सजा-धजाकर ससुराल में पति के घर भेज देती है, वैसे ही जब जीव प्रकृति माता की गोद में जाता है तो वह करूणामयी प्रकृति माँ उसे फिर से नूतन शरीर में नूतन प्राण देकर संसार में भेज देती है और वह जीव अपनी आगे की यात्रा शुरु कर देता है। फिर चिंता, भय, शोक और रूदन किस बात का ?

रोना ही हो तो इस बात के लिए रोओ कि न जाने कितने शरीर मिलने के बाद यह मानव-तन मिला है और अगर इस मनुष्य शरीर में अपना कल्याण नहीं किया तो फिर कब करेंगे ? अथवा तो यूँ मान लो कि दिनभर की थकान को मिटाने के लिए जैसे रात्रि की नींद नितांत जरूरी है, वैसे ही वर्षों से चली आ रही इस यात्रा में ʹमेरे-तेरेʹ की, राग-द्वेष की, काम-क्रोध की थकान मिटाने के लिए मृत्युरूपी रात्रि की जरूरत है, नहीं तो सदैव इस घुटन भरे माहौल में रहना मुश्किल हो जाये।

यह मृत्यु ही है जो इन्सान के जीवन में नम्रता, समता, स्नेह और सहानुभूति को पोसती है। अगर मृत्यु नहीं आती एवं सभी अमर होते तो पत्थर की तरह निष्क्रिय एवं कठोर होकर पड़े रहते। ʹमृत्यु जीवन का अनिवार्य अंग है…ʹ यह सोचकर ही इन्सान परलोक का कुछ विचार करता है। ʹमृत्यु तो आने ही वाली है…. अधिक इकट्ठा करके भी साथ क्या ले जायेंगे ? चलो, थोड़ा-बहुत दान-पुण्य करते हैं ताकि परलोक सँवर जाये…ʹ यह सोचकर भी इन्सान लोभ छोड़ते हैं, संग्रह में थोड़ा संयम बरतते हैं, सत्कर्म में लग जाते हैं। जीवन को सदगुणों से महकाने के ले यह मृत्युरूपी रात्रि उतनी ही जरूरी है जितनी जीवनरूपी सुबह।

कबीरजी ने कहा हैः

जा मरने से जग डरे, मोरे मन आनंद।

कब मरिये कब पाइए,  पूरण परमानंद।।

अभी तक तो हम इस देहरूपी घड़े को ʹमैंʹ मानकर सजाते-सँवारते रहे लेकिन आज पता चल गया कि इसके फूटने से इसमें व्याप्त आकाश का कुछ नहीं  बिगड़ता। संत-महापुरुष तो जानते हैं कि मृत्यु शरीर की होती है, हमारी (आत्मा) की नहीं। वे तो अपने पूर्ण स्वरूप को पाये हुए होते हैं और जो संतत्त्व को उपलब्ध होने की ओर अग्रसर हो रहे हैं, वे भी शोक क्यों करें ? मृत्यु और जन्म तो प्रकृति का खेल है। भगवान श्रीराम के होते हुए भी उनकी माँ को विधवा होना पड़ा था। जिनकी गोद में भगवान खेले, उन पिता दशरथ को भी ʹहाय राम ! हाय राम !ʹ कहते हुए संसार से आखिर जाना ही पड़ा। यह तो परमात्मा की कृपा है, व्यवस्था है कि कभी शरीर दिया तो कभी शरीर छीन लिया। अगर जीव न अपने वास्तविक स्वरूप को पा लिया तो फिर परमात्मा ने नया शरीर नहीं दिया और जीव मुक्त हो गया।

जीवात्मा की मृत्य होती है तो उसे एक मुहूर्तपर्यन्त मूर्च्छा-सी रहती है। वह देखता है कि ʹये मेरे कुटुम्बी हैं… रो रहे हैं….ʹ तो वह उस शरीर में मोहवश पुनः प्रवेश करना चाहता हूँ लेकिन प्रकृति की ऐसी व्यवस्था है कि वह उसे उस शरीर में प्रवेश नहीं करने देती। एक मुहूर्त के बाद जब मूर्च्छा हटती है तब उसका शरीर उसके काबिल ही नहीं रहता, शरीर में परिवर्तन हो जाता है। जैसे गंदी बस्ती के झोंपड़े हटाकर नगरपालिका वहाँ सिपाही तैनात कर देती है ताकि लोग वापस वहीं जम न जायें। जब वे लोग कहीं अन्यत्र व्यवस्था कर लेते हैं तब पुलिस वहाँ से हटा ली जाती है। वैसे ही प्रकृति व्यवस्था करके मृत प्राणियों को मूर्च्छित सा कर देती है। उनका सूक्ष्म शरीर थोड़े समय तक उसी क्षेत्र में घूमता है लेकिन उस स्थूल शरीर में वह प्रवेश नहीं कर पाता।

जीवात्मा ज्यादा समय तक सूक्ष्म शरीर में न भटके, इसके लिए सनातन धर्म में कई व्यवस्थाएँ की गयी हैं। ऐसी ही एक व्यवस्था यह भी है कि जब किसी शव को शमशान में जलाकर दागी घर आते हैं तो उनसे पूछा जाता हैः

“आप कौन हो ?”

वे कहते हैं- “हम दागिये हैं।”

“यहाँ से गये थे तब पाँच थे। अभी कितने हो ?”

वे कहते हैं- “चार।”

फिर पूछते हैं- “पाँचवा कहाँ गया ?”

वे कहते हैं- “वह तो स्वर्ग चला गया है।”

ये प्रश्नोत्तर किये जाते हैं ताकि वह मृत जीव सूक्ष्म शरीर से यदि उनके इर्द-गिर्द भटकता हो तो सचमुच में स्वर्ग की यात्रा पर चला जाये। इस प्रकार सनातन धर्म में जीवात्मा की उन्नति के लिए की प्रकार की व्यवस्थाएँ की गई हैं।

यात्रा में चलते-चलते कई रात्रियाँ नींद भी करनी पड़ती है तो कई रात्रियाँ चलना भी पड़ता है। ऐसे ही मृत्यु भी एक यात्रा है। जितनी बार जन्म होता है, उतनी ही बार आराम करने के लिए मृत्यु भी होती है। अगर मृत्युरूपी नींद नहीं होती तो हर जन्म के ʹमेरे-तेरेʹ के संस्कार, लेन-देन के संस्कार मनुष्य को पागल कर देते। संसार एक पागलखाना हो जाता।

अगर माली बगीचे में काट-छाँट नहीं करे तो बगीचा जंगल में बदल जाये। ऐसे ही ईश्वररूपी माली अगर इस संसाररूपी बगीचे में मृत्यु के बहाने काट-छाँट नहीं करे तो यह संसार भयानक जंगल जैसा हो जाये। इसलिए मृत्यु बहुत जरूरी है। जैसे, आदमी तेज गर्मी के कारण पसीने से तरबतर हो गया हो और शीतल जल में डुबकी लगाये तो तरोताजा होकर बाहर निकालता है, ऐसे ही मृत्युरूपी महा निद्रा में गोता मारकर जीव पुरानी झंझटों, तनावों आदि को भूल जाता है, तरोताजा हो जाता है और नये सिरे से अपनी जीवन-यात्रा का आरम्भ करता है।

मृत्यु एक ईश्वरीय वरदान है, फिर भी यदि कोई जान-बूझकर आत्महत्या करता है तो यह महापाप है। परमात्मा ने हमें यह अमूल्य मानव-चोला दिया है तो हमारा कर्त्तव्य है कि हम इसे साफ-सुथरा रखें, इसे स्वस्थ-तंदुरुस्त रखें। ऐसा नहीं कि मृत्यु जरूरी है तो अनाप-शनाप खाकर मौत को आमंत्रण दें। यद्यपि कपड़ा मैला होता है, गलता है, फटता है लेकिन उसे जान-बूझकर फाड़ देना तो बेवकूफी है। ऐसे ही शरीर बूढ़ा होता है, बीमार होता है, मरता है – यह प्रकृति की व्यवस्था है लेकिन इसे जान-बूझकर मौत के मुँह में ढकेलना ठीक नहीं।

पूर्णता के शिखर पर पहुँचने के लिए जन्म मृत्यु मानों सीढ़ियों के समान हैं। दिन जितना प्रिय है, रात भी उतनी ही प्यारी है। जीवन जितना प्रिय है, विवेकीजनों को मृत्यु का सिलसिला भी उतना ही प्यारा है। वे इससे दुःखी नहीं होते हैं। जिसका विवेक मरा हुआ है वह तो जीते-जी मरा हुआ है, मगर जिसका विवेक जाग्रत है वह मृत्यु के समय भी नहीं मरता वरन् अमर हो जाता है।

जीवन जीना तो कला है ही, मरना भी एक कला है। मनुष्य को चाहिए कि मौत आ जाये तो वह रोये नहीं, फिक्र न करे वरन् उस समय सावधान हो जाये। यदि कोई मृत्यु के करीब हो तो उसके पास अमरता भरे उच्चारण करो किः “तुम्हारी मौत नहीं हो रही है…. मौत हो रही है मरने वाले शरीर की। तुम शरीरी हो, शरीर नहीं हो। तुम कार के चालक हो, कार नहीं हो। तुम देह नहीं वरन् देह को चलाने वाले विदेही आत्मा हो।”

मृत्यु के बाद कहो किः “यह शरीर जो मरा पड़ा है वह तुम नहीं हो। तुम तो शरीर की मौत के बाद भी वातावरण में विद्यमान हो। तुम हमें देख रहे हो किन्तु हम तुम्हें नहीं देख पा रहे हैं। तुम्हारी सूक्ष्म इन्द्रियाँ जगी हैं, हमारी स्थूल इऩ्द्रियाँ हैं इसलिए तुम हमें देख सकते हो, हम तुम्हें नहीं देख सकते। अब तुम्हें यह प्रेरणा देते हैं कि हाड़-माँस का ऐसा शरीर तुमने पहले भी कई बार पाया और कई बार छोड़ा। अब एक बार और छोड़ दिया। अब तो तुम ऐसी यात्रा करो कि तुम्हें बार-बार शरीर में न आना पड़े। अब तो तुम अपनी आत्मा को पहचानकर परमात्मा से मुलाकात करो और मुक्त हो जाओ…. ૐ….. ૐ…. ૐ… तुम चैतन्यस्वरूप हो… तुम साक्षीस्वरूप हो… तुम भगवान के सनातन अंश हो… तुम अजन्मा आत्मा हो।”

यदि आप मृतात्मा को ऐसी प्रेरणा देते हैं तो उसका कल्याण तो उसी क्षण हो जायेगा और आपके कुटुम्ब में भी सुख-शांति छा जायेगी। यही तो मंगल मृत्यु है। ऐसी मृत्यु का स्वागत करके अमर हो जाओ। आखिर कब तक रोते रहोगे ? कब तक परेशान होते रहोगे ?

…और वास्तव में देखा जाये तो आपकी मृत्यु कभी होती ही नहीं है, मरने का कोई उपाय ही नहीं है। वैज्ञानिक कहते हैं कि आदमी जैसा चिन्तन करता है, वैसा ही हो जाता है। यदि कोई सौ बार झूठी कल्पना भी करे तो वैसी कल्पना सच में भी घट सकती है लेकिन मरने की आप लाख बार चेष्टा करो फिर भी नहीं मरते क्योंकि आप एक ऐसा सत्य हो कि वहाँ मृत्यु पहुँच नहीं सकती। यदि मृत्यु आपके आत्मस्वरूप में आये तो वह भी अमर हो जाये।

कोई कह सकता है किः “महाराज ! सारी दुनिया मर रही है। समय पाकर हम भी तो मर जायेंगे।ʹ

परन्तु भैया ! आपने अपनी मृत्यु कभी देखी ही नहीं है। यदि आपने अपनी मृत्य देखी होती तो हजार बार आपका शरीर मरा, उसके साथ आप भी मर जाते। किन्तु ऐसा नहीं होता। दूसरे के शरीर को छूटते हुए देखकर हम कह देते हैं कि हमने मृत्यु देखी है और हम भी मरेंगे। मृत्यु की यह मान्यता हम बना लेते हैं लेकिन जिस आदमी का शव पड़ा होता है वह भी सचमुच मरता नहीं है बल्कि गहरा बेहोश हो जाता है। उसका सूक्ष्म शरीर निकल जाता है और उसकी आगे की यात्रा होने लगती है – मुक्ति की अथवा लोक-लोकान्तरों की यात्रा, कर्म एवं वासनानुसार ऊँच-नीच योनियों में अथवा भगवद् धाम में। जैसे उसके कर्म, भाव, इच्छा की प्रधानता तैसी उसकी यात्रा। अगर कर्म निष्काम हैं, ध्यान-भजन करके भाव ऊँचे कर लिये हैं और तत्त्वज्ञान सुनकर वासनाओं को बाधित कर दिया है, तो फिर उस आत्मारामी जीवन्मुक्त को किसी शरीर में, लोक-लोकान्तर में अथवा भगवद् धाम में जाना नहीं पड़ता। अखिल ब्रह्माण्ड में सूक्ष्म शरीर सूक्ष्म तत्त्वों में विलीन हो जाता है और स्वयं व्पाप जाता है, परमेश्वर-स्वभाव में एकाकार हो जाता है।

चंदा को चाँदनी, सूरज को तेज, जल को रस, पृथ्वी को गन्ध, हवाओं को स्पर्श की सत्ता जिस परम चैतन्य से मिलती है, उस आत्मब्रह्म में वह आत्मवेत्ता, आत्म-साक्षात्कारी महापुरुष एक हो जाता है। जिसके ध्यान, आनंद और सामर्थ्य से ब्रह्मा, विष्णु, महेश और अन्य देव समर्थ हैं वह परम समर्थ तत्त्व सच्चिदानंदस्वरूप है। जैसे बिन्दु सिन्धु में मिलकर सिन्धु हो जाता है, जैसे घटाकाश महाकाश में मिलकर महाकाश हो जाता है वैसे ही वह जीव ब्रह्म में मिलकर ब्रह्म हो जाता है। वासना और कर्म के वशीभूत होकर निगुरे लोग, शास्त्र-विरूद्ध रास्ते पर चलने वाले लोग नरक और ऊँच-नीच योनियों में जाते हैं जबकि भक्त एवं गुरुमुख लोग यक्ष, गन्धर्व, देव आदि योनियों एवं स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होते हैं। दृढ़ भगवद् भक्त भगवद् धाम में  पहुँचते हैं और उनकी जैसी इच्छा एवं कर्मानुकूलता होती है, समय पाकर फिर वैसी यात्रा होती है। जीव का यह सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक जीव अपने ब्रह्मस्वरूप को नहीं जान लेता। स विषय को बार-बार पढ़ो, समझो और सोचो तथा पूर्णता को पाने का पूर्ण पुरुषार्थ करो। पूर्णता पाना कठिन नहीं, पर जिन्हें कठिन नहीं लगता उनमें श्रद्धा-विश्वास बने रहना कठिन है। माता देवहूति ने श्रद्धा-विश्वास से जहाँ आत्मसिद्धि पायी, वह स्थान आज गुजरात राज्य में सिद्धपुर के नाम से विख्यात है। कार्तिक क्षेत्र का बिन्दु सरोवर अभी भी माता देवहूति की श्रद्धा-विश्वास की सुवास फैला रहा है। माता देवहूति ने अपने अपने आत्मसाक्षात्कारी, आत्मारामी पुत्र कपिलदेव में श्रद्धा विश्वास करे ऊँची स्थिति पायी, आत्मसिद्धि पायी।

जैसे, जब शल्यक्रिया की जाती है तब ʹक्लोरोफॉर्मʹ आदि सूँघाकर मरीज को बेहोश कर दिया जाता है और उसकी किडनी आदि बदल दी जाती है। ऐसे ही प्रकृति बड़ी-से-बड़ी शल्यक्रिया करती है और पूरा शरीर ही बदल देती है। मनुष्य के कर्मानुसार उसे घोड़ा, गधा या चूहा आदि किसी भी शरीर में बदल देती है। इसीलिए आदमी एक मुहूर्त के लिए बेहोश हो जाता है, उसे मूर्च्छा आ जाती है लेकिन उसकी मृत्यु नहीं होती।

जो लोग मूर्च्छा में मरते हैं उऩका मरना जारी रहता है और वे अपने को मरणधर्मा मानते हैं लेकिन जिन्होंने फकीरों की कृपा प्राप्त कर ली है, जो फकीरों के श्रीचरणों तक पहुँच चुके हैं वे सजाग हो जाते हैं। वे मृत्यु को भी उसी तरह देख लेते हैं जैसे मनुष्य अपने शरीर या शरीर के दर्दकारक अंग को देख पाता है। उसी प्रकार वे मृत्यु को भी शरीर पर घटते हुए देख लेते हैं। जो मृत्यु को भी होश के साथ देख लेते हैं वे अमर हो जाते हैं और जो बेहोश हो जाते हैं वे मरते ही रहते हैं।

आत्मसाक्षात्कार का अर्थ है कि होश से जियें, सजग होकर जियें। जो होश से जी सकता है वह होश से मर भी सकता है। उसका मरना भी मरना नहीं होता वरन् वह अमर हो जाता है, लेकिन जो बेहोशी में जीता है, वह मरता रहता है।

बेहोशी क्या है ? जैसा अहं का वेग आये, वैसा ही करने लगे। मन में जैसी धारणा बनी या बुद्धि ने जैसा निर्णय दिया वैसा ही काम करने लगे, यह बेहोशी है। होश क्या है ? धारणा, ध्यान, समाधि, प्राणायाम, आत्मविचार आदि करते हुए अपनी असलियत को जान लेना, अपने अहं का विसर्जन कर देना, यह होश है। शाह लतीफ कहते हैं किः

जे भाई जोगी थियां, तमा छद् तमाम।

सबूर जे शमशेर सां कर कीन्हे खे कतलाम।।

अगर आपको होश से मरना है तो योगी बनो और योगी होना है तो जो तमन्नाएँ स्फुरती हैं उन्हें हटाते जाओ। जो-जो इच्छाएँ उठती हैं उऩ्हें हटाते जाओ। तमन्नाएँ छोड़कर सब्र करो तो यह संभव है कि आप विराट से मिल सकते हो, आप विराट में विसर्जित हो सकते हो।

गोला जे गोलन्ह जा, तिनजो थिऊ गुलाम।

नागा तुहिंजो नाव, लिख जे लाहू तिन में।।

अर्थात् ʹसच्चे संतों के दासों के दास बन जाओ।ʹ

यदि आप सब दुःखों से छूटना चाहते हो, यदि आप परम ओज को प्राप्त करना चाहते हो तो इच्छाओं के गुलाम मत बनो, इच्छाओं के पीछे मत भागो, वरन् इच्छाओं के भी द्रष्टा हो जाओ।

अनेक इच्छाएँ उठती रहती हैं। उनमें पचासों इच्छाएँ तो व्यर्थ की होती हैं, थोड़ी ही धर्म के अनुकूल होती हैं। जो इच्छाएँ धर्म के अनुकूल हों एवं आपकी उन्नति में सहायक हों उन्हें सहयोग दो, उन्हें पूरी करने में शक्ति और समय लगाओ लेकिन जो इच्छाएँ आपकी उन्नति एवं धर्म के खिलाफ हों उन इच्छाओं को उठते ही हटा दो।

जो इच्छाओं-वासनाओं के पीछे नहीं भागता, वरन् उनका द्रष्टा हो जाता है वह असंगता का शस्त्र लेकर दृढ़ता से इच्छाओं का छेदन कर डालता है और ऐसी जगह पर पहुँच जाता है, जहाँ से फिर उसे जन्म-मरण के चक्र में नहीं आना पड़ता। उसकी मृत्यु भी अमरता में परिणत हो जाती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 1999, पृष्ठ संख्या 2-6, अंक 84

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आज का युग जेट युग है


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

आज के युग को जेट युग कहते हैं। आज कल जो कुछ होता है सब ʹफास्टʹ (तीव्र गति से) होता है। पहले के जमाने में माताओं-बहनों को रोटी बनानी होती थी तो चूल्हें में गोबर के कण्डे डालतीं, लकड़ियाँ रखतीं, फिर फूँक-फूँककर चूल्हे जलातीं। फूँक-फूँककर थक जातीं, धुएँ के कारण आँखों में आँसू आ जाते, तब कहीं चूल्हा जलता फिर रोटी पकातीं। बड़ी मुश्किल से वे रसोईघर का काम निपटा पाती थीं और आज… उठाया लाइटर, गैस का बटन घुमाया और गैस चालू… 15-20 मिनट में भोजन तैयार।

संदेश भेजने के लिए भी पहले कबूतरों से काम लिया जाता था। कबूतर पालो, उसे काम सिखाओ, फिर जब कभी जरूरत पड़े तो उसके गले में चिट्ठी डालो। वह उड़ता-उड़ता जाये, कब पहुँचे, कब संदेश वापस लाये… कोई पता नहीं। इस प्रकार कई दिन लग जाते थे। या तो कोई विश्वासपात्र व्यक्ति चिट्ठी लेकर घोड़े से जाता और जवाब लेकर वापस आता। उसमें से भी कई दिन निकल जाते थे। अब तो उठाओ फोन, दबाओ बटनः ʹहेलो ! मैं अमुक जगह से बोल रहा हूँ। मुझे अमुक बात करनी है… इतना काम हुआ है, इतना करना है….।ʹ बस, हो गयी बात। संदेश भी पहुँचा, उत्तर भी मिला और योजना भी बन गई।

इसी प्रकार पहले के जमाने में लोगों को कहीं जाना होता था तो ज्यादातर लोग पैदल चलकर जाते थे। कुछ लोग बैलगाड़ी या घोड़े का उपयोग करते थे, फिर भी उसमें आने जाने में काफी समय लगता था। आज कल स्कूटर, टैक्सी, बस, रेल की सुविधा तो है ही, परन्तु जो और जल्दी से कहीं पहुँचना चाहता है वह हवाई जहाज का उपयोग भी कर लेता है। उनमें भी जेट विमान की यात्रा ज्यादा ʹफास्टʹ होती है। इसलिए आज के युग को ʹजेट युगʹ कहते हैं।

आज के इस फास्ट युग में जैसे हम भोजन पकाने, कपड़े धोने, यात्रा करने, संदेश भेजने आदि व्यावहारिक कार्यों में फास्ट हो गये हैं, वैसे ही क्यों न हम प्रभु का आनंद, प्रभु का ज्ञान पाने में भी फास्ट हो जायें ?

पहले का जीवन शांतिप्रद जीवन था, इसलिए सब काम शांति से, आराम से होते थे एवं उनमें समय भी बहुत लगता था। लोग भी दीर्घायु होते थे। लेकिन आज हमारी जिंदगी इतनी लंबी नहीं है कि सब काम शांति और आराम से करते रहें। सतयुग, त्रेता, द्वापर में लोग हजारों वर्षों तक जप-तप-ध्यान आदि करते थे, तब प्रभु को पाते थे। किन्तु आज के मनुष्य की न ही उतनी आयु है, न ही उतनी सात्त्विकता, पवित्रता और क्षमता है कि वर्षों तक माला घुमाता रहे और तप करता रहे। अतः आज की इस ʹफास्ट लाइफʹ में प्रभु की मुलाकात करने में भी फास्ट साधनों की आदत डाल देनी चाहिए। उस प्यारे  प्रभु से हमारा तादात्म्य भी ऐसा फास्ट हो कि,

दिले तस्वीरे है यार ! जबकि गर्दन झुका ली और मुलाकात कर ली….

बस, आप यह कला सीख लो। आप पूजा कक्ष में बैठें, तभी आपको भक्ति, ज्ञान या प्रेम का रस आये ऐसी बात नहीं है। वरन् आप घर में हों या दुकान में, नौकरी कर रहे हों या फुर्सत में, यात्रा में हो या घर के किसी काम में….. हर समय आपका ज्ञान, आनंद एवं माधुर्य बरकरार रह सकता है। युद्ध के मैदान में अर्जुन निर्लेप नारायण तत्त्व का अनुभव कर सकता है तो आप भी चालू व्यवहार में उस परमात्मा का आनंद-माधुर्य क्यों नहीं पा सकते ? गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-

तन सुकाय पिंजर कियो, धरे रैन दिन ध्यान।

तुलसी मिटे न वासना, बिना विचारे ज्ञान।।

शरीर को सुखाकर पिंजर कर देने की भी आवश्यकता नहीं है। व्यवहार काल में जरा-सी सावधानी बरतो और कल्याण की कुछ बातें आत्मसात् करते जाओ तो प्रभु का आनंद पाने में कोई देर नहीं लगेगी।

तीन बातों से जल्दी कल्याण होता हैः

पहली बातः सच्चे हृदय से हरि का स्मरण।

तुलसीदास जी ने कहा हैः

भाँय कुभाँय अनख आलसहूँ।

नाम लेत मंगल दिसि दसहूँ।।

भाव से, कुभाव, क्रोध से, आलस्य से भी यदि हरि का नाम लिया जाता है तो दसों दिशाओं में मंगल होता है। अतः सच्चे हृदय से हरि का स्मरण करने से कितना कल्याण होगा।

जपात सिद्धिः जपात सिद्धिः जपात सिद्धिर्न संशयः।

जब करते रहो…. हरि का स्मरण करते रहो…. इससे आपको सिद्धि मिलेगी। आपका मन सात्त्विक होगा, पवित्र होगा और भगवदरस प्रगट होने लगेगा।

दूसरी बातः प्राणीमात्र का मंगल चाहो। यहाँ हम जो देते हैं, वहीं हमें पाताल मिलता है और कई गुना होकर मिलता है। यदि आप दूसरों को सुख पहुँचाने का भाव रखेंगे तो आपको भी अऩायास ही सुख मिलेगा। अतः प्राणीमात्र को सुख पहुँचाने का भाव रखो।

तीसरी बातः अपने दोष निकालने के लिए तत्पर रहो। जो अपने दोष देख सकता है, वह कभी-न-कभी दोषों को दूर करने के लिए भी प्रयत्नशील होगा ही। ऐसे मनुष्य की उन्नति निश्चित है। जो अपने दोष नहीं देख सकता वह तो मूर्ख है लेकिन जो दूसरों के द्वारा सिखाने पर भी अपने दोषों को कबूल नहीं करता है वह महामूर्ख है और जो परम हितैषी सदगुरु के कहने पर भी अपने में दोष नहीं मानता है वह तो मूर्खों का शिरोमणि है। जो अपने दोष निकालने के लिए तत्पर रहता है वह इसी जन्म में निर्दोष नारायण का प्रसाद पाने में सक्षम हो जाता है।

जो इऩ तीन बातों का आदर करेगा और सत्संग एवं स्वाध्याय में रुचि रखेगा, वह कल्याण के मार्ग पर शीघ्रता से बढ़ेगा।

भगवान श्रीराम भी विद्यार्थी काल में जब धनुर्विद्या आदि सीखते थे तब विद्याध्ययन से समय निकालकर वशिष्ठजी महाराज के चरणों में ब्रह्मज्ञान का सत्संग सुनते थे और चौदह वर्ष का वनवास मिला, तब भी भरद्वाज आदि संत-महात्माओं के सत्संग में बैठकर ब्रह्मविद्या का पान करते थे। भगवान श्रीकृष्ण भी सांदीपनि ऋषि के चरणों में बैठकर सत्संगामृत का पान करते थे। कबीरजी ने भी उस ब्रह्म-परमात्मा के रस का आस्वादन किया और उऩके चरणों में काशीनरेश कृतार्थ हुआ। नानकजी ने भी जीवन भर ब्रह्मविद्या का पान किया और अपने प्यारों को कराया। अब आप भी इस कलियुग में ब्रह्मरस का पान करके पावन होते जाओ।

जानिऊ तबहिं जीव जग जागा।

जब सम बिषय बिलास विरागा।।

ʹजगत में जीव को जागा हुआ तभी जानना चाहिए जब संपूर्ण भोग-विलासों से वैराग्य हो जाये। जैसे, शरीर रोज गंदा हो जाता है तो पानी से स्नान करके उसे स्वच्छ कर लेते हैं, वैसे ही काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, अहंकार आदि से मन मैला हो जाता है तो उसे सत्संग की वर्षा में स्नान कराके पवित्र कर लो। ज्यो-ज्यों पवित्रता बढ़ती जायेगी, त्यों-त्यों भीतर का आत्म-परमात्मरस छलकता जायेगा। जीवन हलका फूल जैसा हो जायेगा। चिंतारहित, अहंकाररहित, तनावरहित जीवन हो जायेगा। जिस वक्त जो काम करना हो, कर लिया आनंद से, उत्साह से। नींद आई तो सो गये और जाग गये तब भी वाह वाह…..। गोता मारकर अमृत पी लिया… देर किस बात की भैया ! यह ʹजेट युगʹ है। प्रभु का आनंद पाने का यह ʹजल्द युगʹ है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 1999, पृष्ठ संख्या 4-6 अंक 83

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