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Tatva Gyan

ईश्वर की आद्यशक्ति और उसका विस्तार


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

ईश्वर की जो मायाशक्ति है, उसी को आद्यशक्ति कहते हैं। उसी से इस संपूर्ण संसार का व्यवहार चलता है। उसी शक्ति से सत्त्व, रज एवं तम – ये तीन गुण उत्पन्न हुए हैं। सत्त्वगुण के अधिष्ठाता भगवान विष्णु, रजोगुण के अधिष्ठाता भगवान ब्रह्माजी एवं तमोगुण के अधिष्ठाता भगवान शिव माने जाते हैं। गुरुवाणी में आता हैः

एक माई जगत वियायी, तीन चेले परवान।

एक संसारी, एक भंडारी, एक देवे निर्वान।।

ये ही तीन देव क्रमशः सृष्टि का सर्जन, पालन एवं संहार करते हैं। इन सबका जो शुद्ध-बुद्ध स्वरूप है, उसी को परब्रह्म परमात्मा कहते हैं। जैसे, हजारों-हजारों लहरों का जो आधार है, उसको सागर कहते हैं वैसे ही ब्रह्म सागर है, अवतार उसमें लहरियाँ हैं और जीव हैं बुदबुदे। बाहर से लहरें एवं बुदबुदे एक दूसरे से भिन्न-भिन्न दिखते हैं, बड़े छोटे दिखते हैं, किन्तु तत्त्व से तो दोनों एक ही हैं। इसीलिए कहा जाता है – आत्मा सो परमात्मा।

जो बुदबुदा है वही लहर है और जो लहर है वही  बुदबुदा है। तात्त्विक दृष्टि से देखें तो लहर, लहर नहीं एवं बुदबुदा, बुदबुदा नहीं – दोनों पानी ही हैं। ऐसे ही जीव भी चेतन है और ईश्वर भी चेतन है। जो शुद्ध चेतन है, उसका नाम है ब्रह्म। मायाविशिष्ट चेतन का नाम है ईश्वर एवं अविद्याग्रसित चेतन का नाम है जीव। यदि जीव की अविद्या मिट जाये, तो उसका वास्तविक स्वरूप तो है ही ब्रह्म। जैसे बुदबुदा अपने को पानी रूप में जान ले तो वह सागर ही है।

किन्तु जीव बेचारा माया अर्थात् अविद्या में ही जीता है और इसलिए भयभीत, दुःखी और चिंतित होता रहता है। वह धन कमाता है तब भी दुःखी होता है और नहीं कमाता है तब भी दुःखी होता है। शादी करता है तो भी दुःखी होता है और कुँवारा रहता है तो भी दुःखी होता है। यश में भी भयभीत रहता है एवं अपयश में भी भयभीत रहता है। जीव बेचारे की हालत ही ऐसी है कि वह स्वयं को सदा जोखिम में ही पड़ा महसूस करता है। उसकी ऐसी हालत होती है, अपनी बेवकूफी के कारण। नहीं तो वह सदा मुक्त और निर्लेप नारायण है। यह बेवकूफी मिटती है परमात्मा के ज्ञान से और परमात्म-ज्ञान मिलता है परमात्मा की शरण जाने से, परमात्मा-प्राप्त संतों की शरण जाने से।

यह बात जानने के बावजूद भी जीव भटकता रहता है। उसका कारण क्या है ? जीव (मनुष्य) का जगत-विषयक स्पंदन।

स्पंदन दो प्रकार का होता है-

ज्ञान प्रधान और संकल्प-विकल्प प्रधान। परमात्मा का चिंतन करते हैं, लेकिन संकल्प-विकल्प प्रधान स्पंदन वाले जीव जगत का चिंतन करके जगतमय ही हो जाते हैं। बार-बार जगत का चिंतन करने से उन्हें संकल्प-विकल्प की आदत पड़ जाती है और आत्मविषयक चिंतन छूट जाता है। जैसे शेर का बच्चा बाल्यकाल से बकरों के बीच रहने से अपना शेरपना भूल जाता है, वैसे ही जगत का चिंतन करते-करते जीव भी अपना वास्तविक स्वरूप (ब्रह्मत्व) भूल जाता है। ऐसे ही असाधु के साथ साधु रहने लगता है तो साधु भी असाधु हो जाता है, लेकिन यदि असाधु साधु के साथ रहने लगे तो वह भी साधु होकर पूजनीय हो जाता है।

वशिष्ठजी महाराज कहते हैं- “हे रामजी ! संग की बड़ी बलिहारी है। मिट्टी पवन का संग करती है तो गगनगामी होकर पुष्पवाटिका में पहुँच जाती है, साधुओं की जटाओं में पहुँच जाती है…. यदि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के नियम को लाँघकर और ऊपर चली जाये तो फिर सदा के लिए ऊपर ही रह जाती है। किन्तु यदि वही मिट्टी पानी का संग करती है तो कीचड़ बन जाती है। मिट्टी तो एक ही है, किन्तु संग का बड़ा प्रभाव है। ऐसे ही जीव जब परमात्मा की शरण लेता है, संत-महापुरुषों का संग करता है तो देर-सबेर परमात्मामय हो जाता है। किन्तु यदि जगत के व्यक्तियों-वस्तुओं का संग करता है, नश्वर पदार्थों का संग करता है, तो नश्वरता की आदत पड़ जाती है।”

आदत भी तीन प्रकार की होती हैः सात्त्विक, राजसिक और तामसिक।

सब आदतें तो गुलामी करवाती हैं लेकिन संत-महापुरुष इन तीनों आदतों से परे अपने स्वरूप में मस्त रहते हैं और वे ही पूर्ण स्वतंत्र रह पाते हैं। ऐसे ही एक पूर्ण स्वतंत्र महापुरुष हो गये मस्तराम  बाबा।

एक बार उनके चरणों में एक राजा ने आकर प्रणाम किया और कहाः “बाबाजी ! चाचा ने खटपट करके जो राज्य मुझसे छीन लिया था, वह राज्य मुझे वापस मिल गया। चूँकि मैं आपको  प्रणाम करके आपका आशीर्वाद लेकर गया था, इसलिए मुझे अपना राज्य वापस मिल गया। यह आपकी ही कृपा है।”

मस्तराम बाबाः “अरे, बिल्कुल झूठ।”

राजाः “नहीं, नहीं बाबाजी ! आपकी ही कृपा से राज्य मिला है।”

तब मस्तराम बाबा ने खुलासा करते हुए कहाः “अरे मेरी कृपा होती तो तुझे यह नश्वर राज्य तो क्या, मैं ही मिल जाता। यह तो मेरी दासी की कृपा हुई है।”

सच ही तो है। जिन्होंने आत्म-राज्य पा लिया हो, ऐसे ब्रह्मवेत्ता संतों के लिए माया दासी के समान ही होती है। ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों की मनौती मानने से, उनका दर्शन करने से और उनके आशीर्वाद लेने से यदि कोई सांसारिक सफलता मिल जाए तो यह कोई आखिरी उपलब्धि नहीं है। आखिरी उपलब्धि तो यह है कि,

जहाँ में उसने बड़ी बात कर ली।

जिसने अपनी आत्मा से मुलाकात कर ली।।

श्रीमद् भगवद् गीता के छठवें अध्याय के 22वें श्लोक में आता हैः

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।

यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।।

ʹपरमेश्वर की प्राप्तिरूप लाभ को प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा लाभ नहीं मानता है और भगवद्-प्राप्तिरूप अवस्था में स्थित हुआ योगी बड़े भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता है।ʹ

जो ऐसे संत-महापुरुषों को छोड़कर माया की शरण में जाता है, जगत की शरण में जाता है, वह फिर चाहे संसार का सारा राज्य ही क्यों न पा ले, सारे शत्रुओं पर विजय ही क्यों न पा ले अथवा सारी संपत्ति ही क्यों न पा ले, फिर भी सदा के लिए पूर्ण सुखी, पूर्ण स्वतंत्र नहीं हो सकता क्योंकि काम-क्रोध आदि विकारों के प्रभाव से यह सब फीका हो जाता है अथवा तो मृत्यु का झटक एक साथ ही सब कुछ छीन लेता है और चौरासी का चक्कर शुरु हो जाता है।

माया तामसिक लोगों को पाप में, राजसी लोगों को काम एवं लोभ मोह में तथा सात्त्विक लोगों को भजनादि में सुख दिखाती है, किन्तु परमात्मा का दर्शन नहीं करने देती। परमात्म-दर्शन तो वही कर सकता है अथवा पूर्ण सुखी, पूर्ण स्वतंत्र एवं पूर्ण आनंदित तो वही हो सकता है, जो अपनी पुरानी जीवभाव की आदतों को मिटा दे। किन्तु यह तभी संभव है जब जीव जगत का चिंतन छोड़कर परमात्म-चिंतन करने लगे, माया को छोड़कर मायाधीश की शरण में जाये, नश्वर को छोड़कर शाश्वत का मार्ग बतलाने वाले संत-महापुरुषों के चरणों का आश्रय ले ले।

ૐ शांति…. ૐ आनंद …….. ૐ माधुर्य।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 1998, पृष्ठ संख्या 13,14 अंक 71

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ईश्वर प्राप्ति इसी जन्म में संभव है…. पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू


 

कई लोगों को होता है कि ʹहम सियाराम-सियाराम…. हरि ૐ-हरि ૐ…ʹ करते हैं, शिविर भरते हैं, शराब-कबाब छोड़ दिया है फिर भी भगवान नहीं मिलते। क्यों ?

जो चीज अधिक आसान होती है, आसानी से मिलती है। उसका लाभ भी तुच्छ होता है, छोटा होता है। जिस मौसम में जो सब्जी या फल ज्यादा होते हैं उसकी कीमत भी कम होत है।

जीवन में सोना इतना काम नहीं आता जितना की लोहा। भोजन बनाने में, औजार बनाने में, मकान आदि बनाने में लोहा जितना उपयोगी है उतना उपयोग सोने का नहीं है। लेकिन कम मात्रा में मिलने के कारण महँगा सोना खरीदा भी जाता है और बड़े यत्न से रखा भी जाता है।

लखपति के लि 25-50 या 100-200 रूपये की कोई कीमत नहीं किन्तु गरीब व्यक्ति के लिए तो 1-2 रूपये भी कीमती हैं।

जिनके यहाँ साल-दो-साल में बालक आ जाते हैं उन्हें बालक मुसीबत से लगते हैं जबकि जिनके यहाँ 15-20 साल बाद बालक का जन्म होता है तो उन्हें लगता है कि मानो, साक्षात देवता ही आ गये हों।

इसी प्रकार अगर वह परब्रह्म-परमात्मा यदि आसानी से मिल जाता तो उसका आनंद, उसका माधुर्य नहीं ले पाते लेकिन बहुत यत्न करते-करते जब मिलता है तो खूब आनंद-माधुर्य छलकता है।

यहाँ दूसरा प्रश्न उठ सकता है कि ʹफिर भी सबको तो भगवान नहीं मिलते। क्यों ?

हाँ, यह बात सही है लेकिन सबको न मिलने का कारण होता है। एक होती है इच्छा और दूसरी होती है आकांक्षा। इच्छा केवल दिमाग को घुमाती है जबकि आकांक्षा मन-बुद्धि को उसमें सक्रिय भी करती है। दुर्बल इच्छा या दुर्बल आकांक्षा वाला व्यक्ति ईश्वर की प्राप्ति तक की यात्रा नहीं कर पाता है।

अच्छा, यह बात भी स्वीकार कर ली तो पुनः एक प्रश्न उठ सकता है कि ʹइच्छा बढ़कर आकांक्षा बनती है और आकांक्षा जब तीव्र होती है तब जीव ईश्वर को पाता है। यह बात भी ठीक है परंतु जिसकी दुर्बल इच्छा-आकांक्षा है तो वह यदि ईश्वर के रास्ते चला और ईश्वर नहीं मिला तो फिर उसकी इतनी मेहनत का क्या लाभ ? संसार के आकर्षणों के त्याग का क्या लाभ ?

इसका उत्तर है कि संसार की चीजों को पाने का आपने यत्न किया और वे नहीं मिलीं तो आपका यत्न व्यर्थ गया किन्तु ईश्वर को पाने का यत्न किया और ईश्वर इस जन्म में नहीं मिले तो भी वह यत्न व्यर्थ नहीं जाता।

संसार की चीजें जड़ हैं, उन्हें पता नहीं कि ʹआप उनको पाना चाहते हैंʹ। अतः अगर आपको वे चीजें नहीं मिलतीं, तब भी आपकी दुर्बल इच्छा-आकांक्षाओं को सबल बनाने की ताकत उन जड़ वस्तुओं में नहीं है जबकि आपकी आरंभिक दुर्बल इच्छा-आकांक्षा को देखकर अंतर्यामी परमात्मा सोचता है कि ʹनिर्बल के बल राम….।ʹ देर-सबेर, इस जन्म में नहीं तो दूसरे जन्म में, इस जन्म की गयी इच्छा-आकांक्षा को, इस जन्म की साधना को पुष्ट बनाकर वह प्रियतम परमात्मा स्वयं ही मिल जाता है।

इस जन्म का वकील, डॉक्टर दूसरे जन्म में पुनः वकील, डॉक्टर बनना चाहे तो जरूरी नहीं कि बन ही जाये ओर अगर बने भी तो उसे आरंभ तो क, ख, ग, घ… , A, B, C, D…. आदि से ही आरंभ करना पड़ेगा। लेकिन इस जन्म का अगर कोई भक्त है तो दूसरे जन्म में उसे फिर से भक्ति की A, B, C, D…. करने की जरूरत नहीं है वरन् जहाँ से भक्ति छूटी है, वहीं से शुरू हो जायेगी।

शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोभिजायते।।

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।।

ʹयोगभ्रष्ट पुरुष शुद्ध आचरणवाले श्रीमान् पुरुषों के घर में जन्म लेता है अथवा ज्ञानवान योगियों के ही कुल में जन्म लेता है।ʹ (गीताः 6.41.42)

आध्यात्मिक सफलता ऊँची चीज है। वह अनायास और जल्दी नहीं मिलती है वरन् ऊँची चीजों के लिए ऊँचा प्रयत्न करना पड़ता और ऊँची चीजों की महत्ता को स्वीकारना पड़ता है। अमर तत्त्व की प्राप्ति, परमात्मा की प्राप्ति की तीव्र इच्छा कोई मजाक नहीं है। उसमें खूब विवेक चाहिए।

जिसकी ईश्वर प्राप्ति की आकांक्षा खूब तीव्र होती है, वह इसी जन्म में ईश्वर को पा लेता है और आकांक्षा अगर तीव्र नहीं है तो कालान्तर में वह तीव्र बनती है और वह ईश्वर को पा लेता है। किन्तु कालान्तर में तीव्र बने, इसका इन्तजार क्यों करो ? बल्कि अभी तीव्र बना लो। जैसे शहद के छत्ते में एक रानी मधुमक्खी होती है। रानी मधुमक्खी जहाँ जाती है वहाँ बाकी की सारी मधुमक्खियाँ उसी का अनुसरण करती हैं। ऐसे ही आपके जीवन में ईश्वरप्राप्ति की इच्छा को रानी बना दो, मुख्य बना दो तो जो कई जन्मों के बाद मिल सकता है वह अमर तत्त्व, वह अमर पद आप इसी जन्म में पा सकते हैं। केवल अपनी आकांक्षा को तीव्र कर दो, बस।

कई लोग व्यवहार में विफल होते हैं तो कहते हैं- ʹभाई ! मैंने धंधा तो किया किन्तु चला नहीं क्योंकि संघर्ष बहुत था… यह काम तो किया लेकिन क्या करें ? भाग्य ही ऐसा था…. पिता-भाई-भागीदार ने साथ नहीं दिया…ʹ वगैरह-वगैरह। सच बात तो यह है कि उनकी आकांक्षा की तीव्रता नहीं होती इसलिए वे विफल होते हैं और दोष देते हैं व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति को।

विफलता का मुख्य कारण यही है कि आकांक्षारूपी रानी मधुमक्खी के अभाव में साधारण मधुमक्खी बैठा देते हैं और दोष परिस्थितियों को देते हैं। ʹभाई ! इसने धोखा दे दिया… उसने ऐसा कर दिया….ʹ जबकि किसी की आकांक्षा तीव्र होती है तो वह कार्य को पूरा करके ही छोड़ता है और उस कार्य में सफल भी होता है।

जैसे, सांसारिक कार्यों में भी व्यक्ति दुर्बल इच्छा व आकांक्षा व असावधानी के कारण विफल होता है, ठीक वैसा ही ईश्वरप्राप्ति का कार्य है। यदि व्यक्ति की ईश्वरप्राप्ति की आकांक्षा तीव्र नहीं होती तो उसका ईश्वरप्राप्ति का लक्ष्य भी सिद्ध नहीं होता। अतः व्यक्ति को चाहिए कि आकांक्षा को तीव्र बनाये।

आकांक्षा को तीव्र कैसे बनाया जाये ? रोज सुबह उठकर संकल्प करें- “मैं अमर तत्त्व को पाऊँगा। जिसे पाने के बाद और कुछ पाना शेष नहीं रहता, जिसे जानने के बाद और कुछ जानना शेष नहीं रहता और जिसमें स्थिर रहने के बाद बड़े भारी दुःख से भी आदमी विचलित नहीं होता, जिसमें स्थिर होने के बाद इन्द्र का पद भी तुच्छ लगता है उसी में मैं स्थिर रहूँगा….।” इस संकल्प को रोज जोर से दुहरायें। सूर्योदय और संध्या के वक्त का फायदा लें, उपासना करें। महाभारत में यह लिखा है कि ऐसा करने वाले व्यक्ति की धृति, मेधा और प्रज्ञा बढ़ती है। अतः सूर्योदय और सूर्यास्त के वक्त का उपयोग उपासना में करो। चूको नहीं।

दृढ़तापूर्वक इस छोटे से नियम को पालो। तमाम व्यावहारिक विडंबनाएँ मिटाने का सामर्थ्य और ईश्वरप्राप्ति का रास्ता तय करने में भी इससे आसानी होगी। हिम्मत करो।

आलस कबहुँ न कीजिये आलस अरि सम जानि।

आलस से विद्या घटे बल-बुद्धि की हानि।।

रात को जल्दी सो जाओ, रात्रि का भोजन जल्दी कर लो। सुबह जल्दी उठो और इस संकल्प को आत्मसात् कर लो तो अमर तत्त्व पाने की आकांक्षा बढ़ेगी।

दूसरी बात है कि भगवान की महत्ता जान लो कि भगवान सबसे महान हैं। सब पदों से भी परमात्मपद ऊँचा है। सब यशस्वी और सुखियों से भी परमात्मपद को पाये हुओं का यश और सुख ऊँचा है।

जो लोग दान-पुण्य करके सुखी और यशस्वी होना चाहते हैं, ठीक है… धन्यवाद के पात्र हैं वे, लेकिन परमात्मप्राप्ति वालों का यश और सुख अदभुत होता है। धन या सत्ता के बल से जो यशस्वी और सुखी होना चाहते हैं उनका यश सुख भी स्थायी नहीं होता। जो अपने मधुर स्वभाव के बल से यशस्वी-सुखी होना चाहते हैं उनसे भी परमात्मप्राप्तिवालों का सुख और यश ऊँचा होता है। जो दान-पुण्य नहीं करते हैं उनकी अपेक्षा दान-पुण्य करने वालों का यश-सुख टिकता है लेकिन अखंड आत्मतत्त्व को पाये हुओं का सुख अखंड टिकता है। यश तो उऩ्हीं का स्थायी होता है जो तीव्र प्रयास करके, ऊँचा प्रयास करके ऊँचे में ऊँची चीज आत्मदेव को पा लेता है।

इस प्रकार जितनी-जितनी आप ऊँची चीज पसंद करते हैं उतनी-उतनी ही तीव्र आकांक्षा रखनी पड़ती है। उतना ही ऊँचा पुरुषार्थ करना पड़ता है तभी उतना ऊँचा सुख या यश टिकता है।

बालक छोटे-छोटे खिलौनों से या लॉलीपॉप बिस्किट से भी रीझ जाता है किन्तु वही बालक जब बड़ा हो जाता है तो क्या उसे हीरे के लिए लालीपॉप या बिस्किट से रिझाया जा सकता है ? नहीं, क्योंकि उसकी मति अब कुछ सुयोग्य बनी हैं। ऐसे ही यह जगत भी लालीपॉप या बिस्किट के टुकड़े जैसा है और परमात्मा हीरों का हीरा है। आपकी मति ऐसी बने कि जगत की किसी भी ऊँचाई को पाने की लालच में ईश्वरप्राप्ति की इच्छा को न छोड़ दें। किसी शत्रु को ठीक करने में कहीं आपका ईश्वर न छूट जाये। किसी मित्र को रिझाने में कहीं आपका ईश्वरप्राप्ति का लक्ष्य न छूट जाये। किसी सुविधा को पाने में कहीं आप अपने लक्ष्य से च्युत न हो जायें। कोई असुविधा आपकी ईश्वरप्राप्ति की उमंग को न छुड़वा दे। ऐसी सतर्कता रखनी चाहिए।

गलती यह होती है कि ईश्वरप्राप्ति की इच्छा-आकांक्षा तीव्र न होने के कारण हम ईश्वरप्राप्त की बात को एवं जहाँ ईश्वरप्राप्ति की बात सुनने को मिलती है उन महापुरुषों को सुनते हुए भी नहीं सुनते हैं।

ʹमहाराज ! यह कैसे ? ईश्वरप्राप्ति की जो बातें बताते हैं उन महापुरुषों के वचनों को हम सुनते हुए भी नहीं सुनते, यह कैसे ?ʹ

एक बार गौतम बुद्ध ने यही बात आनंद से कही थी किः “आनंद ! मुझे कोई नहीं सुनता है। सब अपने-अपने को ही सुनते हैं।”

“भंते ! यह कैसे ? सब आपको सुनने के लिए ही तो आते हैं।”

“नहीं आनंद नहीं। सब मुझे सुनने के लिए नहीं आते बल्कि अपने को ही सुनने के लिए आते हैं और जो जैसा है वैसा ही सुनता है।”

आनंद फिर भी इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। तब बुद्ध बोलेः

“आज खुद ही इस बात का पता चल जायेगा, आनंद !”

शाम का सत्संग पूरा हुआ, तब बुद्ध ने प्रतिदिन की तरह आज भी दुहराया किः “जाओ, समय बीता जा रहा है… अपने-अपने काम में तत्परता से लगो। दिया हुआ वायदा जरूर निभाना चाहिए। बीता हुआ समय वापिस नहीं आता है। अपना वायदा निभाने वाला व्यक्ति ही सफल होता है।”

इतना कहकर बुद्ध उठे एवं राहगीरों के रास्ते पर आनंद को लेकर खड़े हो गये। पहले-पहले एक वेश्या निकली। उससे पूछाः “तुमको आज सत्संग में कौन सी बात अच्छी लगी ?”

“भगवन् ! आप और यहाँ !! आप सचमुच में भगवान हैं, अंतर्यामी हैं। आज की यह बात तो बहुत ही बढ़िया थी कि ʹदिया हुआ वचन निभाना चाहिए।ʹ आज मैं एक बड़े सेठ को वक्त दे आयी थी और आपने मुझे वक्त पर ही अपना वायदा याद दिला दिया। आप सचमुच ही अंतर्यामी हैं।”

इस प्रकार वेश्या ने अपने को ही सुना, बुद्ध को नहीं।

इतने में दूसरा आदमी निकला। उससे पूछाः “भाई ! आज तुम्हें सबसे ज्यादा क्या बढ़िया लगा ?”

उसने कहाः “वायदा निभाने वाली बात बहुत बढ़िया थी। आज हमने साथियों को वायदा दे रखा है और जहाँ डाका डालना है वहाँ यदि वक्त निकल जायेगा तो हम विफल हो जायेंगे। अतः वक्त कहीं बीत न जाये, इसकी याद दिला दी भंते ने।”

डाकू ने भी अपने को ही सुना। इतने में एक भिक्षु को रोका और उससे पूछाः

“भैया ! आज तुमने क्या सुना ?”

भिक्षुः “हर मनुष्य माँ के गर्भ में प्रार्थना करता है कि ʹहे प्रभु ! बाहर निकलकर तेरा भजन करेंगे।ʹ यह वादा करके गर्भ से बाहर निकलता है कि ʹअब वक्त व्यर्थ नहीं करेंगे, अपना जीवन सार्थक करेंगे।ʹ भंते ! आप भी रोज कहते हैं कि ʹसमय बीत रहा है…ʹ मौत कब आकर गला दबोच ले इसका कोई पता नहीं है इसलिए वक्त का सदुपयोग करेंगे। कहीं असत् वस्तुओं में वक्त न चला जाये, असत् आकांक्षाओं में वक्त न चला जाये, असत् इच्छाओं में वक्त न चला जाये क्योंकि ʹबीता हुआ समय फिर वापस नहीं आता।ʹ आपकी यह बात हमें बहुत जँची।”

तब बुद्ध ने आनंद से कहाः “देख आनंद ! इसने भी अपने को ही सुना है। यह भिक्षु है, इसलिए अपने को ठीक ढंग से सुना है। डाकू और वेश्या ने अपने ढंग से सुना था और भिक्षु ने अपने ढंग से। इस प्रकार सब अपने को ही सुनते हैं।”

फिर भी जैसे पिता बच्चे की हजार-हजार बात मान लेते हैं और बच्चे की भाषा में अपनी भाषा मिला देते हैं, ʹरोटीʹ को ʹलोतीʹ बोल लेते हैं ताकि बच्चा आगे चलकर पिता की भाषा सीख ले। ऐसे ही बुद्ध पुरुष आपकी हजार-हजार ʹहाँʹ में ʹहाँʹ भर लेते हैं ताकि एक दिन तुम भी उनकी हाँ में हाँ भरने की योग्यता पा लो। ईश्वरप्राप्ति की इच्छा-आकांक्षा तीव्र करके मुक्त होने का सामर्थ्य पा लो।

ईश्वरप्राप्ति की आकांक्षा अगर तीव्र हो गयी तो फिर मुक्ति पाना तो वैसे भी सहज ही हो जायेगा और इसके लिए आवश्यक है साधन भजन की तीव्रता।

मान लो, किसी दुकानदार का लक्ष्य है रोज 2000 रूपये का धंधा करना। रात होते-होते उसका 2500-3000 रूपयों का धंधा हो जाता है। एक दिन अगर उसने सुबह-सुबह ही 4500 रूपयों का धंधा कर लिया तो क्या वह दुकान बंद कर देगा कि आज का लक्ष्य पूरा हो गया ? नहीं नहीं, वह सारा दिन दुकान चालू रखेगा कि 5000 रूपयों का धंधा हो जाये… 6000 रूपयों का हो जाये। जब मनुष्य को नश्वर धन मिलता है तब भी वह लोभ बढ़ा लेता है ऐसे ही शाश्वत साधन-भजन और निष्ठा में लोभ बढ़ा दे तो तीव्र आकांक्षा आत्मसाक्षात्कार करा देगी।

कबीरजी ने कहा हैः

 

गीता में प्रपत्तियोग


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।

भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- “हे अर्जुन ! मेरे में आविष्ट चित्तवाले उन भक्तों का मैं मृत्युरूप संसार-समुद्र से शीघ्र ही उद्धार करने वाला बन जाता हूँ।” गीताः 12.7

संसार एक सागर है। जैसे सागर में जल-ही-जल है ऐसे ही संसार में मृत्यु ही मृत्यु है। जो पैदा होता है, मृत्यु की ओर उसकी यात्रा शुरु हो जाती है। जो संयोग है वह वियोग में बदल जाता है। जो संग्रह है वह विनाश में बदल जाता है।

ऐसा कोई शरीर नहीं जिसके साथ मृत्यु न जुड़ी हो। ऐसा कोई संयोग नहीं जिसके साथ वियोग न जुड़ा हो। ऐसा कोई संग्रह या भोग नहीं जिसका विनाश या वियोग न होता हो।

संसार मानेः संसरति इति संसारः। जो सरकता जाये उसे संसार कहते हैं। सिक्ख धर्म के आदिगुरु नानकदेव ने कहा हैः

राम गयो रावण गयो ताको बहु परिवार।

कह नानक कछु थिर नहीं सपने ज्यों संसार।।

शिवजी ने भी कहा हैः

उमा कहऊँ मैं अनुभव अपना।

सत्य हरि भजन जगत सब सपना।।

जहाँ खूब दूध होता है उसे दुग्धालय बोलते हैं। जहाँ पुस्तकें होती हैं उसे पुस्तकालय बोलते हैं। जहाँ औषधियाँ होती हैं उसे औषधालय बोलते हैं। ऐसे ही जहाँ दुःख-ही-दुःख है उस संसार को दुःखालय कहा गया है। यह दुःखालय तो है ही, साथ ही विनाशशील भी है।

फिर भी ऐसे दुःखालय और विनाशील संसार में भी एक सुखस्वरूप भगवान का अनुभव किया जा सकता है। मरणधर्मा शरीर में अमर ईश्वर का एहसास हो सकता है। नश्वर में शाश्वत की मुलाकात करने की संभावनाएँ छुपी हैं। इसलिए मनुष्य जीवन सबसे श्रेष्ठ और दुर्लभ माना जाता है।

संसार की ऐसी कोई वस्तु नहीं, ऐसी कोई परिस्थिति नहीं, ऐसी घटना नहीं, ऐसा कोई संयोग नहीं, ऐसा कोई संबंध नहीं, जो सदा रहे। सब नाश की तरफ जा रहे हैं।

खून पसीना बहाता जा तान के चादर सोता जा।

यह किश्ती तो हिलती जायेगी, तू हँसता जा या रोता जा।।

कितना भी इसको थामने का प्रयास करो किन्तु संसार की चीजें और संसार कभी थमा नहीं है। वह बदलता रहता है।

चाँद सफर में, सितारे सफर में।

दरिया सफर में, दरिया के किनारे सफर में।।

जहाँ बस्तियाँ थीं, वे बस्तियाँ सागर में कहाँ खो गयीं ? पता तक नहीं है। जहाँ समुद्र लहराता था वहाँ सड़कें बन गयीं और गाड़ियाँ दौड़ रही हैं। जहाँ पानी उछलकूद करता था, वहाँ तो दस-दस मंजिली इमारतें दिखाई देती हैं और जहाँ मकान थे वे पूरे के पूरे गायब हो गये दरिया में। मोहन-जो-दड़ो केवल एक ही नहीं है, सारी दुनिया मोहन-जो-दड़ो की तरह हो जाती है समय पाकर।

देखत नैन चल्यो जग जाई। का माँगू कछु थिर न रहाई।।

देखते-देखते इस संसार की परिस्थितियाँ चली जा रही हैं, क्या माँगूं ?

अनित्यानि शरीराणि वैभवो नैव शाश्वतः।

नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः।।

शरीर अनित्य है। वैभव शाश्वत नहीं है और हम रोज मृत्यु की तरफ जा रहे हैं। अतः हमारा कर्तव्य यह है कि धर्म का संग्रह कर लें और धर्म का संग्रह करने वाले पुरुष के लिए भगवान वचन देते हैं-

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।

भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।।

हे अर्जुन ! जैसे धनवान व्यक्ति की पत्नी अगर भीख माँगे तो उस धनवान व्यक्ति की इज्जत का सवाल है। ऐसे ही मेरा भक्त संसार के सागर में बार-बार गोते खाये और जन्मे मरे तो मेरी इज्जत का सवाल है। जो मेरा होकर मेरा भजन करता है, उसे पार होने की चिंता नहीं करनी चाहिए। जो मेरा होकर मेरा भजन करता है उसे  भोजन, छाजन, नीर की भी चिंता नहीं करनी चाहिए। उसे कभी उदास या चिंतित नहीं होना चाहिए और कभी संदेह नहीं करना चाहिए। जैसे पतिव्रता स्त्री कभी यह नहीं सोचती कि ʹपति मेरा भरण पोषण करेगा कि नहीं ? मुझे सुख देगा कि नहीं ?ʹ ऐसे ही दृढ़ भक्त जब मेरे होकर भजन करते हैं तो फिर वे कोई संशय या संदेह नहीं करते।

संशय सबको खात है संशय सबका पीर।

संशय की फाकी करे उसका नाम फकीर।।

भिखमंगे का नाम फकीर नहीं है  वरन् जिसने संशय की फाँकी कर ली उसका नाम फकीर है। भगवान हमारा भजन सुनते होंगे कि नहीं, भजन फलता होगा कि नहीं, यह संशय मत आने दो। ʹहमारा क्या होगा ?ʹ अरे !

भोजन छाजन नीर की चिंता करे सो मूढ़।

भक्त चिंता ना करे निज पद में आरूढ़।।

निज पद में आरूढ़ चिंता करे सो कैसी ?

खुशी है ता में प्राप्त अवस्था जैसी।।

किसी ने कहा हैः

गम की अँधेरी रात में, दिल को न बेकरार कर।

सुबह जरूर आयेगी, सुबह का इंतजार कर।।

…..और तेरा परमेश्वर ही तो तेरी सुबह है भैया ! उस परमेश्वर की प्रेरणा ही तो तेरी सुबह है। शरीर की सुबह तो रोज आती है फिर अँधकारमयी रात्रि आ जाती है लेकिन परमेश्वररूपी सुबह, परमेश्वररूपी प्रकाश यदि एक बार भी हृदय में आ जाता है तो फिर रात्रि का सवाल ही नहीं रहता।

भगवान कहते हैं- ʹजो मेरे को अपना निकटवर्ती और नित्य शुद्ध-बुद्ध-चैतन्यस्वरूप जानते-मानते हैं और मेरा भजन करते हैं, अपना चित्त मुझ चैतन्य में लगाते हैं, उन्हें संसार-सागर से तरने की चिंता नहीं करनी चाहिए।

मृत्यु के समय तो शरीर रोग के प्रभाव से पीड़ित हो जाता है। मृत्यु के समय जीव मेरा चिंतन करे और मैं उसे तार दूँ ऐसी बात नहीं है, अर्जुन ! फिर उनकी जीवनभर की भक्ति का क्या होगा ? केवल मृत्यु के समय मेरा भजन करे और तभी मैं उन्हें तारूँ तो फिर मेरे में और दुकानदार में क्या फर्क ? जो सचमुच में एक बार भी मेरी शरण आ जाता है, मैं उसे नहीं छोड़ता।

सचमुच में हम ईश्वर की शरण हैं लेकिन मानते नहीं हैं और राग-द्वेष की शरण में चले जाते हैं। लोभ-लालच की शरण में चले जाते हैं। हाड़-मांस के शरीर की शरण में चले जाते हैं। किन्तु इन चीजों की कितनी भी शरण लो, वे शरण देती नहीं कम्बख्त ! वरन् थप्पड़ें ही मारती हैं जबकि एक बार सच्चे हृदय से परमात्मा की ली गयी शरण भवसागर से तारती है।

कुछ समय पहले वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग कियाः एक मुर्गी ने अण्डा सेया। सेते-सेते जब दिन पूरे हो गये तब एक अण्डे को चोंच मारी तो ज्यों ही चूजे का मुँह बाहर आये उससे पहले मुर्गी को उठाकर बतख को रख दिया । चूजे की पहली नजर बत्तख पर पड़ी तो वह बत्तख को ही अपनी माँ समझने लगा और उसके पीछे-पीछे जाने लगा। बत्तख चोंचे मार रही थी और उसकी असली माँ (मुर्गी) चिल्ला भी रही थी अपने पास बुलाने के लिए किन्तु चूजा बत्तख के पीछे ही लगा रहा।

ऐसे ही वास्तव में हम परमात्मा के बच्चे हैं।

परमात्मा ज्ञानस्वरूप हैं तो हमारी आत्मा भी ज्ञानस्वरूप है। परमात्मा सुखस्वरूप है तो हमारी आत्मा भी सुखस्वरूप है। परमात्मा नित्य है तो हमारी आत्मा भी नित्य है, किन्तु हम मायारूपी बत्तख के प्रभाव में आ गये हैं। उसकी कई चोंचे भी लगती हैं। कभी काम की चोंच तो कभी क्रोध की, कभी लोभ की तो कभी मोह की, कभी अहंकार की भी चोंच लगती है और अतं में तो बड़ी चोंच लगती है मृत्यु की। ऐसे ही सदियों से चोंचे खाता आया है यह जीव किन्तु अगर इस मनुष्य जन्म में उसे सत्संग मिल जाये और असली माँ रूपी परमात्मा ही हमारा सच्चा विश्रांति स्थल है यह समझ में आ जाये तो उद्धार हो जाये।

वास्तव में तो आपका और ईश्वर का ऐसा पक्का संबंध है कि आप तोड़ना चाहें तो भी नहीं तोड़ सकते और अगर ईश्वर खुद भी तुम्हारे साथ संबंध तोड़ना चाहे तो भी नहीं तोड़ सकता। इतना हमारा और ईश्वर का अविभाज्य संबंध है, शाश्वत संबंध है लेकिन अज्ञानता के कारण हम कल्पित संबंधों को सच्चा मानते हैं और सच्चे संबंध को पीठ दिये हुए हैं।

आपका और इस शरीर का संबंध 60-70 पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा और अभी-भी नहीं की तरफ ही जा रहा है। सेठ का और रुपयों का संबंध पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा। पिता और पुत्र का संबंध भी पुत्र के जन्म से पहले नहीं था और मरने के बाद भी नहीं रहेगा। लेकिन परमात्मा के साथ इस जीवात्मा का संबंध तो जन्म के पहले भी था, जन्म ले रहा था तब भी उस चैतन्य के साथ संबंध था, बाल्यावस्था में भी था, किशारावस्था में भी था। किशोरावस्था चली गयी फिर भी ईश्वर  साथ तुम्हारा संबंध नहीं गया। यौवन चला गया फिर भी परमात्मा के साथ का संबंध नहीं गया। बुढ़ापा चला जाये और मौत आ जाये फिर भी परमात्मा के साथ जीवात्मा का संबंध नहीं टूट सकता है। अरे ! जीवात्मा और परमात्मा का संबंध तो मृत्यु के बाद भी नहीं टूट सकता।

जैसे महाकाश के साथ घटाकाश का संबंध नहीं टूट सकता है। महाकाश संबंध तोड़ना चाहे फिर नहीं तोड़ सकता और घड़ा संबंध तोड़ना चाहे फिर भी महाकाश से संबंध नहीं तोड़ सकता। जैसे लहर पानी से संबंध तोड़ना चाहे तो नहीं तोड़ सकती और पानी लहर से संबंध तोड़ना चाहे तो नहीं तोड़ सकता है ऐसे ही ईश्वर और जीव का संबंध नहीं टूट सकता है क्योंकि वह सनातन संबंध है।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।

मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।

ʹहम ईश्वर के हैं, इस बात में तो जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए। फिर वह जो भी करे।ʹ मान दिलाता है तो तेरी मौज… अपमान दिलाता है तो तेरी मौज… अगर नरक में भेजे तो हम तेरे होकर ही नरक में भी जायेंगे।ʹ अगर ईश्वर के होकर नरक में गये तो नरक के बाप की भी ताकत नहीं कि दुःख दे सके। किन्तु अगर भोगों के स्वर्ग में भी गये तो स्वर्ग सुखदायी नहीं वरन् दुःखदायी ही होगा।

ईशावास्य उपनिषद में आता हैः तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः। यह सारा जगत ईश्वररूप है, इसे त्याग से भोगो, पकड़ो मत। जगत की बातों को, जगत की परिस्थिति को अपने भीतर गहरा मत उतारो। अपने में अगर उतारना ही है तो अपना-आपा है, उसके ही प्रेम को अपने में उतारो तो वही रूप हो जाओगे।

सच पूछो तो केवल परमात्मा ही अपना है। नानक जी ने कहा हैः

संगी साथी चल गये सारे कोई न निभियो साथ।

कह नानक इह बिपत में टेक एक रघुनाथ।।

इस शरीर को ʹमैंʹ मानकर और वस्तुओं को ʹमेरीʹ मानकर जो सुखी होना चाहता है उसके भाग्य में दुःख ही दुःख है। इस शरीर को ʹमैंʹ मानकर, वस्तुओं को और संबंधों को सँभाल-सँभालकर जो सुख ढूँढता है उसे V.I.P. Quota का मूर्ख माना जाता है। श्रीकृष्ण ने ऐसे लोगों को गिनकर 108 गालियाँ दी हैं। वह भी कृपा करके दीं हैं।

जैसे बेटा अंगारे के पास चला जाता है तो माँ उसे डाँटती है, मारती है। इसमें माँ काच द्वेष नहीं है वरन् यह भी माँ की कृपा ही है। ऐसे ही माताओं की माता और पिताओं के पिता जो भगवान श्रीकृष्ण हैं उन्होंने गीता में 108 गालियाँ दी हैं ताकि लोग मूर्खता छोड़ें।

विमूढ़ा नानुपश्यन्ति। नराधमाः। आसुरंभावमाश्रिताः।

इस प्रकार की 108 गालियाँ उन्हें दी हैं जो आसक्त होकर मिथ्या संसार में सच्चा सुख ढूँढना चाहते हैं ताकि वे सावधान हो जायें।

अपनी निष्ठा उस परमेश्वर में रखो और परमेश्वर को अपना मानकर तथा अपने को परमेश्वर का मानकर कार्य करो। भजन करो, जो भी निर्णय लो, परमेश्वर के होकर लोगे तो वह अंतर्यामी परमेश्वर जरूर तुम्हारे हृदय में शुभ प्रेरणा करेगा और तुम सफल हो सकोगे।

जिसने उस परमेश्वर को तत्त्व से जान लिया उसके लिए कर्त्तव्य शेष नहीं रह जाता। तस्य कार्यं न विद्यते। वह वही रूप हो जाता है और वास्तव में देखा जाय तो तुम भी वही हो। जैसे पानी में छोटे-बड़े बुलबुले होते हैं किन्तु तत्त्व से तो सारे बुलबुले पानी हैं, वैसे ही तत्त्व से हम सब भगवान के हैं और भगवान हमारे हैं। इस बात को अगर एक बार भी ठीक से समझ लिया तो फिर संसार-सागर से पार होना आसान हो जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 1997, पृष्ठ संख्या 4-9, अंक 58

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