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Tatva Gyan

परिस्थितियों के प्रभाव से परे


पूज्यपाद संत श्री आसाराम जी बापू

सारे जन्म-मरण मन की चंचलता और आसक्ति का फल है। सारे दुःख-क्लेश और मुसीबतों का मूल है मन की चंचलता और आसक्ति। गीता में अर्जुन कहता है श्रीकृष्ण सेः

चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढ़म्।

तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।।

ʹहे कृष्ण ! यह मन बड़ा चंचल और प्रमथन स्वभाव वाला है तथा बड़ा दृढ़ और बलवान है, इसलिए इसको वश में करना वायु की भाँति अति दुष्कर मानता हूँ।ʹ

तब श्री कृष्ण कहते हैं-

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।

ʹहे महाबाहो ! निःसन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है, परंतु हे कुंतीपुत्र अर्जुन  ! अभ्यास से अर्थात् स्थिति के लिए बारंबार यत्न करने से और वैराग्य से मन वश में होता है।ʹ (गीताः 6.34.35)

ज्यों-ज्यों मन शांत होता जायेगा, त्यों-त्यों उसमें परमात्मा का सुख उभरता जायेगा। ज्यों-ज्यों मन अनासक्त होगा, त्यों-त्यों मन परमात्म-प्रेम में पावन होता जायेगा।

आलस्य को भगाने के लिए परिश्रम, उत्साह, स्फूर्ति और तत्परता के विचार सहायक हैं। ऐसे ही कामुकता को दूर करने के लिए ब्रह्मचर्य के विचार, मातृभावना, पवित्रता एवं संयम के विचार, विकारों के परिणाम के विचार करना मददरूप बनता है। क्रोध को भगाना हो तो शांति, प्रेम, क्षमा, मैत्री, सहानुभूति, सज्जनता, उदारता एवं आत्मभाव के विचार सहायक हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, निराशा-हताशा, आलस्य आदि आत्मसुख को लूटने  वाले विकार हैं।

मन में क्रोध आया, हम क्रोधित हुए। क्रोध चला गया, हम शांत हुए। मन में काम आया, व्यक्ति कामी हो गया। काम चला गया, व्यक्ति शांत हो गया। मन में निराशा-हताशा आयी, चिंता आयी तो नींद हराम हो गयी, खाना खराब हो गया, स्वास्थ्य बिगड़ गया। निराशा-हताशा एवं चिंता के विचारों को हटाने के लिए साहस, आशा, पुरुषार्थ के विचार करो। इस प्रकार एक-एक दोष को निकालने के लिए उसके विपरीत विचार करो।

विकारों की जगह पर निर्विकारता ले आओ। आपका जीवन सुखमय हो जायेगा, आनंदमय हो जायेगा, मधुमय हो जायेगा। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- अगर तुम्हें इसी जीवन में अपने जीवनदाता स्वभाव को पाना है, सारे दुःखों से सदा के लिए छूटना तो…

जितात्मनः प्रशांतस्य परमात्मा समाहितः।

शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः।।

जिसने अपने-आप पर विजय कर ली है, वह शीत-उष्ण अर्थात् अनुकूलता और प्रतिकूलता को सहने वाला शरीर के प्रभाव से प्रभावित नहीं होता वरन् शरीर पर उसका प्रभाव बढ़ जाता है। दुःख और सुख मन को होता है। दुःख-सुख में जो सम रहता है, वह मन के प्रभाव से दबता नहीं और वह मन का स्वामी होने में सफल हो जाता है। मान-अपमान की गाँठ बुद्धि को होती है, यह समझकर जो उससे परे हो जाता है, उसे मान-अपमान प्रभावित नहीं कर सकते।

ʹसर्दी-गर्मी, सुख-दुःख, मान-अपमानादि आते जाते रहते हैं, लेकिन मैं तो नित्य हूँ, निर्विकार हूँ…. निर्विकार नारायण का अविभाज्य अंग हूँ…. ऐसा चिंतन कर। मेरे भाई ! पवित्र आचरण का, संयम सदाचार का आश्रय ले। ऐसा करने से शरीर के साथ का अपना अहं प्रत्यय हटता जायेगा और मन की तमाम वृत्तियों से अपना पिण्ड छूटता जायेगा तथा साधक सिद्धत्व के रास्ते चल पड़ेगा। फिर शरीर का प्रभाव तुम पर नहीं पड़ेगा, मन का प्रभाव तुम पर नहीं पड़ेगा वरन् तुम्हारा प्रभाव शरीर और मन पड़ेगा, तुम्हारा प्रभाव बुद्धि पर पड़ेगा। जैसे, भगवान का प्रभाव प्रकृति पर पड़ता है वैसे ही इस जीवात्मा का प्रभाव शरीर, मन और बुद्धि पर पड़ जाये तो जीवात्मा का प्रभाव शरीर, मन और बुद्धि पर पड़ जाये तो जीवात्मा परमात्मा से अभिन्न हो जाये। अरे ! अभिन्न क्या होना ? वास्तव में तो दोनों अभिन्न ही हैं यह पता चल जाये।

अगर मन पर अपना प्रभाव पड़ा तो वासनाएँ शांत होने लगेंगी और अपने चित्त में परमात्मा से दूरी की जो भ्रांति है, वह दूर हो जायेगी। फिर अपने ही मन में परमात्मा का सुख, परमात्मा का वैभव, परमात्मा का आनंद और परमात्मा का माधुर्य उभरने लगेगा। जैसे, बादल के हटने पर सूर्य दिखता है अथवा तो शीतकाल में आकाश स्वच्छ होता है, वैसे ही शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक प्रभावों से ज्यों-ज्यों अपने को दूर करता जायेगा, त्यों-त्यों अपना साफ-सुथरा आत्मसुख, आत्मवैभव प्रगट होता जायेगा।

धनबल, जनबल, बाहुबल और बुद्धिबल इन सारे बलों को जहाँ से बल मिलता है वह है आत्मवैभव। अगर आत्मवैभव मिल गया तो बाकी के वैभव तुम्हारे दास होने लगेंगे, बाकी के वैभव फिर तुम्हें आसक्त नहीं कर पायेंगे।

जैसे, व्यक्ति दूसरों को सुधारने के लिए तत्पर होता है, शत्रु का दोष बड़ी तत्परता से खोज निकालता है, ऐसे ही अपनी कमजोरियाँ खोज निकाले तो वह महापुरुष बन जायेगा।

बुद्ध के सत्संग में सत्संगी आते थे, बुद्धिमान, संयमी भिक्षु भी आते थे और आम आदमी भी आते थे। बुद्ध ने सत्संग पूरा किया। आम आदमी तो चल दिये लेकिन एक किशोर और कुछ साधक भिक्षु बैठे रहे। उस किशोर ने बुद्ध से प्रश्न कियाः “भन्ते ! सबसे छोटा आदमी कौन है ?”

वह किशोर बड़ा धीर-गम्भीर, शांत, चंचलतारहित चित्तवाला लग रहा था। बुद्ध ने उसका प्रश्न सुना और वे गंभीर हो गये। बच्चे का प्रश्न बढ़िया था। बुद्ध तनिक देर के लिए अपने-आपमें आ गये, फिर बोलेः

“सबसे छोटा आदमी वह है जो केवल अपने लिये ही सोचता है, जो केवल अपने स्वार्थ में ही मशगूल रहता है। जो केवल अपने लिये ही जीता है, वह सबसे छोटा व्यक्ति है।”

ज्यों-ज्यों सोच का दायरा, विचार का दायरा व्यापक होता जायेगा, त्यों-त्यों व्यक्ति बड़ा होता जायेगा। दूसरों के दुःख हरने में और दूसरों के चित्त में सुख भरने में, दूसरों की अशांति हरने में एवं शांति भरने में जितना-जितना चित्त मशगूल होगा उतना-उतना चित्त चैतन्य के साथ तदाकार होता जायेगा और दूसरों का दुःख हरने का सामर्थ्य आता है दुःखहारी श्रीहरि में गोता मारने से। जरा-जरा बात में, जरा सी शारीरिक सुविधा-असुविधा से प्रभावित मत हो, मानसिक सुख-दुःख से प्रभावित मत हो और बुद्धिगत मान-अपमान से भी प्रभावित मत हो, क्योंकि असुविधाएँ तुम्हें डराकर डरपोक बना देंगी और सुविधाएँ तुम्हें आसक्त करके खोखला कर देंगी। सुख तुम्हें आसक्त करके खोखला कर देगा और दुःख तुम्हारे अंतःकरण को अशुद्ध कर देगा।

भगवान कहते हैं- जितात्मनः प्रशांतस्य। आप प्रशांत रहो। अशांत नहीं, शांत नहीं वरन् प्रशांत रहो अर्थात् सुव्यस्थित शांत रहो। शारीरिक, मानसिक या बौद्धिक चाहे कोई भी प्रतिकूलता आये या अनुकूलता, आप प्रशांतात्मा रहो, जितात्मा रहो। ज्यों-ज्यों आप जितात्मा होंगे, त्यों-त्यों आपका जीवन सशक्त होगा, निखरेगा और आप सफलता के उन शिखरों पर पहुँच जायेंगे, जहाँ पहुँचना साधारण आदमी के लिए असाध्य है, दुर्लभ है।

धनबल, जनबल, बाहुबल की अपेक्षा स्वभावबल ज्यादा हितकारी है। जिसका स्वभाव दिव्य हो जाता है उसके पास धनबल, सत्ताबल आदि अपने आप खिंचकर आ जाते हैं और जिसका स्वभाव बल क्षीण है उसकी थोड़ी-बहुत प्रशंसा करके लोग उसका शोषण कर लेते हैं। जिसका स्वभाव बल कमजोर है, जो जरा-जरा बात से प्रभावित हो जाता है उसे तो दूसरे लोग भी जरा-जरा बात में प्रभावित करके अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं।

संसार में तुम कहीं भी जाओ तो सब तुम्हारे शोषण की ताक में ही रहते हैं। जैसे दुकानदार ग्राहक के शोषण की ताक में रहते हैं कि ʹज्यादा पैसे लेकर माल दूँ।ʹ फिर अगर तुम्हारा स्वभाव बल दिव्य नहीं है तो तुम उनके शोषण के शिकार हो जाओगे। लोग तुम्हें थोड़ी-सी सुविधा देकर तुम्हारा शोषण कर लेंगे। अतः तुम सुविधाओं गुलाम मत बनो, उनमें फंसो मत वरन् याद रखो श्रीकृष्ण की दिव्य वाणी को किः शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः। शीत और उष्ण ये दो शब्द कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने तमाम शारीरिक सुविधा-असुविधाओं से अप्रभावित रहने की प्रेरणा दी है। ʹसुख-दुःखʹ ये दो शब्द कहकर मानसिक प्रभावों से अप्रभावित रहने की प्रेरणा दी है और मान-अपमान ये दो शब्द कहकर बौद्धिक प्रभावों से अप्रभावित रहने की प्रेरणा दी है ताकि आपका अपना दिव्य स्वभाव प्रगट हो सके।

अनुकूलताएँ और प्रतिकूलताएँ आयें तो तुम उनमें फँसो मत, नहीं तो वे तुम्हें ले डूबेंगी। शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक तीनों ही प्रभावी से अगर थोड़े-से सावधान हो गये तो योगी का योग सफल होने लगेगा, तपी का तप सफलता की सुवास बिखरेगा, ध्यानी का ध्यान सफल होने लगेगा, भक्त की भक्ति सफल होने लगेगी और जपी का जप भी आत्मरस प्रगटने में सफल हो जायेगा।

जो दुनिया की ʹतू-तू… मैं-मैंʹ से प्रभावित नहीं होता, जो दुनियादारों की निंदा-स्तुति से प्रभावित नहीं होता और जो दुनिया के सुख-दुःख से प्रभावित नहीं होता, वह दुनिया को हिलाने में अवश्य सफल हो जाता है।

सुविधा-असुविधा, यह इन्द्रियों का धोखा है, सुख-दुःख, यह मन की वृत्तियों का धोखा है और मान-अपमान यह बुद्धिवृत्ति का धोखा है। इन तीनों से बच जाओ तो संसार आपके लिए नंदनवन हो जायेगा। अगर इन तीन प्रभावों से आप ऊपर उठ गये तो आपका चित्त कहीं जाकर नहीं, कुछ पाकर नहीं, कुछ छोड़कर नहीं, मरने के बाद नहीं वरन् आप जहाँ हो वहीं के वहीं और उसी समय चैतन्य का सुख पा लेगा।

सरदार वल्लभभाई पटेल, लौह पुरुष एक बार रेल के दूसरे दर्जे में यात्रा कर रहे थे। कम्पार्टमेन्ट में भीड़-भाड़ नहीं थी, वरन् वे अकेले थे। इतने में स्टेशन पर गाड़ी रूकी और एक अंग्रेज माई आयी। उसने देखा कि ʹइनके पास तो खूब सामान-वामान है।ʹ

“यह सामान देकर तुम चले जाओ, नहीं तो मैं शोर मचाऊँगी। राज्य हमारा है और तुम इण्डियनʹ आदमी हो। मैं तुम्हारी बुरी तरह पिटाई करवाऊँगी।ʹ

जो आदमी परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता, वह परिस्थतियों को प्रभावित कर देता है. सरदार वल्लभभाई पटेल को युक्ति लड़ाने में देर नहीं लगी। उन्होंने माई की बात सुनी तो सही किन्तु ऐसा स्वांग किया कि मानो वे बहरे हों। वे इशारे से बोलेः “तुम क्या बोलती हो, वह मैं नहीं सुन पा रहा हूँ। तुम जो बोलना चाहती हो, वह लिखकर दे दो।”

उस अंग्रेज माई ने समझा कि ʹयह बहरा है, सुनता नहीं हैʹ अतः उसने लिखकर दे दिया। जब चिट्ठी सरदार के हाथ में आ गयी तो वे खूब जोर से हँसने लगे। अब माई बेचारी क्या करे ? उसने तो धमकी देनी चाही थी किन्तु अपने हस्ताक्षर वाली चिट्ठी देकर खुद ही फँस गयी।

ऐसे ही प्रकृति माई से हस्ताक्षर करवा लो तो फिर वह क्या शोर मचायेगी ? क्या पिटाई करवायेगी और क्या तुम्हें जन्म-मरण के चक्कर में डालेगी ? इस प्रकृति माई की यही तीन बाते हैं- शीत-उष्ण, सुख-दुःख और मान-अपमान। इनसे अपने को अप्रभावित रखो तो विजय तुम्हारी है। किन्तु गलती यह करते हैं कि हम साधन भी करते हैं और असाधन भी साथ में रखते हैं। हम सच्चे भी बनना चाहते हैं और झूठ भी साथ में रखते हैं। हम सच्चे भी बनना चाहते हैं और झूठ भी साथ में रखते हैं। भले बने बिना भलाई खूब करते हैं और बुराई भी साथ में रखते हैं। भय भी साथ में रखते हैं और निर्भय होना भी चाहते हैं। आसक्ति साथ में रखकर अनासक्त होना चाहते हैं, इसीलिए परमात्मा का पथ लंबा हो जाता है।

अतः अपने स्वभाव में जागो। ʹस्वʹ भाव अर्थात् स्व का भाव। परभाव नहीं। सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख, मान-अपमान आदि परभाव हैं क्योंकि ये शरीर, मन और बुद्धि के हैं, हमारे नहीं। सर्दी आयी तब भी हम थे, गर्मी आयी तब भी हम हैं। सुख आया तब भी हम थे और दुःख आया तब भी हम थे और दुःख आया तब भी हम हैं। अपमान आया तब भी हम थे और मान आया तब भी हम हैं। हम पहले भी थे, अब भी हैं और बाद में भी रहेंगे। अतः सदा रहने वाले अपने इसी ʹस्वʹ भाव में जागो।

शरीर की अनुकूलता और प्रतिकूलता, मन के सुखाकार और दुःखाकार भाव, बुद्धि के रागाकार और द्वेषाकार भाव इनको आप सत्य मत मानिये। ये तो आऩे जाने वाले हैं, बनने-मिटने वाले हैं, बदलने वाले हैं लेकिन अपने स्वभाव को जान लीजिये तो काम बन जायेगा। जितना-जितना आदमी जाने-अनजाने ʹस्वʹ के भाव में होता है उतना-उतना वह परिस्थितियों के प्रभाव से अप्रभावित रहता है और जितना वह अप्रभावित रहता है उतना ही उसका प्रभाव परिस्थितियों पर पड़ता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 1997, पृष्ठ संख्या 2,3,4,5 अंक 57

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आत्मबल ही वास्तविक बल है


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

जो बलवान है, प्राणशक्ति से युक्त है उसके लिए पराये भी अपने हो जाते हैं जबकि दुर्बलों के लिए अपने भी पराये हो जाते हैं।

वीरभोग्या वसुन्धरा।

बल ही जीवन है। निर्बलता ही मौत है। समस्त बलों का उदगमस्थल है आत्मा। आत्मा के कारण ही सब प्रिय लगता है और सफलता, सौन्दर्य, माधुर्य, आनंद आदि भी आत्मा  आभा से ही निखरते हैं। इस असत्, जड़, दुःखरूप, परिवर्तनशील और क्लेशों से परिपूर्ण जगत में भी उन्हीं लोगों  रस, आनंद, माधुर्य आदि मिलता है, जिनके जीवन में जगमगाते हुए आत्मभाव का प्रकाश है।

जिन वस्तुओं से आपका अपनत्व है वे ही वस्तुएँ प्यारी लगती है। ʹअपना मकान… अपनी गाड़ी…. अपना बेटा…ʹ आदि क्यों प्यारे लगते हैं ? क्योंकि उनमें आपका अपनत्व है। दुनियाभर के प्रिय व्यंजन आपके समक्ष रख दिये जाते हैं, फिर भी यदि आपका स्वास्थ्य अच्छा नहीं है तो वे सारे व्यंजन आपको फीके लगेंगे, नीरस लगेंगे क्योंकि जिह्वा में अपना रस नहीं है। जिह्वा में जब अपनत्व , चैतन्य का रस होता है, तभी व्यंजन रसमय लगते हैं नहीं तो उन जड़ व्यंजनों में रस कहाँ ? इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों के साथ भी है।

जिन चीजों को भोगने योग्य मानकर तुम अपनी आभा, अपनी ऊर्जा, अपने आत्मचैतन्य की शक्ति बिखेर देते हो, उन्हीं चीजों के इन बाह्य आकर्षणों की अपेक्षा, उनमें जो आत्मसत्ता है उसका ख्याल रखकर अपनी आत्मसत्ता का विकास करो तो तुम्हारा बल बढ़ जायेगा।

एक समय था जब बालक माँ की गोद से पलभर भी दूर नहीं होना चाहता था। जब माँ जवान थी और बालक लाचार था, उसे माँ से पोषण मिलता था, तब वह बार-बार माँ की गोद में पहुँच जाता था। माँ की गोद में पाने के लिए चीखता-पुकारता था। लेकिन वही बालक बड़ा होकर माँ को बूढ़ी पाता है और अब माँ से उसका स्वार्थ नहीं सिद्ध होता तो वह माँ की और देखता तक नहीं। माँ के पास कुछ देर बैठने की उसे फुर्सत तक नहीं क्योंकि अब जिससे स्वार्थ सिद्ध होता है वह पत्नी अब मिल चुकी है। यह सारा संसार ही अपने स्वार्थ से एक-दूसरे के साथ जुड़ा है। तुलसीदासजी ने भी कहा हैः

सुर नर मुनि सबकी यह रीति।

स्वारथ लागहिं करहिं सब प्रीति।।

जितनी-जितनी तुम्हारी प्राणशक्ति उस आत्मदेव से संचालित होती है, जितने-जितने तुम प्राणवान हो, तेजवान हो, ओजवान हो उतने-उतने लोग तुम्हारे इर्द-गिर्द मंडराते हैं। बुढ़ापे में प्राणशक्ति क्षीण हो जाती है, ओज-तेज कम हो जाता है तो अपने भी पराये होने लगते हैं। नौकरी में से भी रिटायरमैंण्ट दे दिया जाता है।

जिसके कारण तुम्हारी कीमत है, उस आत्मसत्ता की जानोगे, उसे जितना अधिक अपना मानोगे और उसमें विश्रांति पाओगे उतने ही तुम महानता के शिखरों को छू सकोगे। नहीं तो थोड़ी-बहुत शक्ति लाकर उसे जगत की बाह्य चकाचौंध में ही खर्च कर दिया तो फिर बुढ़ापे में तुम्हारी खैर नहीं, मृत्यु के बाद तुम्हारी खैर नहीं…. न जाने प्रकृति फिर किस शरीर में पटक कर तुम्हें अनाथ कर दे ? इसलिए कृपा करके प्राणबल रहते ही उस सर्व-सौन्दर्य के सर्वसत्ता  के उदगम स्थान को जानकर उसके साथ एक हो जाओ। इसी में तुम्हारा भला है, कुटुम्ब का भला है, देश का भला है।

ʹमेग्नेटʹ से जुड़ी हुई प्लेट से लोहे के कण चिपके रहते हैं, लेकिन ज्यों ही मेग्नेट का आश्रय प्लेट ने छोड़ा तो लोहे के कण भी प्लेट को छोड़ देंगे। ऐसे ही मेग्नेटों का मेग्नेट तुम्हारा आत्मदेव है और यह जड़ शरीर जब तक उस मेगनेट के करीब है तब तक बाहर के व्यक्ति, बाहर की वस्तुएँ, बाहर का वातावरण आपके साथ सहयोग करता है। जैसे जैसे उस मेग्नेट से तुम्हारी प्राणशक्ति दूर होती जाती है वैसे-वैसे बाहर के व्यक्ति वस्तु वातावरणरूपी लोहे के कण भी तुमसे दूर होते जायेंगे।

धिक् बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजो बलं बलम्।

विश्वामित्र को अनुभव हुआ कि क्षात्रबल को धिक्कार है। आत्मबल ही वास्तविक बल है। जवानी में क्षत्रियबल जरा दिखता है किन्तु बुढ़ापा आते ही बूढ़े राजा का राज्य छीन लिया जाता है। बुढ़ापा आते ही नौकर भी मुकरने लगते हैं और पड़ोसी भी आपकी जमीन जागीर पर निगाह डालने लगते हैं, आपके अपने कुटुम्बी भी आपका अधिकार छीनने की ताक में रहते हैं।

……… तो मानना पड़ेगा कि जीवनशक्ति जिस जीवनदाता से आती है उसी जीवनदाता को पाने में लगाना ही बुद्धिमत्ता है, अन्यथा अज्ञानता है।

शारीरिक स्वास्थ्य अर्थात् शारीरिक बल, मानसिक प्रसन्नता अर्थात् मनोबल एवं बौद्धिक योग्यता अर्थात् बौद्धिक बल ये जितने अधिक होंगे, जितनी आपकी प्राणशक्ति सूक्ष्म होगी और उस आत्मा के साथ आपकी तदाकारता होगी, उतने ही आप इस संसार  नंदनवन की नाई देख सकेंगे… आप उसी ब्रह्म परमात्मा के विषय में जानो, उसी का चिंतन करो एवं उसी में विश्रांति पाओ ताकि आपकी मति को ऐसा बल मिले कि आपकी मति ʹमतिʹ न बचे, ऋतंभरा प्रज्ञा हो जाये। ʹऋतʹ अर्थात् ʹसत्यʹ सत्य से पूर्ण आपकी प्रज्ञा हो जाये…

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 1997, पृष्ठ संख्या 11,12 अंक 57

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अनेक में एक – पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू


वेदांत के ज्ञान की महिमा अमाप है। वेदांत का ज्ञान सुनने से जितना पुण्य होता है उतना पुण्य चांद्रायण व्रत रखने से या पैदल यात्रा करके पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से या अश्वमेध यज्ञ करने से भी नहीं होता है।

किसी आश्रम में कोई नया साधक गुरुजी के दर्शन-सत्संग के लिए आ पहुँचा। उस साधक ने अपनी शंका का समाधान पाने के लिए गुरुजी से पूछाः “गुरुजी ! कोई कहता है कि भगवान मंदिर में रहते हैं और कोई कहता है कि भगवान अपने हृदय में रहते हैं तो सचमुच में भगवान कहाँ रहते हैं ?”

गुरुजी ने कहाः “इतनी सी बात है न ! वह तो तू मेरे पुराने शिष्य से ही पूछकर समझ ले।” साधक ने शिष्य के पास जाकर वही  बात दुहराई कि ʹभगवान कहाँ रहते हैं ?ʹ

शिष्य ने उसकी शंका का समाधान करते हुए कहाः “भगवान सर्वत्र हैं, सर्वव्यापक हैं। वे एक-के-एक अनेक रूपों में दिखत हैं। जैसे आकाश एक है फिर भी घट में आया हुआ आकाश घटाकाश, मठ में आया हुआ आकाश मठाकाश, मेघ में आया हुआ आकाश मेघाकाश और खुला आकाश महाकाश कहलाता है, वैसे ही भगवान परमात्मा एक हैं लेकिन जिस रूप में आते हैं वैसे दिखते हैं।

अनेक रूपों में बसे हुए वे एक-के-एक सच्चिदानंद परमात्मा ही मेरा आत्मा है, ऐसा ज्ञान जिसे हो जाता है उसका जीवन सफल हो जाता है।”

शिष्य की बात समझने की कोशिश करता हुआ वह साधक अपनी शंका का कुछ तो समाधान पा रहा था लेकिन उसे पूर्ण संतोष नहीं हुआ था। शिष्य और साधक की बातों को गुरु जी सुन रहे थे। गुरु जी ने उसी बात को और स्पष्ट रूप से समझाते हुए कहाः “बेटा ! सुनो। एक हजार घट लेकर उसमें पानी भरकर चंद्रमा का प्रतिबिम्ब देखो तो साफ (शुद्ध) पानी में प्रतिबिम्ब स्पष्ट दिखेगा और मैले पानी में प्रतिबिंब साफ नहीं दिखाई देगा। वैसे ही परमात्मा का प्रतिबिंबरूप जीवात्मा अनेक अंतःकरणों में अलग-अलग स्वरूप में दिखाई देता है।

जैसे, विद्युत शक्ति तो एक ही होती है लेकिन टयूबलाईट में ज्यादा प्रकाश देती है, बल्ब में उसके रंग के अनुरूप प्रकाश देती है, माईक्रोफोन में आवाज बनाती है, हीटर में से गर्मी देती है, फ्रीज में बर्फ बनाती है, रेकोर्डिंग में उसका उपयोग होता है तो आवाज टेप करती है। एक ही विद्युत शक्ति अनेक रूपों में अलग-अलग कार्य करती दिखाई देती है। स्थूल भौतिक शक्ति भी यदि अनेक रूपों में कार्य करती हुई दिखती है तो वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म चैतन्य परमात्मा अनेक रूपों में एक ही दिखाई दें इसमें क्या आश्चर्य है ?”

मूलतः एक-का-एक परमात्मा कार्य-कारण की भिन्नता से अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है।

अनुभवी महापुरुषों के ग्रंथों के, शास्त्रों के, भगवान श्रीकृष्ण, भगवान श्रीराम, याज्ञवल्क्य, अष्टावक्र, राजा जनक जैसे ब्रह्मवेत्ताओं के वचनों के लिए अलावा ऐसा दिव्य ज्ञान कहीं सुनने को नहीं मिलता है। सब लोग इसे नहीं सुन पाते हैं। कई लोग सुनना भी चाहते हैं तो अभागे अश्रद्धालु लोग उनकी श्रद्धा को डगमगाते हैं, कई तरह के बहाने बताकर उस आध्यात्मिक रास्ते पर चलने से रोक लेते हैं। जो ईश्वर के मार्ग से किसी को दूर करते हैं ऐसे लोग महापाप के भागी बनते हैं।

किसी व्यक्ति ने मुझसे कहाः “बापू ! आपके गुरु लीलाशाहजी महाराज ने तो आत्मसाक्षात्कार किया था न ? वे आये थे हमारे गाँव। उनके दर्शन से मुझे बहुत आनंद आया और श्रद्धा भी हुई लेकिन उनकी बातों पर मुझे विश्वास नहीं हुआ।”

मुझे आश्चर्य हुआ। मैं उसे देखता ही रह गया कि ʹजिसे मेरे गुरुजी की बात पर विश्वास नहीं हुआ, उसे मेरी बात पर विश्वास कैसे आयेगा ?ʹ

मैंने पूछाः “मेरे गुरुजी की कौन सी बात पर विश्वास नहीं आया ?”

उसने कहाः “लीलाशाहजी बापू कहते थे कि अपना आत्मा ही परमात्मा है और वही आत्मा सबमें बस रहा है।”

उसने कहाः “बापू ! अभी कुछ समय पहले मेरी माँ मर गई। सबमें एक ही आत्मा है तो हम सब भी मर जाने चाहिए थे न ?”

मैंने कहाः “ऐसा कोई जरूरी नहीं है।”

उसने पूछाः “यह कैसे हो सकता है ?”

मैंने कहाः “भाई ! दस घड़ों में पानी भरकर रखो, उनमें पूनम की रात को चंद्रमा का प्रतिबिंब देखो तो दस चंद्रमा दिखेंगे कि नहीं ?”

“हाँ।”

“उनमें से एक घड़ा फोड़ डालो तो नौ प्रतिबिंब दिखेंगे कि नहीं ?”

“हाँ, दिखेंगे।”

“बाकी नौ को भी फोड़ डालो तो असली चंद्रमा रहेगा कि नष्ट हो जायेगा ?”

“असली तो रहेगा।”

“जैसे एक घड़ा फूट जाय या उसका पानी ढुल जाये तो उससे दूसरे प्रतिबिंब या असली चंद्रमा को कुछ हानी नहीं होती। वैसे ही यह देहरूपी घड़ा फूट जाये तो उससे शाश्वत आत्मा को कुछ हानि नहीं होती। वह अमर आत्मा ही परमात्मा है। सबके हृदय में वही है।”

उसने फिर से पूछाः “बापू ! सबके हृदय में सुख का अनुभव होता है तब सबको सुख होना चाहिए और मुझे दुःख का अनुभव होता है तब सबको दुःख होना चाहिए। यह नहीं होता है। क्यों ?”

“क्योंकि जैसे दस घड़ों को भट्ठी पर रखेंगे तो उनमें भरा हुआ पानी उबलेगा लेकिन उसमें आया हुआ प्रतिबिंब उबलेगा क्या ? उसे ताप लगेगा क्या ?”

“नहीं।”

जैसे, भट्ठी पर रखने से घड़ा भी तपेगा, घड़े का पानी भी तपेगा, पर उससे चन्द्रमा के प्रतिबिंब पर या चंद्रमा पर कोई असर नहीं होगा। वैसे ही हरेक मनुष्य के अंतःकरण अलग-अलग होते हैं, उनमें सुख-दुःख का अनुभव तो होता है परंतु उन सबसे परे सबका साक्षी, चैतन्य परमात्मा सुख-दुःख से परे होने के बदले अपने में उसका अनुभव करने लगते हैं।

शरीर को ʹमैंʹ मानने के बजाय अपने को आत्मा मान लो और आत्मा-परमात्मा  एक जान लो तो समस्त सुख-दुःख के लिए पार हो जाओगे।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 1997, पृष्ठ संख्या 6,7 अंक 57

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