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Tatva Gyan

युक्ति से मुक्ति


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

अनपेक्षः शुचिर्दक्षः उदासीनो गतव्यथः।

सर्वारम्भपरित्यागी यो मद् भक्तः स मे प्रियः।।

ʹजो आकांक्षाओं से रहित, बाहर भीतर से पवित्र, दक्ष, उदासीन, व्यथा से रहित, सभी नये-नये कर्मों के आरम्भ का सर्वथा त्यागी है वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।ʹ (गीताः 12.16)

ऐसे भक्त के पीछे भगवान फिरते हैं। कबीर जी ने कहा भी है किः

कबीरा मन निर्मल भयो जैसे गंगा नीर।

पीछे-पीछे हरि फिरें कहत कबीर कबीर।।

अपेक्षाएँ, इच्छाएँ, आकांक्षाएँ ही मन को मलिन करती हैं। अपेक्षारहित, वासनारहित जीवन में ही गंगाजल की तरह मन निर्मल होता है। निर्मल मन वाले भक्त को, योगी को, ज्ञानी को, भगवान अति प्रेम करते हैं। अपेक्षारहित अवस्था में वैराग्य पनपता है, योगी का योग फलता है, भक्त की भक्ति फलती है, साधक की साधना फलती है, ज्ञानी का ज्ञान फलता है। अपेक्षाओं का त्याग ही सुन्दर समाज का निर्माण करता है, सुन्दर जीवन का निर्माण होता है, सुन्दर बुद्धि का प्राकट्य होता है, आन्तरिक सुन्दरता प्रकट होती है, चित्त शान्त होता है, आन्तरिक सामर्थ्य प्रकट होता है।

ʹइतना मिलना चाहिए… इतना खाना चाहिए… ऐसा तो रहना ही चाहिए…. ऐसा तो करना ही चाहिए…. इतना तो होना ही चाहिए…ʹ ऐसा विभिन्न प्रकार का आग्रह ही दुःखदायी है। नवग्रहों की अपेक्षा आग्रह ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि अपेक्षाओं के कारण ही मनुष्य नरक में जाता है। सत्पुरुषों से, सद् विचारों से, सत्साहित्य से तथा सत्शास्त्रों से दूर होता जाता है, छोटी-छोटी इच्छाओं व वासनाओं में ही उलझा रहता है। इन इच्छाओं, वासनाओं, अपेक्षाओं व आकांक्षाओं से ऊपर उठने की युक्ति है कि हम शुभ इच्छा यानी भगवत्तत्त्व में स्थित होने की इच्छा को तीव्र करते जायें। खाते-पीते, सोते-जागते, उठते-बैठते, काम करते, आते-जाते, चलते-फिरते भगवन्नाम व अपने नित्य शाश्वत् स्वरूप का चिंतन करें तो इन सभी तुच्छ वासनाओं से मुक्त हो जायेंगे। सहज मुक्ति की दूसरी युक्ति यह है कि जो भी परिस्थिति आपके सामने आ खड़ी होती है, उसे प्रभु की कृपा का प्रसाद समझकर प्रभु को धन्यवाद देते हुए स्वीकार कर लें। भगवदकृपा की प्रतीक्षा मत करो बल्कि जो भी स्थिति बनी है उसकी कृपा की समीक्षा करो। समीक्षा करने की कला सीखो। ʹहे प्रभु ! तू नचाना चाहता है तो मैं नाच लेता हूँ। तू रूलाना चाहता है तो मैं रो लेता  हूँ। तू हँसाना चाहता है तो मैं हँस लेता हूँ। तू खिलाना चाहता है तो खा लेता हूँ। तू अभाव में रखना चाहता है तो मैं अभाव में रह लेता हूँ। हे भगवन् !

तेरे फूलों से भी प्यार तेरे काँटों से भी प्यार।

चाहे सुख दे या दुःख दे हमें दोनों हैं स्वीकार।।

अपेक्षारहित होने की तीसरी युक्ति है अपने दुर्गुणों व गलतियों को याद करके वर्त्तमान का अनादर मत करो। अपने को अच्छा बनाने के लिए हम करते हैं कि हम सदगुणी बनें। ʹयह दुर्गुण मुझमें कैसे आ गया ? यह गलती मुझमें कैसे हो गई ?ʹ इस प्रकार जो दुर्गुण हो गये हैं उनका भी चिन्तन मत करो और जो सदगुण हैं उनका भी चिन्तन मत करो क्योंकि गुण तो माया के हैं चाहे वे दुर्गुण हों या सदगुण हों। हमें तो माया के पार, गुणातीत अवस्था में पहुँचना है, इसलिए किसी भी प्रकार का आग्रह छोड़ दो। जीवन में कोई हठ नहीं, कोई पकड़ नहीं, कोई मान्यताएँ नहीं, कोई आकांक्षा-अपेक्षा नहीं, कोई जिद्द नहीं। जीवन में जो भी परिस्थिति आये, मान आये, सुख आये तो चिन्तन करोः ʹप्रभु मुझे प्रेरणा देने के लिए मान दे रहे हैं, सफलता दे रहे हैं, सुविधा दे रहे हैं। हे प्रभु ! तेरी असीम कृपा को धन्य हो !ʹ

जीवन में जब अपमान आये, दुःख आये, असफलता आये, विरोध आये, विपत्ति आये तब भी चिन्तन करोः ʹहे दयालु प्रभु ! तू मुझे विपरीत परिस्थितियाँ देकर मेरी आसक्ति-ममता छुड़ा रहा है। मेरी परीक्षा लेकर मेरा साहस व सामर्थ्य बढ़ा रहा है। हे प्रभु ! तेरी कृपा की सदा जय हो !ʹ ऐसी समझ यदि हमने विकसित कर ली तो फिर कोई भी परिस्थिति हमें हिला नहीं सकेगी और हम निर्मल मन से आत्मदेव में स्थित होने का सामर्थ्य पाएँगे।

भगवन्नाम के जप-ध्यान से मन पवित्र होता है, बुद्धि पवित्र होती है, विचार पवित्र होते हैं। पवित्र विचारों से पवित्र कर्म होते हैं। पवित्र कर्मों के पवित्र फल होते हैं। पवित्रों में भी पवित्र परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार होता है, मुक्ति की अनुभूति होती है।

मुक्ति की युक्ति यही है कि साधक ध्यान-भजन-कीर्तन तो करे, साथ ही स्वभाव बदलने के लिए भी सतत् जागृत रहे। स्वभाव जिद्दी, मन बुरी आदतों में फँसा है, व्यसन छूटता नहीं है, परिस्थितियों, वस्तुओं व व्यक्तियों से राग-द्वेष छूटता नहीं है, चित्त छोटी-छोटी परिस्थिति से प्रभावित हो जाता है।

जप-ध्यान-भजन में मन लगता नहीं है, स्वभाव में माधुर्य नहीं आया तो मुक्ति से आप दूर होते चले जायेंगे। ध्यान-भजन में बरकत भी नहीं आयेगी, इसलिए स्वभाव बदलने के प्रति सदा जागृत रहें। अपेक्षारहित जिनका जीवन हो जाता है, उनके संकल्प सत्य हो जाते हैं। भगवान को, अवतारों को, संतों को कोई अपेक्षा नहीं होती। श्रीकृष्ण के जीवन में देखोः वे प्रेम भी उतना ही करते हैं और शासन भी उतना ही करते हैं। हमें शंका हो सकती है कि जो प्रेम करेगा वह शासन कैसे करेगा ? जो दयालु होता है वह न्याय नहीं कर सकता। न्यायाधीश है और दयालु है तो वह फाँसी की सजा कैसे देगा ?…. और सजा देगा तो दयालु कैसे ? ईश्वर व ईश्वरत्व को प्राप्त हुए सदगुरु दोनों में विपरीत गुण एक साथ पाये जाते हैं। उनमें प्रेम के साथ न्याय होगा, न्याय के साथ प्रेम होगा। यदि आप ईश्वर व गुरु से इमानदारी से प्यार करते हैं तो उनके लिए आपके हृदय से धन्यवाद के अलावा कुछ नहीं निकलेगा। यदि आपके अंतःकरण से फरियाद निकलती है तो आप समझ लीजिये कि प्यार में कही कोई कमी है। जहाँ सच्चा प्रेम होता है वहाँ दोषदर्शन नहीं होता। हमको सृष्टिकर्त्ता से प्रेम नहीं है, इसलिए हम कहते रहते हैं- ʹभगवान ने ऐसा क्यों किया ? भगवान ने अमुक के साथ बुरा किया… उसका जवान इकलौता बेटा ले लिया…. यह व्यक्ति कितना इमानदार है परन्तु भगवान ने इसे कितनी गरीबी दी है !ʹ यह सब फरियाद प्रभु में पूर्ण समर्पण के अभाव के कारण है। वास्तव में प्रभु जो कुछ करता है वह अच्छा ही करता है क्योंकि वह सबसे अधिक हमारा हितैषी है। उसके अधिक हितैषी हमारा कहीं कभी कोई हो ही नहीं सकता। वह सदा हमारे साथ है, कभी एक क्षण के लिए भी हमसे अलग नहीं हो सकता इसलिए जीवन जितना अपेक्षारहित बनाओगे उतना ही प्रभु को आप अपने निकट अनुभव करोगे।

गुरु, भगवान व शास्त्रों के वचनों को समझने से हमें परम सुख मिलता है। वस्तुओं तथा सुविधाओं की कमी के कारण हम दुःखी नहीं हैं अपितु ज्ञान व समझ की कमी के कारण हम दुःखी हैं। अपेक्षाएँ जितनी बढ़ती जाएँगी, हम उतने ही दुःखी होते जाएँगे। अपेक्षाएँ जितनी कम होती जाएँगी, हम उतने ही सुखी होंगे और अपेक्षाएँ नहीं हैं तो हम परम सुख में स्थित हो जाएँगे। हर इन्सान के पास पूरा का पूरा परम सुख पड़ा है परन्तु हमारे बाह्य वस्तुओं के आकर्षण की नासमझी ने हमको इस परम सुख से दूर कर रखा है। इसलिए अप्राप्त का चिन्तन छोड़ो तो ही प्राप्त का अनुभव होगा। अप्राप्त का चिन्तन छोड़ने का सरल तरीका है जो भी आपके पास नश्वर वस्तुएँ, सेवाएँ उपलब्ध हैं उनक सदुपयोग करो। इस तरह अप्राप्त का चिन्तन छूटते ही व्यक्ति सदा प्राप्त आत्मा में टिक जाता है। आत्मा ही पूर्ण आनन्दस्वरूप है, पूर्ण सुखस्वरूप है और आत्मा के सिवाय जो कुछ मिलेगा वह बिछुड़ेगा ही। जबकि एक बार आत्मा का ज्ञान हो जाये तो वह कभी नहीं जाता। केवल आत्मसुख ही शाश्वत है। अहंकार का सुख, धन का सुख, मान्यताओं का सुख, सुविधाओं का सुख, ये सब नश्वर हैं। ये सब हमारी नासमझी के कारण हमें वासनाओं की ओर ढकेलते हैं और वासनाओं के घटीयंत्र में जीव कई योनियों में जन्म-जन्मांतर तक भटकता रहता है। मनुष्य सुख के लिए जितना-जितना नश्वर पदार्थों का आधार लेता है, उतना ही वह उन वस्तुओं से बँध जाता है। नश्वर से बँधने की आदत हमारी सदियों पुरानी है। उसको मिटाने के लिए जरा मेहनत करनी पड़ेगी। सत्पुरुषों व सत्शास्त्रों का आधार लेना होगा। लाखों जन्मों से हम इन्द्रियों के गुलाम बनते चले आये हैं। जिस तरह लाखों वर्षों का अन्धकार प्रकाश होते ही गायब हो जाता है, उसी तरह लाखों जन्मों के बंधन सदगुरु के सान्निध्य से, उनके द्वारा दिये गये ज्ञान को पचाने से, तत्परता के साथ साधना करने कट सकते हैं। लाखों जन्मों का काम इसी एक जन्म में किया जा सकता है। जीते-जी मुक्ति की अनुभूति की जा सकती है। इसलिए, आपके पास जो समय है, जवानी है, सामर्थ्य है, बुद्धि है, साधन है, वे काफी हैं। वर्त्तमान में उनका सदुपयोग करो तो सहज ही भूत व भविष्य का चिन्तन छूट जायेगा। जितनी तत्परता से इस काम को करोगे उतना ही शीघ्र आत्मसुख की झलकियाँ प्राप्त होने लगेंगी। आपके हृदय में आनन्द का अदभुत खजाना है। जब भी गरदन झुका ली और मुलाकात कर ली। मुलाकात करने की कला सदगुरु के सान्निध्य से, उनके वचनों से, उनकी कृपा से सीख लो। वर्त्तमान की एक-एक क्षण को सदुपयोग में लगा दो तो अन्दर के आनन्द का अनुभव हुए बिना नहीं रह सकता।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 1997, पृष्ठ संख्या27,28,29 अंक 55

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शक्ति का सदुपयोग करो


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

हमारे अंदर तीन शक्तियाँ मौजूद हैं-

करने की शक्ति, मानने की शक्ति और जानने की शक्ति।

बच्चा जब थोड़ा सा समझने लायक होता है तब पूछता हैः “यह क्या है ?… वह क्या है ?….ʹ बच्चा माता-पिता, भाई-बहन सबसे पूछता है क्योंकि जानने की शक्ति उसमें मौजूद है। मनुष्य इस जानने की शक्ति का यदि सदुपयोग करे तो वह अपने-आपको भी जान सकता है र अपने आपको यदि उसने जान लिया तो विश्वनियंता को भी ठीक से जान लेगा। जैसे चावल की देग में से दो दानों को ठीक से जान लिया तो और सब दानों को भी मनुष्य जान लेता है। इसी प्रकार अपने अंतःकरण में स्थित उस सच्चिदानंद को ठीक से जान लिया तो पूरे विश्व को जानना आसान हो जाता है।

मनुष्य में जानने की जिज्ञासा तो छिपी हुई है, जिसकी वजह से बालक ʹयह क्या है…. वह क्या है…ʹ पूछता है किन्तु ʹमैं क्या हूँ ?ʹ यह पूछे उससे पहले ही उसके ऊपर नाम थोप दिया जाता हैः “तेरा नाम मोहन है… तेरा नाम सोहन है….”आदि-आदि। ये ʹमोहन-सोहनʹ आदि जो नाम रखे जाते हैं, वे वास्तव में हमारे नहीं हैं वरन् नाम हैं हाड़-मांस के शरीर के व्यवहार को चलाने के लिए। जन्म के समय शिशु का कोई नाम नहीं होता। जन्म के 6-8 दिन के बाद या 21-40 दिन के बाद नाम रखा गया और मृत्यु के पश्चात भी वह नामवाला शरीर नहीं रहता है। किन्तु शरीर के जन्म के पहले भी तुम थे, शरीर के जन्म के समय भी तुम थे और शरीर के मरने के बाद भी तुम रहोगे क्योंकि तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है आत्मा, वास्तविक स्वरूप है परमात्मा और परमात्मा अबदल है। उसी को जानने के लिए ही यह जानने की शक्ति मिली थी किन्तु जिससे जानने की शक्ति मिली थी उसे नहीं जाना और जिसे न जानने पर भी चल जाता उसी को जानने में अपने पूरे समय-शक्ति का व्यय कर दिया ! ʹयह मारवाड़ी है….यह पंजाबी है… यह सिन्धी है… यह मि. फलाने हैं….ʹ – यह सब तो जाना किन्तु जानने की शक्ति का सदुपयोग नहीं किया इसीलिए बंधन में पड़े।

मानने की शक्ति सब के पास है। मानने की शक्ति की वजह से सब मानते रहते हैं लेकिन अज्ञानियों की बात मान-मानकर, संसार की आसक्तिवालों की बात मान-मानकर हम भी अपने-आपको उसी आसक्ति में धकेलते हैं। मानने की शक्ति का अगर हम सदुपयोग करें तो जहाँ से मानने की शक्ति उत्पन्न होती है उसी सच्चिदानंद कृष्ण तत्त्व को, राम तत्त्व को, शिव तत्त्व को मानकर हम मुक्त भी हो सकते हैं।

इसी प्रकार मानव में करने की शक्ति भी छुपी हुई है लेकिन करने की शक्ति जहाँ से आयी है उस सच्चिदानंद परमात्मा की प्रसन्नता के लिए उसका प्रयोग करें तो हमारा करना, हमारा व्यवहार भी भक्ति बन जायेगा। लंबी-लंबी पूजाएँ करो, लंबी-लंबी नमाजें पढ़ो लेकिन इन्सान-इन्सान में अगर वैर है, दुश्मनी है तो लंबी-लंबी पूजाएँ करना, लंबी-लंबी नमाजें पढ़ना व्यर्थ हैं क्योंकि जिसकी तुम बंदगी करते हो वही ला-इल्लाह-इल्लिलाह, वही रोम-रोम में रमने वाला राम हर इन्सान की गहराई में छुपा हुआ है। शाह हाफिज ने कहा हैः

“अय इन्सान ! तू सौ मन्दिर तोड़ दे, सौ मस्जिद तोड़ दे लेकिन एक जिन्दे दिल को मत सताना क्योंकि उसमें खुदा खुद रहता है।”

मुसलमान अपने ढंग से संतों-फकीरों और शास्त्रों की बात माने, हिन्दू अपने ढंग से माने तो संसार नंदनवन हो जाये। पड़ौसी अपने ढंग से माने और हम अपने ढंग से मानें तो संसार में जो कलह, अशान्ति, स्वार्थ है, एक दूसरे को निचोड़कर सुखी होने की जो बेवकूफी है, वह संसार से विदा हो जाये।

आज मनुष्य खुद तो सुख की नींद लेना चाहता है लेकिन दूसरे का शोषण करके। तलवार, पिस्तौल, बंदूक या बम का सहारा लेकर वह सुखी होना चाहता है लेकिन हिंसा सदैव डरपोक होती है। आपने देखा-सुना होगा कि शेर जब जंगल में चलता है तो बार-बार मुड़कर देखता है कि ʹमुझे कोई खा तो नहीं जायेगा ?ʹ अब, उस कम्बख्त को कौन खा जायेगा ? उसने तो हाथी के सिर का खून पिया है। उसकी हिंसा ही उसे डराती है। ऐसे ही हम स्वार्थमय व्यवहार में लगकर भयभीत हो रहे हैं कि ʹयह तो नहीं हो जायेगा…! वह तो नहीं हो जायेगा…!ʹ

करने की शक्ति का उपयोग जिससे किया जाता है उसके लिये नहीं करते हैं वरन् व्यर्थ की आसक्ति के लिए करते हैं तो करने की शक्ति हमको बाँध देती है। जानने की शक्ति है लेकिन जिससे जानने की शक्ति आती है उसको नहीं जानते हैं तो हम जन्म-मरण के चक्र में फँसते हैं। मानने की शक्ति छुपी है लेकिन जिसको मानना चाहिए उस सत्यस्वरूप अपने आत्मा को नहीं मानते हैं और हाड़ मांस के शरीर को अपना मानते हैं कि ʹमैं फलाना भाई हूँ… मैं सेठ हूँ…. मैं नौकर हूँ…ʹ

यह सारा थोपा हुआ कचरा अपनी खोपड़ी में लेकर घूमते हैं तभी डर लगता है कि ʹनहीं, मेरी इज्जत न चली जाये… कहीं मेरा पद न चला जाये….ʹ

अरे ! तू कितना भी संभाल लेकिन जब शरीर ही नहीं रहेगा तो मिला हुआ पद, मिले हुए मकान, दुकान, पुत्र-परिवार कब तक रहेंगे ? तू तो वहाँ नजर रख जिसको काल भी नहीं छू सकता। उस अकाल-स्वरूप आत्मा का श्रवण कर। उसी का सहारा ले। इससे तेरा तो मंगल हो ही हो जायेगा, साथ-ही-साथ तेरी मीठी निगाहें जहाँ तक पड़ेंगी उन लोगों का हृदय भी पावन होने लगेगा। तू वह चीज है।

मन तू ज्योतिस्वरूप अपना मूल पिछान।

तू ज्योतिस्वरूप है, तू ज्ञानस्वरूप है, तू प्रेमस्वरूप है, तू आनंदस्वरूप है, तू मुक्तिस्वरूप है। उसी को तू जान। आटा-दाल, घी-तेल और मिर्च मसाले में ही सारी जिन्दगी खपाने के लिए तू पैदा नहीं हुआ है। बड़े शर्म की बात है कि मनुष्य जन्म पाकर भी तू दुःखी, चिन्तित और भयभीत रहता है। दुःखी, चिंतित और भयभीत तो वे रहें जिनके माई बाप मर गये हैं, जो निगुरे हैं। तेरे माई-बाप तो तेरा चैतन्य तेरे साथ है…. तेरे पास तो गुरु का ज्ञान है। जो होगा, देखा जायेगा। फिकर फेंक कुएँ में… हरि ૐ… हरि ૐ… हरि ૐ….

तू अपने ज्ञानस्वरूप में, अपने प्रेमस्वरूप में, अपने आनंदस्वरूप में गोता मार। उसको सदा साथ मान। बाहर की ʹतू-तू… मैं-मैंʹ वाहवाही और निंदा यह इन्द्रियों का धोखा है। बाहर का सुख भी धोखा है और बाहर का दुःख भी धोखा है। बाहर का धन भी धोखा है और बाहर की गरीबी भी धोखा है। वास्तव में तू न सुखी है न दुःखी है, न अमीर है न गरीब है, न मोटा है न पतला है, न काला है न गोरा है। काला-गोरा चमड़ा होता है, मोटा-पतला शरीर होता है, सुखी-दुःखी मन होता है किन्तु तू इतना भोला महेश हो जाता है कि चमड़े से मिलकर अपने को काला-गोरा मानने लगता है, मांस से जुड़कर अपने को मोटा-पतला मानने लगता है और मन से जुड़कर अपने को सुखी-दुःखी मानने लगता है, वरना तू तो इन सबको देखने वाला, इनका साक्षी चैतन्य आत्मा है, सुखस्वरूप है, ज्ञानस्वरूप है… बस, तू अपने उसी स्वरूप को जानकर मुक्त हो जा…. दृश्य में मत उलझ वरन् दृष्टा बन जा… अपने आत्मस्वभाव में आ जा।

जब-जब दुःख आये तो समझ लेना कि बेवकूफी का फल है। दुःख, भय, चिंता जब-जब आये, तब-तब पानी के तीन घूँट पीकर पंजों के बल पर थोड़े कूदना और सोचना किः ʹदुःख आया है यह तो मेहमान है और मेहमान घर आये तो कुलीन लोग दरवाजा बंद थोड़े ही करेंगे वरन् उसकी आवभगत करेंगे कि ʹआओ भाई ! आओ।ʹ ऐसे ही तुम दुःख का भी स्वागत करो कि ʹदुःखरूपी अतिथि आये हो तो आओ। कितने दिन रहोगे यह हम भी देखते हैं। आओ, भाई ! आओ। ʹ ऐसा चिंतन करने मात्र से दुःख हँसी में बदल जायेगा यह बिल्कुल पक्की बात है। ऐसे ही सुख आये तो उसको भी कह दो कि, ʹभाई ! तू भी आया है ? जो आता है वह जाता है लेकिन मैं तो ज्यों-का-त्यों रहता हूँ अखण्ड, एकरस, नित्य मुक्त, साक्षी, चैतन्यरूप… तेरे आने-जाने से मैं अपनी महिमा से च्युत क्यों होऊँ ?”

सुख से चिपकना नहीं, दुःख से डरना नहीं।

तेरे साथ सच्चिदानंद स्वयं है यह समझ खोना नहीं।।

हरि ૐ….ૐ….ૐ…..ૐ…हरि ૐ…..ૐ…ૐ… ૐ….

इस प्रकार के विचार बार-बार करो। परमेश्वर के नाम का जप करो। अपने परमेश्वरीय स्वभाव को जगाओ। हिम्मत, सदगुण, सदाचार, सहानुभूतिभरा व्यवहार तुम्हारे सोहं स्वभाव को जगा देगा। तुम्हारी जानने की शक्ति का सदुपयोग सत्य-स्वरूप परमात्मा को जानने में करो। सत्य का साक्षात्कार करो।

हे साधक ! हम तुम्हारा स्वर्णमय सूर्योदय देखना चाहते हैं।  वाह… वाह… वाह… ૐ….ૐ….ૐ… शांति…. शांति…. शांति…

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 1997, पृष्ठ संख्या 24,25,26 अंक 55

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सत्संग से जागे विवेक


पूज्यपाद संत श्री आशाराम जी बापू

सत्संग से वंचित होना महान पापों का फल है। किसी भी कीमत पर सत्संग का त्याग नहीं करना चाहिए। वशिष्ठजी कहते हैं कि चांडाल के घर की भिक्षा एक ही बार मिले, वह भी ठीकरे में लेकर खाना पड़े पर जहाँ ज्ञान का सत्संग मिलता हो वहीं पड़े रहना चाहिए।

कोई बड़ा धनवान हो चाहे बड़ा सम्राट हो, अंत में तो वह धन को, साम्राज्य को यहीं छोड़कर चला जायेगा और ब्रह्मविद्या नहीं होगी तो किसी न किसी माँ के गर्भ में जाकर लटकने का, फिर जन्म लेने का और मरने का दुर्भाग्य चालू रहेगा। जिसको सत्संग में रूचि है, प्रीति है, श्रद्धा है, वह देर सबेर ज्ञान पाकर मुक्त हो जायेगा।

जैसे आपको कोई चीज अच्छी लगती है तो आप उसका त्याग नहीं करते हैं, फेंक नहीं देते हैं, संभालकर घर में रख लेते हैं। चाहे घर छोटा भी हो, कमरे में जगह नहीं हो तो छत पर भी रख देते हो। ऐसे ही जो लोग सत्संग में जाते हैं, उन्हें सत्संग की कोई न कोई बात तो अच्छी लगती ही है। जो बात अच्छी लगे उसे अगर दिलरूपी घर में जगह नहीं है तो दिमाग रूपी छत में भी रख लेंगे तो कभी-न-कभी काम आएगी।

सत्संग की आधी घड़ी, सुमिरन बरस पचास।

बरखा बरसे एक घड़ी अरहट फिरे बारह मास।।

जैसे अरहट बारहों मास फिरता रहे फिर भी उतना पानी नहीं दे पाता लेकिन एक घड़ी की वर्षा बहुत सारा पानी बरसा देती है। ऐसे ही सत्संग से भी अमाप लाभ मिलता है।

सत्संग ही साधना को पुष्ट करता है। साधक ऐसे ही जप करता रहेगा तो कभी भी ऊब जायेगा पर सत्संग सुनता रहेगा तो कभी जप की महिमा सुनेगा, कभी ध्यान की महिमा सुनेगा, कभी ज्ञान की बातें सुनेगा तो जप में, ध्यान में, ज्ञान में रूचि होगी। काम करते-करते सत्संग में सुनी हुई बातों को याद रखेगा तो भी बहुत लाभ होगा।

सत्संग ऐसी बढ़िया चीज है कि सत्संग सुनते रहने से आदमी के चित्त में विवेक जगता है। एक होता है सामान्य विवेक, दूसरा होता है मुख्य विवेक। सामान्य  विवेक याने शिष्टाचार। कैसे उठना, कैसे बैठना, कैसे बोलना, बड़ों के साथ कैसा व्यवहार करना, महापुरुष है तो उनसे दो कदम पीछे चलना, कुछ पूछे तो विनम्रता से उत्तर देना, उनके सामने अपने चित्त की दशा का वर्णन करना, यह सामान्य विवेक सत्संग में मिलता है। सत्संग सुनते-सुनते जब आदमी के चित्त की पहली भूमिका बन जाती है तो सामान्य विवेक या शिष्टाचार अपने-आप में पैदा होने लगता है।

दूसरा विवेक है मुख्य विवेक। वह है आत्मा-अनात्मा का विवेक। सत्संग में सुनी हुई बातें याद रखकर उसका मनन करने से मुख्य विवेक जगता है। एक होती ही है रहने वाली चीज, वह है आत्मा। दूसरी होती है छूटने वाली, नष्ट होने वाली चीज, वह है अनात्मा, मायारूपी जगत के पदार्थ। जो अनात्म पदार्थ हैं वे चाहे कितने भी कीमती हों, कितने भी सुंदर हों, कितने भी सुखद लगें किन्तु कभी तो उनका वियोग होगा ही। या तो वह चीज नहीं रहेगी या तो उसे ʹमेरीʹ कहने वाला  शरीर नहीं रहेगा। संसार की कोई भी चीज हो वह केवल देखऩे भर को है, कहने भर को हमारी है। आखिर तो छूटेगी ही। जब चीज छूट जाये तब रोना पड़े, उसके वियोग का दुःख सहना पड़े उसके पहले समझकर उसमें से ममता छोड़ दें। जो छूटने  वाली चीज है उसे छूटने वाली समझ लें और जो नहीं छूटने वाला है, सदा साथ देने वाला है उस आत्मा में प्रीति कर लें तो काम बन जायेगा।

हम लोग क्या करते हैं कि जो छूटने वाली चीजें हैं उनसे प्रीति करते हैं और जो सदा साथ रहने वाला है उनकी ओर ध्यान नहीं देते हैं। जो प्रीति अपने आत्मा में करता है और छूटने वाली चीजों का उपयोग करता है उसका जीवन सुखमय हो जाता है।

किसी रास्ते से गुजर कर आप कहीं जाना चाहते हो तो सड़क बढ़िया हो चाहे घटिया हो, चाहे चढ़ाव आये चाहे उतार आये, आप वहाँ से गुजर कर अपने गन्तव्य स्थान को पहुँच ही जाओगे। चढ़ाव देखकर आप रुक नहीं जाओगे और उतार देखकर बैठ नहीं जाओगे । ऐसे ही जीवन के चाहे किसी भी क्षेत्र में जाओ, चढ़ाव उतार आयेंगी ही, अनुकूलता-प्रतिकूलता आयेगी ही। संयोग-वियोग भी होता रहेगा। इन सबको गुजरने दो और अपने लक्ष्य की स्मृति बनाये रखो। जिस पत्नी का संयोग हुआ है एक दिन उसका वियोग भी होगा, पुत्र परिवार का भी वियोग होगा। धन-पद-प्रतिष्ठा, दुःख-सुख सब संयोगजन्य हैं। उनका वियोग अवश्य होगा। इसमें कोई सन्देह नहीं है क्योंकि ये सब नश्वर हैं। फिर भी उनके लिए आदमी तड़पता रहता है तो मनुष्य जन्म में जो आत्मज्ञान का अधिकार है वह गँवा देता है।

व्यवहार में आप कुशल रहो। व्यवहार चलाने के लिए रूपये पैसे की जरूरत पड़ती है। ठीक है, किन्तु अंदर समझ बनाये रखो कि इसमें कोई सार नहीं है। बहुत धन मिल गया तो भी क्या ? पद-प्रतिष्ठा मिल गई फिर क्या ? ये सब अनात्म पदार्थ हैं, उनका संयोग हुआ है तो वियोग भी होगा। इन छूटने वाले पदार्थों का साथ कब तक टिकेगा ?

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।

असत् कभी टिकता नहीं है और सत् का कभी नाश नहीं होता है। उस सत् के साथ मन से भी संबंध बनाये रखना है।

रेलवे में मुसाफिरी करते वक्त हमने देखा है कि यात्री जब मिलते हैं तो आपस में बातचीत करते हैं- ʹआप कहाँ से आये हो ? कहाँ जाना है ?ʹ फिर एक दूसरे का स्वभाव मेल खाता है तो दोस्ती जम जाती है। वे साथ में खाते हैं, कुछ खरीदते हैं तो एक एक दूसरे को देते हैं। एक-दूसरे का एड्रेस भी लेते हैं और उतरते समय तो बहुत लम्बी-चौड़ी बातचीत करते हैं- ʹअच्छा फिर मिलेंगे, खत लिखेंगे… आयेंगे… जायेंगे…ʹ वह सब स्टेशन से बाहर निकलकर घर पहुँचते ही हवा हो जाता है। रेलवे की दोस्ती वहीं तक सीमित रह जाती है।

तुम्हारे ये जो श्वासोच्छ्वास चल रहे हैं तो समझो यह आयुष्यरूपी गाड़ी चल रही है। रेलगाड़ी तो कहीं दो मिनट, कहीं पाँच मिनट, कहीं आधा घंटा भी रूकती है पर यह गाड़ी तो चौबीस घंटों चलती ही रहती है। रेलगाड़ी छुक-छुक करती चलती है, यह गाड़ी ʹसोઽहं सोઽहंʹ करती है। रेलगाड़ी में तो आप चाहो तो बीच के स्टेशन में उतरो चाहे अंतिम स्टेशन पर उतरो मरजी आपकी। इस गाड़ी को तो जहाँ रूके, छोड़ना ही पड़ेगा। ऐसी गाड़ी में साथ में जो स्नेही, सगे-संबंधीरूपी पैसेंजर मिल गये उनके साथ ठीक से संबंध निभा लो लेकिन अंदर से समझ लो कि गाड़ी छूटने तक का खेल है, चाहे उनकी गाड़ी पहले छूटे, चाहे अपनी गाड़ी पहले छूटे। गाड़ी से उतरे कि सब भूल जाना है। केवल अपने घर को याद रखना है।

आप बस में बैठकर कहीं जा रहे हो। रास्ते में बहुत बढ़िया बंगला दिखे, वह चाहे कितना भी सुंदर हो पर बस में से उतरकर उसमें रहने चले जाते हो क्या ? नहीं। अपना मकान भले किराये का हो, पुराना हो पर उसमें ही जाकर रहोगे क्योंकि वह अपना है जबकि सुंदर दिखऩे वाला वह बंगला तो पराया है, देखने भर को है। उसमें निवास नहीं हो सकता। ठीक ऐसे ही शरीररूपी घर कितना भी सुंदर लगे, सुखदायी लगे पर यह देखने भर को है, पराया है। इसमें सदा निवास नहीं हो सकता। अपना आत्मारूपी घर ही अपना है, शाश्वत है।

शरीर सदा टिकता नहीं है और आत्मा कभी मरता नहीं है। यह है मुख्य विवेक। ऐसा विवेक जिसका जागृत हो गया वह देर सवेर अमर आत्मा का ज्ञान पा लेगा।

अविनाशी आतम अमर जग ताते प्रतिकूल।

ऐसा ज्ञान  विवेक है, सब साधन का मूल।।

आत्मा अविनाशी है, शरीन नाशवान है। आत्मा सत्-चित्-आनंदस्वरूप है, शरीर असत्, जड़ और दुःखरूप है। आत्मा अजर-अमर है, शरीर परिवर्तनशील और मरणधर्मा है। ऐसा विवेक जिसका  पक्का हो गया उसने दुनिया में बहुत कुछ जान लिया। उसने बहुत पढ़ाई कर ली, उसने बहुत  परीक्षाएँ पास कर लीं। चाहे वह अनपढ़ हो, अंगूठाछाप हो पर सत्संग सुनते सुनते उसका विवेक जग जाता है। सुख-दुःख में वह इतना हिलता नहीं है। पढ़े हुए जिंदगी में जितने सुख-दुख के झोंके खाते हैं उतने झोंके खाने का दुर्भाग्य उसका नहीं होता है। संसार बमें ही रचा-पचा रहने वाला आदमी चाहे कितना भी पढ़ा लिखा हो  किन्तु उसके जीवन में सत्संग नहीं है विवेक नहीं है। आदमी को थोड़ा सा भी सुख मिलता है तो अभिमान आ जाता है और थोड़ा सा दुःख आता है तो परेशान हो जाता है। तो किसकी पढ़ाई सच्ची ? सत्संग में आदमी बिना परिश्रम के ऐसी पढ़ाई पढ़ लेता है कि अनपढ़ होते हुए भी वह पढ़े-लिखे को पढ़ा सकता है। तुलसीदास जी ने कहा हैः

बिनु सत्संग विवेक न होई।

राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।

भगवान की कृपा के बिना सत्संग सुलभ नहीं है। माया की कृपा हो तो आदमी को धन-धान्य मिलता है, प्रजापति की कृपा हो तो पुत्र परिवार मिलता है। जब प्रभु की कृपा होती है तब सत्संग मिलता है।

सत्संग में प्रीति होना बड़े भाग्य की बात है और सत्संग से वंचित होना, सत्संग का त्याग करना महान पापों का फल है। किसी आदमी में सामान्य विवेक भी नहीं है, वह यदि सत्संग सुनता रहेगा तो उसका सामान्य विवेक जगेगा और प्रीतिपूर्वक, आदरपूर्वक, श्रद्धा से सत्संग का मनन करेगा तो मुख्य विवेक में उसकी गति हो जायेगी। सामान्य विवेक जगने से आदमी के चित्त में धर्म की उत्पत्ति होती है। वह धर्मात्मा बन जाता है। मुख्य विवेक जगता है और वह दृढ़ हो जाता है तो आदमी महात्मा बन जाता है। महात्मा वह है जो अपने शरीर सहित संपूर्ण जगत के पदार्थों को नाशवान समझकर, अविनाशी आत्मा में प्रीतिपूर्वक स्थित हो जाता है। जो अपने-आपको जान लेता है, वही परम विवेकी है। उसने ही जगत में बड़ा काम कर लिया जिसने अपने-आपको जान लिया।

जहाँ में उसने बड़ी बात कर ली।

जिसने अपने आपसे मुलाकात कर ली।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 1997, पृष्ठ संख्या 5,6,7 अंक 53

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