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Anmol Yuktiyan

इससे व्यक्ति त्रिलोचन बन जाता है-पूज्य बापू जी


भगवन्नाम – जो गुरुमंत्र मिला है उसको जितना दृढ़ता से जपता है उतना ही उस मंत्र की अंतःकरण में छाया बनती है, अंतःकरण में आकृति बनती है, अपने चित्त के आगे आकृति बनती है । कभी-कभी भ्रूमध्य में (दोनों भौहों के बीच) मंत्र जपते-जपते ध्यान करना चाहिए । मानो ‘राम’ मंत्र है तो ‘श्रीराम’ शब्द, ‘हरिॐ’ मंत्र है तो ‘हरिॐ’ शब्द भ्रूमध्य में दिखता जाय अथवा और कोई मंत्र है तो उसके अक्षरों को देखते-देखते भ्रूमध्य में जप करें तो तीसरा नेत्र खोलने में बड़ी मदद मिलती है । उसको बोलते हैं ज्ञान-नेत्र, शिवनेत्र । उससे व्यक्ति त्रिलोचन बन जाता है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2020, पृष्ठ संख्या 19 अंक 332

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क्षमा माँगने का सही ढंग – पूज्य बापू जी


लोग बोलते हैं- ‘जाने-अनजाने में मुझसे कुछ गलती या भूलचूक हो गयी हो तो माफ कर देना ! ‘

यह माफी लेने की सच्चाई नहीं है, बेईमान है । यह माफी माँगता है कि मजाक उड़ाता है ? ‘भूलचूक हो गयी हो तो….’ नहीं कहना चाहिएः ‘भूल हो गयी है, क्षमा माँगने योग्य नहीं हूँ लेकिन आपकी उदारता पर भरोसा है, आप मुझे क्षमा कर दीजिये ! यह सज्जनता है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2020, पृष्ठ संख्या 25 अंक 331

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बहुत सरल है ह्रास को रोक के विकास करना ! – पूज्य बापू जी


1. व्यर्थ का चिंतनः व्यर्थ का चिंतन त्याग दें । व्यर्थ चिंतन हटाने के लिए बीच-बीच में ॐकार का उच्चारण, सुमिरन करें । व्यर्थ के चिंतन में शक्ति का ह्रास होता है । व्यर्थ की उधेड़बुन होती रहती है, उसमें बहुत सारी शक्ति खत्म होती है । भगवद्-उच्चारण, भगवत्सुमिरन से व्यर्थ के चिंतन का अंत हो जाता है ।

2. व्यर्थ बोलनाः व्यर्थ का भाषण, व्यर्थ की बात… 10 शब्द बोलने हों तो 6 में निपटाओ तो आपका बोलना प्रभावशाली रहेगा । जो 10 की जगह पर 50 शब्द बोलते हैं उनकी कोई सुनता भी नहीं । 10 की जगह पर 10-12 तो चल जाय, 20 बोलेगा तो भी लोग ऊबेंगे । कट-टू-कट बोलना चाहिए । फोन पर भी कट-टू-कट बात करनी चाहिए । व्यर्थ के भाषण से बचना हो तो भगवत्सुमिरन, भगवत्शांति में गोता खाते रहो, व्यर्थ की बड़बड़ाहट से बच जाओगे ।

3. व्यर्थ का दर्शनः यह देखो, वह देखो… इससे तो भगवान को और सद्गुरु को ही देखने की आदत डाल दो । व्यर्थ का देखना बंद हो जायेगा, कम हो जायेगा ।

4. व्यर्थ का सुननाः व्यर्थ का सुनने की आदत होती है । टी.वी. में व्यर्थ का देखते हैं, व्यर्थ का सुनते हैं, जिससे गड़बड़ संस्कार पड़ जाते हैं । इसकी अपेक्षा भगवान को देखो और भगवत्कथा-सत्संग सुनो ।

5. व्यर्थ का घूमनाः इधर गये, उधर गये…. इससे तो फिर सत्संग में जाओ और सेवा के लिए घूमो तो व्यर्थ का घूमना बंद हो जायेगा ।

तो व्यर्थ का सोचना, बोलना, देखना, सुनना और घूमना – इनमें शक्ति का ह्रास होता है इसलिए उन्हें सार्थक में ले आओ ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2020, पृष्ठ संख्या 19 अंक 331

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