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Anmol Yuktiyan

क्यों होती हैं महामारियाँ ?


आयुर्वेद के ग्रंथ चरक संहिता (विमान स्थानः 3.6) के अनुसार एक ही समय में, एक ही समान लक्षणों वाले तथा अनेक लोगों का विनाश करने वाले रोगों का उदय वायु, जल, देश (स्थान) और काल के विकृत करने से होता है ।

1. विकृत वायुः ऋतु-विपरीत बहने वाली अति निश्चल या वेगवाली, अति शीत या उष्ण, अत्यंत रूक्ष तथा मलिन गंध, वाष्प, बालू, धूलि और धूएँ से दूषित हुई वायु को रोगकारी मानें ।

वर्तमान में बढ़ती वायु-विकृति अनेक प्रकार की बीमारियों को जन्म दे रही है । मार्च 2020 में अंतर्राष्ट्रीय जर्नल ‘कार्डियोवैस्क्युलर रिसर्च’ में प्रकाशित हुए शोध के अनुसार प्रतिवर्ष 88 लाख लोग वायु-प्रदूषण से मर रहे हैं । ‘डॉक्टर्स फॉर क्लीन एयर’ समूह ने कहा है कि लम्बे समय से प्रदूषित वातावरण में रहने से अंगों की पूर्णरूप से कार्य करने की क्षमता घटती है एवं संक्रमित होने व रोगों की चपेट में आने की सम्भावना बढ़ती है । महामारी के परिप्रेक्ष्य में ऐसे लोगों को गम्भीर जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है ।’

2. विकृत जलः जो अत्यंत विकृत गंध व विकृत वर्ण वाला हो, पीने  स्वादयुक्त न हो – अप्रिय हो, उसे दूषित जल समझें ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दूषित पानी से अतिसार, हैजा, पेचिश, टाइफाइड और पोलियो जैसी बीमारीयाँ फैल सकती हैं ।

3. विकृत देशः जिस देश (स्थान, क्षेत्र या राष्ट्र) के स्वाभाविक वर्ण, गंध, रस, स्पर्श विकृत हो गये हों, जहाँ धर्म, सत्य, लज्जा, सदाचार, सुस्वभाव और सदगुण छोड़ दिये गये हों और नष्ट हो गये हों वे दूषित है ऐसा समझें ।

भारत देश जहाँ कृषि-देश है वही ऋषि देश भी है । ‘भा….रत’ अर्थात् वह देश जिसके वासियों का मूल स्वभाव है – ‘भा’ यानी ‘ज्ञान’ में ‘रत’ रहना । ब्रह्मतत्त्व के अनुभवी संतों-महापुरुषों का आदर-सम्मान करके उनसे ब्रह्मविद्या प्राप्त कर, आचार-विचार की सही पद्धति जान के तदनुसार जीवनयापन करते हुए जीवन को दिव्य बनाना यहाँ के लोगों का स्वाभाविक धर्म है, सदगुण है, यहाँ की संस्कृति है लेकिन ये पुण्यात्मा अपने इस महान स्वभाव को भूलते जा रहे थे, जिससे अपनी संस्कृति से विमुख होकर विदेशी कल्चर का अनुसरण करते हुए विकृतियों का शिकार होने लगे थे । उनकी किस प्रकार जागृति हो रही थी यह बताते हुए पूर्व प्रधानमंत्री भारतरत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने कहा थाः “पूज्य बापू जी सारे देश में भ्रमण करके जागरण का शंखनाद कर रहे हैं, संस्कार दे रहे हैं । हमारी जो प्राचीन धरोहर थी और जिसे हम लगभग भूलने का पाप कर बैठे थे, बापू जी हमारी आँखों में ज्ञान का अंजन लगाकर उसको फिर से हमारे सामने रख रहे हैं । बापू जी का प्रवचन सुनकर बड़ा बल मिला है ।”

भारतरत्न अटलजी हमें अपनी प्राचीन धरोहर को पुनः प्राप्त करने के लिए पूज्य बापू जी के सत्संग-सान्निध्य एवं दिव्य ज्ञान के संस्कारों की आवश्यकता बता रहे हैं ।

4. विकृत कालः ऋतु के स्वाभाविक लक्षणों से विपरीत या कम-अधिक लक्षणों वाला काल अस्वास्थ्यकर (अहितकर) जानें ।

ऋतु विपरीत बारिश, गर्मी, सर्दी के कारण बीमारियाँ विशेष होती हैं । ऋतुओं के कालखंड अपने सामान्य समय से कम-अधिक होने से भी रोग व्यापक हो जाते हैं । वृक्षों की अत्यधिक कटाई के कारण बारिश का घटना या बिना ऋतु के होना, कुछ देशों द्वारा केमिकलों के सहारे वर्षा करायी जाना आदि से प्राकृतिक असंतुलन हो गया है ।

महामारी के विकट काल में जब विभिन्न चिकित्सा-पद्धतियाँ भी स्थिति को नियंत्रित करने में अक्षमता अनुभव करने लगती हैं तब बड़े-बड़े शक्तिशाली राष्ट्र भी दिशाहीन अवस्था में आ जाते हैं और अपने देशवासियों को पीड़ा से बचाने में स्वयं को असमर्थ एवं विवश अनुभव करने लगते हैं । ऐसी स्थिति में जब वर्तमान स्थूल, भौतिक औषधियाँ भी विशेष कोई राहत नहीं दे पातीं तब उन सभी राष्ट्रों के कल्याण की भावना से भरकर आयुर्वेद के विश्वहितैषी महर्षि चरक ऐसा उपाय बताते हैं जो भारत के एस समाधिनिष्ठ महर्षि ही बता सकते हैं । उन्होंने चरक संहिता (विमान स्थानः 3.15-18) में महामारी की सर्वसुलभ एवं प्राणरक्षक औषधि बतायी हैः

‘सत्य बोलना, जीवमात्र पर दया, दान, सद्वृत्त (शास्त्रोक्त एवं शास्त्रों के रहस्य के अनुभवी संतों के मार्गदर्शन अनुरूप सदाचार) का पालन, शांति रखना और अपने शरीर की रक्षा, कल्याणकारी गाँवों और नगरों का सेवन, ब्रह्मचर्य का पालन, ब्रह्मचारियों तथा जितात्मा महर्षियों (आत्मवेत्ता महापुरुषों) की सेवा करना, धर्मशास्त्र की सत्कथा-सत्संग सुनना, सात्त्विक, धार्मिक और ज्ञानवृद्धों द्वारा प्रशंसित महापुरुषों का सदा सान्निध्य-लाभ लेना – इस प्रकार ये सब महामारी के भयंकर काल में, जिन मनुष्यों का मृत्युकाल अनिश्चित है उनकी आयु की रक्षा करने वाली औषधियाँ कही गयी हैं ।’

मरते हुओं को मृत्यु के मुख से बचाकर आयु प्रदान करने वाला वेद है ‘आयुर्वेद’ ! यह वेद हमें मार्गदर्शन दे रहा है कि ब्रह्मनिष्ठ महापुरुषों का सत्संग-सान्निध्य लाभ एवं उनकी सेवा ही परम हितकारी उपाय है, जिससे सत्य, जीवदया, परोपकार, सदाचार, भीतरी शांति, शरीर-रक्षा की कला, कल्याणकारी स्थल-सेवन, ब्रह्मचर्य – इन सब सदगुणों की प्राप्ति सहज में ही हो जाती है जो कि महामारी के भयंकर काल में आयु-रक्षा करने वाली औषधियाँ कहे गये हैं ।

और ऐसे महापुरुष हमसे सेवा के रूप  अपेक्षा ही क्या करते हैं ? वे यही चाहते हैं कि जो दिव्य आत्मसुख, आत्मशांति, अमिट एवं अखूट आत्मानंद का लाभ उन्हें हुआ है, उसे हम स्वयं भी पायें और दूसरों तक पहुँचायें । ऐसी सत्प्रवृत्तियों का लाभ हम स्वयं लें और दूसरों को भी दिलायें ।

महामुनि वसिष्ठ जी योगवासिष्ठ महारामायण (निर्वाण प्रकरण उत्तरार्धः 18.9,14) में तत्त्वज्ञानी पुरुषों का आश्रय लेने का उपदेश देते हुए भगवान श्रीरामचन्द्र जी को कहते हैं- “भद्र ! राजों के नाशक, देश को छिन्न-भिन्न करने वाले तथा दुर्भिक्ष (अकाल) आदि से उत्पन्न हुए जनता के क्षोभ की तत्त्वज्ञानी पुरुष तपस्या के प्रताप, सत्कर्मों के अऩुष्ठान, साम (मैत्रीभाव की नीति) आदि उपायों से ऐसे पकड़कर रोक लेते हैं जैसे भूकम्प को पर्वत ।  आपदाओं में, बुद्धिनाश में, भूख-प्यास, शोक-मोह, जरा-मरण आदि क्लेशों में, व्याकुल देशों में तथा बहुत बड़े संकटों में सज्जनों की गति संत ही हैं ।”

सृष्टि का संचालन करने वाली तथा सुसंतुलन करने वाली जो सर्वोच्च सत्ता है, उसके नियम कानून को भगवान का मंगलमय विधान कहा जाता है और उसका सूक्ष्म रहस्य ब्रह्मवेत्ता महापुरुष ही जानते हैं । इससे ऐसे महापुरुषों के सत्संग-सान्निध्य से वंचित समाज में संयम-सदाचार का ह्रास होकर अधर्म बढ़ता है । जैसे – मांसाहार व विकृत खान-पान, भोग विलास की प्रवृत्ति, प्राकृतिक नियमों की अवहेलना, मिलावट, यांत्रिक कत्लखानों द्वारा बहुत बड़ी संख्या में गाय व अन्य पशुओं की हत्या आदि आदि । इससे फिर अनेक प्रकार के दोष एवं रोग उत्पन्न होते हैं ।

पूज्य बापू जी इस घोर कलिकाल में भी सत्ययुग जैसे वातावरण का सर्जन कर रहे थे । कलह, क्लेश, अशांति का वातावरण मिटाकर सर्वत्र ईश्वरीय प्रेम, सामंजस्य व सुसंवादिता का सर्जन कर रहे थे । बापू जी ने ‘भजन करो, भोजन करो, दक्षिणा पाओ योजना’ आदि के द्वारा जप, भजन, कीर्तन, सत्संग आदि के यज्ञ स्थान-स्थान में शुरु करवाये । सत्संगों के द्वारा संयम-सदाचार का प्रचार किया और जगह-जगह आश्रम, समितियाँ, बाल-संस्कार केन्द्र, महिला उत्थान मंडल, युवा सेवा संघ, गुरुकुल – इनके द्वारा संयम सदाचार, परोपकार आदि के सुसंस्कार देने वाले केन्द्र स्थापित किये । पूज्य बापू जी जहाँ भी जाते वहाँ विलायती बबूल, नीलगिरि आदि वायु व पर्यावरण को विकृत करने वाले वृक्षों के निर्मूलन एवं तुलसी, पीपल, नीम व आँवला जैसे वायुशुद्धिकारक वृक्षों के रोपण व गोबर के कंडों पर गूगल आदि के हव द्वरा वायुमंडल के शुद्धिकरण पर जोर देते थे । जल को शुद्ध, दोषनाशक एवं शरीर-पोषक बनाने की कला सिखाते थे । पूज्य श्री ने समाज को पुण्यदायी तिथियों व योगों का खूब लाभ दिलाया । अन्य अनेकानेक लोकहितकारी सेवा-प्रवृत्तियाँ चलायीं ।

ऐसे अनेक उपायों से उपरोक्त चारों प्रकार की विकृतियाँ पूज्य श्री दूर कर रहे थे । लेकिन पिछले करीब पौने सात वर्षों से पूज्य बापू जी को कारागृह में भेजा गया है इस पर प्रसिद्ध न्यायविद् व राज्यसभा सांसद श्री सुब्रमण्यम स्वामी जी ने हाल ही में कहा है कि “आशाराम जी बापू को फँसाया गया है यह सच है । यदि सजायाफ्ता कैदियों को सरकार द्वारा छोड़ा जा रहा है तो गलत तरीके से दोषी पाये गये और शारीरिक रूप से अस्वस्थ 83 वर्षीय संत आशाराम बापू को पहले रिहा करना चाहिए ।”

शास्त्र घोषणा कर रहे हैं-

अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूजनीयो न पूज्यते ।

त्रीणि तत्र भविष्यन्ति दुर्भिक्षो मरणं भयम् ।।

(स्कंद पुराण, मा. के. 3.48.49)

….त्रीणि तत्र भविष्यन्ति दारिद्रयं मरणं भयम् ।।

(शिव पुराण, रूद्र संहिता, सती खंडः 35.9)

जहाँ पूजनीय महात्मा का सम्मान नहीं होता और अपूज्य-असम्माननीय व्यक्तियों का सम्मान होता है, वहाँ भय, मृत्यु, अकाल, दरिद्रता – ये संकट तांडव करते हैं ।

देश के वासी एवं वरिष्ठजन सूझबूझसम्पन्न पवित्रात्मा हैं । वे सर्वहितार्थ इस शास्त्रवचन पर अवश्य ही विचार करेंगे ।

(संकलकः प्रीतेश पाटिल एवं रवीश राय)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल-मई 2020, पृष्ठ संख्या 5-8 अंक 3328-329

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एकादशी को चावल खाना वर्जित क्यों ?


पूज्य बापू जी एकादशी के बारे में एक वैज्ञानिक रहस्य बताते हुए कहते हैं- “संत डोंगरेजी महाराज बोलते थे कि एकादशी के दिन चावल नहीं खाने चाहिए । जो खाता है समझो वह एक-एक चावल का दाना खाते समय एक-एक कीड़ा खाने का पाप करता है । संत की वाणी में हमारी मति-गति नहीं हो तब भी कुछ सच्चाई तो होगी । मेरे मन मे हुआ कि ‘इस प्रकार कैसे हानि होती होगी ? क्या होता होगा ?’

तो शास्त्रों से इस संशय का समाधान मेरे को मिला कि प्रतिपदा से लेकर अष्टमी तक वातावरण में से, हमारे शरीर में से जलीय अंश का शोषण होता है, भूख ज्यादा लगती है और अष्टमी से लेकर पूनम या अमावस्या तक जलीय अंश शरीर में बढ़ता है, भूख कम होने लगती है । चावल पैदा होने और चावल बनाने में खूब पानी लगता है । चावल खाने के बाद भी जलीय अंश उपयोग में आता है । जल से बने रक्त व प्राण की गति पर चन्द्रमा की गति का प्रभाव बहुत अधिक पड़ता है क्योंकि सभी जल तथा जलीय पदार्थों पर चन्द्रमा का अधिक प्रभाव पड़ता है । अतः यदि एकादशी को जलीय अंश की अधिकतावाले पदार्थ जैसे चावल आदि खायेंगे तो चन्द्रमा के कुप्रभाव से हमारे स्वास्थ्य और सुव्यवस्था पर कुप्रभाव पड़ता है । जैसे कीड़े मरे या अशुद्ध खाया तो मन विक्षिप्त होता है, ऐसे ही चावल खाने से भी मन का विक्षेप बढ़ता है । तो अब वह वैज्ञानिक समाधान मिला कि अष्टमी के बाद जलीय अंश आंदोलित होता है और इतना आंदोलित होता है कि आप समुद्र के नजदीक डेढ़-दौ सौ किलोमीटर तक के क्षेत्र के पेड़-पौधों को अगर उन दिनों में काटते हो तो उनको रोग लग जाता है ।

अभी विज्ञानी बोलते हैं कि मनुष्य को हफ्ते में एक बार लंघन करना (उपवास रखना) चाहिए लेकिन भारतीय संस्कृति कहती हैः लाचारी का नाम लंघन नहीं… भगवान की  प्रीति हो और उपवास भी हो । ‘उप’ माने समीप और ‘वास’ माने रहना-भगवद्-भक्ति, भगवद्-ध्यान, भगवद्-ज्ञान, भगवद्-स्मृति के नजदीक आने का भारतीय संस्कृति ने अवसर बना लिया ।

उपवास कैसे खोलें ?

आप जब एकादशी का व्रत खोलें तो हलका फुलका नाश्ता या हलका फुलका भोजन चबा-चबा के करें । एकदम खाली पेट हो गये तो ठाँस के नहीं खाना चाहिए और फलों से पेट नहीं भरना चाहिए अन्यथा कफ बन जायेगा । मूँग, चने, मुरमुरा आदि उपवास खोलने के लिए अच्छे हैं । लड्डू खा के जो उपवास खोलते हैं वे अजीर्ण की बीमारी को बुलायेंगे । एकदम गाड़ी बंद हुई और फिर चालू करके गेयर टॉप में डाल दिया तो डबुक-डबुक…. करके बंद हो जायेगी ।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल-मई 2020, पृष्ठ संख्या 22 अंक 328-329

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पूज्य बापूजी के वचन अपनायें विनाशक योग में भी अविनाशी परमात्मयोग पायें


21 जून (रविवार) को होनेवाला सूर्यग्रहण सम्पूर्ण भारतसहित एशिया, अफ्रीका के अधिकांश भाग, दक्षिण-पूर्वी यूरोप तथा ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी भाग में दिखेगा । यह ग्रहण उत्तर भारत के कुछ भागों में कंकणाकृति और अधिकांश भारत में खंडग्रास दिखेगा । गत वर्ष 26 दिसम्बर के सूर्यग्रहण के पूर्व ऋषि प्रसादमें उस ग्रहण-संबंधी जो भविष्यवाणी प्रकाशित की गयी थी कि इससे भारी उलटफेर होगा…’ उसकी सत्यता उसके पश्चात् काल में और अभी भी देखने को मिल रही है । इस वर्ष 21 जून को होनेवाला सूर्यग्रहण भी भारी विनाशक योग का सर्जन कर रहा है । यह देश व दुनिया के लिए महादुःखदायी है । इस योग से पृथ्वी का भार कम होगा । पूज्य बापूजी ने वर्षों पूर्व सत्संग में संकेत कर दिया था कि ‘‘आसुरी वृत्ति की सफाई का समय आ रहा है, दैवी वृत्ति की नींवें पड़ रही हैं । कुछ समय बाद सफाई होगी, फाइटर भागेंगे, उड़ेंगे ।’’ पूज्य बापूजी ने कई बार सत्संगों में कहा है कि जो ग्रहणकाल में उसके नियम-पालन कर जप-साधना करते हैं, वे न केवल ग्रहण के दुष्प्रभावों से बच जाते हैं बल्कि महान पुण्यलाभ भी प्राप्त करते हैं । इस बार का ग्रहण का योग जप-साधना के लिए अधिक उपयोगी है । महर्षि वेदव्यासजी कहते हैं : ‘‘रविवार को सूर्यग्रहण अथवा सोमवार को चन्द्रग्रहण हो तो चूड़ामणि योगहोता है । अन्य वारों में सूर्यग्रहण में जो पुण्य होता है उससे करोड़ गुना पुण्य चूड़ामणि योगमें कहा गया है ।’’ (निर्णयसिंधु) ग्रहण से होनेवाले दुष्प्रभावों से मानव-समाज को बचाने के लिए ब्रह्मवेत्ता महापुरुष पूज्य बापूजी ने न केवल अपने सत्संगों के माध्यम से शास्त्रों में वर्णित करणीय व अकरणीय बातें जन-जन तक पहुँचायी हैं बल्कि ग्रहण के समय जप, साधन-भजन आदि की व्यवस्था भी अपने आश्रमों में करवायी है । पूज्य बापूजी के असंख्य शिष्य, भक्त, सत्संगी अपने-अपने घरों में भी पूज्यश्री के मार्गदर्शन-अनुसार इस समय नियम-पालनपूर्वक साधन-भजन करते हैं । पूज्य बापूजी के सत्संग में आता है : ‘‘ग्रहण है तो कुछ-न-कुछ उथल-पुथल होगी । यदि अच्छा वातावरण है तो उथल-पुथल अच्छे ढंग से होगी । जैसे मोम पिघलता है तब उसमें बढ़िया रंग डालो तो बढ़िया रंग की मोमबत्ती बनती है और हलका रंग डालो तो हलके रंगवाली मोमबत्ती बनती है ऐसे ही इन दिनों में जैसा, जितना जप-तप होता है उतना बढ़िया लाभ मिलता है ।’’ जो केवल पुण्यकारक ही नहीं अपितु अनिष्टकारक तिथियों, योगों व परिस्थितियों को भी उन्नत होने का साधन बनाने की कला सिखाते हैं वे महापुरुष हैं संत श्री आशारामजी बापू। ऐसे विपरीत या विनाशकारी योगों में क्या करने से बचना चाहिए और क्या करना चाहिए इस बारे में पूज्य बापूजी के सत्संग में आता है : ‘‘सूर्यग्रहण में 4 प्रहर (12 घंटे) और चन्द्रग्रहण में 3 प्रहर (9 घंटे) पहले से सूतक माना जाता है । इस समय सशक्त व्यक्तियों को भोजन छोड़ देना चाहिए । इससे आयु, आरोग्य, बुद्धि की विलक्षणता बनी रहेगी । लेकिन जो बालक, बूढ़े, बीमार व गर्भवती स्त्रियाँ हैं वे ग्रहण से 1 से 1.5 प्रहर (3 से 4.5 घंटे) पहले तक चुपचाप कुछ खा-पी लें तो चल सकता है । बाद में खाने से स्वास्थ्य के लिए बड़ी हानि होती है । गर्भवती महिलाओं को तो ग्रहण के समय खास सावधान रहना चाहिए । शुभ-अशुभ की स्थिरता का विज्ञान चन्द्रमा और सूर्य के बीच पृथ्वी आती है तब चन्द्रग्रहण तथा पृथ्वी और सूर्य के बीच चन्द्र आता है तब सूर्यग्रहण होता है । चन्द्रग्रहण पूर्णिमा को और सूर्यग्रहण अमावस्या को ही होता है । ग्रहण के समय सूर्य या चन्द्र की किरणों का प्रभाव पृथ्वी पर पड़ना थोड़ी देर के लिए बंद हो जाता है । इसका प्रभाव अग्नि-सोम द्वारा संचालित प्राणी-जगत पर भी पड़ता है और सूर्य-चन्द्र की किरणों द्वारा जो सूक्ष्म तत्त्वों में हलचल होती रहती है वह भी उस समय बंद हो जाती है । हमारे जो सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम अवयव हैं उनमें भी हिलचाल नहींवत् हो जाती है । यही कारण है कि ग्रहण के समय कोई भी गंदा भाव या गंदा कर्म होता है तो वह स्थायी हो जाता है क्योंकि पसार नहीं हो पाता है । इसलिए कहते हैं कि ग्रहण व सूतक में भोजन तो न करें, साथ ही ग्रहण से थोड़ी देर पहले से ही अच्छे विचार और अच्छे कर्म में लग जायें ताकि अच्छाई गहरी, स्थिर हो जाय । अच्छाई गहरी, स्थिर हो जायेगी तो व्यक्ति के स्वभाव में, मति-गति में सुख-शांति आयेगी, आयु, आरोग्य व पुष्टि मिलेगी । अगर गंदगी स्थिर होगी, रजो-तमोगुण स्थिर होंगे तो जीवन में चिंता, शोक, भय, विकार और व्यग्रता घुस जायेगी । खाद्य पदार्थ ऐसे बचायें दूषित होने से ग्रहण के पहले का बनाया हुआ अन्न ग्रहण के बाद त्याग देना चाहिए लेकिन ग्रहण से पूर्व रखा हुआ दही या उबाला हुआ दूध तथा दूध, छाछ, घी या तेल इनमें से किसीमें सिद्ध किया हुआ अर्थात् ठीक से पकाया हुआ अन्न (पूड़ी आदि) ग्रहण के बाद भी सेवनीय है परंतु ग्रहण के पूर्व इनमें कुशा डालना जरूरी है । सूतक से पहले पानी में कुशा, तिल या तुलसी-पत्र डाल के रखें ताकि सूतक काल में उसे उपयोग में ला सकें । ग्रहणकाल में रखे गये पानी का उपयोग ग्रहण के बाद नहीं करना चाहिए किंतु जिन्हें यह सम्भव न हो वे उपरोक्तानुसार कुशा आदि डालकर रखे पानी को उपयोग में ला सकते हैं, ऐसा कुछ जानकारों का कहना है । ग्रहण का कुप्रभाव वस्तुओं पर न पड़े इसलिए मुख्यरूप से कुशा का उपयोग होता है । इससे पदार्थ अपवित्र होने से बचते हैं । कुशा नहीं है तो तिल डालें । इससे भी वस्तुओं पर सूक्ष्म-सूक्ष्मतम आभाओं का प्रभाव कुंठित हो जाता है । तुलसी के पत्ते डालने से भी यह लाभ मिलता है किंतु दूध या दूध से बने व्यंजनों में तिल या तुलसी न डालें । ग्रहणकाल में भूलकर भी न करें ग्रहण में अगर सावधानी रही तो थोड़े ही समय में बहुत पुण्यमय, सुखमय जीवन होगा । अगर असावधानी हुई तो थोड़ी ही असावधानी से बड़े दंडित हो जायेंगे, दुःखी हो जायेंगे। ग्रहणकाल में (1) भोजन करनेवाला अधोगति को जाता है । (2) जो नींद करता है उसको रोग जरूर पकड़ेगा, उसकी रोगप्रतिकारकता का गला घुटेगा । (3) जो पेशाब करता है उसके घर में दरिद्रता आती है । जो शौच जाता है उसको कृमिरोग होता है तथा कीट की योनि में जाना पड़ता है । (4) जो संसार-व्यवहार (सम्भोग) करते हैं उनको सूअर की योनि में जाना पड़ता है । (5) तेल-मालिश करने या उबटन लगाने से कुष्ठरोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है । (6) ठगाई करनेवाला सर्पयोनि में जाता है । चोरी करनेवाले को दरिद्रता पकड़ लेती है । (7) जीव-जंतु या किसी प्राणी की हत्या करनेवाले को नारकीय योनियों में जाना पड़ता है । (8) पत्ते, तिनके, लकड़ी, फूल आदि न तोड़ें । दंतधावन, अभी ब्रश समझ लो, न करें । (9) चिंता करते हैं तो बुद्धिनाश होता है । ये करने से सँवरेगा इहलोक-परलोक (1) सूर्यग्रहण के समय रुद्राक्ष-माला धारण करने से पाप नष्ट हो जाते हैं परंतु फैक्ट्रियों में बननेवाले नकली रुद्राक्ष नहीं, असली रुद्राक्ष हों । (2) मंत्रदीक्षा में मिले मंत्र का ग्रहण के समय जप करने से उसकी सिद्धि हो जाती है । (3) महर्षि वेदव्यासजी कहते हैं : ‘‘चन्द्रग्रहण के समय किया हुआ जप लाख गुना और सूर्यग्रहण के समय किया हुआ जप 10 लाख गुना फलदायी होता है ।’’ तो स्वास्थ्य-मंत्र  जप लेना, ब्रह्मचर्य का मंत्र भी सिद्ध कर लेना । ग्रहण के समय किया  हुआ ऐसा-वैसा कोई भी गलत या पाप कर्म अनंत गुना हो जाता है और इस समय भगवद्-चिंतन, भगवद्-ध्यान, भगवद्-ज्ञान का लाभ ले तो वह व्यक्ति सहज में भगवद्-धाम, भगवद्-रस को पाता है । ग्रहण के समय अगर भगवद्-विरह पैदा हो जाता है तो वह भगवान को पाने में बिल्कुल पक्का है, उसने भगवान को पा लिया समझ लो । ग्रहण के समय किया हुआ जप, मौन, ध्यान, प्रभु-सुमिरन अनेक गुना हो जाता है । ग्रहण के बाद वस्त्रसहित स्नान करें ’’ स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल & मई 2020, पृष्ठ संख्या 35 & 36, अंक 328 & 329

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