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Anmol Yuktiyan

पौष्टिक एवं बलवर्धक सूखे मेवे


सूखे मेवे पौषक तत्त्वों से भरपूर होते हैं, जिनके सेवन से शरीर में ऊर्जा बनी रहती है । इनसे न केवल पोषण मिलता है बल्कि दीर्घकाल तक शक्ति को बनाये रखने में मदद मिलती है । तो आइये, जानते हैं 2 सूखे मेवों के बारे में….

शक्तिवर्धक काजू

आयुर्वेद के अनुसार काजू स्निग्ध, पौष्टिक, उष्ण, वीर्यवर्धक, वायुशामक, पाचनशक्ति बढ़ाने वाला एवं जठराग्नि प्रदीपक है ।

आधुनिक अनुसंधानों के अनुसार काजू में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है । इसके साथ इसमें विटामिन्स, कैल्शियम, फॉस्फोरस, ताम्र, लौह, मैग्नेशियम, सोडियम, रेशे (dietary fibres) पाये जाते हैं ।

काजू हृदय रोगों में लाभदायी है । यह मानसिक अवसाद और कमजोरी के लिए बढ़िया उपचार है । यह मनोदशा को सुधारने में मदद करता है । यह भूख बढ़ाने और तंत्रिका तंत्र को मजबूत करने में मदद करता है । शरीर को सक्रिय, ऊर्जावान तथा मन को प्रसन्न बनाये रखने में मदद करता है ।

औषधीय प्रयोग

3-5 काजू पीस के दूध में मिलाकर पीने से शारीरिक शक्ति बढ़ती है ।

सुबह 3-5 काजू शहद के साथ खाने से दिमाग की कमजोरी, विस्मृति मिटती है । स्मरणशक्ति बढ़ती है । ऐसे ही सुबह-सुबह अंतःकरण चतुष्टय का आधार जो साक्षीस्वरूप है उसकी स्मृति करने से अपना अज्ञान मिटने लगता है, आत्मविस्मृति मिटने लगती है, परमात्मस्मृति जगने लगती है । ज्ञान और ध्यान मिलाकर अंतःकरण को सत्संग-सरिता में नहलाने से अंतःकरण की कमजोरी भी मिटती है, परमात्म सुख व स्मृति की वृद्धि होती है ।

मस्तिष्क पोषक (brain food) अखरोट

आयुर्वेद के अनुसार अखरोट गुणों में बादाम के सदृश होता है । इसे फलस्नेह या ब्रेन फूड भी कहा जाता है । इसकी गिरी मधुर, स्निग्ध, बलदायक, पचने में भारी, पुष्टिदायी, वायुशामक एवं कफ व पित्तवर्धक होती है ।

अखरोट में जिंक, फॉलिक एसिड, विटामिन ‘ई’ व ‘बी-6’ तथा लौह, ताम्र, फॉस्फोरस, मैग्नेशियम, मैंगनीज़, पोटैशियम, सोडियम आदि खनिज प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं ।

आधुनिक खोज के अनुसार अखरोट स्वास्थ्यप्रद फैटी एसिड ‘ओमेगा-3’ व ‘ओमेगा-6’ का सर्वोत्तम स्रोत है जो हानिकर कोलेस्ट्रॉल की मात्रा घटाते हैं, जिससे हृदय की रक्तवाहिनियों के अवरोध (coronary artery disease) से रक्षा होती है । इसे खाने से स्मृति बढ़ती है । यह मस्तिष्क के कार्य को सही ढंग से चलाने में मदद करता है । इसमें पॉलीफिनॉल्स होते हैं जो स्तन, प्रोस्टेट, बड़ी आँत व गुदा के कैंसर के खतरे को कम करते हैं । अखरोट मधुमेह से रक्षा व इसे नियंत्रित रखने में तथा उच्च रक्तचाप (hypertension) को कम करने में लाभकारी है ।

औषधीय प्रयोग

20 ग्राम अखरोट की गिरी पीसकर उसमें मिश्री, केसर मिला के दूध के साथ  लेने से कुछ हफ्ते में वीर्यवृद्धि होकर शुक्राणुओं की संख्या बढ़ती है ।

रात्रि को बिस्तर में पेशाब करने वाले बच्चों को 1 अखरोट की गिरी और 15 किशमिश मिलाकर खिलाने से बहुत लाभ होता है ।

ध्यान दें- सूखे मेवे सुबह के समय खाना विशेष लाभदायी है । जो शारीरिक श्रम नहीं करते हों अथवा ज्यादातर बैठे ही रहते हों उन्हें इनका सेवन अल्प मात्रा में करना चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2018, पृष्ठ संख्या 33 अंक 312

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कैसे पायें मधुमेह (Diabetes) से छुटकारा ?


वर्तमान में वैश्विक समस्या बनी हुई बीमारियों में से एक है मधुमेह । हम यहाँ मधुमेह में हितकर आहार-विहार, परहेज एवं ऐसा लाभदायी उपाय बता रहे हैं जो बिल्कुल निरापद है एवं जिसे सभी कर सकते हैं ।

कैसा हो आहार-विहार ?

हितकारी आहारः कड़वे व कसैले रसयुक्त एवं पचने म  हलके पदार्थ हितकारी हैं । प्रोटीन्स का सेवन पर्याप्त मात्रा में करें । विटामिन्स, खनिज तत्त्वों एवं रेशों से भरपूर सब्जियाँ व फल तथा देशी गाय के दूध का सेवन भी यथोचित मात्रा में करना आवश्यक है । एक वर्ष पुराने अनाज का सेवन उत्तम है । करेला, मेथी, सेम की फलियाँ, भिंडी, परवल, सहजन, बथुआ, लौकी, तोरई, जमीकंद (सूरन), कुम्हड़ा, पत्तागोभी, फूलगोभी, बैंगन आदि सब्जियों एवं चुकन्दर, खीरा, ककड़ी, टमाटर, मूली, अदरक, लहसुन आदि का सेवन हितकारी है । अनाजों में जौ, ज्वार, रागी, गेहूँ एवं दालों में मूँग, चना, मसूर आदि तथा सूखे मेवों में अखरोट व बादाम एवं फलों में जामुन, अंगूर, संतरा, मोसम्बी, स्ट्रॉबेरी, रसभरी हितकर हैं । देशी गाय का घी तथा हल्दी, मेथीदाना, अलसी, आँवला व नींबू का आहार में समावेश करें । काली मिर्च, राई, धनिया, जीरा, मिर्च लौंग का यथायोग्य उपयोग कर सकते हैं ।

हितकारी विहारः चरक संहिता के अनुसार विविध प्रकार के व्यायाम विशेषतः तेज गति से चलने का व्यायाम तथा योगासन, प्राणायाम एवं सूर्यनमस्कार करना हितकारी है । सुबह शाम एक-एक घंटा तेजी से चलें । कृश व दुर्बल रोगी यथाशक्ति हलक व्यायाम करें ।

किससे करें परहेज ?

आचार्य चरक लिखते हैं-

आस्यासुखं स्वप्नसुखं दधीनि ग्राम्यौदकानूपरसाः पयांसि ।

नवान्नपानं गुडवैकृतं च प्रमेहहेतुः कफकृच्च सर्वम् ।।

सतत सुखपूर्वक बैठे रहना, अति नींद लेना अर्थात् शारीरिक परिश्रम का अभाव, दही व दूध का अधिक सेवन, किसी भी प्रकार के मांसाहार का सेवन, नया अन्न (नया अनाज) व नया जल (वर्षा आदि का), गुड़, चीनी, मिश्री, मिठाइयाँ तथा कफ बढ़ाने वाले सभी पदार्थों (भात, खीर आदि) का अति सेवन प्रमेह के हेतु हैं । (प्रमेह रोग के 20 प्रकारों में से मधुमेह एक है ।) अतः इनका त्याग करना चाहिए । (चरक संहिता)

मधुमेह के लिए अऩुभूत रामबाण प्रयोग – पूज्य बापू जी

आधा किलो करेले काटकर किसी चौड़े बर्तन में रख के खाली पेट 1 घंटे तक कुचलें । 2-3 दिन में मुँह में कड़वापन महसूस होगा । 7 दिन खड़े-खड़े न कुचल सकें तो बीच में 5-10 मिनट कुर्सी पर बैठकर भी चालू रखें । करेले पके, बासी, सस्ते वाले भी फायदा करेंगे ही ।

इंसुलिन के इंजेक्शन लेने वाले को भी इस 7 दिन के प्रयोग से सदा के लिए आराम हो गया व छूट गयी सारी दवाइयाँ ! मात्र कुछ दिन शाम को आश्रम में मिलने वाली ‘मधुरक्षा टेबलेट’ नामक अचूक औषधि का प्रयोग करें ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2018, पृष्ठ संख्या 32 अंक 312

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महापुरुषों की लोक-मंगलकारी भावनाएँ


लोभी धन का चिंतन करता है, मोह परिवार का, कामी कामिनी का, भक्त भगवान का का चिंतन करता है लेकिन ज्ञानवान महापुरुष ऐसे परम पद को पाये हुए होते हैं क वे परमात्मा का भी चिंतन नहीं करते क्योंकि परमात्मस्वरूप के ज्ञान से वे परमात्मामय हो जाते हैं। उनके लिए परमात्मा निज्स्वरूप से भिन्न नहीं होता। हाँ, वे यदि चिंतन करते हैं तो इस बात का कि सबका मंगल सबका भला कैसे हो।

एक बार गुरु नानक देव जी ने संत कबीर के पास परीक्षार्थ चार आने भेजे और कहलवाया कि “इससे कोई ऐसी वस्तु लें, जिसे खाकर सौ व्यक्ति तृप्त हो जायें।” कबीर जी ने उन पैसों की हींग मंगा ली और एक सेठ के यहाँ हुए भँडारे में दाल में उसका बघार लगवा दिया। वह दाल जिसने भी खायी उसने प्रशंसा की, सब तृप्त हुए। यह समाचार सुन नानक जी बहुत प्रसन्न हुए।

बाद में संत कबीर जी ने गुरु नानक जी के पास एक रूपया भेजकर कहलवाया कि “इस एक रूपये का ऐसा उपयोग कीजिये कि सभी को स्वास्थ्य-लाभ मिले।”

नानकजी ने विचार किया और कुछ हवनीय औषधियाँ मँगाकर भगवन्नाम के साथ हवन करने लगे। हवन के स्वास्थ्यप्रद धुएँ से पूरा वातावरण पवित्र, सुगंधित हो गया, जिससे केवल मनुष्य ही नहीं बल्कि समस्त प्राणियों को लाभ मिला। यह बात सुनकर कबीर जी को अति प्रसन्नता हुई।

कैसे सुहृद होते हैं संत कि जिनका आपसी विनोद भी लोक-मांगल्यकारी एवं लोगों को सूझबूझ देने वाला होता है।

बापू जी की युक्ति, हुई भयंकर महामारियों से मुक्ति

वर्ष 2006 में सूरत में भीषण बाढ़ आयी थी, जिससे वहाँ कई गम्भीर बीमारयाँ फैल रही थीं। तब करूणासागर पूज्य बापू जी ने गूगल, देशी घी आदि हवनीय औषधियो के पैकेट बनवाये तथा अपने साधक-भक्तों को घर-घर जाकर धूप करने को कहा। साथ ही रोगाणुओं से रक्षा का मंत्र व भगवन्नाम-उच्चारण की विधि बतायी। विशाल साधक-समुदाय ने वैसा ही किया, जिससे सूरत में महामारियाँ व्यापक रूप नहीं ले पायीं।

वहाँ कार्यरत नेचुरोपैथी के चिकित्सकों ने जब यह देखा तो कहा कि “शहर को महामारियों से बचाना असम्भव था लेकिन संत आशाराम जी बापू ने यह छोटा सा परंतु बहुत ही कारगर उपाय दिया, जिससे शहरवासियों की भयंकर महामारियों से सहज में ही सुरक्षा हो गयी।”

पूज्य बापूजी ने अपने सत्संगों में वायुशुद्धि हेतु सुंदर युक्ति बताते हैं- “आप अपने घरों में देशी गाय के गोबर के कंडे पर अगर एक चम्मच मतलब 8-10 मि.ली. घी डालकर धूप करते हैं तो एक टन शक्तिशाली वायु बनती है। इससे मनुष्य तो क्या कीट-पतंग और पशु-पक्षियों को भी फायदा होता है। ऐसा शक्तिशाली भोजन दुनिया की किसी चीज से नहीं बनता। वायु जितनी बलवान होगी, उतना बुद्धि, मन, स्वास्थ्य बलवान होंगे।” (गौ-गोबल व विभिन्न जड़ी-बूटियों से बनी ‘गौ-चंदन’ धूपबत्ती पर घी अथवा तिल के तेल की बूँदें डालकर भी ऊर्जावान प्राणवायु बनायी जा सकती है।)

पूज्य बापू जी की ऐसी अनेकानेक युक्तियों का लाभ उठाकर जनसमाज गम्भीर बीमारियों से बचकर स्वास्थ्य लाभ पा रहा है।

अरबों रूपये लगा के भी जो समाजसहित के कार्य नहीं किये जा सकते, वे कार्य ज्ञानवान संतों की प्रेरणा से सहज में ही हो जाते हैं। संतों महापुरुषों की प्रत्येक चेष्टा लोक-मांगल्य के लिये होती है। धन्य हैं समाज के वे सुज्ञ जन, जो ऐसे महापुरुष की लोकहितकारी सरल युक्तियों का, जीवनोद्धारक सत्संग का लाभ लेते व औरों को दिलाते हैं!

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2018, पृष्ठ संख्या 6,9 अंक 311

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