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Anmol Yuktiyan

स्वास्थ्य-रक्षा हेतु कुछ घरेलु प्रयोग


अम्लपित्त (Acidity) जीरा और धनिया बराबर मात्रा में लेकर बारीक चूर्ण बना लें। इसमें समभाग मिश्री मिला लें। 3-3 ग्राम चूर्ण सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करें।

अफराः 1 गिलास छाछ में 2-3 ग्राम अजवायन का चूर्ण व थोड़ा सा सेंधा नमक मिला के लेने से अफरा दूर होता है व दूषित वायु का शीघ्र निष्कासन होता है।

पेटदर्दः 2 चम्मच नींबू का रस, 1 चम्मच अदरक का रस और थोड़ी सी मिश्री मिला के पीने से पेटदर्द में लाभ होता है।

पेचिशः 3-3 ग्राम बेल चूर्ण दिन में  3-4 बार छाछ के साथ सेवन करने से आँवयुक्त पेचिश में लाभ होता है। (बेल चूर्ण आश्रमों व समितियों के सेवाकेन्द्रों पर उपलब्ध है।)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2017, पृष्ठ संख्या 33 अंक 295

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चिंता आसक्ति मिटाने की अनमोल युक्ति


पूज्य बापू जी

भोजन में तुलसी के पत्ते डालने से वह भोजन आपका नहीं, ठाकुर जी का हो जाता है। तुलसी को माता समझते हो तो एक काम करो। आप सुबह उठो तो तुलसी के 15-25 पत्ते लेकर घर के ऊपर एक पत्ता रख दो कि ‘यह घर भगवान को अर्पण। मेरा नहीं, भगवान का है।’ कन्या के सिर पर तुलसी का पत्ता रख दो, ‘यह मेरी बेटी नहीं, आपकी है मेरे ठाकुर जी ! वेटी की मँगनी हो, शादी हो…. कब हो? आपकी मर्जी ! आज से मैं निश्चिंत हुआ।’ बेटे की चिंता है तो उस पर भी तुलसी पत्ता रख दो कि ‘ठाकुर जी ! मेरा बेटा नहीं, आपका है।’

जहाँ अपना स्वार्थ रहता है वहाँ भगवान बेपरवाह होते हैं। अपना स्वार्थ गया, भगवान का कर दिया तो भगवान सँभालते हैं। तुलसी का पत्ता लेकर जो बहुत अच्छी वस्तु ‘मेरी-मेरी’ लगती है, उसके ऊपर रख दो, ‘मेरा गहना नहीं, भगवान का है और शरीर भगवान का है….’ ऐसा करके गहना पहनो। फिर तिजोरी के ऊपर तुलसी का पत्ता रख दो कि ‘मेरी नहीं है, ठाकुर जी की है।’ ‘मेरा-मेरा’ मान के उसमें आसक्ति की तो मरने के बाद छिपकली, मच्छर,चूहा या और कोई शरीर लेकर उस घऱ में आना पड़ेगा इसलिए भगवद् अर्पण करके अपने व कुटुम्ब के लिए यथायोग्य सत्कृत्य के लिए उसका उपयोग करो पर उसमें आसक्ति नहीं करो। ‘मेरा-मेरा’ करके कितने ही चले गये, किसी के हाथ एक तृण आया नहीं। सच पूछो तो सब चीजें भगवान की हैं, यह तो हमारे मन की बेईमानी है कि उन्हें हम ‘हमारा-हमारा’ मानते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2016, पृष्ठ संख्या 20 अंक 288

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चंचलता मिटाओ, सफलता पाओ


पूज्य बापू जी

एकाग्रता सभी क्षेत्रों में सफलता की जननी, कुंजी है। यह एक अदभुत शक्ति है। ध्रुव और प्रह्लाद की सफलता में भी एकाग्रता एक कारण थी। हस्त चांचल्य, नेत्र चांचल्य, वाणी चांचल्य और पाद चांचल्य – ये चार प्रकार की जो चंचलताएँ हैं वे एकाग्रता में बड़ा विघ्न करती हैं।

हस्त चांचल्यः हस्त चांचल्य माने हाथ को अनावश्यक ही कभी किधर लगायेंगे – कभी किधर घुमायेंगे, कभी  तिनका तोड़ेंगे, कभी कान में उँगली डालेंगे, कोई विद्यार्थी बैठा होगा तो उसको पीछे से टपली मारेंगे तो कभी कुछ करेंगे। बैठे हैं तो चटाई  या तिनके तोड़ेंगे, इधर-उधर हाथ लगायेंगे। यह मन-बुद्धि को कमजोर करेगा। कई लोग नाक में उँगली डालते रहते हैं और कुछ मिल गया तो उँगली से घुमाते रहेंगे, घुमाते रहेंगे। बातचीत करेंगे, खायेंगे-पियेंगे और उसे घुमाते भी रहेंगे। घुमाते-घुमाते उसे देखेंगे फिर फेंक देंगे।

बैठे-बैठे कान कुरेदेंगे, इधर-उधर खुजलायेंगे, फिर कुछ भी उठाकर खा लेंगे। छी…. गंदा ! इससे बुद्धि भ्रष्ट होती है। यह बिन जरूरी है। हाथ भी गंदे हुए, समय भी खराब हुआ, मन व्यर्थ की चेष्टा में लगा।

 नेत्र चांचल्यः कईयों को नेत्र चांचल्य होता है। बंदर की तरह इधर-उधर आँखें घुमाते हैं। इससे शक्ति का ह्रास होता है। जो जितना ठग होता है, चोर दिमाग का होता है, उसकी आँखें उतनी ही चंचल होती हैं।

वाणी चांचल्यः कुछ लोग बोलते-बोलते फालतू के वचन बोलते हैं। मैंने कहा था जो है सो लेकिन यह माना नहीं हो है सो। अगर, मगर, लेकिन जैसे शब्द आवश्यकता न होने पर भी बोलते रहेंगे। उनकी आदत बन जाती है। मैं आपके घर गया था, समझे ! पर आप मिले नहीं, समझे ! मैं थोड़ी देर इंतजार किया, समझे ! फिर मैंने सोचा कि मुझे जाना है, समझे ! अब समझे-समझे…. क्या है ? आदमी बिल्कुल नपा तुला, कटोकट, सारगर्भित बोले, बिनजरूरी शब्द न डाले – यह बुद्धिमानी है। बात लम्बी करते हैं तो सामने वाला ऊब जाता है। प्रसंगोचित बोलना चाहिए। चलते-चलते बोलने से, जोर से बोलने से जीवनीशक्ति का ह्रास होता है। छांदोग्य उपनिषद में आता है कि आहार में जो अग्नि तत्त्व होता है उसके स्थूल अंश से अस्थियाँ, मध्यम अंश से मज्जा और सूक्ष्म अंश से वाणी बनती है। इसलिए कम बोलिये, सारगर्भित बोलिये, वाणी का व्यय न करें।

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोये।

औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होये।।

पाद चांचल्यः कुछ लोग बैठे-बैठे पैर हिलाते हैं, शांति से नहीं बैठेंगे। यह तुच्छ मनुष्य की पहचान है। यह चांचल्य मिटते ही जो शक्ति नष्ट हो रही है वह शक्तिदाता (परमात्मा) में विश्राम पाने लगेगी। मन के संकल्प-विकल्प कम होंगे तो बुद्धि पर दबाव कम पड़ेगा और बुद्धि पर दबाव कम पड़ने से भगवान को अपना मानने वाली बुद्धि का बुद्धियोग होने लगेगा।

इन चार प्रकार की चंचलताओं में जो जितना संयमी हो जाये, उतना वह तेजस्वी विद्यार्थी होगा, उतना तेजस्वी उद्योगपति होगा, उतना तेजस्वी अफसर होगा, उतना तेजस्वी समाज का आगेवान होगा, अगर वह संत बनता है तो उतना ही तेजस्वी उनका संतत्व होगा।

चंचलता मिटाने का उपाय

चंचलता निवारण करने का अपना विचार होता है तो आदमी बहुत ऊँचा उठ जाता है।

चंचलता ध्यान के द्वारा कम होती है। लम्बा श्वास लेकर दीर्घ प्रणव (ॐकार) का जप करो। जितना समय उच्चारण में लगे उतनी देर शांत हो जाओ। आप अपने शुद्ध ज्ञान में स्थित होंगे तो चारों प्रकार की चंचलता आसानी से मिट जायेगी, उससे होने वाली शक्तियों का ह्रास रुक जायेगा।

10 से 12 मिनट तक ॐकार का गुंजन करने तथा ॐकार मंत्र का अर्थ सहित ध्यान करने से हारे को हिम्मत, थके को विश्रांति मिलती है, भूले को अंतरात्मा मार्गदर्शन करता है। विद्युत का कुचालक आसन बिछा दे, 10-15 मिनट तक ध्यान करे और एकटक भगवान या गुरु की प्रतिमा अथवा ॐकार को देखता जाय तो साधारण से साधारण व्यक्ति भी इन चंचलताओं से ऊपर उठ जायेगा। बात को खींच-खींचकर लम्बी करने की गंदी आदत छूट जायेगी। मधुर वाणी, सत्य वाणी, हितकर वाणी जैसे सदगुण स्वाभाविक उत्पन्न होने लगेंगे।

यह प्रयोग करने से चारों प्रकार की चंचलताएँ छूट जायेंगी, व्यसन छोड़ने नहीं पड़ेंगे, अपने-आप भाग जायेंगे। चिंता भगाने के लिए कोई दूसरे नये उपाय नहीं करने पड़ेंगे। बुद्धिदाता की कृपा हो तो अल्प बुद्धिवाला भी अच्छी बुद्धि का धनी हो जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2016, पृष्ठ संख्या 21,22 अंक 280

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