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Anmol Yuktiyan

सात्त्विक ऊर्जा द्वारा दैवी गुणों का विकास करता है पिरामिड


सनातन धर्म के मंदिरों की छत पर एक त्रिकोणीय आकृति बनी होती है। जिसे वास्तुशास्त्र एवं वैज्ञानिक भाषा में पिरामिड कहते हैं। यह आकृति अपने आप में अदभुत है। हमारे ऋषियों ने ब्रह्माण्ड के तत्त्वों का सूक्ष्म अध्ययन करके उनसे लाभ लेने के लिए अनेक प्रयोग किये। मंदिर के शिखर की पिरामिडीय आकृति उन्हीं प्रयोगों में से एक है।

पिरामिड चार त्रिकोणों से बना होता है। ज्यामितीशास्त्र के अनुसार त्रिकोण एक स्थिर आकार है। अतः पिरामिड स्थिरता का प्रदाता है। पिरामिड के अऩ्दर बैठकर किया गया शुभ संकल्प दृढ़ होता है। कई प्रयोगों से यह देखा गया है कि किसी बुरी आदत का शिकार व्यक्ति यदि पिरामिड में बैठकर उसे छोड़ने का संकल्प करे तो वह अपने संकल्प में सामान्य अवस्था की अपेक्षा कई गुना अधिक दृढ़ रहता है और उसकी बुरी आदत छूट जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि पिरामिड में कोई भी दूषित, खराब या बाधक तत्त्व टिकते नहीं हैं। अपनी विशेष आकृति के कारण यह केवल सात्त्विक ऊर्जा का ही संयम करता है। इसीलिए कुछ दिन भी पिरामिड में रहने वाले व्यक्ति के दुर्गुण भाग जाते हैं।

पिरामिड में किसी भी पदार्थ के मूल कण नष्ट नहीं होते इसलिए इसमें रखे हुए पदार्थ सड़ते-गलते नहीं हैं। मिश्र के पिरामिड में हजारों वर्षों पहले रखे गये शव आज भी सुरक्षित हैं, यह उपरोक्त तथ्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

मिश्र के पिरामिड मृत शरीर को विक्षिप्त होने से बचाने के लिए बनाये गये हैं। इनकी वर्गाकार आकृति पृथ्वी तत्त्व का ही गुण संग्रह करती है जबकि मंदिरों के शिखर पर बने पिरामिड वर्गाकार के साथ-साथ तिकोने व गोलाकार आकृति के होने से पंच महाभूतों को सक्रिय करने के लिए बनाये गये हैं। इस प्रकार के सक्रिय (ऊर्जामय) वातावरण में भक्तों की भक्ति, क्रिया तथा ऊर्जाशक्ति का विकास होता है। दक्षिण भारत के मंदिरों के सामने अथवा चारों कोनों में पिरामिड आकृति के गोपुर इसीलिए बनाये गये हैं। ये गोपुर एवं शिखर इस प्रकार से बनाये गये हैं ताकि मंदिर में आऩे जाने वाले भक्तों के चारों और कॉस्मिक एनर्जी का विशाल एवं प्राकृतिक आवरण तैयार हो जाये।

अपनी विशेष आकृति से पाँचों तत्त्वों को सक्रिय करने के कारण पिरामिड शरीर को पृथ्वी तत्त्व के साथ, मन को वायु तथा बुद्धि को आकाश तत्त्व के साथ एकरूप होने के लिए आवश्यक वातावरण तैयार करते हैं।

पिरामिड किसी भी पदार्थ की सुषुप्त शक्ति को पुनः सक्रिय करने की क्षमता रखता है। फलतः यह शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक क्षमताओं को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

पिरामिड ‘ब्रह्माण्डीय ऊर्जा’ जिसे विज्ञान ‘कॉस्मिक एनर्जी’ कहता है, उसे अवशोषित करता है। ब्रह्माण्ड स्वयं कॉस्मिक एनर्जी का स्रोत है तथा पिरामिड अपनी अदभुत आकृति के द्वारा इस ऊर्जा को आकर्षित कर अपने अऩ्दर के क्षेत्र में घनीभूत करता है। यह कॉस्मिक एनर्जी पिरामिड के शिखरवाले नुकीले भाग पर आकर्षित होकर फिर धीरे-धीरे इसकी चारों भुजाओं से पृथ्वी पर उतरती हैं। यह क्रिया सतत् चलती रहती है तथा इसका अद्वितीय लाभ इसके भीतर बैठे व्यक्ति या रखे हुए पदार्थ को  मिलता है।

पूज्यपाद संत श्री आशाराम जी बापू के दिशा-निर्देशन में कई संत श्री आशाराम जी आश्रमों में साधना के लिए पिरामिड बनाये गये हैं। मंत्रजप, प्राणायाम एवं ध्यान के द्वारा साधक के शरीर में एक प्रकार की विशेष सात्त्विक ऊर्जा उत्पन्न होती है। यह ऊर्जा उसके शरीर के विभिन्न भागों से वायुमण्डल में चली जाती है परन्तु पिरामिड ऊर्जा का संचय करता है। अपने भीतर की ऊर्जा को बाहर नहीं जाने देता तथा ब्रह्माण्ड की सात्त्विक ऊर्जा को आकर्षित करता है। फलतः साधक पूरे समय सात्त्विक ऊर्जा के बीच रहता है।

आश्रम में बने पिरामिडों में साधक एक सप्ताह के लिए अन्दर ही रहता है। उसका खाना-पीना अऩ्दर ही पहुँचाने की व्यवस्था है। इस एक सप्ताह में पिरामिड के अऩ्दर बैठे साधक को अनेक दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं। यदि उस साधक की पिरमामिड में बैठने से पहले तथा पिरामिड से बाहर निकलने के बाद की शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक एवं बौद्धिक स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन किया जाय तो कोई भी व्यक्ति पिरामिड के प्रभाव को प्रत्यक्ष देख सकता है।

पिरामिड द्वारा उत्पन्न ऊर्जा शरीर की नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में बदल देती है जिसके कारण की रोग भी ठीक हो जाते हैं। व्यक्ति के व्यवहार को परिवर्तित करने में भी यह प्रक्रिया चमत्कारिक साबित होती है। विशेषज्ञों में तो परीक्षण के द्वारा यहाँ तक कह दिया कि पिरामिड के अन्दर कुछ दिन तक रहने से मांसाहारी पशु भी शाकाहारी बन सकता है।

इस प्रकार पिरामिड की सात्त्विक ऊर्जा का यदि साधना व आदर्श जीवन के निर्माण हेतु प्रयोग किया जाय तो आशातीत लाभ हो सकते हैं। हमारे ऋषियों का मंदिरों की छतों पर ‘पिरामिड शिखऱ’ बनाने का यही हेतु रहा है। हमें उनकी इस अनमोल देन का यथावत् लाभ उठाना चाहिए।

अधिकांश लोग यही समझते हैं कि पिरामिड मिश्र की देन है परन्तु यह सरासर गलत है। पिरामिड के बारे में हमारे ऋषियों ने मिश्र के लोगों से भी सूक्ष्म एवं गहन खोजें की हैं। मिश्र के लोगों ने पिरामिड को मात्र मृत शरीरों को सुरक्षित रखने के लिए बनाया जबकि हमारे ऋषियों ने इसे जीवित मानव की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए बनाया।

भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति है तथा भारत के अति प्राचीन शिल्पग्रन्थों एवं शिव स्वरोदय जैसे धार्मिक ग्रंथों में भी पिरामिड की जानकारी मिलती है। अतः हम कह सकते हैं कि पिरामिड मृत चमड़े की सुरक्षा करने वाले मिश्रवासियों की नहीं अपितु जीवात्मा एवं परमात्मा के एकत्त्व का विज्ञान जानने वाले भारतीय ऋषियों की देन हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 25,26 अंक 105

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बिना दवा स्मरणशक्ति का विकास


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

परब्रह्म परमात्मा में सोलह कलाएँ होती हैं। सृष्टि में प्रत्येक वस्तु तथा जीव उन सोलह कलाओं में से कुछ कलाओं के साथ जीवित अथवा स्थित रहते हैं। अलग-अलग वस्तुओं तथा जीवों में ईश्वर की अलग-अलग कलाएँ विकसित होती हैं। उन कलाओं में एक विशेष कला है – स्मृतिकला।

स्मृतिकला तीन प्रकार की होती हैः तात्कालिक स्मृति, अल्पकालिक स्मृति तथा दीर्घकालिक स्मृति।

कई जीवों में अल्पकालिक अथवा तात्कालिक स्मृतिकला ही विकसित होती है परन्तु मनुष्य में स्मृतिकला के तीनों प्रकार विकसित होते हैं। अतः मनुष्य को प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा जाता है।

मनोवैज्ञानिक विश्लेषणानुसार, ʹकुछ याद रखनाʹ एक प्रकार की जटिल मानसिक प्रक्रिया है। स्मरणशक्ति अर्थात् सुनी, देखी एवं अनुभव की हुई बातों का वर्गीकरण करके मस्तिष्क में उन्हें संगृहीत करना तथा भविष्य में जब भी उनकी आवश्यकता पड़े उन्हें फिर से जान लेना।

स्मृति के लिए दिमाग का जो हिस्सा कार्य करता है उसमें एसीटाइलकोलीन, डोयामीन तथा प्रोटीन्स के माध्यम से एक रासायनिक क्रिया होती है। एक प्रयोग के द्वारा यह भी सिद्ध हुआ है कि मानव-मस्तिष्क की कोशिकाएँ आपस में जितनी सघनता से गुंथित होती हैं उतनी ही उसकी स्मृति का विकास होता है।

मानसिक विशेषज्ञों के अनुसार, प्रायः सभी प्रकार के मानसिक रोग स्मृति से जुड़े होते हैं, जैसे कि चिन्ता, मानसिक रोग स्मृति से जुड़े होते हैं, जैसे कि चिन्ता, मानसिक अशांति आदि। ऐसे ढंग के व्यक्तियों में कोई भी कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व इतनी घबराहट बढ़ जाती है कि वे समय पर जरूरत की चीजों को अच्छी तरह से याद नहीं रख सकते।

विद्यार्थियों में यह समस्या अधिक पायी जाती है। परीक्षाकाल निकट आने पर अथवा परीक्षा-पत्र को देखकर घबरा जाने से अऩेक विद्यार्थी याद किये हुए पाठ भी भूल जाते हैं। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि स्मरणशक्ति पर मानसिक रोगों का सीधा प्रभाव पड़ता है।

हमारे प्राचीन ऋषियों ने स्मरणशक्ति को बढ़ाने के लिए प्राणायाम, ध्यान, धारणा आदि अनेक यौगिक प्रयोगों का आविष्कार किया है। उऩ्होंने तो ध्यान के द्वारा एक ही स्थान पर बैठे-बैठे अनेक ग्रहों एवं लोकों की खोज कर डाली।

महर्षि वाल्मीकि ने ध्यान के द्वारा अपनी बौद्धिक शक्तियों का इतना विकास किया कि श्रीरामावतार से पूर्व ही उन्होंने श्रीराम की जीवनी को ʹरामायणʹ के रूप में लिपिबद्ध कर दिया।

इसी प्रकार महर्षि वेदव्यासजी श्रीमद् भागवत महापुराण में आज से हजारों वर्ष पूर्व ही कलियुगी मनुष्यों के लक्षण बता दिये थे।

हमें मानना पड़ेगा कि हमारा ऋषिविज्ञान इतना विकसित था कि उसके सामने आजे के विज्ञान की कोई गणना ही नहीं की जा सकती।

महर्षि वाल्मीकि तथा वेदव्यासजी द्वारा रचित ये दो ग्रंथ-रामायण तथा महाभारत, उनकी चमत्कारिक तथा विकसित स्मरणशक्ति के उदाहरण स्वरूप हैं।

स्मरणशक्ति को बढ़ाने वाला भ्रामरी प्राणायाम हमारे ऋषियों की एक विलक्षण खोज है। भ्रामरी प्राणायाम द्वारा मस्तिष्क की कोशिकाओं में स्पंदन होता है जिसके फलस्वरूप एसीटाइलकोलीन, डोयामीन तथा प्रोटीन के बीच होने वाली रासायनिक क्रिया को उत्तेजना मिलती है तथा स्मरणशक्ति का चमत्कारिक विकास होता है।

कैसे करें भ्रामरी प्राणायाम ?

यह प्राणायाम करने के लिए सर्वप्रथम पाचनशक्ति मजबूत करने की आवश्यकता होती है। पाचनतंत्र में ग्रहण किये गये खाद्य पदार्थों को पचाने तथा उन्हें निष्कासित करने की पूर्ण क्षमता होनी चाहिए।

जिसका पाचनतंत्र कमजोर हो, उसे सर्वप्रथम ʹप्रातः पानी प्रयोगʹ तथा पाद-पश्चिमोत्तानासन के द्वारा अपने पाचनतंत्र को सुदृढ़ बनाना चाहिए। यह प्राणायाम करने वाले के लिए उपयुक्त पोषक तथा सात्त्विक आहार लेना भी अति आवश्यक है क्योंकि शुद्ध तथा पोषक तत्त्व न मिलने के कारण मस्तिष्क की कार्यक्षमता मन्द पड़ जाती है। अतः प्राणायाम करने वाले व्यक्ति के दैनिक भोजन में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, विटामिन तथा खनिज तत्त्वों की उपयुक्त मात्रा उसकी शारीरिक क्षमता के अनुसार होनी चाहिए।

इस प्रकार शुद्ध, सात्त्विक तथा पौष्टिक आहार लेते हुए प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकालीन तीनों संध्याओं के समय खाली पेट भ्रामरी प्राणायाम करने से स्मरणशक्ति का चमत्कारिक विकास होता है।

विधिः प्रातः काल शोच-स्नानादि से निवृत्त होकर कम्बल अथवा ऊन के बने हुए किसी स्वच्छ आसन पर पद्मासन, सिद्धासन अथवा सुखासन में बैठ जायें और आँखें बन्द कर लें।

ध्यान रहे कि कमर व गर्दन एक सीध में रहें। अब दोनों हाथों की तर्जनी (अँगूठे के पासवाली) उँगलियों से अपने दोनों कानों के छिद्रों को बन्द कर लें। इसके बाद खूब गहरा श्वास लेकर कुछ समय तक रोके रखें तथा मुख बन्द करके श्वास छोड़ते हुए भौंरे की तरह ʹૐ…..ʹ का लम्बा गुंजन करें।

इस प्रक्रिया में यह ध्यान अवश्य रखें कि श्वास लेने तथा छोड़ने की क्रिया नथुनों के द्वारा ही होनी चाहिए। मुख के द्वारा श्वास लेना अथवा छोड़ना निषिद्ध है।

श्वास छोड़ते समय होंठ बन्द रखें तथा ऊपर व नीचे के दाँतों के बीच में कुछ फासला रखें। श्वास अन्दर भरने तथा रोकने की क्रिया में ज्यादा जबरदस्ती न करें। यथासम्भव श्वास अंदर खींचे तथा रोकें। अभ्यास के द्वारा धीरे-धीरे आपकी श्वास लेने तथा रोकने की शक्ति स्वतः ही बढ़ती जायेगी।

प्रत्येक श्वास छोड़ते समय ʹૐʹ का गुंजन करें। इस गुंजन द्वारा मस्तिष्क की कोशिकाओं में हो रहे स्पन्दन (कम्पन) पर अपने मन को एकाग्र रखें।

प्रारम्भ में इस प्राणायाम का अभ्यास दस-दस मिनट सुबह-दोपहर अथवा शाम जिस संध्या में समय मिलता हो, नियमित रूप से करें। एक माह बाद प्रतिदिन एक-एक मिनट बढ़ाते हुए तीस मिनट तक यह प्राणायाम कर सकते हैं। किन्तु शारीरिक रूप से कमजोर तथा अस्वस्थ लोगों को प्राणायाम की संख्या का निर्धारण अपनी क्षमता के अनुसार करना चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 1999, पृष्ठ संख्या 9-11, अंक 78

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युक्ति से मुक्ति


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

अनपेक्षः शुचिर्दक्षः उदासीनो गतव्यथः।

सर्वारम्भपरित्यागी यो मद् भक्तः स मे प्रियः।।

ʹजो आकांक्षाओं से रहित, बाहर भीतर से पवित्र, दक्ष, उदासीन, व्यथा से रहित, सभी नये-नये कर्मों के आरम्भ का सर्वथा त्यागी है वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।ʹ (गीताः 12.16)

ऐसे भक्त के पीछे भगवान फिरते हैं। कबीर जी ने कहा भी है किः

कबीरा मन निर्मल भयो जैसे गंगा नीर।

पीछे-पीछे हरि फिरें कहत कबीर कबीर।।

अपेक्षाएँ, इच्छाएँ, आकांक्षाएँ ही मन को मलिन करती हैं। अपेक्षारहित, वासनारहित जीवन में ही गंगाजल की तरह मन निर्मल होता है। निर्मल मन वाले भक्त को, योगी को, ज्ञानी को, भगवान अति प्रेम करते हैं। अपेक्षारहित अवस्था में वैराग्य पनपता है, योगी का योग फलता है, भक्त की भक्ति फलती है, साधक की साधना फलती है, ज्ञानी का ज्ञान फलता है। अपेक्षाओं का त्याग ही सुन्दर समाज का निर्माण करता है, सुन्दर जीवन का निर्माण होता है, सुन्दर बुद्धि का प्राकट्य होता है, आन्तरिक सुन्दरता प्रकट होती है, चित्त शान्त होता है, आन्तरिक सामर्थ्य प्रकट होता है।

ʹइतना मिलना चाहिए… इतना खाना चाहिए… ऐसा तो रहना ही चाहिए…. ऐसा तो करना ही चाहिए…. इतना तो होना ही चाहिए…ʹ ऐसा विभिन्न प्रकार का आग्रह ही दुःखदायी है। नवग्रहों की अपेक्षा आग्रह ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि अपेक्षाओं के कारण ही मनुष्य नरक में जाता है। सत्पुरुषों से, सद् विचारों से, सत्साहित्य से तथा सत्शास्त्रों से दूर होता जाता है, छोटी-छोटी इच्छाओं व वासनाओं में ही उलझा रहता है। इन इच्छाओं, वासनाओं, अपेक्षाओं व आकांक्षाओं से ऊपर उठने की युक्ति है कि हम शुभ इच्छा यानी भगवत्तत्त्व में स्थित होने की इच्छा को तीव्र करते जायें। खाते-पीते, सोते-जागते, उठते-बैठते, काम करते, आते-जाते, चलते-फिरते भगवन्नाम व अपने नित्य शाश्वत् स्वरूप का चिंतन करें तो इन सभी तुच्छ वासनाओं से मुक्त हो जायेंगे। सहज मुक्ति की दूसरी युक्ति यह है कि जो भी परिस्थिति आपके सामने आ खड़ी होती है, उसे प्रभु की कृपा का प्रसाद समझकर प्रभु को धन्यवाद देते हुए स्वीकार कर लें। भगवदकृपा की प्रतीक्षा मत करो बल्कि जो भी स्थिति बनी है उसकी कृपा की समीक्षा करो। समीक्षा करने की कला सीखो। ʹहे प्रभु ! तू नचाना चाहता है तो मैं नाच लेता हूँ। तू रूलाना चाहता है तो मैं रो लेता  हूँ। तू हँसाना चाहता है तो मैं हँस लेता हूँ। तू खिलाना चाहता है तो खा लेता हूँ। तू अभाव में रखना चाहता है तो मैं अभाव में रह लेता हूँ। हे भगवन् !

तेरे फूलों से भी प्यार तेरे काँटों से भी प्यार।

चाहे सुख दे या दुःख दे हमें दोनों हैं स्वीकार।।

अपेक्षारहित होने की तीसरी युक्ति है अपने दुर्गुणों व गलतियों को याद करके वर्त्तमान का अनादर मत करो। अपने को अच्छा बनाने के लिए हम करते हैं कि हम सदगुणी बनें। ʹयह दुर्गुण मुझमें कैसे आ गया ? यह गलती मुझमें कैसे हो गई ?ʹ इस प्रकार जो दुर्गुण हो गये हैं उनका भी चिन्तन मत करो और जो सदगुण हैं उनका भी चिन्तन मत करो क्योंकि गुण तो माया के हैं चाहे वे दुर्गुण हों या सदगुण हों। हमें तो माया के पार, गुणातीत अवस्था में पहुँचना है, इसलिए किसी भी प्रकार का आग्रह छोड़ दो। जीवन में कोई हठ नहीं, कोई पकड़ नहीं, कोई मान्यताएँ नहीं, कोई आकांक्षा-अपेक्षा नहीं, कोई जिद्द नहीं। जीवन में जो भी परिस्थिति आये, मान आये, सुख आये तो चिन्तन करोः ʹप्रभु मुझे प्रेरणा देने के लिए मान दे रहे हैं, सफलता दे रहे हैं, सुविधा दे रहे हैं। हे प्रभु ! तेरी असीम कृपा को धन्य हो !ʹ

जीवन में जब अपमान आये, दुःख आये, असफलता आये, विरोध आये, विपत्ति आये तब भी चिन्तन करोः ʹहे दयालु प्रभु ! तू मुझे विपरीत परिस्थितियाँ देकर मेरी आसक्ति-ममता छुड़ा रहा है। मेरी परीक्षा लेकर मेरा साहस व सामर्थ्य बढ़ा रहा है। हे प्रभु ! तेरी कृपा की सदा जय हो !ʹ ऐसी समझ यदि हमने विकसित कर ली तो फिर कोई भी परिस्थिति हमें हिला नहीं सकेगी और हम निर्मल मन से आत्मदेव में स्थित होने का सामर्थ्य पाएँगे।

भगवन्नाम के जप-ध्यान से मन पवित्र होता है, बुद्धि पवित्र होती है, विचार पवित्र होते हैं। पवित्र विचारों से पवित्र कर्म होते हैं। पवित्र कर्मों के पवित्र फल होते हैं। पवित्रों में भी पवित्र परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार होता है, मुक्ति की अनुभूति होती है।

मुक्ति की युक्ति यही है कि साधक ध्यान-भजन-कीर्तन तो करे, साथ ही स्वभाव बदलने के लिए भी सतत् जागृत रहे। स्वभाव जिद्दी, मन बुरी आदतों में फँसा है, व्यसन छूटता नहीं है, परिस्थितियों, वस्तुओं व व्यक्तियों से राग-द्वेष छूटता नहीं है, चित्त छोटी-छोटी परिस्थिति से प्रभावित हो जाता है।

जप-ध्यान-भजन में मन लगता नहीं है, स्वभाव में माधुर्य नहीं आया तो मुक्ति से आप दूर होते चले जायेंगे। ध्यान-भजन में बरकत भी नहीं आयेगी, इसलिए स्वभाव बदलने के प्रति सदा जागृत रहें। अपेक्षारहित जिनका जीवन हो जाता है, उनके संकल्प सत्य हो जाते हैं। भगवान को, अवतारों को, संतों को कोई अपेक्षा नहीं होती। श्रीकृष्ण के जीवन में देखोः वे प्रेम भी उतना ही करते हैं और शासन भी उतना ही करते हैं। हमें शंका हो सकती है कि जो प्रेम करेगा वह शासन कैसे करेगा ? जो दयालु होता है वह न्याय नहीं कर सकता। न्यायाधीश है और दयालु है तो वह फाँसी की सजा कैसे देगा ?…. और सजा देगा तो दयालु कैसे ? ईश्वर व ईश्वरत्व को प्राप्त हुए सदगुरु दोनों में विपरीत गुण एक साथ पाये जाते हैं। उनमें प्रेम के साथ न्याय होगा, न्याय के साथ प्रेम होगा। यदि आप ईश्वर व गुरु से इमानदारी से प्यार करते हैं तो उनके लिए आपके हृदय से धन्यवाद के अलावा कुछ नहीं निकलेगा। यदि आपके अंतःकरण से फरियाद निकलती है तो आप समझ लीजिये कि प्यार में कही कोई कमी है। जहाँ सच्चा प्रेम होता है वहाँ दोषदर्शन नहीं होता। हमको सृष्टिकर्त्ता से प्रेम नहीं है, इसलिए हम कहते रहते हैं- ʹभगवान ने ऐसा क्यों किया ? भगवान ने अमुक के साथ बुरा किया… उसका जवान इकलौता बेटा ले लिया…. यह व्यक्ति कितना इमानदार है परन्तु भगवान ने इसे कितनी गरीबी दी है !ʹ यह सब फरियाद प्रभु में पूर्ण समर्पण के अभाव के कारण है। वास्तव में प्रभु जो कुछ करता है वह अच्छा ही करता है क्योंकि वह सबसे अधिक हमारा हितैषी है। उसके अधिक हितैषी हमारा कहीं कभी कोई हो ही नहीं सकता। वह सदा हमारे साथ है, कभी एक क्षण के लिए भी हमसे अलग नहीं हो सकता इसलिए जीवन जितना अपेक्षारहित बनाओगे उतना ही प्रभु को आप अपने निकट अनुभव करोगे।

गुरु, भगवान व शास्त्रों के वचनों को समझने से हमें परम सुख मिलता है। वस्तुओं तथा सुविधाओं की कमी के कारण हम दुःखी नहीं हैं अपितु ज्ञान व समझ की कमी के कारण हम दुःखी हैं। अपेक्षाएँ जितनी बढ़ती जाएँगी, हम उतने ही दुःखी होते जाएँगे। अपेक्षाएँ जितनी कम होती जाएँगी, हम उतने ही सुखी होंगे और अपेक्षाएँ नहीं हैं तो हम परम सुख में स्थित हो जाएँगे। हर इन्सान के पास पूरा का पूरा परम सुख पड़ा है परन्तु हमारे बाह्य वस्तुओं के आकर्षण की नासमझी ने हमको इस परम सुख से दूर कर रखा है। इसलिए अप्राप्त का चिन्तन छोड़ो तो ही प्राप्त का अनुभव होगा। अप्राप्त का चिन्तन छोड़ने का सरल तरीका है जो भी आपके पास नश्वर वस्तुएँ, सेवाएँ उपलब्ध हैं उनक सदुपयोग करो। इस तरह अप्राप्त का चिन्तन छूटते ही व्यक्ति सदा प्राप्त आत्मा में टिक जाता है। आत्मा ही पूर्ण आनन्दस्वरूप है, पूर्ण सुखस्वरूप है और आत्मा के सिवाय जो कुछ मिलेगा वह बिछुड़ेगा ही। जबकि एक बार आत्मा का ज्ञान हो जाये तो वह कभी नहीं जाता। केवल आत्मसुख ही शाश्वत है। अहंकार का सुख, धन का सुख, मान्यताओं का सुख, सुविधाओं का सुख, ये सब नश्वर हैं। ये सब हमारी नासमझी के कारण हमें वासनाओं की ओर ढकेलते हैं और वासनाओं के घटीयंत्र में जीव कई योनियों में जन्म-जन्मांतर तक भटकता रहता है। मनुष्य सुख के लिए जितना-जितना नश्वर पदार्थों का आधार लेता है, उतना ही वह उन वस्तुओं से बँध जाता है। नश्वर से बँधने की आदत हमारी सदियों पुरानी है। उसको मिटाने के लिए जरा मेहनत करनी पड़ेगी। सत्पुरुषों व सत्शास्त्रों का आधार लेना होगा। लाखों जन्मों से हम इन्द्रियों के गुलाम बनते चले आये हैं। जिस तरह लाखों वर्षों का अन्धकार प्रकाश होते ही गायब हो जाता है, उसी तरह लाखों जन्मों के बंधन सदगुरु के सान्निध्य से, उनके द्वारा दिये गये ज्ञान को पचाने से, तत्परता के साथ साधना करने कट सकते हैं। लाखों जन्मों का काम इसी एक जन्म में किया जा सकता है। जीते-जी मुक्ति की अनुभूति की जा सकती है। इसलिए, आपके पास जो समय है, जवानी है, सामर्थ्य है, बुद्धि है, साधन है, वे काफी हैं। वर्त्तमान में उनका सदुपयोग करो तो सहज ही भूत व भविष्य का चिन्तन छूट जायेगा। जितनी तत्परता से इस काम को करोगे उतना ही शीघ्र आत्मसुख की झलकियाँ प्राप्त होने लगेंगी। आपके हृदय में आनन्द का अदभुत खजाना है। जब भी गरदन झुका ली और मुलाकात कर ली। मुलाकात करने की कला सदगुरु के सान्निध्य से, उनके वचनों से, उनकी कृपा से सीख लो। वर्त्तमान की एक-एक क्षण को सदुपयोग में लगा दो तो अन्दर के आनन्द का अनुभव हुए बिना नहीं रह सकता।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 1997, पृष्ठ संख्या27,28,29 अंक 55

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