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सब लोग किसे चाहते हैं ?


जो व्यक्ति अच्छा व्यवहार करता है, ईमानदार है, सच्चा है तो उसे सब पसंद करते हैं। उसके पास बैठने में, उससे बात करने में हमें आनंद मिलता है। नम्रता, सहनशीलता, साहस, कार्य में लगन, आत्मविश्वास, विश्वासपात्रता, दयालुता, ईमानदारी, दृढ़ निश्चय, तत्परता, सत्यनिष्ठा इत्यादि अनेक उत्तम गुण हैं, जिनके मेल से मनुष्य का चरित्र बनता है। चरित्र का धन कोई साधारण धन नहीं है। इनमें से कुछ गुणों को भी पूरी तरह धारण करने से मनुष्य का जीवन सफल हो जाता है।

चरित्र –निर्माण कब और कैसे ?

चरित्र-निर्माण का सबसे अच्छा समय है बचपन। उस समय अच्छी आदतें सीखना आसान होता है। ये आदतें जीवनभर काम आती हैं। बालकों को जो बातें बतायी या सिखायी जाती हैं, वे उनके मन पर पक्की हो जाती हैं। गुरुजनों का, सदगुरु का सम्मान करने से और उनकी आज्ञा मानने से विद्या प्राप्त होती है। अर्जुन ने इसी प्रकार गुरु से धनुर्विद्या प्राप्त की थी। भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने गुरु वसिष्ठजी के आज्ञापालन से ही आत्मविद्या पायी थी।

मनुष्य के जीवन की नींव है चरित्र। शब्दों में नहीं बल्कि व्यवहार में प्रकट होते हैं चरित्र के गुण। दिखावट-बनावट से मनुष्य कुछ समय के लिए भले ही किसी को धोखे में रख ले परंतु ज्यादा समय तक धोखे में नहीं रख सकता। लोग चरित्रवान व्यक्ति की बात का विश्वास करते हैं। उसे उपयोगी तथा हितकारी मानते हैं। चरित्रवान दूसरों को धोखा नहीं देता, किसी को नीचे गिराने की कोशिश नहीं करता। वह ऐसी बात का प्रण नहीं करता, जिसे वह पूरा न कर सके।

उत्तम चरित्र क्या है ?

सच्चरित्रवान बनने के लिए मन, वाणी तथा शरीर से किसी को कष्ट मत दो। सच बात को भी प्रिय शब्दों में कहो। किसी की चीज न चुराओ, निंदा न करो। मान की लालसा मत करो। स्नान से शरीर की तथा ईर्ष्या-द्वेष, वैर-विरोध छोड़ने से मन की शुद्धि होती है। सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख सहते हुए अपने कर्तव्य को करो। सत्साहित्य का अध्ययन करते रहो। इन्द्रियों और मन को वश में रखकर अपने स्वभाव को सरल बनाओ। दुःखियों की सेवा करो। पूज्य बापू जी कहते हैं- “परमात्मा से दूर ले जाने वाली जो दुष्ट वासनाएँ हैं, वे दुश्चरित्र होते हैं। सच्चरित्रता से पुण्य होते हैं और पुण्य से हमको सत्संग, संत के दर्शन और परमात्मा में रुचि होती है।

पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। (संत तुलसी दास जी)

चरित्रवान के लक्षण

चरित्रवान मनुष्य बहुत अधिक चतुर बनने का प्रयत्न नहीं करता। सीधा-सच्चा व्यक्ति लोगों को अधिक प्रिय होता है। चरित्रवान अपने कार्यों की बड़ाई करके दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयत्न नहीं करता। वह धैर्यवान तथा सहनशील होता है। वह दूसरों के मत को ध्यान एवं धैर्य से सुनता है चाहे उसे दूसरे का मत ठीक न लगता हो फिर भी सुनने का धैर्य उसमें होता है। यदि वह किसी को उसकी भूल बताता है तो बड़ी नरमी से, तरीके से और उसके सुधार के लिए बताता है। चरित्रवान किसी का उत्साह भंग नहीं करता, वह किसी का दिल नहीं तोड़ता, वह सभी को नेक काम करने की सलाह देता है एवं उत्साहित करता है। वह स्वयं भी हिम्मत नहीं हारता। चरित्रवान मनुष्य सुख और दुःख में सम रहता है। विपत्ति के समय में वह सगे-संबंधियों या मित्रों को धोखा नहीं देता। ऐसी ही मित्रता श्रीकृष्ण ने सुदामा के प्रति निभायी थी। मित्रता निभाना भी सच्चरित्रता की निशानी है।

चरित्रः मानव की एक श्रेष्ठ सम्पत्ति

जो अपना कल्याण चाहता है उसे चरित्रवान बनना चाहिए। यदि हम चरित्रवान हैं, सत्कृत्य करते हैं तो हमारी बुद्धि सही निर्णय लेती है, हमें सन्मार्ग पर प्रेरित करती है। सन्मार्ग पर चलकर हम परमात्मप्राप्ति के लक्ष्य को आसानी से पा सकते हैं।

चरित्र मानव की श्रेष्ठ सम्पत्ति है, दुनिया की समस्त सम्पदाओं में महान सम्पदा है। मानव-शरीर के पंचभूतों में विलीन होने के बाद भी जिसका अस्तित्व बना रहता है, वह है उसका चरित्र। चरित्रवान व्यक्ति ही समाज, राष्ट्र व विश्व-समुदाय का सही नेतृत्व और मार्गदर्शन कर सकता है। अपने सच्चारित्र्य व सत्कर्मों से ही मानव चिरआदरणीय हो जाता है। जब हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य सत्स्वरूप ईश्वर होता है तो सच्चरित्रता में हम दृढ़ होते जाते हैं। सच्चरित्रवान बनने के लिए अपना आदर्श ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों को बनाना चाहिए।

जिसके पास सच्चरित्र नहीं है वह बाहर से भले बड़ा आदमी कहा जाय परंतु उसे अंदर की शांति नहीं मिलेगी एवं उसका भविष्य उज्जवल नहीं होगा। जिसके पास धन, सत्ता कम है परंतु सच्चारित्र्य बल है, उसे अभी चाहे कोई जानता, पहचानता या मानता न हो परंतु उसके हृदय में जो शांति रहेगी, आनंद रहेगा, ज्ञान रहेगा वह अदभुत होगा और उसका भविष्य परब्रह्म-परमात्मा के साक्षात्कार से उज्जवल होगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2016, पृष्ठ संख्या 22,23 अंक 278

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शास्त्रों का बोझा पटको, जीवंत महापुरुष की शरण लो


 

केसरी कुमार नाम के एक प्राध्यापक, जो स्वामी शरणानंद जी के भक्त थे, उन्होंने अपने जीवन की एक घटित घटना का जिक्र करते हुए लिखा कि मैं स्वामी श्री शरणानंद जी महाराज के पास बैठा हुआ था कि गीता प्रेस के संस्थापक श्री जयदयाल गोयंदकाजी एकाएक आ गये। थोड़ी देर बैठने के पश्चात बोलेः “महाराज ! मैं वेद और उपनिषद चाट गया। शास्त्र-पुराण सब पढ़ लिये। अनेक ग्रंथ कंठाग्र हैं। वर्षों से कल्याण पत्रिका में असंख्य जिज्ञासुओं के प्रश्नों के उत्तर देता रहा हूँ। किंतु महाराज ! मुझे कुछ हाथ नहीं लगा। मैं कोरा का कोरा हूँ।”
और वे अत्यन्त द्रवित हो गये। उन्हें अश्रुपात होने लगा।
मैंने एकांत में स्वामी जी से पूछाः “महाराज ! जब इन महानुभाव की यह दशा है, तब हम जैसों की आपके मार्ग में क्या गति होगी ?”
स्वामी जी एक क्षण चुप रहकर बोलेः “गोयंदकाजी के आँसुओं के रूप में धुआँ निकल रहा है भाई ! जो इस बात का लक्षण है कि लकड़ी में आग लग चुकी है। अध्ययन ईंधन है न, जले तो और न जले तो बंधन !”
मुझे चुप देखकर वे फिर ठहाका मारते हुए बोलेः “निराश न हो। तुम्हारे लिए भी एक नुस्खा है। भारी बोझ लेकर चलने वाले को देर होती ही है। गोयंदकाजी ने अपने माथे पर वेद-पुराणों का भारी गठ्ठर लाद रखा था, सो उन्हें पहुँचने में देर हो रही है। तुम्हारे माथे पर हलका बोझ है, जल्दी पहुँच जाओगे। बोझा पटक दो तो और जल्दी होगी। कार्तिकेय जी पृथ्वी परिक्रमा करते ही रहे और गणेश जी माता-पिता के चारों और घूमकर अव्वल हो गये।” (संदर्भः प्राकृत भारती अकादमी जयपुर द्वारा प्रकाशित ‘तरुतले’ भाग-1)
प्राध्यापक केसरी कुमार के जीवन में घटी यह घटना एक बड़े रहस्य की ओर इंगित करती है।
स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं- “हम भाषण सुनते हैं और पुस्तकें पढ़ते हैं, परमात्मा और जीवात्मा, धर्म और मुक्ति के बारे में विवाद और तर्क करते हैं। यह आध्यात्मिकता नहीं है क्योंकि आध्यात्मिकता पुस्तकों में, सिद्धान्तों में अथवा दर्शनों में निवास नहीं करती। यह विद्वता और तर्क में नहीं वरन् वास्तविक अंतःविकास में होती है। मैंने सब धर्मग्रंथ पढ़े हैं, वे अदभुत हैं पर जीवंत शक्ति तुमको पुस्तकों में नहीं मिल सकती। वह शक्ति, जो एक क्षण में जीवन को परिवर्तित कर दे, केवल उन जीवंत प्रकाशवान महान आत्माओं से ही प्राप्त हो सकती है जो समय-समय पर हमारे बीच में प्रकट होते रहते हैं।”
पूज्य बापू जी जैसे आत्मानुभव से प्रकाशवान जीवंत महापुरुष के मार्गदर्शन में उनके द्वारा बताये गये शास्त्रों का अध्ययन करना ठीक है लेकिन मनमानी पुस्तकों को पढ़ने वाले लोग प्रायः उलझ जाते हैं।
आद्य शंकराचार्य जी ने ‘विवेक चूड़ामणि’ में कहा हैः शब्दजालं महारण्यं चित्तभ्रमणकारणम्। सदगुरु के बिना यह चित्त को भटकाने का हेतु बन जाता है। अतः मनमुखी साधक सावधान ! व्यर्थ के वाणी-व्यय व मनमानी पुस्तकों में उलझने से बचो, औरों को बचाओ।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2016, पृष्ठ संख्या 9, अंक 277
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विचार की बलिहारी


‘नारद पुराण’ में आता है कि रैवत मन्वंतर में वेदमालि नामक एक प्रसिद्ध ब्राह्मण रहता था। विद्वान व शास्त्रज्ञ होने पर भी उसने अनेक उपायों से यत्नपूर्वक धन एकत्र किया। अपने व्रत, तप, पाठ आदि को भी दक्षिणा लेकर दूसरों के लिए संकल्प करके दे देता तथा शास्त्रनिषिद्ध व्यक्तियों से भी दान लेने में संकोच नहीं करता था।
‘मेरे पास कितना धन है’ यह जानने के लिए एक दिन उसने अपने धन को गिनना प्रारम्भ किया। उसका धन संख्या में बहुत ही अधिक था। धन की गणना करके वह हर्ष से फूल उठा। उस धनराशि को देखकर भगवान की कृपा से उसके चित्त में विचार का उदय हुआ, ‘मैंने नीच पुरुषों से दान ले के, न बेचने योग्य वस्तुओं का विक्रय करके तथा तपस्या आदि को बेच के यह प्रचुर धन एकत्र किया है। किंतु मेरी अत्यंत दुःसह तृष्णा अब भी शांत नहीं हुई। अहो ! मैं तो समझता हूँ, यह तृष्णा बहुत बड़ा कष्ट है। समस्त क्लेशों का कारण भी यही है। इसके कारण मनुष्य यदि समस्त कामनाओं को प्राप्त कर ले तो भी पुनः दूसरी वस्तुओं की अभिलाषा करने लगता है। बुढ़ापे में मनुष्य के केश पक जाते हैं, दाँत गल जाते हैं, आँख और कान भी जीर्ण हो जाते हैं किंतु यह तृष्णा शांत नहीं होती। मेरी सारी इन्द्रियाँ शिथिल हो रही हैं, बुढ़ापे ने मेरे बल को भी नष्ट कर दिया। किंतु तृष्णा तरुणी हो के और भी प्रबल हो उठी है। जिसके मन में कष्टदायिनी तृष्णा है, वह विद्वान होने पर भी मूर्ख हो जाता है, अत्यंत शांत होने पर भी महाक्रोधी हो जाता है और बुद्धिमान होने पर भी अत्यंत मूढ़बुद्धि हो जाता है।’
पश्चाताप करके वेदमालि ने अपने उद्धार के लिए हृदयपूर्वक भगवान से प्रार्थना की। उसने निश्चय किया कि ‘शेष जीवन संतों की सेवा, भगवद्-ध्यान, भगवद्-ज्ञान व भगवद्-सुमिरन में लगाऊँगा।’ अपने धन को उसने सरोवर, प्याउएँ, गौशालाएँ बनवाने, अन्नदान करने आदि में लगा दिया और किसी आत्मतृप्त संत-महात्मा की खोज एवं तपस्या के लिए नर-नारायण ऋषि के आश्रम बदरीवन की ओर चल पड़ा। वहाँ उसे मुनिश्रेष्ठ जानंति मिले।
वेदमालि ने हाथ जोड़कर विनय से कहाः “भगवन् ! आपके दर्शन से मैं कृतकृत्य हो गया। अब ज्ञान देकर मेरा उद्धार कीजिये।”
मुनिश्रेष्ठ जानंति बोलेः “महामते ! दूसरे की निंदा, चुगली तथा ईर्ष्या, दोषदृष्टि भूलकर भी न करो। सदा परोपकार में लगे रहो। मूर्खों से मिलना-जुलना छोड़ दो। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य छोड़कर लोक (जगत) को अपने आत्मा के समान देखो, इससे तुम्हें शांति मिलेगी। पाखंडपूर्ण आचार, अहंकार और क्रूरता का सर्वथा त्याग करो। सब प्राणियों पर दया तथा साधु पुरुषों की सेवा करते रहो। वेदांत का स्वाध्याय करते रहो। ऐसा करने पर तुम्हें परम उत्तम ज्ञान प्राप्त होगा। ज्ञान से समस्त पापों का निश्चय ही निवारण एवं मोक्ष हो जाता है।”
मुनि के उपदेशानुसार बुद्धिमान वेदमालि ज्ञान के साधन में लगे रहे। ‘मैं ही उपाधिरहित, स्वयं प्रकाश, निर्मल ब्रह्म हूँ’ – ऐसा निश्चय करने पर उन्हें परम शांति प्राप्त हो गयी। इस प्रकार गुरुकृपा से वे आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो गये।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2016, पृष्ठ संख्या 13, अंक 277
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